कोरोना पर विजय प्राप्त करने हेतु जन जागरूकता ही एकमात्र विकल्प।

how to prevent coronavirus 


मैंने पिछले पोस्ट में कोरोना के संदर्भ में 22 मार्च की तिथि का उल्लेख किया था क्योंकि इसी दिन बुध ग्रह गति साम्य हो रहा था जिससे इस बात की सूचना मिल रही थी कि पिछले साल नवंबर के अंत में शुरू होनेवाली किसी भी तरह की व्यक्तिगत या सामूहिक समस्या, 22 मार्च के पश्चात समाधान की दिशा में आगे बढ़ेगी। प्रधानमंत्री जी ने कोरोना के गंभीर संक्रामक स्वभाव को भलीभांति समझा और ठीक 22 मार्च को ही 'जनता कर्फ्यू' के अलावा एक के बाद एक बहुत सारे कड़े और ऐतिहासिक फैसले लिए। अगर इस वायरस के संक्रमण के मूल स्वभाव को हमारे देश की जनसंख्या की दृष्टि से देखा जाए तो ये सभी फैसले बहुत जरूरी थे। 22 मार्च को बढ़ने जो की रफ्तार थी, आज 6 दिनों के बाद भी लगभग प्रतिदिन वही है। अगर आप गौर करेंगे तो पाएंगे कि 14 मार्च के मेरे आर्टिकल पढ़नेवाले सभी पाठक 22 मार्च का इंतजार कर रहे थे और इसी तिथि के बाद से सम्पूर्ण लॉकडॉउन की स्थिति नजर आई जो इसके पहले बिल्कुल सामान्य थी। ज्ञात हो कि ज्योतिष विषय पर आधारित कोई भी भविष्यवाणी आंकड़ों के बजाय लोगो की मानसिक अवस्था को दर्शाता है। सम्पूर्ण देश ने प्रधानमंत्री जी के फैसले का स्वागत किया और इसके अपार समर्थन की झलक हमे जनता कर्फ्यू के दिन देखने को मिला।

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इतने बड़े देश में मरीजों की इतनी संख्या का बढना बिल्कुल स्वभाविक खासकर तब जबकि रोग इतना संक्रामक हो और पूरा विश्व इससे जूझ रहा हो। फिर भी ऐसे सभी मरीजों और इनके साथ रहने वालों की पहचान और क्वारंटाइन किया जाना बेहद जरूरी है। ऐसे संकट के दौर में अभूतपूर्व फैसलों के लिए प्रधानमंत्री की जितनी भी प्रशंसा की जाए कम है, बढ़ने की रफ्तार को स्टैगनेंट कर पाने में सफल रहे हैं लेकिन अब भारत के हर नागरिक का भी कर्तव्य है कि वे भी अलग-थलग रहकर इस बीमारी को कम करने में अपना सहयोग देते रहें। फासला रखकर अन्य लोगों को भी जागरूक बनाएं। इसके अलावा प्रतिदिन बढ़ने वाली संख्या पर गौर करते रहें, जैसे ही प्रतिदिन नए केस की संख्या सौ से अधिक होने लगे तो अतिरिक्त सावधानी बरतने की जरूरत पड़ेगी, इसे रोकने के लिए हर नागरिक लापरवाही बरतने वालों को समझाए या इन्हे रोकने में प्रशासन की मदद ले। लॉकडाउन की स्थिति में बड़ी तादाद में लोगों के पलायन की भी खबरें आ रही हैं, जो जहां तक पहुंचे हैं, स्थानीय प्रशासन/राजनेताओं को उनके स्वास्थ्य एवं संसाधन की अस्थाई व्यवस्था की जिम्मेवारी लेनी चाहिए।


मैं 'गत्यात्मक ज्योतिष' का जन्मदाता और समय विशेषज्ञ हूँ तथा पिछले 50 वर्षों से अधिक समय से ज्योतिष मेरा कार्यक्षेत्र रहा है। परम्परागत ज्योतिष के प्राचीनतम सभी प्रतिपादित नियमों एवं सिद्धांतो के अध्ययन के पश्चात इनके गैर जरूरी पक्ष को दरकिनार करते हुए ज्योतिष के एक नए वैज्ञानिक स्वरूप 'गत्यात्मक ज्योतिष' को स्थापित किया है। 1971 में ज्योतिष से सम्बंधित मेरा पहला लेख शक्ति नगर, दिल्ली से प्रकाशित हुआ था और फिर लेखन का सिलसिला अनवरत जारी रहा है। 'गत्यात्मक ज्योतिष' ही फलित ज्योतिष की एकमात्र ऐसी विधा है जो विश्वास पूर्वक तिथि संयुक्त भविष्यवाणी कर पाने में सक्षम है और इसका प्रमाण कई बार आपको मिल चुका है।


यूं तो चीन के कोरोना वायरस की चर्चा बहुत दिनों से हो रही थी। विश्व के विभिन्न भागों में इसकी विभीषिका का तांडव सुनता और समझता आ रहा था। जनवरी के अंत में केरल में इक्के दुक्के केस से इसकी शुरुआत एवं मार्च के प्रारम्भ से ही यह भारत के अन्य भागों में भी दस्तक देना शुरू कर दिया था। प्रतिदिन धीमी गति से कोरोना अपना पैर पसार रहा था। जब मैं 14 मार्च को कोरोना से सम्बन्धित पहला आर्टिकल पोस्ट कर रहा था उस समय भारत में मरीजों की संख्या 96 थी। किसी ने पूछा, भारत में इसकी रोकथाम कब से हो सकेगी? मैंने सहज भाव से कहा - 22 मार्च से इसकी रोकथाम के लिए आवश्यक कदम उठा लिए जायेंगे और मरीजों की बढ़ने वाली संख्या में कमी होने लगेगी। तब मुझे मालूम नहीं था कि कोरोना का विस्तार अलग-अलग चरणों में अलग-अलग तरह से होता है।


विदेशों में भी जहां आज लाखों की तादाद में इसके शिकार हुए हैं इसका प्रारम्भ एक-दो से ही हुआ था और तीसरे-चौथे चरणों में ये लाखों की संख्या में पहुंच गए। दरअसल पहले और दूसरे चरण में इसका प्रसार एरिथमेटिक प्रोग्रेसन की तरह होता है जैसे 1, 2, 3, 4 की तरह या 1, 11, 21, 31, 41 आदि की तरह, ऐसा होने पर मरीजों की संख्या लाखों तक नहीं पहुंचती। मैं भी इसी रफ्तार की बात सोच रहा था। यह मुझे पक्का विश्वास था कि इस खतरनाक बीमारी को रोकने के लिए सरकार की तरफ से कोई न कोई कदम अवश्य उठाया जायेगा जिससे मरीजों की संख्या 22 मार्च के बाद कम होने लगेगी। लेकिन जब मुझे मालूम हुआ कि कोरोना का असली प्रसार तीसरे-चौथे चरण में बहुत तेजी से होता है तो उसे जानकर किसी की भी रूह कांप जाए। उदाहरण के लिए अगर पहले सप्ताह मरीजों की संख्या लगभग 100 के आसपास दूसरे सप्ताह 1000 तीसरे सप्ताह 10000 चौथे सप्ताह 1 लाख हो जाता तो इस प्रकार से बढ़ने के रफ्तार को ज्योमेट्रिकल प्रोग्रेसन से बढ़ने की प्रक्रिया कहते हैं। अगर भारत में इस रफ्तार से मरीजों के बढ़ने की बात होती तो यहां की जनसंख्या और मेडिकल इंफ्रास्ट्रक्चर को देखते हुए भारतवासियों के लिए बहुत दुर्भाग्य की बात होती।


22 मार्च के पश्चात पुनः 1 या 2 अप्रैल भी एक ऐसी तिथि है जहां इस संदर्भ में कुछ और स्पष्टता और वर्तमान पैटर्न में कुछ परिवर्तन की उम्मीद की जा सकती है, जो हम सभी की आगे की दशा और दिशा तय करेगी। इस वायरस के संक्रामक प्रसार और सरकार द्वारा किए जा रहे सघन प्रयास के बीच रस्साकस्सी में मानवता की जीत सुनिश्चित करने के लिए हम सभी को कुछ दिनों तक काफी संयमित रहने की जरूरत है क्योंकि थोड़ी भी लापरवाही बहुत ही भयावह दृश्य उत्पन्न कर सकती है। जन जागरूकता ही एकमात्र ऐसा विकल्प है जिससे इस मुसीबत पर काबू पाया जा सकता है। कोरोना के सम्पूर्ण स्वभाव को समझते हुए इसकी समाप्ति पर कोई भविष्यवाणी करना कठिन है लेकिन ऐसा लगता है, जनजीवन की जीवन शैली में अकस्मात कोई सुधार की अपेक्षा नहीं करते हुए देश के एक-एक नागरिक को जागरूक होकर कम से कम एक महीने तक काम करना होगा। क्रमिक सुधार स्वयं होता चला जायगा।

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1 comments:

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3/30/2020 05:58:00 pm ×

उपयोगी आलेख

dhanyaawaadडॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
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