बिना पानी के काटे गए वो घंटे मुझसे भूले नहीं जा रहे !!

2011 की पहली जनवरी को भले ही पूरी दुनिया नववर्ष का स्‍वागत करने और आनंद मनाने में व्‍यस्‍त हो , हमलोग खुशियां नहीं मना सकें। सुबह नाश्‍ता बनाते वक्‍त रसोई में प्रेशर कुकर के सेफ्टी वाल्‍व ने तो हमें एक दुर्घटना से जरूर बचा लिया था , पर मन को भयभीत होने से नहीं रोक सका था। वैसे ही शंकाग्रस्‍त मन में भूचाल तब आया , जब हमें गांव से हमारे पति के करीबी बाल सखा के मौत की खबर मिली। आज भी गांव जाने पर मेरे पति का पूरा समय उक्‍त मित्र के इलेक्ट्रिकल और इलेक्‍ट्रोनिक्‍स की दुकान पर ही बैठकर ही कटता था। जब पारिवारिक जबाबदेहियां अपने चरम सीमा पर होती है , वैसे वक्‍त किसी का इस दुनिया से चला जाना उसके पूरे परिवार के लिए कितना कष्‍टकारक हो सकता है , इससे हमलोग अनजान नहीं थे।

इस खबर से हमलोग परेशान चल ही रहे थे कि अचानक पडोसी ने सूचना दी कि हमारे टंकी का पानी ओवरफ्लो कर पूरी सडक को गीला कर रहा है। सप्‍लाई का पानी बंद हो चुका था , टंकी से पानी बहने की बात सुनकर हमलोग चौंककर बाहर बालकनी में आए। मकानमालिक पूरे परिवार सहित दो दिन पहले से बाहर थे और हमलोगों का काम सप्‍लाई के पानी से ही चल रहा था। सप्‍लाई का पानी ही टंकी में चढकर 24 घंटे की आवश्‍यकता को पूरा करता था। इसलिए गर्मियों में होनेवाली पानी की दिक्‍कत के लिए गैरेज में बनवायी  गयी भूमिगत टंकी के मोटर को चलाने की कोई आवश्‍यकता नहीं थी। पर उनके जाने के 48 घंटे बाद वह स्‍वयं चलने लगा था , गैरेज की चाबी न होने से हमलोग कुछ भी कर पाने में असमर्थ थे।

मकान मालिक को फोनकर सारी बातों की जानकारी दी , उन्‍होने रात को बोकारो वापस आने के लिए गाडी पकडी। मोटर और पंप चलता हुआ पूरे टंकी के पानी को समाप्‍त कर चुका था , फिर भी चलता ही जा रहा था। हम मेन स्विच ऑफ कर बिना बत्‍ती के रातभर रहने को तैयार थे , पर मेन स्विच से भी वह ऑफ नहीं हो रहा था। हमलोग रातभर अनिश्चितता के दौर से गुजरे। कहीं मोटर , पंप जल न जाएं , गर्म होकर आग न पकड लें आदि के बारे में सोचकर शंकाग्रस्‍त बने रहें। खिडकी के रास्‍ते गैरेज में एक बिल्‍ली आ जा रही थी और उसके उछलने कूदने से मोटर का स्विच ऑन हो गया था। गनीमत रही कि सुबह उनलोगों के लौटने तक मोटर चल ही रहा था , उन्‍होने आकर सबकुछ ऑफ कर दिया , तब हमलोगों को निश्चिंति हुई।

कुकर तो निर्जीव वस्‍तु ठहरी , तुरंत बाजार से बनकर आ गयी। एक मित्र को खो देने के हादसे से इन्‍हें  उबरने में कुछ समय लगना ही था , ये तो मैं समझ ही रही थी। पर अंडरगा्रउंड टंकी के पानी समाप्‍त होने के दुष्‍परिणाम को हमें दो चार दिन बाद ही गंभीर तौर पर झेलना पड गया। बोकारो में पानी के पाइपलाइन में हुई गडबडी को दूर किए जाने के लिए 7 जनवरी से ही शाम को पानी की सप्‍लाई बंद कर दिया गया। सुबह ही इतना अधिक पानी आ जाया करता था कि सारे जरूरत के बाद टंकी में भी पानी मौजूद होता। हमें शाम के पानी की आवश्‍यकता ही नहीं पडी।

पर 13 जनवरी की रात अचानक नल में पानी आना बंद हो गया , रातभर हमलोगों ने स्‍टोर किए हुए पानी से काम  चलाया। सुबह सप्‍लाई के पानी आने पर भी कुछ काम निबटाए , सप्‍लाई के पानी बंद होने पर हमलोगों ने मकानमालिक को टंकी में पानी चढाने को कहा , जब मकानमालिक ने बताया कि 1 जनवरी को हुई घटना के बाद अंडरग्राउंड टंकी में उन्‍होने पानी नहीं भरा है , तो हमलोगों के पैरों तले जमीन ही खिसक गयी। शाम को पानी की सप्‍लाई नहीं होगी , सुबह यानि 24 घंटे तक बिना पानी के रहना , बहुत बडी मुसीबत थी। रसोई में मौजूद एक बडी बाल्‍टी और स्‍नानगृह में मौजूद एक टब पानी के सहारे हमने 24 घंटे का समय काटा , इस विश्‍वास के साथ कि कल सुबह सप्‍लाई का पानी आ जाएगा। खैरियत थी कि मैं और पापाजी दो ही जन घर में मौजूद थे , आवश्‍यक काम हो गए , पर घर , बर्तन या  कपडों की सफाई तो हो नहीं सकती थी।

पर पूरे बिल्डिंग के लिए असली मुसीबत तो अभी बाकी थी , सुबह 14 जनवरी का मकर संक्राति जैसा पवित्र दिन आ गया था। इस दिन की महत्‍ता इसी से सिद्ध होती है कि यह हिंदुओं का एकमात्र त्‍यौहार है , जिस दिन महिलाओं को नाश्‍ता बनाने से छुट्टी दी गयी है , ताकि वे इस दिन के स्‍नान , दान और पूजा पाठ का पूरा फायदा उठा सके। हमलोग नल में पानी का इंतजार करते रहें , कल से ही पानी की दिक्‍कत देख कामवाली भी तीसरी बार लौट चुकी थी। 10 बजे चौथी बार आयी तो यह खबर लेकर कि पेपर में समाचार प्रकाशित किया जा चुका है कि आज पानी नहीं आएगा तथा आनेवाले कुछ दिनो तक पानी की दिक्‍कत बनी रहेगी।

घर में पीने के लिए मात्र चार ग्‍लास पानी थे , आसपास कोई चापाकल या पानी का दूसरा स्रोत नहीं था। एक्‍वागार्ड होने से मुझे मिनरल वाटर की कभी आवश्‍यकता नहीं पडी थी , मैने पडोसी से मिनरल वाटर सप्‍लाई करनेवाले का फोन नं मांगा और उसे 20 लीटर पानी देने को कहा। पर उसने भी 11 बजे तक पानी नहीं दिया। 1 बजे के लगभग थोडी देर पानी चलने से हमारी कुछ जरूरतें पूरी हुई , मिनरल वाटर भी आ गया। पर हमलोग दो दिन के लिए बाहर चले गए। तीसरे दिन लौटे , खूब पानी चल रहा है , अब साफ सफाई के सारे काम हो चुके हैं , पर कम पानी और बिना पानी के काटे गए वो घंटे मुझसे भूले नहीं जा रहे।

ज्‍योतिष में सर्पधर तारामंडल

परिवर्तन प्रकृति का नियम है , इसलिए कोई भी क्षेत्र इससे अछूता नहीं होता। पर परिवर्तन की एक सीमा होती है , कहीं भी किसी परिवर्तन को एकबारगी नहीं लादा जा सकता। जबतक शास्‍त्र के रूप में विकसित किए गए सिद्धांतों के आधार पर ज्‍योतिषीय गणना में बडे स्‍तर पर गडबडी न दिखे , इसमें कोई बडा परिवर्तन किया जाना व्‍यर्थ है। पर इंग्लैंड की एक संस्था रॉयल ऐस्ट्रोनामिकल सोसाइटी द्वारा  विज्ञान कांग्रेस में घोषणा किए जाने से कि राशि 12 नहीं 13 है , यानी सूर्य और अन्य ग्रह13 राशि मंडल (तारा मंडल) से होकर गुजरता है। उनके हिसाब से इसका नाम ओफियुकस और भारतीय ज्‍योतिषियों के अनुसार सर्पधर तारामंडल रखा गया था , उनके द्वारा वृश्चिक और धनु के बीच आनेवाले इस तारामंडल को राशि मानने से पूरे ज्‍योतिषीय आधार को ही चुनौती मिल गयी है।

भारतीय ज्योतिष सूर्यसिद्धांत आदि ग्रंथों से आनेवाले संपात बिंदु को ही राशि परिवर्तन का विंदू मानता आया है।  पृथ्वी जिस मार्ग पर अपनी दैनिक गति से सूर्य के चारों ओर घूम रही है उसे क्रान्तिवृत कहा जाता है। इस  क्रांतिवृत्‍त को 30-30 डिग्री में बांटकर ही सभी राशियों की गणना की परंपरा है , भले ही उसकी पहचान के लिए आरंभिक दौर में तारामंडल का सहारा लिया जाता हो। इसलिए तारामंडल की स्थिति में परिवर्तन या उस पथ में आनेवाले किसी अन्‍य तारामंडल से ज्‍योतिषीय गणनाएं प्रभावित नहीं होती हैं।  पाश्चात्य ज्‍योतिषीय गणना प्रणाली ने खुद को विकसित मानते हुए  भारतीय गणनाप्रणाली   में प्रयोग किए जानेवाले संपात विंदू को राशि परिवर्तन का विंदू न मानकर तारामंडलों के परिवर्तन के हिसाब से अपनी राशि को परिवर्तित किया है। इस कारण भारतीय गणनाप्रणाली की तुलना में पाश्‍चात्‍य गणना प्रणाली में लगभग 23 अंशों यानी डिग्री का अंतर पड़ जाता है.।

अधिकांश भारतीय ज्‍योतिषियों ने इस पद्धति को अस्‍वीकार कर दिया है और हमारी गणनाएं तारामंडल के हिसाब से न होकर सूर्यसिद्धांत के संपात विंदू को राशि का प्रारंभिक विंदू मानकर होती है।  इसलिए  सर्पधर तारामंडल को पाश्‍चात्‍य ज्‍योतिष भले ही स्‍वीकार कर ले , क्‍यूंकि वह तारामंडल को ही राशि मानता आया है और सूर्य के झुकाव के फलस्‍वरूप होने वाले आकाशीय स्थिति के परिवर्तन को अपनी गणना में जगह देता आया है , पर भारतीय ज्‍योतिष में इस तारामंडल को स्‍वीकारे जाने की कोई वजह नहीं दिखती।  इसलिए यह पाश्‍चात्‍य वैज्ञानिकों को भले ही आकर्षित करे , हमारे लिए इस नए तारामंडल या तेरहवीं राशि का भी कोई औचिंत्‍य नहीं। 

लग्‍न राशिफल ..... आपके लिए वर्ष 2020 कैसा रहेगा ??


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वार्षिक पूर्वानुमान में 12 ड्रापडाउन बने हुए हैं, १२ ड्रापडाउन जीवन के किसी न किसी मामले का प्रतिनिधित्व कर रहा है। एक ही दिन देखने पर सब एक सा लगेगा, प्रतिदिन किसी एक dropdown यानि एक मामले को समझकर दिमाग में बैठाएं। फिर वे अब समझ सकते हैं कि किन्ही मामलों में 2020 का कौन सा समय अच्छा, बुरा और नार्मल रहेगा ?भविष्यवाणियों के महत्व की तीव्रता आपके सेंसिटिव मामलों के हिसाब से तय होगी। इसके अतिरिक्त जिन भविष्यवाणियों में जितना बड़ा डेट का रेंज होगा, जितना बड़ा विवरण होगा, वो भविष्यवाणी उतनी महत्व वाली होगी। आपके जीवन में जो मामले कम सेंसिटिव हों, नार्मल या छोटे विवरण वाले या छोटे छोटे समयांतराल वाले पूर्वानुमान अपेक्षाकृत कम महत्व के होंगे। इसमें एरर की संभावना बहुत मामूली होगी।

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नववर्ष की शुभकामनाएं

ब्‍लॉग जगत में आने के बाद महीने में 20 - 25 पोस्‍ट ठेल देने वाली मैं अचानक कुछ दिनों से कुछ भी नहीं लिख पा रही हूं। 2011 में होनेवाली इस प्रकार की व्‍यस्‍तता का कुछ अंदाजा तो मझे पहले से था , पर एकाएक लिखना इतना कम हो जाएगा , ऐसा भी नहीं सोंचा था। ब्‍लॉग जगत से जुडाव इस हद तक हो चुका है कि व्‍यस्‍तता के बावजूद एक बार डैशबोर्ड खोलकर कम से कम उन सारे ब्‍लॉग्‍स के अपडेट अवश्‍य देख लेती हूं , जिनकी मैं अनुसरणकर्ता हूं , भले ही टिप्‍पणी कर पाऊं या नहीं। यहां तक कि ईमेल में आनेवाले लिंकों , बज्‍ज की पोस्‍टों और ट्विटर तक को सरसरी निगाह से देखे बिना नहीं रह पाती। ऐसे व्‍यस्‍तता भरे समय में सारे एग्रीगेटरों के बंद होने से चाहे नए ब्‍लॉगरों और अन्‍य पाठकों को जो भी असुविधाएं हो रही हों , मुझे तो ये सहूलियत ही दे रहे हैं। चिट्ठा जगत के द्वारा स्‍वागत के लिए नए चिट्ठों के न आने से जहां एक ओर उन्‍हें पढकर उनके स्‍वागत करने से छुट्टी मिली हुई है , वहीं दूसरी ओर ब्‍लॉग4वार्ता में वार्ता न लगाने तक का बहाना मिल गया है। थोडी फुर्सत मिलते ही सोंचा , अपने नियमित पाठको को अपनी स्थिति से अवगत ही करा दूं।

अभी घर में चहल पहल का वातावरण है , कॉलेज की शीतकालीन छुट्टियों की वजह से दोनो बच्‍चे घर में मौजूद हैं , गांव तथा इस इलाके में अन्‍य कई तरह के कार्य के सिलसिले में एक महीने से पापाजी भी दिल्‍ली से आकर इसी इलाके में रह रहे हैं। पापाजी के सभी बच्‍चों में अपने गांव से सबसे निकट मैं ही हूं , इसलिए मम्‍मी ने उनकी पूरी जिम्‍मेदारी मुझे दे रखी है। ठंड के महीने में बुजुर्गो को अधिक देख रेख की आवश्‍यकता होती है , इसलिए मम्‍मी के निर्देशानुसार पापाजी काम के सिलसिले में सुबह से शाम तक या एक दो दिन कहीं रह जाएं , पर उनका असली बसेरा मेरे यहां ही है। 1999 से पापाजी के दिल्‍ली में निवास करने के बाद उनके साथ रहने का बहुत कम मौका मिला , इसलिए न सिर्फ ज्ञानार्जन के लिए उनके इस सान्निध्‍य के पल पल का उपयोग कर रही हूं , बल्कि उन्‍हें अब इस बात के लिए मना भी लिया है कि अब अपनी सेवा के लिए वे मुझे भी बेटों बहूओं से कम समय नहीं दें। यह बात और है कि इतनी उम्र के बावजूद शारीरिक तौर पर वे बिल्‍कुल स्‍वस्‍थ हैं और उन्‍हें किसी प्रकार की सेवा की आवश्‍यकता नहीं।

दिन कटते देर नहीं लगती , देखते ही देखते बच्‍चों के आए हुए 15 दिन व्‍यतीत हो गए , वैसे ही 4-5 दिन और व्‍यतीत हो जाएंगे , फिर बच्‍चे वापस अपने जीवन के सपनों को पूरा करने के लिए चले जाएंगे और मैं रह जाऊंगी अपने कार्यक्रमों को सफल बनाने में। गजब की महत्‍वाकांक्षा का युग है , किसी रिश्‍ते का अच्‍छे से सुख भी नहीं ले पाते हम। चूंकि छोटा 2010 में 12वीं पास कर आगे की पढाई के लिए बाहर जानेवाला था , मैने काफी दिनों से 2011 के लिए कई महत्‍वाकांक्षी कार्यक्रम बना रखे थे। ऐसे समय में पापाजी का मुझे समय देने का निर्णय मुझे बडा सुख पहुंचाने वाला है। अभी हमलोग 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' से संबंधित अपने ज्ञान के प्रचार प्रसार के कार्यक्रम के बारे में चिंतन कर रहे हैं , इससे संबंधित सारे बिखरे हुए लेखन को सुव्‍यवस्थित करने में कुछ समय लगेगा। साथ ही इस कार्यक्रम में आनेवाली आर्थिक समस्‍या को भी हल करने की कोशिश है। जैसा कि मेरा अनुमान है , जुलाई 2010 या जनवरी 2011 तक हमलोग अपने सोंचे हुए कार्य को अवश्‍य मूर्त्‍त रूप दे पाएंगे।

भले ही मेरे जीवन का लक्ष्‍य एक (समाज से ज्‍योतिषीय और धार्मिक भ्रांतियों को दूर करना और ग्रहों के मानव जीवन पर पडने वाले प्रभाव को स्‍थापित करना) ही हो , पर तीन चार वर्षों में मेरा काम करने का ढंग खुद ब खुद परिवर्तित हो जाया करता है। पर जिन जगहों पर मेरा संबंध बन चुका , उससे व्‍यस्‍तता के बावजूद दूरी नहीं बन पाती। इस तरह ब्‍लॉग जगत से दूर रह पाना मेरे लिए मुश्किल है , हालांकि अब पहले की तरह बहुत पाठकों के व्‍यक्तिगत प्रश्‍नों का जबाब मैं नहीं दे सकती। फिर भी अभी भी लग्‍न राशिफल के ब्‍लॉग को नियमित तौर पर अपडेट कर रही हूं , मोल तोल में शेयर बाजार की साप्‍ताहिक भविष्‍यवाणी का कॉलम लगातार अपडेट हो रहा है। अपने वादे के अनुसार 'गत्‍यात्‍मक चिंतन' में तिलियार ब्‍लॉगर मीट की रिपोर्ट का पहला भाग काफी दिन पहले ही लिखा जा चुका था , पर दूसरे भाग के लिखे जाने में हो रही देर की वजह से मैने उसे प्रकाशित नहीं किया था। पर बाद में यह सोंचकर प्रकाशित किया कि शायद प्रकाशित हो जाने के बाद दूसरी कडी लिखी जा सके।

यदि सबकुछ सामान्‍य रहा तो 2011 के अपने व्‍यस्‍त कार्यक्रम के मध्‍य भी समय निकालकर प्रत्‍येक सप्‍ताह अपने ब्‍लॉग 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' और 'गत्‍यात्‍मक चिंतन' को अपडेट करने की अवश्‍य कोशिश करूंगी , ताकि माह में छह आठ पोस्‍ट आप सबों को अवश्‍य पढने को मिल जाए। आप सभी पाठकों के लिए आनेवाला वर्ष 2011 बहुत सुख और सफलता युक्‍त हो , ऐसी कामना करती हूं । मैं भी अपने लक्ष्‍य में कामयाब हो सकूं , इसके लिए मुझे आप सभी पाठकों की शुभकामनाओं की आवश्‍यकता है !!

इतने सारे चिट्ठाकारों से मुलाकात का वह दिन भुलाया जा सकता है ??

मेरे द्वारा रोहतक के तिलयार झील की यात्रा पर एक विस्‍तृत रिपोर्ट का इंतजार न सिर्फ ब्‍लॉगर बंधुओं को , वरन् ज्‍योतिषीय रूचि के कारण मेरे ब्‍लॉग को पढने वाले अन्‍य पाठकों और मित्रों को भी है। जब एक फोन पर इस रिपोर्ट का इंतजार कर रहे अपने पाठक को बताया कि व्‍यस्‍तता के कारण इस रिपोर्ट को प्रकाशित करने में कुछ देर हो रही है , तो उन्‍होने कहा कि इतनी देर भी मत कीजिए कि आप बहुत कुछ भूल ही जाएं। मैने उन्‍हे कहा कि एक सुखद यात्रा वर्षों भूली नहीं जा सकती , वैसी ही यात्राओं में तिलयार यात्रा भी एक है , भला इतने सारे ब्‍लोगरों से मुलाकात का वह दिन इतनी जल्‍द भुलाया जा सकता है ??

पहली बार सुनने पर रोहतक में होने वाली इस ब्‍लॉगर मीट की तिथि 21 नवंबर मुझे जंची नहीं थी , क्‍यूंकि ज्‍योतिषीय दृष्टि से उससे पहले ग्रहों की स्थिति मनोनुकूल नहीं थी , आसमान में ग्रहों की क्रियाशीलता कुछ इस ढंग की थी कि लोगों को किसी न किसी कार्यक्रम में व्‍यस्‍त रखने का यह एक बहाना बन सकती थी। बहुत प्रकार के कार्यों के उपस्थित हो जाने से इस प्रकार की तिथियों के कार्यक्रमों में इच्‍छा के बावजूद आमंत्रित कम संख्‍या में ही पहुंच पाते हैं। हां , 21 नवंबर को पूर्णिमा होने के कारण कार्यक्रम की सफलता पर कोई संदेह नहीं किया जा सकता था , इसलिए मुझे वहां पहुंचने की इच्‍छा तो थी ।

जब निर्मला कपिला जी से मैने रोहतक ब्‍लॉगर मीट के बारे में बात की , तो उन्‍होने कहा कि यदि मेरा कार्यक्रम निश्चित हो , तभी वो चलेंगी। इतने ब्‍लॉगरों के साथ साथ उनसे मिलने का बहाना बडी मुश्किल से मिल रहा था , मैं इंकार नहीं कर सकती थी।  पर तिथि को देखते हुए मन में अंदेशा अवश्‍य बना हुआ था कि कोई आवश्‍यक पारिवारिक या अन्‍य कार्य न उपस्थित हो जाए , छोटे मोटे कार्यक्रमों को तो अपने पूर्वनिर्धारित कार्यक्रम से टाला जा सकता है , यह सोंचकर मैने मित्रों और परिवारवालों के मध्‍य अपनी रोहतक यात्रा की खबर सबसे पहले प्रचारित प्रसारित कर दी। इससे एक फायदा हुआ कि बंगाल में एक दीदी के लडके का विवाह 22 नवंबर को था , दीदी के फोन आने पर मैने उन्‍हें तत्‍काल कह दिया कि मैं विवाह में न पहुंचकर 24 को 'बहू भात' में वहां पहुंचुंगी। मेरे कार्यक्रम की जानकारी मिलने पर दिल्‍ली से मेरे पास आ रहे पापाजी ने भी 20 नवंबर का रिजर्वेशन रद्द करवाकर मेरे साथ ही दिल्‍ली से आने का कार्यक्रम बनाया।

बोकारो से दिल्‍ली और दिल्‍ली से रोहतक जाने का मेरा कार्यक्रम निश्चित हो चुका था , पर 12 नवंबर को होनेवाले छठ के बाद बिहार झारखंड से लौटने वालों की भीड में मेरे लिए रिजर्वेशन मिलना कठिन था। मैने रेलवे की वेबसाइट पर एक एक कर सभी ट्रेनों की स्थिति देखी , कहीं भी व्‍यवस्‍था नहीं दिखाई पडी। 12 नवंबर को छठ होने के कारण बर्थ अवश्‍य उपलब्‍ध थे , पर छठ के मौके पर ट्रेन में बैठे रहना मुझे जंच नहीं रहा था। दूसरे दिनों में निकलने के लिए धनबाद से किसी प्रकार व्‍यवस्‍था जरूर हो सकती थी , पर उतनी दूर जाकर ट्रेन पकडना मुझे पसंद नहीं था। इसलिए मैने दिल्‍ली के लिए 12 नवंबर का ही रिजर्वेशन करवा लिया। रिजर्वेशन के वक्‍त लोअर बर्थ की उपलब्‍धता नहीं थी , इसलिए मैने मिडिल बर्थ में ही अपना रिजर्वेशन कराया। पर रेलवे की व्‍यवस्‍था की पोल इसी से खुल जाती है कि रातभर मेरे नीचे वाली बर्थ बिल्‍कुल खाली पडी रही।

कुछ दिन पूर्व से ही खराब चल रही मेरी तबियत ऐन दिल्‍ली प्रस्‍थान के वक्‍त ही खराब हो गयी। पर दवा वगैरह लेकर अपनी तबियत को सामान्‍य बनाया और दिल्‍ली के लिए निकल पडी। चलते समय तक यह मालूम हो चुका था कि 13 नवंबर को शाम के वक्‍त कनॉट प्‍लेस में भी एक ब्‍लॉगर मीट का आयोजन है। मेरी गाडी का समय 1 बजे दिन में ही दिल्‍ली में था , पर देर होने की वजह से शाम 4 बजे ही वहां पहुंच सकी। मेट्रो से आते वक्‍त राजीव चौक में उतरकर कनॉट प्‍लेस जाने और सबसे मिलने की इच्‍छा थी , पर पहले से ही गडबड तबियत 22 घंटे के सफर के बाद और खराब हो गयी थी। रही सही कसर दूसरे दिन रेलवे वालों ने एसी ऑफ करके पूरी कर दी थी, कई यात्रियों के शिकायत दर्ज कराने पर भी एसी ऑन नहीं हुआ। स्‍लीपर बॉगी में होती तो कम से कम खिडकी खुले होने से ताजी हवा तो मिलती , बंद बॉगी में एसी बंद होने से चक्‍कर आ रहा था। कुछ दिन पूर्व ऐसी स्थिति में कुछ यात्रियों में डेंगू या स्‍वाइन फ्लू फैलने के समाचार पढने को मिला था , इससे दिमाग तनावग्रस्‍त था , ऐसे में घर पहुंचकर ही राहत मिल सकती थी ।

दिल्‍ली में भी मुझे कई काम निबटाने थे , पर तबियत बिगडी होने की वजह से कुछ भी न हो पाया। ललेकि तीन भतीजे भतीजियों की मासूम शैतानियों के कारण सप्‍ताह भर का समय व्‍यतीत होते देर न लगी।  पर जैसा संदेह था , इन दिनों ब्‍लॉग जगत से कुछ ऐसी घटनाएं सुनने को मिली , जिससे स्‍पष्‍ट हुआ कि कार्यक्रम में सम्मिलित हो रहे लोगों में से कुछ वहां नहीं पहुंच सकेंगे। इससे मन में काफी असंतोष बना रहा , पर दिल्‍ली तक आ चुकी थी , तो रोहतक तो पहुंचना ही था। रोहतक में तिलियार झील में ब्‍लॉगर मीट रखी गयी थी , निर्मला कपिला जी से संपर्क किया तो उन्‍होने बताया कि वे राजीव तनेजा जी के साथ आ रही हैं। मैने भी राजीव तनेजा जी को ही संपर्क किया , माता जी के स्‍वास्‍थ्‍य को लेकर तनेजा दंपत्ति अस्‍पताल के चक्‍कर काट रहे थे। पापाजी तैयार नहीं थे कि मैं अकेली अनजान रास्‍ते पर जाऊं , मैने अपने एक भाई का गुडगांव का कार्यक्रम रद्द करवाकर उसे अपने साथ चलने को तैयार किया , पर 20 की शाम को तनेजा जी ने कहा कि वे चलते वक्‍त मुझे ले लेंगे।

21 नवंबर को सुबह नांगलोई में मेट्रो स्‍टेशन के पास राजीव तनेजा जी , संजू तनेजा जी और निर्मला कपिला जी से मिलने का मौका मिला। तनेजा दंपत्ति से तो मैं पहले भी मिल चुकी थी , पर निर्मला कपिला जी से यह पहली मुलाकात थी। उनकी कहानियों लेखों , कविताओं और खासकर टिप्‍पणियों ने मेरे हृदय पर एक छाप छोड दी थी , इसलिए उनसे मिलने की मेरी दिली तमन्‍ना थी , कार से उतरकर उन्‍होने मुझे गले लगा लिया। इस सुखद अहसास को मैं जीवनभर नहीं भूल सकती। हमलोगों ने ब्‍लॉग जगत से जुडी बाते करते हुए ही एक डेढ घंटे का सफर तय किया और थोडी ही देर में मंजिल आ गयी। क्‍या हुआ तिलियार ब्‍लॉगर मीट में , यह जानिए अगली कडी में , इसके लिए आपलोगों को कितना इंतजार करना पड सकता है , नहीं बता सकती।