पञ्चाङ्ग पुराण

 

Hindu calendar in hindi

आज पूरे विश्व में जो कैलेंडर प्रचलित है, वह सौर केलिन्डर है, जिसका आधार पृथ्वी की वार्षिक गति है। पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा ३६५ दिन, कुछ घंटों में करती है, उसी हिसाब से हमारा केलिन्डर ३६५ दिनों का होता है। आप कैलेंडर की किसी भी डेट से सौरमंडल में पृथ्वी की स्थिति और इसके हिसाब से मौसम की जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। भारतीय पंचांग की किसी तिथि से आप सूर्य के अलावा चन्द्रमा की भी जानकारी प्राप्त कर कर सकते हैं।

माना जाता है कि हिंदू पंचांग बनाने की शुरुआत वैदिक काल में ही हुई थी। उस वक्त सूर्य व नक्षत्र पर पंचांग आधारित होता था। बाद में इसमें चन्द्रमा की गति भी जोड़ी गयी। भारतीय कैलेंडर को पञ्चाङ्ग इसलिए कहा जाता है क्योंकि इसमें एक तिथि के पाँच अंगों की जानकारी दी जाती है। ये अंग तिथि, वार, नक्षत्र, योग, करण हैं। इसके अतिरिक्त भी एक तिथि की कई जानकारी पंचागों में उल्लिखित होती हैं। पञ्चाङ्ग को समझने से पहले आइए भारतीय पंचांग की गणना को समझते हैं :-------

hindu calendar new year

Hindu calendar months in hindi

सौर वर्ष - सूर्य की संक्रांति से सौरमास का आरम्भ होता है। सूर्य की एक संक्रांति से दूसरी संक्रांति का समय सौरमास कहलाता है। सौर मास १५ अप्रैल से शुरू होता है, इनके नाम मेष, वृषभ, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्‍चिक, धनु, कुंभ, मकर, मीन हैं । १२ सौर मासों का एक सौर वर्ष होता है, यह 365 दिन का होता है।

भाग्य बारे में

चंद्र वर्ष  (Months according to hindu calendar )एक सौर वर्ष में १२ महीने होते हैं। चन्द्रमा १२ बार पृथ्वी की परिक्रमा करता है। इसलिए 12 महीनों का एक चंद्र-वर्ष होता है। पूर्णिमा के दिन, चंद्रमा जिस नक्षत्र में होता है उसी आधार पर १२ महीनों का नामकरण हुआ है, १२ चंद्र मासों के नाम - चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, अषाढ़, श्रावण, भाद्रपद, अश्विन, कार्तिक, अगहन, पौष, माघ और फाल्गुन। यह सौर वर्ष से 11 दिन 3 घटी 48 पल छोटा होता है, इसलिए तीन वर्षों में एक बार १३ महीने का साल बनाकर इसे सौर वर्ष के साथ कर दिया जाता है। बढे महीने को 'मलमास' या 'अधिमास' कहते हैं।

अयन - आसमान के ३६० डिग्री को दो अयन में बांटा गया है, उत्तरायण और दक्षिणायन। पृथ्वी के अपने अक्ष पर झुके होने से सूर्य सापेक्ष इसकी स्थिति बदलती है। इस कारण सूर्योदय से सूर्यास्त तक सूर्य कभी हमें उत्तर दिशा से घूमते हुए, कभी दक्षिण दिशा से घूमते हुए दिखाई देते हैं। 

Hindu calendar day today

राशि - भचक्र के ३६० डिग्री को ३०-३० डिग्री के १२ भाग में बाँटने से एक-एक राशि निकलती है। १२ राशियों का क्रम भी निश्चित होता है, मेष, वृषभ, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुम्भ और मीन राशि का नामकरण किया गया है। ढाई वर्षों तक शनि , एक वर्ष तक बृहस्पति, एक-एक महीने सूर्य तथा ढाई-ढाई दिन चन्द्रमा सभी राशियों में विचरता है। राशि और नक्षत्र को पहचानने के लिए तारामंडल के विभिन्न रूपों को आधार बनाया गया है।

पक्ष - महीने में एक बार सूर्य-चंद्र एक साथ अमावस को रहते हैं, फिर धीरे धीरे दूरी बनाते हुए पूर्णिमा को एक-दूसरे के सामने चले जाते हैं, 14 दिनो तक चन्द्रमा के सूर्य से बढ़ती हुई दूरी की इस यात्रा को शुक्ल पक्ष कहा जाता है। उसके बाद फिर पूर्णिमा से अमावस तक 14 दिनों का कृष्णपक्ष तय होते होते एक हिंदी मास का चक्र पूरा होता है, जो चन्द्रमा द्वारा पृथ्वी की परिक्रमा के समय पर आधारित है। शुक्ल पक्ष में चंद्र की कलाएँ बढ़ती हैं और कृष्ण पक्ष में घटती हैं। इसलिए पंचांग में आपको हर तिथि के सामने पक्ष जरूर लिखा मिलेगा।

Aaj ka panchang shubh muhurat

पंचांग के पांच अंग ये हैं :---

तिथि - एक दिन को तिथि कहा गया है जो सूर्य और चंद्र के डिग्री के अंतर उन्नीस घंटे से लेकर चौबीस घंटे तक का तय किया जाता है। तिथियों के नाम - पूर्णिमा (पूरनमासी), प्रतिपदा (पड़वा), द्वितीया (दूज), तृतीया (तीज), चतुर्थी (चौथ), पंचमी (पंचमी), षष्ठी (छठ), सप्तमी (सातम), अष्टमी (आठम), नवमी (नौमी), दशमी (दसम), एकादशी (ग्यारस), द्वादशी (बारस), त्रयोदशी (तेरस), चतुर्दशी (चौदस) और अमावस्या (अमावस) हैं


दिन इन 14 दिनों को फिर से दो भाग में बांटकर सात दिनों का सप्ताह बनाया गया है, सप्ताह के सातो वार(दिन) के नाम ग्रहों के नाम पर रखे गए हैं। हमारे पञ्चाङ्गों में हर वार एक दिन के सूर्योदय से दूसरे दिन के सूर्योदय पूर्व तक मन जाता है। आज कंप्यूटर के ज़माने के पंचागों में १२ बजे रात में ही वार के परिवर्तन की विवशता हो गयी है। वार सात हैं - रविवार, सोमवार, मंगलवार, बुधवार, गुरुवार, शुक्रवार और शनिवार। पंचांग में आपको हर तिथि के सामने वार जरूर लिखा मिलेगा।

नक्षत्र - पृथ्वी की परिक्रमा करते हुए चन्द्रमा २८ दिन में आसमान के ३६० डिग्री का सफर तय करता है। इस तरह प्रतिदिन चन्द्रमा १३ डिग्री २० मिनट की दूरी तय करता है, इस आधार पर ज्योतिष में आसमान को २७ भाग में बाँटकर एक नक्षत्र बनाया गया है। पञ्चाङ्ग में आपको हर तिथि के सामने वह नक्षत्र लिखा मिलेगा, जिसमे उस दिन चंद्रमा स्थित होगा।

करण - तिथि को दो भाग में बाँटने से एक करण निकलता हैं। इनकी संख्या ग्यारह है - बव, बालव, कौलव, तैतिल, गर, वणिज, विष्टि, शकुनि, चतुष्पाद, नाग और किस्तुघ्न।

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    कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन

     

    गीता में सही कहा गया है - कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन

    Bhagya aur karm par nibandh

    (ज्योतिष और भाग्य)


    भाग्‍य बडा या कर्म .. इस बात पर अबतक सर्वसम्‍मति का अभाव है। दोनो पक्ष के लोग अपनी अपनी बातों को सही साबित करने के लिए अलग अलग तर्क दिया करते हैं , अलग अलग कहानियां गढा करते हैं। कर्म को मानने वाले लोगों का मत है कि हम जैसे कर्म करते हैं , वैसा ही फल मिलता है।

    असफलता स्थिति में हमें अपने भीतर झांकना चाहिए कि चूक कहां हुई। लेकिन हम धागे, टोने-टोटकों , माथे या हाथों की लकीरों और जन्‍मकुंडलियों से भाग्य को समझने की कोशिश करते हैं, यदि कर्म अच्छे हैं तो भाग्य अपने आप अच्छा हो ही जाएगा। इस दुनिया राजा से रंक और रंक से राजा बनने के कहानियों की कोई कमी नहीं। 

    bhagya bada ki karm


    bhagya aur karm me antar

    दूसरी ओर भाग्‍य को मानने वाले लोगों का कहना है कि क्यों कुछ बच्‍चे मजबूत शरीर और कुछ कई बीमारियों के साथ या बिना हाथ पांव के जन्‍म लेते हैं। क्‍यूं कुछ बच्‍चे सुख सुविधा संपन्न परिवारों में तो कुछ का जन्‍म दरिद्रों के घर में होता है। कुछ अच्‍छे आई क्‍यू के साथ जन्‍म लेते हैं , तो कुछ अविकसित मस्तिष्‍क के साथ ही इस दुनिया में कदम रखते हैं। 

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    कुछ का पालन पोषण माता पिता और परिवार जनों के भरपूर लाड प्‍यार में होता है , तो कुछ इससे वंचित रह जाते हैं। जबकि इन बच्‍चों ने कोई गल्‍ती नहीं की है। इसी प्रकार बडे होने के बाद किसी को मनोनुकूल जीवनसाथी मिलते हैं,तो विवाह के बाद किसी का जीवन नर्क हो जाता है। किसी को अनायास संतान का सुख मिलता है , तो कई जीवनभर डॉक्‍टरों और देवी देवताओं के चक्‍कर काटते हैं। सचमुच विपरीत पक्ष वालों के लिए इसका जबाब दे पाना कठिन है।

    bhagya aur karm

    वास्‍तव में कार्य कारण के नियमों से पूरी प्रकृति भरी पडी है। इतनी बडी प्रकृति में हमने कोई भी काम बिना नियम के होते नहीं देखा है। सूर्य अपने पथ पर तो बाकी ग्रह उपग्रह भी अपने पथ पर चल रहे हैं। पृथ्‍वी पर स्थित एक एक जड चेतन अपने अपने स्‍वभाव के हिसाब से काम कर रहे हैं। हम जैसा कर्म करेंगे , वैसा फल मिलेगा ही । बिना संतुलन के दौडेंगे , तो गिरेंगे , गिरेंगे तो चोट लगेगी। 

    यदि कार्य और कारण का संबंध न हो तो हम कोई नियम स्‍थापित नहीं कर सकते। पर बालक ने जन्‍म लेते साथ जो पाया , वह उसके कर्म का फल नहीं। पर यहां भी तो कोई नियम काम करना चाहिए , आज विज्ञान माने या न माने , पर यह फल बिना किसी नियम के उसे नहीं मिल सकता।

    जबतक कर्म से अधिक फल की प्राप्ति होती रहती है , कोई भी भाग्‍य की ताकत को स्‍वीकार नहीं करता। उसे महसूस होता है कि उसे उसके किए का ही फल मिल रहा है। जिन्‍हें फल नहीं मिल रहा , वे कर्म ही सही नहीं कर रहें। पर जब कर्म की तुलना में प्रतिफल नहीं मिल पाता , लोग भाग्‍य की ताकत को महसूस करने लगते हैं। 

    bhagya aur karam ki kahani

    अपने आरंभिक जीवन में सफल रहनेवाले लोग इसे स्‍वीकार नहीं कर पाते , पर जैसे ही उनके जीवन में भी बिना किसी बुरे कर्म के विपत्तियां दिखाई पडती हैं , उन्‍हें भी भाग्‍य की ताकत महसूस होने लगती है। जीवन के प्रारंभिक दौर में असफलता प्राप्‍त करने वाले लोग तो जीवन में संतुलन बना भी लेते हैं , बाद में  भाग्‍य के कारण  असफलता प्राप्‍त करने वालों को अधिक कष्‍ट होता है। 

    भाग्‍य को जानने के लिए अक्‍सर लोग ज्‍योतिषियों से संपर्क करते हैं , पर प्रारब्‍ध की जानकारी ज्‍योतिषियों को भी नहीं होती। भिन्‍न भिन्‍न स्‍तर वाले परिवार में भी बच्‍चे का जन्‍म एक समय में हो सकता है यानि एक जन्‍म कुंडली होते हुए भी बच्‍चे का भाग्‍य अलग अलग हो सकता है। नक्षत्रों और ग्रहों पर आधारित ज्‍योतिष मात्र काल गणना का विज्ञान है। 

    जिस तरह घडी के समय के आधार पर अंधरे उजाले को देखते हुए दिनभर के और कैलेण्‍डर के आधार पर जाडे , गर्मी , बरसात के मौसम को समझते हुए वर्षभर के कार्यक्रमों को अंजाम दिया जाता है , उसी प्रकार हम जन्‍म कालीन ग्रहों के आधार पर अपने जीवन के उतार चढाव को समझकर तदनुरूप कार्यक्रम बना सकते हैं। 

    karm bhagya se bada hai

    जीवन में कभी समय आपके अनुकूल होता है तो कभी प्रतिकूल , प्रतिकूल समय में आपके अनुभव बढते हैं , जबकि अनुकूल समय में आपको अच्‍छे परिणाम मिलते हैं। अच्‍छे वक्‍त की जानकारी से आपका उत्‍साह, तो बुरे वक्‍त की जानकारी से आपका धैर्य बढता है। 

    किसी खास परिवार , देश या माहौल में जन्‍म लेना तो मनुष्‍य के वश में नहीं , इसलिए जीवन में जैसी जैसी परिस्थिति मिलती जाए , उसे स्‍वीकार करना हमारी मजबूरी है , पर आशावादी सोंच के साथ अच्छे कर्म किए जा सकते हैं और उनके सहारे अपने भाग्‍य को मजबूत बनाया जा सकता है।

    ज्योतिष और भाग्य - महीने के पहली तारीख को मिले तनख्‍वाह को कम या अधिक करना आपके वश में नहीं , पर उससे पूरे महीने या पूरे जीवन अच्‍छे या बुरे तरीके से जीवन निर्वाह करना आपके वश में है। आप पहले ही दिन महीनेभर क्‍या भविष्‍य के भी कार्यक्रम बनाकर नियोजित ढंग से खर्च कर सकते हैं या बाजार में अंधाधुंध खरीदारी कर , शराब पीकर , जुआ खेलकर महीने या भविष्‍य के बाकी दिनों को बुरा बना सकते हैं। इसलिए किसी खास परिस्थिति में होते हुए भी कर्म के महत्‍व से इंकार नहीं किया जा सकता।

    हां , जीवन में कभी कभी ऐसा समय भी आता है ,जब भाग्‍य के साथ देने से मित्रों , समाज या कानून का कुछ खास सहयोग आपको मिलने लगता है ,किसी तरह के संयोग से आपके काम बनने लगते हैं , तो कभी दुर्भाग्‍य से असामाजिक तत्‍वों को भी आपको झेलना पडता है। 100 वर्ष की लंबी आयु में कभी दस बीस वर्षों तक ग्रहों का खास अच्‍छा या बुरा प्रभाव हमपर पड सकता है। 

    उस भाग्य या दुर्भाग्य से खुद को फायदा दिलाने के लिए हमें आक्रामक या सुरक्षात्‍मक ढंग से जीवन जीना चाहिए। जैसे जाडे की सूरज की गर्मी को सेंककर हम खुद को गर्म रखते हैं या गर्मी की दोपहर के सूरज की ताप में बचने के किसी पेड़ की छाया में या वातानुकूलित घर में शरण लेते हैं। 

    कर्म भाग्य को बदल सकता है

    ज्योतिष और भाग्य - पर ध्‍यान रखें , जीवन में कभी भी हमारा मेहनत विफल नहीं होता । प्रकृति में प्रत्‍येक वस्‍तु का महत्‍व है , किसी में कुछ गुण हैं ,उसे विकसित करने की दिशा में कदम बढाए , आज या कल , उसकी कद्र होगी ही। कोई बीज तीन चार महीने में तो कोई दस बीस वर्ष में फल देना आरंभ करता है। हर पशु पक्षी का भी हर काम का अलग अलग समय है। 

    देखने में एक जैसे होते हुए भी हर मनुष्‍य अलग अलग तरह के बीज हैं , इन्‍हें फलीभूत होने के लिए भी अनुकूल परिस्थितियों की आवश्यकता होती है । आसमान में गोचर के ग्रह मनुष्‍य के सम्‍मुख विभिन्‍न परिस्थितियों का निर्माण करते हैं , जिसके आधार पर कर्म का सुंदर फल प्राप्‍त होता है। लोग भले ही इसे भाग्‍य का नाम दें , पर वह हमारे सतत कर्म का ही फल होता है।महाभारत में भी भगवान् कृष्ण ने कहा है , 'कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन'। 

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      जीने के १० सूत्र ……

       

      True life quotes in Hindi

        'वक्‍त की ताकत' को देखते हुए गत्यात्मक ज्योतिष ने दिए हैं जीने के १० सूत्र ……

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        Good quotes about life in hindi by Gatyatmak Jyotish

      1. विरले लोग ही ऐसे होते हैं , जिनके अधिकांश ग्रह मजबूत और जीवन भर का समय या जीवन का हर पक्ष सुखात्मक  हो ! 
      2. विरले लोग ही ऐसे भी होते हैं , जिनके अधिकांश ग्रह कमजोर  और  जीवन भर का समय या  जीवन का हर पक्ष दुःखात्मक हो  !
      3. आपके जन्‍मकालीन ग्रहों की चाल के हिसाब से बने इस ग्राफ के अनुसार आपका अच्‍छा और बुरा वक्‍त चलता रहता है , उसपर ध्‍यान न दें और नियमित तौर पर अपने कर्म करते रहें। 
      4. जीवनयापन के लिए अपनी रूचि के कर्म ढूंढें , क्‍योंकि जितनी पहचान आपको आपके रूचि के काम में मिल सकती है उतनी कहीं नहीं। 
      5. कर्म करने वालों को बुरे वक्‍त में यथोचित सफलता नहीं मिलती,  पर उनके अनुभव में निरंतर वृद्धि होती है, जिससे भविष्‍य में उसके सफल होने की संभावना बनी रहती है। 
      1. जिन्‍हेंं अच्‍छे वक्‍त में उम्‍मीद से अधिक सफलता मिलने लगती है , वे थोडे लापरवाह हो जाते हैं, जिससे भविष्‍य में उनके असफल होने की संभावना बनती है। 
      2. यदि जीवन में अच्‍छा वक्‍त पहले आए तो अपने अधिकारों का सदुपयोग करें , जनहित के कार्य करें , आनेवाले बुरा वक्‍त भी कोई बडी समस्‍या नहीं लेकर आता।
      3. यदि जीवन में अच्‍छा वक्‍त पहले आए तो कभी भी अपने अधिकारों का दुरूपयोग न करें , बाद में आनेवाला बुरा वक्‍त आपको रूला सकता है। 
      4. यदि जीवन में बुरा वक्‍त पहले आए तो धैर्य बनाए रखें और काम करते रहें, वक्‍त कभी भी पलट जाता है और आपको अपने कर्मों का फल दे जाता है। 
      5. यदि जीवन में बुरा वक्‍त पहले आए तो धैर्य खोकर काम करना न बंद करें, क्‍योंकि आपने जब कुछ किया नहीं तो जब वक्‍त बदलेगा भी तो आपको कुछ नहीं दे पाएगा। 
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          गत्यात्मक ज्योतिष : परिचय

           

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          गत्यात्मक ज्योतिष के बारे में संपूर्ण ज्योतिष ज्ञान देना आवश्यक है, क्योंकि भारत के बहुत सारे लोगों को शायद इस बात का ज्ञान भी न हो कि विगत कुछ वर्षों में उनके अपने देश में ज्योतिष की एक नई शाखा का विकास हुआ है,जिसके द्वारा वैज्ञानिक ढंग से की जानेवाली सटीक तिथियुक्त भविष्यवाणी जिज्ञासु बुद्धिजीवियों के मध्य चर्चा का विषय बनी हुई है। सबसे पहले दिल्ली से प्रकाशित होनेवाली पत्रिका ‘बाबाजी’ के 1994-1995-1996 के विभिन्न अंकों में तथा ज्योतिष धाम के कई अंकों में गत्यात्मक ज्योतिष के ज्योतिष के बुद्धिजीवी पाठकवर्ग के सम्मुख मेरे द्वारा ही रखा गया था ।

          जनसामान्य की जिज्ञासा को देखते हुए 1997 में दिल्ली के एक प्रकाशक ‘अजय बुक सर्विस’ के द्वारा मेरी पुस्तक ‘गत्यात्मक दशा पद्धति: ग्रहों का प्रभाव’ पहले परिचय के रुप में पाठकों को पेश की गयी। इस पुस्तक का प्राक्कथन लिखते हुए रॉची कॉलेज के भूतपूर्व प्राचार्य डॉ विश्वंभर नाथ पांडेयजी ने ‘गत्यात्मक दशा पद्धति’ की प्रशंसा की और असके शीघ्र ही देश-विदेश में चर्चित होने कामना करते हुए हमें जो आशीर्वचन दिया था, वह इस पुस्तक के प्रथम और द्वितीय संस्करण के प्रकाशित होते ही पूर्ण होता दिखाई पड़ा। 

          इस पुस्तक की लोकप्रियता का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि शीघ्र ही 1999 में इस पुस्तक का द्वितीय संस्करण प्रकाशित करवाना पड़ा। पुस्तक के प्रकाशन के पश्चात् हर जगह ‘गत्यात्मक ज्योतिष चर्चा का विषय बना रहा । कादम्बिनी पत्रिका के नवम्बर 1999 के अंक में श्री महेन्द्र महर्षिजी के द्वारा इस सिद्धांत को प्रस्तुत किया गया। जैन टी वी के प्रिया गोल्ड फ्यूचर प्रोग्राम में भी इस पद्धति की चर्चा-परिचर्चा हुई। दिल्ली के बहुत से समाचार-पत्रों में इस पद्धति पर आधारित लेख प्रकाशित होते रहें।

          गत्यात्मक ज्योतिष के विकास की चर्चा के आरंभ में ही इसका प्रतिपादन करनेवाले वैज्ञानिक ज्योतिषी श्री विद्यासागर महथा का परिचय आवश्यक होगा ,जिनका वैज्ञानिक दृष्टिकोण ही गत्यात्मक ज्योतिष के जन्म का कारण बना। महथाजी का जन्म 15 जुलाई 1939 को झारखंड के बोकारो जिले में स्थित पेटरवार ग्राम में हुआ। एक प्रतिभावान विद्यार्थी कें रुप में मशहूर महथाजी रॉची कॉलेज ,रॉची में बी एससी करते हुए अपने एस्‍ट्रॉनामी पेपर के ग्रह नक्षत्रों में इतने रम गए कि ग्रह-नक्षत्रों की चाल और उनका पृथ्वी के जड़-चेतन पर पड़नेवाले प्रभाव को जानने की उत्सुकता ही उनके जीवन का अंतिम लक्ष्य बन गयी। उनके मन को न कोई नौकरी ही भाई और न ही कोई व्यवसाय। इन्‍होने प्रकृति की गोद में बसे अपने पैतृक गॉव में रहकर ही प्रकृति के रहस्यों को ढूंढने का फैसला किया।


          Gatyatmak Jyotish ke Janak

          Jyotish com in hindi

          ग्रह नक्षत्रों की ओर गई उनकी उत्सुकता ने उन्हें ज्योतिष शास्त्र के अध्ययन को प्रेरित किया। गणित विषय की कुशाग्रता और साहित्य पर मजबूत पकड़ के कारण तात्कालीन ज्योतिषीय पत्रिकाओं में इनके लेखों ने धूम मचायी। 1975 में उन्हीं लेखों के आधार पर ‘ज्योतिष-मार्तण्ड’ द्वारा अखिल भारतीय ज्योतिष लेख प्रतियोगिता में इन्हें प्रथम पुरस्कार प्रदान किया गया। उसके बाद तो ज्योतिष-वाचस्पति ,ज्योतिष-रतन,ज्योतिष-मनीषी जैसी उपाधियों से अलंकृत किए जाने का सिलसिला ही चल पड़ा।1997 में भी नाभा में आयोजित सम्मेलन में देश-विदेश के ज्योतिषियों के मध्य इन्हें स्वर्ण-पदक से अलंकृत किया गया।


          विभिन्न ज्योतिषियों की भविष्यवाणी में एकरुपता के अभाव के कारणों को ढूंढ़ने के क्रम में इनके वैज्ञानिक मस्तिष्क को ज्योतिष की कुछ कमजोरियॉ दृष्टिगत हुईं। फलित ज्योतिष की पहली कमजोरी ग्रहों के शक्ति-आकलन की थी।ग्रहों के शक्ति निर्धारण से संबंधित सूत्रों की अधिकता भ्रमोत्पादक थी,जिसके कारण ज्योतिषियों को एक निष्कर्ष में पहुंचने में बाधा उपस्थित होती थी। हजारो कुंडलियों का अध्ययन करने के बाद इन्होने ग्रहों की गत्यात्मक शक्ति को ढूंढ निकाला। ग्रह-गति छः प्रकार की होती है---- 
          अतिशीघ्री , 2.शीघ्री , 3. सामान्य , 4. मंद , 5.वक्र , 6.अतिवक्र ।

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          अपने अध्ययन में इन्होनें पाया कि किसी व्यक्ति के जन्म के समय अतिशीघ्री या शीघ्री ग्रह अपने अपने भावों से संबंधित अनायास सफलता जातक को जीवन में प्रदान करते हैं। जन्म के समय के सामान्य और मंद ग्रह अपने-अपने भावों से संबंधित स्तर जातक को देते हैं। इसके विपरीत वक्री या अतिवक्री ग्रह अपने अपने भावों से संबंधित निराशाजनक वातावरण जातक को प्रदान करते हैं। 1981 में सूर्य और पृथ्वी से किसी ग्रह की कोणिक दूरी से उस ग्रह की गत्यात्मक शक्ति को प्रतिशत में निकाल पाने के सूत्र मिल जाने के बाद उन्होने परंपरागत ज्योतिष को एक कमजोरी से छुटकारा दिलाया।

          फलित ज्योतिष की दूसरी कमजोरी दशाकाल-निर्धारण से संबंधित थी। दशाकाल-निर्धारण की पारंपरिक पद्धतियॉ त्रुटिपूर्ण थी। अपने अध्ययनक्रम में उन्होने पाया कि ज्योतिष के प्राचीन ग्रंथों में वर्णित ग्रहों की अवस्था के अनुसार ही मानव-जीवन पर उसका प्रभाव 12-12 वर्षों तक पड़ता है। जन्म से 12 वर्ष की उम्र तक चंद्रमा ,12 से 24 वर्ष की उम्र तक बुध ,24 से 36 वर्ष क उम्र तक मंगल ,36 से 48 वर्ष की उम्र तक शुक्र ,48 से 60 वर्ष की उम्र तक सूर्य ,60 से 72 वर्ष की उम्र तक बृहस्पति , 72 से 84 वर्ष की उम्र तक शनि,84 से 96 वर्ष की उम्र क यूरेनस ,96 से 108 वर्ष क उम्र तक नेपच्यून तथा 108 से 120 वर्ष की उम्र तक प्लूटो का प्रभाव मनुष्य पड़ता है। विभिन्न ग्रहों की एक खास अवधि में निश्चित भूमिका को देखते हुए ही ‘गत्यात्‍मक दशा पद्धति की नींव रखी गयी। अपने दशाकाल में सभी ग्रह अपने गत्यात्मक और स्थैतिक शक्ति के अनुसार ही फल दिया करते हैं। इस तरह इन्होने कुंडली देखने का तरीका निकाला। 

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          उपरोक्त दोनो वैज्ञानिक आधार प्राप्त हो जाने के बाद भविष्यवाणी करना काफी सरल होता चला गया। ‘ गत्यात्मक दशा पद्धति ’ में नए-नए अनुभव जुडत़े चले गए और शीघ्र ही ऐसा समय आया ,जब किसी व्यक्ति की मात्र जन्मतिथि और जन्मसमय की जानकारी से उसके पूरे जीवन के सुख-दुख और स्तर के उतार-चढ़ाव का लेखाचित्र खींच पाना संभव हो गया। धनात्मक और ऋणात्मक समय की जानकारी के लिए ग्रहों की सापेक्षिक शक्ति का आकलण सहयोगी सिद्ध हुआ। भविष्यवाणियॉ सटीक होती चली गयी और जातक में समाहित विभिन्न संदर्भों की उर्जा और उसके प्रतिफलन काल का अंदाजा लगाना संभव दिखाई पड़ने लगा।

          गत्यात्मक दशा पद्धति के अनुसार जन्मकुंडली में किसी भाव में किसी ग्रह की उपस्थिति महत्वपूर्ण नहीं होती , महत्वपूर्ण होती है उसकी गत्यात्मक शक्ति , जिसकी जानकारी के बिना भविष्यवाणी करने में संदेह बना रहता है। गोचर फल की गणना में भी ग्रहो की गत्यात्मक और स्थैतिक शक्ति की जानकारी आवश्यक है। इस जानकारी पश्चात् तिथियुक्त भविष्यवाणियॉ काफी आत्मविश्वास के साथ कर पाने के लिए ‘गत्यात्मक गोचर प्रणाली’ का विकास किया गया ।

          योगकारक ग्रह

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          गत्यात्मक दशा पद्धति एवं गत्यात्मक गोचर प्रणाली के विकास के साथ ही ज्योतिष एक वस्तुपरक विज्ञान बन गया है , जिसके आधार पर सारे प्रश्नों के उत्तर हॉ या नहीं में दिए जा सकते हैं। गत्यात्मक ज्योतिष की जानकारी के पश्चात् समाज में फैली धार्मिक एवं ज्योतिषीय भ्रांतियॉ दूर की जा सकती हैं ,साथ ही लोगों को अपने ग्रहों और समय से ताल-मेल बिठाते हुए उचित निर्णय लेने में सहायता मिल सकती है। यही नहीं, बुरे ग्रहों के प्रभाव को दूर करने के लिए किए जाने वाले उपचार भी बिल्‍कुल वैज्ञानिक और परंपरागत ज्‍योतिष से बिल्‍कुल भिन्‍न है। 

          आनेवाले गत्यात्मक युग में निश्चय ही गत्यात्मक ज्योतिष ज्योतिष के महत्व को सिद्ध करने में कारगर होगा ,ऐसा मेरा विश्वास है और कामना भी। लेकिन सरकारी,अर्द्धसरकारी और गैरसरकारी संगठनों के ज्योतिष के प्रति उपेक्षित रवैये तथा उनसे प्राप्त हो सकनेवाली सहयोग की कमी के कारण इस लक्ष्य को प्राप्त करने में कुछ समय लगेगा , इसमें संदेह नहीं है। ( संपूर्ण ज्योतिष ज्ञान )

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            अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के कुछ कोट्स

             अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के कुछ कोट्स  

            women's day in hindi


            • दुनिया साथ दे न दे माँ का प्यार कम नहीं होता। 
            • स्त्री का अपमान माता का और ईश्वर का अपमान है। 
            • नारी की ताकत कलम और तलवार से भी बढ़कर है। 
            • महिला इतनी बड़ी ताकत है कि वह मर्द को जन्म देती है। 
            • माँ को एक बेटा भाग्य से होता है पर एक बेटी सौभाग्य से होती है। 
            • पापा की लाड़ली माँ की जान भाईयों की मुस्कान परिवार की शान। 
            • नारी जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी , आँचल में है दूध और आँखों में पानी !
            • महिला सबको भूल सकती है , अपनी इज्जत करनेवालों को नहीं भूल सकती। 
            • कोख से बच चुकी बच्चियों को चार किताबें तो पढ़ने दो , दहेज़ से भी बच जाएगी। 
            • लोग मंदिर-मस्जिद में जन्नत तलाश करते है, फुर्सत नहीं कि माँ के कदम ही चूम लें। 
            • कुछ लोग कहते हैं कि स्त्रियों  का घर नहीं होता , पर स्त्रियों  के बिना कोई घर नहीं होता। 
            • अपनी माँ , बहन, बेटी की ही नहीं , दूसरों की माँ , बहन , बेटी का सम्मान करना सीखिए। 
            • हरदिन हरपल नारी का सम्मान करो,  बस एक दिन क्यों नारी दिवस नारी के नाम मनाना है ?
            • खुद मौत की गोद में जाकर जिंदगी को जन्म देने वाली स्त्री को पूजनीय तो माना ही जाना चाहिए। 
            • नारी ही शक्ति नर की, नारी ही शोभा घर की , जो उसे उचित सम्मान मिले , घर में खुशियों के फूल खिले। 
            • कर्तव्यों को साथ लेकर निरंतर अपने पथ पर चलती हुई भारीतय नारी के चेहरे पर कभी शिकन भी नहीं आती। 
            • कोई भी देश तरक्की के शिखर पर तबतक नहीं पहुँच सकता, जबतक उस देश की महिलाएँ कंधे से कन्धा मिलाकर साथ नहीं चलती हैं।
            • यदि पुरुष को शिक्षित किया जाये तो एक पुरुष शिक्षित होता है, पर एक महिला को शिक्षित किया जाये तो आनेवाली पीढ़ी  शिक्षित होती है। 

            अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की अनंत शुभकामनाएं !

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