होली की बहुत बहुत बधाई



ज्‍योतिष के विकास के लिए इसका विकसित विज्ञान के साथ सहसंबंध बनाना आवश्‍यक ...

पृथ्‍वी की निरंतर गतिशीलता के कारण प्रत्‍येक दो घंअे में विभिन्‍न लग्‍नों का उदय है। इसकी दैनिक गति के कारण दिन और रात का अस्तित्‍व है, वार्षिक गति के कारण इसके ऋतु परिवर्तन का चक्र। गति के कारण ही चंद्रमा का बढता घटता स्‍वरूप है , गति के कारण विशिष्‍ट ग्रहों की पहचान है। सूर्य और चंद्र की गति के कारण ही नक्षत्रों का वर्गीकरण है , सूर्य और चंद्र का ग्रहण है। ग्रहों की गति के कारण ही संसार का नित नूतन पिरवेश है और इसी परिवर्तनशीलता के कारण इसका नाम जगत है। न्‍यूटन ने गति के सिद्धांत को समझा, तो भौतिक विज्ञान में क्रांति आ गयी। आज उन्‍ही सिद्धांतों को अधिक विकसित कर वैज्ञानिक अंतरिक्ष में अरबों मील की यात्रा करके तरह तरह की खोज करके सकुशल पृथ्‍वी पर लौट आते हैं।

सृष्टि काल के आरंभ से ही सूर्य , चंद्र और सभी ग्रहों की गति हमारे लिए आकर्शण का केन्‍द्र बने रहें। वैदिककालीन विद्याओं में यह प्रमुख विद्या थी , इसलिए इसे वेद का नेत्र कहा जाता था। उस समय से आजतक आकाशीय पिंडों की गति और स्थिति के विषय में बहुत जानकारी प्राप्‍त कर ली गयी है , सभी पिंडों की गति और परिभ्रमण पथ की इतनी सूक्ष्‍म जानकारी आज है कि आज से सैकडों वर्ष बाद के सभी ग्रहों की स्थिति , सूर्य और चंद्र ग्रहण की जानकारी मिनट सेकण्‍ड की शुद्धता के साथ दी जा सकती है। सूर्य चंद्र परिभ्रमण पथ की सम्‍यक जानकारी के कारण यह भी बताया जा सकता है कि पृथ्‍वी के किस भाग में यह ग्रहण दिखाई पडेगा। यही कारण है कि गणित ज्‍योतिष की पढाई संपूर्ण विश्‍व में हो रही है। गति की सम्‍यक जानकारी के कारण ही पंचांग में तिथि , नक्षत्र , योग , करण आदि का समुचित उल्‍लेख किया जाता है , पर फलित के मामलों में गहों की गति की उपेक्षा की गयी है। फलित ज्‍योतिष में ग्रहों की सिर्फ स्थिति पर ही विचार किया गया है , इसलिए आज तक इसके द्वारा कहा जाने वाला फल अधूरा और अनिश्चित रह गया है।

पृथ्‍वी स्‍वयं गतिशील है , दैनिक और वार्षिक गति के कारण अपने अक्ष और कक्षा में सदैव अपने को हजारो मील दूर ले जाती है। किंतु पृथ्‍वी वासी होने के कारण हमें इसकी गति का आभास भी नहीं हो पाता है , क्‍यूंकि पृथ्‍वी पर स्थित हर जड चेतन की गति पृथ्‍वी की गति के बराबर हो जाती है। ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार ट्रेन पर सवार सभी व्‍यक्ति विरामावस्‍था में होते हुए भी लंबी दूरी तय कर लेते हैं। फलित ज्‍योतिष के अध्‍येता अपने को ब्रह्मांड का केन्‍द्र विंदू मानकर इसे स्थिरावस्‍था में समझते हुए ही संपूर्ण ब्रह्मांड और आकाशीय पिंडों का अध्‍ययन करता है। ब्रह्मांड में दरअसल पृथ्‍वी के साथ शेष ग्रह भी सूर्य की परिक्रमा कर रहे हैं। अत: पृथ्‍वी को विरामावस्‍था में मानने से इसके सापेक्ष सभी ग्रहों की सापेक्षिक गति की जानकारी होती है।

पृथ्‍वी सूर्य की प्रत्‍यक्ष परिक्रमा करता है , इस कारण उसके सापेक्ष सूर्य की समरूप गति को हम देख पाते हैं , चंद्रमा को भी पृथ्‍वी की प्रत्‍यक्ष परिक्रमा करते हुए देखा जा सकता है। भचक्र में ये दोनो ग्रह लगभग समरूप गति में होते हैं। सूर्य कभी उत्‍तरायण तो कभी दक्षिणायण होता है , उसके हिसाब से विभिन्‍न ऋतुएं होती हैं , विभिन्‍न नक्षत्रों से गुजरता है तो उसके अनुरूप उसका फल होता है। चंद्रमा के प्रकाशमान भाग के अनुरूप ही जातक की मनोवैज्ञानिक शक्ति होती है । किसी निश्चित तिथि को सूर्य आकाश के एक निश्चित भाग में ही होता है , पर उस दिन जन्‍म लेने वाले समस्‍त जातकों की कुंडली में विभिन्‍न भावों में दर्ज किया जाता है। उसका फल भी भिन्‍न भिन्‍न जातकों के लिए अलग अलग होता है।

आकाश में शेष ग्रहों का पृथ्‍वी से अप्रत्‍यक्ष गत्‍यात्‍मक संबंध है। यानि की सौरमंडल में अन्‍य सभी ग्रह सूर्य की परिक्रमा करते हुए कभी पृथ्‍वी की ओर आ जाते हैं , तो कभी पृथ्‍वी के विपरीत दिशा में। इसके कारण पृथ्‍वी से विभिन्‍न ग्रहों की दूरी और सापेक्षिक गति बढती घटती है। पृथ्‍वी के सापेक्ष कभी कभी ग्रहों की गति ऋणात्‍मक भी हो जाती है। ‘गणित ज्‍योतिष’ में इसकी विशद चर्चा है , पर ‘फलित ज्‍योतिष’ का अध्‍ययन करते वक्‍त आज तक ग्रहों की इस गति को नजरअंदाज कर दिय गया , जो ग्रहों के बलाबल का सही आधार है। यह विडंबना ही है कि बंदूक की छोटी सी गोली में उसकी शक्ति का अनुमान उसकी गति के कारण हम सहज ही कर लेते हैं। हथेली पर एक छोटा सा पत्‍थर का टुकडा रखकर अपने को बलवान समझते हैं , क्‍यंकि उसे गति देकर शक्ति उत्‍सर्जित की जा सकती है , पर हजारो मील प्रतिघंटा की गति वाले भीमकाय ग्रहों की शक्ति को आज तक ज्‍योतिषी इसकी स्थिति में ढूंढते आ रहे हें। जाने अनजाने ग्रहों की गति के रहस्‍य को नहीं समझ पाने से फलित ज्‍योतिष की गति स्‍वत: अवरूद्ध हो गयी। यही करण है कि हजारो वर्षों से इसकी स्थिति यथावत बनी हुई है और लोग इसे अनुमान शास्‍त्र कहने लगे हैं।

प्रकृति के नियम बहुत ही सरल होते हैं , एक दो प्रतिशत ही अपवाद होते हैं,पर इसे समझने में हमें बहुत समय लग जाता है। फलित ज्‍योतिष की पुस्‍तकों में ग्रह शक्ति के निर्धारण के लिए बहुत सारे नियम हैं। स्‍थान बल , काल बल , दिक बल , नैसर्गिक बल , चेष्‍टा बल , अंश बल , योग कारक बल , पक्ष बल , अयन बल , स्‍थान बल के अलावे भी ष्‍डवर्ग अष्‍टकवर्ग आदि आदि। इसका अभिप्राय यह है कि हमारे .षि मुनि पूर्व ज्‍योतिषियों ने ग्रह शक्ति को समझने की चुनौती को स्‍वीकार किया था। इस परिप्रेक्ष्‍य में उनके द्वारा बहुआयामी प्रयास किया गया , इस लिए ग्रहशक्ति से संबंधित इतने नियम हैं , किंतु व्‍यवहारिक दृष्टि से एक ज्‍योतिषी इतने नियमों को आतमसात करते हुए तल्‍लीन रहकर भविष्‍य कथन नहीं कर सकता। इतने नियमों के मध्‍य विभिन्‍न ज्‍योतिषियों के फलकथन में एकरूपता की बात हो ही नहीं सकती। ज्‍योतिष के इन जटिल सूत्रों ने ग्रह फल कथन में ज्‍योतिषियों के निष्‍कर्ष में विरूपता पैदा कर इसके वैज्ञानिक स्‍वरूप को नष्‍ट करते हुए इसे अनुमान शास्‍त्र बना दिया है। इन उलझनों से बचने के लिए एकमात्र उपाय ग्रहों की गतिज और स्‍थैतिज ऊर्जा का सहरा लेना समीचीन सिद्ध हुआ है। फलित ज्‍योतिष में अन्‍य नियमों की तरह ये नियम भी ग्रह शक्ति निर्धारण के लिए एक नया प्रयोग नहीं है। सन् 1981 से अबतक पच्‍चीस तीस हजार कुंडलियों में किए गए प्रयोग का निचोड निष्‍कर्ष है।

फलित ज्‍योतिष सबसे पुरानी विधाओं में एक वैदिककालीन विद्या है। किंतु भौतिक विज्ञान में वर्णित न्‍यूटन के गति के सिद्धांत का आविष्‍कार सन् 1887 में हुआ , इससे पूर्व ज्‍योतिष में इसका उपयोग संभव नहीं था। पर उसके बाद इसका उपयोग फलित ज्‍योतिष के क्षेत्र में भी होना चाहिए था , क्‍यूंकि किसी भी विज्ञान का विकास विकसित विज्ञान के साथ सहसंबंध बनाकर ही होता है। अगर हम फलित ज्‍योतिष को विज्ञान बनाना चाहते हैं तो हमें भौतिक विज्ञान में वर्णित गतिज और स्‍थैतिज ऊर्जा का सहारा लेना , उसका उपयोग करना एक स्‍वस्‍थ दृष्टिकोण होगा। ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ में ग्रहों की गति की विशद व्‍याख्‍या करते हुए इसकी विभिन्‍न प्रकार की गतियों का सपष्‍ट भिन्‍न भिन्‍न प्रभाव मानव जाति पर कैसे पडता है , का अध्‍ययन किया गया है।


गत्यात्मक ज्योतिष क्या है ?

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वेलेण्‍टाइन डे



रूमानित भरा मौसम होता है वसंत का

वसंत के मौसम में रूमानियत तो होती ही है ,भारतीय संस्‍कृति मे भी इस महीने प्‍यार के अनेक रंग बिखेरता होली का त्‍यौहार मनाए जाने की परंपरा रही है। इसलिए इस महीने प्रेम की महिमा से इंकार नहीं किया जा सकता है , यह अलग बात है कि पहले कम उम्र में विवाह होते थे , तो विवाह के बाद इसका नशा चढता था और आज कैरियर को बनाने के चक्‍कर में लगे विवाह में देर करनेवाले युवाओं युवतियों पर इसका नशा पहले ही छाने लगा है। पर प्रेम संबंध और विवाह दोनों को अलग अलग नहीं रखा जा सकता। जब किसी लड़का और लड़की के बीच प्रेम होता है तो वे साथ साथ जीवन बीताने की ख्वाहिश रखते हैं और विवाह करना चाहते हैं। पश्चिमी सभ्‍यता की देखा देखी भारतवर्ष में भी युवा प्रेमी प्रेमिकाएं द्वारा 14 फरवरी को वेलेण्‍टाइन डे मनाने की परंपरा चल पडी है। वेलेण्‍टाइन डे मनाने के लिए जितनी तैयारी ये करते हैं , उससे कम तैयारी इसका विरोध करनेवाले नहीं करते। भारतीय सभ्‍यता और संसकृति की रक्षा करने के नाम पे युवकों युवतियों द्वारा इस परंपरा को मनाए जाने का का प्रतिवर्ष पुरजोर विरोध किया जाता रहा है। इसके बावजूद पार्कों , पिकनिक स्‍थलों और अन्‍य सार्वजनिक स्‍थलों पर इनकी भीड जुटती है। 

मेष लग्‍नवालों के लिए सर्वाधिक महत्‍वपूर्ण ..

प्रतिवर्ष वेलेण्‍टाइन डे के दिन ग्रहों की स्थिति भिन्‍न भिन्‍न होती है। इस साल वेलेंटाइन डे पर चंद्रमा की स्थिति बहुत ही मजबूत है , चंद्रमा मन को प्रभावित करता है , इसलिए लोगों का उत्‍साह बना रहेगा। चंद्रमा के साथ शनि की ज्‍योतिष के हिसाब से शुक्र , जो प्रेम का ग्रह है , की स्थिति भी आज बहुत ही मजबूत बनी हुई है। इसलिए इस त्‍योहार को मनाने का पूरा जोश बना रहेगा। चंद्रमा की मजबूती के कारण के कारण मकर लग्‍नवाले , और शुक्र की मजबूती के कारण मेष और वृश्चिक लग्‍नवाले अनुकूल माहौल उपस्थित पाएंगे। चंद्रमा के साथ शनि की स्थिति कर्क और सिंह लग्‍नवालों को भी सुखद कार्यक्रमों से जुडाव बनाएंगी। कुल मिलाकर यह दिन मेष लग्‍नवाले प्रे‍मी प्रेमिकाओं के लिए सर्वाधिक तथा कर्क , सिंह , वृश्चिक और मकर लग्‍न के प्रेमी प्रेमिकाओं के लिए खासे महत्‍व का होगा, अन्‍य लग्‍नवालों के लिए औसत हो सकता है। खासकर 11 बजे से 2 बजे दिन और 10 बजे से 1 बजे रात्रि तक का समय खास मनोनुकूल हो सकता है।

16 वर्ष से 19 वर्ष की उम्र के नौजवान सावधान रहें

पर जहां चंद्रमा और शुक्र की स्थिति माहौल को सुखात्‍मक बनाए रखेगी , वहीं चंद्रमा के साथ वक्री शनि की स्थिति कुछ गडबडी उपस्थित कर सकती है। शनि के कारण बहुत सारे लोगों के साथ ही साथ 16 वर्ष से 19 वर्ष की उम्र तक के टीन एजर किशोरों को खासकर बहुत सावधानी बनाए रखने की आवश्‍यकता है। 7 बजे से 11 बजे दिन और 10 बजे से 1 बजे रात्रि तक का समय उनका विशेष गडबड रह सकता है। इस वक्‍त किसी भी प्रकार की विपत्ति में ये फंस सकते हैं। गोचर में मंगल की स्थिति भी बहुत कमजोर चल रही है , जो युवा वर्ग को बाधा उपस्थित करने के लिए काफी है , खासकर 6 बजे से 9 बजे तक का समय उनके लिए ठीक नहीं। वृष और तुला लग्‍नवाले युवकों युवतियों के समक्ष भी बहुत कठिन माहौल बनेगा। हां , यह वेलेण्‍टाइन दिवस विवाहित लोगों के लिए सुखद होगा , सिर्फ मिथुन और कन्‍या लग्‍न वालों के लिए कुछ परेशानी उपस्थित हो सकती है।



भाग्‍य बडा या कर्म ?


भाग्‍य बडा या कर्म .. इस बात पर अबतक सर्वसम्‍मति का अभाव है। दोनो पक्ष के लोग अपनी अपनी बातों को सही साबित करने के लिए अलग अलग तर्क दिया करते हैं , अलग अलग कहानियां गढा करते हैं। कर्म को मानने वाले लोगों का मत है कि हम जैसे कर्म करते हैं , वैसा ही फल मिलता है। असफलता स्थिति में हमें अपने भीतर झांकना चाहिए कि चूक कहां हुई। लेकिन हम धागे, टोने-टोटकों , माथे या हाथों की लकीरों और जन्‍मकुंडलियों से भाग्य को समझने की कोशिश करते हैं, यदि कर्म अच्छे हैं तो भाग्य अपने आप अच्छा हो ही जाएगा। इस दुनिया राजा से रंक और रंक से राजा बनने के कहानियों की कोई कमी नहीं। 



दूसरी ओर भाग्‍य को मानने वाले लोगों का कहना है कि क्यों कुछ बच्‍चे मजबूत शरीर और कुछ कई बीमारियों के साथ या बिना हाथ पांव के जन्‍म लेते हैं। क्‍यूं कुछ बच्‍चे सुख सुविधा संपन्न परिवारों में तो कुछ का जन्‍म दरिद्रों के घर में होता है। कुछ अच्‍छे आई क्‍यू के साथ जन्‍म लेते हैं , तो कुछ अविकसित मस्तिष्‍क के साथ ही इस दुनिया में कदम रखते हैं। कुछ का पालन पोषण माता पिता और परिवार जनों के भरपूर लाड प्‍यार में होता है , तो कुछ इससे वंचित रह जाते हैं। जबकि इन बच्‍चों ने कोई गल्‍ती नहीं की है। इसी प्रकार बडे होने के बाद किसी को मनोनुकूल जीवनसाथी मिलते हैं,तो विवाह के बाद किसी का जीवन नर्क हो जाता है। किसी को अनायास संतान का सुख मिलता है , तो कई जीवनभर डॉक्‍टरों और देवी देवताओं के चक्‍कर काटते हैं। सचमुच विपरीत पक्ष वालों के लिए इसका जबाब दे पाना कठिन है।


वास्‍तव में कार्य कारण के नियमों से पूरी प्रकृति भरी पडी है। इतनी बडी प्रकृति में हमने कोई भी काम बिना नियम के होते नहीं देखा है। सूर्य अपने पथ पर तो बाकी ग्रह उपग्रह भी अपने पथ पर चल रहे हैं। पृथ्‍वी पर स्थित एक एक जड चेतन अपने अपने स्‍वभाव के हिसाब से काम कर रहे हैं। हम जैसा कर्म करेंगे , वैसा फल मिलेगा ही । बिना संतुलन के दौडेंगे , तो गिरेंगे , गिरेंगे तो चोट लगेगी। यदि कार्य और कारण का संबंध न हो तो हम कोई नियम स्‍थापित नहीं कर सकते। पर बालक ने जन्‍म लेते साथ जो पाया , वह उसके कर्म का फल नहीं। पर यहां भी तो कोई नियम काम करना चाहिए , आज विज्ञान माने या न माने , पर यह फल बिना किसी नियम के उसे नहीं मिल सकता।

जबतक कर्म से अधिक फल की प्राप्ति होती रहती है , कोई भी भाग्‍य की ताकत को स्‍वीकार नहीं करता। उसे महसूस होता है कि उसे उसके किए का ही फल मिल रहा है। जिन्‍हें फल नहीं मिल रहा , वे कर्म ही सही नहीं कर रहें। पर जब कर्म की तुलना में प्रतिफल नहीं मिल पाता , लोग भाग्‍य की ताकत को महसूस करने लगते हैं। अपने आरंभिक जीवन में सफल रहनेवाले लोग इसे स्‍वीकार नहीं कर पाते , पर जैसे ही उनके जीवन में भी बिना किसी बुरे कर्म के विपत्तियां दिखाई पडती हैं , उन्‍हें भी भाग्‍य की ताकत महसूस होने लगती है। जीवन के प्रारंभिक दौर में असफलता प्राप्‍त करने वाले लोग तो जीवन में संतुलन बना भी लेते हैं , बाद में  भाग्‍य के कारण  असफलता प्राप्‍त करने वालों को अधिक कष्‍ट होता है। 

भाग्‍य को जानने के लिए अक्‍सर लोग ज्‍योतिषियों से संपर्क करते हैं , पर प्रारब्‍ध की जानकारी ज्‍योतिषियों को भी नहीं होती। भिन्‍न भिन्‍न स्‍तर वाले परिवार में भी बच्‍चे का जन्‍म एक समय में हो सकता है यानि एक जन्‍म कुंडली होते हुए भी बच्‍चे का भाग्‍य अलग अलग हो सकता है। नक्षत्रों और ग्रहों पर आधारित ज्‍योतिष मात्र काल गणना का विज्ञान है। जिस तरह घडी के समय के आधार पर अंधरे उजाले को देखते हुए दिनभर के और कैलेण्‍डर के आधार पर जाडे , गर्मी , बरसात के मौसम को समझते हुए वर्षभर के कार्यक्रमों को अंजाम दिया जाता है , उसी प्रकार हम जन्‍म कालीन ग्रहों के आधार पर अपने जीवन के उतार चढाव को समझकर तदनुरूप कार्यक्रम बना सकते हैं। जीवन में कभी समय आपके अनुकूल होता है तो कभी प्रतिकूल , प्रतिकूल समय में आपके अनुभव बढते हैं , जबकि अनुकूल समय में आपको अच्‍छे परिणाम मिलते हैं। अच्‍छे वक्‍त की जानकारी से आपका उत्‍साह, तो बुरे वक्‍त की जानकारी से आपका धैर्य बढता है। 

किसी खास परिवार , देश या माहौल में जन्‍म लेना तो मनुष्‍य के वश में नहीं , इसलिए जीवन में जैसी जैसी परिस्थिति मिलती जाए , उसे स्‍वीकार करना हमारी मजबूरी है , पर आशावादी सोंच के साथ अच्छे कर्म किए जा सकते हैं और उनके सहारे अपने भाग्‍य को मजबूत बनाया जा सकता है। महीने के पहली तारीख को मिले तनख्‍वाह को कम या अधिक करना आपके वश में नहीं , पर उससे पूरे महीने या पूरे जीवन अच्‍छे या बुरे तरीके से जीवन निर्वाह करना आपके वश में है। आप पहले ही दिन महीनेभर क्‍या भविष्‍य के भी कार्यक्रम बनाकर नियोजित ढंग से खर्च कर सकते हैं या बाजार में अंधाधुंध खरीदारी कर , शराब पीकर , जुआ खेलकर महीने या भविष्‍य के बाकी दिनों को बुरा बना सकते हैं। इसलिए किसी खास परिस्थिति में होते हुए भी कर्म के महत्‍व से इंकार नहीं किया जा सकता।
हां , जीवन में कभी कभी ऐसा समय भी आता है ,जब भाग्‍य के साथ देने से मित्रों , समाज या कानून का कुछ खास सहयोग आपको मिलने लगता है ,किसी तरह के संयोग से आपके काम बनने लगते हैं , तो कभी दुर्भाग्‍य से असामाजिक तत्‍वों को भी आपको झेलना पडता है। 100 वर्ष की लंबी आयु में कभी दस बीस वर्षों तक ग्रहों का खास अच्‍छा या बुरा प्रभाव हमपर पड सकता है। उस भाग्य या दुर्भाग्य से खुद को फायदा दिलाने के लिए हमें आक्रामक या सुरक्षात्‍मक ढंग से जीवन जीना चाहिए। जैसे जाडे की सूरज की गर्मी को सेंककर हम खुद को गर्म रखते हैं या गर्मी की दोपहर के सूरज की ताप में बचने के किसी पेड़ की छाया में या वातानुकूलित घर में शरण लेते हैं। 


पर ध्‍यान रखें , जीवन में कभी भी हमारा मेहनत विफल नहीं होता । प्रकृति में प्रत्‍येक वस्‍तु का महत्‍व है , किसी में कुछ गुण हैं ,उसे विकसित करने की दिशा में कदम बढाए , आज या कल , उसकी कद्र होगी ही। कोई बीज तीन चार महीने में तो कोई दस बीस वर्ष में फल देना आरंभ करता है। हर पशु पक्षी का भी हर काम का अलग अलग समय है। देखने में एक जैसे होते हुए भी हर मनुष्‍य अलग अलग तरह के बीज हैं , इन्‍हें फलीभूत होने के लिए भी अनुकूल परिस्थितियों की आवश्यकता होती है । आसमान में गोचर के ग्रह मनुष्‍य के सम्‍मुख विभिन्‍न परिस्थितियों का निर्माण करते हैं , जिसके आधार पर कर्म का सुंदर फल प्राप्‍त होता है। लोग भले ही इसे भाग्‍य का नाम दें , पर वह हमारे सतत कर्म का ही फल होता है।


सच्‍चा जीवनसाथी [कहानी] - संगीता पुरी

hamari kahani

साहित्‍य शिल्‍पी में प्रकाशित मेरे द्वारा लिखी कुछ कहानियों में आपके लिए एक और कहानी .....शाम के 4 बज चुके हैं , दिन भर काम करने के कारण थकान से शरीर टूट रहा है , इसके बावजूद टेबल पर फाइलों का अंबार लगा है। पिछले एक सप्‍ताह से दो चार छह फाइले छोडकर समय पर घर चले जाने से समस्‍या बढती हुई इस हालात तक पहुंच गयी है। यदि एक एक घंटे बढाकर काम न किया जाए तो फाइलों का यह ढेर समाप्‍त न हो सकेगा। सोंचकर मैने चपरासी को एक कप चाय के लिए आवाज लगायी और फाइले उलटने लगा। अब इस उम्र में कार्य का इतना दबाब शरीर थोडे ही बर्दाश्‍त कर सकता है , वो भी जिंदगी खुशहाल हो तो कुछ हद तक चलाया भी जा सकता है , पर साथ में पारिवारिक तनाव हों तो शरीर के साथ मन भी जबाब दे जाता है। चाय की चुस्‍की के साथ काम समाप्‍त करने के लिए मन को मजबूत बनाया।


किंतु ये फोन की घंटी काम करने दे तब तो। ऑफिस के नंबर पर भैया का फोन ,मैं चौंक पडा। ‘मुझे मालूम था , तुम ऑफिस में ही होगे। हमलोग एक जरूरी काम से दिल्‍ली आए हैं , तुम्‍हारे घर के लिए टैक्‍सी कर चुके हैं। तुम भी जल्‍द घर पहुंचो’
’क्‍यूं भैया, अचानक, कोई खास बात हो गयी क्‍या ?’ मेरी उत्‍सुकता बढ गयी थी।
’हां खास ही समझो, जॉली, हैप्‍पी और मेघना आ रहे थे, हैप्‍पी के विवाह के लिए लडकी देखने। मुझे भी साथ ले लिया , अब होटल में रहने से तो अच्‍छा है , तुम्‍हारे यहां रहा जाए’ साधिकार उन्‍होने कहा।
‘जी , आपलोग जल्‍द घर पहुंचिए , मैं भी पहुंच रहा हूं।‘ ऑफिस के फाइलों को पुन: कल पर छोडकर मैं तेजी से घर की ओर चल पडा।

भैया आ रहे थे , मेरे नहीं मानसी के , पर मेरे अपने भैया से भी बढकर थे। जिंदगी के हर मोड पर उन्‍होने मुझे अच्‍छी सलाह दी थी। उम्र में काफी बडे होने के कारण वे हमें बेटे की तरह मानते थे। उनके साले के लडके जॉली का परिचय भी हमारे लिए नया नहीं था। भैया ने हमारी श्रेया के जीवनसाथी के रूप में जॉली की ही कल्‍पना की थी। जॉली को भी श्रेया बहुत पसंद थी। श्रेया का रंग सांवला था तो क्‍या हुआ चेहरे का आत्‍मविश्‍वास , आंखों की चमक और बहुआयामी व्‍यक्तित्‍व किसी को भी खुश कर सकता था। स्‍कूल कॉलेज के जीवन में मिले सैकडों प्रमाण पत्र और मेडल इसके साक्षी थे। एक चुम्‍बकीय व्‍यक्तित्‍व था उसमें , जो बरबस किसी को अपनी ओर आकर्षित कर लेता था। श्रेया को भी जॉली पसंद था , पर एक पंडित के कहने पर हमने उसकी सगाई भी न होने दी थी। उक्‍त ज्‍योतिषी का कहना था कि जॉली की जन्‍मकुंडली में वैवाहिक सुख की कमी है , विवाह के एक वर्ष के अंदर ही उसकी पत्‍नी स्‍वर्ग सिधार जाएगी। इसी भय से हमने जॉली और श्रेया को एक दूसरे से अलग कर दिया था। मेघना से विवाह हुए जॉली के चार वर्ष व्‍यतीत हो गए। एक बेटा भी है उन्‍हें , सबकुछ सामान्‍य चल रहा है उनका , उक्‍त ज्‍योतिषी पर मुझे एक बार फिर से क्रोध आया।

इस रिश्‍ते को तोडने के बाद हमारे परिवार को खुशी कहां नसीब हुई। कहां कहां नहीं भटका मैं श्रेया के लिए लडके की खोज में , पर लडकेवालों की गोरी चमडी की भूख ने मुझे कहीं भी टिकने नहीं दिया। तीन चार वर्षों की असफलता ने मुझे तोडकर रख दिया था। रवि से विवाह करते वक्‍त मैने थोडा समझौता ही किया था , इससे इंकार नहीं किया जा सकता , पर आगे चलकर यह रिश्‍ता इतना कष्‍टकर हो जाएगा , इसकी भी मैने कल्‍पना नहीं की थी। रवि बहुत ही लालची लडका था, वो किसी का सच्‍चा जीवनसाथी नहीं बन सकता था। अपना उल्‍लू सीधा करने के लिए मेरे साथ अपना व्‍यवहार अच्‍छा रखता , पर आरंभ से ही श्रेया के साथ उसका व्‍यवहार अच्‍छा नहीं रहा। समाज के भय से मैने श्रेया को समझा बुझाकर ससुराल में रहने के लिए भेज तो दिया , पर वह वहां एक महीने भी टिक न सकी।

एक दिन सुबह सुबह घंटी बजने पर दरवाजा खोलते ही श्रेया ने घर में प्रवेश किया , काला पडा चेहरा , कृशकाय शरीर , आंखों के नीचे पडे गड्ढे , बिखरे बाल और रोनी सूरत उसकी हालत बयान् कर रहे थे। बेचारी ने ससुरालवालों का जितना अन्‍याय सही था , उसका एक प्रतिशत भी हमें नहीं बताया था। श्रेया मुझसे लिपटकर रोने लगी , तो मेरी आंखों में भी आंसू आ गए। न संतान के सुखों से बढकर कोई सुख है और न उनके कष्‍टों से बढकर कोई कष्‍ट। ‘अब मैं वहां वापस कभी नहीं जाऊंगी पापा’ वह फट पडी थी।
‘क्‍या हुआ बेटे’ सब जानते और समझते हुए भी मैं पूछ रहा था। मानसी भी अब बाहर के कमरे में आ चुकी थी।
‘पापा, वे लोग मुझे बहुत तंग करते हैं , बात बात में डांट फटकार , न तो चैन से जीने देते हैं और न मरने ही। सारा दिन काम में जुते रहो , सबकी चाकरी करो , फिर भी परेशान करते हैं , लोग तो नौकरों से भी इतना बुरा व्‍यवहार नहीं करते’ उसने रोते हुए कहा।

’मैं समझ रहा हूं बेटे , तुम्‍हारी कोई गल्‍ती नहीं हो सकती। तुम तो बहुत समझदार हो , इतने दिन निभाने की कोशिश की , लेकिन वे लोग तुम्‍हारे लायक नहीं। तुम पढी लिखी समझदार हो , अपने पैरों पर खडी हो सकती हो , दूसरे का अन्‍याय सहने की तुझे कोई जरूरत नहीं।‘ मैंने उसका साथ देते हुए कहा।
’उनलोगों ने सिर्फ लालच में यहां शादी की है, ताकि समय समय पर पूंजी के बहाने एक मोटी रकम आपसे वसूल कर सके। मुझसे नौकरी करवाकर मेरे तनख्‍वाह का भी मालिक बन सके , और घर में एक मुफ्त का नौकर भी। मेरे कुछ कहने पर कहते हैं कि तेरे पापा ने अपनी काली कलूटी बेटी हमारे मत्‍थे यूं ही मढ दी , कुछ दिया भी नहीं’
’छोडो बेटे , तुम फ्रेश हो जाओ , नई जिंदगी शुरू करो , पुरानी बीती बातों को भूलना ही अच्‍छा है। मैं अब फिर तुम्‍हें उस घर में वापस नहीं भेजूंगा’

कहने को तो कितनी आसानी से कह गया था, पर भूलना क्‍या इतना आसान है ? एक परित्‍यक्‍ता को अपनी जिंदगी ढोने में समाज में कितनी मुसीबतें होती हैं , इससे अनजान तो नहीं था मैं। इन दो वर्षों में ही श्रेया की चहकती हंसी न जाने कहां खो गयी है , चेहरे का सारा रस निचोड दिया गया लगता है , आंखों की चमक गायब है , सारा आत्‍मविश्‍वास समाप्‍त हो गया है , बात बात पर उसके आंखों से आंसू गिर पडते हैं , उसकी हालत इतनी खराब है कि कोई पुराने परिचित उसे पहचान तक नहीं पाते।

एक मिष्‍टान्‍न भंडार के पास मैने गाडी खडी कर दी , पता नहीं घर में व्‍यवस्‍था हो न हो। मिठाई , दही और पनीर लेकर पुन:गाडी को स्‍टार्ट किया। हमने जॉली के छोटे भाई हैप्‍पी से श्रेया के विवाह की इच्‍छा अवश्‍य प्रकट की थी , पर वहां उनलोगों ने ही इंकार कर दिया था। जॉली और हैप्‍पी दोनो का विवाह हमारे ही रिश्‍तेदारी में हुआ था , पर कुछ दिनों बाद एक दुर्घटना में हैप्‍पी ने अपनी पत्‍नी रश्मि को खो दिया था। छह माह के पुत्र को हैप्‍पी के पास निशानी के तौर पर छोडकर वह चल बसी थी। कुछ दिन तो हैप्‍पी दूसरी विवाह के लिए ना ना करता रहा , पर बच्‍चे के सही लालन पालन के लिए अब तैयार हो गया था।

घर पहुंचकर मानसी को खुशखबरी सुनाया , भैया आनेवाले थे , उसकी खुशी का ठिकाना न था। वह तुरंत उनके स्‍वागत सत्‍कार की तैयारी में लग गयी। थोडी ही देर में सारे मेहमान पहुंच गए , बातचीत में शाम कैसे कटी , पता भी न चला। श्रेया के बारे में भी उन्‍हें हर बात का पता चल चुका था। कल शाम को हैप्‍पी के लिए लडकी देखने जाना था। हैप्‍पी के साथ साथ लडकी से खास बातचीत की जिम्‍मेदारी मुझे ही दी गयी थी। दसरे दिन मैने ऑफिस से छुट्टी ले ली। शाम लडकी के घर जाने पर मालूम हुआ कि सामान्‍य हैसियत रखनेवाले लडकी के पिता हैप्‍पी और उसके परिवार के जीवन स्‍तर को देखते हुए अपनी लडकी का रिश्‍ता करने को तैयार थे। हैप्‍पी के वैवाहिक संदर्भों या एक बेटे होने की बात उसने लडकी से छुपा ली थी , पर हमलोग विवाह तय करने से पहले उससे सारी बाते खुलकर करना चाहते थे। जब हमने लडकी को इस बारे में जानकारी दी तो उसने उसका गलत अर्थ लगाया , उसने सोंचा कि मात्र बच्‍चे को संभालने के लिए उससे विवाह किया जा रहा है। वह इस तरह के किसी समझौते के लिए तैयार नहीं थी और हमें वहां से निराश ही वापस आना पडा।

लडकी वालों के यहां से आने में देर हो गयी थी। मानसी और श्रेया ने पूरा खाना तैयार रखा था , खाना खाकर हम सब ड्राइंग रूम में बैठ गए। गुमसुम और खोयी सी रहनेवाली श्रेया खाना खाने के बाद थके होने का बहाना कर अपने कमरे में चली गयी। । जॉली तो श्रेया की हालत देखकर बहुत परेशान था , एक ओर हैप्‍पी तो , दूसरी ओर श्रेया .. दोनो की समस्‍याएं हल करने में उसका दिमाग तेज चल रहा था। आज दोनो को ही एक सच्‍चे जीवनसाथी की जरूरत थी , दोनो साथ साथ चलकर एक दूसरे की जरूरत पूरा कर सकते थे, पर इस बात को मुंह से निकालने की उसकी हिम्‍मत नहीं हो रही थी। तभी गर्मी के दिन के इस व्‍यर्थ की यात्रा और तनाव से परेशान भैया ने कहा, ’इतनी गर्मी में बेवजह आने जाने की परेशानी , लडकी के पिता को ऐसा नहीं करना चाहिए था। उसे अपनी लडकी से बात करके ही हमें बुलाना चाहिए था।‘
‘उनकी भी क्‍या गलती ? उन्‍होने सोंचा होगा कि हैप्‍पी को देखकर लडकी मान ही जाएगी।‘ मेघना उन्‍हीं लोगों के पक्ष में थी।

’यहां आकर हमने कोई गल्‍ती नहीं की। हमारे सामने एक और अच्‍छा विकल्‍प उपस्थित हुआ है।‘ जॉली के मुंह से अनायास ही मन की बात निकल पडी। यह सुनकर हमलोग सभी अचंभित थे।
’कौन सा विकल्‍प ?’ भैया ने तत्‍काल पूछा।
’मेरे कहने का कोई गलत अर्थ न लगाएं, पर आज हमारे समक्ष सिर्फ हैप्‍पी की ही नहीं , श्रेया के जीवन की भी जिम्‍मेदारी है। इन दोनो के लिए दूसरे जगहों पर भटकने से तो अच्‍छा है कि दोनो को एक साथ चलने दिया जाए , यदि हैप्‍पी और श्रेया तैयार हो जाए तो‘ जॉली ने स्‍पष्‍ट कहा।
‘मुझे क्‍या आपत्ति हो सकती है , आपकी जैसी इच्‍छा’ हैप्‍पी को इस रिश्‍ते में कोई खराबी नहीं दिख रही थी , सो उसने भैया का तुरंत समर्थन कर दिया।
‘पर क्‍या श्रेया इस बात के लिए तैयार हो जाएगी’ भैया ने पूछा।

’अभी तुरंत तो नहीं, लेकिन जब वह ससुराल जाने को तैयार नहीं , तो कुछ दिनों में तो उसे तलाक लेकर दूसरे विवाह के लिए तैयार होना ही होगा।‘मानसी इतने अच्‍छे रिश्‍ते को आसानी से छोडना नहीं चाहती थी , उसे विश्‍वास था कि कुछ दिनों में वह श्रेया को मना ही लेगी।
जॉली ने हमारे सामने जो प्रस्‍ताव रखा , वह सबके हित में और सबसे बढिया विकल्‍प दिख रहा है। मैं भी दूसरी बार अब कोई भूल नहीं करना चाहता। मुझे भी मालूम है , हैप्‍पी और श्रेया एक दूसरे के सच्‍चे जीवनसाथी बन सकते हैं।