चार दिनों तक चलती रही हमारी बहस

11 जनवरी को पोस्‍ट किए गए अपने आलेख में मैने इस सप्‍ताह में पृथ्‍वी पर कई भूकम्‍प के झटके और खासकर 13 जनवरी के 5 बजे से 7 बजे सुबह के मध्‍य एक बडी भूकम्‍प आने की भविष्‍यवाणी की थी। अधिकांश पाठकों ने इस लेख में टिप्‍पणी के रूप में जाल माल की क्षति न होने के लिए ईश्‍वर से प्रार्थना की थी।



जी उम्मीद करते हैं की जान माल की कोई हानि न हो।

बाकि तो देखते है क्या होता है।



इसके बाद वंदना जी, रंजू भाटिया, समीरलाल जी, मनोज मिश्रा जी, विनय जी, डॉ रूपचंद्र शास्‍त्री जी, विष्‍णु बैरागी जी, सुरेश शर्मा जी, शिव कुमार मिश्र जी, जाकिर अली रजनीश जी, भारतीय नागरिक जी, और अभिषेक प्रसाद ‘अवि’ जी ने भी इसी आशय के कमेंट किए। हेम पांडेय जी ने ‘हाथ केगन को आरसी क्‍या’ की तर्ज पर कमेंट किया।

hem pandey ने कहा…

२४ से अड़तालीस घंटों में सब स्पष्ट हो जाएगा. यदि भविष्यवाणी सही हुई तो आपकी विद्या पर विश्वास भी बढ़ेगा.



विष्‍णु बैरागी जी ने एक भाषाई गल्‍ती पर मेरा ध्‍यान भी आकृष्‍ट कराया।


'ईश्‍वरेच्‍छा बलीयसि।' कृपया भूकम्‍प को 'उम्‍मीद' तो नहीं कहें। वह तो आशंका है।



पर कुछ पाठकों को महसूस हुआ कि मैने प्रतिदिन होनेवाले भूकम्‍प के झटकों को जबरदस्‍ती ग्रहों के प्रभाव से जोडकर अपने ज्ञान को प्रदर्शित कर रही हूं।

हिमाचली ने कहा…मैंने कल किसी टीवी के टिकर पर पढ़ा था कि कहीं पर भूकंप आया है।और आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि दुनिया में रोज़ कहीं न कहीं भूकंप आता ही है और ये सामान्य भूगर्भीय घटना है..



उनका साथ देने में प्रवीण शाह जी और PD जी भी पीछे नहीं रहें। अभी हर प्रकार की टिप्‍पणी आना रूका भी नहीं था कि बी एस पाबला जी के द्वारा मुझे सूचना मिली कि हैती में भूकम्‍प आ चुका है। PD जी को भी उन्‍होने जबाब दिया।

बी एस पाबला ने कहा…

आपकी पोस्ट पर दी गई संभावनाओं को मेरी पोस्ट पर बताए गए विज्ञान ने समर्थन दिया था

ताज़ा भूकम्प 7.2 की तीव्रता का आया है, आ रहा है, आएगा

अधिक जानकारी व लिंक्स मेरी पोस्ट पर

http://bspabla.blogspot.com/2010/01/blog-post_11.html

PD की टिप्पणी पर यही प्रतिक्रिया है कि

'मुर्गी एक बार में एक अंडा देती है, सारी दुनिया को पता चल जाता है

मछली एक बार में हजारों अंडे देती है, किसी को खबर नहीं होती' J


संगीता जी मौसम और भुकंप के बारे मे आपकी भविश्यबानी हमेशा सही के करीब होती है आज एक बडे भुकम्प की खबर आ रही है शाद हेति मे। धन्यवाद और शुभकामनायें



भूकम्‍प की सूचना से दुखी होने के बावजूद मैने प्रवीण शाह जी से पूछ ही लिया।


प्रवीण शाह जी ,

पर आज 13 जनवरी को हैटी में 7.2 रिक्‍टर वाली एक बडी भूकम्‍प आ गयी .. जान माल की भारी क्षति हुई है .. इसे क्‍या कहेंगे आप .. मात्र संयोग या ग्रहों का प्रभाव ??



मुझसे विचारों की भिन्‍नता होने के बावजूद प्रवीण शाह जी हमेशा विनम्रता से पेश आते रहे है।

प्रवीण शाह ने कहा…

आदरणीय संगीता जी मैं किसी भी तरह के पूर्वाग्रह से मुक्त होकर आपके गत्यात्मक ज्योतिष को आंकने का क्षुद्र प्रयास मात्र कर रहा हूँ।

भूकंप के समय और तारीख के बारे में आप काफीकुछ सही रहीं पर स्थान के बारे में आपका अनुमान (180-72)= 108 डिग्री हटकर रहा।

न तो मैं इसे मात्र संयोग कहूंगा, न ही ग्रहों का

प्रभाव... कुछ भी कहने से पहले मैं आपकी इस तरह की कुछ और भविष्यवाणियों व उनके परिणाम (सच होने) का इंतजार करना अधिक उचित समझूंगा।



महिलाएं हांडी के एक चावल को पका देखकर सारे चावल के पके होने का अनुमान लगाती है , यदि आप पाठकों की तरह ही देर करें , तो नीचे के चावल अवश्‍य जल जाएंगे, जांच पडताल करने की भी कुछ सीमा होती है। इसलिए मैने कहा।


प्रवीण शाह जी ,यह पहला मौका नहीं है जब आपने मेरी भविष्‍यवाणी को सही होते पाया है .. आपने मेरी क्रिकेट की हर दिन की भविष्‍यवाणी पढी हैं .. और उसपर गौर करके देखा है .. इसके बाद भी और इंतजार करना चाहते हैं .. तो मुझे क्‍या आपत्ति हो सकती है ??



दिनेशराय द्विवेदी जी तो मेरी खामी दिखाने में एक कदम और आगे रहें। जाकिर अली ‘रजनीश’ जी ने भी उनसे सह‍मति जतायी।


आप ने 180 डिग्री लोंजीट्यूड पर या उस से 20 डिग्री विचलन पर भूकंप की भविष्यवाणी की थी। लेकिन यह हेती में आया जो कि 72.20 डिग्री पर मौजूद है। इस तरह आप की भविष्यवाणी बहुत भटक गई। यदि यह 20 डिग्री के भीतर होती तो उस इलाके में लोगों को सावधान किया जा सकता है। लेकिन आप की भविष्यवाणी के हिसाब से तो सारी धरती को सावधान हो जाने के लिए तैयार हो जाना चाहिए जो संभव ही नहीं है।



शायद बी एस पाबला जी का जबाब उन्‍हीं के लिए था।

बी एस पाबला ने कहा…

गणना में मामूली चूक और बाहरी कारक

कितने ही रॉकेट प्रक्षेपण असफल कर चुकी है,

कितने ही प्रयोग दम तोड़ चुके हैं,

कितने ही मरीज बेहोशी का इंजेक्शन देने के बाद होश में नहीं आ पाए,

कितने ही लोग फांसी चढ़ाए जाने पर रस्सी टूटने पर बच गए

कितने ही लोग ट्रेन के आगे कूद कर आत्महत्या से बच गए,

कितने ही किसान मौसम की वैज्ञानिक सूचना के भरोसे बारिश की राह जोहते अपनी फसल गंवा बैठे,

कितने ही तेज धावक पीछे रह गए।

अगली बार और सटीक गणना की उम्मीद, आपसे



पर पाबला जी के जबाब मिलने तक द्विवेदी जी को दिया जाने वाला मेरा जबाब तैयार हो चुका था और वही जबाब उनका साथ देने वाले जाकिर जी के लिए भी था।


दिनेशराय द्विवेदी जी,

टिप्‍प्‍णी के लिए धन्‍यवाद .. इससे थोडा दुख तो अवश्‍य हुआ .. पर अपनी सहन शक्ति के लिए ईश्‍वर को धन्‍यवाद देती हूं .. आपने कोई नई बात नहीं कही है .. मैं इसी बात से परेशान हूं कि इतने वर्षों से इस क्षेत्र में समर्पित होने के बावजूद मेरे ज्ञान से समाज के सारे लोगों का भला नहीं हो पा रहा .. पर इसके लिए ग्रहों के पृथ्‍वी पर पडने वाले प्रभाव के महत्‍व को सबों को स्‍वीकारना होगा .. यदि मैं अपनी गणना से वर्ष के 365 दिनों मे से एक दिन पर आ जाती हूं .. 24 घंटों में से किसी दो घंटों पर आ जाती हूं .. तो स्‍थान की मेरी कमजोरी को भूगर्भ विज्ञान वाले तो हल कर सकते थे .. जिससे कुछ फायदा तो अवश्‍य हो सकता था .. अन्‍य विकसित विज्ञानों से ज्‍योतिष का तालमेल बनाकर कई घटनाएं टाली भी जा सकती थी .. या आने वाले दिनों में मै खुद भी इसे हल कर लूं .. ऐसा आपको शुभकामनाएं देनी चाहिए थी .. पर आपने उस संभावना की चर्चा न कर सीधा कह दिया कि मेरे ज्ञान से समाज का कुछ भी भला नहीं हो सकता .. जबकि प्रतिदिन मेरे ज्ञान से दो चार लोगों का भला हो रहा है.. और मेरा लक्ष्‍य लाखों का भला करना है !!



फिर भी जाकिर अली ‘रजनीश’ जी के नाम भी कुछ लाइनें लिखी ही गयीं।


वाह रजनीश जी,

आजतक आप चिल्‍लाते रहें कि ग्रहों के आधार पर भविष्‍यवाणियां सही हो ही नहीं सकती .. बरसात की तिथियुक्‍त भविष्‍यवाणियों को भी स्‍वीकार करने से आप कतराते रहें .. पर आज जब काटने की कोई जगह नहीं दिखी .. तो आप कह रहे हैं कि ऐसी भविष्‍यवाणियों का क्‍या औचित्‍य है .. दिनेश रॉय द्विवेदी जी के साथ ही रहें .. कोई आपत्ति नहीं मुझे .. पर उनको जो जबाब मैने दिए है .. उसे आप अपना जबाब समझिए !!



भले ही मैने इस पोस्‍ट पर मिली सभी प्रतिक्रियाओं का जबाब दे दिया हो , पर अपनी भविष्‍यवाणी के सटीक होने के बावजूद भी मैंने दुखी होकर इस पोस्‍ट को प्रेषित किया। सबसे पहली टिप्‍पणी गिरिजेश राव जी की मिली।


संगीता जी, हिन्दी ब्लॉगिंग में किसी की निष्ठा से यदि वाकई प्रभावित हुआ हूँ तो वह आप हैं। लेकिन जाने क्यों आप को झुठलाने को मन करता है।

भविष्य की बातें वर्तमान में पता चल जाँय, इसमें आप को कुछ बहुत प्रकृति विरुद्ध और काल विरुद्ध सा नहीं लगता?

आप की भविष्यवाणी का सही होना तुक्का भी तो हो सकता है।

यहाँ देश हजारों वर्षों तक दुर्गति भोगता रहा और कई मायनों में आज भी ऐसा ही है - क्या ज्योतिष के पास इसका कोई उत्तर/समाधान है? वे कौन से पुण्य कर्म हैं जिनके कारण यूरोप, अमेरिका आदि देश सम्पन्न और कहीं अत्युत्तम जीवन क्वॉलिटी से नवाजे गए हैं?

यूरोप ने शोषण के बल पर अपने को सँवारा। दो दो विश्वयुद्धों को झेला, फिर भी आज कितना आगे है!भारत या समूचे दक्षिण एशिया की ऐसी दुर्गति क्यों है? इस बारे में गत्यात्मक ज्योतिष क्या कहता है?बहुत से सवाल मन में आते हैं। आप का यह ज्योतिष और इसके मानने वाले सचमुच बड़ी सोच में डाल देते हैं।क्या करें?



मेरी मानसिक हालत उनके एक गलत शब्‍द ‘तुक्‍का’ को भी बर्दाश्‍त न कर सकने की थी , मैने उन्‍हें दो टूक जबाब सुना दी, जिसका बाद में मुझे अफसोस भी हुआ।


गिरिजेश राव जी .. आप पाठकों की ऐसी बातें सुनने के लिए मैं तैयार रहती हूं .. जो ज्‍योतिष की ए बी सी डी की जानकारी के बिना ही पी एच डी स्‍तर के ज्ञान की तलाश में रहते हें .. तिथि के साथ भूकम्‍प की सूचना के बावजूद इसे तुक्‍का कहने में आपको थोडी भी हिचकिचाहट नहीं हुई .. आप मेरे ब्‍लॉग के नियमित पाठक होते तो शायद ऐसा नहीं कहते .. क्‍यूंकि यह मेरी पहली भविष्‍यवाणी नहीं है .. आप सब ज्‍योतिष विरोधी मिलकर 'भविष्‍यवाणियों का तुक्‍का' नाम का एक ब्‍लॉग चलाएं .. और प्रतिदिन मौसम , राजनीति से लेकर भूकम्‍प तक की तिथियुक्‍त भविष्‍यवाणी करें .. मैं भी तो थोडी सीख लूं .. जब यूं ही काम बन जाए तो इतना अध्‍ययन करने की क्‍या आवश्‍यकता ??


बाप रे! आप तो एक शब्द पर ही नाराज हो गईं। 'तुक्का' की जगह 'संयोग' लिखना था। शायद आप इतनी नाराज नहीं होतीं। आप को कष्ट पहुँचा इसके लिए क्षमाप्रार्थी हूँ।

ज्योतिष की ए.बी.सी.डी. और पी.एच.डी. की तो बात ही नहीं है। आप के लेख पढ़ता अवश्य हूँ लेकिन नियमित नहीं हूँ, इसे स्वीकारता हूँ।

मेरे प्रश्नों को सहज रूप में लें जो कि एक निष्ठावान अध्येता से हैं। अभी भी अनुत्तरित हैं। बहुत बार प्रश्न विधा के क्षेत्र में नहीं आते तब भी पूछने वाले पूछ बैठते हैं। यदि वाकई ये प्रश्न गत्यात्मक ज्योतिष की परिधि से बाहर हैं तो बता दीजिए।

यदि उसकी परिधि में हैं तो बताइए कि क्या कारण हो सकते हैं जो अरबों की जनसंख्या और इतना बड़ा और रिच भूभाग इस दशा में है?



डॉ टी एस दलाल जी के साथ ही साथ कई पाठकों ने मेरी भविष्‍यवाणी का सच होना स्‍वीकारा।


संगीता जी, मैंने आपकी भविष्यवाणी वाली पोस्ट भी पढ़ी थी , और आज की भी।

सच तो यह है की मैं भी इंतज़ार में था की देखें क्या होता है।

लेकिन इसमें कोई शक नहीं की आपकी भविष्यवाणी सही निकली।

हालाँकि ये बड़ा दुखद समाचार है, और आपको मुबारकवाद भी नहीं दे सकते। अब तो यही कह सकते हैं की ज्योतिष इससे बचने का उपाय भी खोज निकाले तो सही मायने में सार्थक कहलायेगा।

Anil Pusadkar ने कहा…

संगीता जी मैं भूविज्ञान का विद्यार्थी रहा हूं और भूकंप जैसे विषय आज भी जटील ही हैं।इस पर तमाम शोध और अध्ययन के बाद भी बहुत कुछ अंधेरे मे ही है।इसके बावजूद आपकी भविष्यवाणी का खरा उतरना आपके ज्ञान को प्रमाणित करता है और जंहा तक़ मेरा सवाल है मैं आपका पहले से प्रशंसक हूं।मुझे भी लगता है कि अपने जीवन की अनिश्चतता के बारे मे आपसे सलाह लेनी ही पड़ेगी।





'अदा' ने कहा…

संगीता जी,

ये आपदाएं तो आनी हीं थी.... लेकिन आपकी भविष्यवाणी को सुनकर उनके असर से बचा जा सकता है....ठीक वैसे ही जैसे कड़ी धूप में छतरी लगा कर छाया की जा सकती है....

विश्वास तो मुझे हमेशा ही आपकी बातों पर रहा है...आज उस विश्वास में और बढ़ोत्तरी हुई है...ऐसे ही कल्याण किया करें...

Mithilesh dubey ने कहा…

आप जो करती है वह प्रशंसनिय है , अच्छे कामों में अक्सर रुकावटें आती है ।


गिरिजेश राव जी,

मेरे ब्‍लॉग में मानव मस्तिष्‍क में उठने वाले बहुत सारे प्रश्‍नों के उत्‍तर दिए गए हैं .. सारे को पढने के बाद ही उससे आगे बढा जा सकता है .. आपके अन्‍य प्रश्‍नों के जबाब भी धीरे धीरे मिलते चले जाएंगे .. ज्‍योतिष तो बहुत छोटी चीज है .. आपके प्रश्‍न आध्‍यात्‍म के अंदर आते हैं .. आध्‍यात्‍म के ज्ञान की सीमा नहीं .. इतना आसानी से कैसे समझ पाएंगे आप ??

प्रवीण शाह ने कहा…

आदरणीय संगीता जी,

आपकी यह पोस्ट अभी अभी देखी, आज के दिन यह बहुत जरूरी है कि आपकी भविष्यवाणी और उसके परिणाम को एक सही नजरिये से देखा जाये, अत: आपकी पिछली पोस्ट पर की गई टिप्पणी को फिर से एक बार यहां पर दोहरा रहा हूँ।



समीर लाल जी मेरी मानसिक अवस्‍था का अनुमान करने में सफल रहें,विष्‍णु बैरागी जी और आचार्य संजिव ‘सलिल’ जी भी ।

Udan Tashtari ने कहा…

ऐसी गणनाओं और भविष्यवाणियों के बाद आप किस मानसिक अवस्था से गुजरती होंगी, समझा जा सकता है.


यह सचमुच त्रासद विडम्‍बना ही है कि अपनी भविष्‍यवाणी के सच होने पर मन दुखी हो।


आपकी भविष्यवाणी और मनोव्यथा दोनों ही से मेरा सरोकार है. सटीक भविष्यवाणी हेतु आप साधुवाद की पात्र हैं. कोइ चिकित्सक रोगी के भयानक रोग को पहचान ले तो उसे सफल ही माना जाता है.

भविष्यवाणी सटीक हो तो अनुमान करता के ज्ञान और विशी दोनों पर शंका नहीं की जानी चाहिए. भारतीय दर्शन 'विश्वासम फलदायकम' में विश्वास करता है, 'श्रद्धावान लभते ज्ञानं' भी यही सन्देश देता है. पश्चिन का दर्शन संदेहवाद से प्रारंभ होता है...देकार्त कहता है प्रश्न करो...आप की विधि पे भरोसा न करनेवाले संदेहवाद के विद्यार्थी हैं. मैं विश्वास को जीता हूँ.

अब दूअसरे पहलू की बात...मेरे गुरु प्रो. विनय कुमार श्रीवास्तव भूगर्भविद हैं... वे गत कई सालों से भूकम्पों के स्थल का अनुमान लगा परे हैं पर तिथि नहीं बता पाते... भूगर्भ शास्त्री और ज्यतिशी एक साथ अध्ययन करें तो शायद अधिक सटीक पूर्वानुमान हो सके.



प्रवीण शाह जी को मैने समझाया कि किस प्रकार स्‍थान के चुनाव में खामि रह जाती है।


प्रवीण शाह जी,

आप आराम से मेरी अगली भविष्‍यवाणियों का इंतजार करें .. वास्‍तव में हमारे अध्‍ययन के अनुसार भूकम्‍प के तिथि की सूचना जितनी पक्‍की होगी .. उतनी समय और स्‍थान की नहीं भी हो सकती है .. इसे मैने अपने पिछले आलेख में भी स्‍वीकारा है .. क्‍यूंकि पूरे ब्रह्मांड में पृथ्‍वी एक विंदू मात्र होती है .. और गणित ज्‍योतिष का काफी सूक्ष्‍म डाटा हमारे पास नहीं होता .. यदि गणित ज्‍योतिष के कोई विद्वान हमारी मदद करें तो भविष्‍यवाणी के स्‍तर में और बढोत्‍तरी लायी जा सकती है !!


आदरणीय संगीता जी, अब आप मेरे शब्दों को भले ही जिस रूप में लें , लेकिन यह कहूंगा की यदि ज्योतिष शास्त्र किसी आपदा की भविष्य बानी के साथ उसके घटने के स्थान के बारे में जानकारी दे पाने में असमर्थ है तो मैं तो भगवान् से यह प्रार्थना करूंगा कि आइन्दा आपकी इस तरह की कोई भी भविष्य बाणी सही न निकले ! :)


गोदियाल जी .. आपकी बातों का मैं कोई दूसरा अर्थ नहीं लगा रही .. पर मेरी भविष्‍यवाणी के कारण यह भूकम्‍प आया .. ऐसी बात नहीं है .. भूकम्‍प को आना था .. ग्रहों की चाल से मैने उसे पहले समझ लिया .. हो सकता है कि कुछ दिनों के अध्‍ययन के बाद स्‍थान का भी मुझे संकेत मिल जाए .. एक ही दिन में किसी विज्ञान का विकास नहीं हो जाता .. युगों युगों तक सकारात्‍मक रूप से लाखों करोडों लोगों को मदद करनी पडती है इसमें .. पहले इसमें विश्‍वास तो करना होगा .. उसके बाद ही तो दुनिया को आपत्ति से बचाया जा सकता है .. एक व्‍यक्ति से कितनी अपेक्षा कर सकते हैं आपलोग ??

Ashish ने कहा…

संगीता जी

मुझे लगता है इस अर्जित ज्ञान को यदि आप अपने सॉफ्टवेर में समा कर उसे ओपन सौर्स रिलीज़ करें तो आप अपने लक्ष्य को जल्द प्राप्त कर सकेंगी।

निर्झर'नीर ने कहा…

मकर संक्रांति की हार्दिक शुभकामना।जैसे ही भूकंप की जानकारी हुई आपकी याद तजा हो गयी ..आपने सच कहा था अफसोश है जो चले गए



धीरू सिंह जी ने ज्‍योतिष को विज्ञान बताया। पर आपलोगों को यह जानकारी देना चाहूंगी कि हमारा परंपरागत ज्‍योतिष आज के युग तक आते हुए बहुत सारी खामियों का शिकार हो गया है और इससे सटीक भविष्‍यवाणी नहीं की जा सकती। ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिषीय अनुसंधान केन्‍द्र’ द्वारा ग्रहों की गत्‍यात्‍मक और स्‍थैतिक शक्ति की खोज के बाद ही इसे विज्ञान का रूप दिया जा सका है।


ज्योतिष पर विश्वास है मुझे . यह एक सांइस है .लेकिन भारतीय विधा होने के कारण कई पढे लिखे स्वीकार नही करते . अगर विदेशी कोई यह सब कहता तो उसकी प्रंशसा होती . जैसे योग जब से योगा बना तब से स्वीकार्य हो रहा है।






सतीश पंचम ने कहा…






मैं तो ज्योतिष पर बिल्कुल विश्वास नहीं करता, लेकिन किसी सर्वव्यापी ईश्वर पर जरूर कुछ हद तक विश्वास करता हूँ कि उसके चलाये ही यह संसार रच बस रहा है, बन बिगड रहा है....अब वह सर्वोच्च सत्ता मानव जनित कर्म के रूप मैं है या दैवीय या फिर इन दोनों का ही मिश्रण..... नहीं पता।
बस विश्वास है, तभी मंदिर में विभिन्न आकार प्रकार में तराश कर रखे प्रस्तरों में भी ईश्वर को जान नमन कर लेता हूँ.....लेकिन किसी भी ज्योतिष वगैरह पर विश्वास नहीं कर पाता।
शायद अर्ध-कम्यून हूँ मैं।









हालांकि हम ज्योतिष पर विश्वास नहीं करते पर इस बात को थोडा बहुत स्वीकारते हैं कि प्रथ्वी पर ग्रहों नक्षत्रों का प्रभाव पड़ता है.
बचपने से पाठ्य पुस्तकों में एक बात पड़ने को मिली कि समुद्र में आते ज्वार भाटे चाँद सूरज पृथ्वी की स्थिति से आते हैं..................बस यही बहुत है कहने को.

सिद्धार्थ शंकर जी ने इसकी उपयोगिता पर प्रकाश डालने को कहा है , मैने तो पहले ही लिखा है कि एक घडी , कैलेण्‍डर , टार्च की तरह ही ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ आपके लिए उपयोगी हो सकता है।


भविष्य देखना भी जी का जंजाल है। यदि सबकुछ पूर्व निर्धारित और अपरिहार्य ही है तो उसके बारे में पहले से जानकर हम अपना मस्तिष्क कुछ पहले से ही दुखी कर ले रहे हैं।

यह ज्ञान हमारे लिए कितना लाभकर है इसपर भी प्रकाश डाला जाय।


सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी जी .. क्‍या भवितब्‍यता टाली जा सकती है .. इसकी दस कडियां लिख चुकी हूं .. इसमें इस बात पर प्रकाश डाला जा चुका है!!



जी के अवधिया जी के द्वारा पूछे गये छोटे से प्रश्‍न को भी मैं बर्दाश्‍त नहीं कर सकी।


संगीता जी,

बस एक प्रश्न पूछना चाहता हूँ कि आपकी भविष्यवाणी से क्या लाभ हुआ?


जी के अवधिया जी .. आप इस प्रकार के प्रश्‍न कर मुझे और व्‍यथित करने की कोशिश कर रहे हैं अब कोई मरीज डॉक्‍टर पर विश्‍वास ही न करे .. तो डॉक्‍टर क्‍या कर सकता है .. वैज्ञानिक यदि हमारी मदद लें तो अवश्‍य मेरे अनुभव का फायदा दुनिया को मिल सकता है।


संगीता जी ,

हेती की घटना का समाचार सुनकर अत्यंत दुःख हुआ ।

ज्योतिष शास्त्र भविष्य की गर्त मैं झाकने की एक विधा है । भविष्य आने वाली परेशानियों और प्राकृतिक आपदा को रोका तो नहीं जा सकता है, हाँ पर इनसे बचाव हेतु समय पूर्व आवश्यक कदम और सुरक्षात्मक उपाय तो किये जा सकते हैं जिससे जनहानि और धनहानि को कम तो किया जा सकता है ।

ज्योतिष विज्ञानं के माध्यम से सटीक और सही जानकारी प्राप्त कर उसका समाज हित और जनहित मैं प्रयोग हो यही कामना है ।


संगीता जी,

यदि आप समझती हैं कि मैं आपको व्यथित करने की कोशिश कर रहा हूँ तो आप बिल्कुल गलत समझ रही हैं, न तो मेरी कोई ऐसी मंशा थी, न है और न ही रहेगी। आपको व्यथित करके भला मेरा क्या लाभ होगा?

मैं तो सिर्फ यही कहना चाहता हूँ कि ज्ञान है तो उसका लाभ भी मिलना चाहिये। ऐसे ज्ञान का क्या फायदा जिससे लाभ तो मिले ही नहीं उलटे तनाव मिले?

मैं तो सीधे प्रश्न का सीधा सा उत्तर चाहता हूँ। सीधा सा प्रश्न था मेरा जिसका किसी डॉक्टर और मरीज से किसी प्रकार का सम्बन्ध नहीं था।

अभी तक तो विज्ञान ज्योतिष को मानता नहीं है तो वैज्ञानिक आपसे क्यों मदद लेने आयेंगे? हाँ यदि आप ज्योतिष की एक सशक्त पहचान बना दें तो आपसे मदद माँगने वाले स्वयं ही आ जायेंगे।


आप मेरी भावनाओं को नहीं समझ पा रहे हैं .. सब कुछ जानते हुए कितनी अकेली पड जाती हूं मैं .. यही बात आपको समझाना चाह रही थी .. डेढ वर्ष हो गए ब्‍लॉग जगत में ही .. ज्‍योतिष को पहचान दिलाने के लिए कितनी बार हर तरह की तिथियुक्‍त भविष्‍यवाणियां की हैं .. पर न तो मेरी वाहवाही करने से दुनिया का भला हो सकता है .. और न मेरी शिकायत करने से ही .. भला तो मात्र 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' को पहचान दिलाने से हो सकता है .. जो लाख कोशिश के बाद भी नहीं बन पा रहा है !!

Vineet Tomar ने कहा…

संगीताजी, आपकी कहन में दम हे और अगर आपके पास इसका ज्ञान हे तो बहुत अच्छा,आप इसी तरह लेख लिखे ,और समाज को अवगत कराते रहें,जिसको आपकी लेखनी में जरा भी विश्वाश होगा वो आपको जरुर पढेगा ,इसके लिए आप परेशान न हों,क्यूँकी जिनको विरोध करना या आपको गलत बताना हें तो बताना हें इस में कोइ कुछ नहीं कर सकता. आप बस इतना करे अगर ठीक लगे तो के अपनी बात स्पस्ट न लिख केर थोड़ा गुमा केर लिख दे तो शायद समझदार , समझ जाएगा और किसी को कहने को समय लगेगा. में आपके लेख रोज पढता हूँ क्यूँकी मेरी ईमेल पर आ जाते हें.इसी तरह जो भी पढेगा वो देखेगा . अगर कुछ गलत लगा हो तो उस के लिए आप मुझे माफ़ कर दे,. में आपका आभारी हूँ आप अच्छा लिखती हे इसलिए. धन्यवाद
.

राजीव जी ने मेरी टिप्‍पणी को ध्‍यान से पढा और बडा अच्‍छा प्रश्‍न किया है। उनके प्रश्‍न का जबाब मैं अगले किसी आलेख में दूंगी।

ई-गुरु राजीव ने कहा…[ पर न तो मेरी वाहवाही करने से दुनिया का भला हो सकता है .. और न मेरी शिकायत करने से ही .. भला तो मात्र 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' को पहचान दिलाने से हो सकता है .. जो लाख कोशिश के बाद भी नहीं बन पा रहा है !! ]

इस वाक्यों का क्या अर्थ है !!

संगीता जी, मैं आपके लिए क्या कर सकता हूँ ?

मेरा मतलब है कि एक हिन्दू या भारतीय या ज्योतिष-प्रेमी या आपका प्रशंसक होने के नाते आपके लिए (ज्योतिष के लिए) हम पाठक-गणों को क्या करनाचाहिए.



पाठकों ने यह भी कहा कि मेरी भविष्‍यवाणी के कारण भूकम्‍प नहीं आया, भविष्‍यवाणी सही होने पर ग्रहों के प्रभाव की पुष्टि हुई है।


किसी का भी आपको या ज्योतिष को दोष देना अनुचित है.

यह तो ग्रहों की स्थिति के कारण से ऐसा हुआ.

अतः, आपका या किसी का ऐसा सोचना कि काश यह भविष्यवाणी सच नहीं हुई होती, ठीक नहीं है.

प्रत्येक भविष्यवाणी सत्य होनी ही चाहिए इससे ही ज्योतिषी और ज्योतिष का सम्मान बढेगा.

पुनः आपको आपकी भविष्यवाणी के लिए नमन करता हूँ.

कमल शर्मा ने कहा…

आपने लिखा कि काश मेरी भविष्‍यवाणी सही नहीं हुई होती...लेकिन जो तय है उसे कौन टाल सकता है। होनी तो होकर ही रहेगी...कुछ ऐसे परिणामों के लिए मनुष्‍य भी जिम्‍मेदार है जिसने पूरी प्रकृति के साथ खिलावड़ किया है और कर रहे हैं। वैसे भी जो बना है उसका विनाश भी तय है। हम इस विनाश पर आंसू भरी श्रंद्धाजलि के अलावा कुछ नहीं दे सकते।



एक बेनामी ने बिल्‍कुल अलग तरह की टिप्‍पणी की है।

खुला सांड ने कहा…संगीताजी !!! आप के गृह अच्छे नहीं लग रहे !!! कहीं वैज्ञानिक लोग आपका अपहरण ना कर लें!! पहले ही आपकी एक भविष्य वाणी सच हो चुकी है!!! आप हीट लिस्ट में हैं!!!



उन्‍हें मालूम नहीं कि वैज्ञानिकों को जिस दिन ग्रहों के प्रभाव के बारे में जानकारी हो जाएगी , वो आराम से हमारे साथ काम करेंगे, हमारा अपहरण करने की क्‍या आवश्‍यकता ??

70 वर्ष की उम्र से अधिक के वृद्ध की बातें

एक बच्‍चे का हंसता खिलखिलाता मुस्‍कराता चेहरा जहां हमें खुशियों से सराबोर करता है , उसके साथ खेलते हम खुद अपने भूले हुए बचपन को जी लेते हैं, कुछ क्षणों के लिए सारे गम को भूल जाते हैं , वहीं अतिवृद्धावस्‍था को झेल रहे लोगों का जीवन हमारे सामने एक भयावह सच उपस्थित करता है, जिसे देखकर हम कांप से जाते हैं। इतना ही नहीं , उनकी तनावग्रस्‍त बातों को सुनकर चिडचिडाहट उपस्थित पाते हैं । समय और परिस्थिति के अनुसार इन सभी जगहों पर थोडा बहुत परिवर्तन भले ही मिल जाए , पर यह सत्‍य है कि सभी मनुष्‍य बचपन से लेकर बुढापे तक के इस यथार्थ के जीवन को झेलने को मजबूर है।

अपनी अपनी परिस्थिति में उम्र के साथ सभी व्‍यक्ति के जीवन के अनुभव क्रमश: बढते ही जाते हैं , आगे चलकर खास खास क्षेत्रों में भी उम्र में बडे लोगों के अनुभव हमारे लिए बहुत सीख देने वाला होता है। 50 से 70 वर्ष की उम्र तक अपने से बडों की सीख के महत्‍वपूर्ण होने से इंकार नहीं किया जा सकता। इसलिए इस उम्र के लोगों के अनुभव से लाभ उठाते हुए उनकी हर बात में से कुछ न कुछ सीखने की प्रवृत्ति व्‍यक्ति को विकसित करनी चाहिए । पर जब हम स्‍वयं 50 वर्ष के हो जाते हैं , तो बडों के समान हमारे विचारों का भी पूरा महत्‍व हो जाता है , हां 60 वर्ष की उम्र तक के व्‍यक्ति से उन्‍हें कुछ सीख अवश्‍य लेनी चाहिए। पर 60 वर्ष की उम्र के बाद धर्म , न्‍याय आदि गुणों की प्रधानता उनमें दिख सकती है , पर सांसारिक मामलों की सलाह लेने लायक वे नहीं होते हैं।

पर जब उम्र बढती हुई 70 वर्ष के करीब या पार कर जाती है , तो व्‍यक्ति के स्‍वास्‍थ्‍य के साथ ही साथ उसकी मानसिकता बहुत अधिक बदल जाती है। छोटी छोटी बातों में वे इतना अधिक उलझने लगते हैं कि उनके साथ समायोजन कर पाना कठिन हो जाता है। उनका कोई अनुभव इस बदलती हुई जीवनशैली के अनुरूप नहीं होने से छोटी छोटी बातों में बहस की नौबर आ जाती है। प्रतिष्‍ठा को प्रश्‍न बना लेना भी इस उम्र में चरम सीमा पर होता है , सो बात का बतंगड बनाने की कोशिश भी ये करते हैं। 

कभी कभी दवाब की हालत में या किसी प्रकार की लाचारी की हालत में तनारवपूर्ण बातें करके परिवार में सबों का जीना भी मुश्किल कर देते हैं। समझाने बूझाने या राहत देने के लिए कही गयी कोई भी बात का उनपर कोई असर नहीं होता , जिससे उनके साथ रहनेवाले भी अक्‍सर तनाव में आ जाते हैं। हां, यदि इस समय उनका कोई शौक हो तो उनका जीवन पूर्ववत बना रहता है और वे शरीर या विचार से अपने घरवालों को कोई दबाब नहीं देते हैं।

बचपन को भी हममें से हरेक ने जीया और बुढापे को भी हममें से सबको जीना पडेगा , इस तरह आज उनका जो जीवन है वह कल हमारा भी हो सकता है। जब आज हर घर में अतिवृद्धों की यही स्थिति है , तो हमारे बुढापे के समय में भी ऐसा ही होगा। इसलिए आज हम जो करेंगे , उसे देखकर हमारे बच्‍चों में भी वैसे ही संस्‍कार जाएंगे। इन अतिवृद्धों के शारीरिक या मानसिक कमजोरियों के बोझ को न उठाना हमारी कायरता ही मानी जाएगी। 

आखिर बचपन में उन्‍होने हमें उससे भी अधिक लाचार स्थिति में संभाला है। ऐसे बुजुर्गों को उनके किसी रूचि के कार्य में उलझाए रखना अति उत्‍तम होता है। पर यदि वे कुछ करने से भी लाचार हो , तो उनका ध्‍यान रखना हमारा कर्तब्‍य है। यदि वे दिन भर सलाह देने का काम करते हों , जिनकी आज कोई आवश्‍यकता नहीं , तो बेहतर होगा कि हम एक कान से उनकी बात सुने और दूसरे ही कान से निकाल दें , पर किसी प्रकार की बहस कर उनका मन दुखाना उचित नहीं है , बस उनकी आवश्‍यकता की पूर्ति करते रहें , वे खुश रहेंगे !

काश मेरी भविष्‍यवाणी सही नहीं हुई होती !!


2012 के दिसंबर में होने वाले प्रलय के भयानक रूप में प्रचार के बाद मेरे पास कुछ पाठकों के मेल आए। उन्‍हीं का जबाब देने के क्रम में और 21 दिसंबर 2012 के ग्रह स्थिति की जांच पडताल करने के क्रम में कुछ प्राकृतिक आपदाओं की तिथियों पर मेरा ध्‍यान आकृष्‍ट हुआ। संयोग था कि पूरे दिसंबर मेरे गुरू और पिताजी मेरे साथ रहे, इससे ग्रहों के स्‍वभाव को जानने में मुझे बहुत मदद मिली। प्राकृतिक आपदाओं के अध्‍ययन के इसी क्रम में मेरा ध्‍यान 13 से 16 जनवरी की भयावह स्थिति पर गया , तो मैने तुरंत एक पोस्‍ट डाल दी। इस पोस्‍ट पर पाठकों द्वारा बहुत विरोध भी दर्ज किया गया , क्‍यूंकि लोगों के दिमाग में पूर्वाग्रह है कि ग्रहों का पृथ्‍वी पर कोई प्रभाव नहीं पडता है और मैं प्रतिदिन आनेवाली भूकम्‍प की घटना को ग्रहों का प्रभाव सिद्ध करने की बेमतलब कोशिश कर रही हूं। पर इस भूकम्‍प ने मेरा साथ देकर ग्रहों के पृथ्‍वी पर पडनेवाले प्रभाव को तो साबित कर ही दिया है। 

जब से ज्‍योतिष के क्षेत्र में आयी हूं , मेरा सबसे अधिक शौक तिथि के साथ भविष्‍यवाणी करके ग्रहों के प्रभाव को साबित करना रहा है। प्रारंभ में इसकी सत्‍यता का प्रतिशत कुछ कम अवश्‍य होता था , पर क्रमश: बढते हुए आज सत्‍यता के बहुत करीब पहुंच चुका है। इस पूरी यात्रा में गलत हुई भविष्‍यवाणियों ने मुझे जितना तनाव नहीं दिया , उतनी खुशी मेरी सटीक भविष्‍यवाणियों से हुई है। पर कभी कभार पहले से ही भयावह दिखने वाली मेरी सटीक भविष्‍यवाणियां , चाहे वो व्‍यक्तिगत हो या सामूहिक , मुझे काफी कष्‍ट पहुंचा जाती है, वैसे ही दिनों के लिस्‍ट में आज का दिन भी जुड गया है। सुबह पाबला जी और समीर लाल जी के द्वारा हैती में 7 रिक्‍टर से अधिक की एक भयावह भूकम्‍प की खबर से मेरी भविष्‍यवाणी सही होने की सारी खुशी जाती रही।

200 साल के सबसे भयंकर भूकंप में कैरेबियाई देश हैती में हजारों लोगों के मलबे के नीचे दबे होने की आशंका है। कल सुबह 4 बजकर 53 मिनट पर आए इस भूकंप की तीव्रता रिक्टर स्केल पर सात मापी गई है। भूकंप में हैती का राष्ट्रपति भवन भी बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया है।संयुक्त राष्ट्र के पीसकीपर का हेड क्वार्टर, नेशनल पैलेस(राष्ट्रपति भवन ), एक अस्पताल और कुछ महत्वपूर्ण बिल्डिंग इस भूकंप में बुरी तरह क्षतिग्रस्त हुई हैं। भूकंप के बाद हैती, क्यूबा, बहामास और डोमिनिकन रिपब्लिक में सुनामी की चेतावनी जारी कर दी गई। आनेवाले दो तीन दिनों में पीडितों को किसी प्रकार की राहत भी मिलती नहीं दिखाई दे रही। 

इस प्रकार के तनाव में अक्‍सर मैं सोंचा करती हूं कि ग्रहों के प्रभाव के इतने दिनों के अध्‍ययन के बाद भी जब होनी को दूर नहीं किया जा सकता , तो हमारा अध्‍ययन व्‍यर्थ है । क्‍यूंकि 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' मानता है कि ग्रहों के प्रभाव को समझकर आप अपने कार्यक्रम बना सकते हैं , पर उसे रोक नहीं सकते। पर प्रकृति के रहस्‍य की जानकारी से हमें कोई फायदा नहीं हो सकता , इसे वह स्‍वीकार नहीं करता। हमारे जीवन में ऐसा भी नहीं होता कि हम जिस विधि से किसी समस्‍या को समझते हैं , उसी विधि से उसका निराकरण हो । 

निराकरण के लिए अन्‍य विधि का भी सहारा लिया जा सकता है। पर इसके लिए दुनिया के अधिक से अधिक लोगों को हमारे रिसर्च को समझने की आवश्‍यकता है। मैं उसी दिन के इंतजार में हूं , जब इस दुनिया के अधिकांश लोगों को प्रकृति के इस अनूठे नियम की जानकारी हो जाएगी , हमारे रिसर्च से लोगों के दुख दूर करने में सहायता मिलेगी। जब हमारा लक्ष्‍य इतना बडा हो , तो मात्र भविष्‍यवाणी सही होने की छोटी मोटी खुशी से मैं खुश कैसे हो सकती हूं। अभी तो अपनी कमजोर स्थिति को देखते हुए बस ईश्‍वर से प्रार्थना ही कर सकती हूं कि वे भूकम्‍प पीडितों की रक्षा करें !!



दहेज प्रथा की समाप्ति

प्राचीन काल में समान हैसियत रखनेवाले दो मित्र या दो परिचित रिश्‍तेदार या किसी मध्‍यस्‍थ के माध्‍यम से दो अनजान व्‍यक्ति अपने पुत्र या पुत्री के विवाह की बातें करते थे , उस वक्‍त वर अपनी पढाई पूरी कर किसी व्‍यवसाय में लग चुका या कहीं शहर में पढाई कर रहा होता था और कन्‍या अक्षर ज्ञान प्राप्‍त कर लेने के बाद घरेलू कार्यों में दक्षता हासिल कर रही होती थी। सामान्‍य तौर पर दोनो के समान रंगरूप , कद काठी और हैसियत के कारण दहेज लेने देने का कोई प्रश्‍न उठने का सवाल ही नहीं था, समाज में उस वर के समकक्ष विवाह योग्‍य कितने वर मौजूद थे , इस कारण वर वालों का कोई एकाधिकार नहीं था कि वे विवाह के लिए मोटी रकम लें। बस कन्‍या की सुंदरता और खानदान की श्रेष्‍ठता उनकी पहली पसंद हुआ करती थी।

वर कन्‍या को गहने जेवर और कपडे वगैरह के रूप में उपहार देने के क्रम में और रिश्‍तेदारों की उपस्थित भीड को संभालने और खिलाने पिलाने में दोनो पक्षों का खर्च हुआ करता था। चूंकि कन्‍या के यहां वर पक्ष का आगमन होता था , इसलिए उनके स्‍वागत के लिए उनके संबंधियों को भी उपहार देने की परंपरा बनी थी। इसके अतिरिक्‍त कन्‍या दान के वक्‍त फर्नीचर तथा बरतन वगैरह दान किए जाने के कारण उनका कुछ अधिक खर्च हो जाता था। इस तरह वर पक्ष की तुलना में कन्‍या पक्ष का कुछ ही अधिक खर्च होता था। पर वर पक्ष के द्वारा दिए गए उपहार अपने घर में रह जाते थे , जिसका मौके बेमौके उपयोग किया जा सकता था , जबकि  कन्‍या पक्ष के द्वारा दिया गया उपहार बेटी के साथ उसके ससुराल चला जाता था , जिसपर उनका कोई अधिकार नहीं रह जाता था , शायद इसलिए ही बेटियों को उपहार देना भी कन्‍या पक्ष वालों को भारी लगता होगा।

लेकिन कालांतर में सुविधाभोगी मानसिकता के कारण कमोवेश सभी परिवारो में अपनी पुत्रियों का विवाह अपने से संपन्‍न घराने में योग्‍य वर से करने की प्रवृत्ति बढने लगी और इसके लिए कन्‍या पक्ष वाले वर पक्ष वालों को लालच देने लगें। यदि कोई लालच न दिया जाए तो वर पक्ष वाले अपने से निम्‍न हैसियत वालों की कन्‍या से विवाह करने को कैसे राजी हो सकते थे ? कभी कभी अपने समान हैसियतवाले घराने में भी शक्‍ल सूरत से कमजोर या किसी प्रकार की अपंगता की शिकार कन्‍या के विवाह के लिए वर पक्ष को लालच देना कन्‍या पक्षवालों की मजबूरी रही और हालात की कमजोरी ने वर पक्ष को इसे स्‍वीकारने को बाध्‍य किया। इन्‍हीं सब बातों से क्रमश: दहेज की प्रथा बढती चली गयी। बाद में कन्‍या पक्ष द्वारा पढाई लिखाई और नौकरी प्राप्‍त करने के बाद बेहतर जीवन जी पाने वाले वरों की मांग बडे रूप में बढी और दहेज प्रथा का और वीभत्‍स रूप होता चला गया। पर यह तो हमें मानना ही होगा कि कन्‍याओं के पिता की स्‍वार्थी प्रवृत्ति ने ही दहेज प्रथा को जन्‍म दिया है।

आज भी वर या कन्‍या दोनो की हैसियत और उनके माता पिता की हैसियत समान हो तो विवाह के पहले दहेज का कोई प्रश्‍न ही नहीं उठता, चाहे वे अपनी पसंद से विवाह करें या माता पिता की पसंद से या किसी मध्‍यस्‍थ के माध्‍यम से। दोनो की ओर से यथासंभव उपहार खरीदे जाएंगे , खर्च किए जाएंगे , पर यह कितना होगा , इसे पहले से तय करने की कोई आवश्‍यकता नहीं। पर कन्‍या अधिक पढी लिखी न हो और आप अच्‍छे से अच्‍छा वर ढूंढेंगे , तो इस कमी की क्षतिपूर्ति के लिए माता पिता को कुछ करना ही पडेगा। पर कई दशक पूर्व से ही जहां लडकी भी कमाउ होती थी , वहां दहेज की अधिक समस्‍या नहीं उपस्थित हुआ करती थी।

जहां नई नई सरकारी नौकरी ज्‍वाइन करने वाले छोटी छोटी आवश्‍यकता को पूरी करने में ही कुछ दिनों से अपनी सारी तनख्‍वाह समाप्‍त कर रहे हों , दान दहेज के रूप में लाखों कैश और गृहस्‍थी का छोटा बडा सामान एक साथ मिल जाने में क्‍यों आपत्ति कर सकते थे ? उसके लिए कन्‍या की शक्‍ल सूरत या पारिवारिक स्‍तर में थोडा समझौता भी अधिक मायने नहीं रखता था। पर आज मल्‍टीनेशनल कंपनी में लाखों के पैकेज की नौकरी कर रहे युवा दहेज के विरोध में ही दिखाई दे रहे हैं। 

कारण यह है कि कन्‍या के माता पिता अपने पूरे जीवन की बचत भी दे दें , तो उसके एक वर्ष के पैकेज के बराबर होगा। इस कारण इसे महत्‍व न देकर वह उपयुक्‍त पात्र चुनना अधिक पसंद कर रहे हैं।यह समाज के लिए शुभ हो सकता है , पर ऐसे में सामान्‍य से कम शक्‍ल सूरत या प्रोफेशनल डिग्री न रखने वाली कन्‍याओं के विवाह में बहुत बाधा उपस्थित हुई है। ऐसी कन्‍याओं के माता पिता काफी लाचार परेशान दिख रहे हैं। वैसे हाल के दिनों में आयी कन्‍याओं की संख्‍या में गिरावट से थोडी राहत अवश्‍य हुई है , अन्‍यथा स्थिति और भयावह हो सकती थी।

इस सप्‍ताह में ही भूकम्‍प के कई झटकों के आने की उम्‍मीद है !!

'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिषीय अनुसंधान केन्‍द्र' के द्वारा ग्रहों की गत्‍यात्‍मक और स्‍थैतिक शक्ति की खोज के बाद यह स्‍पष्‍ट हो गया है कि इस विशाल ब्रह्मांड में हर घटना एक दूसरे पर आधारित है और विभिन्‍न प्रकार की किरणों या गुरूत्‍वाकर्षण शक्ति के प्रभाव से इनमें से कोई भी अछूता नहीं। जिस तरह हर पशु और पक्षियों में अपने जीन के हिसाब से उसके क्रियाकलाप देखने को मिलते हैं , उसी प्रकार हर व्‍यक्ति अपने जन्‍मकालीन ग्रहों के हिसाब से अपनी शक्ति प्राप्‍त करता है और अपने अपने कर्तब्‍यों का पालन करता है। हां, युग , समाज और काल के हिसाब से व्‍यक्ति विशेष में थोडा बहुत परिवर्तन देखने को मिलता है , उसे हम पृथ्‍वी के अलग अलग भाग का प्रभाव या इसमें होनेवाले परिवर्तन का प्रभाव मान सकते हैं।

व्‍यक्ति विशेष पर ग्रहों के प्रभाव का विशद अध्‍ययन के बाद हमने पृथ्‍वी की जलवायु पर ग्रहों के प्रभाव को समझना चाहा , तो इन दोनो में दिखाई देनेवाला सहसंबंध हमें इसके अध्‍ययन के शौक को बढाता रहा। इस दिशा में हमारी खोज के आधार पर 2010 के पूरे वर्षभर के मौसम पर लिखा गया एक आलेख आप कुछ ही दिनों में आपको मिल जाएगी। मैं यह नहीं कह सकती कि जलवायु को प्रभावित करने सारे ग्रहीय कारकों की हमें जानकारी हो चुकी है , 40 प्रतिशत की ही जानकारी हमें हो सकती है , 60 प्रतिशत तक की खोज बाकी हो सकती है। 

पर खास तिथि को खास ग्रहीय स्थिति को देखते हुए जलवायु की कोई भविष्‍यवाणी का सटीक हो जाना इस संबंध को मान्‍यता दिलाने के लिए काफी है, जो कि पिछले वर्ष कई बार हो चुका। जलवायु पर ग्रहों के प्रभाव को देखने के बादए भूकम्‍प जैसी घटनाओं पर भी ग्रहों के प्रभाव को जानने की उत्‍सुकता होनी स्‍वाभाविक है। इधर एक दो वर्षों से इस दिशा में अध्‍ययन किया गया तो कुछ सफलता मिलने लगी ।

इस आलेख मे लिखे गए खास ग्रह स्थिति में बाली में हुए भूकम्‍प की घटना तथा इस आलेख में लिखे गए ग्रहयोग के अनुसार हुई भूकम्‍प की घटना हमारे अध्‍ययन के पश्‍चात निकाले गए निष्‍कर्ष को सत्‍य साबित करते हुए और अध्‍ययन के लिए हमारे आत्‍मविश्‍वास को बढाने में मदद कर रही है। यही कारण है कि सामने भूकम्‍प के लिए जिम्‍मेदार एक खास ग्रह स्थिति की चर्चा करने से मैं अपने आपको नहीं रोक सकी। आनेवाले 13 से 16 जनवरी 2010 के मध्‍य आसमान के विभिन्‍न राशियों में स्थित ग्रहों की गत्‍यात्‍मक और स्‍थैतिक शक्ति पृथ्‍वी के विभिन्‍न क्षेत्रों में भूकम्‍प के कई झटके देने में समर्थ होगी।

इन चार दिनों में जो शुरूआती झटका अधिक बडे रूप में हो सकता है , वह किसी भी देश में 13 जनवरी को 5 बजे से 7 बजे सुबह आ सकता है। हमारे अध्‍ययन के अनुसार ग्रहों के आधार पर इस झटके की तीव्रता 180 डिग्री देशांतर रेखा पर दिखाई दे रही है। यानि उसके आसपास 20 डिग्री के अंतर पर इस झटके को महसूस किया जाना चाहिए। वह रेखा अंतर्राष्‍ट्रीय तिथि परिवर्तन की रेखा भी है , इसलिए भूकम्‍प आने की तिथि के लिए हम 12 जनवरी या 13 जनवरी में से दोनों को ले सकते हैं, ताकि कोई संदेह न बने। पर वास्‍तव में भारतवर्ष की घडी के हिसाब से यह समय 13 जनवरी की रात 11 बजे का है। अन्‍य महत्‍वपूर्ण झटके इस मुख्‍य समय के अलावे किसी भी देश में यहां तक कि हमारे ही देश के आसपास की देशांतर रेखा के 20 डिग्री अंतर पर 10 बजे रात्रि से लेकर 12 बजे रात्रि तक का भी रह सकता है। मेरी ईश्‍वर से प्रार्थना है कि इसमें जान माल की अधिक क्षति न हो ।

भूकम्‍प जैसे दैवी आपदा के अलावे अन्‍य मानवकृत आपदाओं के होने में भी इस प्रकार के ग्रहीय योग की भूमिका होती है , क्‍यूंकि ऐसी ग्रह स्थितियां पृथ्‍वी में हलचल मचाने के अलावे किसी न किसी प्रकार की घटना को उपस्थित कर व्‍यक्ति के दिलोदिमाग में भी हलचल मचाने में मुख्‍य भूमिका अदा करती है । इसलिए ऐसे ग्रहयोग के समय अनावश्‍यक कार्यों की जबाबदेही या किसी मनोरंजक या महत्‍वपूर्ण कार्यक्रम की उपेक्षा ही की जानी चाहिए !!