क्या ज्योतिष विज्ञान है या अंधविश्वास? इस ब्लॉग में आप ज्योतिष के आधुनिक सूत्रों से सम्बद्ध नवीन ज्योतिषीय सिद्धांत के बारे में जानकारी प्राप्त करेंगे, जो ज्योतिष की सटीकता पर शोध, ज्योतिष में नए शोध और निष्कर्ष के उपरांत विकसित किया गया है, नए ज्योतिष सूत्रों के माध्यम से कुंडली विश्लेषण, इन ज्योतिष के नए नियमों से भविष्यवाणी कैसे करें, 'ज्योतिष सीखने के लिए नए सूत्र और विधियाँ बताई गयी हैं।
ये कैसे कैसे अंधविश्वास 2
Specialist in Gatyatmak Jyotish, latest research in Astrology by Mr Vidya Sagar Mahtha, I write blogs on Astrology. My book published on Gatyatmak Jyotish in a lucid style. I was selected among 100 women achievers in 2016 by the Union Minister of Women and Child Development, Mrs. Menaka Gandhi. In addition, I also had the privilege of being invited by the Hon. President Mr. Pranab Mukherjee for lunch on 22nd January, 2016. I got honoured by the Chief Minister of Uttarakhand Mr. Ramesh Pokhariyal with 'Parikalpana Award' The governor of Jharkhand Mrs. Draupadi Murmu also honoured me with ‘Aparajita Award’ श्री विद्या सागर महथा जी के द्वारा ज्योतिष मे नवीनतम शोध 'गत्यात्मक ज्योतिष' की विशेषज्ञा, इंटरनेट में 15 वर्षों से ब्लॉग लेखन में सक्रिय, सटीक भविष्यवाणियों के लिए पहचान, 'गत्यात्मक ज्योतिष' को परिभाषित करती कई पुस्तकों की लेखिका, 2016 में महिला-बाल-विकास मंत्री श्रीमती मेनका गाँधी जी और महामहिम राष्ट्रपति प्रणव मुख़र्जी द्वारा #100womenachievers में शामिल हो चुकी हैं। उत्तराखंड के मुख्य मंत्री श्री रमेश पोखरियाल जी के द्वारा 'परिकल्पना-सम्मान' तथा झारखण्ड की गवर्नर श्रीमती द्रौपदी मुर्मू जी द्वारा 'अपराजिता सम्मान' से मुझे सम्मानित होने का गौरव प्राप्त हुआ। Ph. No. - 8292466723
ये कैसे कैसे अंधविश्वास 1
हिंदी ब्लॉगरों के काम को कम नहीं आंका जाना चाहिए , शनै: शनै: ही सही , हर महत्वपूर्ण विंदुओं पर वे अपनी कलम चला ही रहे हैं , देश में अंधविश्वास कितना हद तक फैला हुआ है , वो इनकी नजर से देखा जा सकता है। मैने तीन पोस्टों में इसे समेटने की कोशिश की है ...
सबसे पहले तो बात करें आज कि जिसमें खुशदीप सहगल जी भी शंकर जी के मंदिर में आते नाग की पिक्चर दिखाकर पूछ रहे हैं ... आपने फोटो देख लिए...
अब मेरे आप सबसे से चंद सवाल... क्या ये वाकई चमत्कार है... क्या ये फोटो वास्तविक हैं...यानि इनसे कोई छेड़छाड़ नहीं की गई है... जब कोबरा पिछली बार फोटोग्राफर के वहां रहने पर प्रकट नहीं हुआ तो इस बार भी फोटोग्राफर के वहां पहुचने पर चला क्यों नहीं गया... तमिलनाडु में कहीं ये खबर अंधविश्वास की अति की प्रवृत्ति के चलते अखबार ने अपना सर्कुलेशन बढ़ाने की गरज से तो नहीं छापी... बहरहाल, जो भी है, मुझे ई-मेल से ये फोटो-फीचर मिला तो आप के साथ बांटने की इच्छा हुई...अब आप विश्वास रखते हों या इसे अंधविश्वास मानते हो, आप अपने मत के लिए स्वतंत्र हैं...मेरा अनुरोध बस यही है कि इस पोस्ट को बस दिलचस्प ख़बर की तरह लीजिएगा..
मैं दस बारह वर्ष पूर्व की एक सच्ची और महत्वपूर्ण घटना का उल्लेख करने जा रही हूं। बोकारो रांची मुख्य सडक के लगभग मध्य में एक छोटा सा गांव है , जिसमें एक गरीब परिवार रहा करता था। उस परिवार में दो बेटे थे , बडे बेटे ने गांव के रोगियों के उपचार में प्रयोग आनेवाली कुछ जडी बूटियों की दुकान खोल ली थी। बचपन से ही छोटे बेटे के आंखों के दोनो पलक सटे होने के कारण वह दुनिया नहीं देख पा रहा था। गरीबी की वजह से इनलोगों ने उसे डाक्टर को भी नहीं दिखाया था और उसे अंधा ही मान लिया था। पर वह अंधा नहीं था , इसका प्रमाण उन्हें तब मिला , जब 16-17 वर्ष की उम्र में किशोरावस्था में शरीर में अचानक होनेवाले परिवर्तन से उसकी दोनो पलकें हट गयी और आंखे खुल जाने से एक दिन में ही वह कुछ कुछ देख पाने में समर्थ हुआ।
Specialist in Gatyatmak Jyotish, latest research in Astrology by Mr Vidya Sagar Mahtha, I write blogs on Astrology. My book published on Gatyatmak Jyotish in a lucid style. I was selected among 100 women achievers in 2016 by the Union Minister of Women and Child Development, Mrs. Menaka Gandhi. In addition, I also had the privilege of being invited by the Hon. President Mr. Pranab Mukherjee for lunch on 22nd January, 2016. I got honoured by the Chief Minister of Uttarakhand Mr. Ramesh Pokhariyal with 'Parikalpana Award' The governor of Jharkhand Mrs. Draupadi Murmu also honoured me with ‘Aparajita Award’ श्री विद्या सागर महथा जी के द्वारा ज्योतिष मे नवीनतम शोध 'गत्यात्मक ज्योतिष' की विशेषज्ञा, इंटरनेट में 15 वर्षों से ब्लॉग लेखन में सक्रिय, सटीक भविष्यवाणियों के लिए पहचान, 'गत्यात्मक ज्योतिष' को परिभाषित करती कई पुस्तकों की लेखिका, 2016 में महिला-बाल-विकास मंत्री श्रीमती मेनका गाँधी जी और महामहिम राष्ट्रपति प्रणव मुख़र्जी द्वारा #100womenachievers में शामिल हो चुकी हैं। उत्तराखंड के मुख्य मंत्री श्री रमेश पोखरियाल जी के द्वारा 'परिकल्पना-सम्मान' तथा झारखण्ड की गवर्नर श्रीमती द्रौपदी मुर्मू जी द्वारा 'अपराजिता सम्मान' से मुझे सम्मानित होने का गौरव प्राप्त हुआ। Ph. No. - 8292466723
आखिरकार पुलिस ने मुझे ढूंढ ही लिया !!
अपने जीवन की सब सुख सुविधा छोडकर अपने चिंतन के प्रति समर्पित होकर ही कोई लेखक लेखन की निरंतरता बना पाता है। उसका लक्ष्य अपने अनुभवों और विचारों का समाज में बेहतर प्रचार प्रसार ही होता है , क्यूंकि एक प्रतिशत से भी कम मामलों में ही आर्थिक आवश्यकताओं की पूर्ति लेखन के माध्यम से हो पाती है। पर जहां कुछ लोग लेखक के विचारो और अनुभवों की कद्र करते हैं , वहीं समाज में विपरीत मानसिकता रखनेवालों के द्वारा लेखकों का विरोध भी देखने को मिल जाता है।
ऐसे समय में कभी कभी लेखन से विरक्ति सी भी हो जाती है , पर कोई न कोई सुखद घटना फिर आत्मविश्वास को जन्म देते हुए नए जज्बे के साथ चिंतन मनन को बाध्य करती है और हर किसी को अपने कर्तब्य पथ पर बनाए रहती है। बाजार में किसी लेखक के लेखों , उनके पुस्तकों के प्रकाशित होने के साथ ही साथ ऐसे पाठक जन्म ले लेते हैं , जो एक नई दृष्टि से हर कार्य को , हर परिणाम को , हर घटना को देख सके। पाठकों की संख्या में बढोत्तरी के साथ ही साथ लेखक का महत्व बढता जाता है।
मैने 1991 से ही विभिन्न पत्र पत्रिकाओं के लिए लिखना शुरू किया था और बहुत जल्द ही मेरा लेखन एक प्रकाशक की नजर में आ गया था। इसके कारण 1996 में ही एक पुस्तक बाजार में आ गयी थी , दो वर्षों के अंदर ही इसकी सारी प्रतियां बिक चुकी थी और 1999 में ही इसके दूसरे संस्करण को प्रकाशित करने के लिए मुझे हस्ताक्षर करना पडा था। उस पुस्तक में मैने शीघ्र ही बाजार में दूसरी पुस्तकों के लाने और पाठकों से संवाद बनाए रखने का वादा किया था , पर कुछ न कुछ समस्या के कारण इतने दिनों के उपरांत भी बाजार में मेरी या मेरे पिताजी की कोई पुस्तक नहीं आ सकी थी। चार वर्ष पूर्व तक पाठकों ने मेरे पते पर संपर्क भी किया था , पर इधर तीन वर्षों से पता बदलने की वजह से वे संवाद भी नहीं कर पा रहे हैं। ऐसी स्थिति में मेरी अगली पुस्तक के इंतजार कर रहे मेरे एक पाठक महोदय को पिछले दिनों मुझे ढूंढने के लिए पुलिस का सहारा लेना पडा।
मेरी उक्त पुस्तक में बोकारो , बिहार का पता लिखा था , दरभंगा (बिहार) के डी आई जी साहब उनके परिचित थे , उन्होने मेरी खबर लेने के लिए उनसे संवाद किया। बोकारो अब झारखंड में है , उन्होने बोकारो के एस पी साहब को खबर भेजा , इतने बडे बोकारो में भी मेरा पता लगाना आसान नहीं था , पर पुस्तक में मेरे जन्मस्थान पेटरवार के बारे में दी गयी जानकारी से पुलिस को एक सूत्र मिला। एस पी साहब ने पेटरवार के थाना इंचार्ज को खबर की , वहां उन्हें मेरे पिताजी को फोन नंबर मिला। और इस तरह आखिरकार पुलिस ने मुझे ढूंढ ही लिया ।
पर इतना सब होने के बाद भी मुझे ये मालूम न हो सका कि मुझे ढूंढा क्यूं जा रहा है। पापा जी के पास कई फोन आने के बाद अंत में सारा माजरा खुलकर सामने आया , पापाजी से उनकी मीटिंग भी तय हो गयी है। उनका मुझसे अभी तक संवाद नहीं हो सका है , पर मेरे ब्लॉग का पता भी उनके पास चला गया है। हो सकता है , एक दो दिनों में मेरे पास उनका मेल भी आ जाए। एक सीख तो मिल ही गयी है , अच्छा करते रहो , अच्छा सोंचते रहो , अच्छा लिखते रहो , देखने सुनने पढने वाले मिलते रहेंगे।
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ज्योतिष की वैज्ञानिकता पर प्रश्नचिन्ह
गिरीश बिल्लौरे 'मुकुल' जी द्वारा लिए गए मेरे इंटरव्यू वाले पोस्ट में दो प्रकार की ग्राफ की भी चर्चा की गयी है , जो उनके जन्म विवरण के आधार पर 'गत्यात्मक ज्योतिष' के सिद्धांतों पर आधारित मेरे स्वयं के द्वारा विकसित किए गए सॉफ्टवेयर से निकाला गया है। मुकुल जी ने स्वीकारा है कि उनके जीवन के सभी पक्षों और उनके जीवन भर के उतार चढाव को दिखाते इन ग्राफों की सत्यता 90 प्रतिशत से अधिक मानी जा सकती है।
इनके अलावे हिंदी ब्लॉग जगत से जुडे कई पाठकों को भी मैने ऐसे ग्राफ भेजे हैं , जिन्होने भी इसकी सत्यता को स्वीकारा है , पर कुछ को ये ग्राफ समझने में दिक्कत भी हुई है। मेरे पास जितने लोगों ने जन्म विवरण भेजे हैं , उनका काम काफी दिनों से पडा है , उनको भी क्रमश: ये ग्राफ भेज रही हूं। सबो को अलग अलग न समझाना पडे , इसी कारण मै इन ग्राफो का विश्लेषण इस पोस्ट में करने जा रही हूं।
'गत्यात्मक ज्योतिष' के सूत्रों के आधार पर मैने 'प्रीडेस्टीनेशन' नामक अपना साफ्टवेयर विकसित किया है , जिसमें इनपुट के तौर पर किसी की जन्मतिथि , जन्म समय और जन्म स्थान डाला जाए , तो कुल मिलाकर पंद्रह पन्नों में उसकी जन्मकुंडली , विभिन्न प्रकार के चार ग्राफ और आपके ग्राफ के अनुसार ही घटनेवाली सामान्य बातों का जिक्र होता है। 'गत्यात्मक ज्योतिष' की धारणा है कि 'प्रीडेस्टीनेशन' यानि 'पहले से तय' सबकुछ नहीं होता , मनुष्य की कुछ विशेषताएं , विशेष संदर्भों का सुख दुख और जीवन में आने वाले कुछ उतार चढाव ही 'पहले से तय' होते हैं।
मनुष्य की उन विशेषताओं ,विशेष संदर्भों के सुख दुख और जीवन में आने वाले नियत उतार चढावों को पहचान लेने के कारण ही 'गत्यात्मक ज्योतिष' को सिर्फ सांकेतिक विज्ञान कहा जा सकता है। इसके अतिरिक्त मनुष्य अपने जीवन में बहुत कुछ युग के हिसाब से और बहुत कुछ अपनी मेहनत से भी प्राप्त कर सकता है। यही कारण है कि भविष्यवाणियों वाले पन्नों पर अनुभव के आधार पर प्रतिदिन कुछ न कुछ बदलाव हो रहे हैं और युग युगांतर तक थोडा बहुत चलेगा ,क्यूंकि समय और परिस्थिति के अनुसार ग्रहों के प्रभाव की तीव्रता घटती बढती रहती है। मेरे सॉफ्टवेयर से निकलने वाले चारो ग्राफ निम्न प्रकार के होते हैं ......
इस ग्राफ में काली रेखा आपकी सुखात्मक और दुखात्मक परिस्थितियों और आपके मनोभावों को दर्शाता है , जिसका आपके रहन सहन और स्तर से कोई संबंध नहीं होता। यह मात्र आपके आराम दायक और मनोनुकूल माहौल को दर्शाता है , यह जिन वर्षों में ऊपर जाएगा , आपकी परिस्थितियां सुखद बनी रहेंगी , इसके विपरीत जिन वर्षों में नीचे जाएगा , परिस्थितियों में कुछ कष्ट आता जाएगा। जिन वर्षों में लाल रेखा काली रेखा से ऊपर जाएगी , आप परिस्थितियों से संतुष्ट रहेंगे तथा जिन वर्षों में लाल रेखा काली रेखा से नीचे जाएगी , आप परिस्थितियों से असंतुष्ट रहेंगे।
दूसरा ग्राफ आपकी महत्वाकांक्षा , आपके स्तर और आपकी सफलता को दर्शाता है। इस ग्राफ में काली रेखा जिन वर्षों में नीचे रहेगी , आपकी महत्वाकांक्षा और उसके अनुसार आपकी कार्यक्षमता कम होगी , लेकिन जिन वर्षों में काली रेखा ऊपर जाएगी , दायित्वों का बोध होने के साथ ही साथ आपकी महत्वाकांक्षा और कार्यक्षमता बढती जाएगी। काली रेखा से लाल रेखा के ऊपर होने का अर्थ है कि आप अपनी महत्वाकांक्षा और कार्यक्षमता से अधिक सफलता प्राप्त कर रहे हैं , जिन वर्षो में काली रेखा से लाल रेखा नीचे हो , उन वर्षों में आप अनुमान से कम सफलता प्राप्त करेंगे। आश्चर्य की बात तो ये है कि पहले और दूसरे प्रकार के ग्राफ के लिए सिर्फ आपके जन्म तिथि की आवश्यकता पडती है। पर तीसरे और चौथें प्रकार के ग्राफ के लिए जन्म तिथि के साथ ही साथ जन्म समय और जन्मस्थान की भी आवश्यकता पडती है।
तीसरा ग्राफ आपकी महत्वाकांक्षा के संदर्भों को दिखलाता है , आप किस मामले में कितना महत्वाकांक्षी हैं और उस संदर्भ के लिए अपनी कितनी ऊर्जा लगाते हैं। महत्वाकांक्षा और कार्यक्षमता के अनुरूप सफलता पाने से आप संतुष्ट रहा करते हैं या महत्वाकांक्षा और कार्यक्षमता के अनुरूप सफलता न प्राप्त कर पाने से असंतुष्ट , इसका अंदाजा भी इस ग्राफ से हो जाता है।
चौथा ग्राफ आपके सुखदायक संदर्भों को दिखलाता है , प्रकृति ने आपको किन संदर्भों की कितनी सुख सफलता दी है। इनको अनायास ढंग से पाने या कष्ट झेलने के बाद भी आप इनसे संतुष्ट रहते हैं या असंतुष्ट बने हुए हैं , इसका अंदाजा इस ग्राफ से मिल जाता है।
अपने जन्म के समय आसमान में स्थित ग्रहों के प्रभाव को दर्शाते ये चारो ग्राफ किसी को भी आत्म ज्ञान करवाने में सफल हैं , हर व्यक्ति अपने अनुकूल समय और संदर्भों पर अपनी अधिक से अधिक ऊर्जा लगाकर और प्रतिकूल समय और संदर्भों की उपेक्षा कर शांतिपूर्ण जीवन जीने में सफल हो सकते हैं । यदि आपकी उम्र भी 25 वर्ष से अधिक की है और आप चारो प्रकार के ग्राफ पाने की चाहत रखते हैं , अपने जीवन को समझना चाहते हैं , तो अपने जन्म विवरण हमें ईमेल के द्वारा भेज दें। जिन्होने अपना जन्म विवरण पहले भेजा है , वे भी दुबारा याद करा दें , तो उन्हें चारो ग्राफ भेजे जा सकते हैं। लेकिन सिर्फ अपना जन्म विवरण ही भेजें , किसी दूसरे का नहीं । मेरा दावा है कि इन ग्राफो को प्राप्त करने बाद ज्योतिष की वैज्ञानिकता के प्रति किसी को संदेह नहीं रह जाएगा।
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मेरे परिवार का नाम पुराण !!
कहा जाता है नाम में क्या रखा है ? अरे नाम में ही तो सबकुछ रखा है , लोगों के कर्म , लोगों के विचार , लोगों की कल्पना , सब नाम में ही तो छुपी होती है। इसलिए परिवार के लोगों के नाम से ही आप उनके परिवार की मानसिकता , उनके संस्कार को समझ सकते हैं। इस दृष्टि से देखा जाए , तो भारतवर्ष में नाम रखने के इतिहास से ही हमारी सभ्यता और संस्कृति के विकास का पूरा पता चल जाएगा।
हिंदू धर्म में न तो ईश्वर की कमी है और न इनके नामों की , यही कारण है कि पहले ईश्वर के नाम पर लोगों के नाम रखे जाते थे, दूसरी बात कि ईश्वर के अलावे नाम रखने के लिए और बहुत शब्द नहीं थे , महीने , दिनों , तिथियों से लेकर पहर तक का उपयोग नाम रखने में किसी जाता था। प्राचीन काल में सारे बच्चों के नहीं तो कम से कम अपने एक दो बच्चे का नाम तो लोग भगवान का रखते ही थे। इसके पीछे एक सोंच थी कि बच्चे के बहाने तो कम से कम वे ईश्वर के नाम जप सकेंगे।
इतना ही नहीं , दुख दर्द में या मृत्यु से पहले बेटे को भी पुकारा तो अनायास ईश्वर का नाम लिया जा सकेगा। लेकिन आज लोगों को उसकी कोई चिंता नहीं , बुरे वक्त में ईश्वर के नाम पर वे लूटे जा सकते हैं , पर अच्छे वक्त में उसकी सत्ता को भी स्वीकारने में उन्हें अपनी प्रतिष्ठा खोने का भय होता है।
इस लेख में अपने परिवार के लोगों के नाम से मैं भारतवर्ष के बहुत सारे परिवार के बदलते विचारों , बदलती मानसिकता पर प्रकाश डाल रही हूं। मेरे दादाजी तीन भाई थे , तीनों के नाम थे ... 'वंशीधर' , 'मुरलीधर' और 'जगदीश'। इनके नाम से उस युग के अनुरूप उनके माता पिता की धार्मिक भावना को स्पष्टत: समझा जा सकता है। 'स्वर्गीय वंशीधर महथा जी' के पांच पुत्र और एक पुत्री थी , जिनमें से तीन पुत्रों और एक पुत्री का नाम भी ईश्वर के नामों का अनुकरण करते हुए दिया गया था .. 'शिवनंदन' , 'दीनानाथ' , 'रामलोचन' और 'गौरी'। पर चौथे पुत्र में ही फैशन की थोडी हवा लग गयी थी और उनका नाम 'अनिल' रखा गया। पांचवे पुत्र के समय उन्हे गुण ज्ञान की महत्ता का अहसास हुआ होगा , जिसके कारण उनका नाम 'ज्ञानेश्वर' रखा गया।
मेरे दादा जी 'स्वर्गीय मुरलीधर महथा जी' के भी पांच पुत्र और एक पुत्री हुई , बडे पुत्र के जन्म के वक्त साधु गुण वाले व्यक्ति को ईश्वर से कम दर्जा नहीं होने की बात मन में आयी होगी , तभी तो उनका नामकरण 'साधु चरण' किया गया। पर उसके तत्काल बाद विद्या और बुद्धि की महत्ता समझ में आयी होगी , जिसके कारण उनसे छोटे दोनो भाई बहनों का यानि मेरे पिताजी और बुआजी का नाम 'विद्या सागर' और 'बुद्धिमति' रखा गया।
पर विद्या और बुद्धि से क्या होता है ? देश गुलाम था , उसे आजाद करने के लिए चाहे लाख प्रयास हो रहे थे , प्रयास करने वालों को तो जेल भेजा जा रहा था , ऐसी स्थिति में देश की आजादी के लिए ईश्वर पर भी विश्वास किया जाना आवश्यक था। इसलिए जेल में चिंतन में मग्न मेरे बडे दादा जी ने मेरे चाचाजी का नामकरण 'रामविश्वास' किया। उसके बाद के उनके जेल में रहते हुए जन्मलेने वाले चौथे भाई 'रामविनोद' और स्वतंत्र भारत मे जन्म लेने वाले पांचवे भाई 'रामचंद्र' हुए। छोटे दादाजी के तीनो बेटों के नाम भी 'शंकर' , 'भोला' और 'कैलाश' ही रखे गए। इस तरह उस पीढी तक के नामकरण में ईश्वर को काफी महत्व दिया गया।
दूसरी पीढी में फैशन का पूरा दौर शुरू हो गया था , हालांकि ईश्वर की उपेक्षा यहां भी नहीं की जा सकती थी। हमारे परिवार की दोनो बडी पोतियों का नाम 'भारती' और 'आरती' रखा गया था। हमारे घर के पहले पोते को भले ही पप्पू के नाम से पुकारा जा रहा हो , पर धार्मिकता और आधुनिकता दोनो को समावेश करते हुए मेरे चाचा जी ने उसका नाम 'परितोष चंद्र चंद्रशेखर' रखा , इसी प्रकार दूसरे भतीजे का नाम 'गिरीन्द्र कुमार गिरीश' और तीसरे भतीजे का नाम 'अमर ज्योति अवनीश कुमार' रखा गया।
तीनो नाम रखने वाले मेरे तीसरे चाचाजी की प्रतिभा का कायल तो सब थे , पर विद्यालय में नाम लिखवाते वक्त उस नाम में से कुछ हिस्सा कटना ही था। तीनो नाम कटकर बडे पापा जी के दोनो बच्चों का नाम 'परितोष कुमार' 'गिरीश कुमार' तथा मेरे भाई का नाम 'अमर ज्योति' रह गया। बडे पिताजी के छोटे बेटे का नाम 'अनूप' क्यूं पडा , इसके बारे में कभी कोई चर्चा सुनने को नहीं मिली।
भले ही मेरे परिवार में मेरे नाम 'संगीता' को रखने में मेरे पापाजी बॉलीवुड की किसी फिल्म से ही प्रेरित हुए हों , बडे भाई 'अमर ज्योति' का नाम भी चाचाजी की इच्छा के अनुरूप रखा गया हो , पर इस पृथ्वी के कण कण में ईश्वर को देखने वाले मेरे मम्मी पापाजी का दृष्टिकोण डिक्सनरी के हर शब्द में ब्रह्म को देखता रहा और मेरे छोटे चार भाई बहनों के नाम का आधार सिर्फ तुकबंदी रहा और इसी कारण दोनो छोटी बहनों के नाम 'कविता' और 'पुनीता' रख दिए गए।
पहले मेरे बडे भाई के नाम 'अमर ज्योति' की तुकबंदी करते हुए छोटे भाइयों का नाम 'सत्य मूर्ति' और 'अशेष मुक्ति' रखा गया , पर बाद में इतना लंबा नाम को भी उचित न समझते हुए उनके नामों को 'अमरेश' , 'विशेष' और 'अशेष' करने का सोंचा गया। छोटे भाइयों के नाम 'विशेष' और 'अशेष' तो अभी भी हैं , पर 'अमर ज्योति' 'अमरेश' न हो सका।
रखे गए नाम में से किसी का सिर तो किसी की पूंछ कट जाने से मेरे चाचाजी काफी दुखी थे और बाद में उन्होने अपने किसी भी भतीजे भतीजी का नाम नहीं रखा। हां अपनी चारो बच्चियों को अपने मनोनुकूल नाम देकर स्वयं तो संतुष्ट हुए , पर उनके द्वारा किया गया बच्चियों का नामकरण सर्टिफिकेट्स तक ही सीमित रहा , उन्हें सबलोग पुकारू नाम से ही जानते रहें। वैसे आपको बताना आवश्यक है कि उनकी बेटियों के नाम 'श्रीराज राजेश्वरी सेठ शैलजा' , ' श्रीभावना स्मृति' , 'श्रीवाणी अर्चना' और 'निशांत रश्मि' है , यहां सभी श्री का मतलब 'लक्ष्मी' से हैं।
हां अपने बेटे का नाम उन्होने भी बहुत छोटा यानि 'अव्यय कुमार' ही रखा है , इसे व्याकरण का अव्यय न समझा जाए , दरअसल इसके नाम को रखते वक्त इनकी मानसिकता खर्च में कटौती यानि व्यय न करने की थी। उसके बाद के चौथे चाचाजी के बच्चों का नाम भी पहले बच्चे 'रतन' की तुकबंदी से ही 'नूतन' , 'भूषण' और 'सुमन' रखे गए। आधुनिकता के साथ आगे बढते हुए छोटे चाचा जी के बच्चों तक आते आते नाम प्रेट्टी , मोनी , चिक्की हो गए।
अब मेरे परिवार की नई पीढी के सारे बच्चें यानि नाती नातिन और पोते पोतियों के नाम देखे जाएं , तो हमारी संस्कृति पर ही प्रश्न चिन्ह लग जाए। वो तो भला हो कुछ बूढे बूढियों का जिनकी मन्नते पूरी होने की वजह से कहीं कहीं मां बाप दबाब में आकर ही सही , बच्चों के नाम रखने के लिए पूरी डिक्शनरी छान मारी और भगवान के अच्छे अच्छे नाम चुनकर रख लिए।
इसके अलावे कुछ साहित्यप्रेमी बुजुर्गों के द्वारा हिंदी के कुछ अच्छे शब्दों को चुनकर भी बच्चों के नाम रखे गए , नहीं तो टिंकू , टीनू , गोलू , पुचु , बब्बी , सिल्वी , गोल्डी , यूरी आदि नामों ( ये नाम हमारे परिवार के बच्चों के हैं ) को सुनकर सोंचने को ही बाध्य होना पडता है कि आखिर ये बच्चे किस देश के वासी हैं ?
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