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प्राइवेट नौकरी कर रहे युवाओं की चिंता

विश्व में कोरोना वायरस प्राकृतिक आपदा बनकर आयी हो या ये मानवकृत आपदा हो, पूरा विश्व इसके विभीषिका से त्रस्त है। उच्च-मध्यम-निम्न वर्ग, धर्म और जाति-पाति नहीं देख रहा यह वायरस। कोई बीमार पड़ रहे हैं तो कोई मृत्यु का वरण भी, धन या पद की कोई मजबूती काम नहीं आ रही है। निम्नस्तरीय लोगों को अभी सरकारी मदद, समाजसेवी संस्थाओं की मदद मिल रही है, माहौल ठीक होने पर उन्हें बड़ा-छोटा काम भी मिल जायेगा। उच्चवर्गीय परिवार कोरोना के बाद के समाज की मांग के अनुरूप पूंजी के अनुरूप अपने रोजगार को बदल देंगे। गांव-शहर में बसे मध्यमवर्गीय परिवार के लोगों को दो-तीन महीने घर में बैठकर या जरूरी काम करते हुए काटने में भी कोई दिक्कत नहीं, पर उनकी भविष्य की सम्भावनाएँ अनिश्चित लगती हैं।


corona side effects


सरकारी नौकरी कर रहे लोगों पर करियर और रोजी-रोटी की अनिश्चितता नहीं, पर इतने बड़े देश में आयी चुनौतियों को संभालने के क्रम में सरकारी दवाब का सामना तो करना ही पड़ रहा है। पर प्राइवेट नौकरी कर रहे घर-परिवार से अलग रह रहे युवाओं की चिंता भी कम नहीं, जिन्हे अपने नियोक्ताओं के लाभ की भी चिंता करनी है, कंपनी में बने रहने के लिए ऊपर आनेवाले हर आदेश का पालन कर खुद मेहनत करनी है, घर में सहायिकाओं के अभाव में खाने-पीने, साफ़-सफाई का ध्यान भी रखना है। इसके बाद भी यह तनाव बना ही हुआ है कि किसकी नौकरी बचेगी और किसकी नौकरी जाएगी ?


पूरे भारतवर्ष से दो तरह की खबरें रही है -- जहाँ किसी प्रदेश, किसी शहर और किसी गाँव से अच्छी व्यवस्था की, मतलब प्रशासन द्वारा खाने-पीने की व्यवस्था की गयी है. जरूरतभर अनाज बांटे गए हैं, पुलिस चुस्त बनी हुई है, लोगों को जमा होने नहीं दिया जा रहा है, सेनिटाइज़ेशन किया जा रहा है तो वहीं किसी प्रदेश, किसी शहर और किसी गाँव से बुरी व्यवस्था की खबर भी, लोग खाने-खाने को मुंहताज हैं, अनाज किसी को मिला किसी को नहीं, पुलिस आराम कर रही है, लोग जमा हो रहे हैं, सैनिटीजसन की तो कुछ चर्चा नहीं है। 

इससे एक निष्कर्ष तो निकलता है, अच्छी व्यवस्था करने वाला पूरा प्रदेश, शहर या गाँव केंद्र द्वारा दी गयी जिम्मेदारियाँ ले रहा है, जनता को भेजी गयी सुविधाओं को देने में पैसे खर्च कर रहा है, बुरी व्यवस्था करनेवाला प्रदेश, शहर या गाँव केंद्र द्वारा दी गयी जिम्मेदारियाँ नहीं ले रहा है, जनता को भेजी गयी सुविधाओं को न बाँटकर पैसे बचा रहा है। बेईमानी के फल को भोगते हुए हमारे पूर्वजों ने देखा था, इसलिए हमेशा बच्चों को ईमानदारी की शिक्षा दिया करते थे। 

यह बात अलग है कि बाद में हमारे पाठ्यक्रम से नैतिक शिक्षा का विषय ही गायब कर दिया गया। कोरोना के इस भयंकर दौर में यदि कोई पैसे बचाकर ऊपर से नीचे तक इसे बाँटने जैसा भ्रष्टाचार करके यह सोच रहे हैं कि जनता की आह उन्हें नहीं लगेगी तो गलत सोच रहे, जनता की आह सबसे भारी होती है। इससे निष्कर्ष यही निकलता है कि देश मे स्वार्थियों की कमी नहीं है। नैतिक शिक्षा की बात भूल गए हो। बड़े बुजुर्गों द्वारा दीं गयी शिक्षा भूल गए हो पर आज प्रकृति की ताकत को तो पहचानो। आपत्तिकाल मे दूसरे के हिस्से के पैसे मत रखो नादानो !

जिस देश के गरीबों को आनेवाले समय मे खाने पीने, जरूरी व्यवस्था मे ही दिक्कत है, सफाई के लिए साबुन और सेनेटाइजर कहाँ से खरीद पाएंगे ? वैज्ञानिकों को कोरोना वायरस पर गाय के गोबर, मूत्र और लकड़ी की राख़ का भी प्रयोग टेस्ट करना चाहिए. पिछली कई महामारियों मे, जब सर्फ़ सैनिटाइज़र का बनना शुरू भी नहीं हुआ था, यह रामबाण साबित हुआ था. प्लेग के बारे मे प्रसिद्द है कि जिनके घर मे गायें थी, उस के घर मे प्लेग नहीं फैला था. गावों मे अभी भी गोबर से घर आँगन लीपे और राख़ का उपयोग हाथ धोने और बर्तन मांजने मे किया जाता है. उम्मीद है, सरकार इसपर ध्यान देगी। 


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    कोविड की बीमारी में उम्र


    कोरोना के बहुत मारक होने की चर्चा कभी नहीं हुई है, विदेशों से भी जो संकेत आ रहे थे, उसके अनुसार स्वस्थ व्यक्ति को कोरोना से डरने की आवश्यकता नहीं थी, आज हमारे देश के केस को देखते हुए भी यही कहा जा सकता है, पर थॉयरॉइड, BP, न्यूमोनिया, हार्ट, किडनी, शुगर के पेशेंट जिस घर में हों, वहाँ रहनेवाले स्वस्थ व्यक्ति भी सावधानी से रहे, कोरोना से खतरा स्वस्थ लोगों को नहीं, पर पहले से कोई बीमारी रखने वालों को तो है, लापरवाही किया तो आप नहीं भुगतेंगे, आपके घर में रहनेवाले कमजोर भुगतेंगे ! आपका परिवार मजबूत है तो नहीं भुगतेगा पर पड़ोसी के परिवार में लोग कमजोर हुए तो भुगतेंगे !

    age factor in covid


    इसलिए न घबराओ, एक और माता आयी हैं ! जबतक टीका नहीं आ जाता, चेचक की तरह इलाज रखो, बच्चों बुजुर्गों की सारी व्यवस्था अलग रखें ! जरूरी कार्यों से बाहर निकलनेवाले अपनी सारी व्यवस्था अलग रखें ! अच्छे मास्क लगाएं, बाहर से आते ही चप्पल बाहर रखें, बहुत सावधानी से बिना किसी चीज को छुए बाथरूम जाएँ ! सबसे पहले हाथ धोयें, कपडे गरम पानी मे डुबोएं और सर से पैर तक अच्छे से सफाई करके नहाये ! बाहर से आनेवाले सामानो को मानकर चलें कि इसमें कोरोना है ! एक सप्ताह बाहर छोड़ दे या साबुन से धो लें ! गरम पानी मे 5 मिनट के लिए डाल दें ! उसके बाद ही उसका उपयोग करें ! चेन टूटेगा, हड़बड़ाहट न रखें ! भारत मे कोरोना का खास असर नहीं देखा जा रहा है ! सावधान रहेंगे तो कोरोना भी आउट और हम भी आउट हो पाएंगे !

    कोरोना के रिकवरी रेट पर मत जाइये, रिकवरी के पहले पूरे महीने जो झेलना पड़ेगा, उसे समझिए ! नादानी मत कीजिए ! कुछ दिनों जरूरी बातों के लिए ही बाहर निकलें ! घर मे रहेंगे तो एक साल पीछे जायेंगे ! बाहर निकले और कोरोना हुआ तो पूरे परिवार डिस्टर्ब होंगे ! कई साल पीछे जायेंगे ! परिवार मे कोई दुर्घटना हो गयी तो जीवनभर खुद को माफ़ न कर सकेंगे ! दूसरे क्या कर रहे हैं, नक़ल न कीजिए ! आप सही कीजिए, दूसरे नक़ल करेंगे ! कोरोना जहाँ फ़ैल जाता है, संभालना मुश्किल होता है ! जहाँ नहीं फैला है, वहाँ फैलने न दें !  अधिक से अधिक लोग पोस्ट को शेयर कीजिए ! ताकि लोग पढ़कर कुछ समझें, भीड़ न बनायें ! बिलकुल जरूरी काम से ही बाहर निकले लोग ! हर जगह भीड़ हो रही है !

    कोविड की बीमारी में उम्र मायने नहीं रखती, शरीर की आतंरिक शक्ति मायने रखती है, 95% लोगों के इस बीमारी से जीतने की शक्ति के पीछे स्वास्थ्यवर्धक खान-पान, शारीरिक श्रम करते रहना, कोई बीमारी न होना है, सलमान ख़ान की दबंग सीरीज की तीनों फिल्मों, पार्टनर, तेरे नाम, जय हो जैसी अनेक फिल्मों में उनके संगीतबद्ध हिट गाने देनेवाले मशहूर संगीतकार जोड़ी साजिद-वाजिद के वाजिद ख़ान का आज सुबह 42 साल की उम्र में ही मुंबई के चेम्बूर में सुराना अस्पताल में निधन हो गया, उन्हें किडनी की बीमारी थी और उनका Covid-19 टेस्ट पॉजिटिव आया था, कोरोना से पहले भी कम उम्र के कई डॉक्टर्स, व्यवसायी की मौत हमलोग देख चुके हैं, किसी भ्रम में ना रहे, सुरक्षा में कोताही करके कोविड को फैलने का मौका न दें !

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      कोरोना के केसेज इतने न बढ़ते


      दो-तीन  महीने के पूरे घटनाक्रम को देखकर मालूम हो गया। ऊपरवाली सरकार जो चाहती है वो करवा लेती है। ऊपर से यमराज ने महामारी के रूप मे यमदूतों को भेज दिया तो बचना मुश्किल है। देश का इतना बड़ा लॉक डाउन का निर्णय कुछ काम न आया। गाँव -गाँव मे कोरोना को फैलने का मौका मिल गया। मजदूरों को समझा-बूझाकर बड़े बड़े अपने शहर मे रखकर तीन महीने के चावल-रोटी का खर्च न तो सरकार कर सकी और न उद्योगपति कर पाए। न क्रिकेट के खिलाडी और न फ़िल्म जगत ही, वोट के लिए घर घर पहुँच जाने वाले पक्ष या विपक्ष किसी भी राजनीतिक दल के कार्यकर्ता भी नहीं।

      coronavirus increases


      आज दादाजी की बात बहुत याद आ रही है, 'घर की रोटी आधी भली !' महानगर बड़े लोगों के लिए होता है ! मजदूरों, सामान्य नौकरी पेशा करनेवालों के लिए नहीं होता ! अब चेत जाएँ गाँव के लोग ! आनेवाले दिनों मे देश मे ऐसी व्यवस्था लाने की जरूरत है कि लोग अपने घर से ही पढ़ाई, अपने घर से ही नौकरी कर सकें ! किराये या EMI के खर्चे न हो ! माता-पिता-पत्नी-बच्चों के साथ रह सके ! बहुत उच्च स्तर की पढ़ाई या नौकरी के लिए ही महानगर की आवश्यकता हो ! बाकी की अपने अपने जिले - राज्य के अंदर ही ! दसवीं पास करते ही बच्चों को बाहर भेजो ! ऐसी मजबूरी न बालकों न अभिभावकों के लिए उचित है ! आनेवाले समय मे सरकार के सामने बहुत बड़ी जवाबदेही होगी ! और गांववालों के सामने भी ! जो मजदूर महानगर मे बच जायेंगे, उनके लिए अच्छा ही अच्छा होगा !

      अनिश्चितता के कारण दूर दूर तक बाजार मे मांग की कमी है। लोग सिर्फ आवश्यक आवश्यता पर ही फोकस कर रहे हैं। हर क्षेत्र के उद्योगपति निराशा मे हैं, मकान मालिकों को इतना आत्मविश्वास कहाँ से आ रहा है कि उन्हें नए किरायेदार मिल जायेंगे। बसे बसाये पुराने किरायेदारों को निकाल भगा रहे हैं। सरकार ने अपने नुकसान की परवाह न करके थोड़े देर से ही सही, पर लॉक डाउन की घोषणा तो की। सरकार ने स्पष्ट बोल था कि ये तीन महीने हमें अपने घर के अंदर रहकर काटने हैं, जो समर्थ हैं अपने खाने पीने की व्यवस्था करें, गरीबों के खाने की व्यवस्था सरकार करेगी। जिनतक सरकार नहीं पहुँच पाए, उनतक समाज के लोग मदद करें। भीषण संकट की घडी है, व्यवसायी अपने एम्प्लाइज के खाने पीने की व्यवस्था करें। मकान मालिक किराया न लें, बैंक EMI न लें। 

      कोरोना से जंग सभी देशवासियों को मिलकर जीतना था। सरकार तीन महीने के लिए निम्न आय वाले परिवारों को खाने की व्यवस्था कर रही थी। मध्यम आय वाले तीन महीने के खाने की व्यवस्था खुद कर रहे थे। उच्च वर्ग सरकार को दान देकर भारत को इस बीमारी से लड़ने के लिए तैयार कर रहे थे। सरकार के निर्देश के बावजूद बैंकों EMI लिया , मकान मालिकों ने किराया लिया। प्राइवेट स्कूल फीस लेने के लिए बेचैन हैं। कंपनी के मालिक एम्लॉईज के खाने-रहने की व्यवस्था नहीं पाए , उन्हें भी कोरोना के मामले मे देश का साथ नहीं देता हुआ माना जाना चाहिए। 

      यदि ये सब होता तो कोरोना के केसेज इतने न बढ़ते, गड़बड़ी कहाँ कहाँ आयी, आपलोग ध्यान दें। मैं तो इतना कहूंगी कि जनता ने इस लॉक डाउन को गंभीरता से नहीं लिया। प्रशासन को, पुलिस को, डॉक्टर्स को, नर्सों को काफी दवाब आया। जो बाहर न निकले, वे भी सोसाइटी में पिकनिक मनाते दिखें। घर में किसी एक को सर्दी-बुखार हुआ तो किसी ने खुद से क्वैरेन्टाइन नहीं किया। पूरे घर, सोसाइटी में घूमते मिले। लोगों ने कोरोना की गंभीरता को नहीं समझा। मजदूरों को स्थायित्व का खतरा दिखा। फुर्सत में होम सिकनेस बना, रोज रोज भीड़ इकट्ठी करते रहें। 

      लॉक डाउन के तीसरे दिन से ही यत्र-तत्र जो भीड़ दिखी, वह इसी ओर इशारा करती है। हर जगह सिर्फ लाचारों की भीड़ नहीं थी, हठी की भी भीड़ थी। तीन महीने तो किसी तरह गुजारने थे, सबलोगों को घर में रहकर जीवन जी लेना था, कुछ भी खाकर। सब्जी, दूध की इतनी मारामारी क्यों, हमारे जनरेशन तक पहुँचने के लिए हमारे पूर्वजों ने कितनी मेहनत की है हम भूल गए। संकट के समय जानवर भी एकजुटता को महत्व देते आये हैं, लेकिन हमें नहीं देनी थी । 

      कुल मिलाकर एक बात कही जा सकती है कि एकजुटता की कमी से भारत ने बहुत जगह हार मानी है, लोग माने न माने कोरोना काल का इतिहास भी एकजुटता की कमी का इतिहास बनेगा। उनके द्वारा की जानेवाली लापरवाही भविष्य में सबको कोरोना के चक्र में झोंकेगी, जबतक गलती का अहसास होगा, काफी देर हो चुकी होगी। एक बात यह भी है कि जिस देश मे जागरूकता इतनी कम हो कि हेलमेट और सीट बेल्ट भी फाइन के डर से पहनते हों, वहाँ जनता से कुछ उम्मीद करनी भी बेकार है. हमारे यहाँ अभी कोरोना नहीं आया है, यह बात देशभर मे हर जगह हर महीने फेल हो रही है, फिर भी अभीतक लोग यही बात कर रहे हैं.

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        आयुर्वेदिक दवाईयां और काढ़ा लीजिए

        Aayurvedik medicine


        कुछ दिन पहले तक दूर दूर से आ रही खबरे दिन ब दिन नजदीक पहुँचने लगी है, चिकित्सा के क्षेत्र में हो रहे विकास के कारण समाज से महामारी शब्द के अर्थ, उसके प्रभाव और उसकी सावधानियों की चर्चा गायब हो गयीं थी. यदि ऐसा न होता तो विदेश से आनेवाले नागरिकों के ने जो गलतियां की थी, कम से कम सरकार के अनाउंसमेंट के बाद भी हमारे नेता, आम नागरिक और मजदूरों ने इतनी बड़ी गलती न की होती. 

        दो महीने का लॉक डाउन बीमारी की चेन तोड़ने के लिए कम नहीं होता, पर लॉक डाउन में यत्र-तत्र भीड़ होते रहने के कारण चेन टूटनेवाली बात ख़त्म हो गयी।  सरकारी व्यवस्था की पोल खोलकर अब क्या होनेवाला? कम साधन में समस्या तो आएंगी, कमियाँ तो रहेंगी ही, भारत में केस बढ़ने नहीं चाहिए थे, हमें लॉक डाउन को सफल बनाना चाहिए था, इसमें बहुत सारे डिस्टर्बेंस आये, लोगों तक भी सही सन्देश नहीं पहुँचाया जा सका, टीवी चैनल्स भी उत्तरदायित्व का पालन नहीं कर सकें, एक पंक्ति में कहा जा सकता है, न तो सरकार और न ही विपक्ष की कार्यशैली सही रही, इतनी बड़ी विपत्ति में भी हम एकजुट नहीं रहे।

        aayurvedik medicine,


        अभी भी वक्त है, महामारी किसी को नहीं पहचानती, सावधानी ही एकमात्र उपाय है, ईश्वर सब शुभ करें ! नागरिकों से भी लॉक डाउन के दौरान और अभी भी जो भूलें हो रही हैं, उसमे उनके द्वारा दूरी का पालन नहीं किया जाना मुख्य है. पौष्टिक खाना, शरीर में पानी की प्रचुरता बनाये रखना, आयुर्वेदिक सावधानियां, योगा, चेहरे पर मास्क, हाथ पर नियंत्रण, कम से कम बाहर निकलना - इनका पालन सबसे आवश्यक हो गया है.

        दिल्ली और मुम्बई में तो अब कुछ नहीं हो सकता, लाख कोशिश कर ले अब जो करेगा ऊपरवाला ही करेगा....छोटे शहरों वाले समझदारी दिखाएँ तो बच सकते हैं ! भारत में कोरोना की ये हालत नही होने देनी चाहिए थी ! अब भी तो नहीं चेत रहे हैं लोग ! कुछ की गलतियों का खामियाजा सब भुगत रहें हैं ! पुलिस को इतना गंभीर हमने कभी नहीं पाया था, जितना कोरोनाकाल में वे गंभीर रहे , पर नतीजा वही ढाक के तीन पात ! शांति से घर में बैठना था दो महीने लोगों को ! झारखण्ड में भी सामुदायिक संक्रमण शुरू हो गया है !

        सरकार को दोष देने का अधिकार जनता को तबतक नहीं बनता, जबतक वो खुद को पार्टी और पॉलिटिक्स से अलग नहीं करे। जबतक हम खुद को जाति और धर्म, ऊँच और नीच से परे नहीं रखे, जबतक हम नेताओं के तलुए चाटेंगे, स्वार्थी बनकर भ्रष्टाचार का हिस्सा बनेंगे, पेड़ मीडिया की खबरों पर विश्वास करेंगे, हमें सबकुछ सहन करना होगा। फूट डालो और शासन करो, यह राजनीति का मूल मंत्र है, क्या हम एकजुट नहीं होकर इनको अपनी जिम्मेदारी अहसास नहीं करवा सकते ? 

        यदि हम एकजुट होकर जागरूक नागरिक बन जाएँ, ब्लॉक से लेकर केंद्र तक के गतिविधियों का हिसाब किताब रखें। हमारे आयकर का पैसा वेतन के रूप में खानेवाले जो भी अफसर, कर्मचारी जनता के लायक या उनका हितैषी नदिखे, उनका बॉयकॉट करें! गाँव से लेकर महानगर तक की हर स्तर की जनता की हर समस्या को समझें, समाधान निकालें । चरित्रवान और ईमानदार उम्मीदवारों को खड़ा करें, फिर राजनीति में भी या तो ईमानदार नेता रहेंगे या उन्हें ईमानदार बनने की मजबूरी होगी । एकजुट तो हमें ही होना होगा !

        पूरे देश को लगातार बंद रखने की बात अब नहीं सोची जा सकती।  कोरोना का हमारे जीवन में प्रवेश हो चुका, आनेवाले वर्षों में दूसरी बीमारियों से कोई मौत नहीं होगी, हर मौत के पीछे कोरोना होगा, और अफ़सोस करते हुए लोगों का वक्तव्य 'कई बीमारियों से ग्रस्त, कमजोर था/थी वो, कोरोना को नहीं झेल पाया/पायी', इसलिए घर से कम से कम निकलिए...शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढाईये, आयुर्वेदिक दवाईयां और काढ़ा लीजिए, यही बचा सकता है सीनियर सिटिज़न को, जिसकी ओर मैं भी बढ़ रही हूँ। 


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          अग्नि परीक्षा से भी बड़ी परीक्षा

          Corona in india news

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          कल समाचार में पढ़ने को मिला कि कुछ वृद्धों की कोरोना से हुई मौत के बाद उनके बाल-बच्चों ने मोबाइल ऑफ कर दिया है, ताकि अस्पतालों को जवाब न देना पड़े ! खबर मुझे आहत कर गया, पर बुजुर्ग बाल-बच्चों की ये मानसिकता बनायीं किसने? चीन से कोरोना के शुरुआत से लेकर इसकी अमेरिका और यूरोप तक की यात्रा के बाद जब इसने भारत में कदम रखा, तबतक इसके विषय में ऋणात्मक खबरें ही आती रहीं. लगभग सभी देशों में बीमाऱ होने से लेकर दाहकर्म तक की जिम्मेदारी सरकारों की रही. मतलब आपके घर का कोई बीमाऱ है, आप तनाव ही ले सकते हैं, कर कुछ नहीं सकते, ऐसा सभी देशों, सभी डॉक्टरों का मानना था और है ! ऐसी हालत में दिल्ली में कुछ दिन पहले कोरोना से मौत के बाद शवयात्रा और श्मशान में भीड़ देखकर मैं चौंक गयी थी. मौते जब बहुत बढ़ने लगी तो लोगों में स्वाभाविक तौर पर डर का जन्म हुआ !

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          दूसरे देशों की तुलना में भारतवर्ष इस मामले में कुछ अनोखा रहा, संसाधनों की कमी वाला देश कुछ दिनों के लॉक डाउन में और कमजोर हो गया ! खैर असहायों की रक्षा ईश्वर करते हैं, भारतवासियों द्वारा उपयोग किये जानेवाले कुछ रक्षात्मक दवाईयों ने असर किया या स्वयं की रोग प्रतिरोधक क्षमता ने, यह तो बताना मुश्किल है ! भारत संक्रमण के मामले में अपना आंकड़ा तो आगे बढ़ाता जा रहा है, पर मौत की खबरें अपेक्षाकृत कम हैं. फिर भी 45-50 से अधिक के उम्र वालों को, BP और शुगर के मरीजों को, हमेशा न्यूमोनिया या सांस की बीमारी वालों को कोरोना से बहुत ख़तरा है, कोरोना से डॉक्टरों की लाचारी और ऐसी मौतें आँखों के सामने से हटती नहीं है ! सरकार के आंकड़ों में मौतें 3% दिखाई दे पर जिनके परिवार का गया, वह उनके लिए 100% था !

          Corona patient in india


          बस यही सोचकर मैं चार महीने से कोरोना से बचने के लिए अति सावधानी की सलाह देती आ रही हूँ ! स्वाभाविक है, कोरोना मरीजों से दूरी बनाये रहना और भी आवश्यक है ! कोरोना काल में सावधानी से रह रहे एक परिवार के बुजुर्ग अचानक बीमाऱ पड़ जाते है, अस्पताल में पहुँचने के बाद कोरोना से ग्रस्त हो जाते हैं, उनके सपूतों को उन्हें अस्पताल में छोड़कर आना पड़ता है ! सपूत भी क्या करें, आजकर अधिकांश लोग 35-40 की उम्र में bp-शुगर पेशेंट हैं, ख़तरा बड़ा है, घर में भी बच्चे हैं, सबकुछ छोड़कर एक के पीछे कैसे चलें ! ऊपर से सरकार, पुलिस और नियम के विरुद्ध करें तो महामारी एक्ट में फंसना है !

          Corona in india testing


          पानी में डूबता हुआ आदमी बहुत बेचैनी में होता है ! उसके आसपास जो भी मिले, अपने बचने के लिए उसे कसकर पकड़ना चाहता है ! गलती से कोई उसकी पकड़ में आ गया तो दोनों का डूबना निश्चित है, इसलिए होश में रहनेवाले व्यक्ति उसका हाथ झटक देते हैं और दूसरे उपाय करते हैं ताकि उसे बचाया जा सके ! बहुत जगहों पर अति प्रेम और भावना में बहकर पूरे परिवार के एक साथ मौत होते देखा है ! कोरोना काल में लोगों से बहुत सारी गलतियाँ होंगी, लेकिन होगा वही जो राम ने रच रखा है ! शायद अभी कोरोना से हो रही मौत वाले वृद्धों का यथोचित संस्कार ईश्वर ने नहीं लिखा हो ! कोरोना कई परिवारों के लिए अग्नि परीक्षा से भी बड़ी परीक्षा लेकर आया है !

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            कोरोनिल नाम की दवाई लॉन्च

            Corona news in hindi

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            कल से ही बाबा रामदेव जी के द्वारा कोरोनिल नाम की दवाई लॉन्च किये जाने और सरकार द्वारा इसके प्रचार पर रोक लगाने के साथ ही दवाई के पक्ष और विपक्ष में विमर्श चल रहा है ! सरकार अपना प्रोसेस करेगी ही, करनी भी चाहिए, पर मैंने आजतक किसी भी वस्तु या सेवा के बाजार में बिकने या उसके मूल्य निर्धारण में सरकार की दखलंदाजी नहीं देखी, किसी को विरोध करते भी नहीं पाया ! पूरा भारतवर्ष विश्वास पर चल रहा है ! जिस शिक्षक के पढ़ाने का ढंग पसंद है, जिस मिस्त्री का काम आपको पसंद है, जिस टेलर का काम आपको पसंद है, जिस ज्योतिषी का काम आपको पसंद है, जिस देशी विदेशी कंपनी का काम आपको पसंद है, जो घर -मकान आपको पसंद है, सामने प्रतिस्पर्धी नहीं हो, तो वह अपने वस्तु या सेवा के लिए मनमाना रेट रख सकता है, इसलिए काफ़ी अजूबा लग रहा है ! दवाई ने एक -दो महीने में दावे के हिसाब से परिणाम नहीं दिया तो खुद बिक्री ख़त्म हो जाएगी, इसमें रोक लगने का कोई उचित कारण नहीं दिख रहा ! पतंजलि ने बताया है कि अगले सोमवार को दवा के ऑनलाइन ऑर्डर के लिए एक मोबाइल ऐप 'ऑर्डर मी' लॉन्च की जाएगी, जिसके जरिए दवा खरीदी जा सकेगी। वहीं, जो लोग इसे ऑफलाइन स्टोर से खरीदना चाहते हैं, वे एक सप्ताह बाद पतंजलि के स्टोर से खरीद सकेंगे। ५४५ रुपये में ३० दिन की दवा होगी !


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            कोरोना काल में सभी भयभीत हैं, न जाने कब कहाँ से कैसी खबर सुननी पड़ जाये, कब कोरोना किसी को काल का ग्रास बना ले ! एलोपैथी के पास कोई दवाई नहीं, जो कोरोना के गंभीर मरीजों को ठीक कर सके ! डॉक्टर स्वीकार कर रहे हैं कि कोरोना से आपका रोग प्रतिरोधक क्षमता ही बचा सकता है, बीमारी से बचने के लिए रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाये रखने की पूरी वकालत हमारे प्राचीन ज्ञान आयुर्वेद में की गयी है और उसके बहुत सारे उपाय भी बताये गए है, कोरोना काल में भारतीयों ने अपने सुविधानुसार नीम्बू पानी, हल्दी वाली दूध, आमला, गिलोय, एलोवेरा, त्रिफला, अन्य आयुर्वेदिक तत्वों को अपने खाने पीने में शामिल कर लिया है ! फिर भी जीवन अनिश्चितता में ही चल रहा है !

            Can corona cure corona


            इसी अनिश्चितता के दौर में पतंजलि के रामदेव बाबा जी ने कोरोना के उपचार के लिए एक दवाई लॉन्च कर दी है ! अपने शुरुआती दौर में ही बाबाजी लोगों का विश्वास जीत चुके हैं, इसलिए आज उनके अनुसरणकर्ताओं को ख़ुशी होनी स्वाभाविक है ! एलोपैथी के काम करने का ढंग बिलकुल अलग है, वह कुछ ठोस मिलने पर ही कोई निर्णय लेगा, अभी कोरोना की बदलती संरचना को ही नहीं समझ पा रहा ! घर में बंद रहकर धीरे धीरे लोगों का धैर्य समाप्त हो रहा है, इसलिए बाबा की दवाई में आशा की किरण दिखाई दे रही है ! वैसे भी सरकार ने सबकुछ खोल दिया है, घर से निकलने की मजबूरी आती जा रही है, ऐसे में मामूली खर्च में मिलने वाली कोरोना की दवा मानसिक और मनोवैज्ञानिक तौर पर लोगों को मजबूती देने में समर्थ है, जिससे भी किसी बीमारी को जीतने में मदद मिलती है !

            Coronil is effective or not

            पर चुंकि यह दवाई बाबा रामदेव के द्वारा बनायी गयी है, आयुर्वेदिक आधार पर बनायी गयी है, भारतीय सभ्यता और संस्कृति जिन्हे फूटे आँखों नहीं सुहाती, भारतीय परम्परा, आयुर्वेद, वैदिक गणित, ज्योतिष, योगा के उपहासमे जिन्हे आनंद आता है, वे दवाई के विरोध के कारण आज सरकार के पक्ष में हो गए है, जो सरकार भी उन्हें कभी नहीं सुहाई. तर्क भी ऐसे दे रहे है, बाबा व्यवसायी है, अपने कमाने की व्यवस्था कर रहे हैं ! यह सच है कि बाबा व्यवसायी हैं, पर बिना व्यावसायिक बुद्धि वालों के किस ज्ञान को आप सबों ने मिलकर अबतक आगे बढ़ाने का प्रयास किया ! एक दशक पहले की बात है, किसी अनिल कुमार नाम के व्यक्ति ने पूरे भारतवर्ष के भ्रमण के दौरान एकसे बढ़कर एक नवोन्मेष के सैकड़ों उदाहरण के साथ कादम्बिनी पत्रिका में लेख लिखा था. उनका वेबसाइट भी चल रहा है, आजतक किसी भारतीय रिसर्च को आगे बढ़ते मैंने नहीं देखा ! पर अब के हिन्दुस्तानियो को रोकना मुश्किल है, यह नया भारतवर्ष है !

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              कोरोना केसेज क्यों लगातार बढ़ते रहें ?

              Are covid cases increasing in india


              बहुत गंभीर बातें लिखी जा रही हैं, कृपया राजनीतिक रंग देने की कोशिश न करें। सरकार ने अपने नुकसान की परवाह न करके थोड़े देर से ही सही, पर लॉक डाउन की घोषणा तो की। सरकार ने स्पष्ट बोल था कि ये तीन महीने हमें अपने घर के अंदर रहकर काटने हैं, जो समर्थ हैं अपने खाने पीने की व्यवस्था करें, गरीबों के खाने की व्यवस्था सरकार करेगी। जिनतक सरकार नहीं पहुँच पाए, उनतक समाज के लोग मदद करें। भीषण संकट की घडी है, व्यवसायी अपने एम्प्लाइज के खाने पीने की व्यवस्था करें। मकान मालिक किराया न लें, बैंक EMI न लें। यदि ये सब होता तो कोरोना के केसेज इतने न बढ़ते, गड़बड़ी कहाँ कहाँ आयी, आपलोग ध्यान दें। 

              Why covid cases rising in india

              मैं तो इतना कहूंगी कि जनता ने इस लॉक डाउन को गंभीरता से नहीं लिया। प्रशासन को, पुलिस को, डॉक्टर्स को, नर्सों को काफी दवाब आया। जो बाहर न निकले, वे भी सोसाइटी में पिकनिक मनाते दिखें। घर में किसी एक को सर्दी-बुखार हुआ तो किसी ने खुद से क्वैरेन्टाइन नहीं किया। पूरे घर, सोसाइटी में घूमते मिले। लोगों ने कोरोना की गंभीरता को नहीं समझा। मजदूरों को स्थायित्व का खतरा दिखा। फुर्सत में होम सिकनेस बना, रोज रोज भीड़ इकट्ठी करते रहें। लॉक डाउन के तीसरे दिन से ही यत्र-तत्र जो भीड़ दिखी, वह इसी ओर इशारा करती है। हर जगह सिर्फ लाचारों की भीड़ नहीं थी, हठी की भी भीड़ थी। तीन महीने तो किसी तरह गुजारने थे, सबलोगों को घर में रहकर जीवन जी लेना था, कुछ भी खाकर। सब्जी, दूध की इतनी मारामारी क्यों, हमारे जनरेशन तक पहुँचने के लिए हमारे पूर्वजों ने कितनी मेहनत की है हम भूल गए।
              Are covid cases increasing in india


              Why covid cases increasing in india

              संकट के समय जानवर भी एकजुटता को महत्व देते आये हैं, लेकिन हमें नहीं देनी थी । कुल मिलाकर एक बात कही जा सकती है कि एकजुटता की कमी से भारत ने बहुत जगह हार मानी है, लोग माने न माने कोरोना काल का इतिहास भी एकजुटता की कमी का इतिहास बनेगा। उनके द्वारा की जानेवाली लापरवाही भविष्य में सबको कोरोना के चक्र में झोंकेगी, जबतक गलती का अहसास होगा, काफी देर हो चुकी होगी। एक बात यह भी है कि जिस देश मे जागरूकता इतनी कम हो कि हेलमेट और सीट बेल्ट भी फाइन के डर से पहनते हों, वहाँ जनता से कुछ उम्मीद करनी भी बेकार है. हमारे यहाँ अभी कोरोना नहीं आया है, यह बात देशभर मे हर जगह हर महीने फेल हो रही है, फिर भी अभीतक लोग यही बात कर रहे हैं। 

              Recovery rate of coronavirus

              कोरोना के रिकवरी रेट पर मत जाइये, रिकवरी के पहले पूरे महीने जो झेलना पड़ेगा, उसे समझिए ! नादानी मत कीजिए ! कुछ दिनों जरूरी बातों के लिए ही बाहर निकलें ! घर मे रहेंगे तो एक साल पीछे जायेंगे ! बाहर निकले और कोरोना हुआ तो पूरे परिवार डिस्टर्ब होंगे ! कई साल पीछे जायेंगे ! परिवार मे कोई दुर्घटना हो गयी तो जीवनभर खुद को माफ़ न कर सकेंगे ! दूसरे क्या कर रहे हैं, नक़ल न कीजिए ! आप सही कीजिए, दूसरे नक़ल करेंगे ! कोरोना जहाँ फ़ैल जाता है, संभालना मुश्किल होता है ! जहाँ नहीं फैला है, वहाँ फैलने न दें ! सरकार ने पहले दिन ही हाथ खड़े कर दिए थे ! उनसे कुछ उम्मीद नहीं कीजिए ! जब लॉक डाउन का पालन ही नहीं हुआ तो अब सरकार को गाली देने से कुछ नहीं होगा ! अधिक से अधिक लोग पोस्ट को शेयर कीजिए ! ताकि लोग पढ़कर कुछ समझें, भीड़ न बनायें ! बिलकुल जरूरी काम से ही बाहर निकले लोग ! हर जगह भीड़ हो रही है !

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                एक और माता आयी हैं !

                indian coronavirus

                पिछले माह हमारे देश में कोरोना को लेकर खास भय नहीं था, लेकिन उसी वक्त मैंने सावधानी से जुडी यह पोस्ट लिखी थी। कुछ लोगों से सराहना भी मिली तो कुछ लोगों ने यह बोला कि इतना कर पाना संभव नहीं है। हमारे गांव की परम्परा से दूर रहे लोगों को कोई भी सावधानी भारी लगती है, जो उनके जीवन का हिस्सा होना चाहिए था। मेडिकल सुविधाओं को देखकर २५ वर्षों के अंदर हमारे जीवनशैली में आयी हिम्मत एक कोरोना जैसे सूक्ष्मजीव से ही कम हो गयी है, जबकि कोरोना जैसी कई अन्य बीमारियों के आने की आशंका जताई जा रही है। ऐसे समय में अपनी पुरानी जीवनशैली में लौट आना बहुत आवश्यक है।

                syptoms of coronavirus

                मेरी मम्मी उस युग के हिसाब से बहुत पढ़ी-लिखी, पर धर्मपरायण और परम्परागत विचारों वाली महिला थी। अपनी जीवनशैली में उन्होंने परंपरागत और नवीनतम दोनों ही प्रकार के विचारों को समाविष्ट किया हुआ था। साफ़ सफाई में जितना उपयोग गोबर का होता, उतना ही डेटॉल और फिनायल का भी। उनके लिए रसोईघर तो बहुत ही शुद्धता वाली जगह थी, नहाये-धोये बिना कोई अंदर नहीं जा सकता था। चाहे कितना भी प्यासा हो, बिना हाथ-पैर को धोये खुद से पानी भी नहीं ले सकता था। लेकिन कोई बच्चा हाथ-पैर नहीं धो रहा हो तो वे रसोई से पानी निकालकर दे देती, सारा काम खुद करती। पैसे लेने देने पर, मोबाइल छू लेने पर, दरवाजे की बाहर की कुण्डी छू लेने पर भी हाथ धोकर रसोई में जाने की आदत का पालन उन्होंने बड़े होते हम बेटियों से भी करवाया और उनके अंतिम वक्त तक तीनों बहुएँ भी यह सब करती रहीं।

                indian coronavirus

                How to check coronavirus


                मैं जब ससुराल आयी तो अपने घर से भी अधिक नियम थे, बाहर से आने पर चप्पल घर बाहर उतारने पड़ते। काम से आने, ट्रैन या हॉस्पिटल से आने पर कपडे बदलने या नहाने पड़ते। यदि चाय- पानी पीने स्थिर होने के लिए थोड़ी देर बैठना भी हो तो आप प्लास्टिक की कुर्सी पर बैठ सकते थे, सोफे पर नहीं। ६-७वी कक्षा में पढ़ने वाली मेरी भतीजी को कभी भी स्कूल से आने के बाद स्कूल ड्रेस घर में टांगते नहीं देखा, वह दूसरे दिन पहनने के लिए बाथरूम के ही कोने में टांग देती थी। यह सब बिलकुल सामान्य दिनों का रूटीन था, इसका एक असर मैंने साफ़ देखा था की जहाँ दूसरे अभिभावक काम से आते ही अपने बच्चे को गोद में उठा लेते थे, उनकी तुलना में हमारे बच्चे को सर्दी-खाँसी यहाँ तक कि पूरे मोहल्ले के बच्चे को मीज़ल्स हुआ पर हमारे बच्चों को काफी बड़े होने पर।

                incubation period of coronavirus

                कोरोना जैसी बीमारियों का हल भी हमारी पुराने जीवनशैली में ही है, साफ़-सफाई से ही इससे बचा जा सकता है। कोरोना का प्रकोप जिस तरह बूढ़ों पर अधिक देखा जा रहा है, उनको सुरक्षित रखने के लिए, बच्चों को सुरक्षित रखने के लिए बाहर निकलने वालों को अतिरिक्त सावधानी बरतनी होगी। आज इसलिए फेसबुक पर भी पोस्ट लिखी हूँ, भारतीयों, मत घबराओ, एक और माता आयी हैं ! जबतक टीका नहीं आ जाता, चेचक की तरह इलाज रखो, बच्चों बुजुर्गों की सारी व्यवस्था अलग रखें ! जरूरी कार्यों से बाहर निकलनेवाले अपनी सारी व्यवस्था अलग रखें ! अच्छे मास्क लगाएं, बाहर से आते ही चप्पल बाहर रखें, बहुत सावधानी से बिना किसी चीज को छुए बाथरूम जाएँ ! कपडे गरम पानी मे डुबोएं और सर से पैर तक अच्छे से सफाई करके नहाये ! बाहर से आनेवाले सामानो को मानकर चलें कि इसमें कोरोना है ! एक सप्ताह बाहर छोड़ दे या साबुन से धो लें ! गरम पानी मे 5 मिनट के लिए डाल दें ! उसके बाद ही उसका उपयोग करें ! चेन टूटेगा, हड़बड़ाहट न रखें ! भारत मे कोरोना का खास असर नहीं देखा जा रहा है ! सावधान रहेंगे तो कोरोना भी आउट और हम भी आउट हो पाएंगे !

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                  कोरोना वायरस से बचाव के तरीके

                   Instructions for covid 19

                  लॉक डाउन -२ शुरू हो गया आज, इसके अलावा कोई चारा न था।  कोरोना महामारी ने पूरे विश्व के सभी लोगों को अपने अपने घर में बैठने के हालात पैदा कर दिए हैं।  इससे कई प्रकार की परेशानियाँ खड़ी हुई हैं, पर कोरोना के देश में तीसरे, चौथे या पांचवे लेवल पहुँच जाने से तुलना की जाये तो ये सारी परेशानियाँ काफी छोटी हैं। लॉक डाउन ने लोगों को यह समझाने में मदद की है कि कोरोना जैसी बीमारी को हलके में नहीं लिया जाना चाहिए, पर अभी भी बहुत सारे लोग इसकी गंभीरता को नहीं समझ पा रहे हैं।  फलस्वरूप अभी भी ऐसी गलतिया जारी हैं, जो लॉक डाउन के दौरान नहीं होनी चाहिए थी। पूरा विश्व इस बात पर सहमत है कि इस बीमारी के चेन को ख़त्म करना ही इस बीमारी की सबसे बड़ी दवा है, इसके समक्ष अर्थव्यवस्था को भले ही कुछ नुकसान सहना पड़े। पर ऐसा कितने दिन हो सकता है ?
                  instructions for covid 19

                  कुछ सावधानी बरतने की सलाह देते हुए किसी दिन ऑफिस भी खुलेंगे, बाजार भी, रेल और गाड़ियाँ भी।  अभी तो कोरोना वायरस से बचने के लिए टीका बनाने में बहुत समय है, तबतक सावधानिया बरतना ही सबसे बड़ा उपाय है। कोरोना छूत की खतरनाक बीमारी तो है, पर छूत की अन्य बीमारियों में लक्षण दिखने के बाद ही संक्रमण का खतरा था, पर यह बीमारी लक्षण से पहले ही संक्रमण ले आती है। वैसे तो सरकार पूरा ध्यान दे रही है, पर हमलोग अभी से हम अपनी जीवनशैली में ये आदतें डाल लें तो बहुत अच्छा रहेगा :---------

                  1. पूरे घर के पायदान और सभी वस्तुओं की कवर हटा दें, उनके अंदर कोरोना के छुपे रहने की संभावना बनेगी। प्रतिदिन इनकी साफ़-सफाई मुश्किल होती है। 
                  2. प्लास्टिक का उपयोग बंद कर दें, सतह चिकना हो तो वैसे सामान रख सकते हैं, पर जालीदार या डिज़ाइन वाला होने से  यह अच्छी तरह साफ़ नहीं होता। 
                  3. घर के परदे उतार दें या बिलकुल साइड कर दें, ताकि बाहर से आये व्यक्ति को बाथरूम जाते वक्त इसका स्पर्श न हो। 
                  4. बाहर से आनेवाली वस्तुएँ - राशन, फल और साग सब्जियाँ बार बार न मंगवाएं।  इसे महीने में दो बार या तीन बार एक ही दिन मंगवाएं। 
                  5. घर के अंदर आनेवाले सभी सदस्य चप्पल-जुत्ते बाहर उतार दें। ऐसे चप्पल-जूत्ते पहने, जिन्हे साबुन के पानी या डेटोल पानी से साफ़ किया जा सके। 
                  6. गैस सिलिंडर, राशन आदि को घर के एक कोने में ३-४ दिन तक छोड़ दें, उसके बाद ही  सेनेटाइज़ करके घर में रखें। 
                  7. सब्जियों-फल को एक-दो चम्मच नमक या मीठे सोडे वाले पानी में डुबोकर १५ मिनट छोड़ दें। फिर अच्छी तरह धोकर छानकर निकाल लें।  
                  8. दूध के पैकेट को साबुन से साफ़ करके ही उपयोग करें। 
                  9. जिस दिन बाहर से सामान आये, उस दिन पूरे घर, किचेन  की सफाई अच्छी तरह करें। 
                  10. बाहर से आनेवाले आपकी घंटी या गेट नहीं छुएँ, ऐसी व्यवस्था रखें। प्रतिदिन इसे सनीटाइज़  करें। 
                  11. घर के बाहर की सफाई करनेवाले झाड़ू से घर के अंदर की सफाई न करें। 
                  12. ऑनलाइन ट्रांज़ैक्शन का उपयोग करें, यदि किसी को पैसे  हो तो पैसों को घर के कोने में एक बैग में टांगकर रखें।  लें-दें के बाद हाथ को अच्छी तरह धोएं। 
                  13. हाथ धोते वक्त सभी जगह नल की टोटियों में भी साबुन लगा दिया करें, क्योंकि उसे घर के सभी व्यक्ति छूते हैं। 
                  14. अपनी कलाई में डिज़ाइन वाली चूड़ियां न पहने, जिसमे वायरस के घुसने का ख़तरा हो। 
                  15. प्रतिदिन कपडे धोने की आदत डालें। बाथरूम में एक बाल्टी में सर्फ का घोल रखें, ताकि नहाने जानेवाले सभी व्यक्ति उसमे अपने उतारे हुए कपडे सावधानी से डाल दे। अंत में उसे वाशिंग मशीन में धोकर धुप में सुखाये। संभव हो तो सभी कपड़ों को डेटोल से अंतिम बार धोएं। 
                  16. सुबह मुंह-हाथ धोते वक्त फेसवाश भी अच्छी तरह करें। 
                  17. बाहर से आये सामानों को व्यवस्थित करने के बाद घर की सफाई करके स्नान करके ही रसोई में जाएँ। खाना बनाने, खिलाने तक कोई भी दुसरा काम न करें। 
                  18. बाहर से आये सामान को व्यवस्थित करने, रसोई बनाने या अन्य काम करने का समय अलग अलग करें, यह नहीं कि खाना बनाते हुए किसी का फ़ोन उठा लिया, किसी को पैसे दे दिए। 
                  19. बाहर से लाये गए किसी भी सामान पर भरोसा न करें, उन्हें निकालने, सब्जियों को छीलने-काटने के बाद भी हाथ और वह जगह अच्छी तरह धोएं।  
                  20. रसोई में नक्काशी  वाले बर्तन का उपयोग बंद करना होगा।  यदि उपयोग करें तो प्रतिदिन उसे गर्म पानी से धोये। 
                  21. किचेन में उपयोग होनेवाले हर सामान को प्रतिदिन गरम पानी और साबुन से धोने की आदत डालनी होगी।  
                  22. खाना गर्म बनाने और खाने-खिलाने की आदत डालें। 
                  23. किचेन में चाय बनाने भी आएं तो सबसे पहले हाथ अच्छे से धोएं। 
                  24. सुबह उठने,  बाहर से आने और कुछ भी खाने-पीने से पहले बच्चों से हाथ धुलवाने की आदत बनानी होगी। 
                  25. सबसे बड़ी आदत जो हमें खुद में और बच्चों में विकसित करनी होगी, वह अपना मुंह-नाक-आँख  कभी भी नहीं छूना है । 
                  26. खांसी और छींक का क्या है, जरूरी नहीं यह आये तो हमारे सामने टिश्यू पेपर हो, ऐसी स्थिति में कपडे का गला उठाकर अपना मुँह-नाक इसके अंदर करके हम छींक सकते हैं। बच्चों को भी ऐसा ही सिखाएं। 
                  27. आप स्वयं भी न तो कहीं भी थूके और न ही किसी को थूकने दें। सरकार को थूकनेवालों पर कड़ी कार्रवाई करनी होगी। 
                  हर वक्त मन को खुश रखें, मन के हारे हार है मन के जीते जीत।  चुनौतियाँ आयी हैं तो जाएंगी भी !


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