दहेज प्रथा की समाप्ति

प्राचीन काल में समान हैसियत रखनेवाले दो मित्र या दो परिचित रिश्‍तेदार या किसी मध्‍यस्‍थ के माध्‍यम से दो अनजान व्‍यक्ति अपने पुत्र या पुत्री के विवाह की बातें करते थे , उस वक्‍त वर अपनी पढाई पूरी कर किसी व्‍यवसाय में लग चुका या कहीं शहर में पढाई कर रहा होता था और कन्‍या अक्षर ज्ञान प्राप्‍त कर लेने के बाद घरेलू कार्यों में दक्षता हासिल कर रही होती थी। सामान्‍य तौर पर दोनो के समान रंगरूप , कद काठी और हैसियत के कारण दहेज लेने देने का कोई प्रश्‍न उठने का सवाल ही नहीं था, समाज में उस वर के समकक्ष विवाह योग्‍य कितने वर मौजूद थे , इस कारण वर वालों का कोई एकाधिकार नहीं था कि वे विवाह के लिए मोटी रकम लें। बस कन्‍या की सुंदरता और खानदान की श्रेष्‍ठता उनकी पहली पसंद हुआ करती थी।

वर कन्‍या को गहने जेवर और कपडे वगैरह के रूप में उपहार देने के क्रम में और रिश्‍तेदारों की उपस्थित भीड को संभालने और खिलाने पिलाने में दोनो पक्षों का खर्च हुआ करता था। चूंकि कन्‍या के यहां वर पक्ष का आगमन होता था , इसलिए उनके स्‍वागत के लिए उनके संबंधियों को भी उपहार देने की परंपरा बनी थी। इसके अतिरिक्‍त कन्‍या दान के वक्‍त फर्नीचर तथा बरतन वगैरह दान किए जाने के कारण उनका कुछ अधिक खर्च हो जाता था। इस तरह वर पक्ष की तुलना में कन्‍या पक्ष का कुछ ही अधिक खर्च होता था। पर वर पक्ष के द्वारा दिए गए उपहार अपने घर में रह जाते थे , जिसका मौके बेमौके उपयोग किया जा सकता था , जबकि  कन्‍या पक्ष के द्वारा दिया गया उपहार बेटी के साथ उसके ससुराल चला जाता था , जिसपर उनका कोई अधिकार नहीं रह जाता था , शायद इसलिए ही बेटियों को उपहार देना भी कन्‍या पक्ष वालों को भारी लगता होगा।

लेकिन कालांतर में सुविधाभोगी मानसिकता के कारण कमोवेश सभी परिवारो में अपनी पुत्रियों का विवाह अपने से संपन्‍न घराने में योग्‍य वर से करने की प्रवृत्ति बढने लगी और इसके लिए कन्‍या पक्ष वाले वर पक्ष वालों को लालच देने लगें। यदि कोई लालच न दिया जाए तो वर पक्ष वाले अपने से निम्‍न हैसियत वालों की कन्‍या से विवाह करने को कैसे राजी हो सकते थे ? कभी कभी अपने समान हैसियतवाले घराने में भी शक्‍ल सूरत से कमजोर या किसी प्रकार की अपंगता की शिकार कन्‍या के विवाह के लिए वर पक्ष को लालच देना कन्‍या पक्षवालों की मजबूरी रही और हालात की कमजोरी ने वर पक्ष को इसे स्‍वीकारने को बाध्‍य किया। इन्‍हीं सब बातों से क्रमश: दहेज की प्रथा बढती चली गयी। बाद में कन्‍या पक्ष द्वारा पढाई लिखाई और नौकरी प्राप्‍त करने के बाद बेहतर जीवन जी पाने वाले वरों की मांग बडे रूप में बढी और दहेज प्रथा का और वीभत्‍स रूप होता चला गया। पर यह तो हमें मानना ही होगा कि कन्‍याओं के पिता की स्‍वार्थी प्रवृत्ति ने ही दहेज प्रथा को जन्‍म दिया है।

आज भी वर या कन्‍या दोनो की हैसियत और उनके माता पिता की हैसियत समान हो तो विवाह के पहले दहेज का कोई प्रश्‍न ही नहीं उठता, चाहे वे अपनी पसंद से विवाह करें या माता पिता की पसंद से या किसी मध्‍यस्‍थ के माध्‍यम से। दोनो की ओर से यथासंभव उपहार खरीदे जाएंगे , खर्च किए जाएंगे , पर यह कितना होगा , इसे पहले से तय करने की कोई आवश्‍यकता नहीं। पर कन्‍या अधिक पढी लिखी न हो और आप अच्‍छे से अच्‍छा वर ढूंढेंगे , तो इस कमी की क्षतिपूर्ति के लिए माता पिता को कुछ करना ही पडेगा। पर कई दशक पूर्व से ही जहां लडकी भी कमाउ होती थी , वहां दहेज की अधिक समस्‍या नहीं उपस्थित हुआ करती थी।

जहां नई नई सरकारी नौकरी ज्‍वाइन करने वाले छोटी छोटी आवश्‍यकता को पूरी करने में ही कुछ दिनों से अपनी सारी तनख्‍वाह समाप्‍त कर रहे हों , दान दहेज के रूप में लाखों कैश और गृहस्‍थी का छोटा बडा सामान एक साथ मिल जाने में क्‍यों आपत्ति कर सकते थे ? उसके लिए कन्‍या की शक्‍ल सूरत या पारिवारिक स्‍तर में थोडा समझौता भी अधिक मायने नहीं रखता था। पर आज मल्‍टीनेशनल कंपनी में लाखों के पैकेज की नौकरी कर रहे युवा दहेज के विरोध में ही दिखाई दे रहे हैं। 

कारण यह है कि कन्‍या के माता पिता अपने पूरे जीवन की बचत भी दे दें , तो उसके एक वर्ष के पैकेज के बराबर होगा। इस कारण इसे महत्‍व न देकर वह उपयुक्‍त पात्र चुनना अधिक पसंद कर रहे हैं।यह समाज के लिए शुभ हो सकता है , पर ऐसे में सामान्‍य से कम शक्‍ल सूरत या प्रोफेशनल डिग्री न रखने वाली कन्‍याओं के विवाह में बहुत बाधा उपस्थित हुई है। ऐसी कन्‍याओं के माता पिता काफी लाचार परेशान दिख रहे हैं। वैसे हाल के दिनों में आयी कन्‍याओं की संख्‍या में गिरावट से थोडी राहत अवश्‍य हुई है , अन्‍यथा स्थिति और भयावह हो सकती थी।

इस सप्‍ताह में ही भूकम्‍प के कई झटकों के आने की उम्‍मीद है !!

'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिषीय अनुसंधान केन्‍द्र' के द्वारा ग्रहों की गत्‍यात्‍मक और स्‍थैतिक शक्ति की खोज के बाद यह स्‍पष्‍ट हो गया है कि इस विशाल ब्रह्मांड में हर घटना एक दूसरे पर आधारित है और विभिन्‍न प्रकार की किरणों या गुरूत्‍वाकर्षण शक्ति के प्रभाव से इनमें से कोई भी अछूता नहीं। जिस तरह हर पशु और पक्षियों में अपने जीन के हिसाब से उसके क्रियाकलाप देखने को मिलते हैं , उसी प्रकार हर व्‍यक्ति अपने जन्‍मकालीन ग्रहों के हिसाब से अपनी शक्ति प्राप्‍त करता है और अपने अपने कर्तब्‍यों का पालन करता है। हां, युग , समाज और काल के हिसाब से व्‍यक्ति विशेष में थोडा बहुत परिवर्तन देखने को मिलता है , उसे हम पृथ्‍वी के अलग अलग भाग का प्रभाव या इसमें होनेवाले परिवर्तन का प्रभाव मान सकते हैं।

व्‍यक्ति विशेष पर ग्रहों के प्रभाव का विशद अध्‍ययन के बाद हमने पृथ्‍वी की जलवायु पर ग्रहों के प्रभाव को समझना चाहा , तो इन दोनो में दिखाई देनेवाला सहसंबंध हमें इसके अध्‍ययन के शौक को बढाता रहा। इस दिशा में हमारी खोज के आधार पर 2010 के पूरे वर्षभर के मौसम पर लिखा गया एक आलेख आप कुछ ही दिनों में आपको मिल जाएगी। मैं यह नहीं कह सकती कि जलवायु को प्रभावित करने सारे ग्रहीय कारकों की हमें जानकारी हो चुकी है , 40 प्रतिशत की ही जानकारी हमें हो सकती है , 60 प्रतिशत तक की खोज बाकी हो सकती है। 

पर खास तिथि को खास ग्रहीय स्थिति को देखते हुए जलवायु की कोई भविष्‍यवाणी का सटीक हो जाना इस संबंध को मान्‍यता दिलाने के लिए काफी है, जो कि पिछले वर्ष कई बार हो चुका। जलवायु पर ग्रहों के प्रभाव को देखने के बादए भूकम्‍प जैसी घटनाओं पर भी ग्रहों के प्रभाव को जानने की उत्‍सुकता होनी स्‍वाभाविक है। इधर एक दो वर्षों से इस दिशा में अध्‍ययन किया गया तो कुछ सफलता मिलने लगी ।

इस आलेख मे लिखे गए खास ग्रह स्थिति में बाली में हुए भूकम्‍प की घटना तथा इस आलेख में लिखे गए ग्रहयोग के अनुसार हुई भूकम्‍प की घटना हमारे अध्‍ययन के पश्‍चात निकाले गए निष्‍कर्ष को सत्‍य साबित करते हुए और अध्‍ययन के लिए हमारे आत्‍मविश्‍वास को बढाने में मदद कर रही है। यही कारण है कि सामने भूकम्‍प के लिए जिम्‍मेदार एक खास ग्रह स्थिति की चर्चा करने से मैं अपने आपको नहीं रोक सकी। आनेवाले 13 से 16 जनवरी 2010 के मध्‍य आसमान के विभिन्‍न राशियों में स्थित ग्रहों की गत्‍यात्‍मक और स्‍थैतिक शक्ति पृथ्‍वी के विभिन्‍न क्षेत्रों में भूकम्‍प के कई झटके देने में समर्थ होगी।

इन चार दिनों में जो शुरूआती झटका अधिक बडे रूप में हो सकता है , वह किसी भी देश में 13 जनवरी को 5 बजे से 7 बजे सुबह आ सकता है। हमारे अध्‍ययन के अनुसार ग्रहों के आधार पर इस झटके की तीव्रता 180 डिग्री देशांतर रेखा पर दिखाई दे रही है। यानि उसके आसपास 20 डिग्री के अंतर पर इस झटके को महसूस किया जाना चाहिए। वह रेखा अंतर्राष्‍ट्रीय तिथि परिवर्तन की रेखा भी है , इसलिए भूकम्‍प आने की तिथि के लिए हम 12 जनवरी या 13 जनवरी में से दोनों को ले सकते हैं, ताकि कोई संदेह न बने। पर वास्‍तव में भारतवर्ष की घडी के हिसाब से यह समय 13 जनवरी की रात 11 बजे का है। अन्‍य महत्‍वपूर्ण झटके इस मुख्‍य समय के अलावे किसी भी देश में यहां तक कि हमारे ही देश के आसपास की देशांतर रेखा के 20 डिग्री अंतर पर 10 बजे रात्रि से लेकर 12 बजे रात्रि तक का भी रह सकता है। मेरी ईश्‍वर से प्रार्थना है कि इसमें जान माल की अधिक क्षति न हो ।

भूकम्‍प जैसे दैवी आपदा के अलावे अन्‍य मानवकृत आपदाओं के होने में भी इस प्रकार के ग्रहीय योग की भूमिका होती है , क्‍यूंकि ऐसी ग्रह स्थितियां पृथ्‍वी में हलचल मचाने के अलावे किसी न किसी प्रकार की घटना को उपस्थित कर व्‍यक्ति के दिलोदिमाग में भी हलचल मचाने में मुख्‍य भूमिका अदा करती है । इसलिए ऐसे ग्रहयोग के समय अनावश्‍यक कार्यों की जबाबदेही या किसी मनोरंजक या महत्‍वपूर्ण कार्यक्रम की उपेक्षा ही की जानी चाहिए !!

श्री श्रद्धानंद पांडेय जी द्वारा लिखित 'हनुमान पचासा'


हनुमान पचासा

Hanuman pachasa


जय हनुमान दास रघुपति के।
कृपामहोदधि अथ शुभ गति के।।
आंजनेय अतुलित बलशाली।
महाकाय रविशिष्‍य सुचाली।।
शुद्ध रहे आचरण निरंतर।
रहे सर्वदा शुचि अभ्‍यंतर।।
बंधु स्‍नेह का ह्रास न होवे।
मर्यादा का नाश न होवे।।
बैरी का संत्रास न होवे।
व्‍यसनों का अभ्‍यास न होवे।।
मारूतनंदन शंकर अंशी।
बाल ब्रह्मचारी कपि वंशी।।
रामदूत रामेष्‍ट महाबल।
प्रबल प्रतापी होवे मंगल।।
उदधिक्रमण सिय शोक निवारक।
महावीर नृप ग्रह भयहारक।।
जय अशोक वन के विध्‍वंशक।
संकट मोचन दु:ख के भंजक।।
जय राक्षस दल के संहारक।
रावण सुत अक्षय के मारक।।
भूत पिशाच न उन्‍हें सताते।
महावीर की जय जो गाते।।
अशुभ स्‍वप्‍न शुभ करनेवाले।
अशकुन के फल हरनेवाले।।
अरिपुर अभय जलानेवाले।
लक्ष्‍मण प्राण बचानेवाले।
देह निरोग रहे बल आए।
आधि व्‍याधि मत कभी सताए।
पीडक श्‍वास समीर नहीं हो।
ज्‍वर से प्राण अधीर नहीं हो।।
तन या मन में शूल न होवे।
जठरानल प्रतिकूल न होवे।।
रामचंद्र की विजय पताका।
महामल्‍ल चिरयुव अति बांका।।
लाल लंगोटी वाले की जय।
भक्‍तों के रखवालों की जय।।
हे हठयोगी धीर मनस्‍वी।
रामभक्‍त निष्‍काम तपस्‍वी।।
पावन रहे वचन मन काया।
छले नहीं बहुरूपी माया।।
बनूं सदाशय प्रज्ञाशाली।
करो कुभावों से रखवाली।।
कामजयी हो कृपा तुम्‍हारी।
मां समभाषित हो पर नारी।।
कुमति कदापि निकट मत आए।
क्रोध नहीं प्रतिशोध बढाए।।
बल धन का अभिमान न छाए।
प्रभुता कभी न मद भर पाए।।
मति मेरी विवेक मत छोडे।
ज्ञान भक्ति से नाता जोडे।।
विद्या मान न अहं बढाए।
मन सच्चिदानंद को पाए।।
तन सिंदूर लगानेवाले।
मन सियाराम बसानेवाले।।
उर में वास करे रघुराई।
वाम भाग शोभित सिय माई।।
सिन्‍धु सहज ही पार किया है।
भक्‍तों का उद्धार किया है।।
पवनपुत्र ऐसी करूणाकर।
पार करूं मैं भी भवसागर।।
कपि तन में देवत्‍व मिला है।
देह सहित अमरत्‍व मिला है।।
रामायण सुन आनेवाले।
रामभजन मिल गानेवाले।।
प्रीति बढे सियाराम कथा से।
भीति न हो त्रयताप व्‍यथा से।।
राम भक्ति की तुम परिभाषा।
पूर्ण करो मेरी अभिलाषा।।
याद रहे नर देह मिला है।
हरि का दुर्लभ स्‍नेह मिला है।।
इस तन से प्रभु को पाना है।
पुन: न इस जग में आना है।।
विफल सुयोग न होने पाए।
बीत सुअवसर कहीं न जाए।।
धन्‍य करूं मैं इस जीवन को।
सदुपयोग करके हर क्षण को।।
मानव तन का लक्ष्‍य सफल हो।
हरि पद में अनुराग अचल हो।।
धर्म पंथ पर चरण अटल हो।
प्रतिपल मारूति का संबल हो।।
कालजयी सियराम सहायक।
स्‍नेह विवश वश में रघुनायक।।
सर्व सिद्धि सुत संपत्ति दायक।
सदा सर्वथा पूजन लायक।।
जो जन शरणागत हो जाते।
त्रिभुजी लाल ध्‍वजा फहराते।1
कलि के दोष न उन्‍हें दबाते।
सद्गुण आ उनको अपनाते।।
भ्रांत जनों के पंथ निदेशक।
रामभक्ति के तुम उपदेशक।।
निरालम्‍ब के परम सहारे।
रामचंद्र भी ऋणी तुम्‍हारे।।
त्राहि पाहि हूं शरण तुम्‍हारी।
शोक विषाद विपद भयहारी।।
क्षमा करो सब अपराधों को।
पूर्ण करो संचित साधो को।।
बारंबार नमन हे कपिवर।
दूर करो बाधाएं सत्‍वर।।
बरसाओं सौभाग्‍य वृष्टि को।
रखो सर्वदा दयादृष्टि को।।
पाठ पचासा का करे , जो प्राणी प्रतिबार।
श्रद्धानंद सफल उसे,  करते पवनकुमार।।
पवनपुत्र प्रात: कहे, मध्‍य दिवस हनुमान।
महावीर सायं कहे , हो निश्‍चय कल्‍याण।।
करें कृपा जन जानकर , हरें हृदय की पीर।
बास करे मन में सदा, सिया सहित रघुवीर।।

लिंक पर क्लिक करके इन्हे भी देखें 

श्रीहनुमान कृपाष्‍टक



-----------------------------------------------------
चंद्र-राशि, सूर्य-राशि या लग्न-राशि से नहीं, 
जन्मकालीन सभी ग्रहों और आसमान में अभी चल रहे ग्रहों के तालमेल से 
खास आपके लिए तैयार किये गए दैनिक और वार्षिक भविष्यफल के लिए 
Search Gatyatmak Jyotish in playstore, Download our app, SignUp & Login
------------------------------------------------------
अपने मोबाइल पर गत्यात्मक ज्योतिष को इनस्टॉल करने के लिए आप इस लिंक पर भी जा सकते हैं ---------

https://play.google.com/store/apps/details?id=com.gatyatmakjyotish


नोट - जल्दी करें, निःशुल्क सदस्यता की अवधि लगभग समाप्त होनेवाली है।
----------------------------------------------------------------------------------------------------



मात्र 12 डिग्री की खामी हुई !!

पांच जनवरी 2010 को प्रकाशित किए गए अपने महत्‍वपूर्ण आलेख  "इस दुनिया के अंत की संभावना हकीकत है या भ्रम ??(चौथी और अंतिम कडी)"में उस दिन दुनिया में किसी प्रकार के प्रलय न होने की बात करने के क्रम में मैने चर्चा की थी कि पिछले 40 वर्षों सेगत्‍यात्‍मक ज्‍योतिषविश्‍व भर में होनेवाले सुनामी, भूकम्‍प, ज्वालामुखी, ग्लोबल वार्मिग,अकाल, बीमारियां, आतंकवाद, युद्ध की विभीषिका व अणु बम जैसी प्राकृतिक या मानवकृत बुरी घटनाओं का ग्रहीय कारण ढूंढता रहा है। अगस्‍त में ही 19 सितम्‍बर को 5 बजे से 9 बजे सुबह भी आकाश में ग्रहों की खास स्थिति के कारण मेरे भविष्‍यवाणी करने के बाद इण्डोनेशिया के बाली द्वीप में शनिवार यानि 19 सितंबर को सुबह 6.04 बजे 6.4 रिक्‍टर के भूकम्प के तेज झटके भी महसूस किए गए थे। यह हमारे द्वारा किए गए रिसर्च को प्रामाणिक बनाता है।

इससे आगे भी इस आलेख में दूसरे दिन की ही भविष्‍यवाणी करते हुए मैने लिखा था कि "6 जनवरी 2010 को भी असमान में ग्रहों की एक महत्‍वपूर्ण स्थिति बन रही है यह योग लगभग सभी देशों में 9 बजे रात्रि से लेकर 12 बजे रात्रि तक के आसपास उपस्थित होगा। ......... इस योग के कारण इस समय कहीं भी किसी प्रकार की दैवी या मानवकृत आपदा की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता। अभी तक हमारा आकलन विश्‍व में कहीं भी को लेकर ही चल रहा था पर पहली बार देशांतर रेखा के आधार पर 110 डिग्री से 155डिग्री पू तक पहुंचने की मैने कोशिश की है।"

7 जनवरी 2010 के इस समाचार को पढकर मेरे दिए गए तिथि , जो 6 जनवरी 2010 थी , और समय 9 बजे से 12 बजे रात्रि का था , में न्‍यूजीलैंड के दक्षिणी भाग में भूकम्‍प आने की पुष्टि हो जाती है। न्‍यूजीलैंड में 6 जनवरी 2010 , बुधवार को 10 बजकर 48 मिनट पर 6 रिक्‍टर का भूकम्‍प आया। न्‍यूजीलैंड के जिस शहर में भूकम्‍प आया, उसकी देशांतर रेखा मेरे द्वारा बतायी गयी रेखा से मात्र 12 डिग्री के दूरी पर यानि 167 डिग्री पू है। जैसा कि मैने कहा था कि मैं पहली बार किसी क्षेत्र को देते हुए भूकम्‍प की भविष्‍यवाणी कर रही हूं , इसलिए भविष्‍यवाणी में इतनी खामी स्‍वाभाविक है। आपका क्‍या कहना है ?? 


गत्यात्मक ज्योतिष क्या है ?

'गत्यात्मक ज्योतिष' टीम से मुलाक़ात करें।




नेकी कर दरिया में डाल ..

मानव जीवन में अपने और अपने परिवार के मामलों की ही इतनी जिम्‍मेदारी होती है कि उसी के पालन पोषण में हमारा सारा जीवन कट जाता है। किसी परिवार में तीन पीढी तक की जबाबदेही प्रत्‍येक मनुष्‍य का कर्तब्‍य है और उसे कभी भी अपनी नेकी नहीं माननी चाहिए। कभी अपने सुख के लिए,  कभी अपनों के सुख के लिए और कभी समाज में स्‍थान पाने के लिए हम उस कर्तब्‍य का पालन करते हैं। इस दुनिया में हम बहुतों को गरीब , असहाय और कमजोर पाते हैं, पर किसी की मदद करने या उसे ऊंचाई पर ले जाने का हमें कभी भी ख्‍याल नहीं आता है। 

कभी कभी ख्‍याल आए भी तो हम वैसा कर पाने में असमर्थ ही होते हैं और सबकुछ उनके भरोसे छोड देते हैं। पर अपने पूरे जीवन में कभी कभार हमारे समक्ष ऐसा मौका जरूर आ जाया करता है , जहां हम  खुद और अपने परिवार के अतिरिक्‍त किसी और के लिए भी कुछ न कुछ व्‍यवस्‍था कर पाते हैं। ऐसा नहीं है कि हम उसकी मदद करते वक्‍त जीजान लगा देते हैं, वास्‍तव मे हमारे छोटे से त्‍याग या छोटी सी मदद से उस बेचारे या लाचार का बहुत बडा काम बन जाता है , यहां तक कि वहीं से उसके जीवन में सुधार आता है। यहां हमारा कोई स्‍वार्थ नहीं होता और मात्र सामाजिक मामलों में रूचि रखने के कारण हम अपना काम कर लेते हैं।

पर अक्‍सर ऐसा होता है कि सामने वाला हमारी उस मदद के बाद गायब ही हो जाता है या कभी कभी समय के साथ हमारे किए को भूल जाता है। ऐसी स्थिति में हमें बडा बुरा लगता है , आखिर उसकी मजबूती का एक बडा कारण हमारा उसके साथ खडा होना था। पर हम यह नहीं समझ पाते हैं कि यदि हमारे करने से किसी का जीवन सुधरना होता , तो हजारों लाखों लोगों का जीवन हम सुधार पाते , पर इस जीवन में ऐसा नहीं होता है , यहां तक कि हम अपने बच्‍चों तक का जीवन सुधारने में कभी कभी लाचार होते हैं। 

दरअसल प्रकृति में जो व्‍यवस्‍था है , उसी के अनुरूप हमें काम करना होता है। किसी व्‍यक्ति का काम करवाना प्रकृति की व्‍यवस्‍था है , वह कभी कभी हमें माध्‍यम बनाकर वह अवसर देना चाहती है , जहां हम किसी की मदद कर सकें। उस कर्तब्‍य को पूरा करने के बाद अपने पूरे जीवन में कहीं कोई संयोग या अवसर प्राप्‍त करने के हम लायक बन जाते हैं। पर प्रकृति के इस संकेत को न समझकर किसी की मदद न कर हम अक्‍सर अपने जीवन के अमूल्‍य अवसरों को खो देते हैं।

सामाजिक तौर पर इस प्रकार के कार्य नहीं होते तो आज मानव का इस दुनिया में टिक पाना भी मुश्किल होता। पर हम कहीं किसी की छोटी मदद कर देते हैं , तो इस संदेह में ही होते हैं कि हमने ही उसे बनाया । पर ऐसा नहीं है , उसका काम होना था , हम माध्‍यम बने तो इससे हमारे हिस्‍से भी वह बहुत सुख आया , जो आज हमें नहीं दिखाई दे रहा , पर उसके आगे हर सांसारिक सफलता छोटी होगी। 

यदि हम न बनते , कोई और बनता और उसकी तरक्‍की तो निश्चित थी , पर जो सुख हमारे हिस्‍से में आया , वह किसी और के हिस्‍से में जाता। इस दुनिया में यह आवश्‍यक नहीं कि हमने जिसकी की , वही हमारा भी करेगा , पर हमारी जरूरत पर भी कोई और खडा होकर हमें मुसीबत से निकाल लाएगा। समाज में इस प्रकार का लेन देन चलता रहता है , इसलिए हमें दूसरों की ऐसी मदद करनी ही चाहिए , और इसका परिणाम सार्थक होगा , यह सोंचकर निश्चिंत रहना चाहिए। इसलिए तो कहा गया है नेकी कर दरिया में डाल !