ये कैसे कैसे अंधविश्‍वास 2

कल से ही मैं अपने देश में बेवजह फैले अंधविश्‍वास पर हमारे ब्‍लोगरों की निगाह की चर्चा कर रही हूं , इसी की दूसरी कडी आज प्रस्‍तुत है .......



ऋषिकेश खोङके "रुह" जी को सुनने में अजीब सा लग रहा है कि किसी के शरीर में देवी आ गयी है..सुनने मे अजीब लग सकता है की किसी के शरीर मे देवी आ गई
पर भारत मे ये आम बात है | आप भारत मे इस प्रकार की बातों को अंधविश्वास अथवा कुरितियाँ कह सकते है किन्तु मेरे लिये ये कहना जरा मुश्किल होगा | बात काफी पुरानी है और यादें भी धुंधली सी ही है पर आँखो के समक्ष एक चलचित्र है| अवसर है गौरी पूजन (महालक्ष्मी) का ,आरती चल रही है और धिरे-२ समापन की और है की अचानक काँपते हाथ-पैर , खुले हुवे बाल , झुमता शरीर और गले से निकलती अज्ञात आवाज़ के साथ मेरी माता | मै शायद देख कर डर गय होउन्गा | सहसा आवाज़ आती है "अरे अंगात देवी आली , पाया पडा" अर्थात शरीर मे देवी आयी है पैर पडो | एक - एक कर सभी लौग माँ के पैर पडने लगे | माँ सबको आशीर्वाद देती रही और कुछ आश्वासन भी जैसे "सगळ बर होईल, चिन्ता करु नको" अर्थात सब ठिक हो जायेगा चिन्ता मत करो इत्यादि |

शेफाली पांडे जी बालिका को माता के नाम पर पूजे जाते देखकर कहती हैं इन्हें इंसान ही बने रहने दिया जाए ग्रामीण इलाके में शिक्षण कार्य करने के कारण अक्सर मुझे वह देखने को मिलता है, जिसे देखकर यकीन करना मुश्किल होता है कि यह वही भारत देश है, जो दिन प्रतिदिन आधुनिक तकनीक से लेस होता जा रहा है,जिसकी प्रतिभा और मेधा का लोहा सारा विश्व मान रहा है, जहाँ की स्त्री शक्ति दिन पर सशक्त होती जा रही है , लेकिन इसी भारत के लाखों ग्रामीण इलाके अभी भी अंधविश्वास की गहरी चपेट में हैं, इन इलाकों से विद्यालय में आने वाली अधिसंख्य लडकियां कुपोषण, उपेक्षा, शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना का शिकार होती हैं, क्यूंकि ये एक अदद लड़के के इंतज़ार में जबरन पैदा हो जाती हैं, जिनके इस दुनिया में आने पर कोई खुश नहीं हुआ था, और यही अनचाही लडकियां जब बड़ी हो जाती हैं, तो अक्सर खाली पेट स्कूल आने के कारण शारीरिक रूप से कमजोरी के चलते मामूली सा चक्कर आने पर यह समझ लेती हैं कि उनके शरीर में देवी आ गयी है, हाथ पैरों के काँपने को वे अवतार आना समझ लेती हैं, मैं बहुत प्रयास करती हूँ कि बच्चों की इस गलतफहमी को दूर करुँ, मैं उन्हें समझाती हूँ कि ये देवदेवता शहर के कॉन्वेंट या पब्लिक स्कूलों के बच्चों के शरीर में क्यूँ नहीं आते ?

राजकुमार ग्‍वालानी जी भी पूछते हैं .... है कोई टोनही से मुक्ति दिलाने वाला
छत्तीसगढ़ का प्रचलित ज्यौहार हरेली कल है। इस त्यौहार को जहां किसान फसलों के त्यौहार के रूप में मानते हैं और अपने कृषि उपकरणों की पूजा करते हैं, वहीं यह भी मान्यता है कि यही वह दिन होता है जब वह शैतानी शक्ति जिसे सब टोनही कहते हैं विचरण करने के लिए निकलती है। इसी के साथ इस दिन को तांत्रिकों के लिए अहम दिन माना जाता है। इस दिन तांत्रिक तंत्र साधना करने का काम करते हैं। भले इसे अंधविश्वास कहा जाता है, लेकिन यह एक कटु सत्य है कि टोनही जैसी चीज का अस्तित्व होता है। ऐसा साफ तौर पर ग्रामीणों का कहना है। इनका कहना है कि अगर किसी को इसे देखना है तो वह छत्तीसगढ़ आ सकता है। वैसे ये देश के हर कोने में हैं। लेकिन छत्तीसगढ़ में इसके बारे में ज्यादा किस्से हैं। एक तरफ ग्रामीण टोनही के होने का दावा करते हैं तो दूसरी तरफ इसको अंध विश्वास बताया जाता है। ग्रामीण इसको अंध विश्वास बताने वालों से कहते हैं कि क्यों नहीं वे उन स्थानों पर जाने की हिम्मत करते हैं जहां पर टोनही के बारे में कहा जाता है कि वह विचरण करती है। अगर है कोई ऐसा बंदा जो टोनही से मुक्ति दिला सकता है तो वहां जाए और बताए कि टोनही हकीकत नहीं बल्कि महज अंधविश्वास है।

अंकुर जी लिखते हैं कि झारखंड के देवधर जिले के पालाजोरी इलाके में पत्थरघट्टी गांव में पांच महिलाओं को डायन बताकर सरेआम बेआबरू किया गया और उनकी निर्मम पिटाई की गई। मुस्लिम समुदाय की इन पांचों महिलाओं को न सिर्फ पीटा गया बल्कि निर्वस्त्र कर गांव में घुमाया गया और बाद उन्हें मैला खाने को मजबूर किया गया। संथाल परगना प्रमंडल के पुलिस उप महानिरीक्षक मुरारीलाल मीना ने बताया कि यह पूरी करतूत किसी बाबा की है जिसका प्रभाव पूरे इलाके में है। उनके मुताबिक पत्थरघट्टी गांव की ही पांच महिलाओं के बारे में यह अंधविश्वास है कि उन पर किसी मुवक्किल साहब का साया है और जब साया आता है तो ये महिलाएं उन लोगों की निशानदेही करती हैं जो डायन हों।

सुधा अरोडा जी का एक आलेख कविता वाचक्‍न्‍वी जी ने भी पोस्‍ट किया है, जिसमें ग्रामीण महिलाओं को डायन बताकर उनके अधिकारों से वंचित करने की बात की गयी है।.

वर्षा जी संतरे की एक फांक के सहारे हमारे जीवन में फैले अंधविश्‍वास पर लिखती हैं .....
"मम्मी देखो कितनी छोटी फांक है!" वो संतरा खा रही थी और एक छोटी सी फांक पर उसकी नज़र पड़ी.
"बेटा उसे फेंक दे."
"क्यों मम्मी?"
"क्योंकि ऐसी फांक खाने से.. तेरे पापा को भगवान् ले जाएगा."
"अरे ऐसा क्यों होगा? कहाँ लिखा है ऐसा? ये भी कोई बात हुई कि छोटी फांक खाने से पापा .."
"अब है तो है..मत खा उसे."
उसने फांक छोड़ दी. आठ साल की थी वो. अंधविश्वास से बहुत अधिक पाला नहीं पड़ा था, मन नहीं मान रहा था पर जहां पापा कि ज़िन्दगी का सवाल था वहाँ रिस्क लेने की भी हिम्मत नहीं थी.
धीरे धीरे बड़ी हुई. बहुत से ऐसे अंधविश्वासों की उसने धज्जियां उड़ा दीं. बिल्ली रास्ता काट जाती तो वो और खुश होकर आगे बढती. नाखून काटने की याद उसी दिन आती जिस दिन मंगलवार होता. शनिवार को दुनिया भर की शौपिंग करती (शनिवार को नयी चीज़ें खरीदने से मना किया जाता है खासकर धातु की पर उसकी समस्या ये थी की पूरे सप्ताह में वही दिन होता था जब थोडा वक


इतना ही नहीं , अंधविश्‍वास के कारण सुबह गांव का नाम ही बदल दिया जाता है .. सिसवन में हर सुबह बसता है एक बेगूसराय सिसवन (सिवान): विज्ञान की तेज गति ग्रामीण क्षेत्रों में प्रचलित टोटकों के आगे कभी-कभी धीमी लगती है। सिवान के सिसवन प्रखंड के घुरघाट गांव में ऐसा हीं दिखता है। यहां के लोग सुबह में अपने गांव का नाम नहीं बताते। इसके पीछे यह मान्यता है कि नाम बताने से उस दिन के लिए उनका भाग्य बिगड़ जाएगा। जरूरत पड़ने पर अगर सुबह में गांव का नाम बताना पड़े, तो ग्रामीण 'घुरघाट' के बदले 'बेगूसराय' कह काम चलाते हैं।
गांव में मान्यता है कि अगर प्रात:काल में ग्रामीण इसका नाम लें तो उनका बना काम भी बिगड़ जाएगा। ग्रामीणों के अनुसार इससे व्यवसाय में घाटा, दुर्घटना, मृत्यु या किसी अन्य परेशानी आदि से सामना होता है या इसके समाचार मिलते हैं। गांव के चंद्रिका लाल शर्मा के अनुसार इस कारण वे व्यवसाय में घाटा भोग चुके हैं। ग्रामीण संतोष शर्मा की मानें तो एक सुबह इस गांव का नाम लेने के कारण वे एक झूठे मुकदमें में फंस गए थे।

जाकिर अली रजनीश जी तो अपने ब्‍लॉग में समाज में फैले अंधविश्‍वास पर गहरी चिंता व्‍यक्‍त करते हैं ......
जी हाँ, यह कोई कल्पना नहीं, शान्ति नगर, कायमगंज, फर्रूखाबाद, उ0प्र0 की सत्य घटना है, जिसमें शान्ति नगर मोहल्ले के निवासी तेजवीर राठौर ने अपने 12 वर्षीय पुत्र को ठीक करने के लिए एक तांत्रिक को सौंप दिया था। वह तांत्रिक बच्चे को ठीक करने के नाम पर बंधक बनाकर चिमटी के उसके शरीर का मांस नोचता था और देवताओं को चढ़ाता था। गत तीन माह से बच्चा इस अत्याचार को सह रहा था। लेकिन एक दिन जैसे ही उसे मौका मिला, वह तात्रिक के घर से भाग निकला। बच्चे ने बताया कि मकान नं0 6, गली नं0 8, मोहल्ला कलवला, फिरोजाबाद, उ0प्र0 का निवासी तांत्रिक नवमी के दिन उसकी बलि चढ़ाने वाला था।
इसके अतिरिक्त लखीमपुर खीरी में एक किसान द्वारा अपनी संतान की भलाई के लिए पड़ोस की लड़की की बलि चढ़ाने का मामला, गाँव पूरे कुर्मिन, मजरे सेमरी रनापुर, थाना ऊंचाहार, रायबरेली, उ0प्र0 में एक तांत्रिक के कहने पर जिन्न उतारने के नाम पर एक युवक द्वारा अपनी सगी भागी को पटक-पटक कर मार डालने की घटनाएं भी अभी हमारे दिमाग में गूँज रही हैं। इसके अलावा इसी सप्ताह में लखनऊ की मोहनलालगंज तहसील के गौरा गाँव में फैले दिमागी बुखार को ठीक कराने के लिए झाड़ फूँक का सहारा लिये जाने की घटना भी पढ़ने सुनने में आ ही रही हैं, जबकि वहाँ पर दिमागी बुखार के कारण पहले ही दो औरतों की मृत्यु हो चुकी है।

विवेक रस्‍तोगी जी (ये कल्‍पतरू वाले नहीं हैं) चिंतित हैं कि किसी तांत्रिक के सुझाव पर, अमीर बनने के लिए अपनी ही सिर्फ 11 साल की मासूम बेटी से बलात्कार करने, और फिर सालों तक करते रहने की यह खबर कुछ ज्यादा ही विचलित कर देती है अंतस को... सोचकर देखिए, कोई भी बच्चा कैसी भी परेशानी का सामना करते हुए स्वाभाविक रूप से सबसे पहले मां या बाप की गोद में सहारा तलाश करने के लिए भागता है, लेकिन ऐसे मां-बाप हों तो क्या करे वह मासूम...?
एक बेटी के साथ सालों तक यह घिनौना कृत्य होते रहने के बावजूद जब अमीरी ने घर में दस्तक नहीं दी, तो भी उनकी आंखें नहीं खुलीं और दूसरी बेटी के साथ भी वही सब किया गया... और यही नहीं, इस बार मां-बाप ने तांत्रिक को अपनी 15-वर्षीय बेटी की इज़्ज़त से खेलने दिया... इतना अंधविश्वास... तरक्की करते हुए कहां से कहां आ गया हिन्दुस्तान, लेकिन लगता है कि अंधविश्वास की जड़ें मजबूत होती चली जा रही हैं...

अयबज खान जी कहते हैं कि राजस्थान के प्रतापगढ़ में भेरूलाल नाम के एक शख्स को सपना आया, जिसमें उसने एक घोड़ा और उसके पैरों के निशान देखे। सपने में उसके देवता रामदेव ने उसे गांव में मंदिर बनाने का आदेश भी दिया। भेरूलाल ने सुबह उठते ही गांववालों को इस सपने के बारे में ख़बर दी, सपने के मुताबिक उसे गांव में ही एक छोटा सा घोड़ा और उसके पैरों के निशान भी मिल गये।
बस फिर क्या था, भेरूलाल और गांव वाले फटाफट मंदिर बनाने में जुट गये। लेकिन जैसे ही ये ख़बर जंगल में आग की तरह फैली, सरकारी अमला भी गांव में पहुंच गया। लेकिन गांव वाले जिद पर अड़े थे, कि मंदिर तो ज़रूर बनाएंगे, आखिर भगवान खुद उनके द्वार पर जो आये हैं। लेकिन उस भेरुलाल को ये कौन समझाए, कि जिस सपने की बात वो कर रहा है, वो है तो ठेठ देसी, लेकिन उसके तार चाईना से जुड़े हैं। अब इन नासमझो को कौन समझाए, कि भईया ये एक छोटा सा प्लास्टिक का घो़ड़ा है, जो बच्चों के खेलने के काम आता है। और तो और उस घोड़े के पेट पर लिखा भी है मेड इन चाईना.. आगे और भी संग्रह है , जिसे आप अगली कडी में पढ सकेंगे।

ये कैसे कैसे अंधविश्‍वास 1

हिंदी ब्‍लॉगरों के काम को कम नहीं आंका जाना चाहिए , शनै: शनै: ही सही , हर महत्‍वपूर्ण विंदुओं पर वे अपनी कलम चला ही रहे हैं , देश में अंधविश्‍वास कितना हद तक फैला हुआ है , वो इनकी नजर से देखा जा सकता है। मैने तीन पोस्‍टों में इसे समेटने की कोशिश की है ...

सबसे पहले तो बात करें आज कि जिसमें खुशदीप सहगल जी भी शंकर जी के मंदिर में आते नाग की पिक्‍चर दिखाकर पूछ रहे हैं ... आपने फोटो देख लिए...

अब मेरे आप सबसे से चंद सवाल... क्या ये वाकई चमत्कार है... क्या ये फोटो वास्तविक हैं...यानि इनसे कोई छेड़छाड़ नहीं की गई है... जब कोबरा पिछली बार फोटोग्राफर के वहां रहने पर प्रकट नहीं हुआ तो इस बार भी फोटोग्राफर के वहां पहुचने पर चला क्यों नहीं गया... तमिलनाडु में कहीं ये खबर अंधविश्वास की अति की प्रवृत्ति के चलते अखबार ने अपना सर्कुलेशन बढ़ाने की गरज से तो नहीं छापी... बहरहाल, जो भी है, मुझे ई-मेल से ये फोटो-फीचर मिला तो आप के साथ बांटने की इच्छा हुई...अब आप विश्वास रखते हों या इसे अंधविश्वास मानते हो, आप अपने मत के लिए स्वतंत्र हैं...मेरा अनुरोध बस यही है कि इस पोस्ट को बस दिलचस्प ख़बर की तरह लीजिएगा..

कुछ दिन पूर्व मैने भी एक पोस्‍ट लिखा था कि समाज से अंधविश्‍वास हटा पाना बहुत ही कठिन है ....

मैं दस बारह वर्ष पूर्व की एक सच्‍ची और महत्‍वपूर्ण घटना का उल्‍लेख करने जा रही हूं। बोकारो रांची मुख्‍य सडक के लगभग मध्‍य में एक छोटा सा गांव है , जिसमें एक गरीब परिवार रहा करता था। उस परिवार में दो बेटे थे , बडे बेटे ने गांव के रोगियों के उपचार में प्रयोग आनेवाली कुछ जडी बूटियों की दुकान खोल ली थी। बचपन से ही छोटे बेटे के आंखों के दोनो पलक सटे होने के कारण वह दुनिया नहीं देख पा रहा था। गरीबी की वजह से इनलोगों ने उसे डाक्‍टर को भी नहीं दिखाया था और उसे अंधा ही मान लिया था। पर वह अंधा नहीं था , इसका प्रमाण उन्‍हें तब मिला , जब 16-17 वर्ष की उम्र में किशोरावस्‍था में शरीर में अचानक होनेवाले परिवर्तन से उसकी दोनो पलकें हट गयी और आंखे खुल जाने से एक दिन में ही वह कुछ कुछ देख पाने में समर्थ हुआ।

 उसके शरीर में अचानक हुए इस परिवर्तन को देखकर परिवार वालों ने इसका फायदा उठाने के लिए रात में एक तरकीब सोंचा। खासकर बडे बेटे ने अपनी जडीबूटियों की दुकान को जमकर चलाने के लिए यह नाटक किया। सुबह होते ही छोटा बेटा पूर्ववत् ही लाठी लिए टटोलते टटोलते गांव के पोखर में पहुंचा और थोडी देर बाद ही हल्‍ला मचाया कि उसकी आंखे वापस आ गयी है । पूरे गांव की भीड वहां जमा हो गया और पाया कि वह वास्‍तव में सबकुछ देख पा रहा है। जब लोगों ने इसका कारण पूछा तो उसने बताया कि अभी अभी एक बाबा उधर से गुजर रहे थे , उन्‍होने ही उसपर कृपा की है । उन्‍होने कहा है कि न सिर्फ तुम्‍हारी आंख ठीक हो जाएगी, तुम अब जिनलोगों को आशीर्वाद दे दोगे , वे भी ठीक हो जाएंगे।

इमरान हैदर जी इस पोस्‍ट में बताते हैं कि बडे बडे लोग भी अपने को बचाने के लिए अंधविश्‍वास की चक्‍कर में आ जाते हैं भ्रष्ट्राचार के कई मामलों से घिरे जरदारी एक बार फिर अंधविश्वास के चलते मुसीबत में घिरते नज़र आ रहे हैं। राष्ट्रपति बनने के बाद से जरदारी ने खुद को बुरी नज़र से बचाने के लिए 500 से भी ज्यादा काले बकरों की बलि दे दी है। जरदारी रोज़ सुबह एक काले बकरे की बलि देते है ताकि वे किसी भी तरह की बुरी नज़र और जादू से बच सके। इतना ही नहीं इस अंधविश्वास के चलते जरदारी सिर्फ ऊंट और बकरी का ही दूध पीते हैं। ऐसा नहीं है कि इस अंधविश्वास की चपेट में सिर्फ जरदारी ही शामिल हों पूरी दुनिया में ऐसे कई राजनेता और विश्व प्रसिद्ध हस्तियां हैं जिन्होंने खुद को इस तरह के तमाम अंधविश्वासों में खुद को लपेट रखा है। इन हस्तियों के बारे में जानने से पहले एक नज़र ड़ालते हैं कौन से ऐसे टोटके हैं जिन्होंने पूरी दुनिया को दहशत की चपेट में ड़ाल रखा है।

बिल्ली के रोने की आवाज- परेशानी आने की सूचना मिलना।
-काम पर जाते समय छींकना- काम न बनना।
- पूजा करते समय दीपक बुझना- अपशगुन होना।
- खाने में बाल आना- किसी परेशानी में आना।
- रोटी का बार-बार मुड़ना- किसी अपने का याद करना।
- छत पर कौवे का बोलना- मेहमान के आने की सूचना।
और भी ना कितने तरह के टोटके हैं जिनसे लोग डरते हैं। पूरी दुनिया में एक नज़र डाले तो तमाम बड़े नाम किसी ना किसी शकुन और अपशकुन के चलते अंध विश्वास की चपेट में रहे हैं।

दृष्टिकोण ने भी लिखा है कि आजकल टी.वी पर एक धारावाहिक के ज़रिए देश के एक सदियों पुराने अंधविश्वास को भुनाकर पैसा कमाने की जुगत चल रही है। पूर्वजन्म की यादों को वापस लाने के निहायत अवैज्ञानिक, झूठे और आडंबरपूर्ण प्रदर्शन के ज़रिए लोगों में इस बचकाने अंधविश्वास को और गहरे तक पैठाने की कोशिश की जा रही है। यह कहना तो बेहद मूर्खतापूर्ण होगा कि आम जनता में गहराई तक मार करने वाले एक महत्वपूर्ण मीडिया पर ऐसे अवैज्ञानिक कार्यक्रमों को प्रसारित करने की अनुमति आखिर कैसे दे दी जाती है ! यह मामला नियम-कानून, और सांस्कृतिक-सामाजिक नीतियाँ बनाने वालों की मूढ़ता का भी नहीं है। दरअसल यह तो एक सोचे-समझे ब्रेनड्रेन कार्यक्रम का हिस्सा है, जिसमें षड़यंत्रपूर्वक आम जन साधारण में वैचारिक अंधता पैदा करने, समझदारी और तर्कशक्ति को कुंद कर देने की जनविरोधी कार्यवाही अंजाम दी जाती है, ताकि लोगों का ध्यान देश की मूल समस्याओं की ओर से हटाया जा सके।



लेकिन.... इट हैपेन्स ओनली इन इंडिया। कुछ समय पहले एक रिअलिटी शोआरंभ हुआ है 'राज़..पिछले जन्म का' एनडी टी वी इमेजिन पर जहाँप्रतिभागी बड़े नाटकीय तरीके से अपने पूर्व जन्म में चले जाते हैं (यह समययात्रा से भीआगे की चीज़ है भाई) और उन्हें सब कुछ याद आ जाता है, किउनकी मृत्यु कैसे हुई, पिछले जन्म में कौन माँ बाप थे, आदि आदि। प्रेमाईसये है कि यदि आपको कोई चीज़ बेचैन करती है, किसी प्रकार का भय है, याऐसा ही कुछ तो ज़रूरइसका रिश्ता पूर्व जन्म से है। तो अब आप पूर्व जन्म मेंजाइये, अपनी वर्तमान समस्या का निश्चित कारण 'देखिये'। और वापसआइये आपकी उद्विग्नता समाप्त या कम हो जाएगी। तो जैसे ही सेलिनाजेटली कहती हैं कि उन्हें 'सोल मेट' कि तलाश है, दर्शक समझ जाता है किज़रूर पूर्व जन्म में इनका कोई ब्रेक अप हुआ था। वाह वाह।जबकि उसके ही एक नियम 'Cable Television Network Rules, 1994 (Rule 6-1-j) के तहत अंधविश्वास फैलाना जुर्म है।



डॉ श्‍याम गुप्‍ता जी भी परेशान है कि समाचार पत्र अंधविश्‍वासों को हवा दे रहे हैं ...
समाचार पत्र व उनके सम्पादक गण जरा सोचें कि उनके पत्र में छपे ये विज्ञापन किस हद तक समाज़ में व्याप्त अन्धविश्वासों जो बढावा देते हैं? जब तक हम, सारा जनसमुदाय, एवं उसके साथ समाज का प्रहरी, जन् तन्त्र का चौथा खम्बा, अपनी व्यवसायी मानसिकता छोडकर,इसे विज्ञापनों, आलेखों (चाहे वे कितने ही आकर्षक व सम्मानित लेखकों के हों), को छापने से इन्कार करने का साहस नहीं जुटायेंगे ये मुहिम तेज व धार दार नहीं हो पायेगी।



प्रज्ञा प्रसाद जी कहती हैं कि अंधविश्‍वास में घिरे मा बाप पर बच्‍चों के कष्‍ट का भी कोई प्रभाव नहीं पडता है , पढिए ...

आपने भी देखा होगा चैनलों पर कि किस तरह कर्नाटक के गुलबर्गा में मासूमों पर जुल्म ढाया जा रहा था... और ये कोई नई बात नहीं है... पिछले साल भी जुलाई में बच्चों को गले तक ज़मीन में गाड़ दिया गया था... उस वक्त भी बहस हुई थी... लेकिन नतीजा कुछ नहीं निकला... इस बार भी बच्चों को गले तक ज़मीन में दबा दिया गया... इन बच्चों में विकलांग बच्चे भी शामिल थे... अंदाज़ा लगाइए कि किस तरह करी साढ़े ३ घंटे इन बच्चों ने रोते-बिलखते, भूखे-प्यासे गुज़ारे होंगे... लोग दोष दे रहे हैं व्यवस्थआ को, प्रशासन को... लेकिन मैं तो कहती हूं कि इसमें सबसे बड़ा दोष करीब ९९ प्रतिशत दोष माता-पिता का है।



अभिषेक प्रसाद जी भी बात लोगों के विश्वास की – अंधविश्वास की देखकर आश्‍चर्य करते हैं ...
अब हुआ यूँ कि मेरी तबियत खराब हुई तो माँ ने अपने इलाज भी शुरू कर दिए. पहुँच गयी एक jewelry shop और बनवा लायी मेरे लिए सोने का हनुमान (अब उसका मूल्य नहीं बताऊंगा, भाई किसी ने अगवा कर लिया मुझे तो?). हाँ तो जैसा कि माँ ने मुझे बताया कि इस लोकेट को पहनने से मेरी सारी तकलीफें दूर हो जाएँगी. हुआ भी कुछ ऐसा ही 3 दिनों के बाद ही मैं क्रिकेट खेलने लायक हो गया. अब देखिये 7 दिनों से doctor uncle की दवा खा रहा था पर ठीक हुआ हनुमान जी की कृपा से. धन्य हो प्रभु, धन्य हो.
अब ये चमत्कार हुआ तो, पर मैं विश्वास ही नहीं कर पा रहा. कर भी नहीं सकता. जब भगवान नाम की किसी चीज़ पर विश्वास नहीं तो इन सब बातों पर विश्वास का सवाल ही उत्तपन नहीं होता ।



हमारे गांव में एक मकान को भूतहा माना जाता था , जो भी किराएदार वहां रहते , असामान्‍य घटनाओं की चर्चा करते रहते थे। अंत में वह मकान एक पुलिस अफसर को मिला , उन्‍होने कभी भी ऐसी बातें न की , तो गांव के शिक्षितों को महसूस हुआ कि भूत प्रेत वाली बातें बेमानी है , हालांकि बहुत गांववाले यही मानते रहें कि भूत उन्‍हें भी परेशान करता होगा , पर वे अपनी प्रतिष्‍ठा को बनाए रखने के लिए इस बात का खुलासा नहीं कर रहे हैं , पर इस समाचार में देखिए पुलिस भी अंधविश्‍वास में पडी है।




और लोगों की बातें क्‍या की जाए , जब धर्म और मानवता की रक्षा करने वाले एक पुजारी ने तो काली जी के मंदिर में अपना सर ही काट डाला दो वर्ष पूर्व काली माता को चढ़ाई थी जीभ... जबलपुर,। अंधविश्वास के कारण व्यक्ति अपने अनमोल जीवन के साथ खिलवाड़ करते हैं। ऐसी ही एक घटना आज सुबह समीपवर्ती कटनी जिले के ग्राम स्लीमनाबाद में घटित हुई जहां काली माता के एक उपासक ने मंदिर के अंदर अपना सिर काट लिया। पुजारी को गंभीर अवस्था में उपचार के लिए जबलपुर स्थित शासकीय मेडिकल कॉलेज अस्पताल लाया गया है। पुजारी ने लगभग दो वर्ष मां काली को जीभ काटकर समर्पित की थी। कटनी के पुलिस अधीक्षक मनोज शर्मा से प्राप्त जानकारी के अनुसार स्लीमनाबाद निवासी जय कुमार जायसवाल मां काली के उपासक हैं। लगभग दो वर्ष पूर्व उन्होंने अपनी जीभ काटकर मां काली को समर्पित कर दी थी। आज सुबह लगभग 5 बजे जयकुमार ग्राम स्थित मां काली के मंदिर पहुंचे। पूजा अर्चना के बाद उन्होंने तलवार से अपनी गर्दन काट ली।


वैज्ञानिक युग में भी लोग अंधविश्वास में किस तरह जकड़े हुए हैं, इसका उदाहरण यहां देखने को मिला। शहर के प्राचीन मंदिर महेश्वरी देवी में एक युवक ने ब्लेड से अपनी जीभ काटकर चढ़ा दी। पुलिस ने युवक को गंभीर हालत में जिला अस्पताल में भर्ती कराया है।सोमवार दोपहर लगभग 3 बजे कमासिन थानाक्षेत्र के ग्राम लाखीपुर पोस्ट बंथरी निवासी मुकेश कुमार पुत्र रामगुलाम महेश्वरी देवी मंदिर पहुंचा। वहां मौजूद लोग जब तक कुछ समझ पाते उक्त युवक ने जेब से ब्लेड निकाला और जीभ का अगला हिस्सा काटकर मूर्ति की तरफ उछाल दिया। युवक के मुंह से खून का फौव्वारा छूट पड़ा जिससे लोग अवाक रह गये। वहां मौजूद पुजारी दिनेश कुमार ने तुरंत पुलिस को सूचना दी। मौके पर पहुंची पुलिस ने खून से लथपथ युवक को जिला अस्पताल में भर्ती कराया, अगली कडी में और बातें भी जानने को मिलेंगी कल इसी वक्‍त।

आखिरकार पुलिस ने मुझे ढूंढ ही लिया !!

अपने जीवन की सब सुख सुविधा छोडकर अपने चिंतन के प्रति समर्पित होकर ही कोई लेखक लेखन की निरंतरता बना पाता है। उसका लक्ष्‍य अपने अनुभवों और विचारों का समाज में बेहतर प्रचार प्रसार ही होता है , क्‍यूंकि एक प्रतिशत से भी कम मामलों में ही आर्थिक आवश्‍यकताओं की पूर्ति लेखन के माध्‍यम से हो पाती है। पर जहां कुछ लोग लेखक के विचारो और अनुभवों की कद्र करते हैं , वहीं समाज में विपरीत मानसिकता रखनेवालों के द्वारा लेखकों का विरोध भी देखने को मिल जाता है। 

ऐसे समय में कभी कभी लेखन से विरक्ति सी भी हो जाती है , पर कोई न कोई सुखद घटना फिर आत्‍मविश्‍वास को जन्‍म देते हुए नए जज्‍बे के साथ चिंतन मनन को बाध्‍य करती है और हर किसी को अपने कर्तब्‍य पथ पर बनाए रहती है। बाजार में किसी लेखक के लेखों , उनके पुस्‍तकों के प्रकाशित होने के साथ ही साथ ऐसे पाठक जन्‍म ले लेते हैं , जो एक नई दृष्टि से हर कार्य को , हर परिणाम को , हर घटना को देख सके। पाठकों की संख्‍या में बढोत्‍तरी के साथ ही साथ लेखक का महत्‍व बढता जाता है।

मैने 1991 से ही विभिन्‍न पत्र पत्रिकाओं के लिए लिखना शुरू किया था  और बहुत जल्‍द ही मेरा लेखन एक प्रकाशक की नजर में आ गया था। इसके कारण 1996 में ही एक पुस्‍तक बाजार में आ गयी थी , दो वर्षों के अंदर ही इसकी सारी प्रतियां बिक चुकी थी और 1999 में ही इसके दूसरे संस्‍करण को प्रकाशित करने के लिए मुझे हस्‍ताक्षर करना पडा था। उस पुस्‍तक में मैने शीघ्र ही बाजार में दूसरी पुस्‍तकों के लाने और पाठकों से संवाद बनाए रखने का वादा किया था , पर कुछ न कुछ समस्‍या के कारण इतने दिनों के उपरांत भी बाजार में मेरी या मेरे पिताजी की कोई पुस्‍तक नहीं आ सकी थी। चार वर्ष पूर्व तक पाठकों ने मेरे पते पर संपर्क भी किया था , पर इधर तीन वर्षों से पता बदलने की वजह से वे संवाद भी नहीं कर पा रहे हैं। ऐसी स्थिति में मेरी अगली पुस्‍तक के इंतजार कर रहे मेरे एक पाठक महोदय को पिछले दिनों मुझे ढूंढने के लिए पुलिस का सहारा लेना पडा।

मेरी उक्‍त पुस्‍तक में बोकारो , बिहार का पता लिखा था , दरभंगा (बिहार) के डी आई जी साहब उनके परिचित थे , उन्‍होने मेरी खबर लेने के लिए उनसे संवाद किया। बोकारो अब झारखंड में है , उन्‍होने बोकारो के एस पी साहब को खबर भेजा , इतने बडे बोकारो में भी मेरा पता लगाना आसान नहीं था , पर पुस्‍तक में मेरे जन्‍मस्‍थान पेटरवार के बारे में दी गयी जानकारी से पुलिस को एक सूत्र मिला। एस पी साहब ने पेटरवार के थाना इंचार्ज को खबर की , वहां उन्‍हें मेरे पिताजी को फोन नंबर मिला। और इस तरह आखिरकार पुलिस ने मुझे ढूंढ ही लिया । 

पर इतना सब होने के बाद भी मुझे ये मालूम न हो सका कि मुझे ढूंढा क्‍यूं जा रहा है। पापा जी के पास कई फोन आने के बाद अंत में सारा माजरा खुलकर सामने आया , पापाजी से उनकी मीटिंग भी तय हो गयी है। उनका मुझसे अभी तक संवाद नहीं हो सका है , पर मेरे ब्‍लॉग का पता भी उनके पास चला गया है। हो सकता है , एक दो दिनों में मेरे पास उनका मेल भी आ जाए। एक सीख तो मिल ही गयी है , अच्‍छा करते रहो , अच्‍छा सोंचते रहो , अच्‍छा लिखते रहो , देखने सुनने पढने वाले मिलते रहेंगे।

ज्‍योतिष की वैज्ञानिकता पर प्रश्‍नचिन्‍ह

गिरीश बिल्‍लौरे 'मुकुल' जी द्वारा लिए गए मेरे इंटरव्‍यू वाले पोस्‍ट में दो प्रकार की ग्राफ की भी चर्चा की गयी है , जो उनके जन्‍म विवरण के आधार पर 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' के सिद्धांतों पर आधारित मेरे स्‍वयं के द्वारा विकसित किए गए सॉफ्टवेयर से निकाला गया है। मुकुल जी ने स्‍वीकारा है कि उनके जीवन के सभी पक्षों और उनके जीवन भर के उतार चढाव को दिखाते इन ग्राफों की सत्‍यता 90 प्रतिशत से अधिक मानी जा सकती है। 

इनके अलावे हिंदी ब्‍लॉग जगत से जुडे कई पाठकों को भी मैने ऐसे ग्राफ भेजे हैं , जिन्‍होने भी इसकी सत्‍यता को स्‍वीकारा है , पर कुछ को ये ग्राफ समझने में दिक्‍कत भी हुई है। मेरे पास जितने लोगों ने जन्‍म विवरण भेजे हैं , उनका काम काफी दिनों से पडा है , उनको भी क्रमश: ये ग्राफ भेज रही हूं। सबो को अलग अलग न समझाना पडे , इसी कारण मै इन ग्राफो का विश्‍लेषण इस पोस्‍ट में करने जा रही हूं।

'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' के सूत्रों के आधार पर मैने  'प्रीडेस्‍टीनेशन' नामक अपना साफ्टवेयर विकसित किया है , जिसमें इनपुट के तौर पर किसी की जन्‍मतिथि , जन्‍म समय और जन्‍म स्‍थान डाला जाए , तो कुल मिलाकर पंद्रह पन्‍नों में उसकी जन्‍मकुंडली , विभिन्‍न प्रकार के चार ग्राफ और आपके ग्राफ के अनुसार ही घटनेवाली सामान्‍य बातों का जिक्र होता है। 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' की धारणा है कि 'प्रीडेस्‍टीनेशन' यानि 'पहले से तय' सबकुछ नहीं होता , मनुष्‍य की कुछ विशेषताएं , विशेष संदर्भों का सुख दुख और जीवन में आने वाले कुछ उतार चढाव ही 'पहले से तय' होते हैं। 

मनुष्‍य की उन विशेषताओं ,विशेष संदर्भों के सुख दुख और जीवन में आने वाले नियत उतार चढावों को पहचान लेने के कारण ही 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' को सिर्फ सांकेतिक विज्ञान कहा जा सकता है। इसके अतिरिक्‍त मनुष्‍य अपने जीवन में बहुत कुछ युग के हिसाब से और बहुत कुछ अपनी मेहनत से भी प्राप्‍त कर सकता है। यही कारण है कि भविष्‍यवाणियों वाले पन्‍नों पर अनुभव  के आधार पर प्रतिदिन कुछ न कुछ बदलाव हो रहे हैं और युग युगांतर तक थोडा बहुत चलेगा ,क्‍यूंकि समय और परिस्थिति के अनुसार ग्रहों के प्रभाव की तीव्रता घटती बढती रहती है। मेरे सॉफ्टवेयर से निकलने वाले चारो ग्राफ निम्‍न प्रकार के होते हैं ......



इस ग्राफ में काली रेखा आपकी सुखात्‍मक और दुखात्‍मक परिस्थितियों और आपके मनोभावों को दर्शाता है , जिसका आपके रहन सहन और स्‍तर से कोई संबंध नहीं होता। यह मात्र आपके आराम दायक और मनोनुकूल माहौल को दर्शाता है , यह जिन वर्षों में ऊपर जाएगा , आपकी परिस्थितियां सुखद बनी रहेंगी , इसके विपरीत जिन वर्षों में नीचे जाएगा , परिस्थितियों में कुछ कष्‍ट आता जाएगा। जिन वर्षों में लाल रेखा काली रेखा से ऊपर जाएगी , आप परिस्थितियों से संतुष्‍ट रहेंगे तथा जिन वर्षों में लाल रेखा काली रेखा से नीचे जाएगी , आप परिस्थितियों से असंतुष्‍ट रहेंगे।


दूसरा ग्राफ आपकी महत्‍वाकांक्षा , आपके स्‍तर और आपकी सफलता को दर्शाता है। इस ग्राफ में काली रेखा जिन वर्षों में नीचे रहेगी , आपकी महत्‍वाकांक्षा और उसके अनुसार आपकी कार्यक्षमता कम होगी , लेकिन जिन वर्षों में काली रेखा ऊपर जाएगी , दायित्‍वों का बोध होने के साथ ही साथ आपकी महत्‍वाकांक्षा और कार्यक्षमता बढती जाएगी। काली रेखा से लाल रेखा के ऊपर होने का अर्थ है कि आप अपनी महत्‍वाकांक्षा और कार्यक्षमता से अधिक सफलता प्राप्‍त कर रहे हैं , जिन वर्षो में काली रेखा से लाल रेखा नीचे हो , उन वर्षों में आप अनुमान से कम सफलता प्राप्‍त करेंगे। आश्‍चर्य की बात तो ये है कि पहले और दूसरे प्रकार के ग्राफ के लिए सिर्फ आपके जन्‍म तिथि की आवश्‍यकता पडती है। पर तीसरे और चौथें प्रकार के ग्राफ के लिए जन्‍म तिथि के साथ ही साथ जन्‍म समय और जन्‍मस्‍थान की भी आवश्‍यकता पडती है। 



तीसरा ग्राफ आपकी महत्‍वाकांक्षा के संदर्भों को दिखलाता है , आप किस मामले में कितना महत्‍वाकांक्षी हैं और उस संदर्भ के लिए अपनी कितनी ऊर्जा लगाते हैं। महत्‍वाकांक्षा और कार्यक्षमता के अनुरूप सफलता पाने से आप संतुष्‍ट रहा करते हैं या महत्‍वाकांक्षा और कार्यक्षमता के अनुरूप सफलता न प्राप्‍त कर पाने से असंतुष्‍ट , इसका अंदाजा भी इस ग्राफ से हो जाता है।



चौथा ग्राफ आपके सुखदायक संदर्भों को दिखलाता है , प्रकृति ने आपको किन संदर्भों की कितनी सुख सफलता दी है। इनको अनायास ढंग से पाने या कष्‍ट झेलने के बाद भी आप इनसे संतुष्‍ट रहते हैं या असंतुष्‍ट बने हुए हैं , इसका अंदाजा इस ग्राफ से मिल जाता है।

अपने जन्‍म के समय आसमान में स्थित ग्रहों के प्रभाव को दर्शाते ये चारो ग्राफ किसी को भी आत्‍म ज्ञान करवाने में सफल हैं , हर व्‍यक्ति अपने अनुकूल समय और संदर्भों पर अपनी अधिक से अधिक ऊर्जा लगाकर और प्रतिकूल समय और संदर्भों की उपेक्षा कर शांतिपूर्ण जीवन जीने में सफल हो सकते हैं । यदि आपकी उम्र भी 25 वर्ष से अधिक की है और आप चारो प्रकार के ग्राफ पाने की चाहत रखते हैं , अपने जीवन को समझना चाहते हैं , तो अपने जन्‍म विवरण हमें ईमेल के द्वारा भेज दें। जिन्‍होने अपना जन्‍म विवरण पहले भेजा है , वे भी दुबारा याद करा दें , तो उन्‍हें चारो ग्राफ भेजे जा सकते हैं। लेकिन सिर्फ अपना जन्‍म विवरण ही भेजें , किसी दूसरे का नहीं । मेरा दावा है कि इन ग्राफो को प्राप्‍त करने बाद ज्‍योतिष की वैज्ञानिकता के प्रति किसी को संदेह नहीं रह जाएगा।

मेरे परिवार का नाम पुराण !!

कहा जाता है नाम में क्‍या रखा है ? अरे नाम में ही तो सबकुछ रखा है , लोगों के कर्म , लोगों के विचार , लोगों की कल्‍पना , सब नाम में ही तो छुपी होती है। इसलिए परिवार के लोगों के नाम से ही आप उनके परिवार की मानसिकता , उनके संस्‍कार को समझ सकते हैं। इस दृष्टि से देखा जाए , तो भारतवर्ष में नाम रखने के इतिहास से ही हमारी सभ्‍यता और संस्‍कृति के विकास का पूरा पता चल जाएगा। 

हिंदू धर्म में न तो ईश्‍वर की कमी है और न इनके नामों की , यही कारण है कि पहले ईश्‍वर के नाम पर लोगों के नाम रखे जाते थे, दूसरी बात कि ईश्‍वर के अलावे नाम रखने के लिए और बहुत शब्‍द नहीं थे , महीने , दिनों , तिथियों से लेकर पहर तक का उपयोग नाम रखने में किसी जाता था। प्राचीन काल में सारे बच्‍चों के नहीं तो कम से कम अपने एक दो बच्‍चे का नाम तो लोग भगवान का रखते ही थे।  इसके पीछे एक सोंच थी कि बच्‍चे के बहाने तो कम से कम वे ईश्‍वर के नाम जप सकेंगे। 

इतना ही नहीं , दुख दर्द में या मृत्‍यु से पहले बेटे को भी पुकारा तो अनायास ईश्‍वर का नाम लिया जा सकेगा।  लेकिन आज लोगों को उसकी कोई चिंता नहीं , बुरे वक्‍त में ईश्‍वर के नाम पर वे लूटे जा सकते हैं , पर अच्‍छे वक्‍त में उसकी सत्‍ता को भी स्‍वीकारने में उन्‍हें अपनी प्रतिष्‍ठा खोने का भय होता है।

इस लेख में अपने परिवार के लोगों के नाम से मैं भारतवर्ष के बहुत सारे परिवार के बदलते विचारों , बदलती मानसिकता पर प्रकाश डाल रही हूं। मेरे दादाजी तीन भाई थे , तीनों के नाम थे ... 'वंशीधर' , 'मुरलीधर' और 'जगदीश'। इनके नाम से उस युग के अनुरूप उनके माता पिता की धार्मिक भावना को स्‍पष्‍टत: समझा जा सकता है। 'स्‍वर्गीय वंशीधर महथा जी' के पांच पुत्र और एक पुत्री थी , जिनमें से तीन पुत्रों और एक पुत्री का नाम भी ईश्‍वर के नामों का अनुकरण करते हुए दिया गया था .. 'शिवनंदन' , 'दीनानाथ' , 'रामलोचन' और 'गौरी'। पर चौथे पुत्र में ही फैशन की थोडी हवा लग गयी थी और उनका नाम 'अनिल' रखा गया। पांचवे पुत्र के समय उन्‍हे गुण ज्ञान की महत्‍ता का अहसास हुआ होगा , जिसके कारण उनका नाम 'ज्ञानेश्‍वर' रखा गया।

मेरे दादा जी 'स्‍वर्गीय मुरलीधर महथा जी' के भी पांच पुत्र और एक पुत्री हुई , बडे पुत्र के जन्‍म के वक्‍त साधु गुण वाले व्‍यक्ति को ईश्‍वर से कम दर्जा नहीं होने की बात मन में आयी होगी , तभी तो उनका नामकरण 'साधु चरण' किया गया। पर उसके तत्‍काल बाद विद्या और बुद्धि की महत्‍ता समझ में आयी होगी , जिसके कारण उनसे छोटे दोनो भाई बहनों का यानि मेरे पिताजी और बुआजी का नाम 'विद्या सागर' और 'बुद्धिमति' रखा गया। 

पर विद्या और बुद्धि से क्‍या होता है ? देश गुलाम था , उसे आजाद करने के लिए चाहे लाख प्रयास हो रहे थे , प्रयास करने वालों को तो जेल भेजा जा रहा था , ऐसी स्थिति में देश की आजादी के लिए ईश्‍वर पर भी विश्‍वास किया जाना आवश्‍यक था। इसलिए जेल में चिंतन में मग्‍न मेरे बडे दादा जी ने मेरे चाचाजी का नामकरण 'रामविश्‍वास' किया। उसके बाद के उनके जेल में रहते हुए जन्‍मलेने वाले चौथे भाई 'रामविनोद' और स्‍वतंत्र भारत मे जन्‍म लेने वाले पांचवे भाई 'रामचंद्र' हुए। छोटे दादाजी के तीनो बेटों के नाम भी 'शंकर' , 'भोला' और 'कैलाश' ही रखे गए। इस तरह उस पीढी तक के नामकरण में ईश्‍वर को काफी महत्‍व दिया गया।

दूसरी पीढी में फैशन का पूरा दौर शुरू हो गया था , हालांकि ईश्‍वर की उपेक्षा यहां भी नहीं की जा सकती थी। हमारे परिवार की दोनो बडी पोतियों का नाम 'भारती' और 'आरती' रखा गया था। हमारे घर के पहले पोते को भले ही पप्‍पू के नाम से पुकारा जा रहा हो , पर धार्मिकता और आधुनिकता दोनो को समावेश करते हुए मेरे चाचा जी ने उसका नाम 'परितोष चंद्र चंद्रशेखर' रखा , इसी प्रकार दूसरे भतीजे का नाम 'गिरीन्‍द्र कुमार गिरीश' और तीसरे भतीजे का नाम 'अमर ज्‍योति अवनीश कुमार' रखा गया। 

तीनो नाम रखने वाले मेरे तीसरे चाचाजी की प्रतिभा का कायल तो सब थे , पर विद्यालय में नाम लिखवाते वक्‍त उस नाम में से कुछ हिस्‍सा कटना ही था। तीनो नाम कटकर बडे पापा जी के दोनो बच्‍चों का नाम 'परितोष कुमार' 'गिरीश कुमार' तथा मेरे भाई का नाम 'अमर ज्‍योति'  रह गया। बडे पिताजी के छोटे बेटे का नाम 'अनूप' क्‍यूं पडा , इसके बारे में कभी कोई चर्चा सुनने को नहीं मिली।

भले ही मेरे परिवार में मेरे नाम 'संगीता' को रखने में मेरे पापाजी बॉलीवुड की किसी फिल्‍म से ही प्रेरित हुए हों , बडे भाई 'अमर ज्‍योति' का नाम भी चाचाजी की इच्‍छा के अनुरूप रखा गया हो , पर इस पृथ्‍वी के कण कण में ईश्‍वर को देखने वाले मेरे मम्‍मी पापाजी का दृष्टिकोण डिक्‍सनरी के हर शब्‍द में ब्रह्म को देखता रहा और मेरे छोटे चार भाई बहनों के नाम का आधार सिर्फ तुकबंदी रहा और इसी कारण दोनो छोटी बहनों के नाम 'कविता' और 'पुनीता' रख दिए गए।

 पहले मेरे बडे भाई के नाम 'अमर ज्‍योति' की तुकबंदी करते हुए छोटे भाइयों का नाम 'सत्‍य मूर्ति' और 'अशेष मुक्ति' रखा गया , पर बाद में इतना लंबा नाम को भी उचित न समझते हुए उनके नामों को 'अमरेश' , 'विशेष' और 'अशेष' करने का सोंचा गया। छोटे भाइयों के नाम 'विशेष' और 'अशेष' तो अभी भी हैं , पर 'अमर ज्‍योति' 'अमरेश' न हो सका।

रखे गए नाम में से किसी का सिर तो किसी की पूंछ कट जाने से मेरे चाचाजी काफी दुखी थे और बाद में उन्‍‍होने अपने किसी भी भतीजे भतीजी का नाम नहीं रखा। हां अपनी चारो बच्चियों को अपने मनोनुकूल नाम देकर स्‍वयं तो संतुष्‍ट हुए , पर उनके द्वारा किया गया बच्चियों का नामकरण सर्टिफिकेट्स तक ही सीमित रहा , उन्‍हें सबलोग पुकारू नाम से ही जानते रहें। वैसे आपको बताना आवश्‍यक है कि उनकी बेटियों के नाम 'श्रीराज राजेश्‍वरी सेठ शैलजा' , ' श्रीभावना स्‍मृति' , 'श्रीवाणी अर्चना' और 'निशांत रश्मि' है , यहां सभी श्री का मतलब 'लक्ष्‍मी' से हैं। 

हां अपने बेटे का नाम उन्‍होने भी बहुत छोटा यानि 'अव्‍यय कुमार' ही रखा है , इसे व्‍याकरण का अव्‍यय न समझा जाए , दरअसल इसके नाम को रखते वक्‍त इनकी मानसिकता खर्च में कटौती यानि व्‍यय न करने की थी। उसके बाद के चौथे चाचाजी के बच्‍चों का नाम भी पहले बच्‍चे 'रतन' की तुकबंदी से ही 'नूतन' , 'भूषण' और 'सुमन' रखे गए। आधुनिकता के साथ आगे बढते हुए छोटे चाचा जी के बच्‍चों तक आते आते नाम प्रेट्टी , मोनी , चिक्‍की हो गए।

अब मेरे परिवार की नई पीढी के सारे बच्‍चें यानि नाती नातिन और पोते पोतियों के नाम देखे जाएं , तो हमारी संस्‍कृति पर ही प्रश्‍न चिन्‍ह लग जाए। वो तो भला हो कुछ बूढे बूढियों का  जिनकी मन्‍नते पूरी होने की वजह से कहीं कहीं मां बाप दबाब में आकर ही सही , बच्‍चों के नाम रखने के लिए पूरी डिक्‍शनरी छान मारी और भगवान के अच्‍छे अच्‍छे नाम चुनकर रख लिए। 

इसके अलावे कुछ साहित्‍यप्रेमी बुजुर्गों के द्वारा हिंदी के कुछ अच्‍छे शब्‍दों को चुनकर भी बच्‍चों के नाम रखे गए , नहीं तो टिंकू , टीनू , गोलू , पुचु , बब्‍बी , सिल्‍वी , गोल्‍डी , यूरी आदि नामों ( ये नाम हमारे परिवार के बच्‍चों के हैं ) को सुनकर सोंचने को ही बाध्‍य होना पडता है कि आखिर ये बच्‍चे किस देश के वासी हैं ?