जब आपको आउट ऑफ़ सिलेबस प्रश्नपत्र मिले ----

questions out of syllabus 



1 ) इतिहास में 1632 से 1653 के दौरान बनी भव्‍य इमारत ताज महल के बारे में पढने को मिलता है, विज्ञान के विकास के बिना उस युग में इतनी बडी इमारत के बनने का विश्‍वास नहीं होता , आखिर राजस्‍थान से आगरे तक इतना संगमरमर ढोया और इतनी उंचाई पर पहुचाया कैसे गया , हमारे समक्ष इसका कोई जबाब नहीं , पर हमें इसमें विश्‍वास है , क्‍यूंकि आगरे में ताजमहल खडा है ।


2 ) इतिहास में अजंता और एलौरा की गुफा के बारे में भी पढने को मिलता है , इस कला पर विश्‍वास तो किया ही जा सकता है , फिर भी एक प्रश्‍न तो उठता ही है , आखिर गुफा के अंदर रोशनी का प्रबंध कैसे किया गया था , हमारे सामने कोई जबाब नहीं , पर हमें इसमें विश्‍वास है , क्‍यूंकि अजंता और एलौरा की कलाकृतियां इसकी गवाह बनकर खडी हैं


3 ) इतिहास में खगोल शास्‍त्र के बारे में भी इतना कुछ पढने को मिलता है , जब आकाश दर्शन के लिए प्राचीन खगोल वैज्ञानिकों के पास मात्र बांस के खोखे थे , इतने रिसर्च हुए कैसे , हमारे पास कोई जबाब नहीं , पर हमें इसमें विश्‍वास है , क्‍यूंकि उन प्राचीन सूत्रों से आसमान की हर स्थिति की सटीक गणना के हो जा रही है।


4 ) इतिहास में रामचंद्र जी और कृष्‍ण जी के जीवन में घटी घटनाओं के बारे में भी पढने को मिलता है , पर उन घटनाओं का कोई प्रमाण नहीं मिला , इसलिए हम इसे साहित्‍य कहते हैं । 


5 ) इतिहास में ज्‍योतिष की अच्‍छी खासी चर्चा है , पर उसका प्रभाव महसूस करने की चीज है , यह दिखाई नहीं देती , इसलिए इसे हम अंधविश्‍वास कहते है ।


उपरोक्‍त बातें प्रमाणित करती हैं कि हम तर्क नहीं करते , आंखो देखे पर विश्‍वास करते हैं , जबकि ईश्‍वर ने अन्‍य पशुओं की तरह हमें सिर्फ आंख ही नहीं दिए , हमें महसूस करने के लिए दिमाग और दिल भी दिए हैं , मेरे विचार से हमें उनका भी उपयोग करना चाहिए।


अब एक कहानी भी सुन लें 
किसी गांव में एक भी स्‍कूल नहीं , पर एक बच्‍चे को पढने का बहुत शौक था। अपने अध्‍ययन के लिए वह शहर में रहनेवाले अपने चाचाजी के पुत्र की पुरानी पुस्‍तके मंगवा लिया करता था और दिन रात अध्‍ययन में जुटा रहता। वैसे उसे कोई डिग्री तो नहीं मिल सकी थी , पर अपनी मेहनत के बल पर नवीं कक्षा तक की पूरी जानकारी हासिल कर रखी थी। इस कारण उस बच्‍चे से सबको बडी आशा थी। पर शहर से आए एक व्‍यक्ति , जिसका अपना बच्‍चा पढाई नहीं कर पा रहा था , को उस बच्‍चे से जलन हो गयी। उसने अपनी प्रशंसा के लिए उस बच्‍चे की परीक्षा लेने और उसमें पास करने पर बच्‍चे को आगे पढाने की बात करते हुए पूरे गांववालों को निश्चित स्‍थान पर जमा होने को कहा। सारे गांववाले बडे खुश थे कि अब बच्‍चे को पढाई का सही माहौल मिलेगा , पर आयोजक की मंशा तो बच्‍चे के मनोबल को कम करने की थी , इसलिए उसने प्रश्‍न पत्र में स्‍नातक स्‍तर के सारे प्रश्‍न डाल दिए , आयोजक की मंशा पूरी हुई , बच्‍च फेल कर गया और गांववाले निराश , पर बच्‍चे का मनोबल कम नहीं हुआ , उसने उस प्रश्‍न पत्र को हिफाजत से रखा , ताकि अपने अध्‍ययन के उपरांत कभी उसका भी हल निकाल सके। वैसे सफलता असफलता तो ईश्‍वर के हाथों में है , पर सफलता का सपना देखना तो अपने हाथ में ,क्‍यूं न देखा जाए ? ( questions were out of syllabus )


अब चलते चलते एक बात और सुन लें। ... 


जब एक गुरू के द्वारा अपने किसी शिष्‍य की परीक्षा ली जाती है , तो शिष्‍य को सिलेबस के अंदर के ही प्रश्‍नो के जबाब देने पडते हैं , जो एक शिष्‍य के लिए बहुत आसान होता है और यदि एक गुरू के द्वारा दूसरे गुरू के शिष्‍य की परीक्षा ली जाती है तो उसके प्रश्‍नपत्र में आधे प्रश्‍न आउट आफ सिलेबस हो सकते हैं , जो शिष्‍य के लिए कुछ कठिन तो हो जाता है , लेकिन जो गुरू ही नहीं , वो परीक्षा लेना शुरू कर दे , तो बडी खतरनाक स्थिति पैदा होती है , शिष्‍य के प्रश्‍न पत्र के सारे प्रश्‍न आउट आफ सिलेबस हो सकते हैं !!



जब आपको आउट ऑफ़ सिलेबस प्रश्नपत्र मिले ---- जब आपको आउट ऑफ़ सिलेबस प्रश्नपत्र मिले ---- Reviewed by संगीता पुरी on September 25, 2009 Rating: 5

23 comments:

Alpana Verma said...

संगीता जी ,दुर्गाअष्टमी और दशहरा की आप को भी शुभकामनायें.

Admin said...

आपने सोचने पर मजबूर कर दिया. आपको भी तैयारों की मुबारकबाद

AAKASH RAJ said...

संगीता जी , दशहरा की आप को भी ढेर सारी शुभकामनायें.

AAKASH RAJ said...

संगीता जी , दशहरा की आप को भी ढेर सारी शुभकामनायें.

हेमन्त कुमार said...

अपनी मेजबानी और मेहमानी में अन्तर होता है ।
आप को दशहरा की हार्दिक शुभकामनाएं ।
आभार !

Anonymous said...

कथानकों के माध्यम से आपकी कही गई बातों से सहमत हूँ।

अवकाश की शुभकामनाएँ।
बेहतर होगा, वापस आ कर अपने ब्लॉग लेखन पर ध्यान केन्द्रित रखें।

मौन भी बहुत कुछ कहता है, मैंने जाना है।

बी एस पाबला

Rakesh Singh - राकेश सिंह said...

संगीता जी आपको भी विजयादशमी की हार्दिक शुभकामनाएं !

Udan Tashtari said...

विचारणीय...जीवन का प्रश्न पत्र..आउट ऑफ सिलेबस...इसे कहीं इस्तेमाल करना है मुझे अपने आलेख में..इजाजत दिजिये.

Udan Tashtari said...

कितने पुरुषों के दिल में उठता सवाल..क्या ये भी मनोचिज्ञान है पुरुषों का..उलझा हूँ इस चिन्तन में..एक त्रिवेणी!!


नारी सशक्तिकरण आंदोलन का प्रभाव ऐसा..
सुनते हैं नारी पुरुषों के आगे निकल गई है....

क्या प्रश्नपत्र आऊट ऑफ सिलेबस आया है!!

संगीता पुरी said...

समीर लाल जी ,

आपने तो मेरे इस पोस्‍ट की शोभा ही बढा दी है .. बहुत बहुत धन्‍यवाद !!

विनोद कुमार पांडेय said...

दुर्गाअष्टमी और दशहरा की आप को भी शुभकामनायें!!!

रंजू भाटिया said...

मुझे तो लगता है की जीवन में मिलने वाले अक्सर प्रश्नपत्र आउट ऑफ़ सिलेबस ही होते हैं जिनका जवाब नहीं आता पर हम हल करने की कोशिश में लगे रहते हैं ..आपकी कही बाते बहुत ही मन भायी सही कहा है आपने . आपको भी विजयादशमी की बहुत बहुत बधाई

राज भाटिय़ा said...

सब से पहले तोआप को दुर्गाअष्टमी और दशहरा की आप को भी शुभकामनायें. फ़िर इतनी अच्छी पोस्ट के लिये धन्यवाद.

चंद्रमौलेश्वर प्रसाद said...

" जबकि ईश्‍वर ने अन्‍य पशुओं की तरह हमें सिर्फ आंख ही नहीं दिए , हमें महसूस करने के लिए दिमाग और दिल भी दिए हैं ..."

पर यह ईश्वर कौन है?.....यह आउट आफ़ सेलेबस प्रश्न किया था प्रसिद्ध खगोल शास्त्री कार्ल सगान ने!!

Vinashaay sharma said...

संगीता जी आपको दुर्गाअष्टमी और दशहरा की हार्दिक बधाई,एक सपताह से कम्पुयटर खराब पड़ा था,बहुत से आप के ज्ञानबर्धक लेख नहीं पड़ पाया,मेरे अनुसार अच्छा शिक्शक वोह होता है,जो निस्बार्थ भाव से विद्या दान दे,और विद्यार्थी का ठीक से आंकलन करे।

Mohammed Umar Kairanvi said...

मैंने अंक ज्‍योतिष पढा है 13 न. बडा अशुभ होता है, यह हमारा ज्ञान कहता है, जब में यहाँ आया तो 13 कमेंटस होचुके थे, मैं पैदा भी सबसे इस अशुभ तारीख को हुआ तो वेसे कोई बताता नहीं इस तारीख में पैदा होने वाला, दूसरा इस तिथी में रूस का शतरंज चेम्पियन है महीना भी मेरा सबसे अशुभ है वह बताउंगा नहीं, वह भी इतना ही बुरा है, सब जान जायेंगे उस तारीख में मुझ जन्‍म दिन मुबारक वाला ब्लाग बधाई दिलवायेगा, जो कि मैं नहीं चाहता, कुछ 13 के बारे में यात्रा से आने के बाद और बताइयेगा,

आपको तो इशारों में आपके लिये पोस्ट लिख कर खंडेलवाजी महान बना दिया था, अपने को तो अपना प्रचार स्‍वयं करना पडता है, प्रचार लिंक छोड रहा हूं कि अपनी पुरानी आदत है कोई बुरा माने या भला

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विचार करें कि मुहम्मद सल्ल. कल्कि व अंतिम अवतार और बैद्ध मैत्रे, अंतिम ऋषि (इसाई) यहूदीयों के भी आखरी संदेष्‍टा? हैं या यह big Game against Islam है?
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अनिल कान्त said...

दशहरा की आप को भी ढेर सारी शुभकामनायें

Praveen Jakhar said...

संगीता जी अच्छी लघुकथा बुनी यहां। शायद मैंने इसे कहीं पढ़ा भी है। लेकिन इसमें वह गांव का बच्चा कौन बना है? सिर्फ एक बात बताएं आपसे कोई अपनी कुंडली बंचवाने आता है, तो क्या वह आपका गुरु होता है? क्या वह ज्योतिष का जानकार होता है? क्या उसे सवाल पूछने का हक नहीं होता? क्या वह आपसे कोई सवाल नहीं करता, बस आप अपने अंतर्मन से ही जवाब दे देती हैं? नहीं ना। क्योंकि कोई आपसे पूछता होगा, मेरे करियर का क्या होगा? शादी कब होगी? बच्चे कब होंगे? धन-संपत्ति कब मिलेगी? भाग्य कब खुलेगा? बस इसी तरह मैंने भी तो आपसे सात ही सवाल पूछे हैं। नाराज ना हों, समझिए मैं आपके पास कुंडली लेकर नहीं आया, बस ऑनलाइन ही अपने सवाल कर लिए। आप तो जवाब दीजिए। आपको शुभकामनाएं आप दुर्गा पूजा करके हम सबके लिए कामना करके लौटें और जवाब जरूर दें।

Gyan Dutt Pandey said...

जीवन का सेलेबस ढूंढ़ने की जद्दोजहद का खास नतीजा नहीं निकला। लिहाजा जैसे सामने आता है, फेस कर ले रहे हैं!

डा० अमर कुमार said...


चन्द्रमौलेश्वर प्रसाद जी,
ईश्वर एक अवधारणा मात्र है,
मानव के अपरिपक्व बालमन को बहलाने, फुसलाने, आश्वस्त रखने, डराने, धमकाने और
मानवेतर सज़ाओं को निर्धारित करने का साधन जिसको मानव स्वयँ ही एक दूसरे पर लागू करता है ।
और.... शायद इसी बिन्दु से दर्शन प्रारम्भ होता है

Naveen Tyagi said...

sangeeta ji maine aaj tak jyotish vidya par vishvaas nahi kiya hai.kai baar man maar kar koshis bhi ki hai.jyotish vidya par mai aapse adhik jaankaree chaahunga.

Unknown said...

paden
प्रवीण जाखड़ जी और संगीतापुरी जी तो बहाना है,
मुझे तो कुछ कर गुजरना है ...2

Murari Pareek said...

bahut sahi kahi hai saari baaten !!

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