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दुनिया का सबसे आसान शब्‍द है मां


दुनिया का सबसे खूबसूरत शब्‍द, सबसे प्‍यारा शब्‍द है मां। किसी एक महिला के मां बनते ही पूरा घर ही रिश्‍तों से सराबोर हो जाता है। कोई नानी तो कोई दादी , कोई मौसी तो कोई बुआ , कोई चाचा तो कोई मामा , कोई भैया तो कोई दीदी , नए नए रिश्‍ते को महसूस कराती हुई पूरे घर में उत्‍सवी माहौल तैयार करती है एक मां। लेकिन इसमें सबसे बडा और बिल्‍कुल पवित्र होता है अपने बच्‍चे के साथ मां का रिश्‍ता। यह गजब का अहसास है , इसे शब्‍दों में बांध पाना बहुत ही मुश्किल है।

प्रसवपीडा से कमजोर हो चुकी एक महिला सालभर बाद ही सामान्‍य हो पाती है। मां बनने के बाद बच्‍चे की अच्‍छी देखभाल के बाद अपने लिए बिल्‍कुल ही समय नहीं निकाल पाती है। बच्‍चा स्‍वस्‍थ और सानंद हो , तब तो गनीमत है ,पर यदि कुछ गडबड हुई , जो आमतौर पर होती ही है, बच्‍चे की तबियत के अनुसार उसे खाना मिलता है , बच्‍चे की नींद के साथ ही वह सो पाती है , बच्‍चे की तबियत खराब हो , तो रातरातभर जागकर काटना पडता है , परंतु इसका उसपर कोई प्रभाव नहीं पडता , मातृत्‍व का सुखद अहसास उसके सारे दुख हर लेता है।


परंपरागत ज्‍योतिष में मां का स्‍थान चतुर्थ भाव में है। यह भाव हर प्रकार की चल और अचल संपत्ति और स्‍थायित्‍व से संबंध रखता है। यह भाव सुख शांति देने से भी संबंधित है। हर प्रकार की चल और अचल संपत्ति का अर्जन अपनी सुख सुविधा और शांति के लिए ही लोग करते हैं । भले ही उम्र के विभिन्‍न पडावों में सुख शांति के लिए लोगों को हर प्रकार की संपत्ति को अर्जित करना आवश्‍यक हो जाए , पर एक बालक के लिए तो मां की गोद में ही सर्वाधिक सुख शांति मिल सकती है , किसी प्रकार की संपत्ति का उसके लिए कोई अर्थ नहीं।


यूं तो एक बच्‍चा सबसे पहले ओठों की स‍हायता से ही उच्‍चारण करना सीखता है , इस दृष्टि से प फ ब भ और म का उच्‍चारण सबसे पहले कर सकता है। पर बाकी सभी रिश्‍तों को उच्‍चारित करने में उसे इन शब्‍दों का दो दो बार उच्‍चारण करना पडता है , जो उसके लिए थोडा कठिन होता है , जैसे पापा , बाबा , लेकिन मां शब्‍द को उच्‍चारित करने में उसे थोडी भी मेहनत नहीं होती है , एक बार में ही झटके से बच्‍चे के मुंह से मां निकल जाता है यानि मां का उच्‍चारण भी सबसे आसान।

मां शब्‍द के उच्‍चारण की ही तरह मां के साथ रिश्‍ते को निभा पाना भी बहुत ही आसान होता है। शायद ही कोई रिश्‍ता हो , जिसे निभाने में आप सतर्क न रहते हों , हिसाब किताब न रखते हों , पर मां की बात ही कुछ और है। आप अपनी ओर से बडी बडी गलती करते चले जाएं , माफी मांगने की भी दरकार नहीं , अपनी ममता का आंचल फैलाए अपने बच्‍चे की बेहतरी की कामना मन में लिए बच्‍चे के प्रति अपने कर्तब्‍य पथ पर वह आगे बढती रहेगी।


पर कभी कभी मां का एक और रूप सामने आ जाता है , बच्‍चे को मारते पीटते या डांट फटकार लगाते वक्‍त प्रेम की प्रतिमूर्ति के क्रोध को देखकर बडा अजूबा सा लगता है। पर यह एक मां की मजबूरी होती है , उसे दिल पर पत्‍थर रखकर अपना वह रोल भी अदा करना पडता है। इस रोल को अदा करने के लिए उसे अंदर काफी दर्द झेलना पडता है , पर बच्‍चे के बेहतर भविष्‍य के लिए वह यह दर्द भी पी जाती है।


पर हम उनकी इस सख्‍ती , इस कठोरता को याद रखकर अपने मन में उनके लिए गलत धारणा भी बना लेते हैं। साथ ही कर्तब्‍यों के मार्ग पर चलती आ रही मांओं को अधिकारों से वंचित कर देते हैं। जब उन्‍हें हमारी जरूरत होती है , तो हम वहां पर अनुपस्थित होते हैं। ऐसा नहीं होना चाहिए। हमें याद रखना चाहिए कि कोई हमारे साथ भी यही व्‍यवहार करे तो हमें कैसा लगेगा ?

हिंदी दिवस पर विशेष

जब साल 1947 में देश आजाद हुआ तो देश के सामने भाषा का सवाल एक बड़ा सवाल था। भारत जैसे विशाल देश में सैकड़ों भाषाएं और हजारों बोलियां थीं। 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने देवनागरी लिपि में लिखी हिन्दी को अंग्रेजी के साथ राष्ट्र की आधिकारिक भाषा के तौर पर स्वीकार किया था। कहा जाता है कि जब अंग्रेजी को आधिकारिक भाषा के तौर पर हटने का वक्त आया तो देश के कुछ हिस्सों खासकर दक्षिण भारतीय राज्यों में हिंसक प्रदर्शन हुए।  उसके बाद केंद्र सरकार ने संविधान संशोधन करके अंग्रेजी को हिन्दी के साथ भारत की आधिकारिक भाषा बनाए रखने का प्रस्ताव पारित किया।1953 में जवाहरलाल नेहरू सरकार ने इस ऐतिहासिक दिन के महत्व को देखते हुए 14 सितंबर को हिन्दी दिवस के रूप में मनाने का फैसला किया। 



पर आज के आधुनिक युग में भी हिंदी 'हिंदी दिवस' का मोहताज नहीं है। देश की बड़ी आबादी हिंदी बोलने और समझनेवाली है, इसलिए हर क्षेत्र में हिंदी का महत्व है।  पढाई में हिंदी का महत्व इलसिए है क्योंकि इसमें जिस शब्‍द को जिस प्रकार से उच्‍चारित किया जाता है, उसे लिपि में लिखा भी उसी प्रकार जाता है।  रोचक बात यह है कि अंग्रेजी की रोमन लिपि में शामिल कुछ वर्णों की संख्‍या 26 है, जबकि हिंदी की देवनागरी लिपि के वर्णों की संख्‍या ठीक इससे दोगुनी यानी 52 है।  हमारे संसद भले ही अंग्रेजी में संसद में बोलेन, पर चुनाव प्रचार हिंदी में ही करना होता है।  हमारे अभिनेता भी भले ही बात-चित अंग्रेजी में करते हैं, पर उनको कमाई हिंदी फिल्मों में काम  मिलती है।


भारत अलावा  फिजी में भी हिंदी का काफी महत्व है। यहां रेडियो पर आने वाले ज्यादातर कार्यक्रम हिंदी में होते हैं। शिक्षा विभाग द्वारा संचालित सभी बाह्य परीक्षाओं में हिंदी एक विषय के रूप में पढ़ाई जाती है। फिजी का भारतीय समुदाय ने हिंदी समिति तथा हिंदी केंद्र बनाए हैं  औपचारिक एवं मानक हिंदी का प्रयोग पाठशाला के अलावा शादी, पूजन, सभा आदि के अवसरों पर होता है। कोई भी व्यक्ति सरकारी कामकाज, अदालत तथा संसद में भी हिंदी भाषा का प्रयोग कर सकता है। चुनाव सभाओं के पोस्टर व प्रचार सामग्री भी हिंदी भाषा के प्रयोग के बिना अधूरी समझी जाती है।



समय के साथ हुए बदलाव ने डिजिटल वर्ल्ड पर अपनी मौजूदगी साबित किया। हिंदी टाइपिंग की मजबूती ने आज हिंदी ब्लॉग्गिंग, हिंदी टयुब चैनल , हिंदी समाचार या हिंदी खोज इंजन को महत्वपूर्ण बनाया है।  आज गूगल किसी भी हिंदी कीवर्ड के हज़ारो परिणाम सामने लाता है।  सौभाग्यशाली हूँ कि शुरुआती कुछ ब्लोग्गेर्स के साथ ही मैंने भी हिंदी ब्लॉग जगत के माध्यम से हिंदी में उपयोगी पोस्ट लिखी और इंटरनेट के इस अथाह समुद्र में कुछ लेख मेरे भी मौजूद हैं। 

इंटरनेट दिवस : सावधानी बरतने का संकल्प

इंटरनेट की बदौलत इतनी बड़ी दुनिया एक छोटी दुनिया में बदल चुकी है। आज दुनिया में ४ अरब के लगभग लोग इंटरनेट का इस्तेमाल कर रहे हैं। ये आंकड़ा दुनिया की कुल आबादी का 51% से कुछ ज्यादा है। जबकि हमारे देश में ये आंकड़ा 4 करोड़ से ज्यादा ही है, 2016 में भारत में सब्सक्राइबर्स की संख्या मात्रा 39.15 करोड थी। पर आज भारत में लगभग हर किसी के पास स्मार्टफोन हैं जिसके जरिए वह पूरी दुनिया से जुड़ सकता है। एक आंकड़े के मुताबिक दुनिया में हर सेकेंड 30 लाख से ज्यादा मेल भेजे जाते हैं यानि आज के दौर में बिना इंटरनेट के सुचना का आदान प्रदान संभव ही नहीं। 

भारत में इंटरनेट का इतिहास 1986 में नैशनल रिसर्च नेटवर्क के लॉन्च के साथ शुरू हुई , जिसमे नेटवर्क को केवल शिक्षा और रिसर्च के लिए ही उपलब्ध कराया गया था। भारत सरकार और यूनाइटेड नेशन डेवलेपमेंट प्रोग्राम के सपोर्ट और आर्थिक सहायता के साथ ही इलेक्ट्रॉनिक्स विभाग ने नेटवर्क शुरू किया , जिसके बाद NICNet की शुरुआत 1988 में हुई। 15 अगस्त 1995 के दिन भारत की विदेश संचार निगम लिमिटेड ने भारत में आम जनता के लिए आधिकारिक तौर इंटरनेट को लॉन्च किया। तभी से वर्ल्ड वाइड वेब हमारी जिंदगी का एक हिस्सा बन गया, आज लगभग सभी के हाथ में मोबाइल फ़ोन का उपयोग हो रहा है।

समय के साथ इंटरनेट का उपयोग तेजी से बढ़ता जा रहा है , जिसके कारन इसकी सुविधा उपलब्ध करने वाली कंपनियों में होड़ मची हुई है। भारत में सबसे कम स्पीड 9.6 kbps के लिए वीएसएनएल को 5000 रुपये चुकाने पड़ते थे, जबकि अधिक स्पीड 128 kbps के लिए 30 लाख रुपये चुकाने पड़ते थे। आज उससे भी अधिक स्पीड के इंटरनेट की सेवाएं फ्री में मिल रही हैं। अब तक विडियो गेम्स, पॉर्न एडिक्ट, सोशल साइट एडिक्ट की बातें कहीं जा रही थीं । 'ब्लू व्हेल गेम' ने भी इंटरनेट में सक्रिय सैकड़ों किशोरों को मौत के मुँह में जाने को मजबूर किया है। पर वैज्ञानिक यह भी  मानते हैं कि इंटरनेट का ज्यादा इस्तेमाल दिमाग के एक खास हिस्से पर असर डालता है, जिसकी वजह से लोग मानसिक बीमारी के भी शिकार हो सकते हैं।

फिर भी इंटरनेट आज हर कोई यूज कर रहा है, चाहे जॉब की मजबूरी की वजह से या फिर मनोरंजन के लिए। इन समस्याओ से बचने के लिए विश्व भर में आज का दिन 'इंटरनेट सेल्फ केयर डे' के रूप में मनाया जा रहा है। आज का दिन यह संकल्प लेने का दिन है की इंटरनेट को हम सुविधा के तौर पर ही उपयोग करेंगे, किसी भी तौर पर इसे अपने जीवन पर हावी नहीं होने देंगे। हम अपने बच्चों को भी इनकी लत नहीं पड़ने देंगे और अधिक से अधिक लोगों को जागरूक करेंगे कि वे इंटरनेट का सीमित उपयोग करें। 

एक ब्‍लॉगर्स मीट में मेरा विचार

कलकत्‍ता के पार्क स्‍ट्रीट में 'द गोल्‍डेन पार्क' होटल में पिछले रविवार यानि 9 मार्च 2014 को 'अ बिलियन आइडियाज' की ओर से आयोजित एक ब्‍लॉगर्स मीट में भाग लेने का मौका मिला , इसमें विचार विमर्श के लिए निम्‍न मुद्दे थे .....

How to retain the inclusiveness and secular fabric of the nation
How to harness the potential of youth for innovation
How to empower women to have a greater say in the household decision making
How to increase transparency in the governance at all levels.

दो पीढियों से चली आ रही महिलाओं की समस्‍याओं के समाधान का एक उपाय नजर आ रहा था , इसलिए मैं इसी पर अपने विचार प्रस्‍तुत करने गयी थी, जो इस प्रकार हैं .... 

आज से पंद्रह साल पहले तक की मध्‍यम वर्गीय परिवारों की पढी लिखी महिलाओं की कहानी यही थी कि पढे लिखे होने के बावजूद घर परिवार संभालने की जिम्‍मेदारी के कारण अपने कैरियर पर अधिक ध्‍यान नहीं दे पाती थी। इस समय तक मुश्किल से दो प्रतिशत महिलाएं अपना कैरियर बना पायी , जिन्‍हें उनके पति और ससुरालवालों ने पूरा सहयोग दिया। बाकी की 98 प्रतिशत महिलाएं परिवार को संभालने के लिए , बच्‍चों की अच्‍छी परवरिश के लिए समझौते करती रही। उस वक्‍त बीएड करने वाली या प्रतियोगिता पास कर चुकी महिलाओं को भी घर परिवार संभालने के चक्‍कर में नौकरी छोडनी पडी। हमारे परिचय की एक स्‍त्री रोग विशेषज्ञा तक हैं , जिन्‍होने नौकरी के अधिकांश समय छुट्टियों में ही व्‍यतीत किए , फिर रिजाइन करना पडा , क्‍योंकि पतिदेव की पोस्टिंग जहां थी , वहां से वे तबादला नहीं करा सकते थे और ये न तो वहां आ सकती थी और न अकेले बच्‍चों को लेकर नौकरी संभालते हुए दूसरे शहर में रह सकती थी। सबसे बडी बात कि वे कैरियर को छोडकर भी राजी खुशी अपने पारिवारिक दायित्‍वों को निभाती रहीं। मैने खुद भी अपने परिवार और बच्‍चों को संभालने के लिए कैरियर के बारे में कभी नहीं सोंचा। पर आज की पीढी की लडकियां ऐसा समझौता नहीं कर सकती , ‘हमारा सबकुछ बर्वाद हो जाए , पर हम कैरियर को नहीं बर्वाद होने देंगे’ आज की पूरी पीढी की युवतियों की ये आवाज बन रही है और इसकी प्रेरणा उन्‍हें हम जैसी मांओं या चाचियों से ही मिल रही है , जो कल तक परिवार संभालने के कारण खुद के कैरियर पर ध्‍यान नहीं दे रही थी। समाज के लिए यह चिंतन का विषय है कि इन प्रौढ महिलाओं के चिंतन में बदलाव आने में कहीं उनका ही हाथ तो नहीं ?

नौकरी कर रही महिलाओं को दो चार साल भले ही कभी दुधमुंहे , कभी कमजोर ,कभी बीमार बच्‍चे को छोडकर नौकरी को संभाल पाने में दिक्‍कत होती हो , पर बच्‍चों के स्‍कूल में एडमिशन के पश्‍चात हल्‍के रूप में और बच्‍चों के बारहवीं पास करते ही अचानक महिलाओं को कुछ अधिक ही फुर्सत मिलने लगती है। कम पढी लिखी कम विचारशील महिलाएं मंदिरों में , अपनी अपनी मंडलियों में आ जाकर , फिल्‍में टीवी देखकर समय काट ही नहीं लेती , अपने दायित्‍व विहीन अवस्‍था का नाजायज फायदा उठाती हैं और समय का पूरा पूरा दुरूपयोग करती हैं। उनकी छोटी मोटी जरूरतें पतियों के द्वारा पूरी हो जाने से वे निश्चिंत रहती हैं। पर विचारशील महिलाएं कोई न कोई रचनात्‍मक कार्य करना चाहती है , पर बढती उम्र के साथ कुछ बाधाएं भी आती हैं , और उनको काम में परिवार , समाज का सहयोग भी नहीं मिल पाता , तब उन्‍हें ऐसा महसूस होने लगता है कि उनकी प्रतिभा का कोई महत्‍व नहीं। उनकी प्रतिभा को समाज में महत्‍व दिया जाता , तो आज उनका दृष्टिकोण ऐसा नहीं होता। जाहिर है , जिस त्‍याग को आज वे भूल समझ रही हों , वैसा त्‍याग अपनी बच्चियों से नहीं करवा सकती। पर इस तरह की सोंच से आनेवाली पीढी को बहुत नुकसान है , यह बात समाज को समझनी चाहिए।

आज की पूरी पीढी की युवतियों की यह सोंच कि परिवार के लिए कैरियर को छोडना उचित नहीं , आने वाले समय में बहुत बडी अव्‍यवस्‍था पैदा कर सकता है। पुरानी पीढी की गैर कामकाजी महिलाओं ने बच्‍चों के प्रत्‍येक क्रियाकलापो पर ध्‍यान रखा , उसे शारीरिक , नैतिक , बौद्धिक और चारित्रिक तौर पर सक्षम बनाया , जिससे समाज मजबूत बनता है। सारी कामकाजी महिलाओं के बच्‍चों का लालन पालन ढंग से न हो सका , ऐसी बात भी नहीं है , यदि परिवार में बच्‍चों पर ध्‍यान देने वाले कुछ अभिभावक हों या पति और पत्‍नी मिलकर ही बच्‍चों का ध्‍यान रख सकते हों , तो महिलाओं के नौकरी करने पर कोई दिक्‍कत नहीं आयी। पर आज की युवतियॉ कैरियर को अधिक महत्‍व देंगी , वो भी प्राइवेट जॉब को वरियता देती हैं , तो बच्‍चे आयाओं के भरोसे पलेंगे , उनके हिसाब से ही तो उनका मस्तिष्‍क विकसित होगा। एक भैया की शादी मेरे साथ ही हुई थी , पत्‍नी अपने जॉब में तरक्‍की कर रही हैं , इसलिए संतुष्‍ट हैं , पर बच्‍चों के विकास से संतुष्‍ट नहीं , अफसोस से कहती हैं , ‘जब सबका बच्‍चा बढ रहा था , मेरा बढा नहीं , जब सबका बच्‍चा पढ रहा है , मेरा पढा नहीं।‘ हां चारित्रिक तौर पर दोनो अच्‍छे हैं पर इस प्रकार की असंतुष्टि उस समय एक दो परिवार की कहानी थी , अब यही हर परिवार की कहानी होगी। हाल फिलहाल की कहानी है , पति के मना करने के बावजूद अपने बच्‍चे के जन्‍म के दो महीने बाद ही उसकी मां नौकरी पर जाने को तैयार थी , वो मानती थी कि बच्‍चे को संभालने की जिम्‍मेदारी पिता की भी बराबर ही है। हारकर पिता को ही नौकरी छोडनी पडी , घर से ही बच्‍चे को संभालते हुए कुछ काम करने लगा , पर बच्‍चे की परवरिश सामान्‍य नहीं हो सकी। आने वाली पीढी यानि आज के बच्‍चों का विकास ढंग से नहीं होगा , उनके व्‍यक्तित्‍व का पतन होगा तो उसे भी आनेवाले समय में देश को ही झेलना होगा।

कैरियर को महत्‍व देते हुए विवाह न करने या विवाह के बाद बच्‍चे न पैदा करने का व्‍यक्तिगत फैसला समाज के लिए दुखदायी नहीं है , पर विवाह कर बच्‍चे को जन्‍म देने के बाद उसका उचित लालन पालन न हो , यह समाज के लिए सुखद संकेत नहीं। आने वाले समय में बच्‍चों का पालन पोषण , देख रेख भी सही हो , और महिलाएं भी संतुष्‍ट रहे , इसके लिए सरकार को बहुत गंभीरता से एक उपाय करने की आवश्‍यकता है। नौकरी को लेकर महिलाओं के सख्‍त होने का सबसे बडा कारण यह है कि उम्र बीतने के बाद उनके लिए कोई संभावनाएं नहीं बचती , जबकि बच्‍चों को पढाने के क्रम में उनकी पढाई लिखाई चलती रहती है और भले ही अपने विशिष्‍ट विषय को भूल भी गयी हूं , उनका सामान्‍य विषयों का सामान्‍य ज्ञान कम नहीं होता। इसलिए महिलाओं के लिए हर प्रकार की नौकरी में उम्र सीमा समाप्‍त किया जाना चाहिए । साथ ही हर क्षेत्र में उन्‍हें पर्याप्‍त आरक्षण मिलना चाहिए। उन्‍हें व्‍यवसाय के लिए बैंको से कम ब्‍याज दरों पर ऋण और अन्‍य तरह की सुविधाएं मुहैय्या करायी जानी चाहिए, ताकि घर परिवार संभालते वक्‍त भविष्‍य में कुछ आशाएं दिखती रहें। आने वाली बेहतर पीढी का ढंग से पालन पोषण करते वक्‍त महिलाओं का भविष्‍य के लिए आश्‍वस्‍त रहना बहुत आवश्‍यक है। 

अन्‍य तीनों मुददों पर मेरे विचार इस प्रकार हैं .....

  1. हमारे देश में सदैव 'विविधता में एकता' की भावना विकसित होती रही है , इसलिए मेरे विचार से देश के लोगों की जाति , धर्म या रहन सहन जो भी हो कोई अंतर नहीं पडता , बस लोगों के अंदर देश भक्ति की भावना में कहीं कोई कमी नहीं आनी चाहिए , हम अपने बच्‍चों को ऐसी शिक्षा दें कि किसी के बहकावे में आकर वे देश का नुकसान न करें। सरकार को बस इतना करना है कि वे सभी नागरिकों को समान सुविधाएं दें। नौकरी में आरक्षण देकर समाज के कमजोर पक्ष को आर्थिक सुरक्षा भले ही आवश्‍यक हो , पर देश के हित के लिए जिम्‍मेदारी से भरे सरकारी उच्‍च पदों में या पदोन्‍नति में प्रतिभा को महत्‍व दिया जाना चाहिए। 
  2. देश की आनेवाली पीढी को यानि युवाओं को प्रतिभाशाली बनाने के लिए रटंत प्रणाली की शिक्षा को समाप्‍त कर इसे व्‍यावहारिक और उपयोगी बनाने पर बल दिया जाना चाहिए , अपनी अपनी रूचि और प्रतिभा के हिसाब से सभी युवाओं को सरकार की ओर से एक समान अवसर मिलना चाहिए। दबाबपूर्ण पाठ्यक्रम युवाओं के प्रतिभा को नुकसान पहुंचाती है। 
  3. आज प्राइवेट संस्‍थानों ने संचार क्रांति का पूरा फायदा उठाया है , एक एक कर्मचारी की गतिविधियों पर उनकी पूरी निगाह रहती है , सरकार के लिए तो यह और आसान है। संचार क्रांति के इस युग में सरकारी तंत्र की जनता के मध्‍य पारदर्शिता बहुत बडी बात नहीं , बस इच्‍छा शक्ति होनी चाहिए। 

फिलहाल किसी क्रांति की कोई संभावना नहीं मुझे तो नहीं दिखती ..



आज निम्न  वर्गीय परिवारों के बच्चों को खाना , कपडा , मकान , सायकल और जरूरत की अन्य चीजें मुफ्त मिल रही है .. जो उनके माता पिता को दिनभर कडी मेहनत के बाद भी नहीं मिल पाती थी ... वे इस व्यवस्था में क्या खामी देखेंगे ??
मध्यमवर्गीय परिवार के बच्चों  को प्रतियोगिता और मल्टीनेशनल कंपनी की नौकरी के दायित्वों तले उलझा दिया गया है .. भले ही महानगर में रहने की बाध्यता तले उनके पैसे न बच पाए .. पर बडी बडी सेलरी को देखने के बाद वे इस व्यवस्था में क्या खामी देखेंगे ??
उच्च वर्गीय परिवारों के बच्चे भी अपनी कंपनी को चुंबकीय बनाने के लिए ऐसी ऐसी ट्रेनिंग लेने में व्यस्‍त है .. जो पूरे बाजार में बिखरे पडे पैसो को अपनी ओर खींच सके .. इसकी पूरी सुविधा होने से वे इस व्यवस्था में क्या खामी देखेंगे ??
इसके अलावा सरकारी तंत्र के लोगों ने इसे सीमा से अधिक भ्रष्‍ट कर दिया है ... अपने अधिकारों का नाजायज फायदा उठाकर अपनी संतानों को कई पीढी तक नालायक बनाने की पूरी व्‍यवस्‍था कर चुके हैं .. उनकी संताने भी इस व्‍यवस्‍था में क्‍या खामी देखेंगी ??
 इस व्यवस्था में खामी को दूर करने की हमारी सोंच तभी कामयाब हो सकती है ... जब हम दूसरे की तकलीफ को अपनी तकलीफ समझें .. पर किसी भी वर्ग के नवयुवकों के पास खुद के सिवा दूसरों की समस्‍या  के लिए सोंचने का वक्त नहीं .... अब इस स्वा‍र्थपूर्ण माहौल में भारतवर्ष में हाल फिलहाल में किसी क्रांति की कोई संभावना नहीं मुझे तो नहीं दिखती  ..

नारी को युग के अनुरूप अपने व्‍यक्तित्‍व को मजबूत बनाना होगा ....


कुछ दिनों पूर्व एक उलझा हुआ सवाल मिला था , कहते हैं कि नियति निर्धारित है और उसे परिवर्तित नहीं किया जा सकता. तो क्या स्त्री की नियति भी निश्चित है जो उसे सदियों से भोग्या बना कर रख दिया गया है? पुरुष वर्ग ने ही सारी किस्मत का ठेका ले रखा है और औरत किस्मत की मारी बेचारी बन के रह गई है. क्या ज्योतिष की नजर से स्त्री चिंता का कोई समाधान मिल सकता है? आशा है आप मेरे इस सवाल का उत्तर अवश्य देंगी……


चिंतन के क्रम में बहुत सारी बातें जुटती गयी , जो आज पोस्‍ट के रूप में प्रस्‍तुत है ….


विविधता प्रकृति की सबसे बडी खासियत है , इसलिए जहां एक ओर शैवाल जैसे एक कोशिकीय जीव और केंचुए से लेकर ह्वेल और हाथी जैसे जीव और कमल एवं गुलाब जैसे सुंदर फूलदार से लेकर नागफनी जैसे रेगिस्तानी पौधे यहां मौजूद हैं, तो दूसरी ओर नीम, पीपल और वट जैसे विशाल वृक्ष जीवन के अनेक रूपों को आश्रय प्रदान कर जैव विविधता को बनाए हुए हैं । एक एक कण अलग अलग रंग रूप और स्‍वभाव लेकर बिखरे हुए हैं , यदि गंभीरता से विचार किया जाए तो किसी का भी महत्‍व कम नहीं लगता । विष और अमृत दोनो जगह जगह पर उपयोगी हैं , पर युग के अनुरूप प्रकृति की प्रत्‍येक वस्‍तु में कभी किसी का महत्‍व कम और कभी अधिक हो जाता है।

जब ‘शक्ति’ के आधार पर कोई सभ्‍यता और संस्‍कृति चले , अधिकांश समय ऐसा ही चला है , तो जैसा कि जंगल राज में चलता है , मजबूत अपने शिकार के लिए कमजोर जीवों को मारते हैं और कमजोर अपने बचाव का रास्‍ता ढूंढते हैं। पशुओं की प्रकृति को स्‍वीकार करना हमारी मजबूरी हो सकती है , पर हमारा दुर्भाग्‍य है कि हमें ऐसी प्रवृत्ति वाले मनुष्‍य को भी स्‍वीकार करना पडता है। ऐसा राज होने पर मनुष्‍य भी पशु ही हो जाते हैं , ऐसी स्थिति में बलवान शोषण करता है और बलहीनों को शोषित होना पडता है , इस दृष्टि से हमेशा नारी कमजोर है। इसी प्रकार कभी ‘पद’ तो कभी ‘धन’ को मजबूत माना जाता रहा और समाज में इनका महत्‍व बना रहा। प्राचीन नारियों के पास भी कभी न तो धन रहे और न पद। नारियों ने कभी एकजुट होकर इसके लिए लडने की हिम्‍मत भी नहीं की।

इसी प्रकार जब ‘ज्ञान’ के आधार पर कोई सभ्‍यता और संस्‍कृति चले तो ज्ञानी शोषण करते हैं और अज्ञानियों को शोषित होना पडता है। अज्ञानियों के हर कमजोरी का फायदा उठाकर ज्ञानी उसकी खासियत का उपयोग करते हैं , प्रकृति के सभी जीव जंतुओं को ऐसे ही उपयोग में लाया गया , इसके कारण आज कुछ ही वर्षों में न जाने कितने जीव विनाश के कगार पर हैं। प्राचीन काल से समाज में नारियों के ‘ज्ञान’ प्राप्‍त करने की सुविधा न होने से यहां भी उनकी लाचारी हो जाती है , उनकी कोमल भावनाओं का फायदा उठाकर उनकी हर खासियत का उपयोग किया जाता है। पर मैं समझती हूं कि ज्ञान का नाजायज फायदा उठानेवाले ऐसे ज्ञानी अज्ञानियों से भी बदतर हैं।

आज विकासशील और विकसीत देशों में ‘ज्ञान’ के आधार पर ही सभ्‍यता और संस्‍कृति चल रही है , इसी कारण पर्यावरण का हद से भी बुरा हाल है , वनों और वन्‍य जीवों का तो हाल पूछिए ही मत। पर यहां नारियों की स्थिति अविकसित देशों की तुलना में कुछ अच्‍छी मानी जा सकती है। जिन देशों में इन्‍हें ‘ज्ञान’ प्राप्‍त की सुविधा भी मिल रही है, इनकी लाचारी कम ही दिखती है , यदि विकास का क्रम बना रहा तो आनेवाले दिनों में इनकी स्थिति में सुधार संभव है । पर आनेवाली संस्‍कृति में ‘अर्थोपार्जन करने वाले ज्ञान’ का ही महत्‍व है , स्‍त्री हैं या पुरूष कोई मायने नहीं रखता । जो खुद , किसी व्‍यक्ति को , किसी कंपनी को या किसी सरकार को अर्थोपार्जन में मदद करते हैं , समाज में उनकी उपयोगिता है , चाहे इसके लिए आपको कोई भी उल्‍टा सीधा काम करना पडे , आपके सौ खून भी माफ हो सकते हैं। इसके विपरीत आप अर्थोपार्जन के गुर नहीं जानते तो आपके गुण , ज्ञान और ईमानदारी की कोई कीमत नहीं।

इसलिए हमारे प्राचीन ऋषि मुनियों ने सभ्‍यता संस्‍कृति को ‘धर्म’ के आधार पर चलाने का फैसला लिया था , ऐसी स्थिति में ‘शक्ति’ , ‘ज्ञान’ , ‘पद’ या ‘धन’ का नाजायज फायदा उठानेवाले नहीं होते। प्रकृति के एक एक कण की खासियत देखी जाती है और तदनुरूप उसका उपयोग किया जाता है। धर्म ने हमेशा आज के लिए नहीं , आनेवाले कल के लिए सोंचा , आनेवाली पीढी के लिए सार्थक चिंतन किया। यही कारण है कि सभी ‘धर्म’ का मूल व्‍यक्ति के मानवीय गुणों का विकास करना है। सिर्फ ‘स्‍व’ के बारे में सोचना आज के युग में बहुत बडी गल्‍ती है , प्रकृति में एक एक व्‍यक्ति के कार्य याद रखे जाते हैं और उन्‍हें उनके अच्‍छे और बुरे दोनो तरह के परिणाम भी मिलते हैं। पर विडंबना ही है कि जब सभ्‍यता संस्‍कृति ‘शक्ति’ , ‘ज्ञान’ , ‘पद’ या ‘धन’ के हिसाब से चलती है तो धर्म नाममात्र के लिए रह जाता है , क्‍यूंकि इसको भी उसी हिसाब से चला दिया जाता है।

अब यदि ज्‍योतिष पक्ष की बात की जाए तो ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ का विकास मात्र पचास वर्ष पुराना है और इससे पहले के ज्‍योतिष की पुस्‍तकों में सिद्धांतों की इतनी भीड है कि अध्‍ययन में किसी के पूरे जीवन गुजर जाएंगे और किसी निष्‍कर्ष पर पहुंचना संभव नहीं। उनके सभी नियमों में विरोधाभास है , एक का दूसरे से तालमेल का सर्वथा अभाव है। इसलिए खगोल शास्‍त्र के मूल आधार को लेकर हमारे पिताजी विद्या सागर महथा जी ने नए रूप में अध्‍ययन , मनन , चिंतन आरंभ किया और पचास वर्षों तक लगातार एक एक निष्‍कर्ष स्‍थापित करते चले गए। फलस्‍वरूप ज्‍योतिष की एक नई शाखा ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ का विकास हुआ। इतने मजबूत आधार प्राप्‍त करने के बाद 25 वर्षों से मैने भी उन्‍हें सहयोग देना आरंभ किया है , फलस्‍वरूप इसके विकास में तेजी आयी है।






‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ ने मनुष्‍य के जीवन में पडनेवाले ग्रहों के प्रभाव का बहुत अच्‍छा अध्‍ययन किया है, मानव जीवन के बहुत सारे पक्षों की बातें अब स्‍पष्‍ट समझ में आती है। खासकर मनुष्‍य के जीवन के विभिन्‍न काल पर ग्रहों से वे किस प्रकार प्रभावित होंगे , इसको स्‍पष्‍टत: बताया जा सकता है । ग्रहों के गत्‍यात्‍मक और स्‍थैतिक शक्ति की नई जानकारी के बाद मौसम , शेयर बाजार , राजनीति और अन्‍य क्षेत्रों में ग्रह के प्रभाव के बारे में लगातार अध्‍ययन चल रहा है और कई निष्‍कर्ष स्‍थापित किए जा चुके हैं।






पर युग पर ग्रहों के प्रभाव के अध्‍ययन की अभी शुरूआत ही हुई है , हाल फिलहाल में मैने वृद्धों के जीवन पर पड रहे ग्रहों के बुरे प्रभाव का कारण ढूंढने में सफलता पायी है। उसके हिसाब से भारतवर्ष में 2020 के बाद क्रमश: ऐसा वातावरण बनना आरंभ होगा कि वृद्धों का महत्‍व बढता जाएगा। पिछली सदी के अंतिम दशक में युवाओं को गंभीर निराशाजनक परिस्थिति का सामना करना पडा था, क्‍यूंकि हर नौकरी में छंटनी का दौर चल रहा था, विरले ही किसी प्रतियोगिता में सफल होते थे। 2000 के बाद युवाओं के समक्ष कार्यक्रमों की कमी नहीं , चारो ओर उन्‍हें प्रशिक्षित करने के लिए कॉलेज खुल रहे हैं और उनकी मांग बनी हुई है।






पर ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ नारियों की दुर्दशा के बारे में कोई ग्रहीय कारण स्‍पष्‍टत: नही समझ सका है , अभी लंबे शोध की आवश्‍यकता है। वैसे भी नए सिरे से अध्‍ययन की जाए तो युग के अध्‍ययन में युग लग जाते हैं , विदेशियों के आक्रमण ने हमारा परंपरागत ज्ञान को नष्‍ट जो कर दिया है। पर इतना तो अवश्‍य है कि प्रकृति ने युग और काल के अनुरूप किसी के बनावट में कुछ कमजोरी दी है तो इनके भाग्‍य में कुछ कमी तो अवश्‍य होगी और उसका फल उन्‍हें झेलना ही होगा। नारी को युग के अनुरूप अपने व्‍यक्तित्‍व को मजबूत बनाना होगा।






अंतर्राष्‍ट्रीय महिला दिवस पर एक जरूरी मांग ... अपनी सरकार से

Mahila divas kab manaya jata hai


पिछले माह ट्रेन से आ रही थी , रिजर्वेशन नहीं होने और भीड के अधिक होने के कारण महिला बॉगी में चढ गयी , यहां हर वर्ग का प्रतिनिधित्‍व करने वाली महिलाएं मौजूद थी , बच्चियों , युवतियों से लेकर वृद्धा तक , मजदूर से लेकर सामान्‍य गृहस्‍थ तक और नौकरीपेशा से लेकर हम जैसी महिलाओं तक , जिसे किसी वर्ग में रखा ही नहीं जा सकता। पुलिस को ध्‍यान न रहे तो महिला बॉगी में महिलाओं के साथ वाले पुरूष भी अड्डा जमा ही लेते हैं , सफर में महिलाओं की संख्‍या कम नहीं रहती , इसलिए सबके बैठने की समुचित व्‍यवस्‍था नहीं हो पा रही थी। दस और बारह वर्ष की दो बच्चियां एक दो जगहों पर खुद को एडजस्‍ट करने की भी कोशिश की , पर कोई फायदा नहीं हुआ तो कुछ देर खडी इंतजार करती रही , जैसे ही उन्‍होने दो महिलाओं को उतरते देखा तो वे तेजी से सीट की ओर बढी , पर उन्‍होने पाया कि पहले जिस सीट पर सात महिलाएं बैठी थी , वहां इन पांच ने ही खुद को फैलाकर पूरी जगह घेर ली थी। 
बच्चियों ने पहले उनसे आग्रह किया , पर बात न बनी तो तर्कपूर्ण बातें कर हल्‍ला मचाकर सभी यात्रियों का ध्‍यान इस ओर आकृष्‍ट किया। सबको उनके पक्ष में देखकर महिलाओं ने खुद को समेटकर उन्‍हें बैठने की जगह दी। बच्चियों की माताजी को बच्चियों के उचित पालन पोषण के लिए शाबाशी मिली , शाबाशी देने वालों में दो कॉलेज की छात्राएं ही नहीं थी , जो छुट्टियों में महानगर से वापस आ रही थी, वरन् हर वर्ग की महिलाएं थी। बीस पच्‍चीस साल में बच्चियों के पालन पोषण में यह बडा अंतर आया है , हमारे जमाने में तो बडों के प्रति सम्‍मान और छोटों के प्रति स्‍नेह का प्रदर्शन करते हुए नाजायज को भी जायज कहने की शिक्षा दी जाती थी। यही कारण है कि सामने वालों के गलत वक्‍तब्‍य पर उस वक्‍त महिलाओं के मुंह से चूं भी नहीं निकलती थी। 

मैने जब कॉलेज की लडकियों से इस अंतर की चर्चा की तो उन्‍होने कहा कि उनकी मम्‍मी भी कुछ ऐसे ही बताती हैं। फिर बात आयी हमारे जमाने में परिवार के लिए किए जाने वाले महिलाओं के समझौते पर , एक लडकी ने बताया कि उसकी मम्‍मी बीएड कर चुकी थी , नौकरी करने को पापा ने मना कर दिया और मम्‍मी घर परिवार संभालने के चक्‍कर में मान भी गयी। मैने कहा कि उस जमाने में किसी एक महिला के साथ नहीं , बहुतों के साथ ऐसा हुआ कि उन्‍हें कैरियर को ताक पर रखना पडा। हमारे परिचय की एक गायनोको‍लोजिस्‍ट हैं , जिन्‍होने नौकरी के अधिकांश समय छुट्टियों में ही व्‍यतीत किए , फिर रिजाइन करना पडा , क्‍योंकि पतिदेव की पोस्टिंग जहां थी , वहां से वे ट्रासफर नहीं करा सकते थे और ये न तो वहां आ सकती थी और न अकेले बच्‍चों को लेकर रह सकती थी। 
सबसे बडी बात कि वे कैरियर को छोडकर भी राजी खुशी अपने पारिवारिक दायित्‍वों को निभाती रहीं। मैने खुद भी अपने परिवार और बच्‍चों को संभालने के लिए कैरियर के बारे में कभी नहीं सोंचा। पर आज की पीढी की लडकियां ऐसा समझौता नहीं कर सकती , दोनो लडकियां एक साथ बोल उठी , ‘हमारा सबकुछ बर्वाद हो जाए , हम कैरियर को नहीं बर्वाद होने देंगे’। वास्‍तव में ये आवाज इन दो लडकियों की नहीं , आज की पूरी पीढी की युवतियों की ये आवाज बन रही है और इसकी प्रेरणा उन्‍हें इनकी मांओं से ही मिल रही है , जो कल तक परिवार संभालने के कारण खुद के कैरियर पर ध्‍यान नहीं दे रही थी। समाज के लिए चिंतन का विषय है कि इन प्रौढ महिलाओं के चिंतन में बदलाव आने में कहीं उनका ही हाथ तो नहीं ?
सरकारी नौकरी कर रही महिलाओं को भले ही दुधमुंहे कभी कमजोर ,कभी बीमार बच्‍चे को छोडकर भले ही नौकरी को संभाल पाने में महिलाओं को दिक्‍कत होती हो , पर घर परिवार की जिम्‍मेदारी से मुक्‍त होते ही बच्‍चों के स्‍कूल में एडमिशन के पश्‍चात हल्‍के रूप में और बच्‍चों के बारहवीं पास करते ही अचानक महिलाओं को कुछ अधिक ही फुर्सत मिलने लगती है। कम पढी लिखी कम विचारशील महिलाएं अपनी अपनी मंडलियों में आ जाकर , फिल्‍में टीवी देखकर समय काट ही नहीं लेती , अपने दायित्‍व विहीन अवस्‍था का नाजायज फायदा उठाती हैं और समय का पूरा पूरा दुरूपयोग करती हैं। उनकी छोटी मोटी जरूरतें पतियों के द्वारा पूरी हो जाने से वे निश्चिंत रहती हैं। 
पर विचारशील महिलाएं कोई न कोई रचनात्‍मक कार्य करना चाहती है , पर बढती उम्र के साथ कुछ बाधाएं भी आती हैं , और उनको काम में परिवार , समाज का सहयोग भी नहीं मिल पाता , उन्‍हें ऐसा महसूस होने लगता है कि उनकी प्रतिभा का कोई महत्‍व नहीं। उनकी प्रतिभा को समाज में महत्‍व दिया जाता , तो उनका दृष्टिकोण ऐसा नहीं होता। जिस त्‍याग को अब वे भूल समझ रही हों , वह त्‍याग अपनी बच्चियों से नहीं करवा सकती। पर इससे भी आनेवाली पीढी को बहुत नुकसान है , यह बात समाज को समझनी चाहिए।

पूरी एक पीढी की युवतियों का यह सोंचना कि परिवार के लिए कैरियर को छोडना उचित नहीं , आने वाले समय में बहुत बडी अव्‍यवस्‍था पैदा कर सकता है। हमारी पीढी की गैर कामकाजी महिलाओं ने बच्‍चों के प्रत्‍येक क्रियाकलापो पर ध्‍यान रखा , उसे शारीरिक , नैतिक , बौद्धिक और चारित्रिक तौर पर सक्षम बनाया । सारी कामकाजी महिलाओं के बच्‍चों का लालन पालन ढंग से न हो सका , ऐसी बात भी नहीं है , यदि परिवार में बच्‍चों पर ध्‍यान देने वाले कुछ अभिभावक हों या पति और पत्‍नी मिलकर ही बच्‍चों का ध्‍यान रख सकते हों , तो महिलाओं के नौकरी करने पर कोई दिक्‍कत नहीं आयी। पर आज की युवतियॉ कैरियर को अधिक महत्‍व देंगी , वो भी प्राइवेट जॉब को वरियता देती हैं , तो बच्‍चे आयाओं के भरोसे पलेंगे , उनके हिसाब से ही तो उनका मस्तिष्‍क विकसित होगा। 
एक भैया की शादी मेरे साथ ही हुई थी , पत्‍नी अपने जॉब में तरक्‍की कर रही हैं , इसलिए संतुष्‍ट हैं , पर बच्‍चों के विकास से संतुष्‍ट नहीं , अफसोस से कहती हैं , ‘जब सबका बच्‍चा बढ रहा था , मेरा बढा नहीं , जब सबका बच्‍चा पढ रहा है , मेरा पढा नहीं।‘ हां चारित्रिक तौर पर दोनो अच्‍छे हैं पर इस प्रकार की असंतुष्टि उस समय एक दो परिवार की कहानी थी , अब यही हर परिवार की कहानी होगी। बच्‍चों का विकास ढंग से नहीं होगा , उनके व्‍यक्तित्‍व का पतन होगा तो उसे भी देश को ही झेलना होगा। महिला दिवस पर न जाने कितने सेमिनार और कार्यक्रम हा, पर शायद ही किसी का ध्‍यान इस गंभीर समस्‍या पर जाएगा।

कैरियर को महत्‍व देते हुए विवाह न करने या विवाह के बाद बच्‍चे न पैदा करने का व्‍यक्तिगत फैसला समाज के लिए दुखदायी नहीं है , पर विवाह कर बच्‍चे को जन्‍म देने के बाद उसका उचित लालन पालन न हो , यह समाज के लिए सुखद संकेत नहीं। आने वाले समय में बच्‍चों का पालन पोषण , देख रेख भी सही हो , और महिलाएं भी संतुष्‍ट रहे , इसके लिए सरकार को बहुत गंभीरता से एक उपाय करने की आवश्‍यकता है। नौकरी को लेकर महिलाओं के सख्‍त होने का सबसे बडा कारण यह है कि उम्र बीतने के बाद उनके लिए कोई संभावनाएं नहीं बचती , जबकि बच्‍चों को पढाने के क्रम में उनकी पढाई लिखाई चलती रहती है और भले ही अपने विशिष्‍ट विषय को भूल भी गयी हूं , उनका सामान्‍य विषयों का सामान्‍य ज्ञान कम नहीं होता। 
इसलिए सरकार को 35 से 40 वर्ष की उम्र के विवाहित बाल बच्‍चेदार महिलाओं पर उचित ध्‍यान देना चाहिए। उनके लिए हर प्रकार के सरकारी ही नहीं प्राइवेट नौकरियों में भी आरक्षण देने की व्‍यवस्‍था करनी चाहिए। इसके अतिरिक्‍त उन्‍हें व्‍यवसाय के लिए बैंको से बिना ब्‍याज के ऋण और अन्‍य तरह की सुविधाएं मुहैय्या करायी जानी चाहिए, ताकि घर परिवार संभालते वक्‍त भविष्‍य में कुछ आशाएं दिखती रहें। महिला विकास के लिए काम कर रही सरकारी गैरसरकारी तमाम संस्‍थाओं से मेरा अनुरोध है कि सिर्फ गांव की महिलाओं के लिए ही नहीं , मध्‍यम वर्ग की महिलाओं के लिए तथा आने वाली पीढी की बेहतर सुरक्षा के लिए इस मांग को सरकार के समक्ष रखे। आने वाली बेहतर पीढी के लिए महिलाओं का भविष्‍य के लिए आश्‍वस्‍त रहना आवश्‍यक है।

दामिनी को सच्‍ची श्रद्धांजलि कैसे मिले ??

Mahila sashaktikaran par nibandh


पुराने वर्ष को विदा करने और नए वर्ष का स्‍वागत करने के , व्‍यतीत किए गए वर्ष का मूल्‍यांकण करने और नए वर्ष के लिए अपने कार्यक्रम बनाने यानि हर व्‍यक्ति के लिए महत्‍वपूर्ण दिसंबर के उत्‍तरार्द्ध और जनवरी के पूवार्द्ध में पड रही कडाके की ठंड के मध्‍य देश एक अलग ही आग में जल रहा है । एक दुष्‍कर्म के एवज में अपराधियों को फांसी मिलने की मांग पर जनता अटल है , और सरकार अपनी जिद पर । पर सारी घटनाओं को देखने सुनने और चिंतन करने के बाद चाहकर भी इतने दिनों तक अपने विचारों को सुनियोजित ढंग से लिख पाने में सफल न हो सकी। क्‍यो‍कि मेरा सारा ध्‍यान संकेन्‍द्रण अपने सॉफ्टवेयर में एक एक्‍सटेंशन करने में बना हुआ था , जिसकी जानकारी ज्‍योतिषप्रेमियों को मेरे ज्‍योतिष वाले ब्‍लॉग से मिल जाएगी , मुझे यहां चर्चा करने की जरूरत नहीं है , क्‍योंकि इससे मुख्‍य मुद्दे से भटकने का भय है। 

वैसे बहुत खुशी की बात है कि 23 वर्षीया बच्‍ची दामिनी को इंसाफ दिलाने के लिए सारा देश एक साथ उठ खडा हुआ है। वैसे ऐसी घटना कोई पहली बार हमारे देश में नहीं हुर्इ है , प्रतिदिन अखबारों में ऐसी घटनाएं नजर में आ ही जाती हैं , शारिरीक और भावनात्‍मक तौर पर कमजोर होने का फायदा कभी कोई उठा ही लेता है। पुराने जमाने में तो बच्चियां अभिभावकों के आसपास उनकी देख रेख में रहा करती थी । पर आज युग बदल चुका है , बचे भी तो वे कैसे ? शिक्षा दीक्षा काम काज सब उनके लिए भी आवश्‍यक है , पहले की महिलाओं की तरह चादर बुरके में घर आंगन में कैद तो नहीं रह सकती। हजारों महिलाएं अपने साथ हो रहे अन्‍याय को आज भी बेबसी से देख रही हैं। 

इसका मुख्‍य कारण यह है कि हमारे समाज में आजतक ऐसी व्‍यवस्‍था है कि इस मामले में शिकारी को नहीं शिकार को ही सजा दी जाती है। यही कारण है कि आजतक लडकियों की जीवनशैली को इस कदर बनाया जाता रहा कि वे किसी के शिकार होने से बचे। यदि कभी किसी खास परिस्थिति में उनके साथ कोई हादसा हो भी गया तो इस बात को पचाना लडकियों या उसके परिवार वालों की मजबूरी होती है। दुनिया भर में प्रत्‍येक समाज और राष्‍ट्र में अपराध के हिसाब से दिया दोषी को दंड दिए जाने का नियम है। पर हमारे यहां आजतक ऐसे अपराध करने वाले समाज में सर उठाकर घूमते हैं। पर तरह तरह के सवालों , तानों से मासूम लडकियों का जीवन बेकार हो जाता है । इसलिए आजतक प्रत्‍येक गांव शहरों में ऐसे मुद्दों को अभिभावकों द्वारा ढंककर ही रखा जाता है। यहां तक कि ऐसी अपराधों की जानकारी बच्चियों या घर की महिलाओं तक ही सीमित रह जाती है , घर के पुरूषों तक को ऐसे अपराधों का पता नहीं चल पाता। बच्चियों , उनके अभिभावकों की चुप्पियों का बलात्‍कारी नाजायज फायदा उठा रहे हैं।

गिने चुने मामलों में ही ऐसी बातें सार्वजनिक होती है , जब घरवालों के नहीं, बाहरवालों के नजर में ऐसी घटनाएं आ जाती हैं। इस वक्‍त भी घरवालों के द्वारा नहीं , बाहरी लोगों के नजर में आ जाने से ही बलात्‍कारियों के विरूद्ध ऐसी आवाज उठी है , लाखों दामिनियां अभी भी सबकुछ झेलती जा रही हैं। खैर दामिनी अब नहीं रही , इसलिए उसकी जिंदगी के बेकार होने का खतरा तो नहीं है । पर समाज को अपनी सोंच बदलने की आवश्‍यकता है , किसी निर्दोष को दोषी ठहराना कदापि उचित नहीं , यही अपराधियों की संख्‍या के बढने की मुख्‍य वजह है। यदि महिलाओं को यह विश्‍वास होता कि उनके साथ हुए हादसे के प्रति समाज संवेदनशील रहेगा , उसकी मदद करेगा , तो ऐसे अपराध नहीं बढते , इसलिए किसी तरह के आंदोलन से पहले समाज के लोगों को अपनी मानसिकता बदलने की आवश्‍यकता है। समाज में ऐसी व्‍यवस्‍था होनी चाहिए कि अपराधी को अपना चेहरा छुपाना पडे , न कि उनके द्वारा सतायी गयी शारीरिक मानसिक तौर पर परेशान युवतियों को। उन्‍हें ससम्‍मान जीने का हक चाहिए , बिना भेदभाव के नौकरी और शादी विवाह के अवसर मिले। तभी ऐसे अपराधों में कमी हो पाएगी और दामिनी को सच्‍ची श्रद्धांजलि यही होगी।

हम सार्थक ढंग से बाबा अम्बेदकर जयंती मनाना सकते हैं !!!!!

हमारे देश में प्राचीन काल से जो दर्शन मौजूद है इसकी सबसे बडी शक्ति इसका लचीलापन है। कुछ भी विचार , जो ईश्वर, समाज या राजनीति से सम्बन्धित है, इसके दर्शन का अंग बन सकता है। सभी महापुरूषों के विचारों को सुनना , अमल करना यहां के लोगों का स्‍वभाव है। सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्र में तो हमारे देश ने सभी के अनुभवों से सीख ली ही है , धार्मिक क्षेत्र में भी देखा जाए तो हाल के सालों में न जाने कितने बाबाओं , कितनी माताओं को यहां के लोगों ने भगवान बना डाला है। सिर्फ आस्तिक ही नहीं , नास्तिक दर्शन भी आसानी से हिन्दू धर्म का अंग बन सकतें हैं यानि अपने अपने विचारों और भावनाओं के साथ हर प्रकार के लोगों का यहां स्‍वागत होता रहा है , उनके अनुसार समाज में परिवर्तन आता रहा है।

वैसे तो हमारे पास इतिहास का अवतारवाद का सिद्धांत हैं, जिसके अनुसार इतिहास एक दैवी योजना के तहत् चलता है। मानव जाति को हर प्रकार का कष्‍ट झेलते हुए उस समय तक निरंतर बने रहना होता है जब तक कोई अवतार न हो। पर अम्बेदकर का मानना था कि यदि समय की सही मांग को पहचानने वाले ज्ञान चक्षु हों, उसे सही मार्ग दिखाने का साहस एवं शौर्य हो तो एक महापुरूष द्वारा भी किसी भी युग का उद्धार हो सकता है। दैवी या सामाजिक शक्तियों को मानना और झेलना हमारी मजबूरी है , पर मनुष्य इतिहास के निर्माण का एक साधन है। डॉक्टर अम्बेदकर इस मामले में दूरदर्शी माने जा सकते हैं कि वे समझते थे कि समाज के लोगो के बीच जितनी सं‍तुलित आर्थिक स्थिति होगी, उतना ही देश में विकास हो सकता है। ऐसे में जल्‍द ही भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र बन सकता है। पर उनकी सोच का मतलब परिवर्तित हो गया , उन्‍हें संपूर्ण राष्‍ट्र का ना मान कर सिर्फ दलितों और पिछडो का मसीहा बना दिया।

ऐसा इसलिए क्‍योंकि अम्बेदकर ने भारत की जाति व्‍यवस्‍था को समझने के लिए अधिक श्रम और समय दिया । उनके हिसाब से आदिम समाज घुमन्तु कबीलों में बँटा समाज था, बाद में कुछ लोग गाँवों मे बस गए, किन्तु कुछ लोग घुमंतु बने रहे । कालांतर में एक समझौते के तहत किसी हमले की हालत में छितरे लोग, बसे लोगों के सुरक्षा कवच का काम और बसे हुए लोग उन्हे रहने को सीमा पर जगह और अपने मृत पशु देने लगें। भारत में यही छितरे लोग अछूत बन गए। प्राचीन वैदिक संस्कृति बलि की संस्कृति थी, नरमेध, अश्वमेध और गोमेध आदि यज्ञों में नर, अश्व, गो आदि की बलियां होती थीं और सब मिल कर सारा मांस आपस में बाँट लेते थे।

पर बुद्ध के मानवीय धर्म का समाज पर गहरा प्रभाव पड़ा.. बड़ी संख्या में राजाओं और आम जन ने ब्राह्मण धर्म को ठुकरा कर बुद्ध के सच्चे धर्म को अपना लिया.। ब्राह्मण संघर्षशील हो गए, देश में लगातार बौद्धो को हटाकर ब्राह्मण धर्म को पुनर्स्थापित किया जाने लगा। पर जनमामस में अहिंसा का भाव बैठ गया था जो कृषि आधारित समाज के लिये उपयोगी भी था। बौद्ध हिंसा के विरोधी होने के बावजूद ऐसे जानवर का मांस खा लेते थे जिसे उनके लिये मारा न गया हो। बौद्धो से भी दो कदम आगे निकलने के लिए ब्राह्मणों ने गोवध को सबसे बड़ा पाप घोषित कर दिया और गोमांस खाने वाले को अस्पृश्य , ऐसे में ब्राह्मण गोभक्षक से गोरक्षक बन गये। प्राचीन समझौते के तहत मृत जानवरों को ठिकाने लगाने का काम कर रहे छितरे लोगों के लिए मृत जानवरों का मांस खाना मजबूरी थी , इसलिए ये अस्पृश्य हो गये, इसकी शुरुआत अम्‍बेदकर ४०० ई. के आस पास का तय करते हैं।

अम्‍बेदकर आर्थिक सुधार का मॉडल नीचे से ऊपर की ओर रखना चाहते थे , वे सामाजिक ढांचे में दलितों को सम्मानजनक स्थान दिलाना चाहते थे। वे हिंदू समाज के आंतरिक सुधार को लेकर बहुत चिंतित थे। 1930 में गांधी जी द्वारा दलितों को हरिजन कहा जाना भी उन्‍हें अपमानजनक महसूस हुआ , न सिर्फ इसलिये कि दक्षिण भारत में मन्दिरों की देवदासियों के अवैध सन्तानो को हरिजन कहा जाता था, बल्कि इसलिये भी इस शब्द से दलित हिन्दू समाज की मुख्य धारा से अलग थलग दिखायी पडते थे। हिंदू या अन्‍य सम्प्रदायों से उनका कोई विद्वेष नहीं था। अम्बेदकर ने जब धर्म परिवर्तन का फैसला लिया तो उनको मनाने कई धर्माचार्य पहुंचे लेकिन अम्बेदकर ने सबको ठुकरा कर बौद्ध धर्म चुना था। शायद अम्बेदकर के मन में ये बात थी कि जिन दलितों ने अतीत में इस्लाम, इसाई और सिख धर्म अपनाया था समाजिक-आर्थिक रुप से उनमें कोई खास बदलाव नहीं आय़ा। जब एक हिंदू धर्माचार्य अम्बेदकर के पास हिंदू धर्म में ही बने रहने का आग्रह कर रहे थे तो अम्बेदकर ने उनसे पूछा कि क्या हिंदू समाज, शंकराचार्य के पद पर एक दलित को स्वीकार कर लेगा ?

इन दिनों महापुरूषों की जयंती भी जाति के आधार पर ही मनाई जाती है। बाबा अम्‍बेदकर भले ही संविधान के जरिये सबकी बराबरी की वकालत करते रहे मगर आज उनके नाम पर कोई भी राजनीति करने से नहीं चूक रहा। दलित अगर एकजुट हो किसी के पक्ष में मतदान कर दे तो सत्ता मिलनी तय है, पार्टियां दलितों का मसीहा क्‍यूं न बने ? सभी पार्टी अम्बेदकर के विचारों को ही पूरा करने का दंभ भरती है। इनके नाम पर सिर्फ जयंती मनाने , जुलूस निकालने या संस्‍थाओं , पुरस्‍कारों के नाम रखने और आरक्षण की राजनीति करने से कोई लाभ नहीं। दलितों के लिए हर प्रकार की सुविधाएं और उनकी आनेवाली पीढियों की प्रतिभाओं को विकास का सर्वोत्तम प्रबन्ध करके ही हम सार्थक ढंग से बाबा अम्बेदकर जयंती मना सकते हैं। तभी समाज में समता और समरसता बनी रह सकती है।

भाग्‍य बडा या कर्म ?


भाग्‍य बडा या कर्म .. इस बात पर अबतक सर्वसम्‍मति का अभाव है। दोनो पक्ष के लोग अपनी अपनी बातों को सही साबित करने के लिए अलग अलग तर्क दिया करते हैं , अलग अलग कहानियां गढा करते हैं। कर्म को मानने वाले लोगों का मत है कि हम जैसे कर्म करते हैं , वैसा ही फल मिलता है। असफलता स्थिति में हमें अपने भीतर झांकना चाहिए कि चूक कहां हुई। लेकिन हम धागे, टोने-टोटकों , माथे या हाथों की लकीरों और जन्‍मकुंडलियों से भाग्य को समझने की कोशिश करते हैं, यदि कर्म अच्छे हैं तो भाग्य अपने आप अच्छा हो ही जाएगा। इस दुनिया राजा से रंक और रंक से राजा बनने के कहानियों की कोई कमी नहीं। 



दूसरी ओर भाग्‍य को मानने वाले लोगों का कहना है कि क्यों कुछ बच्‍चे मजबूत शरीर और कुछ कई बीमारियों के साथ या बिना हाथ पांव के जन्‍म लेते हैं। क्‍यूं कुछ बच्‍चे सुख सुविधा संपन्न परिवारों में तो कुछ का जन्‍म दरिद्रों के घर में होता है। कुछ अच्‍छे आई क्‍यू के साथ जन्‍म लेते हैं , तो कुछ अविकसित मस्तिष्‍क के साथ ही इस दुनिया में कदम रखते हैं। कुछ का पालन पोषण माता पिता और परिवार जनों के भरपूर लाड प्‍यार में होता है , तो कुछ इससे वंचित रह जाते हैं। जबकि इन बच्‍चों ने कोई गल्‍ती नहीं की है। इसी प्रकार बडे होने के बाद किसी को मनोनुकूल जीवनसाथी मिलते हैं,तो विवाह के बाद किसी का जीवन नर्क हो जाता है। किसी को अनायास संतान का सुख मिलता है , तो कई जीवनभर डॉक्‍टरों और देवी देवताओं के चक्‍कर काटते हैं। सचमुच विपरीत पक्ष वालों के लिए इसका जबाब दे पाना कठिन है।


वास्‍तव में कार्य कारण के नियमों से पूरी प्रकृति भरी पडी है। इतनी बडी प्रकृति में हमने कोई भी काम बिना नियम के होते नहीं देखा है। सूर्य अपने पथ पर तो बाकी ग्रह उपग्रह भी अपने पथ पर चल रहे हैं। पृथ्‍वी पर स्थित एक एक जड चेतन अपने अपने स्‍वभाव के हिसाब से काम कर रहे हैं। हम जैसा कर्म करेंगे , वैसा फल मिलेगा ही । बिना संतुलन के दौडेंगे , तो गिरेंगे , गिरेंगे तो चोट लगेगी। यदि कार्य और कारण का संबंध न हो तो हम कोई नियम स्‍थापित नहीं कर सकते। पर बालक ने जन्‍म लेते साथ जो पाया , वह उसके कर्म का फल नहीं। पर यहां भी तो कोई नियम काम करना चाहिए , आज विज्ञान माने या न माने , पर यह फल बिना किसी नियम के उसे नहीं मिल सकता।

जबतक कर्म से अधिक फल की प्राप्ति होती रहती है , कोई भी भाग्‍य की ताकत को स्‍वीकार नहीं करता। उसे महसूस होता है कि उसे उसके किए का ही फल मिल रहा है। जिन्‍हें फल नहीं मिल रहा , वे कर्म ही सही नहीं कर रहें। पर जब कर्म की तुलना में प्रतिफल नहीं मिल पाता , लोग भाग्‍य की ताकत को महसूस करने लगते हैं। अपने आरंभिक जीवन में सफल रहनेवाले लोग इसे स्‍वीकार नहीं कर पाते , पर जैसे ही उनके जीवन में भी बिना किसी बुरे कर्म के विपत्तियां दिखाई पडती हैं , उन्‍हें भी भाग्‍य की ताकत महसूस होने लगती है। जीवन के प्रारंभिक दौर में असफलता प्राप्‍त करने वाले लोग तो जीवन में संतुलन बना भी लेते हैं , बाद में  भाग्‍य के कारण  असफलता प्राप्‍त करने वालों को अधिक कष्‍ट होता है। 

भाग्‍य को जानने के लिए अक्‍सर लोग ज्‍योतिषियों से संपर्क करते हैं , पर प्रारब्‍ध की जानकारी ज्‍योतिषियों को भी नहीं होती। भिन्‍न भिन्‍न स्‍तर वाले परिवार में भी बच्‍चे का जन्‍म एक समय में हो सकता है यानि एक जन्‍म कुंडली होते हुए भी बच्‍चे का भाग्‍य अलग अलग हो सकता है। नक्षत्रों और ग्रहों पर आधारित ज्‍योतिष मात्र काल गणना का विज्ञान है। जिस तरह घडी के समय के आधार पर अंधरे उजाले को देखते हुए दिनभर के और कैलेण्‍डर के आधार पर जाडे , गर्मी , बरसात के मौसम को समझते हुए वर्षभर के कार्यक्रमों को अंजाम दिया जाता है , उसी प्रकार हम जन्‍म कालीन ग्रहों के आधार पर अपने जीवन के उतार चढाव को समझकर तदनुरूप कार्यक्रम बना सकते हैं। जीवन में कभी समय आपके अनुकूल होता है तो कभी प्रतिकूल , प्रतिकूल समय में आपके अनुभव बढते हैं , जबकि अनुकूल समय में आपको अच्‍छे परिणाम मिलते हैं। अच्‍छे वक्‍त की जानकारी से आपका उत्‍साह, तो बुरे वक्‍त की जानकारी से आपका धैर्य बढता है। 

किसी खास परिवार , देश या माहौल में जन्‍म लेना तो मनुष्‍य के वश में नहीं , इसलिए जीवन में जैसी जैसी परिस्थिति मिलती जाए , उसे स्‍वीकार करना हमारी मजबूरी है , पर आशावादी सोंच के साथ अच्छे कर्म किए जा सकते हैं और उनके सहारे अपने भाग्‍य को मजबूत बनाया जा सकता है। महीने के पहली तारीख को मिले तनख्‍वाह को कम या अधिक करना आपके वश में नहीं , पर उससे पूरे महीने या पूरे जीवन अच्‍छे या बुरे तरीके से जीवन निर्वाह करना आपके वश में है। आप पहले ही दिन महीनेभर क्‍या भविष्‍य के भी कार्यक्रम बनाकर नियोजित ढंग से खर्च कर सकते हैं या बाजार में अंधाधुंध खरीदारी कर , शराब पीकर , जुआ खेलकर महीने या भविष्‍य के बाकी दिनों को बुरा बना सकते हैं। इसलिए किसी खास परिस्थिति में होते हुए भी कर्म के महत्‍व से इंकार नहीं किया जा सकता।
हां , जीवन में कभी कभी ऐसा समय भी आता है ,जब भाग्‍य के साथ देने से मित्रों , समाज या कानून का कुछ खास सहयोग आपको मिलने लगता है ,किसी तरह के संयोग से आपके काम बनने लगते हैं , तो कभी दुर्भाग्‍य से असामाजिक तत्‍वों को भी आपको झेलना पडता है। 100 वर्ष की लंबी आयु में कभी दस बीस वर्षों तक ग्रहों का खास अच्‍छा या बुरा प्रभाव हमपर पड सकता है। उस भाग्य या दुर्भाग्य से खुद को फायदा दिलाने के लिए हमें आक्रामक या सुरक्षात्‍मक ढंग से जीवन जीना चाहिए। जैसे जाडे की सूरज की गर्मी को सेंककर हम खुद को गर्म रखते हैं या गर्मी की दोपहर के सूरज की ताप में बचने के किसी पेड़ की छाया में या वातानुकूलित घर में शरण लेते हैं। 


पर ध्‍यान रखें , जीवन में कभी भी हमारा मेहनत विफल नहीं होता । प्रकृति में प्रत्‍येक वस्‍तु का महत्‍व है , किसी में कुछ गुण हैं ,उसे विकसित करने की दिशा में कदम बढाए , आज या कल , उसकी कद्र होगी ही। कोई बीज तीन चार महीने में तो कोई दस बीस वर्ष में फल देना आरंभ करता है। हर पशु पक्षी का भी हर काम का अलग अलग समय है। देखने में एक जैसे होते हुए भी हर मनुष्‍य अलग अलग तरह के बीज हैं , इन्‍हें फलीभूत होने के लिए भी अनुकूल परिस्थितियों की आवश्यकता होती है । आसमान में गोचर के ग्रह मनुष्‍य के सम्‍मुख विभिन्‍न परिस्थितियों का निर्माण करते हैं , जिसके आधार पर कर्म का सुंदर फल प्राप्‍त होता है। लोग भले ही इसे भाग्‍य का नाम दें , पर वह हमारे सतत कर्म का ही फल होता है।


हैकरों के लिए ऐसे पासवर्डों का तोड निकालना कुछ कठिन होता है !!

इस वर्ष नवरात्र में दस बारह दिनों के लिए गांव चली गयी , चूंकि गांव में मेरे पास कंप्‍यूटर और इंटरनेट की सुविधा नहीं थी , इसलिए इतने दिनों तक अपने जीमेल को लॉगिन भी नहीं कर सकी। आने के बाद जैसे ही काम करना शुरू किया , एलर्ट आने शुरू हुए। मेरा अकाउंट 8 अक्‍तूबर को किसी दूसरे देश से खोला गया था। राहत की बात थी कि किसी को मेल वगैरह नहीं किया गया था। मैने झट से पासवर्ड बदला , पर बदलने के बाद भी मुझे कोई राहत नहीं मिली। 11 अक्‍तूबर को ब्राजील और 13 अक्‍तूबर को टर्की से पुन: इस अकाउंट को खोले जाने की सूचना मिली। इसके बाद मैने अपने पासवर्ड को बहुत मजबूत बनाया , उसमें कैपिटल , स्‍माल अक्षरों और अंकों के साथ संकेत चिन्‍हों का भी प्रयोग किया , यानि कि वैसा ही मजबूत पासवर्ड रखा , जैसा इंटरनेट बैंकिंग में रखने की सलाह दी जाती है ..


पासवर्ड को बदलने के बाद इतने दिन गुजर चुके हैं , अभी तक पुन: ऐसी कोई सूचना नहीं मिली है । शायद हैकरों के लिए ऐसे पासवर्डों का तोड निकालना शायद कुछ कठिन होता हो या फिर उन्‍हें अब मेरे अकाउंट को खोलने की आवश्‍यकता नहीं हो रही हो , पर मुझे तो राहत मिल गयी है। हालांकि ऐसे पासवर्डों को याद रखना लोगों के लिए भी कठिन होता है , पर मेरी सलाह है कि  इंटरनेट का अच्‍छी तरह उपयोग करनेवालों को ऐसी सावधानी बरतनी ही चाहिए , उन्‍हें ऐसे ही पासवर्ड रखने चाहिए , क्‍यूंकि अकाउंट का दुरूपयोग किए जाने के बाद कोई चारा नहीं होता।

भला बिना बच्‍चों के कैसी दीपावली ??

what is diwali for children  


वैसे तो पूरी दुनिया में हर देश और समाज में कोई न कोई त्‍यौहार मनाए जाते हैं , पर भारतीय संस्‍कृति की बात ही अलग है। हर महीने एक दो पर्व मनते ही रहते हैं , कुछ आंचलिक होते हैं तो कुछ पूरे देश में मनाए जानेवाले। दीपावली , ईद और क्रिसमस पूरे विश्‍व में मनाए जाने वाले तीन महत्‍वपूर्ण त्‍यौहार हैं , जो अलग अलग धर्मों के लोग मनाते हैं। भारतवर्ष में पूरे देश में मनाए जानेवाले त्‍यौहारों में होली , दशहरा , दीपावली जैसे कई त्‍यौहार हैं। त्‍यौहार मनाने के क्रम में लगभग सभी परिवारों में पति खर्च से परेशान होता है , पत्‍नी व्रत पूजन , साफ सफाई और पकवान बनाने के अपने बढे हुए काम से , पर बच्‍चों के लिए तो त्‍यौहार मनोरंजन का एक बडा साधन होता है। स्‍कूलों में छुट्टियां है , पापा के साथ घूमघूमकर खरीदारी करने का और मम्‍मी से मनपसंद पकवान बनवाकर खाने की छूट है , तो मस्‍ती ही मस्‍ती है। मम्‍मी और पापा की तो बच्‍चों की खुशी में ही खुशी है। सच कहं , तो बच्‍चों के बिना कैसा त्‍यौहार ??


पर आज सभी छोटे छोटे शहरों के मां पापा बिना बच्‍चों के त्‍यौहार मनाने को मजबूर हैं। चाहे होली हो , दशहरा हो या दीपावली , किसी के बच्‍चे उनके साथ नहीं। इस प्रतियोगिता वाले दौर में न तो पढाई छोटे शहरों में हो सकती है और न ही नौकरी। दसवीं पास करते ही अनुभवहीन बच्‍चों को दूर शहरों में भेजना अभिभावकों की मजबूरी होती है , वहीं से पढाई लिखाई कर आगे बढते हुए कैरियर के चक्‍कर में वो ऐसे फंसते हैं कि पर्व त्‍यौहारों में दो चार दिन की छुट्टियों की व्‍यवस्‍था भी नहीं कर पाते। मैं भी पिछले वर्ष से हर त्‍यौहार बच्‍चों के बिना ही मनाती आ रही हूं। दशहरे में गांव चली गयी , भांजे भांजियों को बुलवा लिया , नई जगह मन कुछ बहला। पर दीपावली में अपने घर में रहने की मजबूरी थी , लक्ष्‍मी जी का स्‍वागत तो करना ही पडेगा। पर बच्‍चों के न रहने से भला कोई त्‍यौहार त्‍यौहार जैसा लग सकता है ??

पहले संयुक्‍त परिवार हुआ करते थे , तीन तीन पीढियों के पच्‍चीस पचास लोगों का परिवार , असली त्‍यौहार मनाए जाते थे। कई पीढियों की बातें तो छोड ही दी जाए , अब तो त्‍यौहारों में पति पत्‍नी और बच्‍चों तक का साथ रह पाना दूभर होता है। जबतक बच्‍चों की स्‍कूली पढाई चलती है , त्‍यौहारों में पति की अनुपस्थिति बनी रहती है , क्‍यूंकि बच्‍चों की पढाई में कोई बाधा न डालने के चक्‍कर में वे परिवार को एक स्‍थान पर शिफ्ट कर देते हैं और खुद तबादले की मार खाते हुए इधर उधर चक्‍कर लगाते रहते हैं। हमारे मुहल्‍ले के अधिकांश परिवारों में किराए में रहनेवाली सभी महिलाएं बच्‍चों की पढाई के कारण अपने अपने पतियों से अलग थी। पर्व त्‍यौहारों में भी उनका सम्मिलित होना कठिन होता था , किसी के पति कुछ घंटों के लिए , तो किसी के दिनभर के लिए समय निकालकर आ जाते। मैने खुद ये सब झेला है , भला त्‍यौहार अकेले मनाया जाता है ??
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बच्‍चों की शिक्षा जैसी मौलिक आवश्‍यकता के लिए भी सरकार के पास कोई व्‍यवस्‍था नहीं है। पहले समाज के सबसे विद्वान लोग शिंक्षक हुआ करते थे , सरकारी स्‍कूलों की मजबूत स्थिति ने कितने छात्रों को डॉक्‍टर और इंजीनियर बना दिया था। पर समय के साथ विद्वान दूसरे क्षेत्रों में जाते रहें और शिक्षकों का स्‍तर गिरता चला गया। शिक्षकों के हिस्‍से इतने सरकारी काम भी आ गए कि सरकारी स्‍कूलों में बच्‍चों की पढाई पीछे होती गयी।सरकार ने कर्मचारियों के बच्‍चों के पढने के लिए केन्‍द्रीय स्‍कूल भी खोलें , उनमें शिक्षकों का मानसिक स्‍तर का भी ध्‍यान रखा , पर अधिकांश क्षेत्रों में खासकर छोटी छोटी जगहों के स्‍कूल पढाई की कम राजनीति की जगह अधिक बनें।  इसका फायदा उठाते हुए प्राइवेट स्‍कूल खुलने लगे और मजबूरी में अभिभावकों ने बच्‍चों को इसमें पढाना उचित समझा। आज अच्‍छे स्‍कूल और अच्‍छे कॉलेजों की लालच में बच्‍चों को अपनी उम्र से अधिक जबाबदेही देते हुए हम दूर भेज देते हैं। अब नौकरी या व्‍यवसाय के कारण कहीं और जाने की जरूरत हुई तो पूरे परिवार को ले जाना मुनासिब नहीं था। इस कारण परिवार में सबके अलग अलग रहने की मजबूरी बनी रहती है।

वास्‍तव में अध्‍ययन के लिए कम उम्र के बच्‍चों का माता पिता से इतनी दूर रहना उनके सर्वांगीन विकास में बाधक है , क्‍यूंकि आज के गुरू भी व्‍यावसायिक गुरू हैं , जिनका छात्रों के भविष्‍य या चरित्र निर्माण से कोई लेना देना नहीं। इसलिए उन्‍हें अपने घर के आसपास ही अध्‍ययन मनन की सुविधा मिलनी चाहिए।  यह सब इतना आसान तो नहीं , बहुत समय लग सकता है , पर पारिवारिक सुद्ढ माहौल के लिए यह सब बहुत आवश्‍यक है। इसलिए आनेवाले दिनों में सरकार को इस विषय पर सोंचना चाहिए।  मैं उस दिन का इंतजार कर रही हूं , जब सरकार ऐसी व्‍यवस्‍था करे , जब प्राइमरी विद्यालय में पढने के लिए बच्‍चे को अपने मुहल्‍ले से अधिक दूर , उच्‍च विद्यालय में पढने के लिए अपने गांव से अधिक दूर , कॉलेज में पढने या कैरियर बनाने के लिए अपने जिले से अधिक दूर जाने की जरूरत नहीं पडेगी। तभी पूरा परिवार साथ साथ रह पाएगा और आनेवाले दिनों में पर्व त्‍यौहारों पर हम मांओं के चेहरे पर खुशी आ सकती है , भला बिना बच्‍चों के कैसी दीपावली ??

हर दिमाग के बीज को एक विशाल वृक्ष बनाने में हर कोई मदद करे !!

बीज तो हर दिमाग में होते हैं , पर समय पर ही उनकी देखभाल हो पाती है , अंकुरण हो पाता है , विकास के क्रम में उन्‍हें हर प्रकार का वातावरण मिल पाता है और वह छोटा सा बीज एक विशाल वृक्ष बन पाता है। आज के सामाजिक राजनीतिक हालत में अनेको दिमाग के बीज दिमाग में ही सोए पडे रह जाते हैं और अनेको प्रकृति की मार से मौत के मुंह में भी चले जाते हैं। मैं आशा करती हूं कि हर दिमाग के बीज को एक विशाल वृक्ष बनाने में हर कोई मदद करे , ताकि हमारे चारो ओर विशाल ही विशाल वृक्ष नजर आए , सभी अपनी अपनी विशेषताओं की घनी पत्तियों से छांव , सुगंधित पुष्‍पों से वातावरण में सुगंध और मीठे फलों से लोगों को असीम तृप्ति प्रदान करे।

प्रकृति के सहयोग प्राप्‍त होने से बहुत लोग मेहनत और आवश्‍यकता से बहुत अधिक प्राप्‍त कर रहे होते हैं , इन्‍हें अपने सामर्थ्‍य का उपयोग दूसरों की असमर्थता को दूर करने में करना चाहिए , क्‍यूंकि प्रकृति पर कभी भरोसा नहीं किया जा सकता कि आज वो आपका साथ दे रही है और संयोग से आपके काम बनते जा रहे हैं , तो कल भी आपकी यही स्थिति होगी। कभी भी आपको किसी और की आवश्‍यकता पड सकती है। किसी की मदद करते समय इस बात का भी ध्‍यान रखें कि उसे बार बार मदद करने की आवश्‍यकता न पडे , उसे इस प्रकार की मदद करें  कि आनेवाले दिनों में वो इतना मजबूत हो सके कि वो पुन: दो चार लोगों की मद कर उन्‍हें भी इस लायक बना सके कि वो दूसरों की मदद कर सके।

मेरे ख्‍याल से हमारी जीवनशैली ऐसी होनी चाहिए कि वह आनेवाली पीढी को शारीरिक , आर्थिक , मानसिक , नैतिक और आध्‍यात्मिक दृष्टि से अधिक से अधिक मजबूत बनाती चली जाए। इनमें किसी का भी महत्‍व आनेवाले समय में कम नहीं होता है। इनकी मजबूती हमें हर परिस्थिति में खुशी से जीना सीखा देती है, जो मस्तिष्‍क में किसी प्रकार का तनाव कम करने में सहायक है।