हमें अन्धविश्वास क्यों नहीं करना चाहिए ?

 

Andhvishwas story in Hindi

मैं दस बारह वर्ष पूर्व की एक सच्‍ची और महत्‍वपूर्ण घटना का उल्‍लेख करने जा रही हूं। बोकारो रांची मुख्‍य सडक के लगभग मध्‍य में एक छोटा सा गांव है , जिसमें एक गरीब परिवार रहा करता था। उस परिवार में दो बेटे थे , बडे बेटे ने गांव के रोगियों के उपचार में प्रयोग आनेवाली कुछ जडी बूटियों की दुकान खोल ली थी। बचपन से ही छोटे बेटे के आंखों के दोनो पलक सटे होने के कारण वह दुनिया नहीं देख पा रहा था। गरीबी की वजह से इनलोगों ने उसे डाक्‍टर को भी नहीं दिखाया था और उसे अंधा ही मान लिया था। पर वह अंधा नहीं था , इसका प्रमाण उन्‍हें तब मिला , जब 16-17 वर्ष की उम्र में किशोरावस्‍था में शरीर में अचानक होनेवाले परिवर्तन से उसकी दोनो पलकें हट गयी और आंखे खुल जाने से एक दिन में ही वह कुछ कुछ देख पाने में समर्थ हुआ। 

उसके शरीर में अचानक हुए इस परिवर्तन को देखकर परिवार वालों ने इसका फायदा उठाने के लिए रात में एक तरकीब सोंचा। खासकर बडे बेटे ने अपनी जडीबूटियों की दुकान को जमकर चलाने के लिए यह नाटक किया। सुबह होते ही छोटा बेटा पूर्ववत् ही लाठी लिए टटोलते टटोलते गांव के पोखर में पहुंचा और थोडी देर बाद ही हल्‍ला मचाया कि उसकी आंखे वापस आ गयी है । पूरे गांव की भीड वहां जमा हो गया और पाया कि वह वास्‍तव में सबकुछ देख पा रहा है। जब लोगों ने इसका कारण पूछा तो उसने बताया कि अभी अभी एक बाबा उधर से गुजर रहे थे , उन्‍होने ही उसपर कृपा की है । उन्‍होने कहा है कि न सिर्फ तुम्‍हारी आंख ठीक हो जाएगी, तुम अब जिनलोगों को आशीर्वाद दे दोगे , वे भी ठीक हो जाएं

hamen andhvishwas kyon nahin karna chahie

पूरा गांव आश्‍चर्य चकित था , इस चमत्‍कार भरे देश में ऐसा चमत्‍कार होते उन्‍होने सुना तो जरूर ही होगा , पर देखने का मौका पहली बार मिला था। पूरे गांव के लंगडे , लूले , अंधे, काने , पागल बच्‍चों को ले लेकर अभिभावक आने लगें, बडे भाई की जडी बूटी जमकर बिकने लगी। परिवार वाले तो इतने में ही खुश थे , पर ईश्‍वर को तो इन्‍हें छप्‍पर फाडकर देना था। यह खबर आग की तरह फैली और दूर दूर से लोग अपने अपने परिवार के लाचारों को लेकर आने लगे। उसके दुकान की जडी बूटी कम पडने लगी , फिर नीम वगैरह की सूखी डालियों का उपयोग किया जाने लगा , पर भीड थी कि बढती जा रही थी । मौके की नजाकत को समझते हुए बडे बडे बरतनों में नीम की पत्तियों उबाली जाने लगी , उस जल को बोतल में भरकर बेचने के लिए गांव भर के बोतलों को जमा किया गया । 

समाचार पत्रों में इस बात की खबर लगातार प्रकाशित होने लगी , शीघ्र ही भीड को नियंत्रित करने के लिए पुलिस तक की व्‍यवस्‍था करनी पडी । एक डेढ महीने के अंदर उस बच्‍चे की महिमा इतनी फैल चुकी थी कि कि पुलिस की मार से बचने के लिए लोग दूर से ही गांव में रूपए पैसे फेक फेककर वापस चले जाते थे। जिस गांव में आजतक एक गाडी नहीं गुजरती थी , उस गांव में बडी बडी गाडियां आकर खडी हो गयी। इधर आसपास की बातों को तो छोड ही दिया जाए , कलकत्‍ता जैसे दूरस्‍थ स्‍थानों से भी बहुत बडे बडे व्‍यवसायी और सरकारी अधिकारी तक इस ‘महात्‍मा’ का दर्शन करने को आ पहुंचे। इतने दिनों तक उस परिवार के अतिरिक्‍त गांव के अन्‍य लोगों ने भी कुछ न कुछ व्‍यवसाय कर पैसे कमाए। लेकिन बाद में रोगियों की स्थिति में कोई सुधार न होने से उसकी पोल खुली और जनता ने उसके नाटक को समझा , तबतक उनलोग लाखों बना चुके थे।

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andhvishwas kya hai

इसी प्रकार गया में चार हाथोंवाले बच्‍चे को जन्‍म देने के बाद उनके मातापिता दो ही दिनों में भक्‍तों के द्वारा मिलनेवाले चढावे से ही लखपति हो गए। 48 घंटे तक ही जीवित रहे इस बच्‍चे को लोगों ने भगवान विष्‍णु का अवतार माना। भारत में अंधविश्‍वास इस हद तक फैला है कि यहां असामान्‍य बच्‍चों को जन्‍म देनेवाले मांबाप उस बच्‍चे का इलाज भी नहीं करवाना चाहते । एक माता पिता के सामने डाक्‍टर मिन्‍नते करते रह गए और उन्‍होने बच्‍चे को सामान्‍य बनाने के लिए डाक्‍टरों को कोशिश ही नहीं करने दी। जनता के अंधविश्‍वासों का ये लोग पूरा फायदा उठाते हैं। जब आज के पढे लिखे युग में इस प्रकार की घटनाएं भारतवर्ष में आम हैं , तो पुराने युग के बारे में क्‍या कहा जा सकता है। समाज से इस तरह के अंधविश्‍वासों को दूर करने के लिए बहुत सारे लोग और संस्‍थाएं कार्यरत हैं , पर सवाल है कि जनता के अंधविश्‍वास को समाप्‍त किया जा सकता है .

Superstition in india in hindi

यह दुनिया विविधताओं से भरी है। यहां फूल हैं तो कांटे भी , प्रेम है तो घृणा भी , मीठास है तो कडुवाहट भी , गर्मी है तो सर्दी भी , आग है तो पानी भी और किसी का भी खात्‍मा कर पाना असंभव है। कभी कभी कोशिश का और उल्‍टा परिणाम निकलता है। हमने फूलों के सुगंध को भी महसूस की और कांटे को भी बाड लगाने में प्रयुक्‍त किया। फल के मीठास को भी महसूस किया और कडुवाहट को भी बीमारी ठीक करने मं उपयोग में लाने की कोशिश की। मैं हर वक्‍त अपने ऋषि मुनियों के दूरदर्शिता की दाद देती हूं , उन्‍हें ये मालूम था कि आम जनता से यह अंधविश्‍वास दूर नहीं कर सकते । इसलिए जनता के इसी अंधविश्‍वास का सहारा लेकर उन्‍हें जीवन जीने का एक ढंग बनाया। स्‍वर्ग और नरक के बहाने बनाकर जनता को अच्‍छे कामों की ओर प्रवृत्‍त करने की कोशिश की। चेचक के होने पर रोगी के लिए जो आवश्‍यक सावधानी बरतनी थी , उसे धर्म का नाम देकर करवाया। 

भले ही हम इस कोण से न सोंच पाएं , पर किसी मरीज के मनोवैज्ञानिक चिकित्‍सा के लिए झाड फूंक कीवैज्ञानिक पद्धतिका ही उन्‍होने सहारा लिया था । बरसात के तुरंत बाद साफ सफाई के लिए कई त्‍यौहारकी परंपरा शुरू की गई। उनके द्वारा सभ्‍य जीवन जीने के लिए आवश्‍यक सभी जरूरतों की पूर्ति के लिए सामाजिक नियम बनाए गए। 'बट', 'पीपल' जैसे महत्‍वपूर्ण पेडों को भी सुरक्षित रखने के लिए इन्‍हें धर्म से जोड दिया गया। सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण जैसे सुंदर प्राकृतिक नजारे को दिखाने के लिए उन्‍हें गांव के किनारे नदियों या तालाबों में ले जाया जाता रहा । ग्रहण के तुरंत बाद उतनी एकत्रित भीडों तक के अंधविश्‍वास का उन्‍होने भरपूर उपयोग किया। 

उनके द्वारा नदियों , तालाबों की गहराइयों में जाकर एक एक मुट्ठी मिटृटी निकलवाकर नदियों तालाबों की गहराई को बढाया जाता रहा । प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर जगहों में एक सुंदर मंदिर का निर्माण कर जनता को तीर्थ के बहाने उन सुंदर नजारों का अवलोकण कराया गया। प्राचीन ज्ञान में क्‍या सही है और क्‍या गलत , इसपर लाख विवाद हो जाए , मैं बहुत बातों को यदि अंधविश्‍वास मान भी लूं । फिर भी यदि धर्म के नाम पर स्‍वार्थ से दूर होकर सर्वजनहिताय जनता के अंधविश्‍वास का कोई उपयोग ही किया गया , तो उसमें मैं कोई बुराई नहीं समझती। पर आज चूंकि हर क्षेत्र स्‍वार्थमय है , लोगों के अंधविश्‍वास का उपयोग स्‍वार्थ के लिए किया जा रहा है , इसलिए यह चिंताजनक तो है ही।

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    कोरोना केसेज क्यों लगातार बढ़ते रहें ?

    Are covid cases increasing in india


    बहुत गंभीर बातें लिखी जा रही हैं, कृपया राजनीतिक रंग देने की कोशिश न करें। सरकार ने अपने नुकसान की परवाह न करके थोड़े देर से ही सही, पर लॉक डाउन की घोषणा तो की। सरकार ने स्पष्ट बोल था कि ये तीन महीने हमें अपने घर के अंदर रहकर काटने हैं, जो समर्थ हैं अपने खाने पीने की व्यवस्था करें, गरीबों के खाने की व्यवस्था सरकार करेगी। जिनतक सरकार नहीं पहुँच पाए, उनतक समाज के लोग मदद करें। भीषण संकट की घडी है, व्यवसायी अपने एम्प्लाइज के खाने पीने की व्यवस्था करें। मकान मालिक किराया न लें, बैंक EMI न लें। यदि ये सब होता तो कोरोना के केसेज इतने न बढ़ते, गड़बड़ी कहाँ कहाँ आयी, आपलोग ध्यान दें। 

    Why covid cases rising in india

    मैं तो इतना कहूंगी कि जनता ने इस लॉक डाउन को गंभीरता से नहीं लिया। प्रशासन को, पुलिस को, डॉक्टर्स को, नर्सों को काफी दवाब आया। जो बाहर न निकले, वे भी सोसाइटी में पिकनिक मनाते दिखें। घर में किसी एक को सर्दी-बुखार हुआ तो किसी ने खुद से क्वैरेन्टाइन नहीं किया। पूरे घर, सोसाइटी में घूमते मिले। लोगों ने कोरोना की गंभीरता को नहीं समझा। मजदूरों को स्थायित्व का खतरा दिखा। फुर्सत में होम सिकनेस बना, रोज रोज भीड़ इकट्ठी करते रहें। लॉक डाउन के तीसरे दिन से ही यत्र-तत्र जो भीड़ दिखी, वह इसी ओर इशारा करती है। हर जगह सिर्फ लाचारों की भीड़ नहीं थी, हठी की भी भीड़ थी। तीन महीने तो किसी तरह गुजारने थे, सबलोगों को घर में रहकर जीवन जी लेना था, कुछ भी खाकर। सब्जी, दूध की इतनी मारामारी क्यों, हमारे जनरेशन तक पहुँचने के लिए हमारे पूर्वजों ने कितनी मेहनत की है हम भूल गए।
    Are covid cases increasing in india


    Why covid cases increasing in india

    संकट के समय जानवर भी एकजुटता को महत्व देते आये हैं, लेकिन हमें नहीं देनी थी । कुल मिलाकर एक बात कही जा सकती है कि एकजुटता की कमी से भारत ने बहुत जगह हार मानी है, लोग माने न माने कोरोना काल का इतिहास भी एकजुटता की कमी का इतिहास बनेगा। उनके द्वारा की जानेवाली लापरवाही भविष्य में सबको कोरोना के चक्र में झोंकेगी, जबतक गलती का अहसास होगा, काफी देर हो चुकी होगी। एक बात यह भी है कि जिस देश मे जागरूकता इतनी कम हो कि हेलमेट और सीट बेल्ट भी फाइन के डर से पहनते हों, वहाँ जनता से कुछ उम्मीद करनी भी बेकार है. हमारे यहाँ अभी कोरोना नहीं आया है, यह बात देशभर मे हर जगह हर महीने फेल हो रही है, फिर भी अभीतक लोग यही बात कर रहे हैं। 

    Recovery rate of coronavirus

    कोरोना के रिकवरी रेट पर मत जाइये, रिकवरी के पहले पूरे महीने जो झेलना पड़ेगा, उसे समझिए ! नादानी मत कीजिए ! कुछ दिनों जरूरी बातों के लिए ही बाहर निकलें ! घर मे रहेंगे तो एक साल पीछे जायेंगे ! बाहर निकले और कोरोना हुआ तो पूरे परिवार डिस्टर्ब होंगे ! कई साल पीछे जायेंगे ! परिवार मे कोई दुर्घटना हो गयी तो जीवनभर खुद को माफ़ न कर सकेंगे ! दूसरे क्या कर रहे हैं, नक़ल न कीजिए ! आप सही कीजिए, दूसरे नक़ल करेंगे ! कोरोना जहाँ फ़ैल जाता है, संभालना मुश्किल होता है ! जहाँ नहीं फैला है, वहाँ फैलने न दें ! सरकार ने पहले दिन ही हाथ खड़े कर दिए थे ! उनसे कुछ उम्मीद नहीं कीजिए ! जब लॉक डाउन का पालन ही नहीं हुआ तो अब सरकार को गाली देने से कुछ नहीं होगा ! अधिक से अधिक लोग पोस्ट को शेयर कीजिए ! ताकि लोग पढ़कर कुछ समझें, भीड़ न बनायें ! बिलकुल जरूरी काम से ही बाहर निकले लोग ! हर जगह भीड़ हो रही है !

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      एक और माता आयी हैं !

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      पिछले माह हमारे देश में कोरोना को लेकर खास भय नहीं था, लेकिन उसी वक्त मैंने सावधानी से जुडी यह पोस्ट लिखी थी। कुछ लोगों से सराहना भी मिली तो कुछ लोगों ने यह बोला कि इतना कर पाना संभव नहीं है। हमारे गांव की परम्परा से दूर रहे लोगों को कोई भी सावधानी भारी लगती है, जो उनके जीवन का हिस्सा होना चाहिए था। मेडिकल सुविधाओं को देखकर २५ वर्षों के अंदर हमारे जीवनशैली में आयी हिम्मत एक कोरोना जैसे सूक्ष्मजीव से ही कम हो गयी है, जबकि कोरोना जैसी कई अन्य बीमारियों के आने की आशंका जताई जा रही है। ऐसे समय में अपनी पुरानी जीवनशैली में लौट आना बहुत आवश्यक है।

      syptoms of coronavirus

      मेरी मम्मी उस युग के हिसाब से बहुत पढ़ी-लिखी, पर धर्मपरायण और परम्परागत विचारों वाली महिला थी। अपनी जीवनशैली में उन्होंने परंपरागत और नवीनतम दोनों ही प्रकार के विचारों को समाविष्ट किया हुआ था। साफ़ सफाई में जितना उपयोग गोबर का होता, उतना ही डेटॉल और फिनायल का भी। उनके लिए रसोईघर तो बहुत ही शुद्धता वाली जगह थी, नहाये-धोये बिना कोई अंदर नहीं जा सकता था। चाहे कितना भी प्यासा हो, बिना हाथ-पैर को धोये खुद से पानी भी नहीं ले सकता था। लेकिन कोई बच्चा हाथ-पैर नहीं धो रहा हो तो वे रसोई से पानी निकालकर दे देती, सारा काम खुद करती। पैसे लेने देने पर, मोबाइल छू लेने पर, दरवाजे की बाहर की कुण्डी छू लेने पर भी हाथ धोकर रसोई में जाने की आदत का पालन उन्होंने बड़े होते हम बेटियों से भी करवाया और उनके अंतिम वक्त तक तीनों बहुएँ भी यह सब करती रहीं।

      indian coronavirus

      How to check coronavirus


      मैं जब ससुराल आयी तो अपने घर से भी अधिक नियम थे, बाहर से आने पर चप्पल घर बाहर उतारने पड़ते। काम से आने, ट्रैन या हॉस्पिटल से आने पर कपडे बदलने या नहाने पड़ते। यदि चाय- पानी पीने स्थिर होने के लिए थोड़ी देर बैठना भी हो तो आप प्लास्टिक की कुर्सी पर बैठ सकते थे, सोफे पर नहीं। ६-७वी कक्षा में पढ़ने वाली मेरी भतीजी को कभी भी स्कूल से आने के बाद स्कूल ड्रेस घर में टांगते नहीं देखा, वह दूसरे दिन पहनने के लिए बाथरूम के ही कोने में टांग देती थी। यह सब बिलकुल सामान्य दिनों का रूटीन था, इसका एक असर मैंने साफ़ देखा था की जहाँ दूसरे अभिभावक काम से आते ही अपने बच्चे को गोद में उठा लेते थे, उनकी तुलना में हमारे बच्चे को सर्दी-खाँसी यहाँ तक कि पूरे मोहल्ले के बच्चे को मीज़ल्स हुआ पर हमारे बच्चों को काफी बड़े होने पर।

      incubation period of coronavirus

      कोरोना जैसी बीमारियों का हल भी हमारी पुराने जीवनशैली में ही है, साफ़-सफाई से ही इससे बचा जा सकता है। कोरोना का प्रकोप जिस तरह बूढ़ों पर अधिक देखा जा रहा है, उनको सुरक्षित रखने के लिए, बच्चों को सुरक्षित रखने के लिए बाहर निकलने वालों को अतिरिक्त सावधानी बरतनी होगी। आज इसलिए फेसबुक पर भी पोस्ट लिखी हूँ, भारतीयों, मत घबराओ, एक और माता आयी हैं ! जबतक टीका नहीं आ जाता, चेचक की तरह इलाज रखो, बच्चों बुजुर्गों की सारी व्यवस्था अलग रखें ! जरूरी कार्यों से बाहर निकलनेवाले अपनी सारी व्यवस्था अलग रखें ! अच्छे मास्क लगाएं, बाहर से आते ही चप्पल बाहर रखें, बहुत सावधानी से बिना किसी चीज को छुए बाथरूम जाएँ ! कपडे गरम पानी मे डुबोएं और सर से पैर तक अच्छे से सफाई करके नहाये ! बाहर से आनेवाले सामानो को मानकर चलें कि इसमें कोरोना है ! एक सप्ताह बाहर छोड़ दे या साबुन से धो लें ! गरम पानी मे 5 मिनट के लिए डाल दें ! उसके बाद ही उसका उपयोग करें ! चेन टूटेगा, हड़बड़ाहट न रखें ! भारत मे कोरोना का खास असर नहीं देखा जा रहा है ! सावधान रहेंगे तो कोरोना भी आउट और हम भी आउट हो पाएंगे !

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        'गत्यात्मक ज्योतिष' का जीवन-ग्राफ

         

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        भारतवासियों के चरित्र को धर्म के द्वारा जितना सकारात्मक स्वरुप दिया गया, उतना किसी और तरीके से संभव ही नहीं था। पर अभी इनका उलटा ही स्वरुप दिखाई दे रहा है। अच्छे वक्त में लोग इसे नहीं मानते , पर थोड़ा बुरा वक्त आते ही धर्म और ज्योतिष की खोज आरम्भ करते हैं। धर्म और ज्योतिष आधुनिक विज्ञान की चीज नहीं , इसलिए किसी के द्वारा इन दोनों विषयों में प्राप्त किया गया अनुभव विचारणीय नहीं होता। धर्म और ज्योतिष से सम्बंधित सकारात्मक विचार आपके पास है , तो वह प्रगतिशीलों को नहीं पचता। 

        यदि धर्म और ज्योतिष से सम्बन्धिक ऋणात्मक विचार आपके पास है , तो वह अंधविश्वासियों को नहीं पचता। इसलिए आप अपने अनुभव समाज में साझा करने की कोशिश ही नहीं करते, ऐसे में फ़ायदा उन्हें मिलता है , जो धर्म और ज्योतिष को अपने हिसाब से तोड़-मरोड़ रहे होते हैं। नुकसान ऐसे लोगों को होता है , जो धर्म और ज्योतिष के क्षेत्र में ईमानदारी से अपना समय व्यतीत कर रहे हैं। हमारे पिताजी ने अपना पूरा जीवन ज्योतिष की सेवा में लगाया और ज्योतिष की एक नयी शाखा विकसित की।

        Ups and downs in life meaning

        'गत्यात्मक ज्योतिष' का ऐसा जीवन-ग्राफ , जिसको ५०,००० से ऊपर लोगों ने सही माना है , हमने समाज को ज्योतिष के मामले की ठगी से बचने , ज्योतिष के प्रति जागरूक करने और ज्योतिष को विज्ञान साबित करने के लिए एक व्यवस्था आरम्भ की है , जिसके द्वारा दुनिया भर के अधिक से अधिक लोगों को ये ग्राफ्स पहुंचाए जा सकें। इस महती कार्य में आप सबों का भी योगदान होना चाहिए। सबके जीवन-भर की परिस्थिति इस ग्राफ के हिसाब से ही चलती है। आपके जीवन के बड़े समयांतराल के सकारात्मक या ऋणात्मक होने की जानकारी यह ग्राफ देता है .. इस ग्राफ से आपका मालूम होगा कि पुरे जीवन में आपका अच्छा और बुरा समयांतराल कब होगा। 

        इस ग्राफ से आपके अच्छे और बुरे ग्रह तथा उनके कारन जीवन का कौन सा पहलु प्रभावित होगा , इसको समझ पाएंगे। 
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          ज्योतिषियों के उलटे सीधे विज्ञापन

           Andhvishwas kya hai

          एक गरम चाय की प्याली और अखबार के साथ प्राय: लोगों के रविवार की शुरुआत होती है .यही तो एक दिन होता है जब हफ्ते भर की बन्धी बन्धाई दिनचर्या से निजात मिलती है .दीमक की तरह पूरे अखबार को चाट जानेवालों की कमी नही ,इसी का फायदा उठाते हुये प्राय: सभी समाचारपत्र इस दिन कुछ विशेष पन्ने भी प्रकाशित करते हैं ,जिसमे तरह –तरह की सामग्री के साथ विज्ञापनो की भी बाढ आयी होती है .विज्ञापन दाता भी इस दिन का भरपूर लाभ उठाते हैं .पहले विज्ञापन पर हमारी नज़र टिक जाती है ,जिसमे पति पत्नी ,प्रेमी प्रेमिका ,शत्रु आदि किसी को भी वश मे करने के दावे एक ज्योतिषी करता है .

          मेरी समझ मे यह बात नही आती कि अगर सभी को वश मे करने की इतनी बडी शक्ति उनके पास है तो दो-चार महान सख्शियत को वश मे करके वह खुद शहंशाह क्यूं नही बन जाते .ऐसे दर-दर भटकने और अखबारों मे विज्ञापन देने की क्या जरूरत है ? यही बात उनसे पूछूं तो उनका जवाब होगा कि किसी को वश मे करने की बात उनके साथ लागू नही होगी .कारण वह नही बता पायेंगे ,पर हमे पता है .क्या आपने किसी डॉक्टर से ऐसा कहते सुना है कि मरीजों की जिस बीमारी को दूर करने के लिये वह जो इलाज कर रहे हैं ,उनकी उसी बीमारी मे वह इलाज कारगर साबित नही होगी .

          Andhvishwas example in Hindi

          दूसरे विज्ञापन पर गौर फरमाइये ,इसमे दो घण्टे मे मनचाहा परिणाम पाने की बात कही गई है .अगर किसी पद के सभी उमीदवार उनके पास पहुंच जायें तो क्या सभी के लिये मनचाहा परिणाम सम्भव है ?ऐसे मे ज्योतिषी अपने दावे पर कैसे खरा उतरेगा ?ऐसे ही एक –से –एक बढकर विज्ञापन देनेवाले यहां नज़र आते हैं ,जो अपने नाम के साथ ज्योतिषी का तमगा लगाकर ज्योतिष विज्ञान के आगे प्रश्न चिंह लगा देते हैं .

          कुछ दिनो पहले एक व्यक्ति ने मेरे सामने अपनी कथा बयां की .अखबार मे दिये गये विज्ञापन से प्रभावित होकर इन्होने एक तांत्रिक से सम्पर्क साधा .किसी समस्या के निदान हेतु तांत्रिक ने उनसे कुछ उपाय बताया .उसने उस व्यक्ति से किसी चौराहे पर सन्धि बेला मे चार दिनो तक दिये जलाने को कहा ,जिसे जलते हुये कोई दूसरा व्यक्ति न देखे .अब आप ही बतायें ,जो चार राहों का संगमस्थल हो ,वहां सान्ध्य बेला मे कोई व्यक्ति न रहे ,ऐसा भला सम्भव हो सकता है क्या ?

          Andhvishwas par kahani

          एक और ठग तांत्रिक की बात सुनिये ,करोडपति बनने के लिये किसी व्यक्ति को उसने पूजा के कलश को एक हाथ से एक बार मे ही मारकर तोडने को कहा .यह क्रम तीन दिनो तक चलना था .दो दिन तो सब कुछ ठीक ठाक रहा ,पर तीसरे दिन एक बार की मार से कलश नही टूट पाया ,हाथ मे चोट आयी सो अलग .खुद मोटी रकम तो ले ही चुका था ,छूटते ही कहा ,अब इसमे मै क्या कर सकता हूं ,तुमसे कलश नही टूट पाया ,अब अमीर बनना सम्भव नही .

          दुनिया मे सभी के कमाने और खाने के अलग-अलग तरीके हैं .कोई .व्यक्ति सही राह तो कोई गलत राह अपनाकर अपनी रोजी-रोटी चलाता है .पर दुख इस बात का है कि आज के वैज्ञानिक युग मे और शिक्षित होने के बावजूद इनके बहकावे मे आनेवाले लोगों की भी कमी नही .तभी तो ये अपना उल्लू सीधा कर चलते बनते हैं .

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