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Tuesday, 18 January 2011

ज्‍योतिष में सर्पधर तारामंडल को तेरहवीं राशि मानने का कोई औचित्‍य नहीं !!

परिवर्तन प्रकृति का नियम है , इसलिए कोई भी क्षेत्र इससे अछूता नहीं होता। पर परिवर्तन की एक सीमा होती है , कहीं भी किसी परिवर्तन को एकबारगी नहीं लादा जा सकता। जबतक शास्‍त्र के रूप में विकसित किए गए सिद्धांतों के आधार पर ज्‍योतिषीय गणना में बडे स्‍तर पर गडबडी न दिखे , इसमें कोई बडा परिवर्तन किया जाना व्‍यर्थ है। पर इंग्लैंड की एक संस्था रॉयल ऐस्ट्रोनामिकल सोसाइटी द्वारा  विज्ञान कांग्रेस में घोषणा किए जाने से कि राशि 12 नहीं 13 है , यानी सूर्य और अन्य ग्रह13 राशि मंडल (तारा मंडल) से होकर गुजरता है। उनके हिसाब से इसका नाम ओफियुकस और भारतीय ज्‍योतिषियों के अनुसार सर्पधर तारामंडल रखा गया था , उनके द्वारा वृश्चिक और धनु के बीच आनेवाले इस तारामंडल को राशि मानने से पूरे ज्‍योतिषीय आधार को ही चुनौती मिल गयी है।

भारतीय ज्योतिष सूर्यसिद्धांत आदि ग्रंथों से आनेवाले संपात बिंदु को ही राशि परिवर्तन का विंदू मानता आया है।  पृथ्वी जिस मार्ग पर अपनी दैनिक गति से सूर्य के चारों ओर घूम रही है उसे क्रान्तिवृत कहा जाता है। इस  क्रांतिवृत्‍त को 30-30 डिग्री में बांटकर ही सभी राशियों की गणना की परंपरा है , भले ही उसकी पहचान के लिए आरंभिक दौर में तारामंडल का सहारा लिया जाता हो। इसलिए तारामंडल की स्थिति में परिवर्तन या उस पथ में आनेवाले किसी अन्‍य तारामंडल से ज्‍योतिषीय गणनाएं प्रभावित नहीं होती हैं।  पाश्चात्य ज्‍योतिषीय गणना प्रणाली ने खुद को विकसित मानते हुए  भारतीय गणनाप्रणाली   में प्रयोग किए जानेवाले संपात विंदू को राशि परिवर्तन का विंदू न मानकर तारामंडलों के परिवर्तन के हिसाब से अपनी राशि को परिवर्तित किया है। इस कारण भारतीय गणनाप्रणाली की तुलना में पाश्‍चात्‍य गणना प्रणाली में लगभग 23 अंशों यानी डिग्री का अंतर पड़ जाता है.।

अधिकांश भारतीय ज्‍योतिषियों ने इस पद्धति को अस्‍वीकार कर दिया है और हमारी गणनाएं तारामंडल के हिसाब से न होकर सूर्यसिद्धांत के संपात विंदू को राशि का प्रारंभिक विंदू मानकर होती है।  इसलिए  सर्पधर तारामंडल को पाश्‍चात्‍य ज्‍योतिष भले ही स्‍वीकार कर ले , क्‍यूंकि वह तारामंडल को ही राशि मानता आया है और सूर्य के झुकाव के फलस्‍वरूप होने वाले आकाशीय स्थिति के परिवर्तन को अपनी गणना में जगह देता आया है , पर भारतीय ज्‍योतिष में इस तारामंडल को स्‍वीकारे जाने की कोई वजह नहीं दिखती।  इसलिए यह पाश्‍चात्‍य वैज्ञानिकों को भले ही आकर्षित करे , हमारे लिए इस नए तारामंडल या तेरहवीं राशि का भी कोई औचिंत्‍य नहीं। 

18 comments:

विष्णु बैरागी said...

आप बिलकुल ठीक कह रही हैं। यह अलग बात है कि 'बाजार' के मारे, हमारे अखबार कहीं इस फितूर को स्‍थापित न कर दें।

Arvind Mishra said...

इस विषय के साथ इतना हल्का ट्रीटमेंट न तो फलित ज्योतिषियों और न ही ज्ञान पिपासुओं के लिए न्यायपूर्ण है -विस्तित आलेख लिखें !

डॉ. दलसिंगार यादव said...

आपने बिलकुल सही मुद्दा उठाया है। परंतु इस बारे में बनारस और पूना के ज्योतिष अनुसंधानकर्ताओं की राय लेकर विस्तृत लेख लिखें और चर्चा कराना आवश्यक है।

केवल राम said...

आदरणीय संगीता जी
आपने सही समय पर सार्थक आलेख लिखा है.....आपकी पोस्ट बहुत सारगर्भित ढंग से प्रकाश डालती है ज्योतिष पर ......विष्णु बैरागी जी के मत से सहमत ...शुक्रिया

निर्मला कपिला said...

इसे और विस्तार से लिखें तो अधिक समझ आयेगी। धन्यवाद इस जानकारी के लिये।

vandan gupta said...

मुझे आपके ही आलेख का इंतज़ार था इस विषय पर और आपने सही कहा है हमारे यहाँ सूर्य से गणनाये होती हैं…………जानकारी के लिये आभार्।

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

इस विद्या को मैं कौतुक से ही देख पाती हूँ ...आपके द्वारा ही इसमें थोड़ी रूचि पैदा हुयी है ...जानकारी के लिए आभार

ब्लॉ.ललित शर्मा said...

कसौटी पर कसा हुआ ही चिरकाल तक स्थाई होता है।

Unknown said...

संगीता जी सुर्य सिद्धान्त के संपाद बिन्दु को समझना

मेरे लिये कठिन हो गया है,कृपया इसको स्पष्ट करें,आभार ।

दिनेशराय द्विवेदी said...

आप जानती हैं कि फलित ज्योतिष पर मेरा तनिक भी विश्वास नहीं है। लेकिन आप की बात सही है। हमने तीस-तीस अंश के क्षेत्र को राशि माना है। उस क्षेत्र में जो प्रमुख तारामंडल है उस के नाम से उस राशि को जाना जाता है। हो सकता है आकाशीय परिवर्तनों से किसी एक क्षेत्र के प्रमुख तारामंडल के तारे मंद हो जाएं। नए तारों के जन्म और पुराने तारों की मृत्यु के कारण किसी क्षेत्र में या किन्हीं दो क्षेत्रों के मध्य कोई नई आकृति उभर आए। उस से राशियों के निर्धारण पर कोई फर्क नहीं पड़ता। पाश्चात्य ज्योतिषी राशियों का आरंभ वर्नल इक्विनोक्स के आधार पर तय करते हैं अर्थात् मार्च में जिस तिथि को रात और दिन बराबर होते हैं, तथा जिस क्षण सूर्य सीधे मूमध्य रेखा के ठीक ऊपर होकर गुजरता है, उस समय वह क्रांतिवृत्त पर जिस बिंदु पर होता है वहीं से मेष राशि का आरंभ माना जाता है। वर्तमान में यह 20-21 मार्च को होता है। इस बिंदु से तीस अंश का मार्ग तय कर लेने पर वृष राशि आरंभ हो जाती है, इसी तरह 30-30 अंशों पर 12 राशियाँ मानी जाती हैं। पाश्चात्य ज्योतिष के अनुसार जो राशियाँ हैं उन के प्रमुख तारामंडल तो उन के क्षेत्रों से कब के बाहर हो चुके हैं। वस्तुतः सूर्य 13 अप्रेल को मेष की संक्रांति पर जहाँ होता है वहाँ से तीस अंश आगे तक का जो क्षेत्र है वहाँ मेष तारामंडल के तारे दिखाई पड़ते हैं। इस तरह भारतीय ज्योतिषीय मान्यताएँ अधिक स्थिर हैं।
ज्योतिर्विज्ञान के अध्ययन के लिए उचित है, लेकिन किसी व्यक्ति के भाग्य पर या मौसम आदि पर इन का कोई असर नहीं होता है और न ही इसे सिद्ध किया जा सका है। एक सी परिस्थितियों में चार ज्योतिषियों का फलित सदैव ही अलग-अलग रहता है। इस तरह फलित ज्योतिष कहीं से भी विज्ञान नहीं है। अपितु आकाशीय पिण्डों के वैज्ञानिक व गणितीय अध्ययन पर आधारित एक भीषण भ्रम मात्र है।

दिनेशराय द्विवेदी said...

मेरी टिप्पणी इतनी लंबी हो गई कि उसे स्वीकार ही नहीं किया और मिट गई। संगीता जी स्वयं विस्तृत पोस्ट लिखने वाली हैं। यदि उस से भ्रम का समाधान न हो सका तो एक पोस्ट इस पर लिखने का श्रम करना होगा।

संगीता पुरी said...

आदरणीय द्विवेदी जी,

नमस्‍कार ।


आपकी टिप्‍पणी मिल चुकी है और मैने उसे प्रकाशित भी कर दिया है । व्‍यस्‍तता के कारण हाल के दिनों में ब्‍लॉगिंग में मेरे क्रियाकलाप कम चल रहे हैं। पर जनसामान्‍य में किसी भी तरह का भ्रम फैलता है .. तो उसे दूर करने के लिए मैं कुछ न कुछ लिखती ही हूं। डॉ अरविंद मिश्रा जी के अनुरोध पर मैं एक विस्‍तृत पोस्‍ट लिखने वाली थी .. पर समय की कुछ कमी चल रही है .. यदि आप इसपर समय दे सके .. तो बहुत ही अच्‍छा होगा।


संगीता पुरी

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

आपकी अगली पोस्ट की प्रतीक्षा है..

राज भाटिय़ा said...

धन्यवाद इस सुंदर जानकारी के लिये,

Unknown said...

यह सही है या नहीं, ‌ये तो आप लोग ही जानें।

vijai Rajbali Mathur said...

किसी क्षेत्र विशेष का नाम लेकर चलने का आग्रह जिन लोगों ने किया है ,वह कितना तार्किक है?उठाये गए प्रश्नों का जवाब देने का अधिकार संगीता जी का ही है.परन्तु ज्योतिष के क्षेत्र में ही होने के कारण भ्रम का निवारण करना चाहता हूँ.जब अमेरिका की खोज भी नहीं हुयी थी और ब्रिटेन के लोगों को वस्त्र पहनने का भी ज्ञान न था तब भी भारतीय ज्योतिष विज्ञान बहुत आगे पहुँच चुका था.इसमें कोई ह्रास नहीं हुआ है.सम्पूर्ण ब्रह्मांड ३६० डिग्री में फैला है और उसे सूर्य की कलाओं के मान ३० -से विभक्त करने पर सदैव १२ राशियाँ ही बनेंगी.राशी की गणना चन्द्र की उपस्थिति से होती है.अतः विदेशियों के कुतर्कों से ज्योतिष -विज्ञानं कभी प्रभावित नहीं हो सकता..किसी भी विषय के नियमबद्ध एवं क्रमबद्ध अध्ययन को विज्ञानं कहते हैं.अतः ज्योतिष एक सम्पूर्ण विज्ञानं है.अज्ञान वश कोई इसे विज्ञानं न माने तो क्या फर्क पड़ता है

eSwami said...

पश्चिमी ज्योतिषी भी इसे नकार चुके हैं. १३ वी राशी का स्वामी कौन है? बिना स्वामी के कैसी राशी? और वैसे भी पश्चिम में ८८ नक्षत्र गिने गए हैं अचानक एक ऐसा लाडला नक्षत्र याद किये जाने की क्या जरूरत पड गई और वैसे भी लग्न तथा सूर्यराशी का मिलान पश्चिम में भी सही फ़ल देता है - हां ट्रापिकल सिस्टम में लग्न का निर्धारण भिन्न होता है और वे गोचर पर अधिक ध्यान देते हैं चूंकि उनके यहां दशा-पद्धति नही चलती.

Anonymous said...

ज्ञानवर्धक आलेख!