विवाह समय निर्धारण में मंद ग्रह

Jyotish Vivah yoga in Hindi 

विवाह पारिवारिक एवं सामाजिक व्यवस्था के लिए एक महवपूर्ण मांगलिक कार्य है। युवकों और युवतियों के विवाह योग्य उम्र में प्रवेश करते ही माता-पिता और अभिभावक उनके विवाह के लिए चिन्तित हो जाते हैं , ताकि उन्हें अपने दायित्व से छुट्टी मिले। यदि विवाह-निर्धारण में थोड़ा भी विलंब होता है ,तो अधिकांश अभिभावक विवाह के निश्चित समय की जानकारी के लिए ज्योतिषियों से भी परामर्श देखे जाते हैं । मंगला मंगली और गुण मिलान टेबल के चक्कर में भी शादी-विवाह में देर हो जाती है। 

कभी किसी ज्योतिषी की बातें सच निकलती हैं तो कभी झूठ भी , ऐसा इसलिए होता है क्योंकि अभी तक ज्योतिष की पुस्तकों में कोई ऐसा निश्चित सूत्र उपलब्ध नहीं है ,जिसे आधार पर हम किसी जातक के विवाह समय की निश्चित जानकारी प्राप्त कर सकें। इसे बावजूद प्राय: सभी जन्मपत्रों में शादी की कोई न कोई निश्चित उम्र लिखी हुई पायी जाती है। इस निश्चित उम्र का उल्लेख परंपरावादी पंडित किस आधार पर करते हैं ,यह तो वे ही जानते होंगे, परंतु इसमें सत्यता बिल्कुल नहीं होती ,इसे हमने महसूस किया है। 

Vivah kab Hoga Kaise jane

जहॉ तक हमारा विचार है , ज्योतिष शास्त्र में ऐसा कोई भी सिद्धांत विकसित नहीं किया जा सकता है ,जिससे विवाह उम्र की निश्चित जानकारी प्राप्त हो सके । इसका कारण यह है कि विवाह उम्र के निर्धारण में परिवार ,समाज ,युग ,वातावरण और परिस्थितियों की भूमिका ग्रह-नक्षत्र से अधिक महत्वपूर्ण होती है। प्राचीनकाल में भी वही 12 राशियां होती थीं ,वही नवग्रह हुआ करते थें, दशाकाल का गणित वही था ,उसी के अनुसार जन्मपत्र बनते थे ।

उस समय विवाह की उम्र 5 वर्ष से भी कम होती थी , फिर क्रमश: बढ़ती हुई 10.15.20.25.से 30 वर्ष तक हो गयी है । अभी भी अनेक जन-जातियों में बाल-विवाह की प्रथा है। क्या उस समाज में विशेष राशियों और नक्षत्रों के आधार पर जन्मपत्र बनते हैं ? यदि नही तो यह अंतर क्यों ? इसलिए हमारी धारणा है कि किसी व्यक्ति के जन्म के समय ही उसके विवाह वर्ष को नहीं बतलाया जा सकता । हॉ , परिवार ,समाज और युग का अनुमान लगाते हुए ग्रहों के प्रभाव के सापेक्ष विवाह समय की जानकारी किसी हद तक अवश्य दी जा सकती है।

jyotish vivah yog in hindi

Vivah bhavishya

आज भारतवर्ष में मध्यमवर्गीय और उच्चवर्गीय परिवारों में युवतियों के विवाह की उम्र 20 वर्ष से 25 वर्ष और युवकों के विवाह की उम्र 25 वर्ष से 30 वर्ष बिल्कुल सामान्य हो गयी है। इससे पूर्व इनके विवाह की बात सोंची भी नहीं जाती है। यदि युवकों के विवाह 30 वर्ष के पश्चात् एवं युवतियों के 25 वर्ष के पश्चात् हों तो आज की परिस्थिति में विवाह में विलम्ब कहा जा सकता है । इस लेख को लिखने के पूर्व हमने अनेक जन्मपत्रियों का विस्तृत अध्ययन किया। हमने पाया कि जिन युवतियों के सातवें भाव का स्वामी बुध काफी मजबूत हो या सातवीं राशि में मजबूत बुध की उपस्थिति हो या सातवें राशीश के साथ मजबूत बुध की घनिष्ठता या परस्पर विपर्यय हो तो उन युवतियों का विवाह जल्द हो जाता है।विवाह के पश्चात् उन्हें अच्छा माहौल ,हर प्रकार की सुख सुविधा ,प्रतिष्ठा और प्यार मिल पाता है तथा विवाह के प्रारंभिक वर्षों में वे सुखी होती हैं।

इसके विपरीत , जिन युवतियों के सातवें भाव का स्वामी बुध काफी कमजोर हो या सातवीं राशि में कमजोर बुध की उपस्थिति हो या सातवें राशीश के साथ कमजोर बुध की घनिष्ठता या परस्पर विपर्यय हो तो उन युवतियों का विवाह जल्द हो जाता है। विवाह के पश्चात् घर-गृहस्थी में अनेक प्रकार की समस्याएं और कष्ट दिखाई पड़ते हैं तथा विवाह के प्रारंभिक वर्षों में वे दाम्पत्य सुख में कमी प्राप्त करती हैं।

Vivah sukh in kundali

जिन युवकों एवं युवतियों के सातवें भाव का स्वामी कमजोर मंगल हो या या सातवें भाव में कमजोर मंगल की उपस्थिति हो या सप्तमेश के साथ कमजोर मंगल की घनिष्ठता या परस्पर विपर्यय हो तो उनके विवाह में देर होने की भी संभावना होती है या जल्दी विवाह हो भी जाए तो 30 वर्ष की उम्र तक दाम्पत्य जीवन कमजोर बना रहता है। 30 वर्ष की उम्र के बाद ही इसमें कुछ सुधार देखा जा सकता है ,वैसे पूरे सुधार की उमीद 36 वर्ष की उम्र के बाद ही की जा सकती है।

 इसके विपरित जिन युवकों एवं युवतियों के सातवें भाव का स्वामी मजबूत मंगल हो या सातवें भाव में मजबूत मंगल की उपस्थिति हो या सप्तमेश के साथ मजबूत मंगल की घनिष्ठता या परस्पर विपर्यय हो तो उनका विवाह 24 वर्ष का उम्र से 30 वर्ष की उम्र तक या कभी कभी 32 वें वर्ष में भी होने की संभावना होती है । विवाह के पश्चात् उनका दाम्पत्य जीवन सुखमय व्यतीत होता है । जिन युवकों एवं युवतियों के सातवें भाव का स्वामी शुक्र हो या या सातवें भाव में शुक्र की उपस्थिति हो या सप्तमेश के साथ मंगल या बुध की घनिष्ठता या परस्पर विपर्यय न हो तो उनके विवाह में अधिक देर होने की संभावना होती है । इनका विवाह 31वें वर्ष या कभी-कभी 36वें वर्ष तक भी होता है।

Accurate marriage astrology in hindi

उपरोक्त बातों से किसी भी जन्मकुंडली से मोटे तौर पर जातक के विवाह की उम्र निकाली जा सकती है ,किन्तु सूक्ष्म गणना के लिए ग्रहों की गोचर के चाल को जानना आवश्यक होगा। हमने पाया है कि विवाह-समय के निर्धारण में मंद ग्रहों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।सभी ग्रह वक्री होने से पूर्व और मार्गी होने के बाद बिल्कुल धीमी गति में चलते हैं। ग्रह सामान्य तब होते हैं ,जब ये पृथ्वी से औसत दूरी पर अपनी औसत गति में होते हैं। 

पृथ्वी को स्थिर मानकर जब हम भचक्र की संपूर्ण राशियों और सभी ग्रहों का अध्ययन करते हैं , तो हमें सभी ग्रहों का एक-एक काल्पनिक पथ प्राप्त होता है , जिनमें सभी ग्रह चक्कर लगाते हैं। ज्योतिषीय पंचांगों का आधार ये काल्पनिक पथ हैं , जहॉ ग्रह अतिशीघ्री , समरुप , मंद और वक्री होते हैं। कभी-कभी ये ग्रह बिल्कुल स्थिर हो जाते हैं। ऐसी स्थिति वक्री होने से कुछ दिन पूर्व और मार्गी होने के कुछ दिन पश्चात् बनती है। इस स्थिति में ग्रह अचल होते हैं। ये काफी उर्जावान होते हैं ।

`गत्यात्मक दशा पद्धति´ के अनुसार बुध ग्रह 10 दिन पूर्व से वक्री होने के दिन तक तथा मार्गी होने के दिन से 10 दिन बाद तक मंद गति में होता है । शुक्र ग्रह डेढ़ महीने पूर्व से वक्री होने के दिन तक तथा मार्गी होने के दिन से डेढ़ हीन बाद तक मंद गति में होता है। शनि और बृहस्पति एक महीने पूर्व से वक्री होने के दिन तक तथा मार्गी होने के दिन से एक महीने बाद तक मंद गति में होते है। वैवाहिक कार्यक्रमों में मंद ग्रहों की निश्चित ही बडी भूमिका होती है , किन्तु किस ग्रह के मंद रहने पर किस जातक का विवाह संपन्न या निश्चित होगा , इसकी जानकारी महत्वपूर्ण है।इस संबंध में तीन बातें देखी गयी है--------

Grah for marriage

जिस जातक के सातवें भाव का राशीश ग्रह मजबूत स्थिति में हो , उसका विवाह सामान्यतया उसी ग्रह की मंद स्थिति में संपन्न होता है। जब भी सातवें भाव का स्वामी मंद होगा , कहीं न कहीं वैवाहिक संबंधों की बात चलती रहेगी , विवाह तय या संपन्न भी होगा।

जिन जातकों के सातवें भाव का राशीश ग्रह कमजोर स्थिति में हो , उनका विवाह दूसरे उन ग्रहों के मंद रहने पर होता है , जो उनके जन्मकाल में सातवें भाव में मजबूत होकर स्थित होते हैं।

जिन जातकों के सातवें भाव का राशीश ग्रह कमजोर स्थिति में हों और उनके सातवें भाव में किसी मजबूत ग्रह की उपस्थिति न हो , तो वैसे जातकों का विवाह गोचर में सातवे भाव में किसी ग्रह के मंद होने पर होता है।

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    फलित ज्योतिष शास्त्र हिंदी में

    Jyotish shastra hindi

    प्राचीन काल के आदि मानव से आज के विकसित मनुष्‍य बनने तक की इस यात्रा में मनुष्‍य के पास अनुभवों के रूप में क्रमश: जो ज्ञान का भंडार जमा हुआ , वो इतनी पुस्‍तकों , इतने पुस्‍तकालयों और वेबसाइट के इतने पन्‍नों में भी नहीं सिमट पा रहा है। एकमात्र प्रकृति में इतने सारे रहस्‍य भरे पडे हैं कि प्रतिदिन हजारों की संख्‍या में अभी तक करोडों शोध पत्र दाखिल किए जा रहे हैं , फिर भी उसका अंत नहीं दिखाई देता। प्रकृति के एक एक व्‍यक्ति , एक एक जीव और एक एक कण में खासियत ही खासियत .. जितना अभी तक पता चल पाया है , उसका हजारगुणा या लाखगुणा ढूंढा जाना बाकी है , वो भी नहीं कहा जा सकता।  

    Vigyan kya hai ?

    विज्ञान शब्‍द विशेष और ज्ञान से बना है , यह विशेष ज्ञान हमें अनुभव के आधार पर प्राप्‍त होता है। मानव मस्तिष्‍क बहुत ही जिज्ञासु होता है , जब हम बारबार एक जैसी घटना को होते देखते हैं , तो उसका कारण ढूंढने के लिए प्रयत्‍नशील होते हैं । उस वक्‍त हमें कई कारण दिखाई पडते हैं , पर सारा सत्‍य नहीं होता। निरीक्षण , परीक्षण और प्रयोग के बाद हम कार्य और कारण में संबंध ढूंढने में सफल हो जाते हैं , तो हमें विशेष ज्ञान की प्राप्ति हो जाती है। पर प्रकृति के नियम इतने सरल भी नहीं कि कोई एक नियम अवश्‍यंभावी तौर पर कार्य करे , दस बीस प्रतिशत जगहों पर अपवाद मिल ही जाते हैं, जिसके कारण पुन: नए नए नियमों की स्‍थापना होती चली जाती है। इस प्रकार विज्ञान का कभी अंत नहीं होता , विज्ञान कभी विकसित नहीं हो सकता , यह हमेशा विकासशील बना रहता है।

    Paramparagat paddhati

    जिस तरह प्रकृति में विज्ञान के सारे नियम चलते रहते हैं , पर उसका ज्ञान हमें बाद में होता है , उसी प्रकार मनुष्‍य ने विज्ञान का उपयोग तो पहले शुरू कर दिया था , पर उसके नियम उसे धीरे से मालूम हुए। पर प्रकृति अपने आप में संपूर्ण है , वह हर प्रकार का संतुलन स्‍वयमेव करती है। प्रकृति की घटनाओं को देख देखकर परख परखकर मनुष्‍य नियमों की स्‍थापना करता रहा है। विश्‍व के हर युग में और अलग अलग क्षेत्र में प्रकृति के नियमों को देखते और समझते हुए ही विभिन्‍न प्रकार की परंपरागत पद्धतियां विकसित की जा सकी। पुन: आवश्‍यकता ही आविष्‍कार की जननी है , प्रकृति के ही नियम की सहायता लेते हुए अपनी सुविधा के लिए विभिन्‍न प्रकार के उपकरण भी विभिन्‍न युगों मे मानव ने बनाए हैं।

    Gyan ke prakar

    कला का अधिक संबंध अभ्‍यास से होता है , वैसे तो विभिन्‍न प्रकार की कलाओं में भी विज्ञान छुपा होता है , पर बहुत थोडी मात्रा में। प्राचीन काल से ही प्रकृति में होनेवाली किसी घटना के नियम के जानकार उसे लोगों से छुपाने का अभ्‍यास करते हुए या कभी कभी उसकी जानकारी देते हुए भी हाथ की सफाई से किसी कला को दिखाया करते थे। पर उसमें मुख्‍य तत्‍व मन की तल्‍लीनता होती है , जिसके कारण किसी कला को अधिक विकसित किया जा सकता है। अपने ज्ञान को सही ढंग से किसी के सामने रख पाना , किसी को सिखला पाना भी एक कला है। इसलिए कला का भी महत्‍व कम नहीं। विज्ञान की एक खासियत है कि इसका ज्ञान आराम से दूसरों को दिया जा सकता है, जबकि कला में प्रशिक्षण मुख्‍य होता है। इसके बावजूद विज्ञान की जानकारी ही सबको महान बनाने के लिए आवश्‍यक नहीं , कला के माध्‍यम से ही उनका बेहतर उपयोग किया जा सकता है। यही कारण है कि विज्ञान की पढाई को संपूर्ण बनाने के लिए प्रायोगिक शिक्षा भी दी जाती है।

    jyotish shastra hindi

    Data analysis

    विज्ञान के नियमों को विकसित करने के लिए या उसके क्रम में हमें हमेशा बहुत बडे आंकडे को लेकर काम करना पडता है, उस आंकडे के विश्‍लेषण के बाद ही हमें सारे रहस्‍यों का पता चल पाता है। इसी कारण किसी भी क्षेत्र के इतिहास का महत्‍व भी कम नहीं। किसी घटना के सभी कारकों को निकालने के लिए उन कारकों के प्रतिक्षण की स्थिति और घटना की स्थिति में संबंध को जानने के लिए सांख्यिकी का उपयोग किया जाता है। कोई भी विधा विज्ञान , कला और सांख्यिकी तीनो की मदद से बेहतर बनायी जा सकती है। परंपरागत विधाओं को विकसित करने के लिए भी इन तीनों का सहारा लिया जाता रहा है और आज की विधाएं भी इन तीनों के संयोग से काम करती हैं। पुन: हर विज्ञान एक दूसरे के साथ सह संबंध बनाते हुए ही मानव के लिए अधिक उपयोगी हो सकती है।

    Paramparagat paddhati

    यदि आधुनिक उपकरणों को छोड भी दें , तो हमारे रसोईघर में कई परंपरागत वस्‍तुएं मिलेंगी। उनकी बनावट पर तनिक ध्‍यान दें। बनावट के आधार पर कुछ बरतन देखने में छोटे लगेंगे , पर उनमें सामान रखने की क्षमता बहुत होगी, सामानों को धोए जानेवाली कठौती की बनावट की वजह से उसका सारा पानी आप निथार पाएंगे, चावल दाल बनानेवाले बरतन उन्‍हें जल्‍दी गलाने के उपयुक्‍त , सब्‍जी बनाने वाली कडाही भूनने के उपयुक्‍त , यहां तक कि खाना परोसे जानेवाले सभी बरतन और कलछी तक नियम के अनुसार सही है। कभी हमारे यहां तेल निकाला जाने वाले परंपरागत चम्‍मच या दूसरे बरतन में डाले जाने वाले कीप को आपने देखा होगा। इसी प्रकार गहने , जेवर , खेती में उपयोग में आनेवाले सामान या घर गृहस्‍थी के अन्‍य सामानों को विकसित करने में प्रकृति के नियमों का ख्‍याल रखने के साथ ही साथ , सुविधा असुविधा के आंकडों और नियमों के बेहतर उपयोग करने की कला .. सबकुछ की आवश्‍यकता पडी होगी। ये भी उस युग का विज्ञान ही था।

    Diagnosis is a art

    आधुनिक युग में भी हर विधा विज्ञान के नियमों के साथ ही साथ कई प्रकार के आंकडों की जांच करते हुए उसके बेहतर उपयोग की कला के दम पर ही विकसित किया जा सकता है। हरेक डाक्‍टर शरीर विज्ञान और स्‍वास्‍थ्‍य के नियमों की पढाई करता है , इसके बावजूद जर्नलों में प्रकाशित होनेवाले  विभिन्‍न प्रकार के रोगों के आंकडों पर ध्‍यान देना उसके सफल होने के लिए आवश्‍यक है , इसके बावजूद सारे एक जैसी सफलता नहीं प्राप्‍त कर पाते। बिखरे हुए ज्ञान को ढंग से समायोजित करते हुए बेहतर 'डायग्‍नोसिस' कर पाना एक कला है और इस हिसाब से ही कोई डॉक्‍टर विशेष सफलता प्राप्‍त कर पाता है। जीवन में हर क्षेत्र में सफलता प्राप्‍त करने के लिए हर व्‍यक्ति को विज्ञान के नियमों के साथ साथ हर प्रकार के आंकडों के विश्‍लेषण की क्षमता और निष्‍कर्ष निकालने की कला का ज्ञान आवश्‍यक है।

    Ganit jyotish

    इस हिसाब से ज्‍योतिष को देखा जाए , तो भले ही आजतक इसे उपेक्षित ही छोड दिया गया हो , पर गणित ज्‍योतिष के रूप में हमारे पास एक बहुत ही मजबूत आधार है , जो पूर्ण तौर पर वैज्ञानिक है। पुन: इसी के आधार पर भविष्‍य के बारे में आकलन करने के लिए इसमें जो सूत्र हैं , वे पूर्ण तौर पर वैज्ञानिक या प्रामाणिक तो नहीं माने जा सकते , पर बहुत हद तक संकेत देने में तो अवश्‍य समर्थ हैं।  इन दोनो मजबूत आधारों के साथ ही साथ 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' के द्वारा विकसित किए गए ग्रहों की ऊर्जा को निकालनेवाले सूत्र के रूप में हमें एक बडा वैज्ञानिक आधार मिल गया है। 

    अपने जीवन और पूरे विश्‍व में घटनेवाली घटनाओं के साथ इनका तालमेल बनाने के लिए सांख्यिकी के आंकडों का उपयोग किया जाना चाहिए। किसी भी विज्ञान के विकास के लिए हर विज्ञान का एक दूसरे के साथ सहसंबंध होना आवश्‍यक है , उनसे तालमेल बिठाकर प्रतिदिन इस विधा को बेहतर बनाया जाना चाहिए , पुन: इतने नियमों के मध्‍य तालमेल बिठाते हुए किसी निष्‍कर्ष पर पहुंचने की कला को विकसित करते हुए इसे अधिक से अधिक प्रामाणिक और उपयोगी बनाया जा सके, ऐसी कोशिश होनी चाहिए। सचमुच बिना प्रायोगिक ज्ञान के किसी विज्ञान की क्‍या उपयोगिता ??

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      गणित ज्योतिष के गत्यात्मक सूत्र

      Ganit jyotish

      ज्योतिष की नयी शाखा ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ सिर्फ नाम से ही गत्‍यात्‍मक नहीं है , इसका नामकरण ऐसा किया गया है क्‍योंकि इसके द्वारा भविष्‍यवाणी करने का मुख्‍य आधार ग्रहों की गति ही है। सौरमंडल में भले ही सूर्य स्थिर हो और पृथ्‍वी उसकी परिक्रमा करती हो , पर फलित ज्‍योतिष पृथ्‍वी को स्थिर मानकर उसके सापेक्ष ग्रहों की स्थिति का अध्‍ययन करता है। 

      Jyotish math in hindi

      गणित ज्योतिष के अनुसार पृथ्‍वी को स्थिर मान लेने से उसके सापेक्ष ग्रहों की गति में प्रतिदिन भिन्‍नता देखी जाती है, यहीं से हमें फलित ज्योतिष सूत्र मिले। यूं तो गणित ज्‍योतिष के सूर्य सिद्धांत में ग्रहों की इन गतियों की विभिन्‍नता की चर्चा हुई है , पर इसके अनुसार फलित पर प्रभाव पडने की चर्चा कहीं नहीं हुई। फलित पर ग्रहों की विभिन्‍न ग्रहों की गतियों का भिन्‍न भिन्‍न तरह के प्रभाव को देखते हुए ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष द्वारा’ ग्रह गति का निम्‍न प्रकार से वर्गीकरण और गणित ज्योतिष के हिसाब से फलित ज्योतिष सूत्र दिया गया है ....

      Ganit jyotish sutra


      Grah Gati ka Gyan

      1. अति‍शीघ्री गति ... ग्रह वास्‍तविक तौर पर पृथ्‍वी से अधिक दूरी पर तथा सूर्य से कम की कोणात्‍मक दूरी पर हो तो ग्रह अतिशीघ्री स्थिति में होते हैं। बुध सूर्य से 0 डिग्री से 9 डिग्री की कोणिक दूरी पर तथा 2 डिग्री प्रतिदिन की गति में हो , शुक्र सूर्य से 0 डिग्री से 15 डिग्री की कोणिक दूरी पर तथा प्रतिदिन 1 डिग्री से अधिक प्रतिदिन की गति में हो तो अतिशीघ्री अवस्‍था में होते हें। मंगल , बृहस्‍पति और शनि की कोणात्‍मक दूरी सूर्य से 0 डिग्री से 30 डिग्री के मध्‍य हो तो अतिशीघ्री होते हैं। 'गत्यात्मक ज्योतिष' ऐसे ग्रहों को 80 से 100 प्रतिशत गत्यात्मक शक्ति देता है। 

      2. शीघ्री गति ... अतिशीघ्री की तुलना में जब ग्रहों की कोणात्‍मक दूरी सूर्य से और इनकी गति सामान्‍य से कुछ अधिक हो , तो ग्रह शीघ्री कहे जाते हैं। बुध सूर्य से 9 डिग्री से 24 डिग्री की दूरी पर तथा 1 डिग्री से अधिक प्रतिदिन की गति में हो , शुक्र 15 डिग्री से 40 डिग्री की कोणात्‍मक दूरी पर और 1 डिग्री से अधिक प्रतिदिन की गति में हो तो शीघ्री अवस्‍था का होता है। मंगल , बृहस्‍पति और शनि की दूरी सूर्य से 30 डिग्री से 75 डिग्री के मध्‍य हो तो ये शीघ्री अवस्‍था के होते हें। 'गत्यात्मक ज्योतिष' ऐसे ग्रहों को 60 से 80 प्रतिशत गत्यात्मक शक्ति देता है। 

      3. सामान्‍य गति ... इस समय ग्रह पृथ्‍वी से औसत दूरी पर होते हैं । सूर्य से बुध की कोणात्‍मक दूरी लगभग 27 डिग्री और शुक्र की सूर्य से कोणात्‍मक दूरी 45 डिग्री होती है , जबकि मंगल , बृहस्‍पति और शनि सूर्य से 90 डिग्री की दूरी पर सामान्‍य गति में होते हैं।   'गत्यात्मक ज्योतिष' ऐसे ग्रहों को 40 से 60 प्रतिशत गत्यात्मक शक्ति देता है। 

      4. मंदगति ... विभिन्‍न ग्रह वक्री होने के पूर्व और मार्गी होने से पश्‍चात् इस दशा से गुजरते हैं। बुध 10.12 दिन पूर्व से वक्री होने तक तथा मार्गी होने से 10;12 दिन पश्‍चात तक मंद गति में होता है। शुक्र वक्री होने से डेढ महीना पूर्व से वक्री होने तक तथा मार्गी होने के दिन से डेढ महाने बाद तक मंद गति में होता है। बृहस्‍पति वक्री होने से एक महीना पूर्व से वक्री होने तक तथा मार्गी होने के दिन से एक महीने बाद तक मंद गति में होता है। मंगल वक्री होने से दो महीने पूर्व से वक्री होने तक तथा मार्गी होने के दिन से दो महीने बाद तक मंद गति में होता है। शनि वक्री होने से एक महीना पूर्व से वक्री होने तक तथा मार्गी होने के दिन से एक महीने बाद तक मंद गति में होता है।  'गत्यात्मक ज्योतिष' ऐसे ग्रहों को 30 से 40 प्रतिशत गत्यात्मक शक्ति देता है। 

      5. वक्री गति .... पृथ्‍वी से सापेक्षिक गति कम होने से ग्रह वक्री गति में देखे जाते हैं। इस समय पृथ्‍वी से ग्रहों की वास्‍तविक दूरी बहुत कम होने लगती है। बुध सूर्य से 18 कोणात्‍मक डिग्री की दूरी पर और शुक्र सूर्य से लगभग 30 डिग्री की कोणात्‍मक दूरी पर स्थित हो तो वे वक्री होते हें। मंगल , बृहस्‍पति और शनि सूर्य से 120 डिग्री की कोणात्‍मक दूरी पर वक्री स्थिति में आते हैं। 'गत्यात्मक ज्योतिष' ऐसे ग्रहों को 10 से 30 प्रतिशत गत्यात्मक शक्ति देता है

      6. अतिवक्री गति ... इस समय ग्रहों की वास्‍तविक दूरी पृथ्‍वी से निकटतम होती है। वक्री स्थिति में सूर्य से 0 से 9 डिग्री के मध्‍य बुध और वक्री स्थिति में सूर्य से 0 डिग्री से 15 डिग्री के मध्‍य शुक्र हो तो ऐसी स्थिति बनती है। मंगल , बृहस्‍पति और शनि सूर्य से 150 डिग्री से 180 डिग्री की दूरी पर अतिवक्री अवस्‍था में होते हैं।  'गत्यात्मक ज्योतिष' ऐसे ग्रहों को 0 से 10 प्रतिशत गत्यात्मक शक्ति देता है

      ग्रहों की इन भिन्‍न भिन्‍न गति के कारण उनकी गत्‍यात्‍मक और स्‍थैतिक शक्ति का आकलन और उसके जनसामान्‍य पर पडनेवाले प्रभाव की चर्चा अगले पोस्‍ट कुण्डली देखने का तरीका इन हिंदी  में की गयी है । 


      इस वर्ष आसमान में दो चार महीनो से सभी ग्रहों की गति कम हुई है, सारे ग्रह पृथ्वी के निकट आ गए हैं। छह जुलाई को सभी ग्रहों की स्थिति नीचे चित्र में दिखाई जा रही है , इसलिए अभी कोरोना जैसी बड़ी मुसीबत पूरे विश्व को परेशान  कर रही है। नवंबर के बाद धीरे धीरे सारे ग्रह पृथ्वी से दूर होने लगेंगे, समस्या काफी कम हो जाएंगी। फोटो इस वेबसाइट से ली गयी है।

      ज्योतिष में हुए नए रिसर्च, गत्यात्मक ज्योतिष के बारे में अधिक जानने के लिए ये लेख अवश्य पढ़ें  ------

      ज्योतिषियों के लिए ----

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        भारत में श्रमिक दिवस

        Labour day kab manaya jata hai

        ये भी कोई पूछनेवाली बात है ? 1 मई 1886 से शुरुआत हुई है श्रमिक दिवस को मनाये जाने की। आधिकारिक तौर पर इसे मनाते हुए 132 साल हो गए, पर क्या बदला है ? कुछ टेक्निकल जानकारों को छोड़ दिया जाये, तो कल इनकी जो हालत थी, आज भी वही है। क्या इसके लिए जवाबदेह सिर्फ पूंजीवादी व्यवस्था है ? नहीं, मुझे तो लगता है कोई भी उनके शुभचिंतक नहीं। पता नहीं, ईश्वर ने उन्हें कौन सा जज्बा दिया है कि हर वक्त समाज की मदद के लिए एक मजबूत स्तम्भ बन जाते हैं वे।

        Labour day kab manaya jata hai



        लॉक डाउन में भी सबसे अधिक प्रभावित होनेवाला हमारा श्रमिक वर्ग ही है। इस समय पूरे भारतवर्ष से दो तरह की खबरें रही है -- जहाँ किसी प्रदेश, किसी शहर, किसी गाँव, किसी कंपनी,  किसी व्यक्ति द्वारा अच्छी व्यवस्था की, मतलब प्रशासन, समाज सेवियों,  कंपनियों,  पूंजीपतियों,  मंदिरों,  गुरुद्वारों के द्वारा  खाने-पीने की व्यवस्था की गयी है. जरूरतभर अनाज बांटे गए हैं, पुलिस चुस्त बनी हुई है, लोगों को जमा होने नहीं दिया जा रहा है, सेनिटाइज़ेशन किया जा रहा है तो वहीं किसी प्रदेश, किसी शहर और किसी गाँव से बुरी व्यवस्था की खबर भी, लोग खाने-खाने को मुंहताज हैं, अनाज किसी को मिला किसी को नहीं, पुलिस आराम कर रही है, लोग जमा हो रहे हैं, सैनिटीजसन की तो कुछ चर्चा नहीं है। इससे एक निष्कर्ष तो निकलता है, अच्छी व्यवस्था करने वाला पूरा प्रदेश, शहर या गाँव केंद्र द्वारा दी गयी जिम्मेदारियाँ ले रहा है, जनता को भेजी गयी सुविधाओं को देने में पैसे खर्च कर रहा है। 

         बुरी व्यवस्था करनेवाला प्रदेश, शहर या गाँव केंद्र द्वारा दी गयी जिम्मेदारियाँ नहीं ले रहा है, जनता को भेजी गयी सुविधाओं को न बाँटकर पैसे बचा रहा है। बेईमानी के फल को भोगते हुए हमारे पूर्वजों ने देखा था, इसलिए हमेशा बच्चों को ईमानदारी की शिक्षा दिया करते थे। यह बात अलग है कि बाद में हमारे पाठ्यक्रम से नैतिक शिक्षा का विषय ही गायब कर दिया गया। कोरोना के इस भयंकर दौर में यदि कोई पैसे बचाकर ऊपर से नीचे तक इसे बाँटने जैसा भ्रष्टाचार करके यह सोच रहे हैं कि जनता की आह उन्हें नहीं लगेगी तो गलत सोच रहे, जनता की आह सबसे भारी होती है। इतना तो कहा ही जा सकता है कि देश मे स्वार्थियों की कमी नहीं है। नैतिक शिक्षा की बात भूल गए हो, बड़े बुजुर्गों द्वारा दीं गयी शिक्षा भूल गए हो पर आज प्रकृति की ताकत को तो पहचानो। आपत्तिकाल मे  दूसरे के हिस्से के पैसे मत रखो  नादानो !

        समाजवादी व्यवस्था में विकास नहीं होता, विकास के लिए पूंजीवाद आवश्यक है। आज के युग में पूंजीवादी व्यवस्थाकी आवश्यकता है, पर इसमें जो गड़बड़ी है वह यह कि लाभ को अधिकतम करने के लिए श्रमिकों का शोषण हो जाता है। यदि किसी उत्पादन या सेवा में लगे सभी कारकों, पूंजी, भूमि, श्रम,साहस और व्यवस्थापक के मध्य बराबरी का भुगतान हो तो आज के युग के लिए सबसे बड़ी सामाजिक व्यवस्था होगी।
        एक काम की बात और, शारीरिक मजदूरों की और तो सबका ध्यान जाता है, इसके विकास के लिए लोग प्रयत्नशील भी है, न्यूनतम मजदूरी भी तय कर दी गयी है। पर बौद्धिक मजदूरों की हालत भी आज अच्छी नहीं, कहीं कहीं तो शारीरिक श्रम की तुलना में मानसिक श्रम का मूल्य कम है। लाचारी काम पैसों में ही पढ़े लिखे लोगों को श्रम करने को मजबूर करती है। सरकार का ध्यान उनकी और भी जाये, क्योंकि बुद्धिजीवियों की आर्थिक स्थिति ख़राब हो तो समाज पर बहुत ख़राब प्रभाव पड़ता है।

        श्रमिक दिवस की अनंत शुभकामनाये !!

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          अगले सप्ताह मीन राशि वाले

          Agle saptah meen rashi walon ko kya Karna chahie ?

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           अन्य ग्रहों की तरह ही पृथ्वी भी एक ग्रह है और भूमण्डल में होने वाले किसी भी परिवर्तन को ग्रहों के फल में ही जोड़कर देखा जायेगा। अभी भी चाहे स्वास्थ्य का मामला हो या धन का, करियर का मामला हो या संतान पक्ष का - राशि के हिसाब से १/१२ की आबादी पर सकारात्मक और १/१२ की आबादी पर ऋणात्मक प्रभाव देखा ही जायेगा। १०/१२ की स्थिति किसी भी दिन सामान्य रहेगी। 

          agle saptah meen rashi walon ko kya karna chahie ?

          भाग -2 

          ७-८-९ मई )


          यह फल गोचर के ग्रहों पर आधारित है, इसलिए मनःस्थिति पर पूरा प्रभाव पड़ेगा। ५ मई से शुरुआत होनेवाले सप्ताह में ग्रह-स्थिति अच्छी नहीं है, आम लोगों को भी परेशानी का सामना करना पद सकता है, पर मीन राशिवालों के लिए कुछ खास गड़बड़ है, इसलिए उन्हें सावधानी बरतने की आवश्यकता है। खासकर ७-८-९ मई को कुछ कठिनाई उपस्थित हो सकती हैं, मीन राशि वालों में ही मेष लग्न वाले धन, भाई-बंधु, संतान, पढ़ाई-लिखाई, रोग-ऋण-शत्रु जैसे झंझट, घर-गृहस्थी की कमजोरी, वृष लग्न वाले स्वास्थ्य , धन, भाई-बंधु, संतान, पढ़ाई-लिखाई, रोग-ऋण-शत्रु जैसे झंझट, मिथुन लग्न वाले खर्च, बाहरी सम्बन्ध, स्वास्थ्य , धन, भाई-बंधु, संतान, पढ़ाई-लिखाई, कर्क लग्नवाले लाभ, खर्च, बाहरी सम्बन्ध, स्वास्थ्य , धन, भाई-बंधु, संतान, सिंह लग्नवाले करियर, राजनीति, लाभ-खर्च, बाहरी सम्बन्ध, स्वास्थ्य , धन, भाई-बंधु, कन्या लग्नवाले भाग्य, लाभ-खर्च, बाहरी सम्बन्ध, स्वास्थ्य , धन, तुला लग्नवाले रूटीन, भाग्य, करियर, लाभ-खर्च, बाहरी सम्बन्ध, स्वास्थ्य , वृश्चिक लग्न वाले घर-गृहस्थी, रूटीन, भाग्य, करियर, लाभ-खर्च, बाहरी सम्बन्ध, धनु लग्नवाले रोग-ऋण-शत्रु जैसे झंझट, घर-गृहस्थी, रूटीन, भाग्य, करियर, लाभ, मकर लग्न वाले पढ़ाई-लिखाई, संतान, रोग-ऋण-शत्रु जैसे झंझट, घर-गृहस्थी, रूटीन, भाग्य, पिता , करियर, कुम्भ लग्नवाले माता, पढ़ाई-लिखाई, संतान, रोग-ऋण-शत्रु जैसे झंझट, घर-गृहस्थी, रूटीन, भाग्य और मीन लग्न वाले भाई-बंधु , माता, पढ़ाई-लिखाई, संतान, रोग-ऋण-शत्रु जैसे झंझट, घर-गृहस्थी, रूटीन आदि मामलों की तकलीफ उपस्थित होगी ।

          भाग -1 

          ( २-३ और ४ मई )


          कल से एक सप्ताह आसमान में विभिन्न ग्रहों की जो स्थिति बन रही है, उसमें चन्द्रमा, मंगल, बृहस्पति और शनि की स्थिति मजबूत बनी रहेगी, जिसके कारण अधिकांश लोग माहौल से खुश रहेंगे। पर मीन राशिवाले कुछ अधिक ही अनुकूल माहौल  प्राप्त करेंगे। खासकर २-३ और ४ मई  मंगल, शनि और बृहस्पति का बहुत ही शुभ प्रभाव उनपर पड़नेवाला है, ५-६-७ मई उसकी तुलना में थोड़ा सामान्य रहेगा। मीन राशिवाले लोगों में ही मेष लग्न वाले स्वास्थ्य,माता पक्ष, स्थायित्व, भाग्य, खर्च, करियर, जीवनशैली और लाभ के मामलों की मजबूती , वृष लग्न वाले भाई-बंधू पक्ष, घर-गृहस्थी, रूटीन, भाग्य, करियर और लाभ-खर्च के मामलों की  मजबूती , मिथुन लग्न वाले धन-कोष, घर-गृहस्थी, रूटीन, झंझट, लाभ,  करियर की  मजबूती , कर्क लग्नवाले स्वास्थ्य, झंझट, घर-गृहस्थी, रूटीन, संतान, करियर और भाग्य की  मजबूती , सिंह लग्नवाले खर्च, संतान पक्ष, झंझट, माता, स्थायित्व, घर-गृहस्थी और रूटीन की  मजबूती , कन्या लग्न वाले लाभ के वातावरण, माता, स्थायित्व , संतान, झंझट, भाई-बंधी, जीवनशैली और घर-गृहस्थी की  मजबूती , तुला लग्नवाले करियर, भाई-बंधू, माता, स्थायित्व, धन, घर-गृहस्थी, संतान, और झंझट की  मजबूती , वृश्चिक लग्न वाले भाग्य, धन, भाई-बंधू, माता, स्थायित्व, संतान पक्ष की  मजबूती , धनु लग्नवाले रूटीन, स्वास्थ्य, धन, भाई-बंधू, माता, संतान, खर्च, स्थायित्व की मजबूती , मकर लग्नवाले घर-गृहस्थी, माता, स्वास्थ्य, धन, माता, स्थायित्व, लाभ और भाई-बंधू की मजबूती , कुम्भ लग्नवाले किसी प्रकार के झंझट, पिता, करियर, भाई-बंधू, धन-लाभ, खर्च और स्वास्थ्य की मजबूती , मीन लग्नवाले संतान पक्ष, स्वास्थ्य, भाग्य, धन, लाभ-खर्च और करियर से सम्बंधित मजबूती प्राप्त करेंगे। जन्मकालीन ग्रहों के हिसाब से कोई मामले कम और कोई अधिक ख़ुशी  देनेवाले बन सकते हैं। लेकिन बहुत बड़ी उपलब्धि नहीं होती है, जबतक जन्मकालीन ग्रह भी मजबूत न हों।  

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