बचपन में मैं ऐसी ही कुंडलियां बनाती होऊंगी ......

June 20, 2011
अपने द्वारा बनायी गयी 27 वर्ष पहले की जन्‍मकुंडली मिलने के बाद मैं ज्‍योतिष के क्षेत्र में अपने अनुभव को लेकर काफी खुश थी और इंतजार कर रही थी कि पापाजी कब दिल्‍ली पहुंचे और मैं उनसे इस संबंध में बात कर सकूं। जैसे ही उनके दिल्‍ली पहुंचने की खबर मिली , मैने झट से फोन लगाया और उन्‍हे सारी बातें बतलायी। उन्‍होने बताया कि मैं तो और पहले से जन्‍मकुंडलियां बनाया करती थी । मैने आश्‍चर्य से पूछा कि आपने तो बचपन से ही आपकी सख्‍त हिदायत थी कि मैं ग्रेज्‍युएशन से पहले ज्‍योतिष की पुस्‍तकें नहीं छूऊंगी , फिर मै पहले कुंडली कैसे बना सकती हूं ??

इसके जबाब में पापाजी के शब्‍द थे ... ' कोई व्‍यक्ति विशेषज्ञ यूं ही नहीं बनता ,  बचपन में जब बच्‍चे कागज और कलम या पेन्सिल का प्रयोग करना शुरू करते हैं और कुछ रेखाचित्र खींचने लगते हैं , उस वक्‍त तुम कागज में कुंडलियां बनाया करती थी। हालांकि उस वक्‍त तुम्‍हें यह भी मालूम नहीं था कि कुंडली में जो खाने होते हैं उसमें 1 से 12 तक के अंक ही भरे जाते हैं या फिर उसमें लिखे जानेवाले अक्षर ग्रहों के छोटे रूप होते हैं। इसलिए तुम खेल खेल में जो कुंडलियां बनाया करती थी , उसमें सारे खानों में कोई भी अंक और कोई भी अक्षर लिखा होता था।' फोन रखने के बाद मैं एक बार फिर से बचपन में खो गयी और आपके लिए कंप्‍यूटर पर ये दोनो कुंडलियां बनायी , आखिर बचपन में मैं ऐसी ही कुंडलियां तो बनाती होऊंगी ......




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10 Komentar
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खेल भी खेला तो कुंडलियाँ बनाने वाला।
इसे कहते हैं होनहार बिरवान के होत के चिकने पात।

शुभकामनाएं

Balas
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आपके इस जुनून ने ही
आपको इस मुकाम पर पहुँचाया है!
शुभकामनाएँ!

Balas
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बचपन की यादें भी बहुत सुहानी होती हैं.

Balas
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tabhi to aaj aap khaas hui hai

Balas
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बचपन से ही इस विद्या में माहिर थीं आप ..

Balas
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हमारा रुझान तो बचपन में ही मिल जाता है...तभी तो आज आप इस मुकाम पर हैं...

Balas
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होनहार विद्वान के होत चिकने पात!!!

Balas
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खेल खेल में कुंडलियां बनाया करती थी

वाह!

Balas
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खेल खेल में कुंडलियां बनाया करती थी

वाह!
वाह ...

Balas
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क्या पता पूर्व जन्म का कोई संस्कार हो!

Balas