राशि के वर्गीकरण का हमारा आधार

कल के आलेख में मैने स्‍पष्‍ट करने की कोशिश की थी कि ज्‍योतिष में सर्पधर तारामंडल को तेरहवीं राशि मानने का कोई औचित्‍य नहीं है। डॉ अरविंद मिश्रा जी समेत कुछ पाठकों को बात पूरी तरह समझ में नहीं आयी , इसलिए इस विषय पर विस्‍तार से एक लेख लिखने की आवश्‍यकता आ गयी है। हमारे ऋषि महषिर्यों की दृष्टि पूरे ब्रह्मांड पर थी , जिसके कारण हमारे लिए जो पृथ्‍वी इतनी विशाल है , उनके लिए एक विंदू मात्र थी। पृथ्‍वी को एक विंदू मानते हुए उन्‍होने उसके चारों ओर के आसमान के पूरब से पश्चिम की ओर जाते प्रतीत होते वृत्‍ताकर पथ के 360 डिग्री को , जिससे सूर्य और अन्‍य सभी ग्रह गुजरते प्रतीत होते हैं , को 12 भागों में बांटा। 0 से 30 डिग्री तक मेष , उसके बाद के 30 डिग्री तक वृष , उसके बाद के 30 डिग्री तक मिथुन .. इस क्रम में 12 राशियों की उत्‍पत्ति हुई। सूर्य 14 अप्रैल को जिस विंदू पर होता है , वहां से मेष राशि की शुरूआत होती है, एक एक महीने बाद दूसरी तीसरी राशियां आती हैं तथा वर्षभर बाद पहले विंदू पर मीन राशि का अंत हो जाता है। 30 - 30 डिग्री पर आनेवाले सारे विंदू ही सूर्य सिद्धांत के संपात विंदू हैं। राशियों का यह वर्गीकरण बिल्‍कुल स्‍थायी है और इसमें फेरबदल की कोई आवश्‍यकता नहीं।

एक  वृत्‍ताकार पथ में किसी भी विंदू को शुरूआत और अंत कह पाना मुश्किल है और हमारे ज्‍योतिषीय ग्रंथों में इस बात की कोई चर्चा नहीं है कि मेष राशि का शुरूआती विंदू यानि वृत्‍ताकार पथ में 0 डिग्री किस आधार पर माना गया है , इसलिए आधुनिक विद्वानों ने इस आधार को लेकर अपने अपने तर्क गढने शुरू कर दिए। हमने भूगोल में पढा है कि 21 मार्च को सारे संसार में दिन रात बराबर होते हैं , क्‍यूंकि उस दिन सूर्य भूमध्‍य रेखा के सीध में होता है। पाश्‍चात्‍य ज्‍योतिषियों की कल्‍पना है कि जिस समय ज्‍योतिष की शुरूआत हो रही होगी , उस समय 14 अप्रैल को सूर्य भूमध्‍य रेखा के सीध में रहा होगा , इसी कारण हमारे ऋषियों ने इसे मेष राशि का प्रथम विंदू माना होगा। पृथ्‍वी के अपने अक्ष पर क्रमश: झुकाव बढने के कारण यह तिथि पीछे होती जा रही है , इसलिए मेष राशि का शुरूआती विंदू भी पीछे की तिथि में माना जाना चाहिए। इसलिए वे हमारे ग्रंथों में उल्लिखित तिथि से 23 डिग्री आगे को ही मेष राशि का आरंभ मानते हैं।

राशियों को लेकर ज्‍योतिषियों में शंका की शुरूआत इनमें स्थित तारामंडल को लेकर भी हुई , जिसके आधार पर राशियों का नामकरण किया गया था। हमारे ग्रंथों में राशियों के 30-30 डिग्री का बंटवारा स्‍पष्‍ट है , पर इन राशियों को पहचानने के लिए हमारे ज्‍योतिषियों ने उसमें स्थित तारामंडल का सहारा लिया था। लेकिन पाश्‍चात्‍य ज्‍योतिषी तारामंडल यानि तारों के समूह को ही राशि मानते हैं , उनका मानना है कि जिस तारे के समूह में बच्‍चे के जन्‍म के समय सूर्य होता है , वही बच्‍चे के चरित्र और व्‍यक्तित्‍व निर्माण में महत्‍व रखता है , क्‍यूंकि प्रत्‍येक तारामंडल की अलग अलग विशेषताएं होती हैं। पर भारतीय ज्‍योतिष में किसी खास तारे या तारामंडल के ज्‍योतिषीय प्रभाव की कहीं चर्चा नहीं है। इसमें ग्रह स्‍वामित्‍व के आधार पर राशि के स्‍वभाव और उसमें स्थित सौरमंडल के गह्रों और पृथ्‍वी के अपने उपग्रह चंद्रमा के प्रभाव की चर्चा की गयी है।

'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' ने ज्‍योतिष की पुस्‍तकों के सभी नियमों की गहराई से छानबीन की है और जिस नियम से भविष्‍यवाणी में अधिक सफलता मिली है , उसे स्‍वीकार किया है। वैज्ञानिक आज जिस वॉबलिंग की चर्चा कर रहे हैं , उसको ध्‍यान में रखते हुए ज्‍योति‍षीय पंचांगों में सभी ग्रहों की स्थिति सायन अंश में दी होती है। उसमें  वर्ष के अनुसार अयण डिग्री घटाकर निरयण डिग्री निकाला जाता है। अपने रिसर्च के आरंभिक दौर में ही 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' ने दोनो प्रकार की कुंडलियां बनाकर फलादेश करना आरंभ किया था। सायन् के हिसाब से जो जन्‍मकुंडली बनी , उसके द्वारा कहे गए फलित की सटीकता में संदेह बना रहा , जबकि निरयण से फलादेश काफी सटीक होता रहा। इसलिए 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष'  मानता आ रहा है कि हमारे ऋषि महर्षियों के द्वारा मेष राशि का शुरूआती विंदू बहुत ही सटीक है। वैसे भी सभी राशियों  का विस्‍तार 30-30 डिग्री का है , जबकि सभी तारामंडल का विस्‍तार एक समान नहीं होता , तारामंडल तो मात्र राशियों को पहचानने के लिए प्रयोग किया गया था। इसलिए तारामंडल को राशि माना जाना उचित नहीं। 

'भारतीय ज्‍योतिष' भविष्‍यवाणी करने की एक वैज्ञानिक विधा है , इसके विकास के लिए प्रयास अवश्‍य किए जा सकते हैं , कुछ नियमो में फेरबदल की जा सकती है। पर राशि का बंटवारा और ग्रह आधिपत्‍य तो  इसका मूल आधार है , इसलिए किसी भी स्थिति में इसके आधार को चुनौती नहीं दी जा सकती , इसपर प्रश्‍नचिन्‍ह नहीं लगाया जा सकता। चूंकि भारतीय ज्‍योतिषी तारामंडल को राशि नहीं मानते हैं , इसलिए सर्पधर तारामंडल को भी राशि मानने का सवाल ही पैदा नहीं होता। पाश्‍चात्‍य ज्‍योतिषी तारामंडल को ही राशि मानते आए हैं , इसलिए सर्पधर तारामंडल को तेरहवीं राशि मान लेना उनकी इच्‍छा पर निर्भर करता है। पर इसे तेरहवीं राशि मानते हुए फलित ज्‍योतिष के विकास में बहुत सारी बाधाएं आएंगी , जिससे निबटना उनके लिए आसान नहीं होगा। 

बिना पानी के काटे गए वो घंटे मुझसे भूले नहीं जा रहे !!

2011 की पहली जनवरी को भले ही पूरी दुनिया नववर्ष का स्‍वागत करने और आनंद मनाने में व्‍यस्‍त हो , हमलोग खुशियां नहीं मना सकें। सुबह नाश्‍ता बनाते वक्‍त रसोई में प्रेशर कुकर के सेफ्टी वाल्‍व ने तो हमें एक दुर्घटना से जरूर बचा लिया था , पर मन को भयभीत होने से नहीं रोक सका था। वैसे ही शंकाग्रस्‍त मन में भूचाल तब आया , जब हमें गांव से हमारे पति के करीबी बाल सखा के मौत की खबर मिली। आज भी गांव जाने पर मेरे पति का पूरा समय उक्‍त मित्र के इलेक्ट्रिकल और इलेक्‍ट्रोनिक्‍स की दुकान पर ही बैठकर ही कटता था। जब पारिवारिक जबाबदेहियां अपने चरम सीमा पर होती है , वैसे वक्‍त किसी का इस दुनिया से चला जाना उसके पूरे परिवार के लिए कितना कष्‍टकारक हो सकता है , इससे हमलोग अनजान नहीं थे।

इस खबर से हमलोग परेशान चल ही रहे थे कि अचानक पडोसी ने सूचना दी कि हमारे टंकी का पानी ओवरफ्लो कर पूरी सडक को गीला कर रहा है। सप्‍लाई का पानी बंद हो चुका था , टंकी से पानी बहने की बात सुनकर हमलोग चौंककर बाहर बालकनी में आए। मकानमालिक पूरे परिवार सहित दो दिन पहले से बाहर थे और हमलोगों का काम सप्‍लाई के पानी से ही चल रहा था। सप्‍लाई का पानी ही टंकी में चढकर 24 घंटे की आवश्‍यकता को पूरा करता था। इसलिए गर्मियों में होनेवाली पानी की दिक्‍कत के लिए गैरेज में बनवायी  गयी भूमिगत टंकी के मोटर को चलाने की कोई आवश्‍यकता नहीं थी। पर उनके जाने के 48 घंटे बाद वह स्‍वयं चलने लगा था , गैरेज की चाबी न होने से हमलोग कुछ भी कर पाने में असमर्थ थे।

मकान मालिक को फोनकर सारी बातों की जानकारी दी , उन्‍होने रात को बोकारो वापस आने के लिए गाडी पकडी। मोटर और पंप चलता हुआ पूरे टंकी के पानी को समाप्‍त कर चुका था , फिर भी चलता ही जा रहा था। हम मेन स्विच ऑफ कर बिना बत्‍ती के रातभर रहने को तैयार थे , पर मेन स्विच से भी वह ऑफ नहीं हो रहा था। हमलोग रातभर अनिश्चितता के दौर से गुजरे। कहीं मोटर , पंप जल न जाएं , गर्म होकर आग न पकड लें आदि के बारे में सोचकर शंकाग्रस्‍त बने रहें। खिडकी के रास्‍ते गैरेज में एक बिल्‍ली आ जा रही थी और उसके उछलने कूदने से मोटर का स्विच ऑन हो गया था। गनीमत रही कि सुबह उनलोगों के लौटने तक मोटर चल ही रहा था , उन्‍होने आकर सबकुछ ऑफ कर दिया , तब हमलोगों को निश्चिंति हुई।

कुकर तो निर्जीव वस्‍तु ठहरी , तुरंत बाजार से बनकर आ गयी। एक मित्र को खो देने के हादसे से इन्‍हें  उबरने में कुछ समय लगना ही था , ये तो मैं समझ ही रही थी। पर अंडरगा्रउंड टंकी के पानी समाप्‍त होने के दुष्‍परिणाम को हमें दो चार दिन बाद ही गंभीर तौर पर झेलना पड गया। बोकारो में पानी के पाइपलाइन में हुई गडबडी को दूर किए जाने के लिए 7 जनवरी से ही शाम को पानी की सप्‍लाई बंद कर दिया गया। सुबह ही इतना अधिक पानी आ जाया करता था कि सारे जरूरत के बाद टंकी में भी पानी मौजूद होता। हमें शाम के पानी की आवश्‍यकता ही नहीं पडी।

पर 13 जनवरी की रात अचानक नल में पानी आना बंद हो गया , रातभर हमलोगों ने स्‍टोर किए हुए पानी से काम  चलाया। सुबह सप्‍लाई के पानी आने पर भी कुछ काम निबटाए , सप्‍लाई के पानी बंद होने पर हमलोगों ने मकानमालिक को टंकी में पानी चढाने को कहा , जब मकानमालिक ने बताया कि 1 जनवरी को हुई घटना के बाद अंडरग्राउंड टंकी में उन्‍होने पानी नहीं भरा है , तो हमलोगों के पैरों तले जमीन ही खिसक गयी। शाम को पानी की सप्‍लाई नहीं होगी , सुबह यानि 24 घंटे तक बिना पानी के रहना , बहुत बडी मुसीबत थी। रसोई में मौजूद एक बडी बाल्‍टी और स्‍नानगृह में मौजूद एक टब पानी के सहारे हमने 24 घंटे का समय काटा , इस विश्‍वास के साथ कि कल सुबह सप्‍लाई का पानी आ जाएगा। खैरियत थी कि मैं और पापाजी दो ही जन घर में मौजूद थे , आवश्‍यक काम हो गए , पर घर , बर्तन या  कपडों की सफाई तो हो नहीं सकती थी।

पर पूरे बिल्डिंग के लिए असली मुसीबत तो अभी बाकी थी , सुबह 14 जनवरी का मकर संक्राति जैसा पवित्र दिन आ गया था। इस दिन की महत्‍ता इसी से सिद्ध होती है कि यह हिंदुओं का एकमात्र त्‍यौहार है , जिस दिन महिलाओं को नाश्‍ता बनाने से छुट्टी दी गयी है , ताकि वे इस दिन के स्‍नान , दान और पूजा पाठ का पूरा फायदा उठा सके। हमलोग नल में पानी का इंतजार करते रहें , कल से ही पानी की दिक्‍कत देख कामवाली भी तीसरी बार लौट चुकी थी। 10 बजे चौथी बार आयी तो यह खबर लेकर कि पेपर में समाचार प्रकाशित किया जा चुका है कि आज पानी नहीं आएगा तथा आनेवाले कुछ दिनो तक पानी की दिक्‍कत बनी रहेगी।

घर में पीने के लिए मात्र चार ग्‍लास पानी थे , आसपास कोई चापाकल या पानी का दूसरा स्रोत नहीं था। एक्‍वागार्ड होने से मुझे मिनरल वाटर की कभी आवश्‍यकता नहीं पडी थी , मैने पडोसी से मिनरल वाटर सप्‍लाई करनेवाले का फोन नं मांगा और उसे 20 लीटर पानी देने को कहा। पर उसने भी 11 बजे तक पानी नहीं दिया। 1 बजे के लगभग थोडी देर पानी चलने से हमारी कुछ जरूरतें पूरी हुई , मिनरल वाटर भी आ गया। पर हमलोग दो दिन के लिए बाहर चले गए। तीसरे दिन लौटे , खूब पानी चल रहा है , अब साफ सफाई के सारे काम हो चुके हैं , पर कम पानी और बिना पानी के काटे गए वो घंटे मुझसे भूले नहीं जा रहे।

ज्‍योतिष में सर्पधर तारामंडल

परिवर्तन प्रकृति का नियम है , इसलिए कोई भी क्षेत्र इससे अछूता नहीं होता। पर परिवर्तन की एक सीमा होती है , कहीं भी किसी परिवर्तन को एकबारगी नहीं लादा जा सकता। जबतक शास्‍त्र के रूप में विकसित किए गए सिद्धांतों के आधार पर ज्‍योतिषीय गणना में बडे स्‍तर पर गडबडी न दिखे , इसमें कोई बडा परिवर्तन किया जाना व्‍यर्थ है। पर इंग्लैंड की एक संस्था रॉयल ऐस्ट्रोनामिकल सोसाइटी द्वारा  विज्ञान कांग्रेस में घोषणा किए जाने से कि राशि 12 नहीं 13 है , यानी सूर्य और अन्य ग्रह13 राशि मंडल (तारा मंडल) से होकर गुजरता है। उनके हिसाब से इसका नाम ओफियुकस और भारतीय ज्‍योतिषियों के अनुसार सर्पधर तारामंडल रखा गया था , उनके द्वारा वृश्चिक और धनु के बीच आनेवाले इस तारामंडल को राशि मानने से पूरे ज्‍योतिषीय आधार को ही चुनौती मिल गयी है।

भारतीय ज्योतिष सूर्यसिद्धांत आदि ग्रंथों से आनेवाले संपात बिंदु को ही राशि परिवर्तन का विंदू मानता आया है।  पृथ्वी जिस मार्ग पर अपनी दैनिक गति से सूर्य के चारों ओर घूम रही है उसे क्रान्तिवृत कहा जाता है। इस  क्रांतिवृत्‍त को 30-30 डिग्री में बांटकर ही सभी राशियों की गणना की परंपरा है , भले ही उसकी पहचान के लिए आरंभिक दौर में तारामंडल का सहारा लिया जाता हो। इसलिए तारामंडल की स्थिति में परिवर्तन या उस पथ में आनेवाले किसी अन्‍य तारामंडल से ज्‍योतिषीय गणनाएं प्रभावित नहीं होती हैं।  पाश्चात्य ज्‍योतिषीय गणना प्रणाली ने खुद को विकसित मानते हुए  भारतीय गणनाप्रणाली   में प्रयोग किए जानेवाले संपात विंदू को राशि परिवर्तन का विंदू न मानकर तारामंडलों के परिवर्तन के हिसाब से अपनी राशि को परिवर्तित किया है। इस कारण भारतीय गणनाप्रणाली की तुलना में पाश्‍चात्‍य गणना प्रणाली में लगभग 23 अंशों यानी डिग्री का अंतर पड़ जाता है.।

अधिकांश भारतीय ज्‍योतिषियों ने इस पद्धति को अस्‍वीकार कर दिया है और हमारी गणनाएं तारामंडल के हिसाब से न होकर सूर्यसिद्धांत के संपात विंदू को राशि का प्रारंभिक विंदू मानकर होती है।  इसलिए  सर्पधर तारामंडल को पाश्‍चात्‍य ज्‍योतिष भले ही स्‍वीकार कर ले , क्‍यूंकि वह तारामंडल को ही राशि मानता आया है और सूर्य के झुकाव के फलस्‍वरूप होने वाले आकाशीय स्थिति के परिवर्तन को अपनी गणना में जगह देता आया है , पर भारतीय ज्‍योतिष में इस तारामंडल को स्‍वीकारे जाने की कोई वजह नहीं दिखती।  इसलिए यह पाश्‍चात्‍य वैज्ञानिकों को भले ही आकर्षित करे , हमारे लिए इस नए तारामंडल या तेरहवीं राशि का भी कोई औचिंत्‍य नहीं। 

लग्‍न राशिफल ..... आपके लिए वर्ष 2020 कैसा रहेगा ??


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नववर्ष की शुभकामनाएं

ब्‍लॉग जगत में आने के बाद महीने में 20 - 25 पोस्‍ट ठेल देने वाली मैं अचानक कुछ दिनों से कुछ भी नहीं लिख पा रही हूं। 2011 में होनेवाली इस प्रकार की व्‍यस्‍तता का कुछ अंदाजा तो मझे पहले से था , पर एकाएक लिखना इतना कम हो जाएगा , ऐसा भी नहीं सोंचा था। ब्‍लॉग जगत से जुडाव इस हद तक हो चुका है कि व्‍यस्‍तता के बावजूद एक बार डैशबोर्ड खोलकर कम से कम उन सारे ब्‍लॉग्‍स के अपडेट अवश्‍य देख लेती हूं , जिनकी मैं अनुसरणकर्ता हूं , भले ही टिप्‍पणी कर पाऊं या नहीं। यहां तक कि ईमेल में आनेवाले लिंकों , बज्‍ज की पोस्‍टों और ट्विटर तक को सरसरी निगाह से देखे बिना नहीं रह पाती। ऐसे व्‍यस्‍तता भरे समय में सारे एग्रीगेटरों के बंद होने से चाहे नए ब्‍लॉगरों और अन्‍य पाठकों को जो भी असुविधाएं हो रही हों , मुझे तो ये सहूलियत ही दे रहे हैं। चिट्ठा जगत के द्वारा स्‍वागत के लिए नए चिट्ठों के न आने से जहां एक ओर उन्‍हें पढकर उनके स्‍वागत करने से छुट्टी मिली हुई है , वहीं दूसरी ओर ब्‍लॉग4वार्ता में वार्ता न लगाने तक का बहाना मिल गया है। थोडी फुर्सत मिलते ही सोंचा , अपने नियमित पाठको को अपनी स्थिति से अवगत ही करा दूं।

अभी घर में चहल पहल का वातावरण है , कॉलेज की शीतकालीन छुट्टियों की वजह से दोनो बच्‍चे घर में मौजूद हैं , गांव तथा इस इलाके में अन्‍य कई तरह के कार्य के सिलसिले में एक महीने से पापाजी भी दिल्‍ली से आकर इसी इलाके में रह रहे हैं। पापाजी के सभी बच्‍चों में अपने गांव से सबसे निकट मैं ही हूं , इसलिए मम्‍मी ने उनकी पूरी जिम्‍मेदारी मुझे दे रखी है। ठंड के महीने में बुजुर्गो को अधिक देख रेख की आवश्‍यकता होती है , इसलिए मम्‍मी के निर्देशानुसार पापाजी काम के सिलसिले में सुबह से शाम तक या एक दो दिन कहीं रह जाएं , पर उनका असली बसेरा मेरे यहां ही है। 1999 से पापाजी के दिल्‍ली में निवास करने के बाद उनके साथ रहने का बहुत कम मौका मिला , इसलिए न सिर्फ ज्ञानार्जन के लिए उनके इस सान्निध्‍य के पल पल का उपयोग कर रही हूं , बल्कि उन्‍हें अब इस बात के लिए मना भी लिया है कि अब अपनी सेवा के लिए वे मुझे भी बेटों बहूओं से कम समय नहीं दें। यह बात और है कि इतनी उम्र के बावजूद शारीरिक तौर पर वे बिल्‍कुल स्‍वस्‍थ हैं और उन्‍हें किसी प्रकार की सेवा की आवश्‍यकता नहीं।

दिन कटते देर नहीं लगती , देखते ही देखते बच्‍चों के आए हुए 15 दिन व्‍यतीत हो गए , वैसे ही 4-5 दिन और व्‍यतीत हो जाएंगे , फिर बच्‍चे वापस अपने जीवन के सपनों को पूरा करने के लिए चले जाएंगे और मैं रह जाऊंगी अपने कार्यक्रमों को सफल बनाने में। गजब की महत्‍वाकांक्षा का युग है , किसी रिश्‍ते का अच्‍छे से सुख भी नहीं ले पाते हम। चूंकि छोटा 2010 में 12वीं पास कर आगे की पढाई के लिए बाहर जानेवाला था , मैने काफी दिनों से 2011 के लिए कई महत्‍वाकांक्षी कार्यक्रम बना रखे थे। ऐसे समय में पापाजी का मुझे समय देने का निर्णय मुझे बडा सुख पहुंचाने वाला है। अभी हमलोग 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' से संबंधित अपने ज्ञान के प्रचार प्रसार के कार्यक्रम के बारे में चिंतन कर रहे हैं , इससे संबंधित सारे बिखरे हुए लेखन को सुव्‍यवस्थित करने में कुछ समय लगेगा। साथ ही इस कार्यक्रम में आनेवाली आर्थिक समस्‍या को भी हल करने की कोशिश है। जैसा कि मेरा अनुमान है , जुलाई 2010 या जनवरी 2011 तक हमलोग अपने सोंचे हुए कार्य को अवश्‍य मूर्त्‍त रूप दे पाएंगे।

भले ही मेरे जीवन का लक्ष्‍य एक (समाज से ज्‍योतिषीय और धार्मिक भ्रांतियों को दूर करना और ग्रहों के मानव जीवन पर पडने वाले प्रभाव को स्‍थापित करना) ही हो , पर तीन चार वर्षों में मेरा काम करने का ढंग खुद ब खुद परिवर्तित हो जाया करता है। पर जिन जगहों पर मेरा संबंध बन चुका , उससे व्‍यस्‍तता के बावजूद दूरी नहीं बन पाती। इस तरह ब्‍लॉग जगत से दूर रह पाना मेरे लिए मुश्किल है , हालांकि अब पहले की तरह बहुत पाठकों के व्‍यक्तिगत प्रश्‍नों का जबाब मैं नहीं दे सकती। फिर भी अभी भी लग्‍न राशिफल के ब्‍लॉग को नियमित तौर पर अपडेट कर रही हूं , मोल तोल में शेयर बाजार की साप्‍ताहिक भविष्‍यवाणी का कॉलम लगातार अपडेट हो रहा है। अपने वादे के अनुसार 'गत्‍यात्‍मक चिंतन' में तिलियार ब्‍लॉगर मीट की रिपोर्ट का पहला भाग काफी दिन पहले ही लिखा जा चुका था , पर दूसरे भाग के लिखे जाने में हो रही देर की वजह से मैने उसे प्रकाशित नहीं किया था। पर बाद में यह सोंचकर प्रकाशित किया कि शायद प्रकाशित हो जाने के बाद दूसरी कडी लिखी जा सके।

यदि सबकुछ सामान्‍य रहा तो 2011 के अपने व्‍यस्‍त कार्यक्रम के मध्‍य भी समय निकालकर प्रत्‍येक सप्‍ताह अपने ब्‍लॉग 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' और 'गत्‍यात्‍मक चिंतन' को अपडेट करने की अवश्‍य कोशिश करूंगी , ताकि माह में छह आठ पोस्‍ट आप सबों को अवश्‍य पढने को मिल जाए। आप सभी पाठकों के लिए आनेवाला वर्ष 2011 बहुत सुख और सफलता युक्‍त हो , ऐसी कामना करती हूं । मैं भी अपने लक्ष्‍य में कामयाब हो सकूं , इसके लिए मुझे आप सभी पाठकों की शुभकामनाओं की आवश्‍यकता है !!