अपने पसंदीदा रंग से जानिए अपना भाग्‍य ....

रंग हमारे मन और मस्तिष्‍क को काफी प्रभावित करते हैं। कोई खास रंग हमारी खुशी को बढा देता है तो कोई हमें कष्‍ट देने वाला भी होता है। जिस तरह यदि हम प्रकृति के निकट हों , तो खुद को फायदा पहुंचाने वाले वस्‍तुओं की ओर हमारा ध्‍यानाकर्षण होता है , उन वस्‍तुओं का प्रयोग हम आरंभ कर देते हैं , उसी तरह 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' की मान्‍यता है कि कमजोर ग्रहों के प्रभाव को दूर करने के लिए जिस रंग का हमें सर्वाधिक उपयोग करना चाहिए , उस रंग को हम खुद पसंद करने लगते हैं और उस रंग का अधिकाधिक उपयोग करते हैं। इस कारण रंगों की पसंद के अनुसार भी किसी व्यक्ति की परिस्थितियों और स्वभाव के बारे में जानकारी प्राप्‍त की जा सकती है।

सफेद रंग पसंद करने वाले लोग बचपन में ही अपने माहौल में किसी न किसी प्रकार की कमजोरी को देखते हैं और कमजोरियों दूर करने के लिए मनोवैज्ञानिक रुप से परेशान रहते हैं , बचपन के व्यवहार में संकोच हावी होता है , हर समय इन्‍हें भय बना होता है कि कोई गलती न हो जाए। यही मनोवैज्ञानिक कमजोरी इनके जीवन के अन्य भागों में भी देखी जा सकती है। 'पूरी तैयारी और सावधानी करके ही काम करो’ की प्रवृत्ति के कारण काम की शुरुआत ही नहीं हो पाती , बहुत सारे काम विचाराधीन भी पड़े रहते हैं। जीवनभर निरंतर इन कमजोरियों को दूर करने के लिए ये सतर्क रहते हैं। अपने विचारों को कमजोर समझकर दूसरों के सामने रखने में संकोच करते हैं। इनके मन के आवेग में पर्याप्त ठहराव होता है और अपनी बातों को रखने के लिए उचित समय की तलाश करते हैं। ये मन से कभी आक्रामक नहीं होते , फलतः आपपर बाह्य आक्रमण होता है। ये रूठकर प्रतिरोधात्मक शक्ति का प्रदर्शन करते हैं।

हरा रंग पसंद करने वाले लोग किशोरावस्था में अपने माहौल को बहुत कमजोर पाते हैं , अध्ययन काल में विपरीत परिस्थितियों से गुजरते हैं । इनकी कठिनाइयां 12 वर्ष की उम्र से 18 वर्ष की उम्र तक बढ़ते हुए क्रम में बनी रहती हैं। बौद्धिक विकास या शिक्षा-दीक्षा के महत्व को समझने के बावजूद परिस्थितियों के विपरित होने से इनका कोई काम सही ढंग से नहीं हो पाता है , इस समय बाधाओं की निरंतरता बनी रहती है।  17 से 19 वर्ष की उम्र में भी इनके मनोबल को तोड़नेवाली कोई घटना घटती है । उस समय इनका आत्मविश्‍वास काम नहीं कर रहा होता है , भीड में पींछे पीछे रहने की आदत रहती है और जीवनभर  नेतृत्‍व क्षमता की कमी मौजूद होती है। इनके व्‍यक्तित्‍व में सेवा भावना होती है। कम उम्र में माहौल में आयी गडबडी इनके धैर्य और निर्णय लेने की शक्ति को बढाती है और इनके आगे के जीवन को संतुलित बनाने में भी मदद करती है। 

लाल रंग पसंद करने वाले लोगों के जीवन में युवावस्था के दौरान परेशानी उपस्थित रहती हैं , यूं तो इनकी समस्याएं 18 वर्ष के उम्र के बाद से ही आरंभ हो जाती हैं , पर 24 वर्ष की उम्र के बाद विपरीत परिणामों की निरंतरता से इनमें शक्ति साहस की कमी और संघर्ष करने की क्षमता कमजोर पड़ती है। 30 वर्ष की उम्र से पहले  ये भीतर से कुछ दब्बू होते हैं , चुस्त जीवनशैली से कोसों दूर इन्‍हें ग्रामीण या एकांतिक जीवन पसंद आता है , वृद्ध जैसा स्वभाव बना रहता है। जीवनभर व्‍यक्तित्‍व में हिम्मत की कुछ कमी बनी रहती है , पर ये लोगों के विश्‍वसनीय बने रहतें हैं । इन्‍हें परंपरागत नियमों पर विश्‍वास होता है , सरल जीवन पसंद होता है। 

नीला रंग पसंद करने वाले लोगों पर घरेलू उत्तरदायित्वों का भारी बोझ रहता है , बढती जिम्‍मेदारियों के साथ समय पर नौकरी या व्यवसाय में आगे बढने में दिक्कत आने से जीवन का मध्य खासकर 36 वर्ष से 42 वर्ष की उम्र तक का समय कष्टकर व्यतीत होता है , इस वक्त लोगों का कम सहयोग मिलता है। पारिवारिक सांसारिक मामलों का कष्ट बना होता है , इसलिए सांसारिक मामलों में रूचि कम होती है , इन्‍हें अपना जीवन नीरस महसूस होता है। 

नारंगी रंग पसंद करने वाले लोगों को किसी खास संदर्भ में निश्चिंत या लापरवाह रहने का बुरा फल कभी कभी जीवन में सामने आ जाया करता है। 48 वर्ष से 54 वर्ष की उम्र तक हर तरह की जवाबदेही बहुत बढ़ी हुई होती है। उम्र के ऐसे पड़ाव पर इतनी सारी जबाबदेहियों को सॅभाल पाने में तकलीफ होती है , प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण इनको अपना जीवन निरर्थक लगने लगता है, स्तर में बढोत्तरी के बावजूद 48 से 54 वर्ष की उम्र में ये खुद को सफल नहीं महसूस करते। परिस्थितियों की कुछ गडबडी 60 वर्ष की उम्र तक बनी होती है।

पीला रंग पसंद करने वाले लोग धार्मिक स्वभाव रखने वाले होते हैं , जीवनभर बहुतों को काम आते हैं । इन्‍हें परंपरागत नियमों पर पूरा विश्‍वास रहता है , पर सेवानिवत्ति के पहले अपनी जबाबदेहियों का निर्वाह कर पाने में असमर्थ रहते हैं , इस कारण उसके बाद इनके जीवन में कष्टकर परिस्थितियों की शुरूआत होती है। वृद्धावस्था में यानि 60 वर्ष की उम्र के बाद असफलताएं दिखाई देती हैं , इस समय इनका जीवन निराशाजनक बना रहता है , उम्र अधिक होने के कारण मानसिक कष्ट बहुत होता है , कमजोर शारीरिक मानसिक हालत के कारण किसी प्रकार के निर्णय लेने में दिक्कत आती है।

काले या स्‍लेटी रंग को पसंद करने वाले लोग जीवन में बहुत छोटी छोटी बातों में उलझे रहते  हैं , इनकी सोंच व्यापक नहीं बन पाती, इस कारण तरक्‍की में रूकावट आती है। मेहनत के हिसाब से कम सामाजिक महत्व प्राप्त करते हैं , जीवन में कभी कभी रहस्यमय ढंग से विपत्ति से घिर जाते हैं, इसका सामना करने की इनमें शक्ति नहीं होती , बहुत निरीह हो जाते हैं , पर जिस ढंग से अचानक समस्या आती है , उसी ढंग से तीन वर्ष के बाद उसका निराकरण भी हो जाता है। इनका अति वृद्धावस्था का समय यानि 72 वर्ष की उम्र के बाद का समय कष्‍टकर होता है। 
(बहुत दिनों से सबका पसंदीदा रंग नोट करने , ग्रहों के साथ उसका तालमेल बिठाने तथा उनकी परिस्थितियों पर ध्‍यान देने के बाद यह लेख लिखा गया है , आप भी अपने अनुभव साझा करें , तो हमें सुविधा होगी , पक्ष और विपक्ष दोनो में टिप्‍पणियां आमंत्रित हैं )

काश आई पी एस अफसर राहूल शर्मा को भी किसी का सहारा मिला होता !!!!

ज्‍योतिष के क्षेत्र में 20 वर्षों से अधिक के अध्‍ययन के बावजूद प्रतिदिन कुछ ग्रहों के आम जनजीवन पर पडनेवाले नए नए रहस्‍यों की जानकारी के मोह ने मुझे अभी तक ज्‍योतिष को प्रोफेशनल ढंग से नहीं लेने दिया , पर यत्र तत्र गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष से संबंधित लेखों के प्रकाशित होते रहने के कारण मुझसे सलाह के लिए मिलने या फोन करने वालों की कमी भी नहीं। एक डॉक्‍टर और एडवोकेट की तरह ही मुझसे संपर्क करनेवाले भी किसी न किसी समस्‍या से जूझ रहे होते हें।  ज्‍योतिष के व्‍यावहारिक स्‍वरूप को मजबूत बनाने के लिए लोगों के समक्ष उपस्थित होने वाली समस्‍याओं को समझना और विभिन्‍न ग्रहों के साथ उनका सहसंबंध स्‍थापित करते हुए शोध को आगे बढाना भी मेरे लिए आवश्‍यक है , इसलिए नई कुंडहलयों के साथ लोगों से मिलना आवश्‍यक भी है। इसलिए ग्रहों के प्रभाव की अभी तक की जानकारी के आधार पर समय निकालकर मैं अधिकांश लोगों को उनकी ग्रहस्थिति के आधार पर ज्‍योतिषीय परामर्श अवश्‍य दिया करती हूं।

वैसे तो हर कोई को जन्‍म लेने के बाद ही एक सा वातावरण नहीं मिलता है , कोई अमीर तो कोई गरीब या भिखारी के घर भी , कोई सुंदर और स्‍वस्‍थ , तो कोई कुरूप और अस्‍वस्‍थ या अपंग भी , कोई तेज दिमाग का , तो कोई कमजोर दिमाग और कोई  तो कोई मानसिक बीमारी के साथ जन्‍म लेता है। पूरे जीवन में भी कोई किसी संदर्भ में बडी तो कोई छोटी सफलता या असफलता से जूझता रहता है , पर इसे लेकर जनसामान्‍य कुछ खास परेशानी महसूस नहीं करता, क्‍यूंकि अपनी अपनी परिस्थिति के हिसाब से ही जीने की उसकी आदत बनी होती है ।  लेकिन बिना किसी प्रकार की गडबडी के अचानक किसी प्रकार की असामान्‍य परिस्थिति उनके जीवन में आ जाती है , तो लोगों को किसी अज्ञात शक्ति के प्रति आकर्षित होना स्‍वाभाविक होता है और इसलिए वे ज्‍योतिषी या किसी अन्‍य जानकार के पास जाते हैं।

हम सभी जानते हैं कि जहां जीवन है , वहां बदलाव है । प्रकृति में दिन है तो रात भी , अंधेरा है तो उजाला भी , वसंत है तो पतझड भी। पर अपने जीवन में सिर्फ सुख ही सुख की कामना करते हैं। कष्‍ट आते ही हमारी बेचैनी बढ जाती है , जबकि सुख का समय हमे जीवन में किताबी ज्ञान के सिवा कुछ नहीं देता , व्‍यवहारिक ज्ञान हम कष्‍ट के समय ही प्राप्‍त करते हैं। अपने पास आनेवाले अधिकांश लोगों को मैं अनुकूल समय का इंतजार करने की ही सलाह देती हूं ,  'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' के हिसाब से लोगों के जीवन में आनेवाली समस्‍याएं भी दो प्रकार की होती हैं , पहली उनके जन्‍म कालीन ग्रहों के हिसाब से आने वाली , यह सामान्‍य ढंग होती हैं , इसलिए कुछ दिनों , महीनों या वर्षों का इंतजार करना लोगों के लिए कठिन नहीं होता है। प्रकृति ने उस परिस्थिति के हिसाब से जीने के लिए उसके बॉडी की प्राग्रामिंग कर दी होती है।

पर समय समय पर आसमान में अलग अलग स्थिति और शक्ति के हिसाब से चल रहे ग्रहों के कारण कोई समस्‍या उपस्थित होती है , तो यह विशेष ढंग की होती है , कभी दो चार दिनों , तो कभी दो चार महीनों या कई कई वर्षों तक आनेवाली ये समस्‍या लोगों के व्‍यक्त्त्वि के बिल्‍कुल प्रतिकूल वातावरण तैयार करती है , इसे झेल पाना लोगों के लिए बहुत ही कठिन हो जाता है। इसलिए लोग तुरंत ही उससे छुटकारा प्राप्‍त करना चाहते हैं , पर उनके पास कोई साधन नहीं होता है। इस वक्‍त कितना भी हाथ पांव चलाएं , कोई फायदा नहीं दिखता , आगे भी उन्‍हें अंधेरा ही अंधेरा नजर आने लगता है ,  वैसी हालत में निराश शारीरिक या मानसिक तौर पर कमजोर हो जाते हैं , इसी वक्‍त आत्‍म हत्‍या करने तक की सोंच लेते हैं। 

पूरी दुनिया जानती है कि आज के प्रतियोगिता के दौर में सफल और असफल लोगों के मध्‍य भाग्‍य या संयोग की भूमिका कम नहीं , फिर भी आज समाज की जीवन शैली इतनी बिगड गयी है कि इन्‍हें इस दौरान कहीं से भी ढाढस के दो शब्‍द नहीं मिलते , दुनिया सफल लोगों के गुणगान में लगी होती है , असफल लोगों को जगह मिलना मुश्किल होता है। अपने पास आनेवाले ऐसे परेशान लोगों की नियमित काउंसलिंग करके मैं उन्‍हें गुमराह होने से बचाती हूं , अनेक उदाहरण हैं मेरे पास। इसमें से ही एक की चर्चा कल ललित शर्मा जी ने अपने पोस्‍ट में की थी , जिसमें वे भी शामिल थे। हमने अपने अध्‍ययन में पाया है कि आसमान में चल रहे प्रतिकूल ग्रह की खास स्थिति से दूर होते ही पुन: कोई न कोई उपाय निकलता है और वातावरण पूर्ववत हो जाता है। जो भी समस्‍याएं चल रही होती हैं , उनसे निजात मिल जाती हैं , भले ही इस दौरान उन्‍हें शारीरिक या मानसिक कष्‍ट के दौर से गुजरना पडा हो। इसलिए ऐसे समय में उन्‍हे सहारा देने  की आवश्‍यकता होती है , काश आई पी एस अफसर राहूल शर्मा को भी किसी का सहारा मिला होता !!!!

होली की बहुत बहुत बधाई



ज्‍योतिष के विकास के लिए इसका विकसित विज्ञान के साथ सहसंबंध बनाना आवश्‍यक ...

पृथ्‍वी की निरंतर गतिशीलता के कारण प्रत्‍येक दो घंअे में विभिन्‍न लग्‍नों का उदय है। इसकी दैनिक गति के कारण दिन और रात का अस्तित्‍व है, वार्षिक गति के कारण इसके ऋतु परिवर्तन का चक्र। गति के कारण ही चंद्रमा का बढता घटता स्‍वरूप है , गति के कारण विशिष्‍ट ग्रहों की पहचान है। सूर्य और चंद्र की गति के कारण ही नक्षत्रों का वर्गीकरण है , सूर्य और चंद्र का ग्रहण है। ग्रहों की गति के कारण ही संसार का नित नूतन पिरवेश है और इसी परिवर्तनशीलता के कारण इसका नाम जगत है। न्‍यूटन ने गति के सिद्धांत को समझा, तो भौतिक विज्ञान में क्रांति आ गयी। आज उन्‍ही सिद्धांतों को अधिक विकसित कर वैज्ञानिक अंतरिक्ष में अरबों मील की यात्रा करके तरह तरह की खोज करके सकुशल पृथ्‍वी पर लौट आते हैं।

सृष्टि काल के आरंभ से ही सूर्य , चंद्र और सभी ग्रहों की गति हमारे लिए आकर्शण का केन्‍द्र बने रहें। वैदिककालीन विद्याओं में यह प्रमुख विद्या थी , इसलिए इसे वेद का नेत्र कहा जाता था। उस समय से आजतक आकाशीय पिंडों की गति और स्थिति के विषय में बहुत जानकारी प्राप्‍त कर ली गयी है , सभी पिंडों की गति और परिभ्रमण पथ की इतनी सूक्ष्‍म जानकारी आज है कि आज से सैकडों वर्ष बाद के सभी ग्रहों की स्थिति , सूर्य और चंद्र ग्रहण की जानकारी मिनट सेकण्‍ड की शुद्धता के साथ दी जा सकती है। सूर्य चंद्र परिभ्रमण पथ की सम्‍यक जानकारी के कारण यह भी बताया जा सकता है कि पृथ्‍वी के किस भाग में यह ग्रहण दिखाई पडेगा। यही कारण है कि गणित ज्‍योतिष की पढाई संपूर्ण विश्‍व में हो रही है। गति की सम्‍यक जानकारी के कारण ही पंचांग में तिथि , नक्षत्र , योग , करण आदि का समुचित उल्‍लेख किया जाता है , पर फलित के मामलों में गहों की गति की उपेक्षा की गयी है। फलित ज्‍योतिष में ग्रहों की सिर्फ स्थिति पर ही विचार किया गया है , इसलिए आज तक इसके द्वारा कहा जाने वाला फल अधूरा और अनिश्चित रह गया है।

पृथ्‍वी स्‍वयं गतिशील है , दैनिक और वार्षिक गति के कारण अपने अक्ष और कक्षा में सदैव अपने को हजारो मील दूर ले जाती है। किंतु पृथ्‍वी वासी होने के कारण हमें इसकी गति का आभास भी नहीं हो पाता है , क्‍यूंकि पृथ्‍वी पर स्थित हर जड चेतन की गति पृथ्‍वी की गति के बराबर हो जाती है। ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार ट्रेन पर सवार सभी व्‍यक्ति विरामावस्‍था में होते हुए भी लंबी दूरी तय कर लेते हैं। फलित ज्‍योतिष के अध्‍येता अपने को ब्रह्मांड का केन्‍द्र विंदू मानकर इसे स्थिरावस्‍था में समझते हुए ही संपूर्ण ब्रह्मांड और आकाशीय पिंडों का अध्‍ययन करता है। ब्रह्मांड में दरअसल पृथ्‍वी के साथ शेष ग्रह भी सूर्य की परिक्रमा कर रहे हैं। अत: पृथ्‍वी को विरामावस्‍था में मानने से इसके सापेक्ष सभी ग्रहों की सापेक्षिक गति की जानकारी होती है।

पृथ्‍वी सूर्य की प्रत्‍यक्ष परिक्रमा करता है , इस कारण उसके सापेक्ष सूर्य की समरूप गति को हम देख पाते हैं , चंद्रमा को भी पृथ्‍वी की प्रत्‍यक्ष परिक्रमा करते हुए देखा जा सकता है। भचक्र में ये दोनो ग्रह लगभग समरूप गति में होते हैं। सूर्य कभी उत्‍तरायण तो कभी दक्षिणायण होता है , उसके हिसाब से विभिन्‍न ऋतुएं होती हैं , विभिन्‍न नक्षत्रों से गुजरता है तो उसके अनुरूप उसका फल होता है। चंद्रमा के प्रकाशमान भाग के अनुरूप ही जातक की मनोवैज्ञानिक शक्ति होती है । किसी निश्चित तिथि को सूर्य आकाश के एक निश्चित भाग में ही होता है , पर उस दिन जन्‍म लेने वाले समस्‍त जातकों की कुंडली में विभिन्‍न भावों में दर्ज किया जाता है। उसका फल भी भिन्‍न भिन्‍न जातकों के लिए अलग अलग होता है।

आकाश में शेष ग्रहों का पृथ्‍वी से अप्रत्‍यक्ष गत्‍यात्‍मक संबंध है। यानि की सौरमंडल में अन्‍य सभी ग्रह सूर्य की परिक्रमा करते हुए कभी पृथ्‍वी की ओर आ जाते हैं , तो कभी पृथ्‍वी के विपरीत दिशा में। इसके कारण पृथ्‍वी से विभिन्‍न ग्रहों की दूरी और सापेक्षिक गति बढती घटती है। पृथ्‍वी के सापेक्ष कभी कभी ग्रहों की गति ऋणात्‍मक भी हो जाती है। ‘गणित ज्‍योतिष’ में इसकी विशद चर्चा है , पर ‘फलित ज्‍योतिष’ का अध्‍ययन करते वक्‍त आज तक ग्रहों की इस गति को नजरअंदाज कर दिय गया , जो ग्रहों के बलाबल का सही आधार है। यह विडंबना ही है कि बंदूक की छोटी सी गोली में उसकी शक्ति का अनुमान उसकी गति के कारण हम सहज ही कर लेते हैं। हथेली पर एक छोटा सा पत्‍थर का टुकडा रखकर अपने को बलवान समझते हैं , क्‍यंकि उसे गति देकर शक्ति उत्‍सर्जित की जा सकती है , पर हजारो मील प्रतिघंटा की गति वाले भीमकाय ग्रहों की शक्ति को आज तक ज्‍योतिषी इसकी स्थिति में ढूंढते आ रहे हें। जाने अनजाने ग्रहों की गति के रहस्‍य को नहीं समझ पाने से फलित ज्‍योतिष की गति स्‍वत: अवरूद्ध हो गयी। यही करण है कि हजारो वर्षों से इसकी स्थिति यथावत बनी हुई है और लोग इसे अनुमान शास्‍त्र कहने लगे हैं।

प्रकृति के नियम बहुत ही सरल होते हैं , एक दो प्रतिशत ही अपवाद होते हैं,पर इसे समझने में हमें बहुत समय लग जाता है। फलित ज्‍योतिष की पुस्‍तकों में ग्रह शक्ति के निर्धारण के लिए बहुत सारे नियम हैं। स्‍थान बल , काल बल , दिक बल , नैसर्गिक बल , चेष्‍टा बल , अंश बल , योग कारक बल , पक्ष बल , अयन बल , स्‍थान बल के अलावे भी ष्‍डवर्ग अष्‍टकवर्ग आदि आदि। इसका अभिप्राय यह है कि हमारे .षि मुनि पूर्व ज्‍योतिषियों ने ग्रह शक्ति को समझने की चुनौती को स्‍वीकार किया था। इस परिप्रेक्ष्‍य में उनके द्वारा बहुआयामी प्रयास किया गया , इस लिए ग्रहशक्ति से संबंधित इतने नियम हैं , किंतु व्‍यवहारिक दृष्टि से एक ज्‍योतिषी इतने नियमों को आतमसात करते हुए तल्‍लीन रहकर भविष्‍य कथन नहीं कर सकता। इतने नियमों के मध्‍य विभिन्‍न ज्‍योतिषियों के फलकथन में एकरूपता की बात हो ही नहीं सकती। ज्‍योतिष के इन जटिल सूत्रों ने ग्रह फल कथन में ज्‍योतिषियों के निष्‍कर्ष में विरूपता पैदा कर इसके वैज्ञानिक स्‍वरूप को नष्‍ट करते हुए इसे अनुमान शास्‍त्र बना दिया है। इन उलझनों से बचने के लिए एकमात्र उपाय ग्रहों की गतिज और स्‍थैतिज ऊर्जा का सहरा लेना समीचीन सिद्ध हुआ है। फलित ज्‍योतिष में अन्‍य नियमों की तरह ये नियम भी ग्रह शक्ति निर्धारण के लिए एक नया प्रयोग नहीं है। सन् 1981 से अबतक पच्‍चीस तीस हजार कुंडलियों में किए गए प्रयोग का निचोड निष्‍कर्ष है।

फलित ज्‍योतिष सबसे पुरानी विधाओं में एक वैदिककालीन विद्या है। किंतु भौतिक विज्ञान में वर्णित न्‍यूटन के गति के सिद्धांत का आविष्‍कार सन् 1887 में हुआ , इससे पूर्व ज्‍योतिष में इसका उपयोग संभव नहीं था। पर उसके बाद इसका उपयोग फलित ज्‍योतिष के क्षेत्र में भी होना चाहिए था , क्‍यूंकि किसी भी विज्ञान का विकास विकसित विज्ञान के साथ सहसंबंध बनाकर ही होता है। अगर हम फलित ज्‍योतिष को विज्ञान बनाना चाहते हैं तो हमें भौतिक विज्ञान में वर्णित गतिज और स्‍थैतिज ऊर्जा का सहारा लेना , उसका उपयोग करना एक स्‍वस्‍थ दृष्टिकोण होगा। ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ में ग्रहों की गति की विशद व्‍याख्‍या करते हुए इसकी विभिन्‍न प्रकार की गतियों का सपष्‍ट भिन्‍न भिन्‍न प्रभाव मानव जाति पर कैसे पडता है , का अध्‍ययन किया गया है।


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'गत्यात्मक ज्योतिष' टीम से मुलाक़ात करें।




वेलेण्‍टाइन डे



रूमानित भरा मौसम होता है वसंत का

वसंत के मौसम में रूमानियत तो होती ही है ,भारतीय संस्‍कृति मे भी इस महीने प्‍यार के अनेक रंग बिखेरता होली का त्‍यौहार मनाए जाने की परंपरा रही है। इसलिए इस महीने प्रेम की महिमा से इंकार नहीं किया जा सकता है , यह अलग बात है कि पहले कम उम्र में विवाह होते थे , तो विवाह के बाद इसका नशा चढता था और आज कैरियर को बनाने के चक्‍कर में लगे विवाह में देर करनेवाले युवाओं युवतियों पर इसका नशा पहले ही छाने लगा है। पर प्रेम संबंध और विवाह दोनों को अलग अलग नहीं रखा जा सकता। जब किसी लड़का और लड़की के बीच प्रेम होता है तो वे साथ साथ जीवन बीताने की ख्वाहिश रखते हैं और विवाह करना चाहते हैं। पश्चिमी सभ्‍यता की देखा देखी भारतवर्ष में भी युवा प्रेमी प्रेमिकाएं द्वारा 14 फरवरी को वेलेण्‍टाइन डे मनाने की परंपरा चल पडी है। वेलेण्‍टाइन डे मनाने के लिए जितनी तैयारी ये करते हैं , उससे कम तैयारी इसका विरोध करनेवाले नहीं करते। भारतीय सभ्‍यता और संसकृति की रक्षा करने के नाम पे युवकों युवतियों द्वारा इस परंपरा को मनाए जाने का का प्रतिवर्ष पुरजोर विरोध किया जाता रहा है। इसके बावजूद पार्कों , पिकनिक स्‍थलों और अन्‍य सार्वजनिक स्‍थलों पर इनकी भीड जुटती है। 

मेष लग्‍नवालों के लिए सर्वाधिक महत्‍वपूर्ण ..

प्रतिवर्ष वेलेण्‍टाइन डे के दिन ग्रहों की स्थिति भिन्‍न भिन्‍न होती है। इस साल वेलेंटाइन डे पर चंद्रमा की स्थिति बहुत ही मजबूत है , चंद्रमा मन को प्रभावित करता है , इसलिए लोगों का उत्‍साह बना रहेगा। चंद्रमा के साथ शनि की ज्‍योतिष के हिसाब से शुक्र , जो प्रेम का ग्रह है , की स्थिति भी आज बहुत ही मजबूत बनी हुई है। इसलिए इस त्‍योहार को मनाने का पूरा जोश बना रहेगा। चंद्रमा की मजबूती के कारण के कारण मकर लग्‍नवाले , और शुक्र की मजबूती के कारण मेष और वृश्चिक लग्‍नवाले अनुकूल माहौल उपस्थित पाएंगे। चंद्रमा के साथ शनि की स्थिति कर्क और सिंह लग्‍नवालों को भी सुखद कार्यक्रमों से जुडाव बनाएंगी। कुल मिलाकर यह दिन मेष लग्‍नवाले प्रे‍मी प्रेमिकाओं के लिए सर्वाधिक तथा कर्क , सिंह , वृश्चिक और मकर लग्‍न के प्रेमी प्रेमिकाओं के लिए खासे महत्‍व का होगा, अन्‍य लग्‍नवालों के लिए औसत हो सकता है। खासकर 11 बजे से 2 बजे दिन और 10 बजे से 1 बजे रात्रि तक का समय खास मनोनुकूल हो सकता है।

16 वर्ष से 19 वर्ष की उम्र के नौजवान सावधान रहें

पर जहां चंद्रमा और शुक्र की स्थिति माहौल को सुखात्‍मक बनाए रखेगी , वहीं चंद्रमा के साथ वक्री शनि की स्थिति कुछ गडबडी उपस्थित कर सकती है। शनि के कारण बहुत सारे लोगों के साथ ही साथ 16 वर्ष से 19 वर्ष की उम्र तक के टीन एजर किशोरों को खासकर बहुत सावधानी बनाए रखने की आवश्‍यकता है। 7 बजे से 11 बजे दिन और 10 बजे से 1 बजे रात्रि तक का समय उनका विशेष गडबड रह सकता है। इस वक्‍त किसी भी प्रकार की विपत्ति में ये फंस सकते हैं। गोचर में मंगल की स्थिति भी बहुत कमजोर चल रही है , जो युवा वर्ग को बाधा उपस्थित करने के लिए काफी है , खासकर 6 बजे से 9 बजे तक का समय उनके लिए ठीक नहीं। वृष और तुला लग्‍नवाले युवकों युवतियों के समक्ष भी बहुत कठिन माहौल बनेगा। हां , यह वेलेण्‍टाइन दिवस विवाहित लोगों के लिए सुखद होगा , सिर्फ मिथुन और कन्‍या लग्‍न वालों के लिए कुछ परेशानी उपस्थित हो सकती है।