सुविधा चल रही है ....

 हमारे पास व्‍यक्तिगत उत्‍सुकता से भरे ज्‍योतिष प्रेमी पाठकों के पत्र नियमित तौर पर आते रहते हैं , शोध कार्यों में व्‍यस्‍तता के कारण बहुत कोशिश के बाद भी सबको जबाब दे पाना संभव नहीं होता है, हालांकि बहुतों की जिज्ञासा का मैने समाधान भी किया है। पिछले लेख में मैने लिखा था कि अर्थप्रधान युग में भविष्‍य के प्रति आशंका से अंधविश्‍वास और बढता जा रहा है। अंधविश्‍वास का मूल कारण अज्ञानता है , आग , वर्षा, बाढ , बिजली, रोग, भूकंप, चंद्रग्रहण , सूर्यग्रहण आदि घटनाओं के बारे में पर्याप्‍त जानकारी न होने से आदिम मानव के मध्‍य इन्‍हें लेकर अंधविश्‍वास था। पर जैसे जैसे रहस्‍यों का पर्दाफाश होता गया , अंधविश्‍वास समाप्‍त होता गया। प्रकृति के रहस्‍यों की जानकारी के बाद बहुत सारे अंधविश्‍वास समाप्‍त होते चले गए , यदि आज समाज में कुछ अंधविश्‍वास प्रचलित हैं , तो इसकी वजह कुछ ऐसे रहस्‍य हैं , जिनका पता विज्ञान नहीं लगा सका है।

1981 से अबतक पच्‍चीस तीस हजार जन्‍मकुंडलियों के विश्‍लेषण के बाद ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ का दावा है कि समय समय पर आनेवाली मनुष्‍य की हर अच्‍छी भली परिस्थिति के पीछे उसके जन्‍मकालीन और गोचर के ग्रहों का हाथ होता है और इसे समझा और समझाया जा सकता है। जन्‍म के ग्रहों से उनके जीवन में आनेवाली विभिन्‍न संदर्भों की परिस्थितियों और उनके जीवन के उतार चढाव की जानकारी देने के लिए मैने नि:शुल्‍क सेवा शुरू की है ,

जो विवरण भेजे जा चुके हैं , उनके बारे में प्रत्‍येक रविवार को हमारे यहां से दिन 11 बजे से 1 बजे के मध्‍य इसी फोन पर जानकारी ली जा सकती है , हम प्रकृति से प्राप्‍त सुख दुख के संदर्भों और उसकी जीवन यात्रा के बारे में उन्‍हें जानकारी देने की कोशिश करेंगे। जबाब देते हुए लिखने की तुलना में मौखिक तौर पर बताना आसान है , इसलिए पिछले सप्‍ताह बहुत सारे पाठकों को उनकी  ही जानकारी देने में कामयाबी मिली , अभी कुछ दिनों तक यह सुविधा चलती रहेगी। अपने विवरण एस एम एस करने से पहले पिछले लेख को अच्‍छी तरह पढ लें।

समाज से अंधविश्‍वास को दूर करने का है हमारा कार्यक्रम

हमारे देश में तरह तरह के अंधविश्‍वास फैले हुए हैं , ताज्‍जुब है कि अंधविश्‍वासों के चक्‍कर में सिर्फ अनपढ , गरीब निम्‍न स्‍तरीय जीवन जीनेवाले ही नहीं हैं , बल्कि पढे लिखे और अमीर लोगों का तबका भी अंधविश्‍वासों से बाहर नहीं है। इसके चक्‍कर में कभी नवजात की बलि चढ़ जाती है , कभी बेबस स्‍त्री डायन बन जाती है , तो कभी सामान्‍य पुरूष महापुरूष। अक्‍सर पत्र पत्रिकाओं में हम इनके विरोध में खबरें प्रकाशित होती हैं , सरकारी और स्‍वयंसेवी संस्‍थाओं द्वारा विज्ञान के प्रचार प्रसार के कार्यक्रम चलते रहते हैं , पर सुधार की गति बहुत धीमी है। अर्थप्रधान युग में भविष्‍य के प्रति आशंका से अंधविश्‍वास और बढता जा रहा है। अंधविश्‍वास का मूल कारण अज्ञानता है , आग , वर्षा, बाढ , बिजली, रोग, भूकंप, चंद्रग्रहण , सूर्यग्रहण आदि घटनाओं के बारे में पर्याप्‍त जानकारी न होने से आदिम मानव के मध्‍य इन्‍हें लेकर अंधविश्‍वास था। पर जैसे जैसे रहस्‍यों का पर्दाफाश होता गया , अंधविश्‍वास समाप्‍त होता गया। देवी-देवता और आस्था से जुड़े कर्मकाण्डों मे भागीदारी गलत नहीं , पर समाज का अंध्‍विश्‍वासी होना इसके विकास में एक रूकावट है।

प्रकृति के सभी प्राणियों की तुलना में व्‍यक्ति की बनावट अलग होती है , इसलिए उसे जरूरत, सुरक्षा और सुविधा के लिए परिवार और समाज की जरूरत होती है , समाज को शक्ति देने के लिए समय समय पर उपलब्ध जानकारियों और तजुर्बों के आधार पर कुछ नियम बनाए जाते हैं। सामाजिक आचार संहिता व्यक्ति के स्वार्थ में कमी लाती है और व्‍यक्ति को संस्‍कारित करने में मदद करती है। पर ऐसा नहीं है कि इन संस्कारों को अपरिवर्तनशील मान लिया जाए। समाज में हो रहे परिवर्तनों के साथ पुराने नियम प्रासंगिक न होकर विकृतियाँ फैलाने वाले हो जाते हैं , ये नियम व्‍यक्ति को अंधविश्‍वासी बनाते हैं। तर्कशीलता का कवच पहनकर नए नियमों को समाविष्‍ट करके ही परम्परा को जीवंत रखा जा सकता है। नए विचार को प्रारम्भ में कड़ी भर्त्सना की जाती है , पर गहरे तर्क वितर्क के बाद इसे सार्वभौम सत्य समझ लिया जाता है और यह अंधविश्‍वास के खात्‍में की राह प्रशस्‍त करता है।

प्रकृति के रहस्‍यों की जानकारी के बाद बहुत सारे अंधविश्‍वास समाप्‍त होते चले गए , यदि आज समाज में कुछ अंधविश्‍वास प्रचलित हैं , तो इसकी वजह कुछ ऐसे रहस्‍य हैं , जिनका पता विज्ञान नहीं लगा सका है। बीमारी का इलाज भले ही मेडिकल साइंस के पास हैं , पर वह यह नहीं बता सकता कि कोई व्‍यक्ति बीमारी से ग्रस्‍त या अस्‍वस्‍थ क्‍यों है ? अधिकांश परिवार को परिवार नियोजन के कार्यक्रम का सहारा लेना पडता है , वहीं कुछ दंपत्ति डॉक्‍टरों के निरंतर इलाज के बावजूद बच्‍चे को जन्‍म देने में बाधाएं उपस्थित पा रहे हैं। कुछ आर्थिक मामले में स्‍वतंत्र हैं तो कुछ को जीवन में कठिन परीक्षा से गुजरना पड रहा है। किसी के बच्‍चे पढाई लिखाई में माता पिता का नाम रोशन कर रहे हैं , तो कुछ उनके लिए बोझ बने हुए हैं। सामान्‍य विद्यार्थी कैरियर में हर तरह से सफल हैं, तो मेधावी और सफल रहे विद्यार्थी दर दर की ठोकर खाने को मजबूर। इसी प्रकार कभी अच्‍छा भला चल रहा व्‍यवसाय अचानक दम तोडने लगता है , तो कभी साधारण व्‍यवसाय अचानक पनप जाता है। कभी अच्‍छे भले बच्‍चे आत्‍म हत्‍या को मजबूर हो जाते हैं , अच्‍छी भली बच्चियां दहेज लोभियों के चंगुल में फंस जाती है। भले ही विज्ञान इसके पीछे किसी नियम के होने की वास्‍तविकता से इंकार करे , पर 1981 से अबतक पच्‍चीस तीस हजार जन्‍मकुंडलियों के विश्‍लेषण के बाद ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ का दावा है कि समय समय पर आनेवाली मनुष्‍य की हर अच्‍छी भली परिस्थिति के पीछे उसके जन्‍मकालीन और गोचर के ग्रहों का हाथ होता है और इसे समझा और समझाया जा सकता है।

चिन्तनशील विचारक पाठकों, आपके मन में ज्योतिष से सम्बंधित कोई भी प्रश्न उपस्थित हो , सकारात्मक तार्किक बहस के लिए हमारे व्हाट्सप्प ग्रुप में आपका स्वागत है , क्लिक करें !


प्राचीन काल से ही फलित ज्योतिष को काल गणना का विज्ञान माना जाता रहा है। काफी ठोस नियमों के नहीं होने के बावजूद भी समाज में इसे कभी अंधविश्‍वास नहीं माना गया , क्‍योंकि इसका आधार ग्रहों नक्षत्रों के गणित पर आधारित है। पर इसमें कुछ कमजोरियां थी , जिसका निदान करने के बाद मनुष्‍य के जीवन में आनेवाली परिस्स्थितियों के बारे में जानकारी प्राप्‍त की जा सकती है। ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ के सारे सिद्धांतों की चर्चा एक बार में संभव नहीं है , पर इसके कुछ फार्मूले को डालकर मैने एक सॉफ्टवेयर विकसित किया है जिससे इस तरह के दो तरह के ग्राफ निकलते हैं ,
पहला ग्राफ आपके जीवन के उतार चढाव को समझाने में समर्थ है , ग्राफ काफी ऊपर हो तो मनमौजी वातावरण , मध्‍य में हो तो काम करने का वातावरण तथा नीचे हो तो निराशाजनक वातावरण देता है। हरा ग्राफ आपके परिस्थितियों की सूचना देता है , लाल यदि हरे से ऊपर हो तो प‍रिस्थितियों आपके नियंत्रण में होंगी , विपरीत स्थिति में आपको परिस्थितियों के हिसाब से चलना होता है।

दूसरा ग्राफ आपके जीवन के विभिन्‍न संदर्भों के बारे में प्रकृति से मिलनेवाले सहयोग की सूचना देता है। जिन संदर्भों का प्रतिशत बीस प्रतिशत के आसपास होगा , उससे संबंधित सुख प्राप्‍त करेंगे , दस प्रतिशत के आसपास होगा , तो उन संदर्भों में महत्‍वाकांक्षी होंगे , दो तीन प्रतिशत के आसपास होगा तो किसी न किसी कारण से उन संदर्भों से कष्‍ट प्राप्‍त करेंगे। इसके अलावे इस ग्राफ से विभिन्‍न संदर्भों से संतुष्टि और असंतुष्टि की जानकारी भी आपको मिल सकती है।



इसके अलावे छोटी छोटी अवधि में आने वाली खुशियों और कष्‍ट का आकलन भी गोचर के ग्रहों द्वारा संभव है , पर उसका प्रोग्रामिंग नहीं हो पाने से उसके आकलन में समय लगता है। सॉफ्टवेयर में अभी कुछ दिनों तक नियमित तौर पर काम चलता रहेगा और इस वर्ष के अंत तक हम बहुत हद तक अभी तक प्राप्‍त जानकारी को समाहित करने में कामयाब हो जाएंगे , पर अभी सिर्फ इन्‍हीं दो ग्राफों से किसी को भी उनकी प्रकृति और जीवनयात्रा के बारे में जानकारी दी जा सकती है, जो उन्‍हें खुद को समझने और अंधविश्‍वास से बचाने में मदद कर सकती है।  'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' भी समाज से अंधविश्‍वास को दूर करने के लिए पिछले चालीस वर्षों से सक्रिय है , विवाह के लिए जन्‍मकुंडली मिलाना आवश्‍यक नहीं , सूर्य और चंद्रग्रहण के प्रभाव का क्‍या है सच ? , मुहूर्त्‍त को लेकर लोगों के भ्रम  जैसी पोसट इसका प्रमाण हैं।

'गत्यात्मक ज्योतिष' आधारित सूत्रों पर कुंडली निर्माण, सटीक भविष्यवाणी, उचित परामर्श और समुचित उपचार के लिए संपर्क करें - 8292466723, gatyatmakjyotishapp@gmail.com

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हम सार्थक ढंग से बाबा अम्बेदकर जयंती मनाना सकते हैं !!!!!

हमारे देश में प्राचीन काल से जो दर्शन मौजूद है इसकी सबसे बडी शक्ति इसका लचीलापन है। कुछ भी विचार , जो ईश्वर, समाज या राजनीति से सम्बन्धित है, इसके दर्शन का अंग बन सकता है। सभी महापुरूषों के विचारों को सुनना , अमल करना यहां के लोगों का स्‍वभाव है। सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्र में तो हमारे देश ने सभी के अनुभवों से सीख ली ही है , धार्मिक क्षेत्र में भी देखा जाए तो हाल के सालों में न जाने कितने बाबाओं , कितनी माताओं को यहां के लोगों ने भगवान बना डाला है। सिर्फ आस्तिक ही नहीं , नास्तिक दर्शन भी आसानी से हिन्दू धर्म का अंग बन सकतें हैं यानि अपने अपने विचारों और भावनाओं के साथ हर प्रकार के लोगों का यहां स्‍वागत होता रहा है , उनके अनुसार समाज में परिवर्तन आता रहा है।

वैसे तो हमारे पास इतिहास का अवतारवाद का सिद्धांत हैं, जिसके अनुसार इतिहास एक दैवी योजना के तहत् चलता है। मानव जाति को हर प्रकार का कष्‍ट झेलते हुए उस समय तक निरंतर बने रहना होता है जब तक कोई अवतार न हो। पर अम्बेदकर का मानना था कि यदि समय की सही मांग को पहचानने वाले ज्ञान चक्षु हों, उसे सही मार्ग दिखाने का साहस एवं शौर्य हो तो एक महापुरूष द्वारा भी किसी भी युग का उद्धार हो सकता है। दैवी या सामाजिक शक्तियों को मानना और झेलना हमारी मजबूरी है , पर मनुष्य इतिहास के निर्माण का एक साधन है। डॉक्टर अम्बेदकर इस मामले में दूरदर्शी माने जा सकते हैं कि वे समझते थे कि समाज के लोगो के बीच जितनी सं‍तुलित आर्थिक स्थिति होगी, उतना ही देश में विकास हो सकता है। ऐसे में जल्‍द ही भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र बन सकता है। पर उनकी सोच का मतलब परिवर्तित हो गया , उन्‍हें संपूर्ण राष्‍ट्र का ना मान कर सिर्फ दलितों और पिछडो का मसीहा बना दिया।

ऐसा इसलिए क्‍योंकि अम्बेदकर ने भारत की जाति व्‍यवस्‍था को समझने के लिए अधिक श्रम और समय दिया । उनके हिसाब से आदिम समाज घुमन्तु कबीलों में बँटा समाज था, बाद में कुछ लोग गाँवों मे बस गए, किन्तु कुछ लोग घुमंतु बने रहे । कालांतर में एक समझौते के तहत किसी हमले की हालत में छितरे लोग, बसे लोगों के सुरक्षा कवच का काम और बसे हुए लोग उन्हे रहने को सीमा पर जगह और अपने मृत पशु देने लगें। भारत में यही छितरे लोग अछूत बन गए। प्राचीन वैदिक संस्कृति बलि की संस्कृति थी, नरमेध, अश्वमेध और गोमेध आदि यज्ञों में नर, अश्व, गो आदि की बलियां होती थीं और सब मिल कर सारा मांस आपस में बाँट लेते थे।

पर बुद्ध के मानवीय धर्म का समाज पर गहरा प्रभाव पड़ा.. बड़ी संख्या में राजाओं और आम जन ने ब्राह्मण धर्म को ठुकरा कर बुद्ध के सच्चे धर्म को अपना लिया.। ब्राह्मण संघर्षशील हो गए, देश में लगातार बौद्धो को हटाकर ब्राह्मण धर्म को पुनर्स्थापित किया जाने लगा। पर जनमामस में अहिंसा का भाव बैठ गया था जो कृषि आधारित समाज के लिये उपयोगी भी था। बौद्ध हिंसा के विरोधी होने के बावजूद ऐसे जानवर का मांस खा लेते थे जिसे उनके लिये मारा न गया हो। बौद्धो से भी दो कदम आगे निकलने के लिए ब्राह्मणों ने गोवध को सबसे बड़ा पाप घोषित कर दिया और गोमांस खाने वाले को अस्पृश्य , ऐसे में ब्राह्मण गोभक्षक से गोरक्षक बन गये। प्राचीन समझौते के तहत मृत जानवरों को ठिकाने लगाने का काम कर रहे छितरे लोगों के लिए मृत जानवरों का मांस खाना मजबूरी थी , इसलिए ये अस्पृश्य हो गये, इसकी शुरुआत अम्‍बेदकर ४०० ई. के आस पास का तय करते हैं।

अम्‍बेदकर आर्थिक सुधार का मॉडल नीचे से ऊपर की ओर रखना चाहते थे , वे सामाजिक ढांचे में दलितों को सम्मानजनक स्थान दिलाना चाहते थे। वे हिंदू समाज के आंतरिक सुधार को लेकर बहुत चिंतित थे। 1930 में गांधी जी द्वारा दलितों को हरिजन कहा जाना भी उन्‍हें अपमानजनक महसूस हुआ , न सिर्फ इसलिये कि दक्षिण भारत में मन्दिरों की देवदासियों के अवैध सन्तानो को हरिजन कहा जाता था, बल्कि इसलिये भी इस शब्द से दलित हिन्दू समाज की मुख्य धारा से अलग थलग दिखायी पडते थे। हिंदू या अन्‍य सम्प्रदायों से उनका कोई विद्वेष नहीं था। अम्बेदकर ने जब धर्म परिवर्तन का फैसला लिया तो उनको मनाने कई धर्माचार्य पहुंचे लेकिन अम्बेदकर ने सबको ठुकरा कर बौद्ध धर्म चुना था। शायद अम्बेदकर के मन में ये बात थी कि जिन दलितों ने अतीत में इस्लाम, इसाई और सिख धर्म अपनाया था समाजिक-आर्थिक रुप से उनमें कोई खास बदलाव नहीं आय़ा। जब एक हिंदू धर्माचार्य अम्बेदकर के पास हिंदू धर्म में ही बने रहने का आग्रह कर रहे थे तो अम्बेदकर ने उनसे पूछा कि क्या हिंदू समाज, शंकराचार्य के पद पर एक दलित को स्वीकार कर लेगा ?

इन दिनों महापुरूषों की जयंती भी जाति के आधार पर ही मनाई जाती है। बाबा अम्‍बेदकर भले ही संविधान के जरिये सबकी बराबरी की वकालत करते रहे मगर आज उनके नाम पर कोई भी राजनीति करने से नहीं चूक रहा। दलित अगर एकजुट हो किसी के पक्ष में मतदान कर दे तो सत्ता मिलनी तय है, पार्टियां दलितों का मसीहा क्‍यूं न बने ? सभी पार्टी अम्बेदकर के विचारों को ही पूरा करने का दंभ भरती है। इनके नाम पर सिर्फ जयंती मनाने , जुलूस निकालने या संस्‍थाओं , पुरस्‍कारों के नाम रखने और आरक्षण की राजनीति करने से कोई लाभ नहीं। दलितों के लिए हर प्रकार की सुविधाएं और उनकी आनेवाली पीढियों की प्रतिभाओं को विकास का सर्वोत्तम प्रबन्ध करके ही हम सार्थक ढंग से बाबा अम्बेदकर जयंती मना सकते हैं। तभी समाज में समता और समरसता बनी रह सकती है।

अपने पसंदीदा रंग से जानिए अपना भाग्‍य ....

रंग हमारे मन और मस्तिष्‍क को काफी प्रभावित करते हैं। कोई खास रंग हमारी खुशी को बढा देता है तो कोई हमें कष्‍ट देने वाला भी होता है। जिस तरह यदि हम प्रकृति के निकट हों , तो खुद को फायदा पहुंचाने वाले वस्‍तुओं की ओर हमारा ध्‍यानाकर्षण होता है , उन वस्‍तुओं का प्रयोग हम आरंभ कर देते हैं , उसी तरह 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' की मान्‍यता है कि कमजोर ग्रहों के प्रभाव को दूर करने के लिए जिस रंग का हमें सर्वाधिक उपयोग करना चाहिए , उस रंग को हम खुद पसंद करने लगते हैं और उस रंग का अधिकाधिक उपयोग करते हैं। इस कारण रंगों की पसंद के अनुसार भी किसी व्यक्ति की परिस्थितियों और स्वभाव के बारे में जानकारी प्राप्‍त की जा सकती है।

सफेद रंग पसंद करने वाले लोग बचपन में ही अपने माहौल में किसी न किसी प्रकार की कमजोरी को देखते हैं और कमजोरियों दूर करने के लिए मनोवैज्ञानिक रुप से परेशान रहते हैं , बचपन के व्यवहार में संकोच हावी होता है , हर समय इन्‍हें भय बना होता है कि कोई गलती न हो जाए। यही मनोवैज्ञानिक कमजोरी इनके जीवन के अन्य भागों में भी देखी जा सकती है। 'पूरी तैयारी और सावधानी करके ही काम करो’ की प्रवृत्ति के कारण काम की शुरुआत ही नहीं हो पाती , बहुत सारे काम विचाराधीन भी पड़े रहते हैं। जीवनभर निरंतर इन कमजोरियों को दूर करने के लिए ये सतर्क रहते हैं। अपने विचारों को कमजोर समझकर दूसरों के सामने रखने में संकोच करते हैं। इनके मन के आवेग में पर्याप्त ठहराव होता है और अपनी बातों को रखने के लिए उचित समय की तलाश करते हैं। ये मन से कभी आक्रामक नहीं होते , फलतः आपपर बाह्य आक्रमण होता है। ये रूठकर प्रतिरोधात्मक शक्ति का प्रदर्शन करते हैं।

हरा रंग पसंद करने वाले लोग किशोरावस्था में अपने माहौल को बहुत कमजोर पाते हैं , अध्ययन काल में विपरीत परिस्थितियों से गुजरते हैं । इनकी कठिनाइयां 12 वर्ष की उम्र से 18 वर्ष की उम्र तक बढ़ते हुए क्रम में बनी रहती हैं। बौद्धिक विकास या शिक्षा-दीक्षा के महत्व को समझने के बावजूद परिस्थितियों के विपरित होने से इनका कोई काम सही ढंग से नहीं हो पाता है , इस समय बाधाओं की निरंतरता बनी रहती है।  17 से 19 वर्ष की उम्र में भी इनके मनोबल को तोड़नेवाली कोई घटना घटती है । उस समय इनका आत्मविश्‍वास काम नहीं कर रहा होता है , भीड में पींछे पीछे रहने की आदत रहती है और जीवनभर  नेतृत्‍व क्षमता की कमी मौजूद होती है। इनके व्‍यक्तित्‍व में सेवा भावना होती है। कम उम्र में माहौल में आयी गडबडी इनके धैर्य और निर्णय लेने की शक्ति को बढाती है और इनके आगे के जीवन को संतुलित बनाने में भी मदद करती है। 

लाल रंग पसंद करने वाले लोगों के जीवन में युवावस्था के दौरान परेशानी उपस्थित रहती हैं , यूं तो इनकी समस्याएं 18 वर्ष के उम्र के बाद से ही आरंभ हो जाती हैं , पर 24 वर्ष की उम्र के बाद विपरीत परिणामों की निरंतरता से इनमें शक्ति साहस की कमी और संघर्ष करने की क्षमता कमजोर पड़ती है। 30 वर्ष की उम्र से पहले  ये भीतर से कुछ दब्बू होते हैं , चुस्त जीवनशैली से कोसों दूर इन्‍हें ग्रामीण या एकांतिक जीवन पसंद आता है , वृद्ध जैसा स्वभाव बना रहता है। जीवनभर व्‍यक्तित्‍व में हिम्मत की कुछ कमी बनी रहती है , पर ये लोगों के विश्‍वसनीय बने रहतें हैं । इन्‍हें परंपरागत नियमों पर विश्‍वास होता है , सरल जीवन पसंद होता है। 

नीला रंग पसंद करने वाले लोगों पर घरेलू उत्तरदायित्वों का भारी बोझ रहता है , बढती जिम्‍मेदारियों के साथ समय पर नौकरी या व्यवसाय में आगे बढने में दिक्कत आने से जीवन का मध्य खासकर 36 वर्ष से 42 वर्ष की उम्र तक का समय कष्टकर व्यतीत होता है , इस वक्त लोगों का कम सहयोग मिलता है। पारिवारिक सांसारिक मामलों का कष्ट बना होता है , इसलिए सांसारिक मामलों में रूचि कम होती है , इन्‍हें अपना जीवन नीरस महसूस होता है। 

नारंगी रंग पसंद करने वाले लोगों को किसी खास संदर्भ में निश्चिंत या लापरवाह रहने का बुरा फल कभी कभी जीवन में सामने आ जाया करता है। 48 वर्ष से 54 वर्ष की उम्र तक हर तरह की जवाबदेही बहुत बढ़ी हुई होती है। उम्र के ऐसे पड़ाव पर इतनी सारी जबाबदेहियों को सॅभाल पाने में तकलीफ होती है , प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण इनको अपना जीवन निरर्थक लगने लगता है, स्तर में बढोत्तरी के बावजूद 48 से 54 वर्ष की उम्र में ये खुद को सफल नहीं महसूस करते। परिस्थितियों की कुछ गडबडी 60 वर्ष की उम्र तक बनी होती है।

पीला रंग पसंद करने वाले लोग धार्मिक स्वभाव रखने वाले होते हैं , जीवनभर बहुतों को काम आते हैं । इन्‍हें परंपरागत नियमों पर पूरा विश्‍वास रहता है , पर सेवानिवत्ति के पहले अपनी जबाबदेहियों का निर्वाह कर पाने में असमर्थ रहते हैं , इस कारण उसके बाद इनके जीवन में कष्टकर परिस्थितियों की शुरूआत होती है। वृद्धावस्था में यानि 60 वर्ष की उम्र के बाद असफलताएं दिखाई देती हैं , इस समय इनका जीवन निराशाजनक बना रहता है , उम्र अधिक होने के कारण मानसिक कष्ट बहुत होता है , कमजोर शारीरिक मानसिक हालत के कारण किसी प्रकार के निर्णय लेने में दिक्कत आती है।

काले या स्‍लेटी रंग को पसंद करने वाले लोग जीवन में बहुत छोटी छोटी बातों में उलझे रहते  हैं , इनकी सोंच व्यापक नहीं बन पाती, इस कारण तरक्‍की में रूकावट आती है। मेहनत के हिसाब से कम सामाजिक महत्व प्राप्त करते हैं , जीवन में कभी कभी रहस्यमय ढंग से विपत्ति से घिर जाते हैं, इसका सामना करने की इनमें शक्ति नहीं होती , बहुत निरीह हो जाते हैं , पर जिस ढंग से अचानक समस्या आती है , उसी ढंग से तीन वर्ष के बाद उसका निराकरण भी हो जाता है। इनका अति वृद्धावस्था का समय यानि 72 वर्ष की उम्र के बाद का समय कष्‍टकर होता है। 
(बहुत दिनों से सबका पसंदीदा रंग नोट करने , ग्रहों के साथ उसका तालमेल बिठाने तथा उनकी परिस्थितियों पर ध्‍यान देने के बाद यह लेख लिखा गया है , आप भी अपने अनुभव साझा करें , तो हमें सुविधा होगी , पक्ष और विपक्ष दोनो में टिप्‍पणियां आमंत्रित हैं )

काश आई पी एस अफसर राहूल शर्मा को भी किसी का सहारा मिला होता !!!!

ज्‍योतिष के क्षेत्र में 20 वर्षों से अधिक के अध्‍ययन के बावजूद प्रतिदिन कुछ ग्रहों के आम जनजीवन पर पडनेवाले नए नए रहस्‍यों की जानकारी के मोह ने मुझे अभी तक ज्‍योतिष को प्रोफेशनल ढंग से नहीं लेने दिया , पर यत्र तत्र गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष से संबंधित लेखों के प्रकाशित होते रहने के कारण मुझसे सलाह के लिए मिलने या फोन करने वालों की कमी भी नहीं। एक डॉक्‍टर और एडवोकेट की तरह ही मुझसे संपर्क करनेवाले भी किसी न किसी समस्‍या से जूझ रहे होते हें।  ज्‍योतिष के व्‍यावहारिक स्‍वरूप को मजबूत बनाने के लिए लोगों के समक्ष उपस्थित होने वाली समस्‍याओं को समझना और विभिन्‍न ग्रहों के साथ उनका सहसंबंध स्‍थापित करते हुए शोध को आगे बढाना भी मेरे लिए आवश्‍यक है , इसलिए नई कुंडहलयों के साथ लोगों से मिलना आवश्‍यक भी है। इसलिए ग्रहों के प्रभाव की अभी तक की जानकारी के आधार पर समय निकालकर मैं अधिकांश लोगों को उनकी ग्रहस्थिति के आधार पर ज्‍योतिषीय परामर्श अवश्‍य दिया करती हूं।

वैसे तो हर कोई को जन्‍म लेने के बाद ही एक सा वातावरण नहीं मिलता है , कोई अमीर तो कोई गरीब या भिखारी के घर भी , कोई सुंदर और स्‍वस्‍थ , तो कोई कुरूप और अस्‍वस्‍थ या अपंग भी , कोई तेज दिमाग का , तो कोई कमजोर दिमाग और कोई  तो कोई मानसिक बीमारी के साथ जन्‍म लेता है। पूरे जीवन में भी कोई किसी संदर्भ में बडी तो कोई छोटी सफलता या असफलता से जूझता रहता है , पर इसे लेकर जनसामान्‍य कुछ खास परेशानी महसूस नहीं करता, क्‍यूंकि अपनी अपनी परिस्थिति के हिसाब से ही जीने की उसकी आदत बनी होती है ।  लेकिन बिना किसी प्रकार की गडबडी के अचानक किसी प्रकार की असामान्‍य परिस्थिति उनके जीवन में आ जाती है , तो लोगों को किसी अज्ञात शक्ति के प्रति आकर्षित होना स्‍वाभाविक होता है और इसलिए वे ज्‍योतिषी या किसी अन्‍य जानकार के पास जाते हैं।

हम सभी जानते हैं कि जहां जीवन है , वहां बदलाव है । प्रकृति में दिन है तो रात भी , अंधेरा है तो उजाला भी , वसंत है तो पतझड भी। पर अपने जीवन में सिर्फ सुख ही सुख की कामना करते हैं। कष्‍ट आते ही हमारी बेचैनी बढ जाती है , जबकि सुख का समय हमे जीवन में किताबी ज्ञान के सिवा कुछ नहीं देता , व्‍यवहारिक ज्ञान हम कष्‍ट के समय ही प्राप्‍त करते हैं। अपने पास आनेवाले अधिकांश लोगों को मैं अनुकूल समय का इंतजार करने की ही सलाह देती हूं ,  'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' के हिसाब से लोगों के जीवन में आनेवाली समस्‍याएं भी दो प्रकार की होती हैं , पहली उनके जन्‍म कालीन ग्रहों के हिसाब से आने वाली , यह सामान्‍य ढंग होती हैं , इसलिए कुछ दिनों , महीनों या वर्षों का इंतजार करना लोगों के लिए कठिन नहीं होता है। प्रकृति ने उस परिस्थिति के हिसाब से जीने के लिए उसके बॉडी की प्राग्रामिंग कर दी होती है।

पर समय समय पर आसमान में अलग अलग स्थिति और शक्ति के हिसाब से चल रहे ग्रहों के कारण कोई समस्‍या उपस्थित होती है , तो यह विशेष ढंग की होती है , कभी दो चार दिनों , तो कभी दो चार महीनों या कई कई वर्षों तक आनेवाली ये समस्‍या लोगों के व्‍यक्त्त्वि के बिल्‍कुल प्रतिकूल वातावरण तैयार करती है , इसे झेल पाना लोगों के लिए बहुत ही कठिन हो जाता है। इसलिए लोग तुरंत ही उससे छुटकारा प्राप्‍त करना चाहते हैं , पर उनके पास कोई साधन नहीं होता है। इस वक्‍त कितना भी हाथ पांव चलाएं , कोई फायदा नहीं दिखता , आगे भी उन्‍हें अंधेरा ही अंधेरा नजर आने लगता है ,  वैसी हालत में निराश शारीरिक या मानसिक तौर पर कमजोर हो जाते हैं , इसी वक्‍त आत्‍म हत्‍या करने तक की सोंच लेते हैं। 

पूरी दुनिया जानती है कि आज के प्रतियोगिता के दौर में सफल और असफल लोगों के मध्‍य भाग्‍य या संयोग की भूमिका कम नहीं , फिर भी आज समाज की जीवन शैली इतनी बिगड गयी है कि इन्‍हें इस दौरान कहीं से भी ढाढस के दो शब्‍द नहीं मिलते , दुनिया सफल लोगों के गुणगान में लगी होती है , असफल लोगों को जगह मिलना मुश्किल होता है। अपने पास आनेवाले ऐसे परेशान लोगों की नियमित काउंसलिंग करके मैं उन्‍हें गुमराह होने से बचाती हूं , अनेक उदाहरण हैं मेरे पास। इसमें से ही एक की चर्चा कल ललित शर्मा जी ने अपने पोस्‍ट में की थी , जिसमें वे भी शामिल थे। हमने अपने अध्‍ययन में पाया है कि आसमान में चल रहे प्रतिकूल ग्रह की खास स्थिति से दूर होते ही पुन: कोई न कोई उपाय निकलता है और वातावरण पूर्ववत हो जाता है। जो भी समस्‍याएं चल रही होती हैं , उनसे निजात मिल जाती हैं , भले ही इस दौरान उन्‍हें शारीरिक या मानसिक कष्‍ट के दौर से गुजरना पडा हो। इसलिए ऐसे समय में उन्‍हे सहारा देने  की आवश्‍यकता होती है , काश आई पी एस अफसर राहूल शर्मा को भी किसी का सहारा मिला होता !!!!