औरतों पर ही नहीं , हमने तो मर्द पर भी भूत आते देखा है ??

भूत कहां रहते हैं


लगातार कई पोस्‍टों में भूत प्रेत की चर्चा सुनकर मुझे भी एक घटना याद आ गयी , जो मैं आपलोगों को सुना ही दूं। 1975 के आसपास की बात है , घर के बगल के सब्‍जी के खेत में मेरे पापाजी कई मजदूरों से काम करवा रहे थे। मुहल्‍ले के ही सारे मजदूर थे , इसलिए वे खाना खाने अपने अपने घर चले जाते थे। ठीक 1 बजे उनको खाने की छुट्टी देकर पापाजी भी खाना खाने घर आए। खेत की सब्जियां जानवर न खा लें, यह सोंचकर मेरे पापाजी को घर में देखकर थोडी ही देर में दादी जी उस खेत का दरवाजा बंद कर आ गयी। 

अभी पापाजी खाना खा ही रहे थे कि घर के किसी बच्‍चे ने देखा कि एक मजदूर उसी बगीचे के पुआल के ढेर पर बंदर की तरह उपर चढता जा रहा है। उसके हल्‍ला मचाने के बावजूद वह उपर चढता गया और उपर चढकर डांस करने लगा। हमलोग सारे बच्‍चे जमा होकर तमाशा देखने लगे। हमलोगों का हल्‍ला सुनकर पापाजी खाना छोडकर आंगन मे आए। उससे डांटकर उतरने को कहा तो वह उतरकर आम के पेड पर बिल्‍कुल पतली टहनी पर चढ गया। आंय बांय क्‍या क्‍या बकने लगा। कभी इस पेड पर तो कभी उसपर , फिर पापाजी के डांटने पर उतरकर बगीचे के दीवार पर दौडने लगा।

उसकी शरारतें देखकर सबका डर से बुरा हाल था , पता नहीं , सांप बिच्‍छू ने काट लिया या भूत प्रेत का चक्‍कर है या फिर इसका दिमाग किसी और वजह से खराब हो गया है। अभी कुछ ही दिन पहले एक मजदूर हमारा काम करते हुए पेड से गिर पडा था , एक्‍सरे में उसकी हाथ की हड्डियां टूटी दिखी थी और हमारे यहां से उसका इलाज किया ही जा रहा था और ये दूसरी मुसीबत आ गयी थी। मेरी दादी जी परेशान ईश्‍वर से प्रार्थना कर रही थी कि हमारे घर में ही सारे मजदूरों को क्‍या हो जाता है , उनकी रक्षा करें और वह बेहूदी हरकतें करता जा रहा था।


bhut kahan rahte hain

10 - 15 मिनट तक डांट का कोई असर न होते देख मेरे पापाजी ने उसे प्‍यार से बुलाया। थोडी देर में वह सामने आया। पापाजी प्‍यार से उससे पूछने लगे कि तुम्‍हें क्‍या हुआ , किसी कीडे मकोडे ने काटा या कुछ और बात हुई। उसने शांत होकर कहा ‘पता नहीं मुझे क्‍या हो गया है , चाची से पूछिए न , मैने बगीचे के कितने बैगन भी तोड डाले’ , पापाजी चौंके ‘चाची से पूछिए न , बगीचे के बैगन’ , हमलोगों को बगीचे में भेजा , सचमुच बहुत से बैगन टूटे पडे थे। पापाजी को राज समझ में आ गया , उसे बैठाकर पानी पिलाया , खाना खिलाया और उसे दिनभर की छुट्टी दे दी और उसकी पत्‍नी को बुलाकर उसके साथ आराम करने को घर भेज दिया। पापाजी ने दादी जी से बैगन के बारे में पूछा तो उन्‍होने बताया कि उन्‍हे कुछ भी नहीं मालूम।

दरअसल मजदूरों को जब छुट्टी दी गयी थी , तो सारे चले गए , पर इसकी नजर बगीचे के बैगन पर थी , इसलिए यह उसी बगीचे के कुएं पर पानी पीने के बहाने रूक गया। घर ले जाने के लिए वह बैगन तोडने लगा , उसी समय दादी जी दरवाजा बंद करने गयी । उन्‍हें मोतियाबिंद के कारण धुंधला दिखाई देता था , वो मजदूर को नहीं देख पायीं , पर मजदूर ने सोंचा कि दादी जी ने बैगन तोडते उसे देख लिया है , इसलिए उसने चोरी के इल्‍जाम से बचने के लिए नाटक करना शुरू किया। माजरा समझ में आने पर हमारा तो हंसते हंसते बुरा हाल था। सचमुच यही बात थी , क्‍यूंकि दूसरे दिन वह बिल्‍कुल सामान्‍य तौर पर मजदूरी करने आ गया था।


भूतों
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परंपरागत ज्ञान-विज्ञान के अनुसार शरीर में जीव तत्‍व की उपस्थिति

परंपरागत ज्ञान-विज्ञान पुराने युग के जीवन पद्धति के अनुकूल था, इसलिए आज की जीवनपद्धति के अनुसार देखा जाए , तो इसमें कुछ कमियां अवश्‍य दिखाई पडती हैं, पर इसके बावजूद यह मुझे बहुत आकर्षित करता है और शायद यही कारण है कि न सिर्फ इसकी वैज्ञानिक व्‍याख्‍या सुननी ही मुझे अच्‍छी लगती है , मैं स्‍वयं छोटी मोटी हर परंपरा तक की वैज्ञानिक व्‍याख्‍या में दिलचस्‍पी रखती हूं।

 2004 में राष्‍ट्रीय भौतिक प्रयोगशाला , दिल्‍ली में परंपरागत ज्ञान विज्ञान के एक सेमिनार में इस प्रकार के कई शोध प्रस्‍तुत किए गए थे , जिसमें से रानी दुर्गावती विश्‍व विद्यालय , जबलपुर के पूर्व कुलपति डा सुरेश्‍वर शर्मा द्वारा प्रस्‍तुत किए गए एक शोघपत्र ने मुझे आश्‍चर्यित कर दिया था , जो आपलोगों के लिए प्रस्‍तुत कर रही हूं .... 

महामहोपाध्‍याय पं गिरिधर शर्मा चतुर्वेदी ने अपने ग्रंथ ‘वैदिक विज्ञान और भारतीय संस्‍कृति’ में एक प्राचीन श्‍लोक का उद्धरण दिया है , जिसमें जीव तत्‍व की उपस्थिति के आकार को बताया है ... 


बालाग्र शतभागस्‍य शतधा कल्पितस्‍य च । 
तस्‍य भागस्‍य भागम् ऐषा जीवस्‍थ कल्‍पना ।। 


एक जीवन से दूसरे जीवन की निरंतरता विज्ञान की भाषा में जीवन तत्‍व अथवा ‘जीन’ के नाम से और उसके द्वारा जानी जाती है। इसके आकार माप का जो वर्णन इस श्‍लोक में बताया गया है , वह अद्भुत और आश्‍चर्यजनक रूप से ठीक वही है , जो आधुनिक विज्ञान ने जीन अथवा आनुवंशिकी कारक अर्थात डी एन ए के अणु को मापा है। यह माप 10 नैनो मीटर है। मनुष्‍य के बाल की मोटाई 100 माइक्रोमीटर या एक मि मी के दसवें भाग के बराबर मापी गयी है। 

एक नैनोमीटर एक मि मी का सौ करोडवां भाग है। माइक्रोमीटर एक मीटर का दस लाखवां भाग है और मि मी का हजारवां भाग। इस प्रकार दस नैनोमीटर बाल की मोटाई का दस करोडवां भाग हुआ। प्राचीन और आधुनिक विज्ञानियों के सूक्ष्‍म मापन में अद्भुत समानता आ‍श्‍चर्यित करती है। यह अपने आपमें प्रमाण है कि सामान्‍य नेत्रों से देखकर इतनी सूक्ष्‍म माप संभव नहीं है। अत: उस समय उन्‍नत सूक्ष्‍मदर्शी यंत्र या उससे मिलती जुलती कुछ उपकरण व्‍यवस्‍था अवश्‍य होगी , जिसकी खोज की जानी चाहिए। 

उसी प्रकार पं चतुर्वेदी ने मनुष्‍य के संतानोत्‍पादन करनेवाले गुणों को धारण करनेवाले तत्‍व को ‘सह:’ का नाम दिया है , जो इस बात को स्‍पष्‍ट करता है कि ये ‘सह:’ यानि साथ साथ चलते हैं। अर्थात् अनेक एक साथ रहते हैं , जिनकी संख्‍या 84 है। 'सह:' को आधुनिक भाषा में हम सेट भी कह सकते हैं। गुणसूत्र तो 23 जोडे होते हैं , परंतु उसमें जीन सेट अर्थात् लिंक्ड जीन सेट्स के समूह होते हैं। वे ही एक पीढी से दूसरी पीढी में अदल बदल कर स्‍थानांतरित होते हैं। जीन सेट ट्रांसमिशन की निश्चित संख्‍या का ज्ञान अभी ह्यूमन जीनोम प्रोजेक्‍ट की शोध परियोजनाओं का विषय है। 

इन 84 'सह:' के संयोग और पीढी स्‍थानांतरण में इनकी निश्चित संख्‍या भी हैरान करनेवाली है क्‍यूंकि अभी इस स्‍तर पर हमारा आधुनिक अनुवांशिकी‍ विज्ञान भी नहीं पहुंच सका है। 84 में से 56 'सह:' यानि जीन सेट अनुवांशिक होते हैं , 84 में से 28 'सह:' या जीन सेट उपार्जित होते हैं , 56 में से 21 'सह:' माता + पिता के मिलते हैं , 15 'सह:' दादा + दादी के‍ मिलते हैं , 10 'सह:' पडदादी + पढदादा के मिलते हैं , 6 'सह:' प्रपडदादी + प्रपडदादा के मिलते हैं , 3 'सह:' पूर्व प्रपडदादी + पूर्व प्रपडदादा के होते हैं और 1 'सह:' पूर्व छठी पीढी के। वंशावली तालिका बनाकर इन महत्‍वपूर्ण वैज्ञानिक ज्ञान का सत्‍यापन कर ह्यूमन जीनोम प्रोजेक्‍ट के शोधकर्ता इस प्राचीन ज्ञान को वैज्ञानिक ढंग से लोगों के सामने रख सकते हैं।

जब आपको आउट ऑफ़ सिलेबस प्रश्नपत्र मिले ----

Questions out of syllabus 



1 ) इतिहास में 1632 से 1653 के दौरान बनी भव्‍य इमारत ताज महल के बारे में पढने को मिलता है, विज्ञान के विकास के बिना उस युग में इतनी बडी इमारत के बनने का विश्‍वास नहीं होता , आखिर राजस्‍थान से आगरे तक इतना संगमरमर ढोया और इतनी उंचाई पर पहुचाया कैसे गया , हमारे समक्ष इसका कोई जबाब नहीं , पर हमें इसमें विश्‍वास है , क्‍यूंकि आगरे में ताजमहल खडा है ।

2 ) इतिहास में अजंता और एलौरा की गुफा के बारे में भी पढने को मिलता है , इस कला पर विश्‍वास तो किया ही जा सकता है , फिर भी एक प्रश्‍न तो उठता ही है , आखिर गुफा के अंदर रोशनी का प्रबंध कैसे किया गया था , हमारे सामने कोई जबाब नहीं , पर हमें इसमें विश्‍वास है , क्‍यूंकि अजंता और एलौरा की कलाकृतियां इसकी गवाह बनकर खडी हैं

3 ) इतिहास में खगोल शास्‍त्र के बारे में भी इतना कुछ पढने को मिलता है , जब आकाश दर्शन के लिए प्राचीन खगोल वैज्ञानिकों के पास मात्र बांस के खोखे थे , इतने रिसर्च हुए कैसे , हमारे पास कोई जबाब नहीं , पर हमें इसमें विश्‍वास है , क्‍यूंकि उन प्राचीन सूत्रों से आसमान की हर स्थिति की सटीक गणना के हो जा रही है।

4 ) इतिहास में रामचंद्र जी और कृष्‍ण जी के जीवन में घटी घटनाओं के बारे में भी पढने को मिलता है , पर उन घटनाओं का कोई प्रमाण नहीं मिला , इसलिए हम इसे साहित्‍य कहते हैं । 

5 ) इतिहास में ज्‍योतिष की अच्‍छी खासी चर्चा है , पर उसका प्रभाव महसूस करने की चीज है , यह दिखाई नहीं देती , इसलिए इसे हम अंधविश्‍वास कहते है ।

उपरोक्‍त बातें प्रमाणित करती हैं कि हम तर्क नहीं करते , आंखो देखे पर विश्‍वास करते हैं , जबकि ईश्‍वर ने अन्‍य पशुओं की तरह हमें सिर्फ आंख ही नहीं दिए , हमें महसूस करने के लिए दिमाग और दिल भी दिए हैं , मेरे विचार से हमें उनका भी उपयोग करना चाहिए।

अब एक कहानी भी सुन लें 

किसी गांव में एक भी स्‍कूल नहीं , पर एक बच्‍चे को पढने का बहुत शौक था। अपने अध्‍ययन के लिए वह शहर में रहनेवाले अपने चाचाजी के पुत्र की पुरानी पुस्‍तके मंगवा लिया करता था और दिन रात अध्‍ययन में जुटा रहता। वैसे उसे कोई डिग्री तो नहीं मिल सकी थी , पर अपनी मेहनत के बल पर नवीं कक्षा तक की पूरी जानकारी हासिल कर रखी थी। इस कारण उस बच्‍चे से सबको बडी आशा थी। पर शहर से आए एक व्‍यक्ति , जिसका अपना बच्‍चा पढाई नहीं कर पा रहा था , को उस बच्‍चे से जलन हो गयी। उसने अपनी प्रशंसा के लिए उस बच्‍चे की परीक्षा लेने और उसमें पास करने पर बच्‍चे को आगे पढाने की बात करते हुए पूरे गांववालों को निश्चित स्‍थान पर जमा होने को कहा। 

सारे गांववाले बडे खुश थे कि अब बच्‍चे को पढाई का सही माहौल मिलेगा , पर आयोजक की मंशा तो बच्‍चे के मनोबल को कम करने की थी , इसलिए उसने प्रश्‍न पत्र में स्‍नातक स्‍तर के सारे प्रश्‍न डाल दिए , आयोजक की मंशा पूरी हुई , बच्‍च फेल कर गया और गांववाले निराश , पर बच्‍चे का मनोबल कम नहीं हुआ , उसने उस प्रश्‍न पत्र को हिफाजत से रखा , ताकि अपने अध्‍ययन के उपरांत कभी उसका भी हल निकाल सके। वैसे सफलता असफलता तो ईश्‍वर के हाथों में है , पर सफलता का सपना देखना तो अपने हाथ में ,क्‍यूं न देखा जाए ? ( questions were out of syllabus )

अब चलते चलते एक बात और सुन लें। ... 


जब एक गुरू के द्वारा अपने किसी शिष्‍य की परीक्षा ली जाती है , तो शिष्‍य को सिलेबस के अंदर के ही प्रश्‍नो के जबाब देने पडते हैं , जो एक शिष्‍य के लिए बहुत आसान होता है और यदि एक गुरू के द्वारा दूसरे गुरू के शिष्‍य की परीक्षा ली जाती है तो उसके प्रश्‍नपत्र में आधे प्रश्‍न आउट आफ सिलेबस हो सकते हैं , जो शिष्‍य के लिए कुछ कठिन तो हो जाता है , लेकिन जो गुरू ही नहीं , वो परीक्षा लेना शुरू कर दे , तो बडी खतरनाक स्थिति पैदा होती है , शिष्‍य के प्रश्‍न पत्र के सारे प्रश्‍न आउट आफ सिलेबस हो सकते हैं !!


चिट्ठे का नाम पैथोलोजिकल बायो रिदम में एडवांस स्‍टडीज


मेरे प्रोफाइल को विजिट करनेवाले अक्‍सर मुझे ईमेल भेजा करते हैं ... 

“ आपका प्रोफाइल देखा , पर आप तो ज्‍योतिष जैसे विषय पर लिखती हैं , जिसमें मेरी रूचि नहीं और उसके बारे में मुझे कोई जानकारी भी नहीं , इसलिए आपका ब्‍लाग नहीं पढ पाता हूं। “ 

जो भी मुझे इस प्रकार के ईमेल भेजा करते हैं , उनसे मेरा अनुरोध रहता है कि वे मेरा ब्‍लाग अवश्‍य पढें , मेरे ब्‍लाग पर ज्‍योतिष की तो कोई चर्चा ही नहीं होती , आसमान में मौजूद ग्रहों की वर्तमान स्थिति के आधार पर सामयिक प्रश्‍नों के तिथियुक्‍त जबाब भी होते हैं , इसके माध्‍यम से समाज से धार्मिक और ज्‍योतिषीय भ्रांतियों का दूर करने की दिशा में भी प्रयास जारी है , इसके साथ ही मेरी अपनी और ब्‍लाग जगत से जुडी बातें भी मैं इसी चिट्ठे में करती हूं। 

इसलिए कुल मिलाकर मेरे ब्‍लाग में ऐसा कुछ भी नहीं , जो आपकी समझ में इसलिए नहीं आए कि आप ज्‍योतिष के बारे में कुछ नहीं जानते। इतना कहने के बाद भी बहुत लोग चिट्ठे का 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' नाम देखकर ही मेरे चिट्ठे को ज्‍योतिषीय चिट्ठा समझकर नहीं पढते हैं , तो अनजान पाठकों की बात करने की आवश्‍यकता ही नहीं । इसलिए कुछ दिनों से मेरे दिमाग में अपने चिट्ठा का नाम बदले देने की बात चल रही थी । 

 मैने चंद्रमा के घटने बढने यानि पूर्णिमा और अमावस्‍या के जनसामान्‍य पर पडनेवाले प्रभाव की चर्चा करते हुए एक आलेख लिखा था। उसमें निशांत मिश्रा की निम्‍न टिप्‍पणी आयी थी ...... “क्या आप इसे microbiological, pathological, और pharmacological सन्दर्भों में नहीं देखतीं? इन विषयों के परिप्रेक्ष्य में देखने से यह स्पष्ट हो जाता है कि तबीयत खराब होने, निदान न हो पाने, बाद में निदान हो जाने, और फिर तबीयत ठीक हो जाने को जैवरासायनिकी द्वारा बेहतर समझाया जा सकता है.”

इसके कुछ दिनों बाद ही 4 सितम्‍बर को मैने भावना पांडेय जी का एक आलेख पढकर उसे बृहस्‍पति के 12–12 वर्षों में एक जैसी स्थिति को जोडने का प्रयास किया , तो डा अरविंद मिश्रा की निम्‍न टिप्‍पणी मिली ... ” मनुष्य में एक जैवीय घड़ी होती है -यह कुदरत से संतुलन बना के चलती है -अब जैसे ज्वार भाटा चंद्रमा की गतियों से प्रभावित है -मनुष्य की लय ताल /बारंबारता की घटनाओं में मासिक चक्र आदि हैं -कुछ असामान्य स्थतियों में जब जैवीय घडी बिगड़ती है तो कुछ रोग बारंबारता लिए हो जाते हैं -आप पैथोलोजिकल बायो रिदम से गूगलिंग करें -परिणाम सभी को बताएं -कृपा कर अध्यन का दायरा बढायें -आप इन्टरनेट युग में जी रही हैं !”

इन दोनो टिप्‍पणियों से अर्थ यह निकलता है कि ब्रह्मांड में घटनेवाली हर घटना का संबंध एक दूसरे से होता है , जो बायो रिदम का कारण है। आकाशीय पिंडों की गति के अनुसार धरती पर घटनाओं का संबंध होता है , इसे विज्ञान भी मानता है। पर ज्‍योतिष को मानने में वैज्ञानिकों को मुश्किल हो जाती है और जिसे वैज्ञानिक न माने , उसे आम जनों को मानने में तो दिक्‍कत होगी ही। अब जहां ज्‍योतिष के प्रति ये मानसिकता हो , वहां मेरे चिट्ठे को पढनेवालों की संख्‍या कम होनी ही है। 

इसलिए मेरे मन में अपने चिट्ठे के नाम को परिवर्तित कर देने के विचार बार बार आ रहे हैं। आप पाठको से मेरा प्रश्‍न है कि क्‍या इस चिट्ठे का नामकरण planet’s effect on microbiological, pathological, pharmacologica या पैथोलोजिकल बायो रिदम में एडवांस स्‍टडीज कर दिया जाए ?


ये जादू भी न .. कम मजेदार कला नहीं


 पाठकों को मैं बताना चाहूंगी कि अपने जीवन में कुछ दिनों तक जादू दिखाने का भी चस्‍का रहा मुझे। अपने जादू दिखाने की लिस्‍ट में से सबसे आसान और सबसे कठिन जादू के ट्रिक आपके लिए पेश कर रही हूं। आप भी ऐसी जादू कर सकते हैं। 

सबसे आसान जादू को दिखाने से पहले तैयारी के लिए आपको अपने रूमाल के किनारे मोडे गए हिस्‍से में सावधानीपूर्वक एक माचिस की तिली डालकर छोड देनी है। जहां दो चार दोस्‍त जमा हों , वहां आप जादू दिखाने के लिए अपने उसी रूमाल को बिछा दें। अपने किसी दोस्‍त को उस स्‍माल में एक माचिस की तिली रखने को कहें। अब माचिस को कई तह मोडते वक्‍त आप ध्‍यान देते हुए उस तिली को छुपाकर और अपनी रूमाल के किनारे छिपायी तिली को सामने रखें। अपने दोस्‍त को अपने तिली को तोडने को कहे , इसके दो नहीं , चार छह टुकडे करवा लें । जब दोस्‍त को तसल्‍ली हो जाए कि तिली अच्‍छी तरह टूट चुकी है , तब आप रूमाल को झाड दें , साबुत तिली आपके सामने होगी। आपकी जादूगिरी देखकर दोस्‍त प्रभावित हुए बिना नहीं रहेंगे। 

हाल फिलहाल तो विज्ञान के प्रवेश से जादू के क्षेत्र में भी बहुत अधिक विकास हुआ है , पर पारंपरिक जादू में सबसे बडा जादू बच्‍चे के सर काटकर उसे जोडने का दिखाया जाता था। उसमें हाथ की अधिक सफाई की जरूरत होती थी। चादर को झाडकर बच्‍चे को सर से पांव तक ढंकते वक्‍त एक गोल तकिया और तरल लाल रंग का पैकेट अंदर भेज देना पडता था , उसके बाद बाहर के व्‍यक्ति के कहे अनुसार लडके का हर क्रिया कलाप होता था और जिस समय सर धड से अलग करने का समय होता , उससे पहले वह अपने शरीर को सिकोडकर छोटा कर लेता और सर के जगह गोल तकिया रखकर रंग के पैकेट को खोल देता । जब लोगों के अनुरोध पर उसके सर जोडने की बात होती है, वह तकिए और पैकेट को चादर में छुपाते हुए उठ खडा होता था।

जादूगर को जादू दिखाते देख हमें अचरज इसलिए होता है , क्‍यूंकि हम नहीं जानते कि उसने किस ट्रिक का इस्‍तेमाल किया है। प्राचीन काल में जब प्रकृति के निकट रहनेवाले युग में खाने पीने और रहने के अलावे न तो खर्च था और न ही महत्‍वाकांक्षा , तो यह बात मानी नहीं जा सकती कि जादूगरों ने पैसे कमाने के लालच में जनता को उनके द्वारा की जानेवाली हाथ की सफाई की जानकारी नहीं दी हो । बडा कारण यही माना जा सकता है कि यदि वे लोगों को अपने ट्रिक की जानकारी दे देतें , तो इससे लोगों के मनोरंजन का यह साधन समाप्‍त हो जाता । और जब इस कला का कोई महत्‍व ही नहीं रह जाएगा , तो फिर इसका दिनोदिन विकास भी संभव नहीं था । यही सब कारण था कि जादू की तरह ही हर कला की पीढी दर पीढी संबंधित परिवार में ही सुरक्षित रहने की परंपरा बन गयी।

वास्‍तव में , लोगों ने जब समाज बनाकर रहना शुरू किया तो पाया कि किसी एक वर्ग द्वारा उपजाए जानेवाले अनाज से सिर्फ उनके परिवार का ही नहीं , बहुतों का गुजारा हो सकता है , तो सारे लोगों का खेती में ही व्‍यस्‍त रहना आवश्‍यक नहीं। इस कारण हर क्षेत्र के विशेषज्ञों को अपनी अपनी प्रतिभा के अनुसार अलग अलग काम सौंप दिए गए और उनके खाने , पीने और अन्‍य आवश्‍यकताओं की पूर्ति करने की जिम्‍मेदारी खेतिहरों को दी गयी। इसी से समाज में इतने वर्ग बन गए और पीढी दर पीढी सभी अलग अलग प्रकार के कार्यों में जुट गए । 

खेतिहरों द्वारा सामान्‍य कलाकारों को भी पूरी मदद मिलने के कारण ही प्राचीन काल में कला का इतना विकास हो सका , वरना आज कला के क्षेत्र में बिना विशिष्‍टता के आप जुडे , तो दो वक्‍त का भोजन जुटाना भी मुश्किल है । इसके अतिरिक्‍त प्राचीन काल में सभी कलाओं , सभी क्षेत्रों के लोगों को महत्‍व देने और समाज में परस्‍पर सहयोग की भावना को जागृत करने के लिए ही विभिन्‍न तरह के कर्मकांड की व्‍यवस्‍था भी की गयी । पर इतने अच्‍छे लक्ष्‍य को ध्‍यान में रखते हुए समाज के लोगों के किए गए विभाजन का आज हम यत्र तत्र बुरा ही परिणाम देखने को मजबूर हैं।