किसी अन्‍य विधा में कहां ??

पिछले आलेख में राज भाटिया जी की टिप्‍पणी मिली । उन्‍होने पूछा कि एक बात पुछनी थी कि कुंडली के क्या लाभ ओर क्या हानियां हैं।  इस बारे जरुर लिखे, हमारी बीबी कहती है कि बच्चो की कुंडली बनवा ले ? तो मै कहता हूं कि क्या लाभ ??  इस का उस के पास कोई जबाब नही, फ़िर कहती है ,  बनवाने मे क्या हानि है??  इस का जबाब मेरे पास नही, शायद आप के पास हो तो जरुर बताये।

मेरे ख्‍याल से जब प्राचीन काल में ज्‍योतिष शास्‍त्र के माध्‍यम से जन्‍मकुंडली के आधार पर बच्‍चे के भूत भविष्‍य और वर्तमान को समझने का कार्य चल रहा था , तब हमारे देश में लोग बच्‍चों के जन्‍मविवरण ही नहीं रखा करते होंगे। इसलिए प्रत्‍येक गांव में  जन्‍म लेनेवाले बच्‍चों की जन्‍मकुंडली बनाने का काम पंडितों को सिखला दिया गया होगा , क्‍यूंकि हर घर में लोग पढे लिखे नहीं होते थे और बच्‍चों के जन्‍मवि‍वरण डायरी में नोट नहीं किए जाते थे। बच्‍चों का जन्‍म भी अस्‍पताल में नहीं होता था कि उनका जन्‍मविवरण कहीं मिल पाए।

बडे बडे पंडित और ज्ञानी कभी घूमते फिरते हुए हर गांव में जाया करते ही थे , वे उनमें से कुछ महत्‍वपूर्ण व्‍यक्तियों , जिसमें अच्‍छे और बुरे हर प्रकार के लोग आते थे , की जन्‍मकुंडली देख लिया करते होंगे। देशभर में घूमने से और महत्‍वपूर्ण लोगों की कुंडलियों को उनके अच्‍छे गुणों और दुगुर्णों से जोडने से उनके अनुभव में जो बढोत्‍तरी होती होगी , उससे वे ग्रंथ लिखा करते होंगे। इस तरह ब्राह्मण जन्‍मकुंडली को तो बनाते ही थे , कालांतर में साथ साथ विद्वानों द्वारा लिखे गए ग्रंथों में लिखे फल को भी जातक की जन्‍मकुंडली में उल्लिखित कर दिया करते होंगे।

चिन्तनशील विचारक पाठकों, आपके मन में ज्योतिष से सम्बंधित कोई भी प्रश्न उपस्थित हो , सकारात्मक तार्किक बहस के लिए हमारे व्हाट्सप्प ग्रुप में आपका स्वागत है , क्लिक करें !


पर समय के साथ साथ सामाजिक राजनीतिक स्थितियां छिन्‍न भिन्‍न हुईं , सबका जीवन जीने का ढंग बदला। कितनी महत्‍वपूर्ण पुस्‍तकें खो गयी , ब्राह्मणों की विद्या बुद्धि का ह्रास हुआ। बाद में जन्‍मकुंडली के आधार पर की जानेवाली भविष्‍यवाणियों के उतनी सटीक न हो पाने से जन्‍मकुंडली बनाना या मिलाना एक गैर जरूरी कार्य रह गया। हाल के वर्षों में तलाक के बढते दर के कारण विवाह पूर्व जन्‍मकुंडली मिलाने पर ध्‍यान जरूर दिया जा रहा है , पर जन्‍मकुंडली बनवाने या मिलवाने का काम को या उसके अनुसार अपनी जीवनशैली को बदलने को उतना महत्‍व नहीं दिया जाता। यदि कहीं ऐसा हो भी रहा है तो गुणी ज्ञानी से अधिक व्‍यावसायिक क्षमता वाले ज्‍योतिषियों के इस क्षेत्र में दखल होने से कोई फायदा नहीं दिख रहा।

पर यदि ज्‍योतिषी सच्‍चा और ज्ञानी हो तो बच्‍चे के जन्‍म के बाद ही उसकी जन्‍मकुंडली बनवाकर बच्‍चे की चारित्रिक विशेषताएं और उसकी जीवनयात्रा के बारे में अच्‍छी तरह जान लेना चाहिए, ताकि उसके जीवन में आनेवाली समस्‍याओं के प्रति पहले से तैयार रहा जा सके। पर आज अच्‍छे ज्‍योतिषी मिलते ही कहां हैं ?? किसी ज्‍योतिषी की परीक्षा लेने के लिए पहले पिता को अपनी जन्‍मपत्री ज्‍योतिषी से दिखाकर अपने बीते जीवन के बारे में पूछ लेना चाहिए। भूत को बतलाने के लिए बहुत सारे तांत्रिक ज्‍योतिषी बनकर तंत्र मंत्र का सहारा लेकर भूत की सटीक भविष्‍यवाणी करते हैं। पर वे न तो भूत की खास खास घटनाओं का वर्ष बता सकते हैं और न ही भविष्‍य की घटनाओं का समय ।

मेरे ख्‍याल से एक ज्‍योतिषी को समय विशेषज्ञ होना चाहिए , जो आपके भूत को भी सांकेतिक तौर पर ही देखता है और भविष्‍य को भी। वह बच्‍चे की जन्‍मकुंडली बनाने के दौरान बच्‍चे की चारित्रिक विशेषताओं को स्‍पष्‍ट कर देता है , जिसके कारण आप उसकी एक अलग तरह की बनावट को स्‍वीकार करते हुए , उसकी तुलना किसी और बच्‍चे से न करते हुए उसका सही पालन पोषण करें और उसका मनोवैज्ञानिक विकास ठीक ढंग से हो पाए। प्रकृति में अलग अलग तरह के इतने बीज हैं , हम उनकी बनावट पर कभी भी मुहं नहीं बिचकाते , पर बच्‍चों के बनावट की विभिन्‍नता को स्‍वीकारने में परहेज करते है , जन्‍मकुंडली के आधार पर बच्‍चों का स्‍वभाव समझ लें , तो ऐसा करने से हम बच सकते हैं। इसके अतिरिक्‍त एक ज्‍योतिषी बच्‍चे के जीवन में आने वाले उतार चढाव के बारे में पहले ही स्‍पष्‍ट कर सकता है , ताकि उसे जीवनयात्रा में किसी समस्‍या से जूझने में मदद मिल सके।

कल एक पत्रकार आरिफ जी ने भी मेल से पूछा था कि  भूत ,भविष्य और  वर्तमान  को  जानने  की  इच्छा  कब  और  किस  आयु  तक  होनी  चाहिए ? आजकल  वास्तु  ,अंक  ज्योतिष ,रेखा  गणित  या  दूसरी  विधा  में  से  कोंन  सी  सटीक  मानी जाती  है ? जिस  की  जन्म  तिथि  सही  नहीं  क्या  उसका  कोई  भविष्य नहीं  है  या  बताया  नहीं  जा  सकता ?

मैं पहले भी लिख चुकी हूं कि 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' ण्‍क घडी , टार्च और कैलेण्‍डर की तरह आपको रास्‍ता दिखाने और कार्यक्रम बनाने में मदद करता है। इनके उपयोग करने की यदि कोई सीमा है तो वही सीमा भूत ,भविष्य और  वर्तमान  को  जानने  की  आवश्‍यकता की भी मानी जा सकती है। भविष्‍य को जानने की बहुत सारी विधाएं हो सकती हैं , पर सबका अध्‍ययन एक सीमा के अंदर ही हो सकता है। पर भविष्‍य जानने के लिए एकमात्र सटीक विधा ज्‍योतिष है , जिसमें अध्‍ययन की कोई सीमा नहीं। मनुष्‍य का चरित्र , मनुष्‍य का जीवन , मनोविज्ञान , चिकित्‍सा , मौसम , राजनीति , शेयर बाजार , प्राकृतिक आपदा .... कोई भी क्षेत्र ग्रहों के प्रभाव से अछूता नहीं। हर क्षेत्र में इसका अध्‍ययन कर इसे बहुत ही व्‍यापक स्‍वरूप दिया जा सकता है, इसके बहाव को सैकडों वर्षों से अवरूद्ध करने की वजह से आज यह काम के लायक नहीं रह गया है। जिसकी जन्‍म तिथि नहीं लिखी हो , उसका भविष्‍य नहीं हो सकता , ऐसा कैसे कहा जा सकता है ??  भविष्‍य को जानने के लिए अन्‍य संकेतों का सहारा लिया जा सकता है , पर भविष्‍य की चर्चा के लिए जो बात ज्‍योतिष में है , वो भला किसी अन्‍य विधा में कहां ??
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वार्षिक पूर्वानुमान में 12 ड्रापडाउन बने हुए हैं, १२ ड्रापडाउन जीवन के किसी न किसी मामले का प्रतिनिधित्व कर रहा है। एक ही दिन देखने पर सब एक सा लगेगा, प्रतिदिन किसी एक dropdown यानि एक मामले को समझकर दिमाग में बैठाएं। फिर वे अब समझ सकते हैं कि किन्ही मामलों में 2020 का कौन सा समय अच्छा, बुरा और नार्मल रहेगा ?भविष्यवाणियों के महत्व की तीव्रता आपके सेंसिटिव मामलों के हिसाब से तय होगी। इसके अतिरिक्त जिन भविष्यवाणियों में जितना बड़ा डेट का रेंज होगा, जितना बड़ा विवरण होगा, वो भविष्यवाणी उतनी महत्व वाली होगी। आपके जीवन में जो मामले कम सेंसिटिव हों, नार्मल या छोटे विवरण वाले या छोटे छोटे समयांतराल वाले पूर्वानुमान अपेक्षाकृत कम महत्व के होंगे। इसमें एरर की संभावना बहुत मामूली होगी।

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ऐसे संयोग सबके जीवन में आते है क्‍या ??

प्रकृति में जो घटनाएं निरंतर नियमित तौर पर देखी जाती है , उसमें तो हम सहज विश्‍वास कर लेते हैं। चूकि घटनाएं किसी न किसी नियम के हिसाब से होती हैं , इसलिए इन नियमों को ढूंढ पाने की दिशा में हमं सफलता भी मिलती जाती है और इसी के कारण आज विज्ञान इतना विकसित है। पर कभी कभी कुछ घटनाएं बहुत ही विरल होती हैं , पूरे एक जीवन में किसी को एकाधिक बार दिखाई भी देती हैं , तो उसपर किसी का गंभीरता से ध्‍यान ही नहीं जाता। यदि उसका ध्‍यान गया भी तो बाकी लोग जिन्‍होने ऐसा कुछ होते नहीं देखा है , वे सहज विश्‍वास भी नहीं कर पाते हैं। इसलिए ऐसी घटनाओं की चर्चा भी नहीं हो पाती और उसके रहस्‍य का पर्दाफाश भी नहीं हो पाता , वे रहस्‍य रहस्‍य ही बने रह जाते है।


मेरे मम्‍मी , पापा और तीनों भाई काफी दिनों से दिल्‍ली में ही रह रहे हैं , इसलिए आजकल दिल्‍ली ही मायके बन गया है। गांव में कभी कभी किसी शादी विवाह या अन्‍य सिलसिले में जाने की आवश्‍यकता पडती है। तीन वर्ष पूर्व जब एक विवाह के सिलसिले में गांव गयी तो चाचाजी की लडकी गांव में ही थी , ढाई महीने के पुत्र को लेकर वह बाहर आयी , तो उसे देखकर मैं चौंकी। मुझे लगा , मैने पहले भी अपने जीवन में बिल्‍कुल उसी रंग रूप का वैसा ही एक बच्‍चा देख चुकी हूं। बच्‍चे की मां यानि मेरी वो बहन बचपन में बिल्‍कुल वैसी थी , चाची ने इस बात की पुष्टि की। बहुत देर बाद मुझे याद आया कि अगस्‍त में जन्‍म लेने वाली उस बहन को ढाई महीने की उम्र में ऊनी कपडों में लेकर नवंबर में चाची मायके से पहली बार आयी थी , तब मैने खुद से 15 वर्ष छोटी उस बहन को पहली बार देखा था , वह लडके के जैसी दिख रही थी। इस संयोग पर वहां बैठे हम सब लोग थोडी देर हंसे , फिर इस बात को भूल गए।


जब अभी पिछले महीने एक काम के सिलसिले में गांव पहुंच गयी , तो वह बहन फिर गांव में ही मिली। मैं अचानक वहां पहुंची थी , उसे लेने उसके पति भी आए हुए थे और वह शाम के ट्रेन से निकलने वाली थी , मतलब संयोग से ही मेरी उससे भेंट हो गयी। मुझे पता तक नहीं था कि उसने एक बिटिया रानी को जन्‍म दिया है , जो पूरे ढाई महीने की हो गयी है। वह बिटिया को लेकर घर के बरामदे में आयी , तो उसे देखते ही पिछली यादें फिर से ताजी हो गयी। पूरे आंगन और आस पडोस के लोग जमा थे , मैने उन्‍हें याद दिलाया तो फिर सब चौंके। दिन तो नहीं गिने , पर मैं बहन की तरह ही उसके दोनो बच्‍चों को लगभग ढाई महीने के लगभग उम्र में पहली बार देख रही थी। यह मात्र संयोग है या इसके पीछे भी कोई रहस्‍य है , मैं नहीं बता सकती। पर ऐसे संयोग जबतब मेरे जीवन में आते रहते है , आपलोगों के जीवन में आते है या नहीं ??

धर्म का असली लक्ष्‍य मानव धर्म की रक्षा होनी चाहिए !!

indian religion and culture

ब्‍लॉग जगत में सबसे अधिक बहस वाला मुद्दा हमारे धर्मग्रंथ बने हुए हैं। इनके पक्ष और विपक्ष में हमेशा तर्कों का खेल चलता रहता है। ताज्‍जुब तो इस बात का है कि न तो किसी के तर्क काटने योग्‍य होते , और न ही सहज विश्‍वास करने योग्‍य , क्‍यूंकि जो आस्तिक है , उनकी आस्‍था धर्म पर हद से अधिक है , तो जो नास्तिक है उनकी आस्‍था विज्ञान पर हद से अधिक। मेरे हिसाब से धर्म और विज्ञान में जो आधारभूत अंतर है , वो अंतर हमारी संस्‍कृति और पाश्‍चात्‍य संस्‍कृति में भी है , वह यह कि वह यह कि धर्म की दिलचस्‍पी प्रकृति के नियमों को स्‍वीकार करते हुए , उसकी रक्षा करते हुए उसके सापेक्ष जीवन जीने की खोज में होता है , जबकि विज्ञान हमेशा प्रकृति को पराजित कर लेने का दावा करता है।

indian religion and culture

इस विकासशील युग में धर्म पर आश्रित रहकर जीवनयापन करना मुश्किल है , और हम विज्ञान का सहारा लेने को बाध्‍य हैं , पर प्रकृति के सहारे जीने की बाध्‍यता तो आदिम काल से चलती आ रही है और लाख वैज्ञानिक विकास के बावजूद भी समाप्‍त नहीं हो सकती , इसलिए प्रकृति पर विजय पाने का दावा भी बेकार है। । इसके अलावे विज्ञान के अंधाधुंध और बिना सोंचे समझे किए गए विकास के कारण उत्‍पन्‍न संकट भय जरूर उपस्थित करता है और हम यह सोंचने को बाध्‍य हो जाते हैं कि इससे अच्‍छी तो हमारी परंपरागत जीवनशैली थी , जिसमें प्रकृति और मानव धर्म दोनो सुरक्षित था। पर भारतवर्ष का सनातन धर्म , जो न तो हिंदू , न मुस्लिम , न सिक्‍ख और न ईसाई है , में हमेशा स्‍वतंत्र चिंतन और मनन को स्‍थान दिया है। तभी इसमें धर्म का क्षेत्र भी हमेशा परिष्‍कृत होता रहा , इतने धर्मगुरू हुए , सभी ने समाज के हिसाब से मानव धर्म की अपनी अपनी परिभाषाएं रची।

पर जहां आज एक ओर धर्मगुरू सही मार्ग दिखाने में असमर्थ हैं , वहीं दूसरी ओर वैज्ञानिक भी लोगों को एक सही दिशा नहीं दे पा रहें। हमारा मौलिक चिंतन समाप्‍त हो गया है और हम उसे ही सत्‍य समझ बैठते हैं , जो पाश्‍चात्‍य वैज्ञानिक कहते हैं , जबकि उनका चिंतन न कभी विराट हुआ है और न होगा। पढे लिखे भारतीय उनके विकास को देखकर और अपने को खुद उसी दिशा में जाते देखकर विकास का झूठा भ्रम पाल रहे हैं। यही कारण है कि प्रकृति जोर शोर से उपद्रव मचा रही है और आनेवाले वर्षों में इसके विनाश का विकट स्‍वरूप हमें देखना होगा। मेरा यह नहीं मानना है कि जो धर्मग्रंथों में लिखा है , आज के संदर्भ में उसकी एक एक पंक्तियां सही है , हमने अपने धर्म के अनुसार ही स्‍वतंत्र चिंतन और मनन को स्‍थान देते हुए उनमें से समय के साथ अच्‍छी बातों को चुनचुनकर ग्रहण किया है और बुरी बातों को अस्‍वीकार करते आए हैं। महाकवि कालिदास ने भी कहा था .....

पुराणमित्येव न साधु सर्वं न चापि नवमित्यवद्यम् |
सन्तः परीक्ष्यान्यतरद्भजन्ते मूढः परप्रत्ययनेयबुद्धिः ||

न तो पुराना ही पुराना होने के कारण सही है , और न नया ही नया होने के कारण ग्राह्य , साधु बुद्धि के लोग दोनो की परीक्षा करके ही स्‍वीकार या अस्‍वीकार किया करते हैं। उलूल जुलूल तर्क देकर पुरानी हर बात को ही अच्‍छा मान लेना या नई हर बात को ही बुरा मान लेना उचित नहीं। धर्म के अनुसार गंगा को मां मानकर उसकी सुरक्षा करें या फिर विज्ञज्ञन के हिसाब से पर्यावरण की दृष्टि से , पर सुरक्षा के उपाय किए जाने चाहिए । यदि हम इस दृष्टिकोण को लेकर चलें , तो धर्म और विज्ञान में टकराव की कोई बात नहीं होगी। धर्म का असली लक्ष्‍य मानव धर्म की रक्षा होनी चाहिए , इस कारण समय समय पर इसका परिवर्तनशील होना आवश्‍यक है , धर्मगुरूओं को इस दिशा में सोचने की आवश्‍यकता है , न कि लकीर के फकीर बने रहने की।

आज हर स्‍तर पर अधिकारों का दुरूपयोग हो रहा है !!

दुर्गापूजा में शहर से बाहर थी , कई दिनों बाद बोकारो लौटना हुआ , इस वर्ष देशभर में दुर्गापूजा के साथ साथ कॉमनवेल्‍थ गेम्‍स की भी धूम रही। इस कार्यक्रम की सफलता ने जहां पूरी दुनिया के समक्ष भारत का सर ऊंचा किया , वहीं इस आयोजन की आड में पैसों का बडा हेर फेर मन को सालता रहा। भ्रष्‍टाचार के मामलों में हमारा देश दिन ब दिन आगे बढता जा रहा है और कोई इसे सुधारने की कोशिश न‍हीं कर रहा , बस हर कोई एक दूसरे को गाली ही दे रहे हैं। किसी की समस्‍या से दूसरे को कोई मतलब नहीं , क्‍या छोटे और क्‍या बडे , सब अपने अधिकारों का दुरूपयोग ही कर रहे हैं।

अभी हाल में ही एक काम के सिलसिले में अचानक रांची हजारीबाग जानेवाले एन एच पर ही बोकारो से 30 किमी दूर के गांव में जाने की आवश्‍कता पड गयी । परेशानी की कोई बात नहीं थी , मेरे निवासस्‍थान से आधे किमी से भी कम दूरी पर बस स्‍टॉप है , धनबाद और अन्‍य स्‍थानों से आधे आधे घंटे में अच्‍छी आरामदेह बसें रांची की ओर जाया करती हैं , मैं बिना किसी को कहे सुने आराम से तैयार होकर घर से निकल पडी। संयोग से एक बस हजारीबाग के लिए बोकारो से ही खुल रही थी , मैने कंडक्‍टर से एक टिकट बुक करने को कहा , पर जगह का नाम सुनते ही उसने कहा कि आपको सीट नहीं मिलेगी , केबिन में बैठकर जाओ, जबकि‍ उस समय बस पूरी खाली थी।

बसवाले पहले पूरी दूरी तक के यात्री को ही सीट देना चाहते थे और छोटे छोटे दूरी तक के यात्री को इधर उधर बैठाकर, खडे करके भी किराया ले लेते हैं। क्‍यूंकि यदि पूरी दूरी के यात्री न मिले , तो इनसे लाभ कमाया जा सके। मतलब दोनो हाथ में लड्डू , जबकि मालिक को सिर्फ सीट के पैसेंजर के ही किराये दिए जाते हैं , वो भी पूरे नहीं। मैने कहा,'ये क्‍या बात हुई , या तो आप वहां स्‍टॉपेज ही न रखें या फिर यात्रियों को सीट दें। यदि आपको नुकसान पहुंच रहा हो , तो स्‍पष्‍ट कहें कि अगले स्‍टॉपेज तक का किराया देने पर सीट दी जाएगी। आज के आरामपसंद युग में थोडा अधिक किराया देना मुश्किल भी नहीं।' पर उन्‍हें मेरी बात सुनने में कोई दिलचस्‍पी नहीं थी। उन्‍होने न मुझसे अधिक किराया लिया और न ही मुझे मेरा पसंदीदा आगे का सीट मिला, यह कहते हुए कि वह सीट बुक है और आपका तो मैडम बस आधे घंटे का सवाल है। उनके कहने के स्‍टाइल से लगा कि वे मजबूर हैं , पर यह देखकर आश्‍चर्य हुआ कि मेरे उतरने उतरने तक उस सीट पर कोई भी पैसेंजर नहीं बैठा।

वहां पहुंचने पर जिस सरकारी ऑफिस में मेरा काम था , वहां मुझे कुछ पुराने कागजात निकलवाने थे। मैने एक सज्‍जन से पहले ही इस बात से ऑफिसवालों को आगाह करवा चुकी थी , इसलिए वे तैयार थे। मेरे पहुंचते ही उन्‍होने पुराने फाइलों को खंगाला और बीस से पच्‍चीस मिनट के अंदर मेरे कागजात मुझे सौंप दिए। मेरे लिए कोई दो नंबर का कार्य उन्‍होने नहीं किया था , इस काम को करना उनका कर्तब्‍य था , क्‍यूंकि इसके लिए सरकार उन्‍हें हमारे ही द्वारा दिए गए कर से वेतन दिया करती है। पर मुझे यह देखकर आश्‍चर्य हुआ कि काम के होते ही वे स्‍टाफों को मिठाई खिलाने के बहाने से इशारे से कुछ पैसों की मांग करने लगें। 

मेरे मन को जो बात कचोटती रही , वह यह कि जिन्‍हें भी जो अधिकार मिल रहे हैं , वह उसी का दुरूपयोग कर रहा है और ऊपरवाले को गाली दे रहा है। मगर यदि वो ऊपर होता , तो वो भी ऐसा ही करता। वे सरकारी कर्मचारी हैं , हर महीने मासिक तनख्‍वाह मिलती है , पर जो उनके सामने होते हैं , वे कभी कभी लाचार भी होते होंगे। क्‍या ही अच्‍छा होता कि हम सामनेवाले की समस्‍याओं को भी समझते , ईमानदारी हममें कूट कूट कर भरी होती, हर स्‍तर पर जिम्‍मेदारियों का सही ढंग से पालन किया जाता। आज हम किसी को गाली देने से नहीं चूकते  , पर जब मुझे कोई अधिकार मिलता है , उसका दुरूपयोग करने लगते हैं।

ईश्वर की सत्ता में यकीन

कल आनंद सिंह जी के एक नए ब्‍लॉग क्रांतिकारी विचार में एक कविता पढने को मिली , जिसमें उन्‍होने ईश्‍वर की सत्‍ता में यकीन रखनेवाले मित्रों से एक अपील की थी ......


उनसे पूछना कि जब हीरोशिमा और नागासाकी पर
शैतान अमेरिका गिरा रहा था परमाणु बम,
तो मानवता का कलेजा तो हो गया था छलनी छलनी ,
लेकिन महाशय के कानों में क्यों नहीं रेंगी जूँ तक?

फिर उनसे पूछना कि जब दिल्ली की सड़कों पर
कोंग्रेसी राक्षस मासूम सिखों का कर रहे थे कत्लेआम,
तब यह धरती तो काँप उठी थी 
लेकिन बैकुंठ में क्यों नहीं हुई ज़रा सी भी हलचल?

उनसे यह भी पूछना कि जब गुजरात में
संघ परिवार के ख़ूनी दरिंदों द्वारा
मुस्लिम महिलाओं का हो रहा था सामूहिक बलात्कार,
तब इंसानियत तो हो गयी थी शर्मसार
पर जनाब के रूह में क्यों नहीं हुई थोड़ी भी हरकत?



मैने कल ब्‍लॉग4वार्ता में भी इस पोस्‍ट की चर्चा की थी , ताकि उन्‍हें जबाब मिल पाए। पर इतने पाठकों में से किसी से भी उन्‍हें संतुष्टि होने सा जबाब नहीं मिला। मैं ईश्‍वर की सत्‍ता में विश्‍वास रखती हूं , पर यह मानते हुए कि वह भी मनमानी नहीं कर सकता। वह भी प्रकृति के नियमों से ही बंधा है , इसलिए अधिक पूजा पाठ या कर्मकांड के कारण उसे खुश करके सांसारिक या अन्‍य प्रकार की सफलता प्राप्‍त की जा सकती है , यह हमारा भ्रम है। ऐसे कर्मकांडों को मैं महत्‍वपूर्ण मानती हूं , जब उससे समाज का या पर्यावरण का भला हो रहा हो। सामाजिक सौहार्द बिगाडने वाला , चारित्रिक रूप से कमजोर बनाने वाला और पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाला कर्मकांड मुझे बिल्‍कुल पसंद नहीं। इसलिए मेरे द्वारा दिया जाने वाला जबाब लेखक को संतुष्टि नहीं भी दे सकता, पर फिर भी अपने तर्क के हिसाब से इसका जबाब देना आवश्‍यक समझूंगी। 

एक पिता के लिए अपना संतान बहुत प्‍यारा होता है , पर उसके सही विकास के लिए डांट फटकार और मार पीट करने को भी बाध्‍य होता है। वर्ष में एक या दो दिन की डांट मार से वह या आंख दिखाने से वह पूरे वर्षभर पिता के भय से भयभीत रहता है और किसी भी गलत काम की हिम्‍मत नहीं कर पाता। उसी प्रकार समय समय पर प्रकृति को भी कुछ ऐसी व्‍यवस्‍था रखनी पडती है , ताकि इतने बडे संसार का काम सुचारू ढंग से चल सके। प्रकृति को ही कुछ लोग ईश्‍वर माना करते हैं । एक बच्‍चे के पालन पोषण में बहुत देखभाल की आवश्‍यकता होती है , यदि देखभाल के अभाव में एक दो बच्‍चे मौत के मुंह में न जाएं या अविकसित न रहें , तो बच्‍चों को ढंग से पालने की झमेले में कौन फंसना चाहेगा ??

प्रतिदिन करोडों व्‍यक्ति कहीं न कहीं आ जा रहे हैं , खतरे का काम कर रहे हैं , छिटपुट एक दो दुर्घटनाएं घटती हैं , सैकडों के जान चले जाते हैं। यदि समय समय पर ये दुर्घटनाएं नहीं हो , तो सोंचिए क्‍या होगा ?? न कोई यातायात के नियमों का पालन करे , न खुद पर नियंत्रण और न ही वाहन को सुरक्षित रखने का प्रयास। पिछले वर्ष जयपुर के पेट्रोल पंप में आग लगी थी , उस वक्‍त भी किसी नास्तिक ने ऐसा ही सवाल उठाया था। ईश्‍वर जब किसी को बुरा नहीं चाहता , तो ऐसी घटनाएं किसके अच्‍छाई के लिए घटा करती है ?? पर एक स्‍थान पर लीकेज की इस बडी घटना में भले ही अरबों का नुकसान हुआ हो , पर उसके बारे में सुनकर ही दुनियाभर के पेट्रोलवाले सावधान हो गए होंगे और उससे सौगुणे की देख रेख सही ढंग से होने लगती है।

भले ही कभी कभी निर्दोष के कष्‍ट को देखकर हम परेशान हो जाते है , पर प्रकृति में कोई भी काम बिना नियम के नहीं होते ,  उसमें से कुछ को हम समझ चुके हैं और कुछ की खोज निरेतर जारी है। । पर यदि खतरे की कोई संभावना ही न रहे , तो दुनिया में कोई भी सावधानी नहीं बरत सकेगा। इसलिए ईश्‍वर या प्रकृति जो भी करती है , उसका उद्देश्‍य शुभ हुआ करता है।  यदि प्रकृति में कोई भी काम बिना नियम के होते , तो आज विज्ञान का विकास न हो पाता। विज्ञान इन नियमों को ही तो प्रकृति के नियमों का सहारा लेकर मानव जीवन को सरल बनता है। सभी जीवों में मनुष्‍य ही ऐसा है , जो प्रकृति के रहस्‍यों को ढूंढने में समर्थ है , क्‍यूंकि उसके मस्तिष्‍क की खास बनावट है , जो उसने प्रकृति से ही पायी है।

कोई गलत काम करने से पूर्व प्रकृति की ओर से हमारे दिमाग में बार बार संदेश जाता है , 'हम गलत कर रहे हैं' , पर मनुष्‍य गलत काम करने के वक्‍त उसे दबाने की पूरी कोशिश करता है। कोई भी जीव अपनी प्रकृति के विरूद्ध काम नहीं करता , पर प्रकृति ने मनुष्‍य को अच्‍छे उद्देश्‍य के लिए जो दिमाग दिया है , उसका वही दुरूपयोग कर रहा है। जहां गल्‍ती बडी करनी होती है , वहां आत्‍मा के इस शोर को दबाने के लिए वह मदिरा का सेवन करना है , होश खोकर गलत काम किया करता है , और सारी जबाबदेही ईश्‍वर के मत्‍थे । प्रकृति या ईश्‍वर से कोई प्रश्‍न पूछने की आवश्‍यकता नहीं , आज वहीं हमसे दस प्रश्‍न पूछ सकती है।  वह उसने जितना दिया वह कम नहीं। उसे जिम्‍मेदारी पूर्वक चलाना नहीं आता , ईश्‍वर पर दोषारोपण करना तो बहुत आसान है।