'वेद अमृत' जैसी स्‍वच्‍छ धार्मिक पत्रिकाएं

 हमारे यहाँ 'वेद अमृत' जैसी स्‍वच्‍छ धार्मिक पत्रिकाएं नहीं अन्धविश्वास चलता है !

वर्ष 2002 तक या उसके बाद भी मैं कुछ घरेलू पत्रिकाएं पढा करती थी। 2002 के दिसंबर माह में एक पत्रिका 'मेरी सहेली' के साथ 'वेद अमृत' नाम की पत्रिका का लघु संस्‍करण प्राप्‍त किया था। उस छोटे संस्‍करण में नाम मात्र के कई लेख और कहानियां होने के बावजूद मैं इस पत्रिका के लक्ष्‍य को समझ गयी थी और अगले ही महीने इसक‍ा प्रवेशांक बाजार से मंगवा लिया था। प्रवेशांक पढने के बाद मेरी प्रतिक्रिया इन शब्‍दों में संपादक जी के पास पहुंची थी , जिसे उन्‍होने 'वेद अमृत' के फरवरी माह के अंक में 'आपके विचार' में प्रकाशित भी किया था ..... 

'वेद अमृत' जैसी स्‍वच्‍छ धार्मिक पत्रिकाएं


पिछले महीने मेरी सहेली के साथ वेद अमृत का लघु संस्‍करण प्राप्‍त किया उसे पढने के बाद वेद अमृत के प्रवेशांक को खरीदने का लोभ संवरण नहीं कर पायी। आज बाजार में फैली अधिकांश पत्रिकाएं धर्म , ज्ञान , ज्‍योतिष और वास्‍तु के नाम पर कुछ भी छापती जा रही है और कुछ पत्रिकाएं तो पूर्वाग्रह से ग्रस्‍त होकर धर्म की टांग ही तोड देने को उद्दत हैं। ऐसी परिस्थितियों में आपके संपादकीय के समन्‍वयवादी दृष्टिकोण ने मुझे बहुत प्रभावित किया है।

 शायद आपकी पत्रिका का लक्ष्‍य उन पुराने मोतियों को चुनकर पिरोकर वह माला तैयार करनी है , जो नयी पीढी के नए दृष्टिकोण के अनुरूप हों। सभी लेख संपादकीय में कहे गए लक्ष्‍य को पूरा करने में समर्थ हैं। शास्‍त्र को शस्‍त्र न बनाओ , सत्‍य की रक्षा , अभिशाप या वरदान जैसी कहानियां जहां कम उम्र के पाठकों तक को प्राचीन कथाओं के माध्‍यम से संदश देने में समर्थ हैं , वहीं जीवन पथ जैसी कहानी आज के युग की जरूरत। अन्‍य लेख भी जितने सहज ढंग से ज्ञान का भंडार मस्तिष्‍क में उंडेलते हैं , उसे देखकर आपकी पूरी टीम के लेखन और संपादन पर गर्व होता है। 

सृष्टि निर्माता ,प्रकृति , अल्‍लाह या भगवान ... जो भी कह दिया जाए , पर एक नियम या व्‍यवस्‍था के आगे हम सब नतमस्‍तक हैं। कितने ही तरह की प्राकृतिक आपदाओं को हम आज के युग में भी नहीं रोक पाए हैं और जब भी किसी घटना पर हमारा वश नहीं चलता , उसे प्रकृति की इच्‍छा मान लेते हैं। आखिर यह कमजोरी हर मनुष्‍य के पास कभी कभी क्‍यूं उपस्थित होती हैं , जब किसी संयोग की कमी से उसका काम नहीं होता और कभी वहीं संयोग दूसरों को काम कर डालता है। 

धर्म की उत्‍पत्ति कभी भी सार्वदेशिक और सार्वकालिक नहीं हुई। इसलिए दूसरे देश या काल में भले ही वह अनुपयोगी हो , पर जिस युग और देश में इसकी संहिताएं तैयार की जाती हैं , यह काफी लोकप्रिय होता है। यह बात अलग है कि धर्म हमेशा मध्‍यमवर्गीय लोगों की जरूरतों को घ्‍यान में रखकर बनाया जाता है , क्‍यूंकि उच्‍चवर्गीय लोगों की संख्‍या और निम्‍नवर्गीय लोगों की भी समस्‍याएं नाममात्र की होती हैं। सभ्‍यता और संस्‍कृति मध्‍यमवर्गीय लोगों से अधिक प्रभावित होती हैं, इसी कारण मध्‍यम वर्ग ही हमेशा दबाब में होता है और इस दबाब से बचाने के लिए कोई भी विकल्‍प तैयार किया जाए , तो उसे अपनाने के लिए पूर्ण तौर पर तैयार होता है। कालांतर में इसे ही उनका धर्म मान लिया जाता है। 

धर्माचरण का नकल करनेवाले कुछ पाखंडियों , धोखेबाजों और कपटी लोगों की पोल कुछ ही दिनों में खुल जाती है , जबकि महात्‍मा गांधी , मदर टेरेसा , ईसा मसीह , दयानंद सरस्‍वती , स्‍वामी विवेकानंद , गौतम बुद्ध , महावीर , गुरू नानक , चैतन्‍य महाप्रभु आदि अनेकानेक लोग धर्माचरण द्वारा युगों युगो तक पूजे जाते हैं। यदि उनके विचारों में अच्‍छाई नहीं होती , समाज के लिए सोंचने का संदेश नहीं होता , तो ऐसा क्‍यूं होता ??

आज कुछ पुस्‍तको को व्‍यवस्थित करने के क्रम में मुझे वेद अमृत के सभी पुराने अंक मिले। फरवरी 2006 तक का अंक मेरे पास मौजूद है , जिसमें से प्रत्‍येक की कीमत मात्र 15 रूपए लिखी गयी है। उसके बाद के अंक भी कहीं पर छुपे हो सकते हैं , जो बाद में मिल जाए। पर इसके कुछ ही दिनों बाद वेद अमृत का प्रकाशन बंद हो गया, जाहिर सी बात है कि पत्रिकाएं बिक नहीं पा रही होंगी। इतने कम कीमत में बडों के लिए यह पत्रिका तो लाभप्रद थी ही , इसमें बाल जगत के अंतर्गत आनेवाली कहानी को मैं बच्‍चों को अवश्‍य पढाया करती थी , प्रत्‍येक में कुछ न कुछ संदेश छुपा होता था। समाज में कोई अच्‍छी शुरूआत हो और विद्वान लोगों द्वारा उसका यही हश्र हो , तो हमारे समाज के लोग तो भटकेंगे ही ।

आज के आर्थिक युग में लोगों की सोंच बिल्‍कुल बदल गयी है , विज्ञान के बडे बडे आविष्‍कारों का उपयोग करना मात्र उनका लक्ष्‍य हो गया है , साधन ही साध्‍य बन गया है। वे न तो खुद अच्‍छा साहित्‍य पढना चाहते हैं और न ही बच्‍चों को पढाना चाहते हैं।बाद में आनेवाली पीढी को दोष देते हम नहीं थकते। बस प्रोफेशनल सफलता ही हर बात का मापदंड बन गया है , लोगों ने अपने को इतना सिमटा लिया है कि जीवन के अंतिम चरणों में भी बिल्‍कुल अनुभवहीन दिखते हैं। आज धर्म को भले ही गलत मान लिया जाए और इसकी आवश्‍यकता को नकारा जाए , पर आज के युग में भी एक धर्मगुरू की आवश्‍यकता है ही , जो लोगों के भटकते दिलोदिमाग को शांत करने की कोशिश करे , ताकि पूरी दुनिया चैन से जी सके। सही कहा गया है , गुरू के बिना ज्ञान मुश्किल ही होता है।

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    वैदिक गणितः चुटकियों में बड़ी-बड़ी गणनाएँ

    Vaidik ganit ke bare mein

    आज शाम एक आलेख पर नजर पडी वैदिक गणितः चुटकियों में बड़ी-बड़ी गणनाएँ , जिसमें दिया गया है कि भारत में कम ही लोग जानते हैं, पर विदेशों में लोग मानने लगे हैं कि वैदिक विधि से गणित के हिसाब लगाने में न केवल मजा आता है, उससे आत्मविश्वास मिलता है और स्मरणशक्ति भी बढ़ती है। भारत के स्कूलों में वह शायद ही पढ़ाई जाती है। भारत के शिक्षाशास्त्रियों का भी यही विश्वास है कि असली ज्ञान-विज्ञान वही है जो इंग्लैंड-अमेरिका से आता है। घर का जोगी जोगड़ा, आन गाँव का सिद्ध। 

    vaidik ganit ke bare mein


    लेकिन आन गाँव वाले अब भारत की वैदिक अंकगणित पर चकित हो रहे हैं और उसे सीख रहे हैं। बिना कागज-पेंसिल या कैल्क्युलेटर के मन ही मन हिसाब लगाने का उससे सरल और तेज तरीका शायद ही कोई है। भारत का गणित-ज्ञान यूनान और मिस्र से भी पुराना बताया जाता है। शून्य और दशमलव तो भारत की देन हैं ही, कहते हैं कि यूनानी गणितज्ञ पिथागोरस का प्रमेय भी भारत में पहले से ज्ञात था। ऑस्ट्रेलिया के कॉलिन निकोलस साद वैदिक गणित के रसिया हैं। 

    उन्होंने अपना उपनाम 'जैन' रख लिया है और ऑस्ट्रेलिया के न्यू साउथ वेल्स प्रांत में बच्चों को वैदिक गणित सिखाते हैं। उनका दावा है- 'अमेरिकी अंतरिक्ष अधिकरण नासा गोपनीय तरीके से वैदिक गणित का कृत्रिम बुद्धिमत्ता वाले रोबेट बनाने में उपयोग कर रहा है। साद अपने बारे में कहते हैं, 'मेरा काम अंकों की इस चमकदार प्राचीन विद्या के प्रति बच्चों में प्रेम जगाना है। 

    मेरा मानना है कि बच्चों को सचमुच वैदिक गणित सीखना चाहिए। भारतीय योगियों ने उसे हजारों साल पहले विकसित किया था। आप उन से गणित का कोई भी प्रश्न पूछ सकते थे और वे मन की कल्पनाशक्ति से देख कर फट से जवाब दे सकते थे। उन्होंने तीन हजार साल पहले शून्य की अवधारणा प्रस्तुत की और दशमलव वाला बिंदु सुझाया। उनके बिना आज हमारे पास कंप्यूटर नहीं होता।

    इस आलेख को पढने के बाद मुझे अपने गांव की एक अनपढ ग्रामीण महिला याद आ गयी। वो महाजनों के घर से धान खरीदा करती थी और उससे ग्रामीण प्रक्रियाओं के अनुसार चावल तैयार किया करती थी। फिर उसे बाजार में बेच दिया करती थी , इसी कार्य के द्वारा कमाया गया मुनाफा उसके परिवार की जरूरतें पूरा करता था।  हमें हिसाब में कठिनाई होती थी , इसलिए हमलोग उसे किलो और क्विंटल के हिसाब से धान खरीदने को कहते थे , पर वह मेरे यहां पूराने तौल के अनुसार ( 40 सेर का मन ) धान खरीदती। 

    इतने रूपए मन के हिसाब से इतने मन और इतने किलो , हमें इस हिसाब किताब में काफी दिक्‍कत महसूस होती थी , इस दशमलव के हिसाब को हमलोग बिना कॉपी किताब और केलकुलेटर के नहीं कर सकते थे , वो मन ही मन जोडकर रूपए और पैसे तक का सही आकलन कर लेती थी। बिना किसी तरह की पढाई लिखाई के यह ज्ञान निश्चित तौर पर उसके पास मौखिक रूप में अपने माता पिता या किसी अन्‍य पूर्वजों से ही आया होगा और अभी तक वह उसे धरोहर के तौर पर संभाले हुई है। 

    बिना किताबों और कॉपियों या पढाई के ही परंपरागत रूप से ही अपनी आनेवाली पीढी तक यह ज्ञान खेल खेल में ही चलता आ रहा है। हमलोग उसके इस ज्ञान पर चकित रह जाते थे , पर हमें कभी भी उस हिसाब को समझने का मौका नहीं मिल पाया था। शायद अब भी हमलोगों का नजरिया अपने परंपरागत ज्ञान के प्रति बदलेगा , मैं ऐसी आशा रखती हूं , क्‍यूं‍कि उस वक्‍त मैं अपने परंपरागत ज्ञान को लेकर इतनी गंभीर नहीं थी , इसलिए शायद सोंच लिया हो कि जब हमारे पास दशमलव की उन्‍नत पद्धति है , तो इस बेकार के ज्ञान को सीखने का क्‍या फायदा ?

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      'गत्यात्मक ज्योतिष' की टीम

      'गत्यात्मक ज्योतिष' की टीम के महत्वपूर्ण सदस्य  

      एक शोध-पत्र जमा करने में जीवन के कितने वर्ष गुजर जाते हैं, तो आप समझ सकते हैं कि किसी भी विज्ञान के एक नए स्वरुप को जन्म दे पाने में कितना समय लगा होगा। हर क्षेत्र में हज़ारो-लाखो लोग नियमित काम करते हैं, तब जाकर एक-एक पाठ पूरा होता है। सही जन्म कुंडली गणना के लिए  ‘गत्यात्मक ज्योतिष’ के जनक श्री विद्या सागर महथा जी की ज्योतिषीय यात्रा आसान नहीं रही। ज्योतिष में निहित कमजोरियों को देखने की शुरुआत इन्होने 24 वर्ष की उम्र से ही शुरू कर दी थी। इसे समझने के लिए 12 वर्षों तक ज्योतिष के ग्रंथों का गंभीर अध्ययन किया। 12 वर्ष के बाद इन्होने ज्योतिष की कमियों और इनके सुधार के उपायों पर लिखना शुरू किया। 

      पर सही जन्म कुंडली गणनाज्योतिष में सुधार की संभावनाओं पर इनका दिमाग हमेशा चलता रहा और जून 1981 में ईश्वर की विशेष कृपा से ग्रहों की शक्ति-निर्धारण का जो सूत्र उन्हें प्राप्त हुआ, वह ज्योतिष को एक बहुत बड़ा वैज्ञानिक आधार देने में सक्षम था। पर सिर्फ आधार से ही रातोरात विज्ञान को विकसित नहीं किया जा सकता, नए नए अनुभव जोड़ते जाने थे इसमें। उन्होंने तो अपना पूरा जीवन इसे समर्पित किया ही किया, हम चार भाई बहनों ने भी इस विधा की हर बात समझनी और नए अनुभवों को जोड़ने में कोई कमी नहीं की। आज ज्योतिष के क्षेत्र में काम करते हुए विद्या सागर महथा जी को 55 साल हो गए हैं, संगीता पुरी 35 वर्षों से, अमर ज्योति 25 साल से, शालिनी खन्ना 20 साल से और अशेष कुमार 15 वर्षों से गत्यात्मक ज्योतिष’ को नए नए अनुभवों से समृद्ध कर रहे हैं। इस प्रकार हमारी टीम में ये सदस्य हैं। गत्यात्मक ज्योतिष की पूरी टीम को जानने के लिए आप इस लिंक पर क्लिक कर सकते हैं। 




      सही जन्म कुंडली गणना

      विद्या सागर महथा 

      ज्योतिष-वाचस्पति , ज्योतिष-रत्न , ज्योतिष-मनीषी , स्वर्ण-पदक विजेता।
      ग्रहों के गतिज और स्थैतिज ऊर्जा को निकालने के सूत्र तथा स्वास्थ्य , धन , शिक्षा , दांपत्य-जीवन , सामाजिक-राजनीतिक स्थिति , संपत्ति और स्थायित्व से सम्बंधित धनात्मक/ऋणात्मक समय और उतार-चढ़ाव के जीवन-ग्राफ को प्रतिपादित करने के सूत्र के जनक।
      बहुत से ज्योतिषीय पत्रिकाओं तथा कई अप्रकाशित और अप्रकाशित पुस्तकों के लेखक। 
      ज्योतिष के महान विद्वान् और समय-विशेषज्ञ 
      सही जन्म कुंडली गणना

      संगीता पुरी 

      गत्यात्मक ज्योतिष विशेषज्ञा , इंटरनेट में 15  वर्षों से ब्लॉग लेखन में सक्रिय , सटीक भविष्यवाणियों के लिए पहचान , 'गत्यात्मक ज्योतिष' को परिभाषित करते हुए एक पुस्तक की लेखिका , २०१६ में महिला-बाल-विकास मंत्री श्रीमती मेनका गाँधी जी और महामहिम राष्ट्रपति प्रणव मुख़र्जी द्वारा द्वारा #100womenachievers में शामिल हो चुकी हैं। उत्तराखंड के मुख्य मंत्री श्री रमेश पोखरियाल जी के द्वारा 'परिकल्पना-सम्मान' तथा झारखण्ड की गवर्नर श्रीमती द्रौपदी मुर्मू जी द्वारा 'अपराजिता सम्मान'  से इन्हे सम्मानित किया गया ।


      सही जन्म कुंडली गणना

      अमर ज्योति 

      गत्यात्मक ज्योतिष विशेषज्ञ , ज्योतिष काउंसलर , प्रभावशाली ढंग से बुद्धिजीवी और हाई प्रोफाइल लोगों के जीवन-ग्राफ का विश्लेषण करते हुए गोचर को देखते हुए भविष्यवाणी करने में  सफल रहे हैं। 
      सही जन्म कुंडली गणना

      शालिनी खन्ना 

      गत्यात्मक ज्योतिष विशेषज्ञा , धनबाद में दैनिक हिन्दुस्तान पत्र की ज्योतिषीय काउंसलर , प्रसिद्ध समाज-सेविका , कुछ दैनिक और मासिक पत्रों में सटीक भविष्यवाणियां करने वाली अच्छी लेखिका , लाइफ-ग्राफ  पूरा विवरण में सूक्ष्म दृष्टि रखने में सफल। 

      अशेष कुमार 

      गत्यात्मक ज्योतिष विशेषज्ञ 

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        80 प्रतिशत से अधिक लोग अमला योग में

        Amla yog in Astrology

        'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' प्राचीन ज्‍योतिषीय ग्रंथों में वर्णित सारे योगों के प्रभाव की पुष्टि के लिए संभावनावाद के नियमों का सहारा लेता है। इसकी मान्‍यता है कि कोई भी राजयोग तभी राजयोग माना जा सकता है , ज‍ब कुल जनसंख्‍या के बहुत कम प्रतिशत कूंडली मे उस राजयोग के होने की पुष्टि हो। मैने गणित के संभावनावाद के नियम के अनुसार दुनियाभर के लोगों की जन्‍मकुंडली में गजकेशरी योग के होने की संभावना का आकलन किया था और बताया था कि 4/11 की संभाब्‍यता रखने वाला यह नियम गजकेशरी योग के फलों को देने की सामर्थ्‍य तबतक नहीं रख सकता , जबतक पूरी दुनिया में इतनी समृद्धि न आ जाए , जिससे लगभग 37 प्रतिशत लोग उसके फल को प्राप्‍त करने लायक न हो जाएं। ज्योतिष 

        Amla Yog in Astrology


        उसी योग की पुस्‍तक में दूसरे नंबर पर अमला योग की चर्चा की गयी थी। इस योग की परिभाषा देते हुए लिखा गया है कि लग्‍न से 10वें स्‍थान पर या चंद्रमा जिस राशि पर बैठा हुआ हो , उस राशि से दसवें स्‍थान पर शुभग्रह बैठे हों ,तो जन्‍मकुंडली मे अमला योग बनता है और इस योग में जन्‍म लेनेवाला व्‍यक्ति प्रसिद्ध , गुणवान और ख्‍याति प्राप्‍त करनेवाला होता है। ऐसा व्‍यक्ति पूर्ण सुखी जीवन व्‍यतीत करता है और संपूर्ण सुखों को भोगता है। ऐसा व्‍यक्ति चरित्रवान एवं सज्‍जन होता है।

        जैसा कि हम सभी जानते हैं कि ज्‍योतिष में चंद्र, बुध, शुक्र, केतु और बृस्‍पति ये पांचो शुभग्रह माने जाते हैं। अमला योग के अनुसार इनमें से एक की भी उपस्थिति से मुनंष्‍य सुखी जीवन जी सकता है। लग्‍न से 10वें स्‍थान पर किसी एक शुभ ग्रह की उपस्थिति की संभावना 1/12 होगी, लेकिन इन पांचों में से किसी एक की संभावना 5/12 हो जाएगी। इसी प्रकार चंद्र राशिवाले स्‍थान से भी इन पांचों ग्रहों में से एक के होने की संभावना भी 5/12 होगी। इन दोनो प्रकार की संभावना में से किसी एक संभावना के बनने का चांस 10/12 होगा। इसका अर्थ यह है कि संभावनावाद के नियम के अनुसार कुल जनसंख्‍या का बडा भाग यानि 80 प्रतिशत से अधिक जनसंख्‍या अमला योग में जन्‍म ले सकती है।

        इस आधार पर इस योग की सत्‍यता को तभी स्‍वीकारा जा सकता है, जब पूरे विश्‍व का विकास इतना हो चुका हो कि 80 प्रतिशत से अधिक लोग प्रसिद्ध, गुणवान और ख्‍याति प्राप्‍त करनेवाले और पूर्ण सुखी जीवन व्‍यतीत करनेवाले हों। कम से कम आज के समय में, जब विश्‍व के 90 प्रतिशत से अधिक लोग कष्‍ट में जीवन यापन करने को बाध्‍य हों, इस योग की प्रामाणिकता का कोई तुक नजर नहीं आता।

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          राहु केतु के उपाय

          Rahu ketu ke upay

          जब भी किसी की कुंडली में बुरे ग्रहों के प्रभाव की चर्चा होती है तो मंगल और शनि के साथ ही साथ राहू और केतु का नाम भी आना स्‍वाभाविक होता है। यह अचरज की ही बात है कि मंगल और शनि जैसे भीमकाय ग्रहों और राहू केतु जैसे अस्त्तिवहीन ग्रहों के प्रभाव को परंपरागत ज्‍योतिष एक ही रूप में कैसे देखता आया है ? इस विराट ब्रह्मांड में पृथ्‍वी को स्थिर रखने पर सूर्य का बन रहा काल्‍पनिक पथ और सूर्य की परिक्रमा करता चंद्रमा का पथ दोनो ही राहू और केतु नाम के इन दो संपात विंदूओं पर एक दूसरे को काटते हैं । 

          Rahu ketu ke upay

          गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष की माने तो सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण के दिन सूर्य , पृथ्‍वी और चंद्रमा के साथ ही साथ ये दोनो विंदू भी एक ही सीध में आ जाते हैं। हो सकता है , जब यह खोज नहीं हुई हो कि एक पिंड की छाया दूसरे पर पडने से सूर्यग्रहण या चंद्रग्रहण होता है , तब सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण में इन दोनो संपात विंदुओं की ही भूमिका को मान लिया गया हो और इन्‍हें इतना महत्‍वपूर्ण दर्जा दे दिया गया हो।

          पर भौतिक विज्ञान में विद्युत चुंबकीय या गुरूत्‍वाकर्षण या फिर कोई और शक्ति क्‍यों न हो , किसी की भी उत्‍पत्ति पदार्थ के बिना संभव नहीं है और हमलोग ग्रह की जिस भी उर्जा से प्रभावित हों , राहू और केतु उनमें से किसी का भी उत्‍सर्जन नहीं कर पाते , इसलिए राहू और केतु से प्रभावित होने का कोई प्रश्‍न ही नहीं उठता। अपने 40 वर्षीय अध्‍ययन मनन में ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ ने सूर्य , चंद्रमा और अन्‍य ग्रहों की भिन्‍न भिन्‍न स्थिति के अनुसार उनकी शक्ति को पृथ्‍वी के जड चेतन पर महसूस किया है , पर राहू और केतु की विभिन्‍न स्थिति से जातक पर कोई प्रभाव नहीं देखा , इसलिए ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ में इसकी चर्चा नहीं की गयी है। 

          राहू और केतु को छोडकर इनकी जगह यूरेनस , नेप्‍च्‍यून और प्‍लूटो के आंशिक प्रभाव को देखते हुए इसे अवश्‍य शामिल किया गया है। इस प्रकार गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष के अनुसार हमें प्रभावित करनेवाले ग्रहों की कुल संख्‍या नौ की जगह दस हो गयी है , जो इस प्रकार हैं ...... चंद्र , बुध , मंगल , शुक्र , सूर्य , बृहस्‍पति , शनि , यूरेनस , नेप्‍च्‍यून एवं प्‍लूटो। 'गत्यात्मक जन्मकुंडली' में राहु और केतु नहीं होते हैं, मनुष्य पर इनके प्रभाव की बात ही नहीं, तो फिर उपाय की बात तो हो ही नहीं सकती। 

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