एस्ट्रोलॉजर बनने के लिए क्या करें ?



Q- एस्ट्रोलॉजर बनने के लिए क्या करें ?

Ans- एस्ट्रोलॉजर बनने के लिए एस्ट्रोलॉजी की पढ़ाई करनी होगी , देश के कई विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में इसकी पढ़ाई करवाई जाती है।  'गत्यात्मक ज्योतिष' भी शीघ्र ज्योतिषियों को ट्रेनिंग देने की व्यवस्था में है। 

Q- astrology ke liye kya padhai kare

Ans - ग्रहों के जड़ चेतन पर प्रभाव को समझना ज्योतिष का मुख्या विषय है , जिसे राशिचक्र , लग्न , भाव और सभी ग्रहों के माध्यम से आपको सिखाया  जाता है। 

Q - astrologer ka contact no.

Ans - गत्यात्मक ज्योतिष से जुड़े एस्ट्रोलॉजर का नंबर 8292466723  है 

Q - astrologer ka mobile no.

Ans - गत्यात्मक ज्योतिष से जुड़े एस्ट्रोलॉजर का नंबर 8292466723  है 

Q - astrology me kiska adhyayan kiya jata

Ans - ग्रहों के जड़ चेतन पर प्रभाव को समझना ज्योतिष का मुख्य विषय है , जिसे राशिचक्र , लग्न , भाव और सभी ग्रहों के माध्यम से आपको सिखाया  जाता है। 

Q - computer astrology kya hai

Ans - एस्ट्रोलॉजी के नियमों , सिद्धांतों को जब कंप्यूटर में कोडन के माध्यम से डाला जाता है तो इसे कंप्यूटर एस्ट्रोलॉजी।  इसके उपयोग करने से ज्योतिषियों को कम मेहनत करनी होती है।     

Q - astrology kiska adhyan h
 
Ans - एस्ट्रोलॉजी में आसमान , उसमे स्थित गृह नक्षत्र और उसके पृथ्वी पर प्रभाव का अध्ययन किया जाता है। 

Q - astro match kya hai kise kehte h

Ans - विवाह से पहले वर वधू की की कुंडली को मिलाकर देखा जाता है , ताकि विवाह के बाद उनमे मतभेद न उभरे , इसी प्रक्रिया को ास्त्रो मैच कहते हैं। 

Q - graho ke upay ka scientific reason or astrology kya kaam karta hai

Ans - 'गत्यात्मक ज्योतिष' के द्वारा ग्रहों के बुरे प्रभाव से बचने के लिए कई प्रकार के अचूक उपाय किये जाते हैं,  जिसमे संगति  कलर-थेरेपी , दान-पुण्य , मुहूर्त की अंगूठी , पेड़-पौधों , । वैज्ञानिक ढंग से इसे प्रूफ कर  पाना बहुत कठिन है। 

 मै शीघ्र ही इस चैनल पर निःशुल्क ज्योतिष सिखलाने का कोर्स शुरू करनेवाली हूँ , चैनल को सब्सक्राइब करें ,  वीडियोज को देखक्रर ज्योतिष का ज्ञान प्राप्त करें , उन्हें लाइक और शेयर करें , ताकि चैनल की रफ़्तार तेज हो और आपको नयी नयी जानकारिया मिलती रहें। 





मेरी पुस्तक का कौन सा संस्करण आपके पास है ?

पाठकों से अनुरोध है कि यदि उनके पास मेरी पुस्तक है तो यह जानकारी दें कि उसमे कौन सा एडिशन लिखा गया है। हमारे पाठकों में प्रकाशक भी हैं, लेखक भी। वकील भी हैं और पाठक भी।  मुझे एक और विचार देने का कष्ट करें कि इस परिस्थिति में मुझे क्या कदम उठाना चाहिए ? पूरी कहानी इस प्रकार है ....

20 वीं सदी के अंत में हमारे पिताजी श्री विद्या सागर महथा जी के द्वारा ज्योतिष के क्षेत्र में गंभीर शोधकार्य चला। 21 वीं सदी के आरम्भ से पिताजी के साथ हम सभी बच्चे भी इस शोध का आगे ले जाने के लिए नियमित कार्य कर रहे हैं। ज्योतिष के विद्वानों को इस शोध-कार्य से परिचित करवाया जाये , मैंने एक पुस्तक लिखी , जो ज्योतिष की प्रचलित पुस्तकों से बिलकुल भिन्न हमारे खुद के अनुभव पर आधारित थी। वर्ष 1996 में ही एक प्रकाशक ने पुस्तक की 400 प्रति छापने और बेचने के लिए मुझसे सहमति ली । उस वक्त कितने छापे और बेचे, मुझे पता नहीं।

पुनः 1999 में दूसरे संस्करण के 400 पुस्तकें छपने के लिए उन्होंने मुझसे संपर्क किया और मैंने फिर उन्हें अनुमति दे दी। दोनों संस्करण में लगभग 8000 रुपये मुझे मिलने की बात हुई थी, पर काफी तकाजे के बाद उन्होंने मुझे पैसे न देकर उतने मूल्य की पुस्तकें ही भेजीं। दो-चार वर्ष बाद फिर से उनका पत्र मिला कि वे तीसरा संस्करण छापना चाहते हैं, मैंने अनुमति नहीं दी। ज्योतिष के क्षेत्र में मुझ जैसी पहली लेखिका की हिंदी किताब की इतनी अच्छी बिक्री से आप पुस्तक में मौजूद विषय की मजबूती का आकलन कर सकते हैं। तीसरी बार अनुमति न देने से मैं निश्चिन्त हो गयी कि अब मेरी पुस्तक नहीं छप रही है।

आश्चर्य तो तब हुआ, जब कुछ दिनों पूर्व हमारे ब्लॉग के एक-दो पाठकों ने जिक्र किया कि उन्होंने मेरी पुस्तक मंगवाकर पढ़ी। मैंने नेट पर देखा तो कई जगहों पर उपलब्ध थी, आमेजन पर भी। मुझे लगा कि 20 साल पुरानी पुस्तक में से ही बची हुई उपलब्ध होगी। मैं प्रकाशक के कार्यालय में गयी और बची पुस्तकों के बारे में जानकारी मांगी। मैंने कहा कि उनके पास पुस्तक हो तो मुझे दें। उन्होंने कई फटी हुई पुरानी किताबें मुझे दिखाईं और बोलै कि बस इतनी ही बची है।

मैंने अमेजन को ऑर्डर किया तो तीन दिन बाद पुस्तक मेरे घर पर आयी। बिलकुल नई पुस्तक में कॉपीराइट लेखिका के पास और एडिशन 2018 का लिखा गया था। मैं तो सोच भी नहीं सकती थी कि मेरी सहमति के बिना यह पुस्तक छापी और बेची जाती रही है। क्या इसमें 'गत्यात्मक ज्योतिष' को जन्म देनेवाले मेरे गुरु और पिताजी श्री विद्या सागर महथा जी और मेरा हिस्सा नहीं होना चाहिए ?




काश अबतक इलाज की अन्य पद्धतियों को भी विकसित किया गया होता !!

2009 की बात है , शनिवार और रविवार को बच्‍चों की छुट्टियों की वजह से नींद देर से ही खुलती है । हां , कभी कभार फोन की घंटी नींद अवश्‍य तोड दिया करती है। ऐसे ही एक शनिवार भोर की अलसायी हुई नींद के आगोश में थी कि अचानक फोन की घंटी बजी। फोन उठाकर जैसे ही मैने ‘हलो’ कहा , वैसे छोटी बहन की दर्दनाक आवाज कानों में पडी , ‘दीदी , मुझे बचा लो , ये लोग मेरी जान ले लेंगे।’ मेरे तो होश ही उड गए , विवाह के दस वर्षों तक सबकुछ सामान्‍य रहने के बाद ससुराल में इसके जीवन में कौन सा खतरा आ गया। अपने को बहुत संभालते हुए पूछा , ‘क्‍या हुआ , पूरी बात बताओ ’ तब उसने जो बताया , वह लगभग शून्‍य हुए दिमाग को काफी राहत देनेवाली थी। दरअसल गर्मी की वजह या अन्‍य किसी वजह से कई दिनों से उसके शरीर के कई जगहों पर फोडे निकल गए थे , कुछ काफी बडे भी हो गए थे। शाम को डाक्‍टर ने बडे फोडों को जल्‍द आपरेशन करा लेने की सलाह दी थी। रात में इनलोगों में लंबी बहस चली थी , बहन के पति और श्‍वसुर डाक्‍टर की सलाह मान लेने को कह रहे थे और बहन एक दो दिन इंतजार करना चाह रही थी । सुबह सुबह अपनी हार को नजदीक पाकर उसने घबडाकर मुझे फोन लगा दिया था। अपनों का कष्‍ट देखना बहुत मुश्किल होता है , उसकी समस्‍या को हल करने के लिए मैने जैसे ही अपना दिमाग खपाया , एक उपाय नजर आ ही गया।

किसी भी फोडे के लिए आयुर्वेद की एक दवा है ‘एंटीबैक्‍ट्रीन’ , मैने बहुत दिन पूर्व उसका प्रयोग किया था और उसके चार छह घंटे के अंदर उसके प्रभाव से प्रभावित होकर कई बार दूसरों को भी उसके उपयोग की सलाह दी थी , जिसमें से किसी को भी उस दवा पर संदेह नहीं रह गया था। अगर फोडा शुरूआती दौर में हो तो , यह दवा उसे दबा देती है और यदि फोडा पक चुका हो , तो यह दवा उसके मवाद को बहा देती है , यानि फोडा किसी भी हालत में हो , उसका मुंह हो या नहीं , इसका उपयोग किया जा सकता है। बाद में घाव भी इसी दवा से ठीक हो जाता है , इसलिए मैने उसके पति से एक दिन का समय मांगा और बहन को उसी दवा के प्रयोग की सलाह दी। और मेरी आशा के अनुरूप ही रात में उसकी खनकती हुई आवाज कानों में पडी। फोडा बह चुका था , पाठक कभी भी बहुत कम कीमत की इस दवा की परीक्षा ले सकते हैं। एलोपैथी की कडी दवाओं या आपरेशन से बचने के लिए इस प्रकार के बहुत उपाय आयुर्वेद में हैं , जिनके बारे में या तो लोगों को जानकारी नहीं है या फिर वे विश्‍वास नहीं कर पाते।

कई बार छोटे बच्‍चों के कब्‍ज को लेकर अभिभावक की पारेशानी को देखकर डाक्‍टर लगातार एलोपैथी की दवा चलाते हैं । मैने ऐसे कई बच्‍चों को छोटी हर्रे घिसकर पिलाने की सलाह दी है और उससे बच्‍चों को फिर एलोपैथी की दवा की जरूरत नहीं रह गयी है। तुलसी , अदरक का रस और मधु को साथ मिलाकर बच्‍चों को पिलाने से सर्दी ठीक हो जाती है , बडे भी इसका काढा पीकर सर्दी ठीक कर सकते हैं। बडे पत्‍ते वाली तुलसी , जो कि घर में नहीं लगायी जाती , वह कुछ बीमारियों में बहुत कारगर होती है। मेरी एक भांजी के पैर में घुटने के नीचे कुछ दाने हो गए , कभी कभी नोचने भी लगे , देखते ही देखते बढने भी लगे। हमने एलोपैथी के चर्मरोग विशेषज्ञ को दिखाया , उसकी कई दवाएं चली , पर कम अधिक होता रहा , जड से नहीं मिटा। हारकर हमने होम्‍योपैथी के डाक्‍टर से दिखाया। पहले सप्‍ताह की दवा से उसने बीमारी बढने की उम्‍मीद की , वह सही रहा , पर दूसरे सप्‍ताह से बीमारी में जो कमी होनी चाहिए थी , वह नहीं हुई और पहले से बडी समस्‍या देखकर हमलोग और घबडा गए। 

कुछ दिन बाद हमारे गांव से एक व्‍यक्ति आए , उन्‍होने देखा और अपनी दवाई सुझा दी , और उनकी दवाई से पूरा इन्‍फेक्‍शन समाप्‍त । दवाई का नाम सुनेंगे , तो आप चौंक ही जाएंगे , दवा थी , गाय के ताजे दूध का फेन। एक महीने में बीमारी समाप्‍त हो गयी। बचपन से बिल्‍कुल स्‍वस्‍थ रहे मेरे बडे बेटे को 12 वर्ष की उम्र के बाद सालोभर सर्दी खांसी रहने लगी , पांच छह वर्षों तक एलोपैथी की दवा चलाने के बाद भी कोई फायदा नहीं हुआ , डाक्‍टर कहा करते थे कि ध्‍यान दें , इसे किस चीज से एलर्जी है , उससे दूर रखें , पर इतने दिनों तक हमें कुछ भी समझ में न आया , जितनी सावधानी बरतते , सर्दी खांसी उतनी ही अधिक परेशान करती थी। अंत में हारकर हमलोगों ने होम्‍योपैथी की दवा चलायी , और छह महीने में एलर्जी जड से दूर। हर वक्‍त टोपी , मफलर , मोजे में अपने को पैक रखने वाले और हर ठंडा खाना से वंचित रहनेवाले उसी बेटे को आज कहीं भी किसी परहेज की जरूरत नहीं होती है। ऐसी अन्‍य बहुत सारी घटनाएं हैं , जिसके कारण एलोपैथी से इतर पद्धतियों पर भी मेरा भरोसा बना हुआ है।

एलोपैथी के साइड इफेक्‍ट के कारण उत्‍पन्‍न होने वाली बहुत सी सारी शारीरिक समस्‍याओं के बावजूद भी इलाज की सर्वोत्‍तम पद्धति के रूप में अभी एलोपैथी का नाम ही लिया जा सकता है । एलोपैथी की सफलता को देखते हुए मै भी इसे स्‍वीकारती हूं , वैसे इसका सबसे बडा कारण इस मद में किया जानेवाला खर्च है , इससे इंकार नहीं किया जा सकता । पर छोटी छोटी बीमारियों के लिए ही सही , जहां पर हमारी ये देशी दवाएं कारगर है , वहां एलोपैथी का प्रयोग किया जाना क्‍या उचित है ? लोग ये जानते हैं कि सरदर्द हो , तो दर्दनिवारक गोली लेनी है , पर ये क्‍यूं नहीं जानते कि फोडा होने पर ‘एंटीबैक्‍ट्रीन’ का प्रयोग करना है। ताज्‍जुब की बात है कि यहां की इतनी सटीक देशी दवाइयों की जानकारी यहीं के ही लोगों को मालूम नहीं है। शिक्षा का मतलब अपनी सभ्‍यता, संस्‍कृति और ज्ञान को भूल जाना नहीं होता , पर आजतक ऐसा ही होता आया है , जो हमारी शिक्षा व्‍यवस्‍था को दोषपूर्ण तो ठहरा ही देता है। युग बदलने के साथ ही साथ हर पद्धति का विकास किया जाना अधिक आवश्‍यक है , जब तक हर क्षेत्र का समानुपातिक विकास न हो , एक क्षेत्र की अंधी दौड में हमें शामिल नहीं होना चाहिए।

दुनिया का सबसे आसान शब्‍द है मां


दुनिया का सबसे खूबसूरत शब्‍द, सबसे प्‍यारा शब्‍द है मां। किसी एक महिला के मां बनते ही पूरा घर ही रिश्‍तों से सराबोर हो जाता है। कोई नानी तो कोई दादी , कोई मौसी तो कोई बुआ , कोई चाचा तो कोई मामा , कोई भैया तो कोई दीदी , नए नए रिश्‍ते को महसूस कराती हुई पूरे घर में उत्‍सवी माहौल तैयार करती है एक मां। लेकिन इसमें सबसे बडा और बिल्‍कुल पवित्र होता है अपने बच्‍चे के साथ मां का रिश्‍ता। यह गजब का अहसास है , इसे शब्‍दों में बांध पाना बहुत ही मुश्किल है।

प्रसवपीडा से कमजोर हो चुकी एक महिला सालभर बाद ही सामान्‍य हो पाती है। मां बनने के बाद बच्‍चे की अच्‍छी देखभाल के बाद अपने लिए बिल्‍कुल ही समय नहीं निकाल पाती है। बच्‍चा स्‍वस्‍थ और सानंद हो , तब तो गनीमत है ,पर यदि कुछ गडबड हुई , जो आमतौर पर होती ही है, बच्‍चे की तबियत के अनुसार उसे खाना मिलता है , बच्‍चे की नींद के साथ ही वह सो पाती है , बच्‍चे की तबियत खराब हो , तो रातरातभर जागकर काटना पडता है , परंतु इसका उसपर कोई प्रभाव नहीं पडता , मातृत्‍व का सुखद अहसास उसके सारे दुख हर लेता है।


परंपरागत ज्‍योतिष में मां का स्‍थान चतुर्थ भाव में है। यह भाव हर प्रकार की चल और अचल संपत्ति और स्‍थायित्‍व से संबंध रखता है। यह भाव सुख शांति देने से भी संबंधित है। हर प्रकार की चल और अचल संपत्ति का अर्जन अपनी सुख सुविधा और शांति के लिए ही लोग करते हैं । भले ही उम्र के विभिन्‍न पडावों में सुख शांति के लिए लोगों को हर प्रकार की संपत्ति को अर्जित करना आवश्‍यक हो जाए , पर एक बालक के लिए तो मां की गोद में ही सर्वाधिक सुख शांति मिल सकती है , किसी प्रकार की संपत्ति का उसके लिए कोई अर्थ नहीं।


यूं तो एक बच्‍चा सबसे पहले ओठों की स‍हायता से ही उच्‍चारण करना सीखता है , इस दृष्टि से प फ ब भ और म का उच्‍चारण सबसे पहले कर सकता है। पर बाकी सभी रिश्‍तों को उच्‍चारित करने में उसे इन शब्‍दों का दो दो बार उच्‍चारण करना पडता है , जो उसके लिए थोडा कठिन होता है , जैसे पापा , बाबा , लेकिन मां शब्‍द को उच्‍चारित करने में उसे थोडी भी मेहनत नहीं होती है , एक बार में ही झटके से बच्‍चे के मुंह से मां निकल जाता है यानि मां का उच्‍चारण भी सबसे आसान।

मां शब्‍द के उच्‍चारण की ही तरह मां के साथ रिश्‍ते को निभा पाना भी बहुत ही आसान होता है। शायद ही कोई रिश्‍ता हो , जिसे निभाने में आप सतर्क न रहते हों , हिसाब किताब न रखते हों , पर मां की बात ही कुछ और है। आप अपनी ओर से बडी बडी गलती करते चले जाएं , माफी मांगने की भी दरकार नहीं , अपनी ममता का आंचल फैलाए अपने बच्‍चे की बेहतरी की कामना मन में लिए बच्‍चे के प्रति अपने कर्तब्‍य पथ पर वह आगे बढती रहेगी।


पर कभी कभी मां का एक और रूप सामने आ जाता है , बच्‍चे को मारते पीटते या डांट फटकार लगाते वक्‍त प्रेम की प्रतिमूर्ति के क्रोध को देखकर बडा अजूबा सा लगता है। पर यह एक मां की मजबूरी होती है , उसे दिल पर पत्‍थर रखकर अपना वह रोल भी अदा करना पडता है। इस रोल को अदा करने के लिए उसे अंदर काफी दर्द झेलना पडता है , पर बच्‍चे के बेहतर भविष्‍य के लिए वह यह दर्द भी पी जाती है।


पर हम उनकी इस सख्‍ती , इस कठोरता को याद रखकर अपने मन में उनके लिए गलत धारणा भी बना लेते हैं। साथ ही कर्तब्‍यों के मार्ग पर चलती आ रही मांओं को अधिकारों से वंचित कर देते हैं। जब उन्‍हें हमारी जरूरत होती है , तो हम वहां पर अनुपस्थित होते हैं। ऐसा नहीं होना चाहिए। हमें याद रखना चाहिए कि कोई हमारे साथ भी यही व्‍यवहार करे तो हमें कैसा लगेगा ?

हिंदी दिवस पर विशेष

जब साल 1947 में देश आजाद हुआ तो देश के सामने भाषा का सवाल एक बड़ा सवाल था। भारत जैसे विशाल देश में सैकड़ों भाषाएं और हजारों बोलियां थीं। 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने देवनागरी लिपि में लिखी हिन्दी को अंग्रेजी के साथ राष्ट्र की आधिकारिक भाषा के तौर पर स्वीकार किया था। कहा जाता है कि जब अंग्रेजी को आधिकारिक भाषा के तौर पर हटने का वक्त आया तो देश के कुछ हिस्सों खासकर दक्षिण भारतीय राज्यों में हिंसक प्रदर्शन हुए।  उसके बाद केंद्र सरकार ने संविधान संशोधन करके अंग्रेजी को हिन्दी के साथ भारत की आधिकारिक भाषा बनाए रखने का प्रस्ताव पारित किया।1953 में जवाहरलाल नेहरू सरकार ने इस ऐतिहासिक दिन के महत्व को देखते हुए 14 सितंबर को हिन्दी दिवस के रूप में मनाने का फैसला किया। 



पर आज के आधुनिक युग में भी हिंदी 'हिंदी दिवस' का मोहताज नहीं है। देश की बड़ी आबादी हिंदी बोलने और समझनेवाली है, इसलिए हर क्षेत्र में हिंदी का महत्व है।  पढाई में हिंदी का महत्व इलसिए है क्योंकि इसमें जिस शब्‍द को जिस प्रकार से उच्‍चारित किया जाता है, उसे लिपि में लिखा भी उसी प्रकार जाता है।  रोचक बात यह है कि अंग्रेजी की रोमन लिपि में शामिल कुछ वर्णों की संख्‍या 26 है, जबकि हिंदी की देवनागरी लिपि के वर्णों की संख्‍या ठीक इससे दोगुनी यानी 52 है।  हमारे संसद भले ही अंग्रेजी में संसद में बोलेन, पर चुनाव प्रचार हिंदी में ही करना होता है।  हमारे अभिनेता भी भले ही बात-चित अंग्रेजी में करते हैं, पर उनको कमाई हिंदी फिल्मों में काम  मिलती है।


भारत अलावा  फिजी में भी हिंदी का काफी महत्व है। यहां रेडियो पर आने वाले ज्यादातर कार्यक्रम हिंदी में होते हैं। शिक्षा विभाग द्वारा संचालित सभी बाह्य परीक्षाओं में हिंदी एक विषय के रूप में पढ़ाई जाती है। फिजी का भारतीय समुदाय ने हिंदी समिति तथा हिंदी केंद्र बनाए हैं  औपचारिक एवं मानक हिंदी का प्रयोग पाठशाला के अलावा शादी, पूजन, सभा आदि के अवसरों पर होता है। कोई भी व्यक्ति सरकारी कामकाज, अदालत तथा संसद में भी हिंदी भाषा का प्रयोग कर सकता है। चुनाव सभाओं के पोस्टर व प्रचार सामग्री भी हिंदी भाषा के प्रयोग के बिना अधूरी समझी जाती है।



समय के साथ हुए बदलाव ने डिजिटल वर्ल्ड पर अपनी मौजूदगी साबित किया। हिंदी टाइपिंग की मजबूती ने आज हिंदी ब्लॉग्गिंग, हिंदी टयुब चैनल , हिंदी समाचार या हिंदी खोज इंजन को महत्वपूर्ण बनाया है।  आज गूगल किसी भी हिंदी कीवर्ड के हज़ारो परिणाम सामने लाता है।  सौभाग्यशाली हूँ कि शुरुआती कुछ ब्लोग्गेर्स के साथ ही मैंने भी हिंदी ब्लॉग जगत के माध्यम से हिंदी में उपयोगी पोस्ट लिखी और इंटरनेट के इस अथाह समुद्र में कुछ लेख मेरे भी मौजूद हैं।