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'गत्‍यात्‍मक भृगुसंहिता' तैयार करने में देर

 Bhrigu samhita janam kundali in hindi


गत्यात्मक ज्योतिष के रिसर्च के बाद ज्योतिष के हर क्षेत्र में गत्यात्मकता आ सकती है।  पिछले कई आलेखों में मैने भृगु ज्योतिष के बारे में आपको जानकारी देने का प्रयास किया है , पिछली कडी में मैने बताया था कि किस प्रकार मेरे द्वारा तैयार की गयी 'गत्‍यात्‍मक भृगुसंहिता' नष्‍ट हो गयी। पर 144 शीटोंवाले एक्‍सेल प्रोग्राम का बच जाना मेरे लिए काफी राहत भरा था , जिसके द्वारा किसी भी 'गत्‍यात्‍मक समय भृगुसंहिता' तैयार की जा सकती थी। पर पहले की तुलना में कुछ अच्‍छा तैयार करने की सोंच के कारण ही चार पांच वर्ष व्‍यतीत हो जाने पर भी मैं उस दिशा में काम न कर सकी।

Bhrigu Samhita

Bhrigu samhita kundli bhagya
एक्‍सेल में बने प्रोग्राम से मेरे मनोनुकूल काम होते न देख मैने प्रोग्रामिंग सीखने का निश्‍चय किया। सी++ सीखने के लिए मुझे जितना समय देना पडता या जितना ध्‍यान लगाना पडता , शायद मैं नहीं दे सकती थी। उसकी तुलना में विज्‍युअल बेसिक काफी आसान था , इसलिए मैने विज्‍युअल बेसिक सीखने के लिए इंस्‍टीच्‍यूट में एडमिशन ले लिया। इसे सीखते सीखते ही घर पर ज्‍योतिष के 'गत्‍यात्‍मक सिद्धांतों' के आधार पर एक साफ्टवेयर भी तैयार करने लगी , ताकि इसे बनाने में कोई समस्‍या हो , तो कंप्‍यूटर के जानकारों से पूछा जा सके। 
पर ज्‍योतिष के सिद्धांत इतने आसान भी नहीं कि वे समस्‍याओं को तुरंत हल कर पाते , मुझे ही स्‍वयं दिन रात जगकर इस काम को अंजाम देना पडा और कामभर प्रोग्रामिंग किया हुआ मेरा साफ्टवेयर कुछ ही दिनों में तैयार हो गया , जो अभी भी सिर्फ जन्‍मतिथि , जन्‍मसमय और जन्‍मस्‍थान के आधार पर जातक के जीवनभर के उतार चढाव का ग्राफ के साथ ही साथ कई तरह की भविष्‍यवाणी करने में भी समर्थ है।
Bhrigu samhita kundli faladesh


विज्‍युअल बेसिक सीखने के बाद मुझे महसूस हुआ कि एम एस वर्ड के मेल मर्ज की तुलना में विज्‍युअल बेसिक द्वारा और अच्‍छे ढंग से 'गत्‍यात्‍मक भृगु संहिता' को तैयार किया जा सकता है। इस कारण मेल मर्ज द्वारा फिर से बनाए जानेवाले भृगुसंहिता के काम में रूकावट आ गयी और नए तरह की भृगुसंहिता को बनाने की दिशा में सोंच बनीं। 
पर कोई काम अनायास जितनी तेजी से हो जाता है , अधिक तैयारी के क्रम में उतनी ही देर लगती है। पहले से बने हुए उस एक्‍सेल शीट को भी पापाजी के द्वारा संपादित कराने की इच्‍छा थी , पर न तो उनका मेरे यहां लम्‍बी अवधि के लिए आना हो पा रहा है और न ही मैं उनके यहां जा पा रही हूं, जो कि देर होने का मुख्‍य कारण है।
Bhrigu samhita kundli guruji


पुस्‍तक के रूप में जो 'गत्‍यात्‍मक भृगुसंहिता' तैयार हुई थी , उसमें व्‍यक्ति के ग्राफ के अनुसार किसी एक ग्रह के हिसाब से उसकी उम्र के आधार पर भविष्‍यवाणी की जाती थी। पर मेरे मनोनुकूल अब जो भृगुसंहिता बनेगी , उसे साफ्टवेयर ही समझा जाए और इसमें अपना जन्‍मविवरण डालने के बाद यह उम्र के साथ नहीं , वरन् ईस्‍वी के साथ भविष्‍यवाणी कर सकेगी। वैसे मेरे अभी बने प्रोग्राम में भी इसकी सुविधा है , पर वह विस्‍तृत में न होकर संक्षेप में है। 

हमारे केंद्र से जन्मकुंडली बनवाने पर पुरे जीवन के उतार-चढ़ाव के साथ साथ इस प्रोग्राम की भविष्यवाणियाँ भी आपको दी जाती हैं। आगे मेरा जो कार्यक्रम है , उसमें भाषा ऐसी सरल रहेगी कि लोगों का अपनी जीवनयात्रा के बारे में , आनेवाली परिस्थितियों के बारे में पहले से ही सबकुछ समझ में आ जाएगा और इस आधार पर अपने समय से तालमेल बिठाते हुए वे अपनी आगे की योजना बना पाएंगे।

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    मेरे द्वारा रची गयी गत्‍यात्‍मक भृगुसंहिता नष्‍ट

     

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    गत्यात्मक ज्योतिष ने आज के आधुनिक युग के अनुरूप गत्यात्मक भृगु संहिता के लेखन की दिशा में बड़ा काम किया है। पिछले दो कडी में मैने भृगुसंहिता के बारे में कुछ जानकारियां दी थी , पर दूसरे सामयिक मुद्दों में व्‍यस्‍तता बन जाने से उसकी आगे की कडी में रूकावट आ गयी थी। जहां पहली कडी में मैने इस कालजयी रचना के आधार को बताया था , वहीं दूसरी कडी में मैने अपने पिताजी के द्वारा लिखी जा रही गत्‍यात्‍मक भृगुसंहिता के अधूरे ही रह जाने की जानकारी दी थी। 

    अपनी जबाबदेही के समाप्‍त होने के बावजूद प्रकाशकों के किसी प्रकार की दिलचस्‍पी न लेने से मेरे पिताजी गत्‍यात्‍मक भृगुसंहिता का आधा भाग लिखने के बाद उसे और आगे न बढा सके तथा उनके द्वारा लिखा गया गत्‍यात्‍मक भृगुसंहिता का आधा भाग मेरे पास ज्‍यों का त्‍यों सुरक्षित रहा। उनके अधूरे सपने को पूरा करने की दृढ इच्‍छा होने के कारण इस गत्‍यात्‍मक भृगुसंहिता को भी पूरा करने की लालसा मेरे भीतर उमडती तो अवश्‍य थी , पर मुझमें इतनी योग्‍यता भी नहीं थी कि उनकी भाषा से सामंजस्‍य बनाकर इसका आधा भाग लिख सकूं और पिताजी आगे बढने को तैयार ही नहीं थे, इस कारण मैं मायूस थी।

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    पर जीवन में नित्‍य नए नए प्रयोग करते रहने के शौक ने मुझे शांत बैठने नहीं दिया और मैने ’गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ के सूत्रों को कंप्‍यूटर में डालकर उसके द्वारा किसी व्‍यक्ति के जीवन के उतार चढाव और अन्‍य प्रकार के सुख दुख से संबंधित ग्राफों को प्राप्‍त करने के लिए 2002 में कंप्‍यूटर इंस्‍टीच्‍यूट में दाखिला ले लिया। 2003 में मैने एम एस आफिस सीखने के क्रम में ही ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ के सूत्रों पर आधारित मैने पहला प्रोग्राम एम एस एक्‍सेल की शीट पर बनाया , जिसमें जन्‍मविवरण डालने के बाद कुछ मेहनत भी करनी पडती थी , पर वह हमारे सिद्धांतों के अनुरूप ही हर प्रकार के ग्राफ देने में सफल था। पर मुख्‍य मुद्दा तो उसके लिए भविष्‍यवाणियां दे पाना था , जिसके लिए एक्‍सेल ही पर्याप्‍त नहीं था।

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    जब मै एम एस वर्ड के 'मेल मर्ज' प्रोग्राम को समझने में समर्थ हुई , भृगुसंहिता तैयार करने के लिए एक शार्टकट रास्‍ता नजर आ ही गया। पिताजी के द्वारा छह लग्‍न तक के तैयार किए गए वाक्‍यों को चुन चुनकर 'मेल मर्ज' का उपयोग करके बारहों लग्‍न तक की भविष्‍यवाणियां तैयार की जा सकती थी। 

    पर भले ही यह शार्टकट था , पर इसमें भी कम मेहनत नहीं लगनी थी , क्‍यूंकि जहां भृगुसंहिता के ओरिजिनल में 1296 प्रकार के फलादेश और पिताजी के लिखे गत्‍यात्‍मक भृगुसंहिता में 2016 अनुच्‍छेद होते , वहीं मेरे द्वारा कंप्‍यूटर में तैयार होनेवाले इस गत्‍यात्‍मक भृगुसंहिता में 40,320 अनुच्‍छेद या इसे पृष्‍ठ ही कहें , क्‍यूंकि तबतक ग्रहों की अन्‍य कई प्रकार की शक्तियों की खोज की जा चुकी थी।

     पिताजी के लिखे भाग से मुख्‍य वाक्‍यों को श्रेणी बनाकर अलग करना , उसे एम एस एक्‍सेल में ग्रहों की शक्ति के आधार पर 40 तरह के शीट बनाकर 12 ग्रहों * 12 राशियों = 144 सेल तक लिखना , फिर सभी ग्रहों की 7 ग्रहों के बारे में अगले पन्‍नों पर भिन्‍न भिन्‍न बातों को लिखकर उससे उन 144 शीटों का मेल मर्ज करना आसान तो नहीं था, मुझे इसमें एक वर्ष से उपर ही लगे। पर इससे 12 * 12 * 7 * 40 = 40,320 पन्‍नों की एक भृगुसंहिता तैयार हो गयी , अपने सपने को पूरा हुआ देखकर मुझे खुशी तो बहुत हुई ,मुझे लगा की इस प्रकार मैं गत्यात्मक भृगु संहिता को ऑनलाइन एक एक तक पहुंचा सकती हूँ।

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    पर इसे पढने पर मुझे ऐसा महसूस हुआ कि इसे बनाने में मुझे थोडा समय और देना चाहिए था, लेकिन मैं आत्म विश्वास में थी कि ऐसा करना संभव है। खुद की लिखी भाषा और कंप्‍यूटर के द्वारा तैयार की जानेवाली भाषा में कुछ तो अंतर होता ही है , भविष्‍यवाणियां बहुत स्‍वाभाविक ढंग से लिखी गयी नहीं लग रही थी , पर प्रयोग के समय एक एक अनुच्‍छेद को एडिट करते हुए इसे सामान्‍य बनाना कठिन भी नहीं था। कुछ दिनों तक एडिट कर और प्रिंट निकालकर मैने इसकी भविष्‍यवाणियां लोगों को वितरित भी की , खासकर भविष्‍यवाणियों का उम्र के साथ तालमेल काफी अच्‍छा था , जो इसे लोकप्रिय बनाने के लिए काफी था। लोग ऑनलाइन इसे पढ़ सकते थे।

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    ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ के अनुसार एक्‍सेल प्रोग्राम में किसी व्‍यक्ति का जीवन ग्राफ जो भी दर्शाता था , उसे यह प्रोग्राम शब्‍दों में बखूबी अभिव्‍यक्‍त कर देता था। यह प्रोग्राम अंदर किसी फोल्‍डर में पडा था , बार बार प्रयोग के क्रम में दिक्‍कत होने से मैने डेस्‍कटाप पर ही इसका शार्टकट बना लिया था। पहली बार कंप्‍यूटर को फारमैट करने की नौबत आयी , सारे फाइलों को सीडी में राइट करके रखा गया , पर अनुभवहीनता के कारण इस प्रोग्राम को कापी करने की जगह इसकेशार्टकट को ही कापी कर लिया गया और कंप्‍यूटर फारमैट हो गया और इसके साथ ही सारी मेहनत फिर से बेकार। 

    पर 40 शीटों के एक्‍सेल के उस फाइल का सीडी में बच जाना बहुत राहत देनेवाला था, क्‍यूंकि उसके सहारे कभी भी नई गत्‍यात्‍मक भृगुसंहिता तैयार की जा सकती थी। लेकिन अधिक तैयारी करने में अधिक देर हो जाती है , पर अभी तक उसपर काम करना संभव न हो सका। अगली कडी में इस बात की चर्चा करूंगी कि गत्‍यात्‍मक भृगुसंहिता के निर्माण के लिए मेरा अगला कदम क्‍या होगा ??

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      आधी-अधूरी गत्‍यात्‍मक भृगु संहिता

       Bhrigu Samhita kundli in Hindi

      मेरे पिछले पोस्‍ट में आपलोगों ने महर्षि भृगु द्वारा उस युग के अनुरूप लिखी गयी ‘भृगुसंहिता’ ग्रंथ के बारे में जानकारी प्राप्‍त की , भविष्‍यवाणियों के लिए यह एक बहुत ही अच्‍छी पांडुलिपी रही होगी । पर इसे आधुनिक युग की जीवनशैली के सापेक्ष देखा जाए , तो उसमें बहुत सारी खूबियों के साथ ही साथ कुछ कमियां भी दिखाई पडने लगी। इसका मुख्‍य कारण यही था कि इस ग्रंथ में ग्रहों की स्थिति के आधार पर ही फलाफल की चर्चा की गयी थी , जिसकी चर्चा मैं पिछले पोस्‍ट में कर चुकी हूं । वैसे षष्‍ठ , अष्‍टम और द्वादश भाव की नयी व्‍याख्‍या करते हुए मैने एक और लेख लिखा है , जिसे अवश्‍य पढ लें , क्‍यूंकि इसे पढ लेने पर यह बात और स्‍पष्‍ट हो जाएगी कि ज्‍योतिष के प्राचीन सिद्धांतों को आज की कसौटी पर कसना क्‍यूं आवश्‍यक है। गत्यात्मक ज्योतिष यह काम बखूबी क्र रहा है। 

      Grah sthiti in kundali

      ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ के अनुसार भृगु संहिता कुंडली को पढ़ने के लिए ग्रहों की शक्ति के आकलन और खासकर ग्रह जिस राशि में स्थित हों , उसके राशिश के सापेक्षिक शक्ति के आकलन के सूत्र की खोज के बाद 1990 में ही यह स्‍पष्‍ट हो गया था कि एक ही स्थिति में होने के बावजूद सारे ग्रह कब धनात्‍मक प्रभाव दे सकते हैं और कब ऋणात्‍मक। इसलिए इस आधार पर भविष्‍यवाणी किया जाना अधिक उपयुक्‍त हो सकता है , इसे ध्‍यान में रखते हुए श्री विद्यासागर महथा जी के द्वारा एक नई गत्यात्मक भृगुसंहिता कुंडली रचने की दिशा में लेखन शुरू कर दिया गया। 1996 में जब मेरी पुस्‍तक प्रकाशित हुई, तो उसके प्रस्‍तावना में उन्‍होने बहुत जल्‍द निकट भविष्‍य में ही ‘गत्‍यात्‍मक भृगुसंहिता’ को बाजार में उपलब्‍ध कराने का पाठकों से वादा भी किया था।

      Bhrigu Samhita kundli in Hindi


      Bhrigu samhita in hindi

      चूंकि राहू और केतु के प्रभाव को ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ अभी तक स्‍पष्‍टत: नहीं समझ सका है , इसलिए इसकी चर्चा इस पुस्‍तक में नहीं की जा रही थी। पर अन्‍य सातों ग्रहों के बारह राशियों और बारह लग्‍नानुसार ग्रहों के धनात्‍मक और ऋणात्‍मक फलाफल को देखते हुए 7*12*12*2 = 2016 अनुच्‍छेद लिखकर ही इस ग्रंथ को पूरा किया जा सकता था। अपने पूरे जुनून और दृढ इच्‍छा शक्ति के बावजूद बहुत ही सटीक ढंग से वे इसे आधा (कन्‍या लग्‍न तक) यानि 1000 अनुच्‍देद ही पूरा कर सके थे कि कुछ पारिवारिक जबाबदेहियां पुन: उनका रास्‍ता रोककर खडी हो गयी । वैसे इस हालत में भी उस भृगुसंहिता का एक भाग तो प्रकाशित किया ही जा सकता था , पर उसे पूर्ण तौर पर समझने के लिए ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ के मूल नियमों को समझना आवश्‍यक था , जिसके लिए एक अन्‍य पुस्‍तक को प्रकाशित करना आवश्‍यक था , जो पहले से ही लिखी जा चुकी थी।

      Grah sthiti in kundali

      पर आश्‍चर्य की बात है कि बोकारो से भेजी गयी मुझ जैसी अनुभवहीन लेखिका की पहली पुस्‍तक ‘गत्‍यात्‍मक दशा पद्धति : ग्रहों का प्रभाव’ को पहली बार में ही एक प्रकाशक ने प्रकाशित कर दिया , पर 1975 में अपने पांच लेखों के आधार पर पूरे भारतवर्ष के ज्‍योतिषियों के मध्‍य प्रथम पुरस्‍कार जीतनेवाले और 80 के दशक में ही अपनी मौलिकता के लिए सभी वरिष्‍ठ ज्‍योतिषियों के मध्‍य चर्चित रहे श्री विद्यासागर महथा जी की पुस्‍तकों को बिना किसी शर्त के भी प्रकाशित करने में दिल्‍ली के इतने सारे प्रकाशकों में से किसी ने कोई दिलचस्‍पी नहीं ली , जबकि वे उन दिनों दिल्‍ली में ही निवास कर रहे थे। इस पुस्‍तक को प्रकाशित करने में प्रकाशकों के सामने जो समस्‍या आ रही थी , उसका उन्‍होने खुलकर जिक्र किया था , जिसकी चर्चा करना उचित नहीं ।

      Bhrigu samhita kundli in hindi

      प्रकाशकों की उपेक्षा को देखते हुए उनके कई मित्रों ने इस पुस्‍तक को स्‍वयं प्रकाशित करने की सलाह दी , पर जहां एक ओर उस पुस्‍तक को समझने के लिए ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ के सिद्धांतों को समझना आवश्‍यक था , वहीं इस नई पद्धति के लिए प्रचुर प्रचार प्रसार की भी आवश्‍यकता थी। इतनी मेहनत कर पाने में जहां एक ओर दिन ब दिन उनकी उम्र का बढोत्‍तरी और व्‍यावहारिक मामलों की कमी जबाब देता जा रहा था , वहां मैं भी अपनी पारिवारिक जिम्‍मेदारियों यानि दोनो बेटों के पालन पोषण में फंसते चले जाने से समय की कमी महसूस कर रही थी। पुस्‍तकों के प्रकाशित नहीं हो पाने के कारण उनके उत्‍साह में थोडी कमी का आना स्‍वाभाविक था , इस कारण उनके प्रशंसकों के लगातार पत्र आने और मेरे लाख अनुरोध के बावजूद भी वे उस भृगुसंहिता को आगे नहीं बढा सके और उनके हाथो से लिखी आधी-अधूरी भृगुसंहिता ही अभी तक वैसी ही स्थिति में डायरी में सुरक्षित पडी है । इससे आगे क्‍या हुआ , इसकी चर्चा पुन: अगली कडी में हो पाएगी।

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        क्‍या आपने भृगुसंहिता का नाम सुना है ?

         

        Bhrigu samhita in hindi

        भृगु संहिता फलित ज्योतिष - ज्‍योतिष में थोडी भी रूचि रखनेवालों ने भृगुसंहिता का नाम अवश्‍य सुना होगा। जैसा कि नाम से ही स्‍पष्‍ट है , यह ज्‍योतिष के क्षेत्र में महर्षि भृगु द्वारा रचित एक ऐसी कालजयी पुस्‍तक मानी जाती है , जिसमें हर काल में जन्‍म लेनेवालों का भविष्‍य लिखा हुआ है। आम लोगों की तरह मैं भी सोंचा करती थी कि जिनलोगों ने जन्‍म भी नहीं लिया है , उसके बारे में भी भविष्‍यवाणी कर पाना भला कैसे संभव है ? इस पुस्‍तक की मूल पांडुलिपि के बारे में अभी तक सही सही बता पाना मुश्किल है , पर गुरू शिष्‍य परंपरा के तहत् आज तक ढोए जा सके तथ्‍यों के आधार पर जब विभिन्‍न प्रकाशनों की भृगुसंहिताओं को पढा , तो भृगुसंहिता के मूल आधार के बारे में बात समझ में आयी। गत्यात्मक ज्योतिष प्राचीनतम विधाओं का भी नवीनतम उपयोग की बात करता है। 

        Bhrigu samhita in hindi


        Bhrigu samhita Hindi explanation

        वास्‍तव में , प्राचीन ज्‍योतिष में हमें प्रभावित करने वाले 7 आकाशीय पिंडों और दो महत्‍वपूर्ण विंदुओं ( राहू और केतु ) को मिलाकर 9 ग्रह माने गए है। इन 9 ग्रहों की 12 राशियों में स्थिति 9*12 = 108 तरह के फलादेश दे सकती है। यदि लग्‍न के आधार पर विभिन्‍न भावों को देखते हुए गणना की जाए , तो 12 लग्‍नवालों के लिए पुन: 108*12 = 1296 प्रकार के फलादेश होंगे। यदि इन फलादेशों को 1296 अनुच्‍छेदों में लिखकर रखा जाए , तो किसी भी बच्‍चे के जन्‍म के बाद उस बच्‍चे की जन्‍मकुंडली में नवों ग्रहों की स्थिति को देखते हुए भृगुसंहिता में से 9 अनुच्‍छेदो को चुनकर भविष्‍यवाणी के लिए निकाला जा सकता है।

        Gatyatmak Bhrigu samhita Hindi guide

        प्राचीन ज्‍योतिष में आकाश का 30-30 डिग्रियों में विभाजन , उनका विभिन्‍न ग्रहों को आधिपत्‍य दिया जाना और लग्‍नसापेक्ष सभी भावों को जो विभाग सौंपे गए हैं , उस आधार को ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ ने जस का तस स्‍वीकार किया है। पर जब विभिन्‍न प्रकाशनों की भृगुसंहिताओं को पढा , तो पाया कि सारे फलादेश ग्रह स्थिति के आधार पर लिखे गए हैं। यानि लगभग कोई भी ग्रह हों , लग्‍न से केन्‍द्र या त्रिकोण में हों तो उन्‍हें बलवान तथा षष्‍ठ , अष्‍टम या द्वादश भाव में हो तो उन्‍हें कमजोर मानकर फलादेश लिखा गया है ।

        Gatyatmak Bhrigu samhita Hindi notes

        पर ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ की मान्‍यता है कि जिस तरह राजमहल में दिखाई देनेवाले सभी राजा नहीं होते , न पुलिस स्‍टेशन कैम्‍पस में दिखाई देनेवाले सभी लोग अपराधी और न ही श्‍मशान में दिखाई पडनेवाला सारा शरीर लाश उसी तरह ग्रहों की स्थिति मात्र के आधार पर भविष्‍य का आकलन गलत है। भले ही अधिकांश समय ग्रह अपनी स्थिति के अनुसार ही फल देते हों , पर कभी कभी इसका उल्‍टा भी हो जाया करता है।

        लग्नकुंडली

        ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ के द्वारा ग्रहों की गत्‍यात्‍मक और स्‍थैतिक शक्ति का खुलासा होने के बाद यह स्‍पष्‍ट हो गया कि धन स्‍थान में मौजूद ग्रहों के बावजूद जातक निर्धन , भाग्‍य स्‍थान में मौजूद ग्रहों के बावजूद जातक भाग्‍यहीन , बुद्धि स्‍थान में मौजूद ग्रहों के बावजूद जातक बुद्धिहीन और अष्‍टम भाव में मौजूद ग्रहों के बावजूद जातक अच्‍छे जीवन जीनेवाला क्‍यूं हो जाता है। इस आधार पर ‘भृगुसंहिता’ के नाम के साथ कोई छेडछाड न करते हुए कुछ वर्षों से एक ‘गत्‍यात्‍मक भृगुसंहिता’ तैयार करने की दिशा में काम किया गया , जिसमें क्‍या क्‍या खूबियां थी और उसे तैयार करने में क्‍या क्‍या परेशानियां आयी , उसे पढने के लिए अगले पोस्‍ट का इंतजार करें ।

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