क्या ज्योतिष विज्ञान है या अंधविश्वास? इस ब्लॉग में आप ज्योतिष के आधुनिक सूत्रों से सम्बद्ध नवीन ज्योतिषीय सिद्धांत के बारे में जानकारी प्राप्त करेंगे, जो ज्योतिष की सटीकता पर शोध, ज्योतिष में नए शोध और निष्कर्ष के उपरांत विकसित किया गया है, नए ज्योतिष सूत्रों के माध्यम से कुंडली विश्लेषण, इन ज्योतिष के नए नियमों से भविष्यवाणी कैसे करें, 'ज्योतिष सीखने के लिए नए सूत्र और विधियाँ बताई गयी हैं।
दुनिया का सबसे आसान शब्द है मां
Specialist in Gatyatmak Jyotish, latest research in Astrology by Mr Vidya Sagar Mahtha, I write blogs on Astrology. My book published on Gatyatmak Jyotish in a lucid style. I was selected among 100 women achievers in 2016 by the Union Minister of Women and Child Development, Mrs. Menaka Gandhi. In addition, I also had the privilege of being invited by the Hon. President Mr. Pranab Mukherjee for lunch on 22nd January, 2016. I got honoured by the Chief Minister of Uttarakhand Mr. Ramesh Pokhariyal with 'Parikalpana Award' The governor of Jharkhand Mrs. Draupadi Murmu also honoured me with ‘Aparajita Award’ श्री विद्या सागर महथा जी के द्वारा ज्योतिष मे नवीनतम शोध 'गत्यात्मक ज्योतिष' की विशेषज्ञा, इंटरनेट में 15 वर्षों से ब्लॉग लेखन में सक्रिय, सटीक भविष्यवाणियों के लिए पहचान, 'गत्यात्मक ज्योतिष' को परिभाषित करती कई पुस्तकों की लेखिका, 2016 में महिला-बाल-विकास मंत्री श्रीमती मेनका गाँधी जी और महामहिम राष्ट्रपति प्रणव मुख़र्जी द्वारा #100womenachievers में शामिल हो चुकी हैं। उत्तराखंड के मुख्य मंत्री श्री रमेश पोखरियाल जी के द्वारा 'परिकल्पना-सम्मान' तथा झारखण्ड की गवर्नर श्रीमती द्रौपदी मुर्मू जी द्वारा 'अपराजिता सम्मान' से मुझे सम्मानित होने का गौरव प्राप्त हुआ। Ph. No. - 8292466723
हिंदी दिवस पर विशेष
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इंटरनेट दिवस : सावधानी बरतने का संकल्प
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एक ब्लॉगर्स मीट में मेरा विचार
- हमारे देश में सदैव 'विविधता में एकता' की भावना विकसित होती रही है , इसलिए मेरे विचार से देश के लोगों की जाति , धर्म या रहन सहन जो भी हो कोई अंतर नहीं पडता , बस लोगों के अंदर देश भक्ति की भावना में कहीं कोई कमी नहीं आनी चाहिए , हम अपने बच्चों को ऐसी शिक्षा दें कि किसी के बहकावे में आकर वे देश का नुकसान न करें। सरकार को बस इतना करना है कि वे सभी नागरिकों को समान सुविधाएं दें। नौकरी में आरक्षण देकर समाज के कमजोर पक्ष को आर्थिक सुरक्षा भले ही आवश्यक हो , पर देश के हित के लिए जिम्मेदारी से भरे सरकारी उच्च पदों में या पदोन्नति में प्रतिभा को महत्व दिया जाना चाहिए।
- देश की आनेवाली पीढी को यानि युवाओं को प्रतिभाशाली बनाने के लिए रटंत प्रणाली की शिक्षा को समाप्त कर इसे व्यावहारिक और उपयोगी बनाने पर बल दिया जाना चाहिए , अपनी अपनी रूचि और प्रतिभा के हिसाब से सभी युवाओं को सरकार की ओर से एक समान अवसर मिलना चाहिए। दबाबपूर्ण पाठ्यक्रम युवाओं के प्रतिभा को नुकसान पहुंचाती है।
- आज प्राइवेट संस्थानों ने संचार क्रांति का पूरा फायदा उठाया है , एक एक कर्मचारी की गतिविधियों पर उनकी पूरी निगाह रहती है , सरकार के लिए तो यह और आसान है। संचार क्रांति के इस युग में सरकारी तंत्र की जनता के मध्य पारदर्शिता बहुत बडी बात नहीं , बस इच्छा शक्ति होनी चाहिए।
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फिलहाल किसी क्रांति की कोई संभावना नहीं मुझे तो नहीं दिखती ..
आज निम्न वर्गीय परिवारों के बच्चों को खाना , कपडा , मकान , सायकल और जरूरत की अन्य चीजें मुफ्त मिल रही है .. जो उनके माता पिता को दिनभर कडी मेहनत के बाद भी नहीं मिल पाती थी ... वे इस व्यवस्था में क्या खामी देखेंगे ??
मध्यमवर्गीय परिवार के बच्चों को प्रतियोगिता और मल्टीनेशनल कंपनी की नौकरी के दायित्वों तले उलझा दिया गया है .. भले ही महानगर में रहने की बाध्यता तले उनके पैसे न बच पाए .. पर बडी बडी सेलरी को देखने के बाद वे इस व्यवस्था में क्या खामी देखेंगे ??
उच्च वर्गीय परिवारों के बच्चे भी अपनी कंपनी को चुंबकीय बनाने के लिए ऐसी ऐसी ट्रेनिंग लेने में व्यस्त है .. जो पूरे बाजार में बिखरे पडे पैसो को अपनी ओर खींच सके .. इसकी पूरी सुविधा होने से वे इस व्यवस्था में क्या खामी देखेंगे ??
इसके अलावा सरकारी तंत्र के लोगों ने इसे सीमा से अधिक भ्रष्ट कर दिया है ... अपने अधिकारों का नाजायज फायदा उठाकर अपनी संतानों को कई पीढी तक नालायक बनाने की पूरी व्यवस्था कर चुके हैं .. उनकी संताने भी इस व्यवस्था में क्या खामी देखेंगी ??
इस व्यवस्था में खामी को दूर करने की हमारी सोंच तभी कामयाब हो सकती है ... जब हम दूसरे की तकलीफ को अपनी तकलीफ समझें .. पर किसी भी वर्ग के नवयुवकों के पास खुद के सिवा दूसरों की समस्या के लिए सोंचने का वक्त नहीं .... अब इस स्वार्थपूर्ण माहौल में भारतवर्ष में हाल फिलहाल में किसी क्रांति की कोई संभावना नहीं मुझे तो नहीं दिखती ..
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नारी को युग के अनुरूप अपने व्यक्तित्व को मजबूत बनाना होगा ....
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अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर एक जरूरी मांग ... अपनी सरकार से
Mahila divas kab manaya jata hai
मैने जब कॉलेज की लडकियों से इस अंतर की चर्चा की तो उन्होने कहा कि उनकी मम्मी भी कुछ ऐसे ही बताती हैं। फिर बात आयी हमारे जमाने में परिवार के लिए किए जाने वाले महिलाओं के समझौते पर , एक लडकी ने बताया कि उसकी मम्मी बीएड कर चुकी थी , नौकरी करने को पापा ने मना कर दिया और मम्मी घर परिवार संभालने के चक्कर में मान भी गयी। मैने कहा कि उस जमाने में किसी एक महिला के साथ नहीं , बहुतों के साथ ऐसा हुआ कि उन्हें कैरियर को ताक पर रखना पडा। हमारे परिचय की एक गायनोकोलोजिस्ट हैं , जिन्होने नौकरी के अधिकांश समय छुट्टियों में ही व्यतीत किए , फिर रिजाइन करना पडा , क्योंकि पतिदेव की पोस्टिंग जहां थी , वहां से वे ट्रासफर नहीं करा सकते थे और ये न तो वहां आ सकती थी और न अकेले बच्चों को लेकर रह सकती थी।
सरकारी नौकरी कर रही महिलाओं को भले ही दुधमुंहे कभी कमजोर ,कभी बीमार बच्चे को छोडकर भले ही नौकरी को संभाल पाने में महिलाओं को दिक्कत होती हो , पर घर परिवार की जिम्मेदारी से मुक्त होते ही बच्चों के स्कूल में एडमिशन के पश्चात हल्के रूप में और बच्चों के बारहवीं पास करते ही अचानक महिलाओं को कुछ अधिक ही फुर्सत मिलने लगती है। कम पढी लिखी कम विचारशील महिलाएं अपनी अपनी मंडलियों में आ जाकर , फिल्में टीवी देखकर समय काट ही नहीं लेती , अपने दायित्व विहीन अवस्था का नाजायज फायदा उठाती हैं और समय का पूरा पूरा दुरूपयोग करती हैं। उनकी छोटी मोटी जरूरतें पतियों के द्वारा पूरी हो जाने से वे निश्चिंत रहती हैं।
पूरी एक पीढी की युवतियों का यह सोंचना कि परिवार के लिए कैरियर को छोडना उचित नहीं , आने वाले समय में बहुत बडी अव्यवस्था पैदा कर सकता है। हमारी पीढी की गैर कामकाजी महिलाओं ने बच्चों के प्रत्येक क्रियाकलापो पर ध्यान रखा , उसे शारीरिक , नैतिक , बौद्धिक और चारित्रिक तौर पर सक्षम बनाया । सारी कामकाजी महिलाओं के बच्चों का लालन पालन ढंग से न हो सका , ऐसी बात भी नहीं है , यदि परिवार में बच्चों पर ध्यान देने वाले कुछ अभिभावक हों या पति और पत्नी मिलकर ही बच्चों का ध्यान रख सकते हों , तो महिलाओं के नौकरी करने पर कोई दिक्कत नहीं आयी। पर आज की युवतियॉ कैरियर को अधिक महत्व देंगी , वो भी प्राइवेट जॉब को वरियता देती हैं , तो बच्चे आयाओं के भरोसे पलेंगे , उनके हिसाब से ही तो उनका मस्तिष्क विकसित होगा।
कैरियर को महत्व देते हुए विवाह न करने या विवाह के बाद बच्चे न पैदा करने का व्यक्तिगत फैसला समाज के लिए दुखदायी नहीं है , पर विवाह कर बच्चे को जन्म देने के बाद उसका उचित लालन पालन न हो , यह समाज के लिए सुखद संकेत नहीं। आने वाले समय में बच्चों का पालन पोषण , देख रेख भी सही हो , और महिलाएं भी संतुष्ट रहे , इसके लिए सरकार को बहुत गंभीरता से एक उपाय करने की आवश्यकता है। नौकरी को लेकर महिलाओं के सख्त होने का सबसे बडा कारण यह है कि उम्र बीतने के बाद उनके लिए कोई संभावनाएं नहीं बचती , जबकि बच्चों को पढाने के क्रम में उनकी पढाई लिखाई चलती रहती है और भले ही अपने विशिष्ट विषय को भूल भी गयी हूं , उनका सामान्य विषयों का सामान्य ज्ञान कम नहीं होता।
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दामिनी को सच्ची श्रद्धांजलि कैसे मिले ??
Mahila sashaktikaran par nibandh
पुराने वर्ष को विदा करने और नए वर्ष का स्वागत करने के , व्यतीत किए गए वर्ष का मूल्यांकण करने और नए वर्ष के लिए अपने कार्यक्रम बनाने यानि हर व्यक्ति के लिए महत्वपूर्ण दिसंबर के उत्तरार्द्ध और जनवरी के पूवार्द्ध में पड रही कडाके की ठंड के मध्य देश एक अलग ही आग में जल रहा है । एक दुष्कर्म के एवज में अपराधियों को फांसी मिलने की मांग पर जनता अटल है , और सरकार अपनी जिद पर । पर सारी घटनाओं को देखने सुनने और चिंतन करने के बाद चाहकर भी इतने दिनों तक अपने विचारों को सुनियोजित ढंग से लिख पाने में सफल न हो सकी। क्योकि मेरा सारा ध्यान संकेन्द्रण अपने सॉफ्टवेयर में एक एक्सटेंशन करने में बना हुआ था , जिसकी जानकारी ज्योतिषप्रेमियों को मेरे ज्योतिष वाले ब्लॉग से मिल जाएगी , मुझे यहां चर्चा करने की जरूरत नहीं है , क्योंकि इससे मुख्य मुद्दे से भटकने का भय है।
वैसे बहुत खुशी की बात है कि 23 वर्षीया बच्ची दामिनी को इंसाफ दिलाने के लिए सारा देश एक साथ उठ खडा हुआ है। वैसे ऐसी घटना कोई पहली बार हमारे देश में नहीं हुर्इ है , प्रतिदिन अखबारों में ऐसी घटनाएं नजर में आ ही जाती हैं , शारिरीक और भावनात्मक तौर पर कमजोर होने का फायदा कभी कोई उठा ही लेता है। पुराने जमाने में तो बच्चियां अभिभावकों के आसपास उनकी देख रेख में रहा करती थी । पर आज युग बदल चुका है , बचे भी तो वे कैसे ? शिक्षा दीक्षा काम काज सब उनके लिए भी आवश्यक है , पहले की महिलाओं की तरह चादर बुरके में घर आंगन में कैद तो नहीं रह सकती। हजारों महिलाएं अपने साथ हो रहे अन्याय को आज भी बेबसी से देख रही हैं।
इसका मुख्य कारण यह है कि हमारे समाज में आजतक ऐसी व्यवस्था है कि इस मामले में शिकारी को नहीं शिकार को ही सजा दी जाती है। यही कारण है कि आजतक लडकियों की जीवनशैली को इस कदर बनाया जाता रहा कि वे किसी के शिकार होने से बचे। यदि कभी किसी खास परिस्थिति में उनके साथ कोई हादसा हो भी गया तो इस बात को पचाना लडकियों या उसके परिवार वालों की मजबूरी होती है। दुनिया भर में प्रत्येक समाज और राष्ट्र में अपराध के हिसाब से दिया दोषी को दंड दिए जाने का नियम है। पर हमारे यहां आजतक ऐसे अपराध करने वाले समाज में सर उठाकर घूमते हैं। पर तरह तरह के सवालों , तानों से मासूम लडकियों का जीवन बेकार हो जाता है । इसलिए आजतक प्रत्येक गांव शहरों में ऐसे मुद्दों को अभिभावकों द्वारा ढंककर ही रखा जाता है। यहां तक कि ऐसी अपराधों की जानकारी बच्चियों या घर की महिलाओं तक ही सीमित रह जाती है , घर के पुरूषों तक को ऐसे अपराधों का पता नहीं चल पाता। बच्चियों , उनके अभिभावकों की चुप्पियों का बलात्कारी नाजायज फायदा उठा रहे हैं।
गिने चुने मामलों में ही ऐसी बातें सार्वजनिक होती है , जब घरवालों के नहीं, बाहरवालों के नजर में ऐसी घटनाएं आ जाती हैं। इस वक्त भी घरवालों के द्वारा नहीं , बाहरी लोगों के नजर में आ जाने से ही बलात्कारियों के विरूद्ध ऐसी आवाज उठी है , लाखों दामिनियां अभी भी सबकुछ झेलती जा रही हैं। खैर दामिनी अब नहीं रही , इसलिए उसकी जिंदगी के बेकार होने का खतरा तो नहीं है । पर समाज को अपनी सोंच बदलने की आवश्यकता है , किसी निर्दोष को दोषी ठहराना कदापि उचित नहीं , यही अपराधियों की संख्या के बढने की मुख्य वजह है। यदि महिलाओं को यह विश्वास होता कि उनके साथ हुए हादसे के प्रति समाज संवेदनशील रहेगा , उसकी मदद करेगा , तो ऐसे अपराध नहीं बढते , इसलिए किसी तरह के आंदोलन से पहले समाज के लोगों को अपनी मानसिकता बदलने की आवश्यकता है। समाज में ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए कि अपराधी को अपना चेहरा छुपाना पडे , न कि उनके द्वारा सतायी गयी शारीरिक मानसिक तौर पर परेशान युवतियों को। उन्हें ससम्मान जीने का हक चाहिए , बिना भेदभाव के नौकरी और शादी विवाह के अवसर मिले। तभी ऐसे अपराधों में कमी हो पाएगी और दामिनी को सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी।
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हम सार्थक ढंग से बाबा अम्बेदकर जयंती मनाना सकते हैं !!!!!
वैसे तो हमारे पास इतिहास का अवतारवाद का सिद्धांत हैं, जिसके अनुसार इतिहास एक दैवी योजना के तहत् चलता है। मानव जाति को हर प्रकार का कष्ट झेलते हुए उस समय तक निरंतर बने रहना होता है जब तक कोई अवतार न हो। पर अम्बेदकर का मानना था कि यदि समय की सही मांग को पहचानने वाले ज्ञान चक्षु हों, उसे सही मार्ग दिखाने का साहस एवं शौर्य हो तो एक महापुरूष द्वारा भी किसी भी युग का उद्धार हो सकता है। दैवी या सामाजिक शक्तियों को मानना और झेलना हमारी मजबूरी है , पर मनुष्य इतिहास के निर्माण का एक साधन है। डॉक्टर अम्बेदकर इस मामले में दूरदर्शी माने जा सकते हैं कि वे समझते थे कि समाज के लोगो के बीच जितनी संतुलित आर्थिक स्थिति होगी, उतना ही देश में विकास हो सकता है। ऐसे में जल्द ही भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र बन सकता है। पर उनकी सोच का मतलब परिवर्तित हो गया , उन्हें संपूर्ण राष्ट्र का ना मान कर सिर्फ दलितों और पिछडो का मसीहा बना दिया।
ऐसा इसलिए क्योंकि अम्बेदकर ने भारत की जाति व्यवस्था को समझने के लिए अधिक श्रम और समय दिया । उनके हिसाब से आदिम समाज घुमन्तु कबीलों में बँटा समाज था, बाद में कुछ लोग गाँवों मे बस गए, किन्तु कुछ लोग घुमंतु बने रहे । कालांतर में एक समझौते के तहत किसी हमले की हालत में छितरे लोग, बसे लोगों के सुरक्षा कवच का काम और बसे हुए लोग उन्हे रहने को सीमा पर जगह और अपने मृत पशु देने लगें। भारत में यही छितरे लोग अछूत बन गए। प्राचीन वैदिक संस्कृति बलि की संस्कृति थी, नरमेध, अश्वमेध और गोमेध आदि यज्ञों में नर, अश्व, गो आदि की बलियां होती थीं और सब मिल कर सारा मांस आपस में बाँट लेते थे।
पर बुद्ध के मानवीय धर्म का समाज पर गहरा प्रभाव पड़ा.. बड़ी संख्या में राजाओं और आम जन ने ब्राह्मण धर्म को ठुकरा कर बुद्ध के सच्चे धर्म को अपना लिया.। ब्राह्मण संघर्षशील हो गए, देश में लगातार बौद्धो को हटाकर ब्राह्मण धर्म को पुनर्स्थापित किया जाने लगा। पर जनमामस में अहिंसा का भाव बैठ गया था जो कृषि आधारित समाज के लिये उपयोगी भी था। बौद्ध हिंसा के विरोधी होने के बावजूद ऐसे जानवर का मांस खा लेते थे जिसे उनके लिये मारा न गया हो। बौद्धो से भी दो कदम आगे निकलने के लिए ब्राह्मणों ने गोवध को सबसे बड़ा पाप घोषित कर दिया और गोमांस खाने वाले को अस्पृश्य , ऐसे में ब्राह्मण गोभक्षक से गोरक्षक बन गये। प्राचीन समझौते के तहत मृत जानवरों को ठिकाने लगाने का काम कर रहे छितरे लोगों के लिए मृत जानवरों का मांस खाना मजबूरी थी , इसलिए ये अस्पृश्य हो गये, इसकी शुरुआत अम्बेदकर ४०० ई. के आस पास का तय करते हैं।
अम्बेदकर आर्थिक सुधार का मॉडल नीचे से ऊपर की ओर रखना चाहते थे , वे सामाजिक ढांचे में दलितों को सम्मानजनक स्थान दिलाना चाहते थे। वे हिंदू समाज के आंतरिक सुधार को लेकर बहुत चिंतित थे। 1930 में गांधी जी द्वारा दलितों को हरिजन कहा जाना भी उन्हें अपमानजनक महसूस हुआ , न सिर्फ इसलिये कि दक्षिण भारत में मन्दिरों की देवदासियों के अवैध सन्तानो को हरिजन कहा जाता था, बल्कि इसलिये भी इस शब्द से दलित हिन्दू समाज की मुख्य धारा से अलग थलग दिखायी पडते थे। हिंदू या अन्य सम्प्रदायों से उनका कोई विद्वेष नहीं था। अम्बेदकर ने जब धर्म परिवर्तन का फैसला लिया तो उनको मनाने कई धर्माचार्य पहुंचे लेकिन अम्बेदकर ने सबको ठुकरा कर बौद्ध धर्म चुना था। शायद अम्बेदकर के मन में ये बात थी कि जिन दलितों ने अतीत में इस्लाम, इसाई और सिख धर्म अपनाया था समाजिक-आर्थिक रुप से उनमें कोई खास बदलाव नहीं आय़ा। जब एक हिंदू धर्माचार्य अम्बेदकर के पास हिंदू धर्म में ही बने रहने का आग्रह कर रहे थे तो अम्बेदकर ने उनसे पूछा कि क्या हिंदू समाज, शंकराचार्य के पद पर एक दलित को स्वीकार कर लेगा ?
इन दिनों महापुरूषों की जयंती भी जाति के आधार पर ही मनाई जाती है। बाबा अम्बेदकर भले ही संविधान के जरिये सबकी बराबरी की वकालत करते रहे मगर आज उनके नाम पर कोई भी राजनीति करने से नहीं चूक रहा। दलित अगर एकजुट हो किसी के पक्ष में मतदान कर दे तो सत्ता मिलनी तय है, पार्टियां दलितों का मसीहा क्यूं न बने ? सभी पार्टी अम्बेदकर के विचारों को ही पूरा करने का दंभ भरती है। इनके नाम पर सिर्फ जयंती मनाने , जुलूस निकालने या संस्थाओं , पुरस्कारों के नाम रखने और आरक्षण की राजनीति करने से कोई लाभ नहीं। दलितों के लिए हर प्रकार की सुविधाएं और उनकी आनेवाली पीढियों की प्रतिभाओं को विकास का सर्वोत्तम प्रबन्ध करके ही हम सार्थक ढंग से बाबा अम्बेदकर जयंती मना सकते हैं। तभी समाज में समता और समरसता बनी रह सकती है।
Specialist in Gatyatmak Jyotish, latest research in Astrology by Mr Vidya Sagar Mahtha, I write blogs on Astrology. My book published on Gatyatmak Jyotish in a lucid style. I was selected among 100 women achievers in 2016 by the Union Minister of Women and Child Development, Mrs. Menaka Gandhi. In addition, I also had the privilege of being invited by the Hon. President Mr. Pranab Mukherjee for lunch on 22nd January, 2016. I got honoured by the Chief Minister of Uttarakhand Mr. Ramesh Pokhariyal with 'Parikalpana Award' The governor of Jharkhand Mrs. Draupadi Murmu also honoured me with ‘Aparajita Award’ श्री विद्या सागर महथा जी के द्वारा ज्योतिष मे नवीनतम शोध 'गत्यात्मक ज्योतिष' की विशेषज्ञा, इंटरनेट में 15 वर्षों से ब्लॉग लेखन में सक्रिय, सटीक भविष्यवाणियों के लिए पहचान, 'गत्यात्मक ज्योतिष' को परिभाषित करती कई पुस्तकों की लेखिका, 2016 में महिला-बाल-विकास मंत्री श्रीमती मेनका गाँधी जी और महामहिम राष्ट्रपति प्रणव मुख़र्जी द्वारा #100womenachievers में शामिल हो चुकी हैं। उत्तराखंड के मुख्य मंत्री श्री रमेश पोखरियाल जी के द्वारा 'परिकल्पना-सम्मान' तथा झारखण्ड की गवर्नर श्रीमती द्रौपदी मुर्मू जी द्वारा 'अपराजिता सम्मान' से मुझे सम्मानित होने का गौरव प्राप्त हुआ। Ph. No. - 8292466723
भाग्य बडा या कर्म ?
गत्यात्मक ज्योतिष क्या है ?
'गत्यात्मक ज्योतिष' टीम से मुलाक़ात करें।
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हैकरों के लिए ऐसे पासवर्डों का तोड निकालना कुछ कठिन होता है !!
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भला बिना बच्चों के कैसी दीपावली ??
what is diwali for children
वैसे तो पूरी दुनिया में हर देश और समाज में कोई न कोई त्यौहार मनाए जाते हैं , पर भारतीय संस्कृति की बात ही अलग है। हर महीने एक दो पर्व मनते ही रहते हैं , कुछ आंचलिक होते हैं तो कुछ पूरे देश में मनाए जानेवाले। दीपावली , ईद और क्रिसमस पूरे विश्व में मनाए जाने वाले तीन महत्वपूर्ण त्यौहार हैं , जो अलग अलग धर्मों के लोग मनाते हैं। भारतवर्ष में पूरे देश में मनाए जानेवाले त्यौहारों में होली , दशहरा , दीपावली जैसे कई त्यौहार हैं। त्यौहार मनाने के क्रम में लगभग सभी परिवारों में पति खर्च से परेशान होता है , पत्नी व्रत पूजन , साफ सफाई और पकवान बनाने के अपने बढे हुए काम से , पर बच्चों के लिए तो त्यौहार मनोरंजन का एक बडा साधन होता है। स्कूलों में छुट्टियां है , पापा के साथ घूमघूमकर खरीदारी करने का और मम्मी से मनपसंद पकवान बनवाकर खाने की छूट है , तो मस्ती ही मस्ती है। मम्मी और पापा की तो बच्चों की खुशी में ही खुशी है। सच कहं , तो बच्चों के बिना कैसा त्यौहार ??
पर आज सभी छोटे छोटे शहरों के मां पापा बिना बच्चों के त्यौहार मनाने को मजबूर हैं। चाहे होली हो , दशहरा हो या दीपावली , किसी के बच्चे उनके साथ नहीं। इस प्रतियोगिता वाले दौर में न तो पढाई छोटे शहरों में हो सकती है और न ही नौकरी। दसवीं पास करते ही अनुभवहीन बच्चों को दूर शहरों में भेजना अभिभावकों की मजबूरी होती है , वहीं से पढाई लिखाई कर आगे बढते हुए कैरियर के चक्कर में वो ऐसे फंसते हैं कि पर्व त्यौहारों में दो चार दिन की छुट्टियों की व्यवस्था भी नहीं कर पाते। मैं भी पिछले वर्ष से हर त्यौहार बच्चों के बिना ही मनाती आ रही हूं। दशहरे में गांव चली गयी , भांजे भांजियों को बुलवा लिया , नई जगह मन कुछ बहला। पर दीपावली में अपने घर में रहने की मजबूरी थी , लक्ष्मी जी का स्वागत तो करना ही पडेगा। पर बच्चों के न रहने से भला कोई त्यौहार त्यौहार जैसा लग सकता है ??
पहले संयुक्त परिवार हुआ करते थे , तीन तीन पीढियों के पच्चीस पचास लोगों का परिवार , असली त्यौहार मनाए जाते थे। कई पीढियों की बातें तो छोड ही दी जाए , अब तो त्यौहारों में पति पत्नी और बच्चों तक का साथ रह पाना दूभर होता है। जबतक बच्चों की स्कूली पढाई चलती है , त्यौहारों में पति की अनुपस्थिति बनी रहती है , क्यूंकि बच्चों की पढाई में कोई बाधा न डालने के चक्कर में वे परिवार को एक स्थान पर शिफ्ट कर देते हैं और खुद तबादले की मार खाते हुए इधर उधर चक्कर लगाते रहते हैं। हमारे मुहल्ले के अधिकांश परिवारों में किराए में रहनेवाली सभी महिलाएं बच्चों की पढाई के कारण अपने अपने पतियों से अलग थी। पर्व त्यौहारों में भी उनका सम्मिलित होना कठिन होता था , किसी के पति कुछ घंटों के लिए , तो किसी के दिनभर के लिए समय निकालकर आ जाते। मैने खुद ये सब झेला है , भला त्यौहार अकेले मनाया जाता है ??
बच्चों की शिक्षा जैसी मौलिक आवश्यकता के लिए भी सरकार के पास कोई व्यवस्था नहीं है। पहले समाज के सबसे विद्वान लोग शिंक्षक हुआ करते थे , सरकारी स्कूलों की मजबूत स्थिति ने कितने छात्रों को डॉक्टर और इंजीनियर बना दिया था। पर समय के साथ विद्वान दूसरे क्षेत्रों में जाते रहें और शिक्षकों का स्तर गिरता चला गया। शिक्षकों के हिस्से इतने सरकारी काम भी आ गए कि सरकारी स्कूलों में बच्चों की पढाई पीछे होती गयी।सरकार ने कर्मचारियों के बच्चों के पढने के लिए केन्द्रीय स्कूल भी खोलें , उनमें शिक्षकों का मानसिक स्तर का भी ध्यान रखा , पर अधिकांश क्षेत्रों में खासकर छोटी छोटी जगहों के स्कूल पढाई की कम राजनीति की जगह अधिक बनें। इसका फायदा उठाते हुए प्राइवेट स्कूल खुलने लगे और मजबूरी में अभिभावकों ने बच्चों को इसमें पढाना उचित समझा। आज अच्छे स्कूल और अच्छे कॉलेजों की लालच में बच्चों को अपनी उम्र से अधिक जबाबदेही देते हुए हम दूर भेज देते हैं। अब नौकरी या व्यवसाय के कारण कहीं और जाने की जरूरत हुई तो पूरे परिवार को ले जाना मुनासिब नहीं था। इस कारण परिवार में सबके अलग अलग रहने की मजबूरी बनी रहती है।
वास्तव में अध्ययन के लिए कम उम्र के बच्चों का माता पिता से इतनी दूर रहना उनके सर्वांगीन विकास में बाधक है , क्यूंकि आज के गुरू भी व्यावसायिक गुरू हैं , जिनका छात्रों के भविष्य या चरित्र निर्माण से कोई लेना देना नहीं। इसलिए उन्हें अपने घर के आसपास ही अध्ययन मनन की सुविधा मिलनी चाहिए। यह सब इतना आसान तो नहीं , बहुत समय लग सकता है , पर पारिवारिक सुद्ढ माहौल के लिए यह सब बहुत आवश्यक है। इसलिए आनेवाले दिनों में सरकार को इस विषय पर सोंचना चाहिए। मैं उस दिन का इंतजार कर रही हूं , जब सरकार ऐसी व्यवस्था करे , जब प्राइमरी विद्यालय में पढने के लिए बच्चे को अपने मुहल्ले से अधिक दूर , उच्च विद्यालय में पढने के लिए अपने गांव से अधिक दूर , कॉलेज में पढने या कैरियर बनाने के लिए अपने जिले से अधिक दूर जाने की जरूरत नहीं पडेगी। तभी पूरा परिवार साथ साथ रह पाएगा और आनेवाले दिनों में पर्व त्यौहारों पर हम मांओं के चेहरे पर खुशी आ सकती है , भला बिना बच्चों के कैसी दीपावली ??
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हर दिमाग के बीज को एक विशाल वृक्ष बनाने में हर कोई मदद करे !!
बीज तो हर दिमाग में होते हैं , पर समय पर ही उनकी देखभाल हो पाती है , अंकुरण हो पाता है , विकास के क्रम में उन्हें हर प्रकार का वातावरण मिल पाता है और वह छोटा सा बीज एक विशाल वृक्ष बन पाता है। आज के सामाजिक राजनीतिक हालत में अनेको दिमाग के बीज दिमाग में ही सोए पडे रह जाते हैं और अनेको प्रकृति की मार से मौत के मुंह में भी चले जाते हैं। मैं आशा करती हूं कि हर दिमाग के बीज को एक विशाल वृक्ष बनाने में हर कोई मदद करे , ताकि हमारे चारो ओर विशाल ही विशाल वृक्ष नजर आए , सभी अपनी अपनी विशेषताओं की घनी पत्तियों से छांव , सुगंधित पुष्पों से वातावरण में सुगंध और मीठे फलों से लोगों को असीम तृप्ति प्रदान करे।
प्रकृति के सहयोग प्राप्त होने से बहुत लोग मेहनत और आवश्यकता से बहुत अधिक प्राप्त कर रहे होते हैं , इन्हें अपने सामर्थ्य का उपयोग दूसरों की असमर्थता को दूर करने में करना चाहिए , क्यूंकि प्रकृति पर कभी भरोसा नहीं किया जा सकता कि आज वो आपका साथ दे रही है और संयोग से आपके काम बनते जा रहे हैं , तो कल भी आपकी यही स्थिति होगी। कभी भी आपको किसी और की आवश्यकता पड सकती है। किसी की मदद करते समय इस बात का भी ध्यान रखें कि उसे बार बार मदद करने की आवश्यकता न पडे , उसे इस प्रकार की मदद करें कि आनेवाले दिनों में वो इतना मजबूत हो सके कि वो पुन: दो चार लोगों की मद कर उन्हें भी इस लायक बना सके कि वो दूसरों की मदद कर सके।
मेरे ख्याल से हमारी जीवनशैली ऐसी होनी चाहिए कि वह आनेवाली पीढी को शारीरिक , आर्थिक , मानसिक , नैतिक और आध्यात्मिक दृष्टि से अधिक से अधिक मजबूत बनाती चली जाए। इनमें किसी का भी महत्व आनेवाले समय में कम नहीं होता है। इनकी मजबूती हमें हर परिस्थिति में खुशी से जीना सीखा देती है, जो मस्तिष्क में किसी प्रकार का तनाव कम करने में सहायक है।
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