चंद्रग्रहण या सूर्यग्रहण का राशि पर प्रभाव

 

Grahan ka rashi par prabhav

आप दुनिया को जिस रूप में देख पाते हैं , उसी रूप में उसका चित्र उतार पाना मुश्किल होता है , चाहे आप किसी भी साधन से कितनी भी तन्‍मयता से क्‍यूं न कोशिश करें। इसका मुख्‍य कारण यह है कि आप हर वस्‍तु को देखते तो त्रिआयामी हैं , यानि हर वस्‍तु की लंबाई और चौडाई के साथ साथ उंचाई या मोटाई भी होती है , पर चित्र द्विआयामी ही ले पाते हैं , जिसमें वस्‍तु की सिर्फ लंबाई और चौडाई होती है। इसके कारण किसी भी वस्‍तु की वास्‍तविक स्थिति दिखाई नहीं देती है।

Surya grahan ke bare mein bataiye

इसी प्रकार जब हम आकाश दर्शन करते हैं , तो हमें पूरे ब्रह्मांड का त्रिआयामी दर्शन होता है । प्राचीन गणित ज्‍योतिष के सूत्रों में सभी ग्रहों की आसमान में स्थिति का त्रिआयामी आकलण ही किया जाता है , इसी कारण सभी ग्रहों के अपने पथ से विचलन के साथ ही साथ सूर्य के उत्‍तरायण और दक्षिणायण होने की चर्चा भी ज्‍योतिष में की गयी है। पर ऋषि , महर्षियों ने जन्‍मकुंडली निर्माण से लेकर भविष्‍य कथन तक के सिद्धांतों में कहीं भी आसमान के त्रिआयामी स्थिति को ध्‍यान में नहीं रखा है । 

इसका अर्थ यह है कि फलित ज्‍योतिष में आसमान के द्विआयामी स्थिति भर का ही महत्‍व है। शायद यही कारण है कि पंचांग में प्रतिदिन के ग्रहों की द्विआयामी स्थिति ही दी होती है। ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ भी ग्रहों के पृथ्‍वी के जड चेतन पर पडने वाले प्रभाव में ग्रहों की द्विआयामी स्थिति को ही स्‍वीकार करता है। इस कारण सूर्यग्रहण या चंद्रग्रहण से प्रभावित होने का कोई प्रश्‍न ही नहीं उठता ?

grahan ka rashi par prabhav

surya-chandra-grahan

हम सभी जानते हैं कि आसमान में प्रतिमाह पूर्णिमा को सूर्य और चंद्र के मध्‍य पृथ्‍वी होता है , जबकि अमावस्‍या को पृथ्‍वी और सूर्य के मध्‍य चंद्रमा की स्थिति बन जाती है , लेकिन इसके बावजूद प्रतिमाह सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण नहीं होता। इसका कारण भी यही है। आसमान में प्रतिमाह वास्‍तविक तौर पर पूर्णिमा को सूर्य और चंद्र के मध्‍य पृथ्‍वी और हर अमावस्‍या को पृथ्‍वी और सूर्य के मध्‍य चंद्रमा की स्थिति नहीं बनती है । यह तो हमें मात्र उस चित्र में दिखाई देता है , जो द्विआयामी ही लिए जाते हैं। इस कारण एक पिंड की छाया दूसरे पिंड पर नहीं पडती है। जिस माह वास्‍तविक तौर पर ऐसी स्थिति बनती है, एक पिंड की छाया दूसरे पिंड पर पडती है और इसके कारण सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण होते है।

 Chandra grahan ka rashi par prabhav

सूर्यग्रहण के दिन चंद्रमा सूर्य को पूरा ढंक लेता है , जिससे उसकी रोशनी पृथ्‍वी तक नहीं पहुंच पाती , तो दूसरी ओर चंद्रग्रहण के दिन पृथ्‍वी सूर्य और चंद्रमा के मध्‍य आकर सूर्य की रोशनी चंद्रमा पर नहीं पडने देती है । सूर्य और चंद्र की तरह ही वास्‍तविक तौर पर समय समय पर अन्‍य ग्रहों की भी आसमान में ग्रहण सी स्थिति बनती है , जो विभिन्‍न ग्रहों की रोशनी को पृथ्‍वी तक पहुंचने में बाधा उपस्थित करती है। पर चूंकि अन्‍य ग्रहों की रोशनी से जनसामान्‍य प्रभावित नहीं होते हैं , इस कारण वे सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण की तरह उन्‍हें साफ दिखाई नहीं देते। परंतु यदि ग्रहणों का प्रभाव पडता , तो सिर्फ सूर्य और चंद्र ग्रहण ही प्रभावी क्‍यूं होता, अन्‍य ग्रहण भी प्रभावी होते और प्राचीन ऋषियों , महर्षियों के द्वारा उनकी भी कुछ तो चर्चा की गयी होती ।

Surya grahan ka rashi par prabhav,

अन्‍य ग्रहों के ग्रहणों का किसी भी ग्रंथ में उल्‍लेख नहीं किए जाने से यह स्‍पष्‍ट है कि किसी भी ग्रहण का कोई ज्‍योतिषीय प्रभाव जनसामान्‍य पर नहीं पडता है। पर चूंकि सूर्य के उदय और अस्‍त के अनुरूप ही पशुओं के सारे क्रियाकलाप होते हैं , इसलिए अचानक सूर्य की रोशनी को गायब होते देख उनलोगों का व्‍यवहार असामान्‍य हो जाता है , जिसे हम ग्रहण का प्रभाव मान लेते हैं । लेकिन चिंतन करनेवाली बात तो यह है कि यदि ग्रहण के कारण जानवरों का व्‍यवहार असामान्‍य होता , तो वह सिर्फ सूर्यग्रहण में ही क्‍यूं होता ? चंद्रग्रहण के दिन भी तो उनका व्‍यवहार असामान्‍य होना चाहिए था। पर चंद्रग्रहण में उन्‍हें कोई अंतर नहीं पडता है , क्‍यूंकि अमावस्‍या के चांद को झेलने की उन्‍हें आदत होती है।

Chandra grahan ka prabhav in hindi

वास्‍तव में ज्‍योतिषीय दृष्टि से अमावस्‍या और पूर्णिमा का दिन ही खास होता है। यदि इन दिनों में किसी एक ग्रह का भी अच्‍छा या बुरा साथ बन जाए तो अच्‍छी या बुरी घटना से जनमानस को संयुक्‍त होना पडता है। यदि कई ग्रहों की साथ में अच्‍छी या बुरी स्थिति बन जाए तो किसी भी हद तक लाभ या हानि की उम्‍मीद रखी जा सकती है। ऐसी स्थिति किसी भी पूर्णिमा या अमावस्‍या को हो सकती है , इसके लिए उन दिनों में ग्रहण का होना मायने नहीं रखता। 

पर पीढी दर पीढी ग्रहों के प्रभाव के ज्ञान की यानि ज्‍योतिष शास्‍त्र की अधकचरी होती चली जानेवाली ज्‍योतिषीय जानकारियों ने कालांतर में ऐसे ही किसी ज्‍योतिषीय योग के प्रभाव से उत्‍पन्‍न हुई किसी अच्‍छी या बुरी घटना को इन्‍हीं ग्रहणों से जोड दिया हो। इसके कारण बाद की पीढी इससे भयभीत रहने लगी हो। इसलिए समय समय पर पैदा हुए अन्‍य मिथकों की तरह ही सूर्य या चंद्र ग्रहण से जुड़े सभी अंधविश्वासी मिथ गलत माने जा सकते है। यदि किसी ग्रहण के दिन कोई बुरी घटना घट जाए , तो उसे सभी ग्रहों की खास स्थिति का प्रभाव मानना ही उचित होगा , न कि किसी ग्रहण का प्रभाव।

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    ज्योतिष के अचूक उपाय

     

    Jyotish ke achuk upay

    Gold silver copper ring astrology in hindi

    गत्यात्मक ज्योतिष’ मानता है कि मनुष्य के समक्ष उपस्थित होनेवाली शारीरिक, मानसिक या अन्य प्रकार की कमजोरी का एक कारण उसके जन्मकाल के कमजोर ग्रह हैं और उस ग्रह के प्रभाव को मानव पर पड़ने से रोककर ही उस समस्या को कम किया जा सकता है। ज्योतिष शास्त्र में नए ढंग से कुंडली देखने का तरीका ईजाद करने के बाद गत्यात्मक ज्योतिष ने बुरे ग्रहों के अचूक उपाय के लिए निम्न रास्ते सुझाये हैं -

    1. समय-नियोजन – अंधेरे में चलनेवाले लगभग सभी राहगीर अपने गंतब्य पर पहुंच ही जाते हैं। बिना घड़ी पहने परीक्षार्थी परीक्षा दे ही सकते हैं। बिना कैलेण्डर के लोग वर्ष पूरा कर ही लेते हैं। किन्तु टॉर्च, घड़ी और कैलेण्डर के साथ चलनेवाले लोगों को ही यह अहसास हो सकता है कि उनका रास्ता कितना आसान रहा। वे पूरी अवधि में चिंतामुक्त रहें। इसी प्रकार का सहयोग ‘गत्यात्मक ज्योतिष’ आपको प्रदान करता है। ग्रहों के बुरे प्रभाव को परिवर्तित कर पाना यानि बुरे को अच्छे में तथा अच्छे को बुरे में बदल पाना असंभव है, किन्तु ग्रहों के बुरे प्रभाव को कम करने के लिए या अच्छे प्रभाव को और बढ़ा पाने के लिए परामर्श अवश्य दी जा सकती है।

    2. प्रभावी अंगूठी या लॉकेट – अमावस्या के दिन बिल्कुल कमजोर रहने वाला चंद्रमा पूर्णिमा के दिन अपनी पूरी शक्ति में आ जाता है। आप अपनी मन:स्थिति को अच्छी तरह गौर करें, पूर्णिमा और अमावस्या के वक्त आपको अवश्य अंतर दिखाई देगा। पूर्णिमा के दिन चांदी को पूर्ण तौर पर गलाकर एक छल्ला या लॉकेट तैयार कर पहनने से उनमे चंद्रमा की सकारात्मक शक्ति आती है, जिसका पहननेवाले पर अच्छा प्रभाव पडता है, जिससे व्यक्ति के मनोवैज्ञानिक क्षमता में वृद्धि होती है । हमारे यहाँ ये अंगूठियॉ उस मुहूर्त्त में बनवायी जाती हैं, जब कई ग्रहों का शुभ प्रभाव पृथ्वी के उस स्थान पर पड़ रहा हो, जिस स्थान पर वह अंगूठी बनवायी जा रही हो। दो घंटे के उस विशेष लग्न का चुनाव कर अंगूठी को अधिक प्रभावशाली बनाया जाता है।

    jyotish ke achuk upay

    3. रंगो का चुनाव – ‘गत्यात्मक ज्योतिष’ ग्रहों के प्रभाव को कम या अधिक करने के लिए कलर थेरेपी के महत्व को स्वीकार करता है। यह तथ्य सर्वविदित है कि विभिन्न पदार्थों में रंगों की विभिन्नता का कारण किरणों को अवशोषित और उत्सर्जित करने की शक्ति है। इस आधार पर सफेद रंग की वस्तुओं का चंद्र, हरे रंग की वस्तुओं का बुध, लाल रंग की वस्तुओं का मंगल, चमकीले सफेद रंग की वस्तुओं का शुक्र, तप्त लाल रंग की वस्तुओं का सूर्य, पीले रंग की वस्तुओं का बृहस्पति और काले रंग की वस्तुओं का शनि के साथ संबंध होने से इंकार नहीं किया जा सकता। रंगो का उपयोग आप विभिन्न रंग के रत्न के साथ ही साथ वस्त्र धारण से लेकर अपने सामानों और घरों की पुताई तक और विभिन्न प्रकार की वनस्पतियों को लगाकर प्राप्त कर सकते हैं। 

    4. संगति का प्रभाव – हम संगति के महत्व के बारे में हमेशा ही कुछ न कुछ पढ़ते आ रहें हैं। यहॉ तक कहा गया है -----`संगत से गुण होत हैं, संगत से गुण जात´। गत्यात्मक ज्योतिष भी संगति के महत्व को स्वीकार करता है। एक कमजोर ग्रह या कमजोर भाववाले व्यक्ति को मित्रता, संगति, व्यापार या विवाह वैसे लोगों से करनी चाहिए, जिनका वह ग्रह या वह भाव मजबूत हो। यदि एक बालक का जन्म अमावस्या के दिन हुआ हो, तो उन कमजोरियों के कारण, जिनका चंद्रमा स्वामी है, बचपन में बालक का मनोवैज्ञानिक विकास सही ढंग से नहीं हो पाता है और बच्चे का स्वभाव कुछ दब्बू किस्म का हो जाता है, उसकी इस स्थिति को ठीक करने के लिए बालक की संगति पर ध्यान देना होगा। पूर्णिमा के आसपास जन्म लेने वाले बच्चों की उच्छृंखलता को देखकर उनके बाल मन का मनोवैज्ञानिक विकास भी कुछ अच्छा हो जाएगा। ऐसा ही अन्य ग्रहों और भावों के साथ भी होता है।

    5. दान का महत्व – इसके अलावे ग्रहों के बुरे प्रभाव को कम करने के लिए हमारे धर्मशास्त्रों में हर तिथि पर्व पर स्नानादि के पश्चात् दान करने के बारे में बताया गया है। अपनी कुंडली के अनुसार ही उसमें जो ग्रह कमजोर हो, उसको मजबूत बनाने के लिए दान करना चाहिए। जातक का चंद्रमा कमजोर हो, तो अनाथाश्रम को दान करना चाहिए, खासकर 12 वर्ष से कम उम्र के अभावग्रस्त और जरुरतमंद बच्चों को दिए जानेवाले दान से उनका काफी भला होगा। जातक का बुध कमजोर हो तो उन्हें विद्यार्थियों को या किसी प्रकार के रिसर्च कार्य में लगे व्यक्ति को सहयोग देना चाहिए। जातक का मंगल कमजोर हो, तो उन्हें युवाओं की मदद और कल्याण के लिए कार्यक्रम बनाने चाहिए। जातक का शुक्र कमजोर हो तो उनके लिए कन्याओं के विवाह में सहयोग करना अच्छा रहेगा। सूर्य कमजोर हो तो प्राकृतिक आपदाओं में पड़नेवालों की मदद की जा सकती है। बृहस्पति कमजोर हो तो अपने माता पिता और गुरुजनों की सेवा से लाभ प्राप्त किया जा सकता है। शनि कमजोर हो तो वृद्धाश्रम को दान करें या अपने आसपास के जरुरतमंद अतिवृद्ध की जरुरतों को पूरा करने की कोशिश करें।

    6. पेड़-पौधों की भूमिका – प्राचीनकाल से ही पेड़-पौधें का मानव विकास के साथ गहरा संबंध रहा है। यदि जातक का चंद्रमा कमजोर हो, तो उन्हें तुलसी या अन्य छोटे-छोटे औषधीय पौधे, बुध कमजोर हो तो उसे बिना फल फूलवाले या छोटे छोटे हरे फलवाले पौधे, मंगल कमजोर हो तो उन्हें लाल फल-फूलवाले बड़े-बड़े पेड़, शुक्र कमजोर हो तो उन्हें सफेद फल-फूलवाले बड़े-बड़े पेड़, सूर्य कमजोर हो तो उन्हें तप्त लाल रंग के फल-फूलवाले बड़े-बड़े पेड़, बृहस्पति कमजोर हो तो उन्हें पीले फल-फूलवाले बड़े-बड़े पेड़, शनि कमजोर हो तो उन्हें सार्वजनिक स्थलों पर पीपल और बरगद के पेड़ लगाने चाहिए।

    7. प्रार्थना – कभी कभी हमारे सामने ऐसी समस्याएं आ जाती है, जिसे हम न तो खुद और न ही दूसरों से हल करवा पाते हैं, उस समय एक सर्वशक्तिमान की याद अवश्य आ जाती है, जिसके सामने हम प्रार्थना करने लगते हैं। ऐसा माना जाता है कि प्रार्थना में अद्भुत शक्ति होती है और इसके जरिए हम प्रभु या प्रकृति से संबंध बना लेते हैं। जहां धार्मिक और आध्यात्मिक रूचि रखने वाले व्यक्ति प्रतिदिन प्रार्थना करते हैं, वहीं सांसारिक या व्यस्त रहने वाले व्यक्ति विपत्ति के उपस्थित होने पर अवश्य ईश्वर की प्रार्थना किया करते हैं। प्रार्थना के सफल होने के लिए ईश्वर के प्रति समर्पित होने के साथ साथ अपने अहंकार का त्याग और मन की निश्छलता की आवश्यकता होती है। अपने या अपनों के लिए की गयी प्रार्थना भी ग्रहों के प्रभाव को कम करने में सहायक होती है। 



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      शादी लव मैरिज होगी या अरेंज ?

       

      Love marriage hone ke sanket

      आज के परिवेश में बच्‍चों के पालन पोषण में अभिभावकों की बढती उदारता से बच्‍चे न सिर्फ स्‍वतंत्र , वरन उच्‍छृंखल भी हो गए हैं। इस कारण अपने दोस्‍तों के साथ उनके व्‍यवहार में काफी खुलापन आ गया है , जिसको देखते हुए पुराने ख्‍यालात के अभिभावक अक्‍सर परेशान हो जाते हैं। यही कारण है कि आजकल सयाने बेटे बेटियों की कुंडलियों को लेकर आनेवाले अभिभावकों का एक सामान्‍य सा प्रश्‍न हो गया है कि उनके बच्‍चे की कुंडली में लव-मैरिज होने के संकेत है या नहीं ?

      Love marriage hone ke lakshan

      इस प्रश्‍न का जवाब देने के लिए कुंडली के सप्‍तम भाव पर ही ध्‍यान दिया जा सकता था , क्‍योंकि परंपरागत ज्‍योतिष में यही भाव पति , पत्‍नी , घर गृहस्‍थी और दाम्‍पत्‍य जीवन से लेकर प्‍यार और रोमांस तक के बारे में बतलाता है। यही सोंचकर मैने प्रेम विवाह करने वाले अनेको लोगों की कुंडलियों का परंपरागत ढंग से विवाह करनेवालों की कुंडलियों के साथ तुलनात्‍मक अध्‍ययन करने में काफी समय जाया किया , पर फल वही ढाक के तीन पात।

      वैवाहिक मामले 

      love marriage hone ke sanket kyon nahi milta ?

      लव-मैरिज होने के संकेत ढूँढने में काफी माथापच्‍ची में कुछ दिन व्‍यतीत होने और किसी निष्‍कर्ष पर न पहुंच पाने से मैं कुछ परेशान ही थी कि अचानक एक काफी बुजुर्ग महिला की कुंडली मेरे पास पहुंची , जिन्‍होने प्रेम विवाह किया था और उस विवाह के कारण उन्‍हें वर्षों तक बहुत ही दर्दनाक परिस्थितियों से गुजरना पडा था।

       कुछ दिनों तक अपने दोनो परिवारों और समाज से बहिष्‍कृत होने के बाद जब वह ससुराल में रहने लगी थी तो उनपर चोरी तक का इल्‍जाम लगाया गया था। उक्‍त महिला की जन्‍मकुंडली में प्रेम विवाह के कारण उत्‍पन्‍न होने का यह संघर्ष दिखायी पड रहा था। मुझे इस बात पर आश्‍चर्य हुआ कि जब उनकी कुंडली में प्रेम विवाह स्‍पष्‍ट दिखाई पड रहा है , तो अन्‍यों में लव-मैरिज होने के संकेत क्‍यों नहीं दिखाई दे रहे ?
      love marriage hone ke lakshan

      love marriage hoga ya arranged marriage

      पर तुरंत बाद ही इसका रहस्‍य मेरी समझ में आ ही गया , वह यह कि 20-25 वर्ष पहले के सामाजिक और पारिवारिक स्थिति में विवाहपूर्व प्रेम मानो एक तरह का अपराध ही था और प्रेम विवाह तो बहुत ही असामान्‍य तरह की घटना होती थी । यहां तक कि विवाह तय होने के बाद भी युवक युवतियों को एक दूसरे से मिलने की सख्‍त मनाही होती थी। बहुत उन्‍नत विचारों वाले परिवार में ही युवा अपने जीवन साथी को देख पाते थे , अन्‍यथा अधिकांश जगहों पर विवाह के बाद ही अपने जीवनसाथी की एक झलक तक मिलती थी। 

      love marriage hone ke sanket

      मुझे याद आया , जब मैं कालेज में पढ ही रही थी , अपने कालेज के एक सीनियर के प्रेम की बात उसके परिवारवालों के द्वारा स्‍वीकार नहीं किए जाने पर उन्‍होने छुपकर कोर्ट में विवाह कर लिया था तो दोनो ही परिवार के लोग इसे पचा नहीं सके थे और लगभग दस वर्ष तक उन्‍हें अपने परिवारवालों से मिले जुले बिना ही काटनी पडी थी , जबकि दोनो पढे लिखे और भौतिकी के लेक्‍चरर थे और उन्‍होने सोंच समझकर ही निर्णय लिया था। हां, स्‍वजातीय या अपने किसी परिचित के संतान होने पर एक दो प्रतिशत से भी कम मामलों में ही सही, प्रेम करनेवालों की सुन ली जाती थी और उन्‍हें खुशी खुशी वैवाहिक बंधन में बंधने की स्‍वीकृति मिलती थी।

       prem Vivah ke upay

      पर आज प्रेम विवाह या परिवार द्वारा आयोजित किए जानेवाले विवाह में कोई अंतर नहीं रह गया है। यदि युवा किसी से प्रेम भी करते हैं तो भले ही कुछ दिन इंतजार करना पडे , पर अपने अपने अभिभावकों को विश्‍वास में ले ही लेते हैं और आखिर में उनकी रजामंदी से प्रेम विवाह को अभिभावक के पसंदीदा विवाह में बदल ही दिया जाता है। सारे नाते रिश्‍तेदारों के मध्‍य उत्‍सवी माहौल में न सिर्फ उनका विवाह ही करवाया जाता है , वरन् उनके प्रेम का कोई गलत अर्थ न लगाते हुए उनके चुनाव की प्रशंसा भी की जाती है। आज के माहौल को देखते हुए प्रेम विवाह के उपाय निकलने की जरूरत नहीं। 

      यदि परिवारवालों की पसंद के अनुसार भी विवाह हो रहा हो , तो भी विवाह पूर्व युवकों और युवतियों को एक दूसरे से मिलने और एक दूसरे को समझने की पूरी स्‍वतंत्रता मिल ही जाती है। इस कारण उनके मन में न तो कोई संदेह होता है और न ही अनिश्चितता । अब इस स्थिति में इन दोनो प्रकार के विवाह को परिभाषित करने के लिए क्‍या कोई विभाजन रेखा खींची जा सकती है ? यही कारण है कि हमें आजकल के युवकों और युवतियों की जन्‍मकुंडली में भी इस बात का कोई संकेत नहीं दिखाई देता है कि जातक प्रेम विवाह करेंगे या अरेंज्‍ड ? आज के माहौल को देखते हुए प्रेम विवाह के उपाय निकलने की जरूरत नहीं। 

      ज्योतिष में हुए नए रिसर्च, गत्यात्मक ज्योतिष के बारे में अधिक जानने के लिए ये लेख अवश्य पढ़ें  ------

      'गत्यात्मक ज्योतिष' आधारित सूत्रों पर सिर्फ चन्द्रमा और मंगल ही नहीं, वर-वधू के जन्मकालीन सभी ग्रहों के आधार पर किये जानेवाले कुंडली मिलान के लिए संपर्क करें - 8292466723,  gatyatmakjyotishapp@gmail.com 

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        ग्रहों की गति से कुंडली देखने का तरीका

         

        Kundli dekhne ka tarika in hindi

        गणित ज्योतिष के अद्भुत सूत्र नामक लेख में सौरमंडल में ग्रहों की विभिन्न गतियों की चर्चा की गयी है और यह भी बताया गया कि ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ किसी प्रकार की भविष्‍यवाणी करने के लिए ग्रहों की गति पर ही आधारित है। पृथ्‍वी को स्थिर मान लेने से उसके सापेक्ष ग्रहों की गति में प्रतिदिन भिन्‍नता देखी जाती है।

        पृथ्‍वी के जड चेतन या अन्‍य प्रकार की घटनाओं के खास व्‍यवहार का कारण ग्रहगति की ये विभिन्‍नता ही है। 40 वर्षों तक विभिन्‍न ग्रहों की विभिन्‍न गतियों का पृथ्‍वी पर पडनेवाले प्रभाव को देखते हुए ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ निम्‍न निष्‍कर्ष पर पहुंचा है ....

        Kundli dekhne ka tarika in hindi



        kundli dekhne ka tarika

         (How to read Janam kundali in Hindi)

        1. अति‍शीघ्री गति ... ग्रह जब अतिशीघ्री होते हैं तो उन्‍हें अत्‍यधिक गत्‍यात्‍मक शक्ति संपन्‍न माना जाता है । 'गत्यात्मक ज्योतिष' ऐसे ग्रहों को 80 से 100 प्रतिशत गत्यात्मक शक्ति देता है, क्योंकि  ये अनायास सुख और सफलता देनेवाले ग्रह होते हैं , जिसके कारण लोग निश्चिंत या लापरवाह स्‍वभाव के हो जाते हैं। जन्मकुंडली में चन्द्रमा सूर्य से सप्तम भाव में स्थित हो तो इसकी गत्यात्मक शक्तिअधिकतम होती है, मंगल, बृहस्पति और शनि सूर्य के साथ हो तो गत्यात्मक शक्ति अधिकतम होती है , बुध और शुक्र सूर्य से निकटतम डिग्री में हो और प्रतिदिन 1 डिग्री से अधिक की गति में हों तो उनकी गत्यात्मक शक्ति अधिकतम होती है। लोगों के जो ग्रह अतिशीघी हो उनसे संबंधित संदर्भ और उनका गत्‍यात्‍मक दशाकाल निश्चिंति भरा होता है। 

        2. शीघ्री गति ... ग्रह जब शीघ्री होते हैं तो उन्‍हें भी गत्‍यात्‍मक शक्ति संपन्‍न माना जाता है ।  'गत्यात्मक ज्योतिष' ऐसे ग्रहों को 60 से 80 प्रतिशत गत्यात्मक शक्ति देता है, क्योंकि ये थोडी मेहनत से अधिक सफलता देनेवाले ग्रह होते हैं , जिसके कारण लोग कम मेहनत हो जाते हैं। जन्मकुंडली में चन्द्रमा सूर्य के त्रिकोण में स्थित हों तो गत्यात्मक शक्ति अच्छी होती है, मंगल, बृहस्पति और  शनि  सूर्य से अगल बगल की राशि में स्थित हों तो गत्यात्मक शक्ति अच्छी होती है , बुध और शुक्र सूर्य से थोड़ी दुरी पर और 1 डिग्री प्रतिदिन से अधिक की गति में हों तो उनकी गत्यात्मक शक्ति अच्छी होती है। लोगों के जो ग्रह शीघी हो उनसे संबंधित संदर्भ और उनका गत्‍यात्‍मक दशाकाल भी अच्‍छा ही होता है।

        3. सामान्‍य गति ... ग्रह जब सामान्‍य होते हैं तो उन्‍हें सामान्‍य गत्‍यात्‍मक शक्ति संपन्‍न माना जाता है ।  'गत्यात्मक ज्योतिष' ऐसे ग्रहों को 40  से 60 प्रतिशत गत्यात्मक शक्ति देता है, क्योंकि ये महत्‍वपूर्ण ग्रह होते हैं , जिसके कारण लोग समन्‍वयवादी दृष्टिकोण के हो जाते हैं। जन्मकुंडली में चन्द्रमा, मंगल, बृहस्पति और शनि सूर्य से केन्द्रगत हों तो सामान्य शक्ति के होते हैं।  बुध और शुक्र सूर्य से अधिकतम दूरी पर सहित हों तो सामान्य शक्ति के माने जाएंगे। लोगों के जो ग्रह सामान्‍य हो उनसे संबंधित संदर्भ और उनका गत्‍यात्‍मक दशाकाल महत्‍वपूर्ण होता है।

        4. मंद गति ... ग्रह जब मंदगति के होते हैं तो उन्‍हें कुछ कम गत्‍यात्‍मक शक्ति संपन्‍न माना जाता है ।  'गत्यात्मक ज्योतिष' ऐसे ग्रहों को 30 से 40 प्रतिशत गत्यात्मक शक्ति देता है, क्योंकि ये बहुत मेहनती ग्रह होते हैं , जिसके कारण लोगों का किसी भी क्षेत्र में बहुत अधिक ध्‍यान संकेन्‍द्रण होता है। जन्मकुंडली में चन्द्रमा सूर्य से तीसरे या ग्यारहवें स्थित हो, मंगल, बृहस्पति और शनि सूर्य से त्रिकोण में स्थित हों तो कम गत्यात्मक शक्ति के होते हैं।  बुध और शुक्र सूर्य के निकट होते हैं और उनकी गति १ डिग्री प्रतिदिन की होती है। लोगों के जो ग्रह मंद गतिशील हो उनसे संबंधित संदर्भ और उनका गत्‍यात्‍मक दशाकाल बहुत ही दवाबपूर्ण होता है।

        5. वक्री गति .... ग्रह जब वक्री गति में होते हैं तो उन्‍हें कम गत्‍यात्‍मक शक्ति संपन्‍न माना जाता है ।  'गत्यात्मक ज्योतिष' ऐसे ग्रहों को 10 से 30 प्रतिशत गत्यात्मक शक्ति देता है, क्योंकि ये कुछ कठिनाई और असफलता देनेवाले ग्रह होते हैं , जिसके कारण लोग थोडे चिडचिडे और निराश हो जाते हैं। जन्मकुंडली में चन्द्रमा सूर्य के दूसरे या बारहवें स्थित हो, मंगल , बृहस्पति और शनि सूर्य से छठे या आठवें  स्थित हो, तो इन्हे बहुत कम गत्यात्मक शक्ति दी जाती है। बुध और शुक्र सूर्य के साथ हो तथा वक्र गति में हों तो इन्हे बहुत कम गत्यात्मक शक्ति दी जाएगी।  जो ग्रह वक्री हो उनसे संबंधित संदर्भ और उनका गत्‍यात्‍मक दशाकाल कठिनाई भरा होता है।

        6. अतिवक्री गति ... ग्रह जब अतिवक्री होते हैं तो उन्‍हें बहुत कम गत्‍यात्‍मक शक्ति संपन्‍न माना जाता है ।  'गत्यात्मक ज्योतिष' ऐसे ग्रहों को 0 से 10 प्रतिशत गत्यात्मक शक्ति देता है, क्योंकि ये बहुत अधिक कठिनाई और तनाव देनेवाले ग्रह होते हैं , जिसके कारण लोग किंकर्तब्‍यविमूढ और अवसाद ग्रस्‍त हो जाते हैं। जन्मकुंडली में चन्द्रमा सूर्य के साथ हो, मंगल , बृहस्पति और शनि सूर्य से सप्तम हो तो इनकी गत्यात्मक शक्ति शुन्य के आसपास होती है। बुध और शुक्र वक्री गति के साथ सूर्य की डिग्री के आसपास होते हैं। लोगों के जो ग्रह अतिवक्री हो उनसे संबंधित संदर्भ और उनका गत्‍यात्‍मक दशाकाल पराधीन और लाचार होता है।

        kundli dekhne ka tarika

        (Gatyatmak Falit Jyotish ke sutra)

        यदि गत्‍यात्‍मक शक्ति की दृष्टि से यानि सुख के नजर से देखा जाए तो अतिशीघ्री ग्रह को सर्वाधिक मजबूत और अतिवक्री ग्रह को सर्वाधिक कमजोर माना जा सकता है , पर स्‍थैतिक शक्ति की दृष्टि से यानि कार्यक्षमता और महत्‍व की नजर से देखा जाए तो सामान्‍य और मंद ग्रह को सर्वाधिक मजबूत माना जा सकता है , क्‍योकि अधिकांश ग्रहों के शीघ्री या अतिशीघ्री होने के समय का माहौल खुशनुमा होता है और उस समय जो भी जातक जन्‍म लें , जीवनभर खुशनुमा माहौल प्राप्‍त करते हैं। इसी तरह अधिकांश ग्रहों के वक्री या अतिवक्री होने के समय का माहौल कष्‍टदायक होता है और उस समय जो भी जातक जन्‍म लें , जीवनभर कष्‍टप्रद माहौल प्राप्‍त करते हैं।

        इन दोनो के ही विपरीत , अधिकांश ग्रहों के सामान्‍य या मंद होने के समय का माहौल महत्‍वपूर्ण और दवाबपूर्ण होता है और उस समय जो भी जातक जन्‍म लें , जीवनभर महत्‍वपूर्ण और दवाबपूर्ण माहौल प्राप्‍त करते हैं। यही कारण है कि गत्यात्मक ज्योतिष के द्वारा की गई गणना सटीक होती है।  हमारे क्लाइंट्स की संतुष्टि का मुख्य कारण है।

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          जन्म कुंडली में राजयोग

          All Raj yoga in kundli 

          राजयोगों की विवेचना या उल्लेख करते हुए सामान्यतया ज्योतिषी या ज्योतिषप्रेमी अपने मस्तिष्क मे भावी उपलब्धियों की बहुत बड़ी तस्वीर खींच लेने की भूल करते हैं। चूंकि आज का युग राजतंत्र का नहीं है , कई लोग इसकी व्याख्या करते हुए कहते हैं कि राजयोग का जातक मंत्री , राज्यपाल , राष्ट्रपति , कमांडर , जनप्रतिनिधि या टाटा ,बिड़ला जैसी कम्पनियों का मालिक होना है। लेकिन जब इस प्रकार के योगों की प्राप्ति बहुत अधिक दिखलाई पड़ने लगी , यानि राजयोगवाली बहुत सारी कुंडलियॉ देखने को मिलने लगीं , तो ज्योतिषी फलित कहते वक्त कुछ समझौता करने लगे और राजयोग का अर्थ गजेटेड अफसरो से जोड़ने लगें हैं। 

          जन्म कुंडली में राजयोग

           जन्म कुंडली में राजयोग

          पर जिस राजयोग में एक राजा को पैदा होना चाहिए , उसमें एक मामूली दुकानदार पैदा हो जाता है और जब श्रीमती इंदिरा गॉधी जैसे सर्वगुणसंपन्न प्रधानमंत्री की कुंडली की व्याख्या करने का अवसर मिलता है , तो बड़े से बड़े ज्योतिषी उनकी कुंडली में बुधादित्य राजयोग ही उनके प्रघानमंत्री बनने का कारण बताते हैं , जबकि संभावनावाद के अनुसार 50 प्रतिशत से अधिक लोगों की कुंडली में बुधादित्य योग के होने की संभावना होती है। एक महान ज्योतिषी ने अपनी पुस्तक में लिखा है , बुधादित्य योग यद्यपि प्राय: सभी कुंडलियों में पाया जाता है , फिर भी इसे कम महत्वपूर्ण नहीं समझना चाहिए। इस तरह राजयोगों का विश्लेषण क्या असमंजस में डालनेवाला पेचीदा , अस्पष्ट और भ्रामक नहीं है ? इस तरह के पेचीदे वाक्य राजयोग के विषय में ही नहीं , वरन् ज्योतिष के समस्त नियमों के प्रति बुिद्धजीवी वर्ग की जो धारणा बनती है , उससे फलित ज्योतिष का भविष्य उज्जवल नहीं दिखाई पड़ता है। 

          Raj yoga in kundali check

          आज कम्प्यूटर का जमाना है , अपने समस्त ज्योतिषीय नियमों , सिद्धांतो को कम्प्यूटर में डालकर देखा जाए , कुंडली निर्माण से संबंधित गणित भाग का काम संतोषजनक है , परंतु फलित भाग बिल्कुल ही स्थूल पड़ जाता है , इससे किसी को संतुष्टि नहीं मिल पाती है। एक मामूली प्रथमिक स्कूल के शिक्षक और बसचालक की कुंडली में अनेक राजयोग निकल आते हैं और अमेरिका के राष्ट्रपति बिल क्लिंटन की कुंडली में एक दरिद्र योग का उल्लेख इस तरह होता है , मानो वह अति विशिष्ट व्यक्ति न होकर भिखारी हो। ऐसी स्थिति में आवश्‍यक है कि विभिन्‍न ग्रहों की स्थिति को देखते हुए आज के युग के अनुरूप राजयोगों की अलग से व्‍याख्‍या की जाए। ग्रहों की गत्यात्मक और स्थितिक शक्ति के हिसाब से ही आकलन किया जाये तो राजयोग की सही विवेचना हो पाएगी।

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