इंटरनेट दिवस : सावधानी बरतने का संकल्प

इंटरनेट की बदौलत इतनी बड़ी दुनिया एक छोटी दुनिया में बदल चुकी है। आज दुनिया में ४ अरब के लगभग लोग इंटरनेट का इस्तेमाल कर रहे हैं। ये आंकड़ा दुनिया की कुल आबादी का 51% से कुछ ज्यादा है। जबकि हमारे देश में ये आंकड़ा 4 करोड़ से ज्यादा ही है, 2016 में भारत में सब्सक्राइबर्स की संख्या मात्रा 39.15 करोड थी। पर आज भारत में लगभग हर किसी के पास स्मार्टफोन हैं जिसके जरिए वह पूरी दुनिया से जुड़ सकता है। एक आंकड़े के मुताबिक दुनिया में हर सेकेंड 30 लाख से ज्यादा मेल भेजे जाते हैं यानि आज के दौर में बिना इंटरनेट के सुचना का आदान प्रदान संभव ही नहीं। 

भारत में इंटरनेट का इतिहास 1986 में नैशनल रिसर्च नेटवर्क के लॉन्च के साथ शुरू हुई , जिसमे नेटवर्क को केवल शिक्षा और रिसर्च के लिए ही उपलब्ध कराया गया था। भारत सरकार और यूनाइटेड नेशन डेवलेपमेंट प्रोग्राम के सपोर्ट और आर्थिक सहायता के साथ ही इलेक्ट्रॉनिक्स विभाग ने नेटवर्क शुरू किया , जिसके बाद NICNet की शुरुआत 1988 में हुई। 15 अगस्त 1995 के दिन भारत की विदेश संचार निगम लिमिटेड ने भारत में आम जनता के लिए आधिकारिक तौर इंटरनेट को लॉन्च किया। तभी से वर्ल्ड वाइड वेब हमारी जिंदगी का एक हिस्सा बन गया, आज लगभग सभी के हाथ में मोबाइल फ़ोन का उपयोग हो रहा है।

समय के साथ इंटरनेट का उपयोग तेजी से बढ़ता जा रहा है , जिसके कारन इसकी सुविधा उपलब्ध करने वाली कंपनियों में होड़ मची हुई है। भारत में सबसे कम स्पीड 9.6 kbps के लिए वीएसएनएल को 5000 रुपये चुकाने पड़ते थे, जबकि अधिक स्पीड 128 kbps के लिए 30 लाख रुपये चुकाने पड़ते थे। आज उससे भी अधिक स्पीड के इंटरनेट की सेवाएं फ्री में मिल रही हैं। अब तक विडियो गेम्स, पॉर्न एडिक्ट, सोशल साइट एडिक्ट की बातें कहीं जा रही थीं । 'ब्लू व्हेल गेम' ने भी इंटरनेट में सक्रिय सैकड़ों किशोरों को मौत के मुँह में जाने को मजबूर किया है। पर वैज्ञानिक यह भी  मानते हैं कि इंटरनेट का ज्यादा इस्तेमाल दिमाग के एक खास हिस्से पर असर डालता है, जिसकी वजह से लोग मानसिक बीमारी के भी शिकार हो सकते हैं।

फिर भी इंटरनेट आज हर कोई यूज कर रहा है, चाहे जॉब की मजबूरी की वजह से या फिर मनोरंजन के लिए। इन समस्याओ से बचने के लिए विश्व भर में आज का दिन 'इंटरनेट सेल्फ केयर डे' के रूप में मनाया जा रहा है। आज का दिन यह संकल्प लेने का दिन है की इंटरनेट को हम सुविधा के तौर पर ही उपयोग करेंगे, किसी भी तौर पर इसे अपने जीवन पर हावी नहीं होने देंगे। हम अपने बच्चों को भी इनकी लत नहीं पड़ने देंगे और अधिक से अधिक लोगों को जागरूक करेंगे कि वे इंटरनेट का सीमित उपयोग करें। 

गणेश चतुर्थी या विनायक चतुर्थी विशेष


भारत त्योहारों का देश है और गणेश चतुर्थी उन्हीं त्योहारों में से एक है जिसे 10 दिनों तक बड़ी ही धूम-धाम से मनाया जाता है।  भारत में भगवान गणेश के जन्मदिन के इस उत्सव को उनके भक्त बेहद ही उत्साह के साथ मनाते हैं।  वैसे भी भारत में  नए या अच्छे काम की शुरूआत करने से पहले भगवान गणेश का पूजन किया जाना शुभ माना जाता है।  हिन्दू कैलेंडर के अनुसार गणेश चतुर्थी का पर्व भाद्रपद महीने में आता है यानि कि  हर साल यह त्योहार अगस्त या सितंबर के महीने पड़ता है। गणेश चतुर्थी का त्योहार 10 दिनों तक चलता है, ऐसा माना जाता है विर्सजन के बाद वह अपने माता-पिता देवी पार्वती और भगवान शिव के पास लौट जाते हैं।  इस साल गणेश चतुर्थी का यह पर्व 25 अगस्त से शुरू होकर 5 सितंबर तक चलेगा।  इन दिनों भगवान गणेश भक्त उन्हें हर रोज नए-नए पकवान और मिठाईयों का भोग लगाते हैं।

गणेश चतुर्थी या विनायक चतुर्थी का त्यौहार शुक्रवार, 25 अगस्त 2017 को देश-विदेश में रहने वाले हिन्दू लोगों द्वारा मनाया जाएगा। यह शुक्ल चतुर्थी से शुरू होकर अनंत चतुर्दशी पर समाप्त होगी । गणपति स्थापना और गणपति पूजा मुहूर्तऐसा माना जाता है कि भगवान गणेश का जन्म मध्याह्न काल के दौरान हुआ था इसीलिए मध्याह्न के समय को गणेश पूजा के लिये ज्यादा उपयुक्त माना जाता है। पहले भारतवर्ष में गणेश चतुर्थी भगवान गणेश के जन्म दिन के रूप में पुरे हिंदू समुदाय के द्वारा एक साथ पूरी श्रद्धा और समर्पण के साथ प्रतिवर्ष मनाया जाता था  । आजकल यह हिंदू समुदाय के लोगों द्वारा पूरी दुनिया में मनाया जाता है।

गणेश चतुर्थी का त्योहार आने से दो-तीन महीने पहले ही कारीगर भगवान गणेश की मिट्टी की मूर्तियां बनाना शुरू कर देते हैं। गणेश चतुर्थी वाले दिन लोग इन मूर्तियों को अपने घर लाते हैं. कई जगहों पर 10 दिनों तक पंडाल सजे हुए दिखाई देते हैं जहां गणेश जी की मूर्ति स्थापित होती हैं।  प्रत्येक पंडाल में एक पुजारी होता है जो इस दौरान चार विधियों के साथ पूजा करते हैं।  अनन्त चतुर्दशी के दिन श्रद्धालु-जन बड़े ही धूम-धाम के साथ सड़क पर जुलूस निकालते हुए भगवान गणेश की प्रतिमा का सरोवर, झील, नदी इत्यादि में विसर्जन करते हैं।विसर्जन के दौरान उनके भक्त ''गणपति बप्पा मोरया, पुग्चा वर्षा लोकर या" जिसका मतबल है गणपति बप्पा मोरया, अगले बरस तू जल्दी आ।

गणेश चतुर्थी के दिन चन्द्र-दर्शन वर्ज्य होता है। ऐसा माना जाता है कि इस दिन चन्द्र के दर्शन करने से मिथ्या दोष अथवा मिथ्या कलंक लगता है जिसकी वजह से दर्शनार्थी को कोई झूठा आरोप सहना पड़ता है। पौराणिक गाथाओं के अनुसार, भगवान कृष्ण पर स्यमन्तक नाम की कीमती मणि चोरी करने का झूठा आरोप लगा था। माना जाता है कि भगवान कृष्ण ने भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के दिन चन्द्रमा को देखा था जिसकी वजह से उन्हें मिथ्या दोष का श्राप लगा था । भगवान गणेश ने चन्द्र देव को श्राप दिया था कि जो व्यक्ति भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के दौरान चन्द्र के दर्शन करेगा वह मिथ्या दोष से अभिशापित हो जायेगा और झूठे आरोप से कलंकित हो जायेगा। मिथ्या दोष से मुक्ति के लिये गणेश चतुर्थी का व्रत कर चन्द्रमा को फल, फूल, दही का भोग लगाकर या हाथ में कोई फल लेकर चंद्र-दर्शन की परम्परा अनेक जगहों पर है।



२१ अगस्त २०१६ का पूर्ण सूर्य ग्रहण


सूर्य ग्रहण तब होता है, जब पृथ्वी और सूर्य के बीच चंद्रमा आ जाता है। सूर्य ग्रहण तीन प्रकार के होते हैं। पहला पूर्ण सूर्य ग्रहण होता है। जब चंद्रमा पूरी तरह से पृथ्वी को अपनी छाया में ले लेता तो इसे पूर्ण सूर्य ग्रहण कहते हैं। ऐसी स्थिति में सूर्य की किरणें धरती तक नहीं पहुंच पाती हैं और धरती पर अंधेरा छा जाता है। दूसरा ग्रहण है आंशिक सूर्य ग्रहण। इसमें चंद्रमा सूर्य के कुछ हिस्से को ढक लेता है। इस दौरान धरती के कुछ हिस्सों पर सूर्य नजर नहीं आता। दो सप्ताह पहले रक्षाबंधन के दिन खंडग्रास चंद्र ग्रहण हुआ था। चंद्र ग्रहण के दो सप्ताह बाद सूर्य ग्रहण होता है।

साल 2017 का दूसरा सूर्यग्रहण , जो पूर्ण सूर्य ग्रहण होगा, 21 अगस्त को दिखाई देगा। भारतीय समय के मुताबिक यह ग्रहण रात में 9.15 मिनट से शुरु होगा और रात में 2.34 मिनट पर खत्म होगा। यह ग्रहण यूरोप, उत्तर/पूर्व एशिया, उत्तर/पश्चिम अफ्रीका, उत्तरी अमेरिका में पश्चिम, दक्षिण अमेरिका, प्रशांत, अटलांटिक, आर्कटिक की ज्यादातर हिस्सों में दिखेगा. 99 सालों बाद अमेरिकी महाद्वीप में पूर्ण सूर्यग्रहण होने जा रहा है। अमेरिका में सुबह 10.15 मिनट से सूर्यग्रहण ऑरेगन के तट से दिखने लगेगा और दक्षिण कैरोलीना के तट पर दोपहर 2.50 बजे खत्म होगा. उत्तरी अमेरिका के सभी हिस्से में आंशिक सूर्यग्रहण देखा जा सकेगा।

पूरे विश्व में लाखों लोग सूर्य ग्रहण देखेंगे। जहां सूर्य ग्रहण दिखाई देगा, वहां लोग घर से बाहर निकलकर देख सकते हैं। जिन क्षेत्रों में सूर्य ग्रहण नहीं दिखाई देगा, वहां के लोग लाइव टेलिकास्ट के जरिए इसका दीदार करेंगे । इसके लिए कई एजेंसियां लाइव टेलिकास्ट करेंगी। अमेरिका की अंतरिक्ष एजेंसी नासा भी इसका लाइव टेलिकास्ट करेगी। नासा 12 जगहों से सूर्य ग्रहण की कवरेज करेगा। रिपोर्ट्स के मुताबिक एजेंसी रिसर्च प्लेन, गुब्बारे और सैटेलाइट के जरिए कवरेज करेगी। बताया जा रहा है कि नासा सूर्य ग्रहण का सीधा प्रसारण अमेरिकी समय के मुताबिक दोपहर में 12 बजे शुरू करेगा। जब ग्रहण लगेगा उस वक्त भारत में रात होगी। ऐसे में भारत में लोग सूर्य ग्रहण नहीं देख पाएंगे। भारत के लिए यह अमावस सोमवती होने के कारन और महत्वपूर्ण हो जाता है।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार सूर्यग्रहण के बाद पवित्र नदियों और सरोवरों में स्नान कर देवता की आराधना करनी चाहिए। स्नान के बाद गरीबों और ब्राह्मणों को दान देने की परंपरा है। हिन्दू मान्यता के अनुसार, सूर्यग्रहण में ग्रहण के दौरान कुछ भी खाने की अनुमति नहीं है, यह मान्यता भी प्रचलित है कि गर्भवती स्त्री को सूर्यग्रहण या चंद्रग्रहण नहीं देखना चाहिए. क्योंकि माना जाता है कि उसके दुष्प्रभाव से शिशु को प्रभावित कर सकता है। सूर्यग्रहण या चंद्रग्रहण के दौरान किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत को बिल्कुल मना किया जाता है. मान्यता है कि इस दौरान शुरु किया गया काम अच्छा परिणाम नहीं देता है। पर वैज्ञानिक मान्यता है कि सूर्यग्रहण के दौरान पृथ्वी के उत्तरी एवं दक्षिणी ध्रुव प्रभावित होते हैं. इसलिए यह अवधि ऋणात्मक मानी जाती है। इसके अलावा सूर्य से अल्ट्रावॉयलेट किरणें निकलती हैं जो एंजाइम सिस्टम को प्रभावित करती हैं, इसलिए सूर्यग्रहण के दौरान सावधानी बरतने की जरूरत है। 

ग्रहण के दौरान दो-चार घंटों के लिए पृथ्वी में सौर ऊर्जा के प्रवाह में बाधा  , खासकर जिस क्षेत्र में ग्रहण का प्रभाव अधिक पहुंचे , उस क्षेत्र के लिए कुछ ऋणात्मक प्रभाव डालने वाला हो सकता है , पर इसका ज्योतिषीय प्रभाव भी पड़ता है , 'गत्यात्मक ज्योतिष' इसकी पुष्टि नहीं करता। 

करवा चौथ का चांद रोहिणी नक्षत्र में ....

आसमान में पूर्वी क्षितीज पर सूर्योदय के दो घंटे पहले तथा पश्चिमी क्षितिज पर दो घंटे बाद दिखाई देने वाले शुक्र ग्रह को आप सभी ने अवश्‍य देखा होगा। इसकी चमक एवं शान अन्य ग्रहो से बिल्‍कुल अलग व निराली होती है। ज्योतिष में शुक्र को आकर्षण , प्रेम , विवाह और दाम्‍पत्‍य जीवन का प्रतीक ग्रह माना जाता है। शुक्र ग्रह मजबूत होने से व्यक्ति आकर्षक, सुंदर, मनमोहक, सुखी रहता है। साथ ही प्रेम-संबंध मजबूत और दाम्पत्य-जीवन सुखद होता है। शुक्र की दो राशियां वृष और तुला है।

कार्तिक महीने के कृष्ण पक्ष के चतुर्थी तिथि को शुक्र ग्रह के दोनो राशियों में से तुला में सूर्य तथा वृष में चंद्रमा होता है, जो क्रमश: आत्‍मा और मन का प्रतीक ग्रह है। वृष राशि में ही चंद्रमा के प्रिय रोहिणी नक्षत्र का वास है। क्‍या संयोग है कि हिंदू धर्म के अनुसार इस तिथि को सुहागिन और अविवाहित स्त्रियों के द्वारा करवा चौथ का लोकप्रिय निर्जला व्रत रखा जाता है। पूजा की विधि देशभर में भिन्‍न भिन्‍न हो सकती है, कथाएं भी अलग अलग हो सकती हैं, पर ग्रहों की स्थिति को देखते हुए माना जा सकता है कि सबका लक्ष्‍य एक है , अपनी मन और आत्‍मा को शुद्ध कर दाम्‍पत्‍य जीवन को अधिक से अधिक मजबूती देने की खुद की तपस्‍या , बुजुर्गों का आशीर्वाद और ईश्‍वर से प्रार्थना, चंद्रोदय के बाद चंद्र को अर्घ्‍य देने के बाद ही पति के हाथो अन्‍न जल ग्रहण कर व्रत तोडा जाता है।

इस वर्ष 18 अक्तूबर को रात 10 बजकर 48 मिनट पर चतुर्थी तिथि का प्रारंभ हो रहा है। यह 19 अक्तूबर को शाम सात बजकर 32 मिनट तक रहेगी। दोनो ही दिन चंद्रोदय चतुर्थी तिथि के अंतर्गत नहीं हो पाएगा, क्‍योंकि 19 अक्तूबर, बुधवार को चंद्रमा का उदय रात 9 बजे के आसपास होगा, समय में स्‍थान के हिसाब से कुछ परिवर्तन होते हैं। पर पूजा के वक्‍त शाम 5:43 से 6:59 तक चतुर्थी तिथि होगी , साथ ही पूजन के वक्‍त वृष लग्‍न का उदय होगा , जिसमें रोहिणी नक्षत्र का चंद्रमा मौजूद होगा , इसलिए यह त्‍यौहार 19 अक्‍तूबर को मनाया जा रहा है। 19 अक्‍तूबर को एक ग्रह मंगल को छोडकर सभी ग्रहों की स्थिति बहुत अच्‍छी है , इसलिए आनंदमय वातावरण में सारे कार्यक्रम संपन्‍न होंगे। 


पर मंगल की कमजोर स्थिति मेष और वृश्चिक लग्‍न वालों के स्‍वास्‍थ्‍य की, तुला और मीन लग्‍न वालों के धन की , कन्‍या और कुभ लग्‍न वालों के भाई-बंधु की , सिंह और मकर लग्‍नवाले के किसी सामान या संपत्ति की , कर्क और धनु लग्‍नवालों के पढाई लिखाई या संतान पक्ष की , मिथुन और वृश्चिक लग्‍नवालों के किसी झंझट की , मेष और कन्‍या लग्‍नवालों के रूटीन की, सिंह और मीन लग्‍नवालों के भाग्‍य की, कर्क और कुंभ लग्‍नवालों की प्रतिष्‍ठा की, मिथुन और मकर लग्‍न वालों के लाभ की , वृश और धनु लग्‍न वालों के खर्च की कुछ समस्‍या उपस्थित कर सकती है। पर मंगल की गडबड स्थिति के कारण प्रेम और दाम्‍पत्‍य के इस त्‍यौहार करवा चौथ में आपसी संबंध या प्रगाढता में थोडी कमी या दूरी महसूस करने वाले पति पत्‍नी वृष और तुला लग्‍न वाले पति-पत्‍नी होंगे।

सर्पधर नामक 13 वीं राशि

परिवर्तन प्रकृति का नियम है , इसलिए कोई भी क्षेत्र इससे अछूता नहीं होता। पर परिवर्तन की एक सीमा होती है , कहीं भी किसी परिवर्तन को एकबारगी नहीं लादा जा सकता। जबतक शास्‍त्र के रूप में विकसित किए गए सिद्धांतों के आधार पर ज्‍योतिषीय गणना में बडे स्‍तर पर गडबडी न दिखे , इसमें कोई बडा परिवर्तन किया जाना व्‍यर्थ है। पर इंग्लैंड की एक संस्था रॉयल ऐस्ट्रोनामिकल सोसाइटी द्वारा  विज्ञान कांग्रेस में घोषणा किए जाने से कि राशि 12 नहीं 13 है , यानी सूर्य और अन्य ग्रह13 राशि मंडल (तारा मंडल) से होकर गुजरता है। उनके हिसाब से इसका नाम ओफियुकस और भारतीय ज्‍योतिषियों के अनुसार सर्पधर तारामंडल रखा गया था , उनके द्वारा वृश्चिक और धनु के बीच आनेवाले इस तारामंडल को राशि मानने से पूरे ज्‍योतिषीय आधार को ही चुनौती मिल गयी है।



भारतीय ज्योतिष सूर्यसिद्धांत आदि ग्रंथों से आनेवाले संपात बिंदु को ही राशि परिवर्तन का विंदू मानता आया है।  पृथ्वी जिस मार्ग पर अपनी दैनिक गति से सूर्य के चारों ओर घूम रही है उसे क्रान्तिवृत कहा जाता है। इस  क्रांतिवृत्‍त को 30-30 डिग्री में बांटकर ही सभी राशियों की गणना की परंपरा है , भले ही उसकी पहचान के लिए आरंभिक दौर में तारामंडल का सहारा लिया जाता हो। इसलिए तारामंडल की स्थिति में परिवर्तन या उस पथ में आनेवाले किसी अन्‍य तारामंडल से ज्‍योतिषीय गणनाएं प्रभावित नहीं होती हैं।  पाश्चात्य ज्‍योतिषीय गणना प्रणाली ने खुद को विकसित मानते हुए  भारतीय गणनाप्रणाली   में प्रयोग किए जानेवाले संपात विंदू को राशि परिवर्तन का विंदू न मानकर तारामंडलों के परिवर्तन के हिसाब से अपनी राशि को परिवर्तित किया है। इस कारण भारतीय गणनाप्रणाली की तुलना में पाश्‍चात्‍य गणना प्रणाली में लगभग 23 अंशों यानी डिग्री का अंतर पड़ जाता है.।




अधिकांश भारतीय ज्‍योतिषियों ने इस पद्धति को अस्‍वीकार कर दिया है और हमारी गणनाएं तारामंडल के हिसाब से न होकर सूर्यसिद्धांत के संपात विंदू को राशि का प्रारंभिक विंदू मानकर होती है।  इसलिए  सर्पधर तारामंडल को पाश्‍चात्‍य ज्‍योतिष भले ही स्‍वीकार कर ले , क्‍यूंकि वह तारामंडल को ही राशि मानता आया है और सूर्य के झुकाव के फलस्‍वरूप होने वाले आकाशीय स्थिति के परिवर्तन को अपनी गणना में जगह देता आया है , पर भारतीय ज्‍योतिष में इस तारामंडल को स्‍वीकारे जाने की कोई वजह नहीं दिखती।  इसलिए यह पाश्‍चात्‍य वैज्ञानिकों को भले ही आकर्षित करे , हमारे लिए इस नए तारामंडल या तेरहवीं राशि का भी कोई औचिंत्‍य नहीं।