इस सप्‍ताहांत की ग्रह स्थिति से ... बचके रहना रे बाबा !!

मै चंद्रमा के जनसामान्‍य पर पडनेवाले प्रभाव को समझाते हुए लिख चुकी हूं कि पूर्णिमा और अमावस्‍या के दिन समुद्र में आनेवाले ज्‍वारभाटे से चंद्रमा के पृथ्‍वी पर प्रभाव की पुष्टि तो हो ही जाती है , भले ही वैज्ञानिक इसका कोई अन्‍य कारण बताएं। पर चंद्रमा के अन्‍य रूप में पडने वाले प्रभाव को भी महसूस किया जा सकता है। पूरी दुनिया की बात तो नहीं कह सकती , पर हमारे गांव में चतुदर्शी और अमावस्‍या की यात्रा को बुरा माना जाता है। हमने अपने अध्‍ययन में पाया है किसिर्फ यात्रा के लिए ही नहीं , छोटा चांद बहुत मामलों में कष्‍टदायक होता है।उस वक्‍त जो भी समस्‍या चल रही होती है , वह बढकर व्‍यक्ति के मानसिक तनाव को चरम सीमा तक पहुंचा देती है।अमावस्‍या के ठीक दूसरे या तीसरे दिन हमें काफी राहत मिल जाती है । 

यदि यह सत्‍य है कि हमारे मन का प्रतीक एक चंद्रमा ही हमारी परेशानी और खुशी को बढाने के लिए काफी होता है , तो इसके साथ यदि अन्‍य ग्रह भी हो जाए , तो स्थिति और सुखद या विकट तो हो ही सकती है। ऐसी ही सुखद या दुखद ग्रहीय स्थिति कभी सारे संसार , पूरे देश या कोई खास ग्रुप के लिए किसी जीत या मानवीय उपलब्धि की खुशी तथा प्राकृतिक विपत्ति का कारण बनती है तो कभी प्राकृतिक आपदा , मानवकृत कृत्‍य या किसी हार का गम एक साथ ही सब महसूस करते हैं ।आनेवाले 19 सितम्‍बर को 5 बजे से 9 बजे सुबहभी आकाश में ग्रहों की ऐसी ही स्थिति बन रही है , जिसका पूरी दुनिया में यत्र तत्र कुछ बुरा प्रभाव महसूस किया जा सकता है। 

इसका प्रभाव 18 सितम्‍बर और 20 सितम्‍बर को भी महसूस किया जा सकता है। सारे नहीं तो 40 से 60 प्रतिशत तक जनसंख्‍या इस बुरे योग से प्रभावित होती है। आवश्‍यक नहीं कि सब के साथ कुछ अनहोनी ही हो जाए , पर किसी के साथ कोई बडी घटना तो किसी के साथ कोई छोटी मोटी माथापच्‍ची उपस्थित हो ही सकती है। इस योग से आप सबों को अवगत कराने में मेरा उद्देश्‍य भय नहीं , जागरूकता पैदा करना है , ताकि इस दौरान आप पूरी सतर्क रहें और कोई विषम परिस्थिति उपस्थित होती भी है तो उसका मुकाबला कर सकें। मेडिकल साइंस के अनुसार शरीर के किसी भाग में चोट हो , तो टेटनस होने की संभावना 1/10,000 ही होती है , इसके बावजूद सावधानी के लिए टेटनस के टीके सबको लगाए जाते हैं। तबइस योग से 40 से 60 प्रतिशत प्रभावित हो रहे हों, तो लोगों को सावधान करना क्‍या आवश्‍यक नहीं ? 

खासकर यह समय सप्‍ताह के अंत का है , सामान्‍य तौर पर भी इस समय लोगों की आवाजाही बढ जाती है , कभी किसी खास उद्देश्‍य के लिए तो कभी मनोरंजन के ख्‍याल से भी। किसी उद्देश्‍य को लेकर आप घर से निकल रहें हों , तो उसके पूरे होने की संभावना कम रहेगी , इसलिए उसे यदि टाला जा सके , तो टाल ही दें। यदि आप मनोरंजन के ख्‍याल से निकल रहे हों , तो कई तरह की समस्‍याएं आपके मन को परेशान करने के लिए उपस्थित होती रहेगी। 

इसका अर्थ यह है कि यह समय घूमने फिरने की दृष्टि से भी उत्‍तम नहीं। इसके अलावे यह समय नवरात्र के आरंभ का भी है , इसलिए छुट्टियों में भी लोगों का जाना आना लगा रहेगा , जरूरी हो तोयात्रा अवश्‍य करें , पर इस दौरान उन्‍हें अतिरिक्‍त सावधानी बरतनी चाहिए। इस समय प्रशासन को भी मंदिरों की सुरक्षा व्‍यवस्‍था को भी चुस्‍त दुरूस्‍त बनाए रखने की जरूरत है। रेलवे या सेना को भी हर प्रकार से सतर्क रहने की आवश्‍यकता है ।


आज आपलोग मेरे दोनो बेटों से मिलिए !!

पिछले वर्ष मेरे जन्‍मदिन पर बडे बेटे ने मेरे लिए अंग्रजी में एक पोएट्री लिखी थी , जो मैने अपने ब्‍लाग पर प्रकाशित कर तो दिया था , पर बेटे से एक वादा भी करवाया था कि वह मुझे अगले वर्ष हिन्‍दी में कविता लिखकर देगा। मात्र 10 दिनों के भीतर ही जब 30 दिसम्‍बर 2008 को जब उसके जन्‍मदिन पर मैं उससे मिली , तो उसने अपना वादा निभाते हुए यह कविता ‘तेरा संग है मां तो’ मुझे भेंट किया , जो मैं आपके लिए पेश कर रही हूं।


तेरा संग है , मां , तो जीवन में रंग है ,
आंखो में ललक है ,दिल में उमंग है ।
आसमान को छूती जिंदगी मेरी पतंग है ,
क्‍यूंकि बनके डोर हर उंचाई पर , तू मेरे संग है।

तेरा संग है , मां , तो जीवन खुशहाल है,
सब कुछ सुलझा सा ,न अवशिष्‍ट सवाल है।
जीवन बिल्‍कुल सरल है , तुम्‍हारा ही कमाल है,
क्‍यूंकि तुम्‍हारी दिखाई राह पे , अविराम मेरी चाल है .

तेरा संग है , मां , तो जीवन सितार है,
खुशियों की लगी , जीवन में कतार है
तू है तो सिर्फ जीत है , ना कभी हार है,
क्‍यूंकि पास मेरे , उज्‍जवल रास्‍ते की भरमार है।

तेरा संग है , मां , तो जीवन में बहार है,
तेरा आशीष मुझपर , बहुत बडा उपकार है।
छोटा पर अनमोल , मेरा यह उपहार है,
क्‍यूंकि तेरे लिए इसमें, भरपूर प्‍यार और सत्‍कार है।

कंप्‍यूटर इंजीनियरिंग की पढाई कर रहा बडा विज्ञान में अधिक रूचि रखने के बावजूद हर विषय को गंभीरतापूर्वक पढना पसंद करता है। वह जितना ही पढाकू है , अभी स्‍कूलिंग कर रहा छोटा उतना ही शराराती , इसके बावजूद हर परीक्षा में नंबर लाने में वह बडे को पीछे छोड देता है। सामान्‍य ज्ञान को बढाने के लिए अपने भैया की संगति ही काफी है , अधिक पढने की क्‍या जरूरत ? पढाई और लंबाई को छोड दिया जाए , क्‍यूंकि दोनो छह फीट के आसपास लंबे और अपनी अपनी कक्षा में अच्‍छा स्‍थान रखते हैं , तो शक्‍ल सूरत से लेकर विचारों तक में बचपन से ही दोनो बिल्‍कुल भिन्‍न हैं। 

यहां तक कि जहां बडे के जन्‍म के बाद बधाइयों के आदान प्रदान से आनंददायक और खुशनुमा शाम लोगों को याद रहेगा , वहीं छोटे ने अपनी नाइट ड्यूटी के कर्तब्‍यों को समाप्‍त कर सोने जा रही डाक्‍टर और नर्सों के समक्ष अपने आगमन की आहट देकर जो तनावपूर्ण माहौल बनाया , उसे भी कोई भूल नहीं सकता। उसके अर्द्धरात्रि में जन्‍म होने के बाद भी सब दवा और खून के इंतजाम में रातभर भटकते रहे ,  सुबह मेरे होश में आने के बाद ही तनाव समाप्‍त हो सका।;

 बडे के सांवले सलोने रूप को देखते हुए लोग उसे 'कृष्‍ण कन्‍हैया' कहा करते , तो छोटे  के भूरे बाल और गोरा रंग सबको 'रसियन बच्‍चा' पुकारने को मजबूर करता। पालन पोषण में भी दोनो के व्‍यवहार की भिन्‍नता को मैने स्‍पष्‍ट देखा है , बिल्‍कुल बचपन से ही बडा सुबक सुबक कर और छोटा चिल्‍ला चिल्‍लाकर रोया करता था। बडा जितना ही सहनशील है , छोटा उतना ही गुस्‍सैल। बडे को सादा खाना पसंद है , तो छोटे को चटपटा । इसके अतिरिक्‍त बडा परंपरावादी और छोटा आधुनिक विचारों को पसंद करनेवाला है। 

आज की परिस्थिति को देखते हुए बडा राजनीतिक स्थिति में सुधार और लोकतंत्र की स्‍थापना के साथ देश के क्रमिक विकास की बातें करता है तो छोटे के अनुसार देश को एक देशभक्‍त तानाशाह की जरूरत है , जो दोचार वर्षों के अंदर देश की स्थिति को सुधार सकता है। एक जैसे वातावरण में पालन पोषण होने के बावजूद दोनो के विचारों की भिन्‍नता देखकर मैं तो अवाक हूं । अभी दो चार दिन पहले छोटा एक शैतानी करते हुए पकडा गया , जिसे मैं आपके सम्‍मुख रख रही हूं। 




(सीबीएसई) से मेरा प्रश्‍न

जब मेरा बडा पुत्र आठवीं पास करने के बाद नवीं कक्षा में गया , उसने हमारे सामने हिन्‍दी छोडकर संस्‍कृत पढने की अपनी इच्‍छा जाहिर की। हमारे कारण पूछने पर उसने बताया कि बोर्ड की परीक्षा में हिन्‍दी में उतने नंबर नहीं आ सकते , जितने कि संस्‍कृत में आएंगे। जहां सभी बच्‍चे संस्‍कृत के कारण परीक्षाफल में अधिक प्रतिशत ला रहे हों और सभी विद्यालयों में ग्‍यारहवी में प्रवेश के लिए बोर्ड के नंबर ही देखे जाते हों , इसलिए उसकी बात को न मानना उसकी पढाई के साथ खिलवाड करना होता। हमलोगों ने उसे हिन्‍दी छोडकर संस्‍कृत पढने की सलाह दी । दसवीं के बोर्ड में अन्‍य विषयों के साथ उसे अंग्रेजी और संस्‍कृत पढनी पडी। पुन: छोटे बेटे के लिए हमें हिन्‍दी को छोडने का ही निर्णय लेना पडा। 

ऐसा इसलिए नहीं कि हिन्‍दी रोचक विषय नहीं है , वरन् इसलिए कि हिन्‍दी में नंबर नहीं लाए जा सकते । अब भाषा तो भाषा होती है , हिन्‍दी हो या अंग्रेजी , गुजराती हो या बंगाली। सबमें कोर्स तो एक जैसे होने चाहिए , नंबर एक जैसे आने चाहिए। इस बात की ओर मेरा ध्‍यान काफी दिनों से था कि केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड को हिन्‍दी के पाठ्यक्रम में सुधार लाना चाहिए , जब बोर्ड की परीक्षाओं में संस्‍कृत में 100 में 100 लाया जा सकता है , अंग्रेजी में 100 में 100 लाया जा सकता है , तो फिर हिन्‍दी में 100 में 100 क्‍यूं नहीं लाया जा सकता ? लाया जा सकता है तो फिर अंग्रेजी या संस्‍कृत की तुलना में हिन्‍दी का परिणाम खराब क्‍यूं होता है ? पर जब यह आलेख लिख रही हूं ,दसवीं बोर्ड की परीक्षाएं ही समाप्‍त कर दी गयी हैं , इसलिए इस बात का अब कोई औचित्‍य नहीं।

वैसे अंग्रेजी से मेरी कोई दुश्‍मनी नहीं , वर्तमान समय के वैश्‍वीकरण को देखते हुए यह अवश्‍य कहा जा सकता है कि अंग्रेजी की पढाई करना या करवाना कोई अपराध नहीं , अंग्रेजी की जानकारी से हमारे सामने ज्ञान का भंडार खुला होता है , हर क्षेत्र में कैरियर में आगे बढने में सुविधा होती है । मैं मानती हूं कि हर व्‍यक्ति को समय के अनुसार ही काम करना चाहिए , सिर्फ आदर्शो पर चलकर अपना नुकसान करने से कोई फायदा नहीं । पर जब हम खुद इतने मजबूत हो चुके हों कि दूसरी भाषा पर आश्रिति समाप्‍त हो जाए तो हमें अपनी भाषा की उन्‍नति के लिए काम करना ही चाहिए , सिर्फ हिन्‍दी दिवस मना लेने से कुछ भी नहीं होनेवाला। 

पर इस दिशा में आनेवाली पीढी को सही ढंग से तैयार न कर पाने में मुझे केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई)का भी कम दोष दिखाई नहीं देता। हिन्‍दुस्‍तान की अपनी भाषा हिन्‍दी को भी 12वीं कक्षा तक अनिवार्य विषय के रूप में न पढाया जाना मुझे तो सही नहीं लगता है। आज के सभी बच्‍चे 12वीं कक्षा तक विज्ञान , कला या कामर्स विषय के साथ अंग्रेजी की पढाई तो करते हैं , पर यदि अधिक रूचि न हो तो अपनी मातृभाषा को वह सिर्फ आठवीं तक या अधिकतम दसवीं तक ही पढ पाते हैं । आज हिन्‍दी दिवस के मौके पर केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) से मेरा प्रश्‍न यही है कि क्‍या हिन्‍दी उनकी उपेक्षा का शिकार नहीं हो रही ? क्‍या हिन्‍दीभाषी प्रदेशों के बच्‍चों को 12वीं तक हिन्‍दी के एक अनिवार्य पेपर नहीं होने चाहिए ? क्‍या अन्‍य भाषाओं के विद्यार्थियों को भी अपनी मातृभाषा के अलावे हिन्‍दी नहीं पढाया जाना चाहिए ?


क्‍या आपपर भी ट्रिपल नाइन के संयोग का कुछ प्रभाव पडेगा ??


कई दिन पूर्व राजकुमार ग्‍वालानी जी के एक पोस्‍टपर नजर गयी थी जिसमें लिखा गया था “ सितंबर का माह भी 
एक अनोखी सौगात लेकर आया है। इस माह में ट्रिपल नाइन का संयोग पडऩे वाला है। वैसे देखा जाए तो आप एक नहीं बल्कि दो-दो ट्रिपल नाइन का मजा ले सकते हैं।“ मैने उसे पढा भी और अपनी टिप्‍पणी भी दर्ज कर दी थी “अंको के अनोखे संयोग हो रहे हैं इस वर्ष !! ” उसमें इस योग का ज्‍योतिष के हिसाब से भी चर्चा की गयी थी “इस श्रेष्ठ दिन के कारण ही पितृ पक्ष होने के बाद भी 9 सितंबर को खरीददारी के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। 

वैसे पितृ पक्ष में खरीददारी नहीं की जाती है, पर इस बार ट्रिपल नाइन से इस पक्ष में भी सराफा बाजार में रौनक की रहने खबरें आ रही हैं।” मेरी अपनी जानकारी के अनुसार ज्‍योतिष के हिसाब से तो इसका कोई प्रभाव नहीं पडना चाहिए , पर पूरे पितृपक्ष के शोक के पंद्रह दिनों में से कोई ज्‍योतिषी एक दिन को शुभ ही बता रहा हो , तो इस खुशी से जनता को क्‍यूं वंचित किया जाए , यह सोंचकर मैने उसपर कोई टिप्‍पणी नहीं की। 


पर कल के इस योग की भयावहता को लेकर भी समाचार पत्रों में कुछ चर्चा की गयी है , जिससे लोगों में इस योग के ज्‍योतिषीय प्रभाव को लेकर जिज्ञासा बन गयी है , इस कारण इस पोस्‍ट को लिखने की आवश्‍यकता पड गयी है। जहां तक पहले ट्रिपल नाइन का सवाल है , यह कोई योग ही नहीं , क्‍यूंकि हर तेरह महीने से एक दिन पश्‍चात् किसी न किसी रूप में यह योग आता है। पिछले वर्ष 08-08-08 , उससे पहले 07-07-07 और उससे पहले 06-06-06 , इसलिए इस पहले ट्रिपल नाइन का बनना कोई अहमियत नहीं रखता। 

अब यदि दूसरे ट्रिपल 9 यानि 09-09-09 के योगफल से जो 27 बनते हैं उनके योग को देखते हुए 9 का बनना , वह अंक ज्‍योतिषियो के लिए महतवपूर्ण हो सकते थे , पर यह तिथि वास्‍तव में 09-09-2009 है , जिसका योगफल 29 यानि 11 यानि 2 होते हैं , इसलिए उनके लिए भी यह योग महत्‍वपूर्ण नहीं। यानि जो दूसरा 9 बनाया गया है , वह एक प्रकार से जबरदस्‍ती योग पैदा कर देना है। इस प्रकार दोनो योगों के आधार पर किसी प्रकार की भविष्‍यवाणी उचित नहीं । 


जहां तक ज्‍योतिषीय भविष्‍यवाणी की बात है , वह आसमान में ग्रहों की खास स्थिति के ही पृथ्‍वी पर खास प्रभाव की चर्चा करता है। हिन्‍दी के पंचांग के अनुसार किसी तिथि से दो ग्रहों सूरज और चंद्र की स्थिति का पता चलता है , इसलिए उसके आधार पर आंशिक ही सही , कोई भविष्‍यवाणी उचित हो भी सकती है , जैसे शिवरात्रि के दिन बारिश , आंधी , पानी , तूफान का आना या अन्‍य त्‍यौहारों के दिन किसी खास प्रकार के माहौल का उपस्थित होना हमेशा तो नहीं , पर काफी मामलों में सही माना जा सकता है , पर अंग्रेजी कैलेण्‍डर के अनुसार किसी तिथि से पृथ्‍वी की अपने परिभ्रमण पथ पर खास जगह पर स्थिति का ही बोध होता है , आसमान के किसी ग्रह की स्थिति का नहीं । इसलिए अंग्रेजी कैलेण्‍डर के अनुसार दो तीन अंको के संयोग को किसी प्रकार का योग बना देना और इस आधार पर किसी प्रकार की भविष्‍यवाणी का कोई औचित्‍य नहीं।

हमारे हाथों में रह ही जाता है !!


पिछली पोस्‍ट पर मिली टिप्‍पणियों को देखते हुए महसूस हुआ कि अभी भी भृगुसंहिता से संबंधित संदर्भों में आगे बढने के लिए कुछ बातें स्‍पष्‍ट करना आवश्‍यक है। सबसे पहले सिद्धार्थ जोशी जी की टिप्‍पणी पर गौर करें .... 
अच्‍छा लॉजिक है लेकिन इसमें कुछ कमी दिखाई देती है। पहली तो यही कि पेड़ पौधे गति नहीं कर सकते। और मनुष्‍य कर्म करके प्रकृति की उन बाधाओं को पार पा जाता है जिन्‍हें खुले में पेड़ पौधों को अपनी जड़ अवस्‍था में ही सहना पड़ता है। 

ऐसे में किसी का भाग्‍य कर्म से कितना प्रभावित होता है

और कर्म भाग्‍य से कितना प्रभावित होता है

दोनों गणनाएं करना क्‍या टेढी खीर नहीं है। हो सकता है दस पेड़ों में से हरेक का भाग्‍य स्‍पष्‍ट बताया जा सके लेकिन दस बच्‍चों का भाग्‍य कैसे बताएंगे। और हाल में पैदा हुए फराह खान के तीन बच्‍चों का ? :) 

‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ मानता है कि पेड पौधे गति नहीं कर सकते और मनुष्‍य गति कर सकता है , यह इन दोनो का स्‍वभाव है , अपने जड से सारी शक्ति लेते हुए अचल रहकर भी पेड विकास का क्रम बनाए होता है , जिसे प्राप्‍त करने के लिए मनुष्‍य को चलना फिरना आवश्‍यक है। इसके साथ ही प्रकृति ने इसी हिसाब से सहनशक्ति की भिन्‍नता भी तो विभिन्‍न जीवों को प्रदान की है। वहां पर मनुष्‍य को सारे जीवों से अलग माना जा सकता है । पर मैने पहले ही लिखा कि इस दृष्टि से एक समान होते हुए भी सारे मनुष्‍य अलग अलग प्रकार के बीज हैं और तद्नुसार ही जीवन में अलग अलग गुणों और विशेषताओं के साथ सफलता या असफलता प्राप्‍त करते हैं।

अब सवाल है दस पेड़ों में से हरेक का भाग्‍य स्‍पष्‍ट बताने में सरलता की , जबकि दस बच्‍चों का भाग्‍य बताने में कठिनता की , वह दिक्‍कत इसलिए आती है , क्‍यूंकि बीजों की भविष्‍यवाणी करते समय एक किसान सिर्फ उसके गुणात्‍मक पहलू और प्रतिफलन कालको बतलाने की कोशिश करते हैं , जबकि बच्‍चे के भविष्‍य को बतलाने में हम ज्‍योतिषी परिमाणात्‍मक स्‍तर तकपहुंच जाते हैं। यदि किसान अपने को विद्वान समझते हुए बीजों को देखकर भी परिमाणात्‍मक (कितना) की चर्चा करने लग जाएं , तो उस भविष्‍यवाणी में भूल होना निश्चित है , क्‍यूंकि विकास को निश्चित बतलाने में सिर्फ बीज ही नहीं उसका देख रेख भी मायने रखता है। 

एक बीज की तरह ही ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ बच्‍चे के गुणात्‍मक पहलू और उसके प्रतिफलन कालकी ही भविष्‍यवाणी करना उचित मानता है। फराह खान के तीनो बच्‍चों ने यदि एक ही लग्‍न में जन्‍म लिया होगा , तो उनमें एक जैसी प्रवृत्ति दिखाई पडेंगी , पर यदि उन्‍होने अलग अलग लग्‍न में जन्‍म लिया हो , तो अलग अलग होनी निश्चित है , पर लक्ष्‍य के बारे में आप पक्‍का दावा नहीं कर सकते , यह व्‍यक्ति के अपने हाथ में भी हो सकता है।

इसी संदर्भ में एक दूसरी टिप्‍पणी स्‍वदेश जैन जी की मेरे ईमेल तक पहुंची है ....
आपने लिखा कि "इसी प्रकार कर्म करने से हमारी भविष्‍यवाणियों के सटीक होने की संभावना बलवती होती जाती है।" इसका मतलब यह क्यों ना मान लिया जाय कि जो कर्म हम कर है वह भी पूर्वनिर्धारित ही हुए ना, यदि यह सोच सही है तब पाप करना या पुण्य अर्जित करना अपने हाथ मे नही है ना।
आपके उत्तर का इन्‍तजार रहेगा कृपया मार्गदर्शन कीजिये !

जब किसी बच्‍चे के जन्‍म के समय के ग्रहों के आधार पर बननेवाली जन्‍मकुंडली के आधार पर हमलोग बच्‍चे की जीवनभर के शारीरिक , मानसिक और अन्‍य प्रकार के सुखों , दुखों की सटीक चर्चा करने का दावा कर रहे हैं , तो यह तो निश्चित है कि मनुष्‍य की प्रकृति , सोंच , पवृत्तियां और उसकी व्‍यक्तिगत परिस्थितियां पूर्वनिर्धारित मानी जा सकती है , पर कर्म करने से पहले वह अपने आसपास की दुनिया यानि सामाजिक , राष्‍ट्रीय और अंतर्राष्‍ट्रीय माहौल से प्रभावित होता है। यानि माहौल अच्‍छा मिले तो वे बुरी प्रवृत्तियां समाप्‍त होने की और अच्‍छी प्रवृत्तियां विकसित होने की संभावना रहती है , जबकि माहौल गडबड हो तो इसके विपरीत होता है। इसलिए बहुत कुछ निश्चित होने के बाद भी बहुत कुछ और तो हमारे हाथों में रह ही जाता है।