बडा ढैया और छोटा ढैया


ज्‍योतिष में विश्‍वास रखनेवाले सभी लोगों को एक बडे ढैया की जानकारी अवश्‍य होगी , जो ढाई वर्षों तक अपना प्रभाव न सिर्फ बनाए रहता है , वरन बहुत ही बुरी हालत में लोगों को जीने को विवश भी कर देता है। हालांकि इसकी सही गणना कर पाने में परंपरागत ज्‍योतिषी अभी तक सक्षम नहीं हो सके हैं कि वास्‍तव में किसी जातक पर ढैया का प्रभाव कब से कब तक पडेगा , फिर भी इस ढैया को लेकर जनमानस में बडा भय देखने को मिलता है। 

ज्‍योतिषीय द़ृष्टि से भी ढाई वर्षों के इस महत्‍व का कारण बिल्‍कुल वैज्ञानिक है। शनि को आसमान के चारो ओर के 360 डिग्री को पार करने में 30 वर्ष लगते हैं और इस हिसाब से 30 डिग्री की एक राशि को पार करने में ढाई वर्ष। इन ढाई वर्षों में शनि बिल्‍कुल एक सा स्‍वभाव रखता है , शनि भी सारे संसार पर एक सा प्रभाव नहीं डालता है , वरन यह कि इन ढाई वर्षों मे वह किसी का भला , तो किसी का बुरा भी कर सकता है। आकाशीय पथ के अंडाकार होने के कारण ये ढैया कभी कभी मात्र दो ही वर्ष और कभी कभी तीन वर्ष तक अपना प्रभाव जनसामान्‍य पर दिखाते हैं। सबसे बडी बात यह है कि इस ढैया का प्रभाव सभी लोगों पर एक सा नहीं पडता है। किसी किसी व्‍यक्ति पर छोटी और बडी असफलता देने में इसकी बडी भूमिका बनी रहती है , पर कभी कभी तो यह बडा अनर्थ भी कर डालता है।

shani ki dhaiya kya hai

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अपने व्‍यतीत किए गए जीवन पर गौर करें। यदि लगातार तीन वर्षों तक किसी प्रकार का सुख या दुख आपके जीवन में आया था , तो समझ जाएं , वह शनि ग्रह के ढैया का ही प्रभाव था। मोटा मोटी रूप में देखा जाए तो बुरे तौर पर इसका प्रभाव मानव जीवन में एक बार 17 वर्ष से 19 वर्ष की उम्र में तथा दूसरी बार 46 वर्ष से 48 वर्ष की उम्र में दिखाई पडता है। तो यदि आप उम्र के इन्‍हीं पडावों पर हैं , तो सावधान रहें , शनिदेव आपपर कभी भी प्रभावी हो सकते है। आपके जीवन का हर पक्ष गडबड नहीं होगा , केवल उसी पक्ष की गडबडी आएगी , जिसका स्‍वामी आपकी कुंडली में शनि है।

जब किसी की जन्म कुंडली और गोचर में लगातार तीन राशियों में चलने वाला शनि के मध्य का तालमेल बिगड़ता है तो साढ़ेसाती की संभावना बनती है। जिसका दशाकाल चल रहा हो ग्रह पॉजिटिव हो उससे सम्बंधित अच्छा फल भी मिलता है और शनि जिस भाव का स्वामी है उसका बुरा फल मिलता है। जिसका दशाकाल चल रहा हो ग्रह नेगेटिव हो उससे सम्बंधित बुरा फल भी मिलता है और शनि जिस भाव का स्वामी है उसका बुरा फल मिलता है। 

हो सकता है , आपमें से अधिकांश लोगों का ध्‍यान इस बात पर नहीं गया हो कि छोटी छोटी कई प्रकार की समस्‍याओं से हमें लगातार ढाई दिनों तक रू ब रू होना पडता है। चाहे हमारे शरीर के किसी भी अंग में इंफेक्‍शन हो या किसी तरह की चोट का दर्द , बूढे बुजुर्गो को हमेशा ही कहते सुना है ढाई दिनों में ठीक हो जाएगा । सचमुच ही ढाई दिनों में ये समस्‍याएं समाप्‍त हो जाती हैं , चाहे इसके लिए एलोपैथी , होम्‍योपैथी , आयुर्वेदिक या घरेलू किसी भी तरह की दवाओं का उपयोग किया जाए , दवा का प्रयोग नहीं करने पर भी ये समस्‍याएं अपने शरीर के रोग प्रतिरोधक क्षमता से ही ठीक हो जाती है। यदि कोई लम्‍बी बीमारी हो , तो भी ढाई दिनों के उपरांत उसकी तीव्रता में कमी देखने को मिलती है। सिर्फ शारीरिक ही नहीं , मानसिक , बौद्धिक , घरेलू एवं अन्‍य प्रकार की समस्‍याएं भी ढाई दिनों अधिक विकट रूप में दिखाई पडती है। पूर्व की घटनाओं पर ध्‍यान दें , तो आपने भी आम जीवन में अनेको बार ढाई दिनों के अंतराल को एक सा पाया होगा। 

जिस तरह बडे ढैया के लिए शनि ग्रह को जिम्‍मेदार माना जाता है उसी तरह छोटे ढैया के लिए चंद्रमा जिम्‍मेदार है । इन ढाई दिनों को छोटा ढैया कहा जा सकता है। नाम के अनुरूप ही इसका प्रभाव भी छोटा ही होता है। ज्‍योतिषीय द़ृष्टि से भी बडे ढैया की ही तरह ढाई दिनों के इस महत्‍व का कारण बिल्‍कुल वैज्ञानिक है। पूरे आसमान के 360 डिग्री को जब 12 भागों में विभक्‍त किया जाता है , तो 30 डिग्री की एक राशि निकलती है। चूंकि चंद्रमा को पूरे 360 डिग्री का चक्‍कर लगाने में 28 दिन लगते हैं ,इस हिसाब से इस 30 डिग्री की एक राशि को पार करने में ढाई दिन ही लगने चाहिए। इन ढाई दिनों में चंद्रमा का एक सा स्‍वभाव रहता है , इसका मतलब यह नहीं कि वह सारे संसार पर एक सा प्रभाव डालता है , वरन यह कि इन ढाई दिनों मे वह किसी का भला , तो किसी का बुरा भी कर सकता है। आकाशीय पथ के अंडाकार होने के कारण ये ढैया कभी कभी मात्र दो ही दिन और कभी कभी तीन दिन तक अपना प्रभाव जनसामान्‍य पर दिखाते हैं। कभी कभी ये ढाई दिन बिल्‍कुल सामान्‍य भी होते हैं।

अपने.अपने जन्मकुंडली के हिसाब से हर व्यक्ति इस योग की तीव्रता में भिन्नता महसूस करेंगे , किसी को बड़े , तो किसी को छोटे रूप में उपलब्धि या संकट मिलते हैं , यह निर्णायक दिन होता है।

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    जन जागरूकता ही एकमात्र विकल्प।

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    मैंने पिछले पोस्ट में कोरोना के संदर्भ में 22 मार्च की तिथि का उल्लेख किया था क्योंकि इसी दिन बुध ग्रह गति साम्य हो रहा था जिससे इस बात की सूचना मिल रही थी कि पिछले साल नवंबर के अंत में शुरू होनेवाली किसी भी तरह की व्यक्तिगत या सामूहिक समस्या, 22 मार्च के पश्चात समाधान की दिशा में आगे बढ़ेगी। प्रधानमंत्री जी ने कोरोना के गंभीर संक्रामक स्वभाव को भलीभांति समझा और ठीक 22 मार्च को ही 'जनता कर्फ्यू' के अलावा एक के बाद एक बहुत सारे कड़े और ऐतिहासिक फैसले लिए। अगर इस वायरस के संक्रमण के मूल स्वभाव को हमारे देश की जनसंख्या की दृष्टि से देखा जाए तो ये सभी फैसले बहुत जरूरी थे। 22 मार्च को बढ़ने जो की रफ्तार थी, आज 6 दिनों के बाद भी लगभग प्रतिदिन वही है। अगर आप गौर करेंगे तो पाएंगे कि 14 मार्च के मेरे आर्टिकल पढ़नेवाले सभी पाठक 22 मार्च का इंतजार कर रहे थे और इसी तिथि के बाद से सम्पूर्ण लॉकडॉउन की स्थिति नजर आई जो इसके पहले बिल्कुल सामान्य थी। ज्ञात हो कि ज्योतिष विषय पर आधारित कोई भी भविष्यवाणी आंकड़ों के बजाय लोगो की मानसिक अवस्था को दर्शाता है। सम्पूर्ण देश ने प्रधानमंत्री जी के फैसले का स्वागत किया और इसके अपार समर्थन की झलक हमे जनता कर्फ्यू के दिन देखने को मिला।

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    इतने बड़े देश में मरीजों की इतनी संख्या का बढना बिल्कुल स्वभाविक खासकर तब जबकि रोग इतना संक्रामक हो और पूरा विश्व इससे जूझ रहा हो। फिर भी ऐसे सभी मरीजों और इनके साथ रहने वालों की पहचान और क्वारंटाइन किया जाना बेहद जरूरी है। ऐसे संकट के दौर में अभूतपूर्व फैसलों के लिए प्रधानमंत्री की जितनी भी प्रशंसा की जाए कम है, बढ़ने की रफ्तार को स्टैगनेंट कर पाने में सफल रहे हैं लेकिन अब भारत के हर नागरिक का भी कर्तव्य है कि वे भी अलग-थलग रहकर इस बीमारी को कम करने में अपना सहयोग देते रहें। फासला रखकर अन्य लोगों को भी जागरूक बनाएं। इसके अलावा प्रतिदिन बढ़ने वाली संख्या पर गौर करते रहें, जैसे ही प्रतिदिन नए केस की संख्या सौ से अधिक होने लगे तो अतिरिक्त सावधानी बरतने की जरूरत पड़ेगी, इसे रोकने के लिए हर नागरिक लापरवाही बरतने वालों को समझाए या इन्हे रोकने में प्रशासन की मदद ले। लॉकडाउन की स्थिति में बड़ी तादाद में लोगों के पलायन की भी खबरें आ रही हैं, जो जहां तक पहुंचे हैं, स्थानीय प्रशासन/राजनेताओं को उनके स्वास्थ्य एवं संसाधन की अस्थाई व्यवस्था की जिम्मेवारी लेनी चाहिए।


    मैं 'गत्यात्मक ज्योतिष' का जन्मदाता और समय विशेषज्ञ हूँ तथा पिछले 50 वर्षों से अधिक समय से ज्योतिष मेरा कार्यक्षेत्र रहा है। परम्परागत ज्योतिष के प्राचीनतम सभी प्रतिपादित नियमों एवं सिद्धांतो के अध्ययन के पश्चात इनके गैर जरूरी पक्ष को दरकिनार करते हुए ज्योतिष के एक नए वैज्ञानिक स्वरूप 'गत्यात्मक ज्योतिष' को स्थापित किया है। 1971 में ज्योतिष से सम्बंधित मेरा पहला लेख शक्ति नगर, दिल्ली से प्रकाशित हुआ था और फिर लेखन का सिलसिला अनवरत जारी रहा है। 'गत्यात्मक ज्योतिष' ही फलित ज्योतिष की एकमात्र ऐसी विधा है जो विश्वास पूर्वक तिथि संयुक्त भविष्यवाणी कर पाने में सक्षम है और इसका प्रमाण कई बार आपको मिल चुका है।


    यूं तो चीन के कोरोना वायरस की चर्चा बहुत दिनों से हो रही थी। विश्व के विभिन्न भागों में इसकी विभीषिका का तांडव सुनता और समझता आ रहा था। जनवरी के अंत में केरल में इक्के दुक्के केस से इसकी शुरुआत एवं मार्च के प्रारम्भ से ही यह भारत के अन्य भागों में भी दस्तक देना शुरू कर दिया था। प्रतिदिन धीमी गति से कोरोना अपना पैर पसार रहा था। जब मैं 14 मार्च को कोरोना से सम्बन्धित पहला आर्टिकल पोस्ट कर रहा था उस समय भारत में मरीजों की संख्या 96 थी। किसी ने पूछा, भारत में इसकी रोकथाम कब से हो सकेगी? मैंने सहज भाव से कहा - 22 मार्च से इसकी रोकथाम के लिए आवश्यक कदम उठा लिए जायेंगे और मरीजों की बढ़ने वाली संख्या में कमी होने लगेगी। तब मुझे मालूम नहीं था कि कोरोना का विस्तार अलग-अलग चरणों में अलग-अलग तरह से होता है।


    विदेशों में भी जहां आज लाखों की तादाद में इसके शिकार हुए हैं इसका प्रारम्भ एक-दो से ही हुआ था और तीसरे-चौथे चरणों में ये लाखों की संख्या में पहुंच गए। दरअसल पहले और दूसरे चरण में इसका प्रसार एरिथमेटिक प्रोग्रेसन की तरह होता है जैसे 1, 2, 3, 4 की तरह या 1, 11, 21, 31, 41 आदि की तरह, ऐसा होने पर मरीजों की संख्या लाखों तक नहीं पहुंचती। मैं भी इसी रफ्तार की बात सोच रहा था। यह मुझे पक्का विश्वास था कि इस खतरनाक बीमारी को रोकने के लिए सरकार की तरफ से कोई न कोई कदम अवश्य उठाया जायेगा जिससे मरीजों की संख्या 22 मार्च के बाद कम होने लगेगी। लेकिन जब मुझे मालूम हुआ कि कोरोना का असली प्रसार तीसरे-चौथे चरण में बहुत तेजी से होता है तो उसे जानकर किसी की भी रूह कांप जाए। उदाहरण के लिए अगर पहले सप्ताह मरीजों की संख्या लगभग 100 के आसपास दूसरे सप्ताह 1000 तीसरे सप्ताह 10000 चौथे सप्ताह 1 लाख हो जाता तो इस प्रकार से बढ़ने के रफ्तार को ज्योमेट्रिकल प्रोग्रेसन से बढ़ने की प्रक्रिया कहते हैं। अगर भारत में इस रफ्तार से मरीजों के बढ़ने की बात होती तो यहां की जनसंख्या और मेडिकल इंफ्रास्ट्रक्चर को देखते हुए भारतवासियों के लिए बहुत दुर्भाग्य की बात होती।


    22 मार्च के पश्चात पुनः 1 या 2 अप्रैल भी एक ऐसी तिथि है जहां इस संदर्भ में कुछ और स्पष्टता और वर्तमान पैटर्न में कुछ परिवर्तन की उम्मीद की जा सकती है, जो हम सभी की आगे की दशा और दिशा तय करेगी। इस वायरस के संक्रामक प्रसार और सरकार द्वारा किए जा रहे सघन प्रयास के बीच रस्साकस्सी में मानवता की जीत सुनिश्चित करने के लिए हम सभी को कुछ दिनों तक काफी संयमित रहने की जरूरत है क्योंकि थोड़ी भी लापरवाही बहुत ही भयावह दृश्य उत्पन्न कर सकती है। जन जागरूकता ही एकमात्र ऐसा विकल्प है जिससे इस मुसीबत पर काबू पाया जा सकता है। कोरोना के सम्पूर्ण स्वभाव को समझते हुए इसकी समाप्ति पर कोई भविष्यवाणी करना कठिन है लेकिन ऐसा लगता है, जनजीवन की जीवन शैली में अकस्मात कोई सुधार की अपेक्षा नहीं करते हुए देश के एक-एक नागरिक को जागरूक होकर कम से कम एक महीने तक काम करना होगा। क्रमिक सुधार स्वयं होता चला जायगा।


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      Best app : Online jyotish in English & Hindi

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      Assuming the Earth in the center the 360 degrees of the whole universe is divided into 12 equal parts by which all Rashies become 30 degrees each. All these Rashies are called Aries, Taurus, Gemini, Cancer, Leo, Virgo, Libra, Scorpio, Sagittarius, Capricorn, Aquarius, and Pisces. Three Rashies are importantly considered in any horoscope. Firstly the Rashi in which the Sun in the horoscope of a native situated is considered as sun Rashi. Next Rashi in which the Moon in the horoscope of a native situated is considered as Moon Rashi. The Rashi which is rising on the eastern horizon at the time of the birth of a native is importantly considered as Lagna Rashi. All those people having got birth in the duration of one particular month fall under the one Sun Rashi while all those people having got birth in the particular duration of around two and a half-days fall under the one Moon Rashi. 

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      Online Rashifal in English based on Kundali

      We often see Rashiphal in almost all the newspapers and magazines these days. In some magazines, predictions are described as per Sun Rashi while in some other magazines these are described as per Moon Rashi but these are all unscientific while millions of people fall into the trap of it in vain. If Lagna Rashiphals is got to be started instead of Sun Rashiphal and Moon Rashiphal, then readers will of course be benefitted very much because if the difference is there of merely two hours in the births of two natives, then the one difference is sure to be there of change of ascendant while in Moon Rashi that difference takes place around after two and a half-day (the natives having taken birth during this period falls under the same Moon Rashi) and in Sun Rashi such change takes place after a month (the natives having taken birth during this period falls under the same Sun Rashi). But since the readers are unaware of their own ascendants, astrologers manage to get the Rashiphal published in the magazines and newspapers for the public to avail it easily but it puts a question mark of the scientificness of astrology.

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      Any type of time-bound accurate prediction can be done on the basis of the ascendant of a person but there might be some difference in the intensity for several persons. The Lagnaphal written for some particular month will be the same for billions of people of that particular Lagna although there might be some difference in level, environment, circumstances, and some difference relative to their birth time planets. For instance, in some particular time for some ascendant, the profit of a laborer can be rupees 250 to 500 while for a businessman such profit can be in millions of rupees. Such a type of prediction can be made on the basis of ‘Gatyatmak Gochar Pranali’. 

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      All the more Gatyatmak Jyotish has managed to provide Daily & Yearly predictions through the app Gatyatmak Jyotish on the basis of the mutual correlation between birth time all planets' situation and its current moving position. So please don't forget to install the app and sign up with your birth details, thereafter you can feel its accuracy through Gatyatmak Jyotish App.


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        Is astrology a science

         

        Is astrology a science 

        Whether predictive astrology is a science or superstition, is not an easy question to answer. Traditional and superstitious people who have been cheated because of their belief in astrologers have not lost their faith in astrology as such. People of high intellect and scientific background have been seen to approach astrologers secretly. I would blame the government, educational institutions, and media for this controversial situation of astrology.

        Astrology a science or myth

        Till today they have neither proved astrology to be a science nor a superstition. If they would have believed astrology to be merely a superstition, then astrologers involved in making and matching horoscopes could have found themselves in legal problems. People involved in performing and ‘tantra-mantra’ could have found themselves behind bars, and the publication of horoscopes in various magazines would have been banned.

        evil customs

        The government took steps to restrict the practice of evil customs like- gambling, drinking, child-marriage, ‘sati-pratha’ (woman willingly burns herself on her husband’s funeral pyre); but it did not try and stop the practice of astrology, why? Is it because the government believes astrology to be a science- No.

        Is astrology a real science

        If it would have believed so then it would have conducted competitions and seminars in this field and would have awarded the scholars or at least given them some incentives. But nothing of the kind has been done to date. If we look at the print media they have printed articles on ‘tantra-mantra’, astrology, interviews of astrologers, forecasts, etc. But what is the use of such articles when they have not been able to reach any conclusion over this controversy nor pass any message to their readers?

        Newspaper

        The selection of astrologers by the publishers for their articles is based on professional success rather than their deep knowledge of the field. These successful astrologers do not care for the development of predictive astrology. Representation of astrology by such astrologers fails to pass any substantial message to the readers. The publishers should encourage those astrologers to publish articles that can prove astrology to be a science. They should take up a case study based on a person’s place, date, and time of birth and invite astrologers to give their personal readings of that particular horoscope; and that astrologer who is able to predict it most accurately should be given a place in newspapers and magazines.


        Is astrology a science

        Is astrology a science 

        But never an astrologer has been asked to prove his knowledge by either a governmental, non-governmental or educational institution. Hence the astrologers with deep knowledge of the field could never come forward and society kept getting fooled by hoaxers.

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        Astrology thus can be said to be a Symbolic science. According to the law of probability, there is a 50% chance of an incident happening or not happening. But if on some base the possibility of an incident can be raised to 60, 70, or even 80% then we can definitely call it a science. But in order to achieve this one needs to study and research this field in depth.

        Let’s take the example of medical science- At any given time some of the other new diseases force the doctors to do research on it. An effort is made to establish a relationship between cause and effect on the basis of a hypothesis, but success in the first attempt itself is not assured. Several tests have to be conducted, a lot of money and time is expended on these tests, then only one reaches a conclusion.

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        Take the example of Geology- initially work is done on the assumption that rich mineral resources could be found in a particular place, but it is not a certainty. But with the development of geological science, one can predict cent percent, without much expenditure, where these resources actually are. A few decades backspace technology was also not so advanced. An unlimited amount was spent on making satellites, but these were destroyed immediately after projection. Thereafter efforts were put in to modify them, which has shown positive results. Weather forecasts done on the basis of photographs procured from these satellites are becoming more and more precise day-by-day.

        But such is not the case with astrology. Most people are not ready to accept it as a science, and those who do are blind supporters of it. They do not question the predictions made by astrologers. Hence, the astrologers, misuse this blind trust laid in them. They misguide the people for their own personal benefits. That’s why people apprehensive of approaching astrologers. Even if the astrologer does predict the future correctly, he might not get so much appreciation in comparison to the repartee he would get on making a false prediction. Hence, till now the astrologers take a safe way out.

        For example, if they tell a person, “You are going to face huge problems in the future, get some ‘puja’ done!” If the person does not perform the prayer and he faces difficulties- then the astrologer was right; if he performs the prayer and still faces problems then what would have happened if he wouldn’t have performed it; and last but not the least if the problem really does not occur by performing the puja then the astrologer is believed to have really eroded the problem. In this way, an astrologer may gain, but eventually, predictive astrology is at a loss.

        But the fact is that despite of uncountable hindrances development is in the nature of all things when the time is right. Nature sees to it that the seeds that it has sowed also get the nourishment. Even when it is ignored it goes back to nature. Today when governmental and non-governmental organizations totally disregard astrology as a science or are forced to rely on professionally accomplished astrologers, when traditional astrologers are misguided by the ‘Rahu-Ketu’ and ‘vimshottari system’; people are unaware of the fact that dynamic astrology has also developed in this computer age. After the research done by the” Dynamic Astrological Research Centre” on the static and dynamic strength of planets, astrology today has become an objective science.

        Through this newly found system, the native can receive a graph on the ups and downs of his whole life. According to dynamic astrology, like the glands of the planets, too affect a person at specific periods in his life. Moon, which represents the heart, affects the child from his birth till the age of twelve years. Mercury, representing the mind, affects a juvenile in the learning stage to learn and grasp new things. Mars, otherwise known as the planet of courage, affects its native from the age of twenty-four to thirty-six. At the age of thirty-six to forty-eight, a person becomes more tactful and experienced in his field of work, hence the planet affecting this tact is Venus. Amongst all planets sun is the most powerful.

        At the age between forty-eight and sixty a person has to take the most responsibilities in his life, it is a period in his life when his patience and ardor are tested. Thus, the sun affects a person the most at this stage. Sixty to seventy-two years is the time of retiring from all responsibilities and leading a religious life. The planet of chastity is Jupiter which affects the people at this age. The farthest planets Saturn, Uranus, Neptune, and Pluto affect a person in his old age after seventy-two. 

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          कोरोना लॉक डाउन में आसानी से बनाये खाये ------

          Easy to cook food items in corona lock down



          चीन के वुहान शहर निकला कोरोना वायरस भले ही चीन के दूसरे शहरों तक नहीं पहुँचा, पर पूरे विश्व के लिए तबाही का मंजर लेकर आया है। उनके अनुभवों से फायदा लेते हुए हमारे प्रधान-मंत्री ने कोरोना को हराने के लिए पूरे देश में 21 दिनों लॉक डाउन कर दिया है। जैसे भी रहना है, घर में ही रहना है, तभी कोरोना वायरस के दैत्य से पूरे देश को छुटकारा मिल सकता है। अचानक अनाउंस किये गए इस वक्तव्य से सबको असुविधा होनी स्वाभाविक है। गरीबों को काम मिलना बंद, पैसों की कमी हो गयी है, वैसे स्वयंसेवी संगठन भी जोर-शोर से काम में लगे हैं। काम करने वाली सहायिकाएँ नहीं आ रही, बच्चे स्कूल नहीं जा रहे, पतिदेव को वर्क फ्रॉम होम मिला हुआ है। सबका ख्याल भी रखना है, बीमारी के कारण अतिरिक्त सफाई भी रखनी है, महिलाओं को दिनभर काम करना पड़ रहा है। इस समय हर परिवार में पुरुष महिलाओं के सहयोगी के रूप में उभरें है, हर काम में मदद कर रहे हैं, ताकि पत्नी को सहायिकाओं की कमी न खले। जिनके पास व्यवस्था है, कुल मिलाकर उनकी स्थिति अच्छी है। पर सरकार ने भले ही आश्वस्त किया है कि वे खाने-पीने की वस्तुओं की कमी नहीं होने देंगे, फिर भी सबलोग अंदाज से ही खाना बनाएँ ताकि अन्न की बर्वादी न हो। पिकनिक मनाने का समय नहीं है अभी।

          Fast Easy food to cook 


          सबसे बुरी स्थिति पूरे देश में जहाँ तहाँ घर में अकेले रहने वाले बूढ़े, घर से हाल-फिलहाल निकले विद्यार्थी, 10-12 घंटे ऑफिस का काम करनेवाले युवक-युवतियों की हैं, जो घर के काम के लिए पूर्ण तौर पर सहायिकाओं पर ही निर्भर थे। सहायिकाओं की अनुपस्थिति में उन्हें होटल से खाना मंगवाना पड़ता था, जो अभी बंद चल रहे हैं। उन्हें तकलीफ तो हो रही होगी, पर दिन तो काटने ही होंगे। यदि 21 दिनों में सब ठीक-ठाक हो गया तो बढ़िया, यदि नहीं हुआ तो लॉक-डाउन बढ़ाया भी जा सकता है। इसलिए बेहतर होगा कि वे कुछ भी पकाकर, उबालकर, तलकर खाना सीख लें। साथ ही अपने शरीर, कपडे, घर को साफ़-सुथरा बनाये रखने की अतिरिक्त जिम्मेदारी है, अभी खाने में बिलकुल कामचलाऊ और जरूरी सामान ही बनाये। यदि अभी आप सिर्फ जीने के लिए खाएंगे, जो आपके स्वास्थ्य के लिए भी अच्छा होगा और आपको घर से कम से कम निकलना होगा। अभी के हालत में यह बहुत आवश्यक है, कोरोना से जंग में जीत के बाद हम फिर खाने के लिए जी सकते हैं। उनके लिए ही यह पोस्ट लिखने की जरूरत महसूस हुई।

          Easy to cook for vacation 

          मैगी, पैकेट के बने-बनाये सामान और फ़ास्ट फ़ूड के चक्कर में न पड़े, स्वस्थ रहने के लिए अनाज पकाकर खाएं :-------- 



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          1. प्रत्येक घर में कुकर होता ही है, 100 ग्राम चावल में 200 ग्राम पानी डालकर 1 सिटी लगाने से एक व्यक्ति के खाने का चावल बन जाता है। चावल धोकर डालें, प्रेशर खुद से निकलने दे और चावल निकालकर खाएं। 
          2. मीठा पसंद करने वाले लोग इसे भी दूध-चीनी के साथ ( यदि घर तक दूधवाला आ रहा हो या दूध के पैकेट मंगवा पा रहे हों, तो खौलते दूध में इसे चीनी के साथ डालें ) थोड़ी देर बाद खाएं। 
          3. नमकीन पसंद करनेवाले दूध का दही जमाकर या दही के पैकेट मंगवाकर हल्का नमक लेकर इसे खा सकते हैं।  
          4. यदि दूध दही नहीं हो, तो एक बड़ी कलछी या कटोरे में घी गरम करें, कड़ाही का भी उपयोग कर सकते हैं। घी गर्म होने के बाद आँच बंद करें और उसमे पहले से छीलकर रखा हुआ लहसुन, आधे चम्मच नमक और एक चौथाई चम्मच हल्दी डालें। लहसुन लाल हो जायेगा, यदि न हो तो बस एक मिनट के लिए आंच ऑन करें। लहसुन पसंद करने वाले इसे चावल में डालकर बड़े शौक से खाते हैं। 
          5. यदि लहसुन न पसंद हो तो उसे निकाल दे सिर्फ घी, नमक, हल्दी चावल में डालकर खाएं। 
          6. यदि सूखा सूखा चावल आपके गले में अंटकता है तो आप चावल बनाते वक्त चावल के दुगुने की जगह तीनगुना पानी डाल दें । एक व्यक्ति के लिए पानी 200 ग्राम ही रखें, चावल 100 की जगह 70 ग्राम लें। पेट खराब होने पर जो चावल आपको दिया जाता था, एक सिटी में वही चावल बन जायेगा। ये भी दही के साथ खाया जाता है। 
          7. इसमें स्वाद की कमी दिख रही हो तो कढ़ाही में कोई दाल भूनकर रख लें। कुकर बराबर मात्रा में 100 ग्राम धुले दाल-चावल, 400 ग्राम पानी डालकर एक सिटी लगा ले। अचार, पापड़ के साथ यह खिचड़ी खा सकते हैं। एक व्यक्ति के लिए मात्रा मैंने इसलिए बताई है कि सामान बर्वाद न हो, एक बार खाना घटने बढ़ने के हिसाब से आप थोड़ा अंतर कर सकते हैं। 
          8. जिनको चावल खाने की मनाही हो, वे बराबर मात्रा में 100 ग्राम भुना दाल-दलिया, 400 ग्राम पानी डालकर एक सिटी लगा ले। अचार, पापड़ के साथ यह दलिया खा सकते हैं। 
          9. चावल के साथ दाल बनाने के लिए भी पानी की उतनी ही मात्रा लेनी है, जितनी आपने चावल के लिए ली थी, यानी 100 ग्राम या थोड़ा कम, लेकिन चावल की तरह दाल पानी का आधा नहीं, 1/5 लेना है। कूकर में पानी, धोयी हुई दाल, छोटी चम्मच नमक और एक चौथाई चम्मच हल्दी डालें। एक सिटी लगाने के बाद 5 मिनट सिम पर रखें। प्रेशर ख़त्म होने पर दूसरे बर्तन में ढाल लें और चावल चढ़ा लें। 
          10. चावल-दाल के साथ आप आलू को उबालकर मैश करके नमक-तेल डालकर खाएँ। एक कलछी या कड़ाही में तेल गर्म करके ऑफ कर लें। लालमिर्च, जीरा तेल में डालें और लाल होने पर तेल सहित इस छौंक को थोड़ा दाल और थोड़ा मैश आलू में डाले। 
          11. आलू को मैश करके खाने की इच्छा न हो, तो उबले आलू को 8-10 भाग में काटकर कड़ाही में तेल गर्मकर मिर्च, जीरा डालें और कटे आलू में नमक-हल्दी डालकर थोड़ा भूनकर खाएं। 
          12. थोड़ा आलू छीलना, प्याज काटना भी जानते हों तो ऊपर के खाने को और अच्छा बनाया जा सकता है। चावल को धोकर छन्नी में छान लें, कूकर में तेल या घी डालकर थोड़ा जीरा तड़काएं , एक प्याज-मिर्च को काटकर डालें, मध्यम आंच में थोड़ा भुने, लाल न होने दें, एक छिले आलू के 8-10 टुकड़े डालकर आधे चम्मच नमक और एक चौथाई चम्मच साथ डाले, 2-3 मिनट भुने , फिर चावल डालकर थोड़ा भुने , घी हो तो डाल दें, 5 मिनट भूनकर आपके पास कोई मसाले हों तो आधे चम्मच डाल दें। दोगुना पानी डालकर एक सिटी लगा लें। यह फ्राइड राइस आप ऐसे भी खा सकते हैं। 
          13. इसका स्वाद बढ़ाने के लिए यदि टमाटर हो तो उन्हें उबालकर मैश करके नमक, तेल , कटे प्याज, स्वादानुसार मिर्च डालकर नमकीन चटनी बना लें। 
          14. इसी प्रोसेस से आप स्वादिष्ट खिचड़ी बना सकते हैं कूकर में तेल या घी डालकर थोड़ा जीरा तड़काएं , एक प्याज-मिर्च को काटकर डालें , मध्यम आंच में थोड़ा भुने, लाल न होने दें, एक छिले आलू के 8-10 टुकड़े डालकर आधे चम्मच नमक और एक चौथाई चम्मच साथ डाले, 2-3 मिनट भुने , फिर 100 ग्राम दाल-चावल (दोनों बराबर मात्रा में) डालकर थोड़ा भुने, घी हो तो डाल दें, 5 मिनट भूनकर आपके पास कोई मसाले हों तो आधे चम्मच डाल दें। चारगुना पानी डालकर एक सिटी लगा लें। ऐसी खिचड़ी बहुत स्वादिष्ट लगेगी। 
          15. चावल खाना मना हो तो चावल की जगह दाल-दलिया की खिचड़ी भी इसी प्रोसेस से बना सकते हैं। कूकर में तेल या घी डालकर थोड़ा जीरा तड़काएं, एक प्याज-मिर्च को काटकर डालें, माध्यम आंच में थोड़ा भुने, लाल न होने दें, एक छिले आलू के 8-10 टुकड़े डालकर आधे चम्मच नमक और एक चौथाई चम्मच साथ डाले, 2-3 मिनट भुने , फिर 100 ग्राम दाल-दलिया ले डालकर थोड़ा भुने, घी हो तो डाल दें, 5 मिनट भूनकर आपके पास कोई मसाले हों तो आधे चम्मच डाल दें। चारगुना पानी डालकर एक सिटी लगा लें। ये दलिया बहुत स्वादिष्ट लगेगी। 
          16. प्याज हमेशा बोर्ड पर काटें, अदरक कद्दूकस करें, लहसुन और मिर्च कैची से काटे ---- इतना सीख जाएँ तो आप चावल के साथ स्वादिष्ट दाल, तड़का, छोले, राजमा कुछ भी बना सकते हैं। सबकी मात्रा एक व्यक्ति के लिए 50 ग्राम। कुकर चढ़ाये, तेल गर्म होने पर जीरा तड़काएं, एक प्याज, एक मिर्च , थोड़ी लहसुन , थोड़ी अदरक - सारी कटी हुई कूकर में डालें। थोड़ा भूनकर आधे चम्मच मसाले डालें, मसाला भुनने के लिए थोड़ा पानी डालें। एक टमाटर डालें, फिर 1 घंटे भीगा हुआ कोई भी दाल या मिला-जुला दाल डालकर थोड़ा भुने, चारगुना पानी डालें। तेज आंच में एक सिटी लगने के बाद 5 मिनट सिम पर रखें। प्रेशर निकल जाने पर कटोरे में पलट दें और इसी कूकर में ऊपर बताये विधि से चावल बना लें। 
          17. कुकर चढ़ाये, तेल गर्म होने पर जीरा तड़काएं, एक प्याज, एक मिर्च , थोड़ी लहसुन , थोड़ी अदरक - सारी कटी हुई कूकर में डालें। थोड़ा भूनकर आधे चम्मच मसाले डालें, मसाला भुनने के लिए थोड़ा पानी डालें। एक टमाटर डालें, फिर 6 घंटे भीगा हुआ छोले, राजमा, जो भी हो, डालकर थोड़ा भुने, चारगुना पानी डालें। तेज आंच में एक सिटी लगने के बाद 15 मिनट सिम पर रखें। प्रेशर निकालने की भूल न करें। प्रेशर निकल जाने पर कटोरे में पलट दें और इसी कूकर में ऊपर बताये विधि से चावल बना लें। 
          18. कड़ाही में इसी प्रोसेस से आप पोहा, उपमा, दलिया भी बना सकते हैं। सबकी मात्रा एक व्यक्ति के लिए 50 ग्राम। पोहा बनाना हो तो इसे धोकर छन्नी में छाने, कड़ाही चढ़ाये , तेल गर्म होने पर सरसों तड़काएं, एक प्याज, एक मिर्च, थोड़ा अदरक - सारी कटी हुई कड़ाही में डालें। एक टमाटर डालें और भुने, फिर पोहा डालकर सबको मिक्स करें। थोड़ी देर ढंककर छोड़ देने से पोहा तैयार हो जायेगा । 
          19. उपमा बनाना हो तो कड़ाही में सूजी भुनकर निकाले, फिर तेल डालें, गर्म होने पर सरसों तड़काएं, एक प्याज, एक मिर्च, थोड़ा अदरक - सारी कटी हुई कड़ाही में डालें। थोड़ा भूनकर एक टमाटर डालें और भुने, फिर सूजी डालकर सबको मिक्स करें। चारगुना पानी डालकर ढंककर गरम होने तक तेज आंच रखें, फिर 2 मिनट सिम पर छोड़ दें। 
          20. दलिया बनाना हो तो कड़ाही में दलिया भुनकर निकाले , तेल गर्म होने पर जीरा तड़काएं, एक प्याज, एक मिर्च, थोड़ा अदरक - सारी कटी हुई कड़ाही में डालें। एक टमाटर डालें और भुने, फिर दलिया, जो भी हो, डालकर सबको मिक्स करें। छह गुना पानी डालकर ढंककर गरम होने तक तेज आंच रखें, फिर 2 मिनट सिम पर छोड़ दें। 
          21. घर मे दही हो तो 100 ग्राम दही मे दो चम्मच बेसन, एक चम्मच नमक, आधे चम्मच हल्दी मिलाकर रखें, कढ़ाई मे दो चम्मच तेल गर्म करें, एक लाल मिर्च और थोड़ा जीरा डाले, इनके लाल होने पर दही-बेसन-नमक-हल्दी का घोल कड़ाही मे डाल दें. खोलने पर सिम पर करें. 5 मिनट मे ऑफ कर दें. पकौड़ों की जगह आप इसमें बूंदी डाल सकते हैं. 
          22. पुलाव के लिए चावल धोकर छलनी मे रखना है. कढ़ाही मे रिफाइन, रिफाइन मे लौंग-इलाइची-काजू-किशमिश डालकर चावल भून लें . इस चावल को दुगुने पानी के साथ कुकर मे एक सिटी लगा लें. पुलाव बन जायेगा. 
          23. इसके साथ पनीर की सब्जी बनानी हो तो पनीर का कोई भी रेसिपी बनाने से पहले पनीर को जैसे धोते-काटते हो वैसे काट लें। कड़ाही मे रिफाइन्ड डाले , पनीर तलकर निकालकर अलग रखें . जीरा डालकर प्याज छौंक दें, थोड़ा नमक डालकर धीमी आंच मे छोड़ दो, धीमी आंच मे लाल होने तक प्याज गल जाता है. फिर छोटा टमाटर,धनिया-जीरा-मिर्च- नमक-हल्दी डालकर भुने, फिर रस के लिए थोड़ा दूध डालें. ढक्कन थोड़ा खुला रखें , थोड़ा खौलने पर पनीर डाल दें . सब्जी तैयार है। 
          24. जिन्हे रोटी-सब्जी बनानी आती है, उनके लिए तो कोई दिक्कत ही नहीं। 


          (मैं यह मानकर चल रही हूँ कि आप सीमित साधनों में रह रहें हैं , यदि नहीं तो चावल, खिचड़ी, दलिया में गोभी मटर, गाजर बीन्स जैसी हरी सब्जियों का उपयोग हो सकता है )


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