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नारी को युग के अनुरूप अपने व्‍यक्तित्‍व को मजबूत बनाना होगा ....


कुछ दिनों पूर्व एक उलझा हुआ सवाल मिला था , कहते हैं कि नियति निर्धारित है और उसे परिवर्तित नहीं किया जा सकता. तो क्या स्त्री की नियति भी निश्चित है जो उसे सदियों से भोग्या बना कर रख दिया गया है? पुरुष वर्ग ने ही सारी किस्मत का ठेका ले रखा है और औरत किस्मत की मारी बेचारी बन के रह गई है. क्या ज्योतिष की नजर से स्त्री चिंता का कोई समाधान मिल सकता है? आशा है आप मेरे इस सवाल का उत्तर अवश्य देंगी……


चिंतन के क्रम में बहुत सारी बातें जुटती गयी , जो आज पोस्‍ट के रूप में प्रस्‍तुत है ….


विविधता प्रकृति की सबसे बडी खासियत है , इसलिए जहां एक ओर शैवाल जैसे एक कोशिकीय जीव और केंचुए से लेकर ह्वेल और हाथी जैसे जीव और कमल एवं गुलाब जैसे सुंदर फूलदार से लेकर नागफनी जैसे रेगिस्तानी पौधे यहां मौजूद हैं, तो दूसरी ओर नीम, पीपल और वट जैसे विशाल वृक्ष जीवन के अनेक रूपों को आश्रय प्रदान कर जैव विविधता को बनाए हुए हैं । एक एक कण अलग अलग रंग रूप और स्‍वभाव लेकर बिखरे हुए हैं , यदि गंभीरता से विचार किया जाए तो किसी का भी महत्‍व कम नहीं लगता । विष और अमृत दोनो जगह जगह पर उपयोगी हैं , पर युग के अनुरूप प्रकृति की प्रत्‍येक वस्‍तु में कभी किसी का महत्‍व कम और कभी अधिक हो जाता है।

जब ‘शक्ति’ के आधार पर कोई सभ्‍यता और संस्‍कृति चले , अधिकांश समय ऐसा ही चला है , तो जैसा कि जंगल राज में चलता है , मजबूत अपने शिकार के लिए कमजोर जीवों को मारते हैं और कमजोर अपने बचाव का रास्‍ता ढूंढते हैं। पशुओं की प्रकृति को स्‍वीकार करना हमारी मजबूरी हो सकती है , पर हमारा दुर्भाग्‍य है कि हमें ऐसी प्रवृत्ति वाले मनुष्‍य को भी स्‍वीकार करना पडता है। ऐसा राज होने पर मनुष्‍य भी पशु ही हो जाते हैं , ऐसी स्थिति में बलवान शोषण करता है और बलहीनों को शोषित होना पडता है , इस दृष्टि से हमेशा नारी कमजोर है। इसी प्रकार कभी ‘पद’ तो कभी ‘धन’ को मजबूत माना जाता रहा और समाज में इनका महत्‍व बना रहा। प्राचीन नारियों के पास भी कभी न तो धन रहे और न पद। नारियों ने कभी एकजुट होकर इसके लिए लडने की हिम्‍मत भी नहीं की।

इसी प्रकार जब ‘ज्ञान’ के आधार पर कोई सभ्‍यता और संस्‍कृति चले तो ज्ञानी शोषण करते हैं और अज्ञानियों को शोषित होना पडता है। अज्ञानियों के हर कमजोरी का फायदा उठाकर ज्ञानी उसकी खासियत का उपयोग करते हैं , प्रकृति के सभी जीव जंतुओं को ऐसे ही उपयोग में लाया गया , इसके कारण आज कुछ ही वर्षों में न जाने कितने जीव विनाश के कगार पर हैं। प्राचीन काल से समाज में नारियों के ‘ज्ञान’ प्राप्‍त करने की सुविधा न होने से यहां भी उनकी लाचारी हो जाती है , उनकी कोमल भावनाओं का फायदा उठाकर उनकी हर खासियत का उपयोग किया जाता है। पर मैं समझती हूं कि ज्ञान का नाजायज फायदा उठानेवाले ऐसे ज्ञानी अज्ञानियों से भी बदतर हैं।

आज विकासशील और विकसीत देशों में ‘ज्ञान’ के आधार पर ही सभ्‍यता और संस्‍कृति चल रही है , इसी कारण पर्यावरण का हद से भी बुरा हाल है , वनों और वन्‍य जीवों का तो हाल पूछिए ही मत। पर यहां नारियों की स्थिति अविकसित देशों की तुलना में कुछ अच्‍छी मानी जा सकती है। जिन देशों में इन्‍हें ‘ज्ञान’ प्राप्‍त की सुविधा भी मिल रही है, इनकी लाचारी कम ही दिखती है , यदि विकास का क्रम बना रहा तो आनेवाले दिनों में इनकी स्थिति में सुधार संभव है । पर आनेवाली संस्‍कृति में ‘अर्थोपार्जन करने वाले ज्ञान’ का ही महत्‍व है , स्‍त्री हैं या पुरूष कोई मायने नहीं रखता । जो खुद , किसी व्‍यक्ति को , किसी कंपनी को या किसी सरकार को अर्थोपार्जन में मदद करते हैं , समाज में उनकी उपयोगिता है , चाहे इसके लिए आपको कोई भी उल्‍टा सीधा काम करना पडे , आपके सौ खून भी माफ हो सकते हैं। इसके विपरीत आप अर्थोपार्जन के गुर नहीं जानते तो आपके गुण , ज्ञान और ईमानदारी की कोई कीमत नहीं।

इसलिए हमारे प्राचीन ऋषि मुनियों ने सभ्‍यता संस्‍कृति को ‘धर्म’ के आधार पर चलाने का फैसला लिया था , ऐसी स्थिति में ‘शक्ति’ , ‘ज्ञान’ , ‘पद’ या ‘धन’ का नाजायज फायदा उठानेवाले नहीं होते। प्रकृति के एक एक कण की खासियत देखी जाती है और तदनुरूप उसका उपयोग किया जाता है। धर्म ने हमेशा आज के लिए नहीं , आनेवाले कल के लिए सोंचा , आनेवाली पीढी के लिए सार्थक चिंतन किया। यही कारण है कि सभी ‘धर्म’ का मूल व्‍यक्ति के मानवीय गुणों का विकास करना है। सिर्फ ‘स्‍व’ के बारे में सोचना आज के युग में बहुत बडी गल्‍ती है , प्रकृति में एक एक व्‍यक्ति के कार्य याद रखे जाते हैं और उन्‍हें उनके अच्‍छे और बुरे दोनो तरह के परिणाम भी मिलते हैं। पर विडंबना ही है कि जब सभ्‍यता संस्‍कृति ‘शक्ति’ , ‘ज्ञान’ , ‘पद’ या ‘धन’ के हिसाब से चलती है तो धर्म नाममात्र के लिए रह जाता है , क्‍यूंकि इसको भी उसी हिसाब से चला दिया जाता है।

अब यदि ज्‍योतिष पक्ष की बात की जाए तो ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ का विकास मात्र पचास वर्ष पुराना है और इससे पहले के ज्‍योतिष की पुस्‍तकों में सिद्धांतों की इतनी भीड है कि अध्‍ययन में किसी के पूरे जीवन गुजर जाएंगे और किसी निष्‍कर्ष पर पहुंचना संभव नहीं। उनके सभी नियमों में विरोधाभास है , एक का दूसरे से तालमेल का सर्वथा अभाव है। इसलिए खगोल शास्‍त्र के मूल आधार को लेकर हमारे पिताजी विद्या सागर महथा जी ने नए रूप में अध्‍ययन , मनन , चिंतन आरंभ किया और पचास वर्षों तक लगातार एक एक निष्‍कर्ष स्‍थापित करते चले गए। फलस्‍वरूप ज्‍योतिष की एक नई शाखा ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ का विकास हुआ। इतने मजबूत आधार प्राप्‍त करने के बाद 25 वर्षों से मैने भी उन्‍हें सहयोग देना आरंभ किया है , फलस्‍वरूप इसके विकास में तेजी आयी है।






‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ ने मनुष्‍य के जीवन में पडनेवाले ग्रहों के प्रभाव का बहुत अच्‍छा अध्‍ययन किया है, मानव जीवन के बहुत सारे पक्षों की बातें अब स्‍पष्‍ट समझ में आती है। खासकर मनुष्‍य के जीवन के विभिन्‍न काल पर ग्रहों से वे किस प्रकार प्रभावित होंगे , इसको स्‍पष्‍टत: बताया जा सकता है । ग्रहों के गत्‍यात्‍मक और स्‍थैतिक शक्ति की नई जानकारी के बाद मौसम , शेयर बाजार , राजनीति और अन्‍य क्षेत्रों में ग्रह के प्रभाव के बारे में लगातार अध्‍ययन चल रहा है और कई निष्‍कर्ष स्‍थापित किए जा चुके हैं।






पर युग पर ग्रहों के प्रभाव के अध्‍ययन की अभी शुरूआत ही हुई है , हाल फिलहाल में मैने वृद्धों के जीवन पर पड रहे ग्रहों के बुरे प्रभाव का कारण ढूंढने में सफलता पायी है। उसके हिसाब से भारतवर्ष में 2020 के बाद क्रमश: ऐसा वातावरण बनना आरंभ होगा कि वृद्धों का महत्‍व बढता जाएगा। पिछली सदी के अंतिम दशक में युवाओं को गंभीर निराशाजनक परिस्थिति का सामना करना पडा था, क्‍यूंकि हर नौकरी में छंटनी का दौर चल रहा था, विरले ही किसी प्रतियोगिता में सफल होते थे। 2000 के बाद युवाओं के समक्ष कार्यक्रमों की कमी नहीं , चारो ओर उन्‍हें प्रशिक्षित करने के लिए कॉलेज खुल रहे हैं और उनकी मांग बनी हुई है।






पर ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ नारियों की दुर्दशा के बारे में कोई ग्रहीय कारण स्‍पष्‍टत: नही समझ सका है , अभी लंबे शोध की आवश्‍यकता है। वैसे भी नए सिरे से अध्‍ययन की जाए तो युग के अध्‍ययन में युग लग जाते हैं , विदेशियों के आक्रमण ने हमारा परंपरागत ज्ञान को नष्‍ट जो कर दिया है। पर इतना तो अवश्‍य है कि प्रकृति ने युग और काल के अनुरूप किसी के बनावट में कुछ कमजोरी दी है तो इनके भाग्‍य में कुछ कमी तो अवश्‍य होगी और उसका फल उन्‍हें झेलना ही होगा। नारी को युग के अनुरूप अपने व्‍यक्तित्‍व को मजबूत बनाना होगा।