अपने हिस्‍से का सुख (कहानी) .... संगीता पुरी

hamari kahani

मात्र एक खबर से पूरे घर में सन्‍नाटा पसर गया था। सुबह एक्‍सीडेंट के बाद से ही सबके कान समय समय पर फोन पर होनेवाले बातचीत में ही लगे थे , इसलिए फोन रखते हुए 'मामाजी नहीं रहें' कहनेवाले पुलकित के धीमे से स्‍वर को सुनने में मां को तनिक भी देर न लगी और वह तुरंत बेहोश होकर गिर पडी। हमारे बहुत कोशिश करने पर ही वह होश में आ सकी , अपने इकलौते भाई की मौत का सदमा झेल पाना आसान तो न था। अभी उम्र ही क्‍या हुई थी , अभी नौकरी के भी दस साल बचे ही थे यानि मात्र 50 के ही थे वे। मेरे हाथ भले ही मम्‍मी को पंखा झल रहें हो , पर मन में विचारों का द्वन्‍द्व चल ही रहा था।


चार वर्ष पूर्व बोर्ड की परीक्षा पास करने के बाद मेरे समक्ष आगे की पढाई जारी रखने का कोई उपाय न था। ऐसे में मामाजी ने मुझे अपने पास शहर में बुलवाकर एक कॉलेज में मेरा नामांकन करवा दिया था। इस तरह अपनी पढाई के सिलसिले में मामाजी के परिवार से पिछले चार वर्षों से जुडी हुई थी मैं। उस घर की एक एक परेशानी से वाकिफ। वे शहर में रहते थे , बस इस बात को लेकर गांव वालों को भले ही उनसे प्रतिस्‍पर्धा रहती हो , पर वास्‍तव में उनकी स्थिति उतनी मजबूत भी नहीं थी। सरकारी नौकरी करने वाले सामान्‍य कर्मचारियों को तनख्‍वाह ही कितनी मिलती है ??

उतने में ही मामाजी तीन बच्‍चों के अपने पांच सदस्‍यीय परिवार को ही नहीं , साथ साथ नाना जी और नानी जी की जबाबदेही हमेशा संभालते आए थे। मेरे सामने ही चार वर्ष पहले नाना जी और दो वर्ष पहले नानी जी गुजर चुके थे , परिवार कुछ छोटा तो हो गया था , पर मामाजी के स्‍वास्‍थ्‍य की गडबडी तथा बच्‍चों की पढाई लिखाई के बढते भार से जीवन की गाडी खींचने में खासी परेशानी हो रही थी। महीने के अंत तक इतनी देनदारी हो जाती कि महीने का तनख्‍वाह शुरूआत के चार दिन में ही समाप्‍त हो जाता। अन्‍य आवश्‍यकताओं के लिए पूरे महीने खिचखिच होती रहती। अभी एक महीने पहले ही तो परीक्षा देकर मैं उनके यहां से वापस आयी थी।

ग्रेज्‍युएशन करने के बाद दो तीन वर्षों से बडे भैया नौकरी के लिए दिए जानेवाली परीक्षाओं में जुटे हुए थे। छह महीने के कोचिंग के फी के लिए घर में कितने दिनों तक हंगामा मचा रहा । भैया हर महीने कितने फार्म भरते और परीक्षा देने के लिए हमेशा शहर शहर भटकते ,  फिर अखबार में परीक्षाफल देखते और निराश सर झुका लेते। मामाजी इतने खर्च के व्‍यर्थ होने पर झुंझलाते। कर्मचारियों की छंटनी और रिक्तियों की कमी के इस दौर में सामान्‍य विद्यार्थियों को भला नौकरी मिल सकती है ?? व्‍यवसाय में रूचि रखनेवाले भैया को नौकरी करने की इच्‍छा भी न थी , पर व्‍यवसाय के लिए पूंजी कहां से लाते ?? मामाजी की मजबूरी वे समझते थे ,  दीदी की शादी भी तो करनी थी । दिन ब दिन तिलक दहेज की बढती मांग के कारण कहीं बात बढ भी नहीं पाती थी।

दो वर्षों से ग्रेज्‍युएशन करके बैठी दीदी अपने खाली दिमाग का शैतानी उपयोग ही कर रही थी। बात बात में भाइयों से झगड पडती।  छोटा भाई इंटर करने के बाद इंजीनियरिंग में एडमिशन लेना चाहता था , ताकि उसे भविष्‍य में कैरियर को लेकर इतना चिंतित न रहना पडे। पर आर्थिक समस्‍या यहां भी आडे आ रही थी। मामाजी की पहली प्राथमिकता दीदी की शादी थी , इस कारण इससे पहले वे कहीं भी बडा खर्च करने को तैयार न थे। छोटे भाई का भी एक वर्ष बर्वाद हो गया था , ऐसे दबाबपूर्ण वातावरण में मामाजी और बीमार रहने लगे थे , जिससे हर महीने दवाई का बोझ और बढता जा रहा था।

बढती महंगाई , मामाजी की बीमारी , दोनो भाइयों की महत्‍वाकांक्षा और दीदी की चिडचिडाहट ... ये सब घर के माहौल को बिगाडने के लिए काफी थे। अब तो किसी प्रकार घर को संभालनेवाले परिवार के एकमात्र कमानेवाले मामाजी ही नहीं रहें , तो अब घर का क्‍या हाल होगा ?? सोंचकर ही मैं परेशान थी। ऊपर नजर उठाया तो पापा खडे थे , उन्‍हें भी यह दुखद सूचना मिल चुकी थी। हमने तुरंत मामाजी के यहां निकलने का कार्यक्रम बनाया , उसके लिए पूरी तैयारी शुरू की। मां के बाद इस दुर्घटना का सर्वाधिक बुरा प्रभाव मुझपर ही पडा था , पर मां को लाचार देखते हुए मैने हिम्‍मत बनाए रखा। तीन चार घंटे का ही तो सफर था , हमें देखते ही मामीजी दहाड मारकर रो पडी। हमलोगों के पहुचने के बाद ही उनका दाह संस्‍कार हुआ। सारे क्रिया कर्म समाप्‍त होने तक लगभग सभी नजदीकी मेहमानों की मौजूदगी बनी रही , फिर धीरे धीरे सारे लोग चले गए। वहां की स्थिति को संभाले रहने की जिम्‍मेदारी मुझपर छोडकर मां भी चली गयी।

वहां रहने पर बातचीत से मालूम हुआ कि प्‍लांट में डृयूटी के दौरान ही एक एक्‍सीडेंट में मामाजी की मौत हुई थी , इसलिए कंपनी की ओर से उन्‍हें कुछ सुविधाएं मिलने की संभावना थी। कंपनी की ओर से एक बेटे को नौकरी देने के लिए ट्रेनिंग की वयवस्‍था की जानी थी , कंपनी की लापरवाही से हुए मौत के कारण परिवार को क्षतिपूर्ति के चेक भी मिलने थे। बीमा कंपनियों द्वारा भी एकमुश्‍त राशि मिलनेवाली थी और साथ में मामी जी को कुछ पेंशन भी। इसके लिए महीने दो महीने सबकी दौडधूप चलती रही , फिर धीरे धीरे सारा काम हो गया , छोटे भैया ने दो महीने की ट्रेनिंग के बाद आकर नौकरी ज्‍वाइन भी कर ली। दीदी के दहेज के लिए रूपए रख मामीजी ने बाकी रूपए बडे भैया को दे दिए। वे तो व्‍यवसाय करना ही चाहते थे , उनके मन की मुराद पूरी हो गयी। घर का माहौल सामान्‍य तौर पर ठीक ठाक देखकर मैं वापस लौट गयी।

समय समय पर मामा जी के यहां की खबर मिलती रहती थी , एक भाई व्‍यवसाय और एक नौकरी में सेट हो ही चुके थे , दहेज की वयवस्‍था हो जाने से दीदी के विवाह तय होने में देर नहीं लगी थी। हालांकि विवाह होने में अभी देर थी , पर विवाह का नाम सुनते ही मैं खुद को एक बार फिर से वहां जाने से नहीं रोक पायी। भैया का व्‍यवसाय चल पडा था , भैया की कमाई और दीदी की कुशलता से पूरे घर ही बदला बदला नजर आ रहा था। पूरे घर में हंसीखुशी का माहौल था , मामाजी सबके हिस्‍से का कष्‍ट लेकर इस दुनिया से चले गए थे। परिवार के एक एक सदस्‍य के पास पैसे थे , अभी से विवाह की तैयारी जोर शोर से हो रही थी। सबके चेहरे पर रौनक थी , सब अपने अपने हिस्‍से का सुख प्राप्‍त कर रहे थे। 

पोस्‍ट के माध्‍यम से ही लोगों को जबाब देने का सिलसिला शुरू .....

परसों मेरी लेख पढने के बाद एक ब्‍लॉगर भाई का ईपत्र मिला ......


कल फिर आपकी एक अच्छी पोस्ट पढने को मिली। उसी के साथ करीब साल भर पहले
की एक कसक भी उभर आई, जब बहुत ही ज्यादा परेशानी में बड़ी आशा से आप का
मार्ग-दर्शन चाहा था पर ...



इस मैसेज को पढने के बाद मुझे भी कुछ याद आया , मैने उनके नाम से आए पुराने ईमेल सर्च किए तो पाया कि इन्‍होने डेढ वर्ष पूर्व यानि मार्च 2010 में मुझसे ज्‍योतिषीय सलाह लेने के लिए संपर्क किया था। फिर अपने प्रोग्राम के डेटाबेस को देखा , तो उसमें उनका पूरा डिटेल्‍स और आवश्‍यक गणना मौजूद था। बच्‍चों के बारहवीं बोर्ड और इंजीनियरिंग कॉलेजों में प्रवेश परीक्षाओं पर मेरा पूरा ध्‍यान संकेन्‍द्रण बने होने से पिछले तीन वर्षों से फरवरी से जुलाई तक किसी काम में कम ही रूचि बनी रही। तीनों ही वर्ष इन महीनों  में ब्‍लॉग जगत में मेरी सक्रियता कम रही , ज्‍योतिष के क्षेत्र में भी क्रियाकलाप कम हो गए थे। मेरे ब्‍लॉगिंग में पोस्‍टों की संख्‍या से भी इसका अंदाजा लग सकता है। बच्‍चों के इंजीनियरिंग कॉलेजों में दाखिले के बाद पिछले छह आठ महीने से उन पारिवारिक कार्यों में व्‍यस्‍तता बनी हुई है , जिसे तीन वर्षों या उससे पहले से टालती आ रही थी । यही कारण है कि अभी तक किसी भी क्षेत्र में अभी तक नियमितता का अभाव बना हुआ है। 


ज्‍योतिषियों के पते और फोन नं पर संपर्क करनेवालों की कमी नहीं होती , प्रतिदिन एक दो मेल आते रहते हैं , गणना करने से पहले किसी पत्र को प्राथमिकता दी नहीं जा सकती , कभी पत्र की भाषा से जरूरी समझते हुए , तो कभी परिचित देखकर कुछ पत्रों को छांटकर उनके जन्‍म विवरण और आवश्‍यक अन्‍य डेटा अपने डेटाबेस में डाल दिया करती हूं। डेटाबेस में होने से कुछ गणना मेरे द्वारा बनाए गए सॉफटवेयर कर देते हैं (यह काम भी व्‍यस्‍तता की वजह से पूरा नहीं हो सका है) और थोडी गणना मुझे खुद करनी होती है , तब जाकर किसी को कुछ सलाह दी जा सकती है। पर मेरे पास इतना भी समय नहीं होता कि उनको ईमेल किया जा सके। इनके साथ ऐसा ही हुआ था , मैं उनको जबाब नहीं दे सकी थी , पर उनकी सारी गणना हो चुकी थी।


समय होने पर अधिकांश को एक छोटा सा ईमेल भेज दिया करती हूं कि उनका केलकुलेशन हो चुका है , फोन नं दे देने पर वे फोन पर संपर्क कर लेते हैं। बहुत सारे लोगों के काम होने के बाद भी उनसे संपर्क नहीं हो पाता है , जब वे फोन करते हैं , मैं व्‍यस्‍त रहती हूं। जब मैं थोडी फुर्सत में होती हूं , तो लोग व्‍यस्‍त हो जाते हैं। इस तरह कुछ दिनों तक तालमेल न बन पाने से कितनों की गणनाएं  मेरे पीसी में ही पडी रह जाती हैं। हां , कभी कभी मैं जिनकी गणना नहीं किए होती , वही बार बार तकाजा करते हुए अपना काम करवा लेते हैं। मेरे रूटीन में भी इससे असुविधा आती है , पर उन्‍हे कितनी बार मना किया जाए ?? 


इन सबसे बचने के लिए यानि अपने और उनके समय को समय को बचाने के लिए मै अपने ब्‍लॉग पर इस पोस्‍ट के माध्‍यम से ही लोगों को जबाब देने का सिलसिला शुरू कर रही हूं। पिछली पोस्‍ट में मैने एक कुंडली में मौजूद समस्‍या के बारे में चर्चा करते हुए रांची के उक्‍त सज्‍जन को ज्‍योतिषीय सलाह दी थी। ब्‍लॉग पर ही जबाब पढ लेने से उनके साथ साथ मुझे भी काफी सुविधा हुई , नाम न होने से किसी के प्राइवेसी को भी कोई खतरा नहीं रहेगा और बाकी पाठकों का भी ज्ञानवर्द्धन होगा। इस पोसट में उक्‍त ब्‍लॉगर भाई का ग्राफ दिया जा रहा है , जो मेरे कंप्‍यूटर के प्रोग्राम ने निकालकर दिया है .....



जैसा कि आप सभी देख रहे होंगे , 1978 तक उनके जीवन में बिल्‍कुल सहज सुखद परिस्थितियां दिखाई दे रही हैं , पर उसके बाद ग्राफ के नीचे जाने का अर्थ स्‍तर के साथ साथ जबाबदेहियों का बढना दर्शा रहा है। 1984 के बाद कुछ बढे हुए रूप में 1990 के बाद और बढे हुए रूप में तथा 1996 के बाद और बढते हुए 2002 तक लगातार दबाबपूर्ण परिस्थितियां झेलते रहें , इन्‍हें 1984 से 1996 तक पारिवारिक और खर्च तथा 1996 से 2008 तक सामाजिक और ऑफिशियल मामलों का कष्‍ट झेलना पडा।  हालांकि पूरी जीवनयात्रा में कहीं भी जीवन स्‍तर में कमजोरी नहीं दिखाई दे रही है , पर फिर भी जीवन आसान नहीं रहा। 2002 के बाद खुद संघर्ष करते हुए संतान पक्ष से हर प्रकार के सहयोग प्राप्‍त होने से जीवन में कुछ सुधार हुआ और 2008 के बाद परिस्थितियों के ग्राफ में कोई गडबडी नहीं दिखाई दे रही है। वृद्धावस्‍था के सभी ग्रहों के मजबूत होने से कुल वातावरण संतोषजनक है। पर गोचर में शनि के ढैय्या ने अगस्‍त 2008 के बाद मानसिक शांति को समाप्‍त कर रखा है। भाई बंधु या मातृ पक्ष का सहयोग न बनने से इनके सम्‍मुख लाभ के वातावरण में गडबडी आयी है , खासकर दोनो ही वर्ष दिसंबर से जून तक समस्‍याएं काफी बढ जाती हैं। जून 2011 के बाद कुछ राहत मिलने की उम्‍मीद है , थोडी बहुत समस्‍याएं रहेंगी , जो क्रमश: कम होती हुई 2012 तक काफी अच्‍छी हो जाएंगी। संतान पक्ष के काम बनने का समय , लाभ या  व्‍यापार से संबंधित मामलों में सुधार अप्रैल 2012 से होगा । कुल मिलाकर 2012 के बाद के जीवन से इनको बडी शिकायत नहीं रहेगी। 

बचपन में मैं ऐसी ही कुंडलियां बनाती होऊंगी ......

अपने द्वारा बनायी गयी 27 वर्ष पहले की जन्‍मकुंडली मिलने के बाद मैं ज्‍योतिष के क्षेत्र में अपने अनुभव को लेकर काफी खुश थी और इंतजार कर रही थी कि पापाजी कब दिल्‍ली पहुंचे और मैं उनसे इस संबंध में बात कर सकूं। जैसे ही उनके दिल्‍ली पहुंचने की खबर मिली , मैने झट से फोन लगाया और उन्‍हे सारी बातें बतलायी। उन्‍होने बताया कि मैं तो और पहले से जन्‍मकुंडलियां बनाया करती थी । मैने आश्‍चर्य से पूछा कि आपने तो बचपन से ही आपकी सख्‍त हिदायत थी कि मैं ग्रेज्‍युएशन से पहले ज्‍योतिष की पुस्‍तकें नहीं छूऊंगी , फिर मै पहले कुंडली कैसे बना सकती हूं ??

इसके जबाब में पापाजी के शब्‍द थे ... ' कोई व्‍यक्ति विशेषज्ञ यूं ही नहीं बनता ,  बचपन में जब बच्‍चे कागज और कलम या पेन्सिल का प्रयोग करना शुरू करते हैं और कुछ रेखाचित्र खींचने लगते हैं , उस वक्‍त तुम कागज में कुंडलियां बनाया करती थी। हालांकि उस वक्‍त तुम्‍हें यह भी मालूम नहीं था कि कुंडली में जो खाने होते हैं उसमें 1 से 12 तक के अंक ही भरे जाते हैं या फिर उसमें लिखे जानेवाले अक्षर ग्रहों के छोटे रूप होते हैं। इसलिए तुम खेल खेल में जो कुंडलियां बनाया करती थी , उसमें सारे खानों में कोई भी अंक और कोई भी अक्षर लिखा होता था।' फोन रखने के बाद मैं एक बार फिर से बचपन में खो गयी और आपके लिए कंप्‍यूटर पर ये दोनो कुंडलियां बनायी , आखिर बचपन में मैं ऐसी ही कुंडलियां तो बनाती होऊंगी ......




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आज पितृ दिवस पर बस एक गीत ...... मेरे पापा द ग्रेट

ज्‍योतिष का अनुभव

 अपरिचित लोगों के फोन का आना मेरे लिए बिल्‍कुल सामान्‍य बात है । परसों रांची से एक सज्‍जन ने मेरे मोबाइल पर फोन किया। उन्‍होने नाम बताया , पर नाम नहीं बता सकती मैं। उन्‍होने परिचय देते हुए बताया कि 27 वर्ष पूर्व वे मेरे पिताजी से ज्‍योतिषीय सलाह लेने के सिलसिले में मिल चुके हैं , उनके द्वारा बनाया गया जीवन के उतार चढाव का ग्राफ उन्‍होने अभी तक संभाल रखा है। इतने दिनों तक परिस्थितियां लगभग उनके ग्राफ के हिसाब से ही सही चलती हुई अब ऋणात्‍मक हो गयी हैं और कोई उपाय न दिखने से वे पुन: मुझसे सलाह लेना चाहते हैं। मैने बताया कि पापाजी अभी झारखंड में ही हैं और वे उनसे मिल सकते हैं। पर पापाजी के बारे में मुझे उनसे ही नई जानकारी मिली। उन्‍होने बताया कि उन्‍हे कहीं से पापाजी का ही नंबर मिला था , उन्‍होने पहले पापाजी को ही फोन किया था , पर पापाजी धनबाद से राजधानी एक्‍सप्रेस से दिल्‍ली के लिए निकल चुके हैं , इसलिए उन्‍होने संपर्क करने के लिए इन्‍हें मेरा नंबर दिया ।

गजब की बात थी , पापाजी कुछ दिनों से एक काम के सिलसिले में झारखंड के विभिन्‍न शहरों में रह रहे थे , काम के समाप्‍त होने के बाद अपने एक मित्र के पुत्र के विवाह के इंतजार में 8 जून तक मेरे यहां ठहरे हुए थे , विवाह हमलोगों ने साथ साथ एटेंड किया , विवाह संपन्‍न होने के बाद वे सामान सहित धनबाद चले गए थे। मुझे दिल्‍ली के टिकट बनवाने को कहा , पर दूर दूर तक किसी भी ट्रेन में खाली बर्थ नहीं मिली। मैने कहा कि प्रोग्राम पक्‍का करने के बाद तत्‍काल का ही टिकट ले लेना अच्‍छा होगा। मैं इधर इंतजार ही कर रही थी कि टिकट के लिए पापाजी का कोई आदेश आए और पापाजी राजधानी एक्‍सप्रेस से दिल्‍ली के लिए निकल भी पडे थे। वैसे ये कोई नई बात नहीं थी , धनबाद में पापाजी आम नहीं , खास हो जाते हैं , उनके मित्रों ने वी आई पी कोटे में उनके  लिए टिकट की व्‍यवस्‍था कर दी होगी। आम से याद आया , छोटी बहन , जो धनबाद में ही रहती है , का सुबह फोन आया था कि दिल्‍ली के लिए पापाजी ने आम मंगवाया है , व्‍यस्‍तता की वजह से उसकी इस बात पर मैं ध्‍यान नहीं दे पायी थी। दरअसल पूरे परिवारवालों के लिए बिहार के आम का स्‍वाद बहुत मायने रखता है , इसलिए इस मौसम में बिहार से दिल्‍ली जानेवालों के लिए आम की टोकरी ले जाना अनिवार्य है।

मैने उन्‍हें ढाढस बंधाते हुए कहा कि वे अपना जन्‍म विवरण भेज दें , मैं देख लूंगी कि समस्‍या क्‍या है ?? उन्‍होने बताया कि जब वे पापाजी से मिले थे , उनके पास सिर्फ जन्‍म तिथि थी , उनके जीवन की घटनाओं से जन्‍मसमय का अंदाजा लगाते हुए पापाजी ने उनके जन्‍म का संभावित समय निकालकर उनकी जन्‍मकुंडली बनायी थी और उनके जीवन के उतार चढाव का ग्राफ खींचा था। चूंकि उनके पास जन्‍मविवरण नहीं था , इसलिए मैने उन्‍हें अपने ईमेल पर पापाजी के द्वारा बनी उनकी कुंडली और ग्राफ भेजने को कहा। कल उन्‍होने जो भेजा , उसमें अपने हाथ से लिखी ग्रहों की डिग्री और ग्राफ के वर्ष को देखकर मैं चौंक गयी। उसे आप भी देखिए ..... 


1981 में पापाजी के द्वारा ग्रहों की गत्‍यात्‍मक शक्ति की खोज के बाद ग्राफ खींचे जाने के लिए एक फार्मूले की खोज होने के तुरंत बाद यह पापाजी के सबसे पुराने पैड पर मेरे द्वारा बनायी गयी जन्‍मकुंडली और ग्राफ था । इसका अर्थ यह है कि मैं खुद को जितने दिन का ज्‍योतिष का अनुभवी समझती थी , उससे कहीं अधिक हूं। हालांकि पापाजी ने मुझसे यह जन्‍मकुंडली बनवायी थी , पर विश्‍लेषण खुद ही किया था। इसलिए रांची वाले उक्‍त सजजन को मेरी याद नहीं है। जैसा कि आप ग्राफ में देख रहे होंगे , पूरे जीवन की परिस्थितियां + में हैं , जबकि 2000 के बाद , खासकर 2006 के बाद की परिस्थितियां - दिखा रही हैं। 2012 में ग्राफ बिल्‍कुल नीचे आ गया है , यही कारण है कि इनके सम्‍मुख भयावह परिस्थितियां उपस्थित हो गयी है। कल इनसे बात करने पर ऐसा महसूस हुआ कि इनका सबकुछ समाप्‍त होने जा रहा है।

इस वर्ष इनके समक्ष सचमुच बहुत बिगडी हुई परिस्थितियां रह सकती हैं , पर जैसा कि आप देख रहे होंगे , 2012 के बाद पुन: ग्राफ ऊपर की दिशा को प्रवृत्‍त है , इसलिए क्रमश: सुधारोन्‍मुख परिस्थितियां बनेंगी। वर्षभर आनेवाली विपरीत परिस्थितियों से इन्‍हे तनिक भी घबराने की आवश्‍यकता नहीं  , प्रकृति के नियमों पर भरोसा रखना आवश्‍यक होगा।चूंकि 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' के हिसाब से वृद्धावस्‍था को संचालित करनेवाला ग्रह बृहस्‍पति होता है , इसलिए इसके बुरे प्रभाव को दूर करने के लिए पीले रंग का अधिक से अधिक उपयोग किया जा सकता है। साथ ही 17 जुलाई 2011 को सुबह 7 बजे से 10 बजे के मध्‍य सोने को पूर्ण तौर पर गलाकर तैयार किया गया छल्‍ला पहन लें , जिससे मनोवैज्ञानिक तौर पर ये मजबूत होंगे और किसी भी झंझट को झेलने की शक्ति में बढोत्‍तरी प्राप्‍त करेंगे। इस दौरान मेरी शुभकामनाएं हर वक्‍त इनके साथ होंगी।