राहु केतु के उपाय

Rahu ketu ke upay

जब भी किसी की कुंडली में बुरे ग्रहों के प्रभाव की चर्चा होती है तो मंगल और शनि के साथ ही साथ राहू और केतु का नाम भी आना स्‍वाभाविक होता है। यह अचरज की ही बात है कि मंगल और शनि जैसे भीमकाय ग्रहों और राहू केतु जैसे अस्त्तिवहीन ग्रहों के प्रभाव को परंपरागत ज्‍योतिष एक ही रूप में कैसे देखता आया है ? इस विराट ब्रह्मांड में पृथ्‍वी को स्थिर रखने पर सूर्य का बन रहा काल्‍पनिक पथ और सूर्य की परिक्रमा करता चंद्रमा का पथ दोनो ही राहू और केतु नाम के इन दो संपात विंदूओं पर एक दूसरे को काटते हैं । 

Rahu ketu ke upay

गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष की माने तो सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण के दिन सूर्य , पृथ्‍वी और चंद्रमा के साथ ही साथ ये दोनो विंदू भी एक ही सीध में आ जाते हैं। हो सकता है , जब यह खोज नहीं हुई हो कि एक पिंड की छाया दूसरे पर पडने से सूर्यग्रहण या चंद्रग्रहण होता है , तब सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण में इन दोनो संपात विंदुओं की ही भूमिका को मान लिया गया हो और इन्‍हें इतना महत्‍वपूर्ण दर्जा दे दिया गया हो।

पर भौतिक विज्ञान में विद्युत चुंबकीय या गुरूत्‍वाकर्षण या फिर कोई और शक्ति क्‍यों न हो , किसी की भी उत्‍पत्ति पदार्थ के बिना संभव नहीं है और हमलोग ग्रह की जिस भी उर्जा से प्रभावित हों , राहू और केतु उनमें से किसी का भी उत्‍सर्जन नहीं कर पाते , इसलिए राहू और केतु से प्रभावित होने का कोई प्रश्‍न ही नहीं उठता। अपने 40 वर्षीय अध्‍ययन मनन में ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ ने सूर्य , चंद्रमा और अन्‍य ग्रहों की भिन्‍न भिन्‍न स्थिति के अनुसार उनकी शक्ति को पृथ्‍वी के जड चेतन पर महसूस किया है , पर राहू और केतु की विभिन्‍न स्थिति से जातक पर कोई प्रभाव नहीं देखा , इसलिए ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ में इसकी चर्चा नहीं की गयी है। 

राहू और केतु को छोडकर इनकी जगह यूरेनस , नेप्‍च्‍यून और प्‍लूटो के आंशिक प्रभाव को देखते हुए इसे अवश्‍य शामिल किया गया है। इस प्रकार गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष के अनुसार हमें प्रभावित करनेवाले ग्रहों की कुल संख्‍या नौ की जगह दस हो गयी है , जो इस प्रकार हैं ...... चंद्र , बुध , मंगल , शुक्र , सूर्य , बृहस्‍पति , शनि , यूरेनस , नेप्‍च्‍यून एवं प्‍लूटो। 'गत्यात्मक जन्मकुंडली' में राहु और केतु नहीं होते हैं, मनुष्य पर इनके प्रभाव की बात ही नहीं, तो फिर उपाय की बात तो हो ही नहीं सकती। 

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    ज्योतिष शास्त्र क्या है ?

    ज्योतिष शास्त्र क्या है

    फलित ज्‍योतिष की विवादास्‍पदता के लिए जो मुख्‍य बात जिम्‍मेदार है , वह यह कि यदि भाग्‍य से ही हमें सबकुछ प्राप्‍त होना या न होना लिखा है तो फिर कर्म करने का क्‍या फायदा ? हमने हमेशा ही लोगों को समझाया है कि हमें जन्‍म के बाद और जीवनपर्यंत जिन परिस्थितियों का सामना करना पडता है , वह हमारा प्रारब्‍ध है , पर हम अपने सोंच , अपनी मेहनत और अपने क्रियाकलापों के द्वारा जो प्राप्‍त करते हैं , वह परिणाम होता है। जन्‍म के पूर्व और तुरंत पश्‍चात् सभी बच्‍चों के स्‍वास्‍थ्‍य , व्‍यवहार या माहौल में असमानता प्रारब्‍ध को सिद्ध करने के लिए काफी है। पर यह भी सच है कि हम पिछले जन्‍म के कर्म से अपने भाग्‍य में जो कुछ भी लेकर आते हैं और जन्‍मकुंडली के द्वारा उसे जानने का प्रयास करते हैं , उसे मेहनत से बढाया या घटाया जा सकता है और इसे हर स्‍तर तक ले जाया जा सकता है। इसमें प्रारब्‍ध का कोई वश नहीं , यह सिर्फ हालात पैदा करने भर के लिए उत्‍तरदायी है। 

    Jyotish shastra kya hai,


    मान लिया कोई व्‍यक्ति अपने भाग्‍य में काफी मजबूत शरीर लेकर आया है , पर वह उसपर और अधिक ध्‍यान दे , तो शरीर की मजबूती बढते हुए उसे किसी भी स्‍तर तक ले जाकर उसे इनाम पाने का हकदार बना सकती है। इसी प्रकार यदि वह भाग्‍य से कमजोर शरीर लेकर आया है , तो जहां सावधान रहने से उसकी कमजोरी उसे कम परेशान करेगी , वहीं सावधान न होने से यह अधिक तकलीफदेह हो जाएगी , उससे संबंधित महत्‍वाकांक्षा तो वह रख ही नहीं सकता है , क्‍योंकि महत्‍वाकांक्षा भी अपने शरीर की मजबूती को देखकर ही की जा सकती है। इसी प्रकार धन और संपत्ति का मामला है , भाग्‍य से धन और हर प्रकार की संपत्ति की प्राप्ति की एक निश्चित सीमा होती है , पर कर्म से उसे अनिश्चित की ओर ले जाया जा सकता है। 

    किसी किशोर में प्रकृति प्रदत्‍त प्रतिभा है , हर बात को सीखने समझने की प्रवृत्ति है , पर सामाजिक माहौल न मिल पाने से उसका बौद्धिक विकास ढंग से नहीं हो सकता है। आखिर पाकिस्‍तान के सभी बच्‍चों का जन्‍म तो भारत में जन्‍म लेनेवाले बच्‍चों से अलग समय पर नहीं होता होगा ? उनकी जन्‍मकुंडली तो भारत के बच्‍चों से अलग नहीं होती होगी , पर क्‍या कारण हो सकता है कि बच्‍चे की प्रतिभा का या तो उपयोग ही नहीं हो रहा या फिर उपयोग गलत क्षेत्र में हो रहा है। यह उस देश की परिस्थितियों का दोष है , इसे कर्म से सुधारा जा सकता है। भारत के युवा अगर प्रतिभा में वैश्विक स्‍तर के हैं , तो वह यहां की शिक्षा प्रणाली के कारण हैं , सिर्फ भाग्‍य के कारण नहीं। इसी प्रकार जीवन जीने का अलग अलग ढंग पर भी विशेष क्षेत्र या युग का प्रभाव देखा जा सकता है। इसलिए कर्म करने से इंकार तो नहीं किया जा सकता। 

    लोगों का यह भी मानना है कि भविष्‍य सिर्फ आनंददायक ही नहीं होता , इसमें उलझनें भी होती है , कठिनाइयां भी होती हैं , तो क्‍यों न इसे अनिश्चित और रोमांचक ही रहने दिया जाए। इसे भी सही माना जा सकता है , पर फिर भी भविष्‍य की परिस्थितियों को जानना सबके लिए आवश्‍यक है , क्‍योंकि भविष्‍य में उपस्थित होनेवाली सफलताओं की जानकारी जहां वर्तमान कठिनाइयों से लडने की शक्ति देती है , वहीं भविष्‍य में उपस्थित होनेवाली कठिनाइयों की जानकारी अति आशावाद को कम कर , निश्चिंति को कम कर कर्तब्‍यों के प्रति जागरूक बनाती है। भविष्‍य इतना भी दृढ और निश्चित नहीं होता कि आपका रोमांच नहीं बने रहने दे , क्‍योंकि भविष्‍य को प्रभावित करने छोटा अंश ही सही , पर सामाजिक , राजनीतिक , आर्थिक , पारिवारिक परिवेश भी होता है और मनुष्‍य का खुद कर्म भी , इसलिए सबकुछ ईश्‍वर और ज्‍योतिषी पर न छोडकर कर्म करना मनुष्‍य का पहला कर्तब्‍य होना चाहिए।

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      सामाजिक कार्य भी करें

       हर दिमाग के बीज को एक विशाल वृक्ष बनाने में हर कोई मदद करे !!

      बीज तो हर दिमाग में होते हैं , पर समय पर ही उनकी देखभाल हो पाती है , अंकुरण हो पाता है , विकास के क्रम में उन्‍हें हर प्रकार का वातावरण मिल पाता है और वह छोटा सा बीज एक विशाल वृक्ष बन पाता है। आज के सामाजिक राजनीतिक हालत में अनेको दिमाग के बीज दिमाग में ही सोए पडे रह जाते हैं और अनेको प्रकृति की मार से मौत के मुंह में भी चले जाते हैं।

      samajik karya kya hai


       मैं आशा करती हूं कि हर दिमाग के बीज को एक विशाल वृक्ष बनाने में हर कोई मदद करे , ताकि हमारे चारो ओर विशाल ही विशाल वृक्ष नजर आए , सभी अपनी अपनी विशेषताओं की घनी पत्तियों से छांव , सुगंधित पुष्‍पों से वातावरण में सुगंध और मीठे फलों से लोगों को असीम तृप्ति प्रदान करे।

      प्रकृति के सहयोग प्राप्‍त होने से बहुत लोग मेहनत और आवश्‍यकता से बहुत अधिक प्राप्‍त कर रहे होते हैं , इन्‍हें अपने सामर्थ्‍य का उपयोग दूसरों की असमर्थता को दूर करने में करना चाहिए , क्‍यूंकि प्रकृति पर कभी भरोसा नहीं किया जा सकता कि आज वो आपका साथ दे रही है और संयोग से आपके काम बनते जा रहे हैं , तो कल भी आपकी यही स्थिति बातें कभी भी आपको किसी और की आवश्‍यकता पड सकती है।

      यदि आप लोगों की मदद की प्रवृत्ति विकसित करेंगे तो आगे भी लोग आपकी मदद को खडे रहेंगे! लेकिन किसी की मदद करते समय इस बात का भी ध्‍यान रखें कि उसे बार बार मदद करने की आवश्‍यकता न पडे , उसे इस प्रकार की मदद करें  कि आनेवाले दिनों में वो इतना मजबूत हो सके कि वो पुन: दो चार लोगों की मद कर उन्‍हें भी इस लायक बना सके कि वो दूसरों की मदद कर सके।

      अच्छी अच्छी ज्ञान की बाते 

      मेरे ख्‍याल से हमारी जीवनशैली ऐसी होनी चाहिए कि वह आनेवाली पीढी को शारीरिक , आर्थिक , मानसिक , नैतिक और आध्‍यात्मिक दृष्टि से अधिक से अधिक मजबूत बनाती चली जाए। इनमें किसी का भी महत्‍व आनेवाले समय में कम नहीं होता है। इनकी मजबूती हमें हर परिस्थिति में खुशी से जीना सीखा देती है, जो मस्तिष्‍क में किसी प्रकार का तनाव कम करने में सहायक है। जीवन में कोई भी प्रतिभावान मिले, कोई भी उम्दा कलाकार मिले, कोई भी इन्नोवाटिव रिसर्च मिले, उन्हें आगे बढ़ाना हमारा सामाजिक दायित्व है! 

      प्रतिभावनो की तो हमारे देश में कमी नहीं, पर हमारे देशवासियों को इसका फायदा हमारे प्रयास से ही मिलेगा! आज के दौर में अधिकांश प्रतिभाएं हमें इंटरनेट पर दिखाई देती हैँ! इसलिए इंटरनेट में जो भी अपनी कला, ज्ञान और प्रतिभा से आपको आकृष्ट करें, उन्हें जरूर rate करें, उनके लिए reviews लिखें और share करें, क्योंकि उनके पास प्रतिभा है, पैसे नहीं कि वे बड़े बड़े व्यवसायियों के सामने खुद को स्थापित कर पाएँ! हमारा दायित्व सिर्फ हमारा परिवार ही नहीं होना चाहिए, सामाजिक और राष्ट्रीय भी होना चाहिए!

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        सभी विज्ञानो के साथ ज्योतिष का सहसम्बन्ध

        सभी विज्ञानो के साथ ज्योतिष का सहसम्बन्ध 

        प्राचीन काल के आदि मानव से आज के विकसित मनुष्‍य बनने तक की इस यात्रा में मनुष्‍य के पास अनुभवों के रूप में क्रमश: जो ज्ञान का भंडार जमा हुआ , वो इतनी पुस्‍तकों , इतने पुस्‍तकालयों और वेबसाइट के इतने पन्‍नों में भी नहीं सिमट पा रहा है। एकमात्र प्रकृति में इतने सारे रहस्‍य भरे पडे हैं कि प्रतिदिन हजारों की संख्‍या में अभी तक करोडों शोध पत्र दाखिल किए जा रहे हैं , फिर भी उसका अंत नहीं दिखाई देता। प्रकृति के एक एक व्‍यक्ति , एक एक जीव और एक एक कण में खासियत ही खासियत .. जितना अभी तक पता चल पाया है , उसका हजारगुणा या लाखगुणा ढूंढा जाना बाकी है , वो भी नहीं कहा जा सकता।  

        Jyotish aur vigyan


        विज्ञान शब्‍द विशेष और ज्ञान से बना है , यह विशेष ज्ञान हमें अनुभव के आधार पर प्राप्‍त होता है। मानव मस्तिष्‍क बहुत ही जिज्ञासु होता है , जब हम बारबार एक जैसी घटना को होते देखते हैं , तो उसका कारण ढूंढने के लिए प्रयत्‍नशील होते हैं । उस वक्‍त हमें कई कारण दिखाई पडते हैं , पर सारा सत्‍य नहीं होता। निरीक्षण , परीक्षण और प्रयोग के बाद हम कार्य और कारण में संबंध ढूंढने में सफल हो जाते हैं , तो हमें विशेष ज्ञान की प्राप्ति हो जाती है। पर प्रकृति के नियम इतने सरल भी नहीं कि कोई एक नियम अवश्‍यंभावी तौर पर कार्य करे , दस बीस प्रतिशत जगहों पर अपवाद मिल ही जाते हैं, जिसके कारण पुन: नए नए नियमों की स्‍थापना होती चली जाती है। इस प्रकार विज्ञान का कभी अंत नहीं होता , विज्ञान कभी विकसित नहीं हो सकता , यह हमेशा विकासशील बना रहता है।

        जिस तरह प्रकृति में विज्ञान के सारे नियम चलते रहते हैं , पर उसका ज्ञान हमें बाद में होता है , उसी प्रकार मनुष्‍य ने विज्ञान का उपयोग तो पहले शुरू कर दिया था , पर उसके नियम उसे धीरे से मालूम हुए। पर प्रकृति अपने आप में संपूर्ण है , वह हर प्रकार का संतुलन स्‍वयमेव करती है। प्रकृति की घटनाओं को देख देखकर परख परखकर मनुष्‍य नियमों की स्‍थापना करता रहा है। विश्‍व के हर युग में और अलग अलग क्षेत्र में प्रकृति के नियमों को देखते और समझते हुए ही विभिन्‍न प्रकार की परंपरागत पद्धतियां विकसित की जा सकी। पुन: आवश्‍यकता ही आविष्‍कार की जननी है , प्रकृति के ही नियम की सहायता लेते हुए अपनी सुविधा के लिए विभिन्‍न प्रकार के उपकरण भी विभिन्‍न युगों मे मानव ने बनाए हैं।

        कला का अधिक संबंध अभ्‍यास से होता है , वैसे तो विभिन्‍न प्रकार की कलाओं में भी विज्ञान छुपा होता है , पर बहुत थोडी मात्रा में। प्राचीन काल से ही प्रकृति में होनेवाली किसी घटना के नियम के जानकार उसे लोगों से छुपाने का अभ्‍यास करते हुए या कभी कभी उसकी जानकारी देते हुए भी हाथ की सफाई से किसी कला को दिखाया करते थे। पर उसमें मुख्‍य तत्‍व मन की तल्‍लीनता होती है , जिसके कारण किसी कला को अधिक विकसित किया जा सकता है। 

        अपने ज्ञान को सही ढंग से किसी के सामने रख पाना , किसी को सिखला पाना भी एक कला है। इसलिए कला का भी महत्‍व कम नहीं। विज्ञान की एक खासियत है कि इसका ज्ञान आराम से दूसरों को दिया जा सकता है, जबकि कला में प्रशिक्षण मुख्‍य होता है। इसके बावजूद विज्ञान की जानकारी ही सबको महान बनाने के लिए आवश्‍यक नहीं , कला के माध्‍यम से ही उनका बेहतर उपयोग किया जा सकता है। यही कारण है कि विज्ञान की पढाई को संपूर्ण बनाने के लिए प्रायोगिक शिक्षा भी दी जाती है।

        विज्ञान के नियमों को विकसित करने के लिए या उसके क्रम में हमें हमेशा बहुत बडे आंकडे को लेकर काम करना पडता है, उस आंकडे के विश्‍लेषण के बाद ही हमें सारे रहस्‍यों का पता चल पाता है। इसी कारण किसी भी क्षेत्र के इतिहास का महत्‍व भी कम नहीं। किसी घटना के सभी कारकों को निकालने के लिए उन कारकों के प्रतिक्षण की स्थिति और घटना की स्थिति में संबंध को जानने के लिए सांख्यिकी का उपयोग किया जाता है। 

        कोई भी विधा विज्ञान , कला और सांख्यिकी तीनो की मदद से बेहतर बनायी जा सकती है। परंपरागत विधाओं को विकसित करने के लिए भी इन तीनों का सहारा लिया जाता रहा है और आज की विधाएं भी इन तीनों के संयोग से काम करती हैं। पुन: हर विज्ञान एक दूसरे के साथ सह संबंध बनाते हुए ही मानव के लिए अधिक उपयोगी हो सकती है।

        यदि आधुनिक उपकरणों को छोड भी दें , तो हमारे रसोईघर में कई परंपरागत वस्‍तुएं मिलेंगी। उनकी बनावट पर तनिक ध्‍यान दें। बनावट के आधार पर कुछ बरतन देखने में छोटे लगेंगे , पर उनमें सामान रखने की क्षमता बहुत होगी, सामानों को धोए जानेवाली कठौती की बनावट की वजह से उसका सारा पानी आप निथार पाएंगे, चावल दाल बनानेवाले बरतन उन्‍हें जल्‍दी गलाने के उपयुक्‍त , सब्‍जी बनाने वाली कडाही भूनने के उपयुक्‍त , यहां तक कि खाना परोसे जानेवाले सभी बरतन और कलछी तक नियम के अनुसार सही है। 

        कभी हमारे यहां तेल निकाला जाने वाले परंपरागत चम्‍मच या दूसरे बरतन में डाले जाने वाले कीप को आपने देखा होगा। इसी प्रकार गहने , जेवर , खेती में उपयोग में आनेवाले सामान या घर गृहस्‍थी के अन्‍य सामानों को विकसित करने में प्रकृति के नियमों का ख्‍याल रखने के साथ ही साथ , सुविधा असुविधा के आंकडों और नियमों के बेहतर उपयोग करने की कला .. सबकुछ की आवश्‍यकता पडी होगी। ये भी उस युग का विज्ञान ही था।

        आधुनिक युग में भी हर विधा विज्ञान के नियमों के साथ ही साथ कई प्रकार के आंकडों की जांच करते हुए उसके बेहतर उपयोग की कला के दम पर ही विकसित किया जा सकता है। हरेक डाक्‍टर शरीर विज्ञान और स्‍वास्‍थ्‍य के नियमों की पढाई करता है , इसके बावजूद जर्नलों में प्रकाशित होनेवाले  विभिन्‍न प्रकार के रोगों के आंकडों पर ध्‍यान देना उसके सफल होने के लिए आवश्‍यक है , इसके बावजूद सारे एक जैसी सफलता नहीं प्राप्‍त कर पाते। 

        बिखरे हुए ज्ञान को ढंग से समायोजित करते हुए बेहतर 'डायग्‍नोसिस' कर पाना एक कला है और इस हिसाब से ही कोई डॉक्‍टर विशेष सफलता प्राप्‍त कर पाता है। जीवन में हर क्षेत्र में सफलता प्राप्‍त करने के लिए हर व्‍यक्ति को विज्ञान के नियमों के साथ साथ हर प्रकार के आंकडों के विश्‍लेषण की क्षमता और निष्‍कर्ष निकालने की कला का ज्ञान आवश्‍यक है।

        इस हिसाब से ज्‍योतिष को देखा जाए , तो भले ही आजतक इसे उपेक्षित ही छोड दिया गया हो , पर गणित ज्‍योतिष के रूप में हमारे पास एक बहुत ही मजबूत आधार है , जो पूर्ण तौर पर वैज्ञानिक है। पुन: इसी के आधार पर भविष्‍य के बारे में आकलन करने के लिए इसमें जो सूत्र हैं , वे पूर्ण तौर पर वैज्ञानिक या प्रामाणिक तो नहीं माने जा सकते , पर बहुत हद तक संकेत देने में तो अवश्‍य समर्थ हैं।  इन दोनो मजबूत आधारों के साथ ही साथ 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' के द्वारा विकसित किए गए ग्रहों की ऊर्जा को निकालनेवाले सूत्र के रूप में हमें एक बडा वैज्ञानिक आधार मिल गया है। 

        अपने जीवन और पूरे विश्‍व में घटनेवाली घटनाओं के साथ इनका तालमेल बनाने के लिए सांख्यिकी के आंकडों का उपयोग किया जाना चाहिए। किसी भी विज्ञान के विकास के लिए हर विज्ञान का एक दूसरे के साथ सहसंबंध होना आवश्‍यक है , उनसे तालमेल बिठाकर प्रतिदिन इस विधा को बेहतर बनाया जाना चाहिए , पुन: इतने नियमों के मध्‍य तालमेल बिठाते हुए किसी निष्‍कर्ष पर पहुंचने की कला को विकसित करते हुए इसे अधिक से अधिक प्रामाणिक और उपयोगी बनाया जा सके, ऐसी कोशिश होनी चाहिए। सचमुच बिना प्रायोगिक ज्ञान के किसी विज्ञान की क्‍या उपयोगिता ??

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          जन्‍मकुंडली में स्थित स्‍वक्षेत्री ग्रहों का प्रभाव

          जन्‍मकुंडली में स्थित स्‍वक्षेत्री ग्रहों का प्रभाव

          ज्योतिष में आसमान के 360 डिग्री को 12 भागों में बाँटकर  30-30 डिग्री की एक एक राशि निकाली गयी है। मेष और वृश्चिक राशि का अधिपति मंगल, वृष और तुला राशि का अधिपति शुक्र, मिथुन और कन्या राशि का अधिपति बुध, कर्क राशि का अधिपति चन्द्रमा, सिंह राशि का अधिपति सूर्य, धनु और मीन  राशि का अधिपति बृहस्पति तथा मकर और कुम्भ राशि का अधिपति शनि को माना जाता है।

           जन्मकुंडली में  ग्रह जब अपनी राशि में हों तो उन्हें स्वक्षेत्री माना जाता है, इस कारण मेष और वृश्चिक राशि में मंगल, वृष और तुला राशि में शुक्र, मिथुन और कन्या राशि में बुध, कर्क राशि में चंद्र, सिंह राशि में सूर्य, धनु और मीन राशि में बृहस्पति तथा मकर और कुम्भ राशि में शनि को स्वक्षेत्री माना जाता है। जन्‍मकुंडली में चंद्रमा 4 अंक में , सूर्य 5 अंक में , मंगल 1 या 8 अंक में , शुक्र 2 या 7 अंक में , बुध 3 या 6 अंक में , बृहस्‍पति 9 या 12 अंक में तथा शनि 10 या 11 अंक में हो तो उन्‍हें स्‍वक्षेत्री माना जाता है।

          swakshetri grahon ka prabhaw


          फलित ज्‍योतिष में स्‍वक्षेत्री ग्रहों को बहुत ही महत्‍वपूर्ण माना जाता है। पुराने शास्‍त्रों के अनुसार यदि किसी जन्‍मकुंडली में एक दो स्‍वक्षेत्री ग्रह हों , तो वह भाग्‍यवान होता है। किंतु 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' के हिसाब से बात ऐसी नहीं है। प्रत्‍येक जन्‍मकुंडली में 12 खाने होते हैं , जो 12 भावों का प्रतिनिधित्‍व करते हैं। किसी ग्रह के किसी एक खाने में आने की संभावना 1/12 होगी , जबकि सूर्य और चंद्र को छोडकर बाकी ग्रहों के आधिपत्‍य में दो दो खाने होते हैं , इसलिए उनके स्‍वक्षेत्री होने की संभावना 1/6 होगी।इस तरह किसी जन्‍मकुंडली में दो ग्रहों के स्‍वक्षेत्री होने की संभावना 72 में से एक हो ही सकती है। इस तरह ग्रहों का स्‍वक्षेत्री होना सामान्‍य बात ही मानी जा सकती है।

          सभी स्‍वक्षेत्री ग्रहों का स्‍वभाव एक सा नहीं होता .. स्‍वभाव में भिन्‍नता का कारण उनकी गत्‍यात्‍मक शक्ति है , जो ग्रहों की गति के आधार पर निकाली जाती है। स्‍वक्षेत्री ग्रह यदि अतिशिघ्री अवस्‍था में हो , तो जातक पूर्वजों से या भाग्‍य से कोई ऐसी चीज प्राप्‍त करता है , जिससे उसका मन संतुष्‍ट होता है। शरीर , धन , संपत्ति स्‍थायित्‍व , बुद्धि , विद्या , ज्ञान किसी भी क्षेत्र में आसानी से मिलने वाली सफलता के कारण जातक को अधिक प्रयास करने की जरूरत ही नहीं रह जाती है। स्‍वक्षेत्री ग्रह शीघ्री अवस्‍था में हो , तो जातक को भाग्‍य का थोडा सहयोग भी मिलता है और वह अपने कर्म के द्वारा इसे बढाने का भी प्रयास करता है। उसकी महत्‍वाकांक्षा थोडी छोटी तो जरूर होती है , पर कार्यक्षमता और प्रयास के अनुरूप सफलता भी मिलती है।

          स्‍वक्षेत्री ग्रह सामान्‍य या मंद हो तो उन संदर्भों में जातक की महत्‍वाकांक्षा बहुत बडी होती है। उसी के अनुसार उसकी कार्यक्षमता भी बढती जाती है। ग्रह के गत्‍यात्‍मक दशाकाल में तो उन संदर्भों के प्रति उसका ध्‍यान संकेन्‍द्रण बहुत अधिक होता है , उस वक्‍त बाकी सारे मुद्दे गौण हो जाते हैं। अधिकांश समय दशाकाल में सफलता मिलते ही देखी जाती है , ऐसा कभी कभी नहीं भी होता है , पर पूरे जीवन उन खास संदर्भों का स्‍तर तो देखने को मिलता ही है।

          यदि स्‍वक्षेत्री ग्रह सामान्‍य तौर पर वक्री हो , तो जातक की कार्यक्षमता और महत्‍वाकांक्षा ऊंची तो होती है , पर उसके अनुरूप उसे सफलता नहीं मिल पाती , खासकर ग्रह के गत्‍यात्‍मक दशाकाल में उन संदर्भों की स्थिति बुरी होने से तनाव बढ जाता है। स्‍वक्षेत्री ग्रह अतिवक्री अवस्‍था में हो , तो स्‍वक्षेत्री होने के बावजूद उन ग्रहों के कारण व्‍यक्ति बहुत ही कठिनाई और पराधीनता भरा वातावरण प्राप्‍त करते हैं। किसी प्रकार की दुर्घटना या असफलता का बुरा प्रभाव इनके व्‍यक्तित्‍व पर पडता है , जिसके कारण इन संदर्भो में किंकर्तब्‍यविमूढ होते हैं।

          इस तरह 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' के हिसाब से स्‍वक्षेत्री ग्रह भी गति के हिसाब से ही फल देते हैं।

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