शादी लव मैरिज होगी या अरेंज ?

 

Love marriage hone ke sanket

आज के परिवेश में बच्‍चों के पालन पोषण में अभिभावकों की बढती उदारता से बच्‍चे न सिर्फ स्‍वतंत्र , वरन उच्‍छृंखल भी हो गए हैं। इस कारण अपने दोस्‍तों के साथ उनके व्‍यवहार में काफी खुलापन आ गया है , जिसको देखते हुए पुराने ख्‍यालात के अभिभावक अक्‍सर परेशान हो जाते हैं। यही कारण है कि आजकल सयाने बेटे बेटियों की कुंडलियों को लेकर आनेवाले अभिभावकों का एक सामान्‍य सा प्रश्‍न हो गया है कि उनके बच्‍चे की कुंडली में लव-मैरिज होने के संकेत है या नहीं ?

Love marriage hone ke lakshan

इस प्रश्‍न का जवाब देने के लिए कुंडली के सप्‍तम भाव पर ही ध्‍यान दिया जा सकता था , क्‍योंकि परंपरागत ज्‍योतिष में यही भाव पति , पत्‍नी , घर गृहस्‍थी और दाम्‍पत्‍य जीवन से लेकर प्‍यार और रोमांस तक के बारे में बतलाता है। यही सोंचकर मैने प्रेम विवाह करने वाले अनेको लोगों की कुंडलियों का परंपरागत ढंग से विवाह करनेवालों की कुंडलियों के साथ तुलनात्‍मक अध्‍ययन करने में काफी समय जाया किया , पर फल वही ढाक के तीन पात।

वैवाहिक मामले 

love marriage hone ke sanket kyon nahi milta ?

लव-मैरिज होने के संकेत ढूँढने में काफी माथापच्‍ची में कुछ दिन व्‍यतीत होने और किसी निष्‍कर्ष पर न पहुंच पाने से मैं कुछ परेशान ही थी कि अचानक एक काफी बुजुर्ग महिला की कुंडली मेरे पास पहुंची , जिन्‍होने प्रेम विवाह किया था और उस विवाह के कारण उन्‍हें वर्षों तक बहुत ही दर्दनाक परिस्थितियों से गुजरना पडा था।

 कुछ दिनों तक अपने दोनो परिवारों और समाज से बहिष्‍कृत होने के बाद जब वह ससुराल में रहने लगी थी तो उनपर चोरी तक का इल्‍जाम लगाया गया था। उक्‍त महिला की जन्‍मकुंडली में प्रेम विवाह के कारण उत्‍पन्‍न होने का यह संघर्ष दिखायी पड रहा था। मुझे इस बात पर आश्‍चर्य हुआ कि जब उनकी कुंडली में प्रेम विवाह स्‍पष्‍ट दिखाई पड रहा है , तो अन्‍यों में लव-मैरिज होने के संकेत क्‍यों नहीं दिखाई दे रहे ?
love marriage hone ke lakshan

love marriage hoga ya arranged marriage

पर तुरंत बाद ही इसका रहस्‍य मेरी समझ में आ ही गया , वह यह कि 20-25 वर्ष पहले के सामाजिक और पारिवारिक स्थिति में विवाहपूर्व प्रेम मानो एक तरह का अपराध ही था और प्रेम विवाह तो बहुत ही असामान्‍य तरह की घटना होती थी । यहां तक कि विवाह तय होने के बाद भी युवक युवतियों को एक दूसरे से मिलने की सख्‍त मनाही होती थी। बहुत उन्‍नत विचारों वाले परिवार में ही युवा अपने जीवन साथी को देख पाते थे , अन्‍यथा अधिकांश जगहों पर विवाह के बाद ही अपने जीवनसाथी की एक झलक तक मिलती थी। 

love marriage hone ke sanket

मुझे याद आया , जब मैं कालेज में पढ ही रही थी , अपने कालेज के एक सीनियर के प्रेम की बात उसके परिवारवालों के द्वारा स्‍वीकार नहीं किए जाने पर उन्‍होने छुपकर कोर्ट में विवाह कर लिया था तो दोनो ही परिवार के लोग इसे पचा नहीं सके थे और लगभग दस वर्ष तक उन्‍हें अपने परिवारवालों से मिले जुले बिना ही काटनी पडी थी , जबकि दोनो पढे लिखे और भौतिकी के लेक्‍चरर थे और उन्‍होने सोंच समझकर ही निर्णय लिया था। हां, स्‍वजातीय या अपने किसी परिचित के संतान होने पर एक दो प्रतिशत से भी कम मामलों में ही सही, प्रेम करनेवालों की सुन ली जाती थी और उन्‍हें खुशी खुशी वैवाहिक बंधन में बंधने की स्‍वीकृति मिलती थी।

 prem Vivah ke upay

पर आज प्रेम विवाह या परिवार द्वारा आयोजित किए जानेवाले विवाह में कोई अंतर नहीं रह गया है। यदि युवा किसी से प्रेम भी करते हैं तो भले ही कुछ दिन इंतजार करना पडे , पर अपने अपने अभिभावकों को विश्‍वास में ले ही लेते हैं और आखिर में उनकी रजामंदी से प्रेम विवाह को अभिभावक के पसंदीदा विवाह में बदल ही दिया जाता है। सारे नाते रिश्‍तेदारों के मध्‍य उत्‍सवी माहौल में न सिर्फ उनका विवाह ही करवाया जाता है , वरन् उनके प्रेम का कोई गलत अर्थ न लगाते हुए उनके चुनाव की प्रशंसा भी की जाती है। आज के माहौल को देखते हुए प्रेम विवाह के उपाय निकलने की जरूरत नहीं। 

यदि परिवारवालों की पसंद के अनुसार भी विवाह हो रहा हो , तो भी विवाह पूर्व युवकों और युवतियों को एक दूसरे से मिलने और एक दूसरे को समझने की पूरी स्‍वतंत्रता मिल ही जाती है। इस कारण उनके मन में न तो कोई संदेह होता है और न ही अनिश्चितता । अब इस स्थिति में इन दोनो प्रकार के विवाह को परिभाषित करने के लिए क्‍या कोई विभाजन रेखा खींची जा सकती है ? यही कारण है कि हमें आजकल के युवकों और युवतियों की जन्‍मकुंडली में भी इस बात का कोई संकेत नहीं दिखाई देता है कि जातक प्रेम विवाह करेंगे या अरेंज्‍ड ? आज के माहौल को देखते हुए प्रेम विवाह के उपाय निकलने की जरूरत नहीं। 

ज्योतिष में हुए नए रिसर्च, गत्यात्मक ज्योतिष के बारे में अधिक जानने के लिए ये लेख अवश्य पढ़ें  ------

'गत्यात्मक ज्योतिष' आधारित सूत्रों पर सिर्फ चन्द्रमा और मंगल ही नहीं, वर-वधू के जन्मकालीन सभी ग्रहों के आधार पर किये जानेवाले कुंडली मिलान के लिए संपर्क करें - 8292466723,  gatyatmakjyotishapp@gmail.com 

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    ग्रहों की गति से कुंडली देखने का तरीका

     

    Kundli dekhne ka tarika in hindi

    गणित ज्योतिष के अद्भुत सूत्र नामक लेख में सौरमंडल में ग्रहों की विभिन्न गतियों की चर्चा की गयी है और यह भी बताया गया कि ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ किसी प्रकार की भविष्‍यवाणी करने के लिए ग्रहों की गति पर ही आधारित है। पृथ्‍वी को स्थिर मान लेने से उसके सापेक्ष ग्रहों की गति में प्रतिदिन भिन्‍नता देखी जाती है।

    पृथ्‍वी के जड चेतन या अन्‍य प्रकार की घटनाओं के खास व्‍यवहार का कारण ग्रहगति की ये विभिन्‍नता ही है। 40 वर्षों तक विभिन्‍न ग्रहों की विभिन्‍न गतियों का पृथ्‍वी पर पडनेवाले प्रभाव को देखते हुए ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ निम्‍न निष्‍कर्ष पर पहुंचा है ....

    Kundli dekhne ka tarika in hindi



    kundli dekhne ka tarika

     (How to read Janam kundali in Hindi)

    1. अति‍शीघ्री गति ... ग्रह जब अतिशीघ्री होते हैं तो उन्‍हें अत्‍यधिक गत्‍यात्‍मक शक्ति संपन्‍न माना जाता है । 'गत्यात्मक ज्योतिष' ऐसे ग्रहों को 80 से 100 प्रतिशत गत्यात्मक शक्ति देता है, क्योंकि  ये अनायास सुख और सफलता देनेवाले ग्रह होते हैं , जिसके कारण लोग निश्चिंत या लापरवाह स्‍वभाव के हो जाते हैं। जन्मकुंडली में चन्द्रमा सूर्य से सप्तम भाव में स्थित हो तो इसकी गत्यात्मक शक्तिअधिकतम होती है, मंगल, बृहस्पति और शनि सूर्य के साथ हो तो गत्यात्मक शक्ति अधिकतम होती है , बुध और शुक्र सूर्य से निकटतम डिग्री में हो और प्रतिदिन 1 डिग्री से अधिक की गति में हों तो उनकी गत्यात्मक शक्ति अधिकतम होती है। लोगों के जो ग्रह अतिशीघी हो उनसे संबंधित संदर्भ और उनका गत्‍यात्‍मक दशाकाल निश्चिंति भरा होता है। 

    2. शीघ्री गति ... ग्रह जब शीघ्री होते हैं तो उन्‍हें भी गत्‍यात्‍मक शक्ति संपन्‍न माना जाता है ।  'गत्यात्मक ज्योतिष' ऐसे ग्रहों को 60 से 80 प्रतिशत गत्यात्मक शक्ति देता है, क्योंकि ये थोडी मेहनत से अधिक सफलता देनेवाले ग्रह होते हैं , जिसके कारण लोग कम मेहनत हो जाते हैं। जन्मकुंडली में चन्द्रमा सूर्य के त्रिकोण में स्थित हों तो गत्यात्मक शक्ति अच्छी होती है, मंगल, बृहस्पति और  शनि  सूर्य से अगल बगल की राशि में स्थित हों तो गत्यात्मक शक्ति अच्छी होती है , बुध और शुक्र सूर्य से थोड़ी दुरी पर और 1 डिग्री प्रतिदिन से अधिक की गति में हों तो उनकी गत्यात्मक शक्ति अच्छी होती है। लोगों के जो ग्रह शीघी हो उनसे संबंधित संदर्भ और उनका गत्‍यात्‍मक दशाकाल भी अच्‍छा ही होता है।

    3. सामान्‍य गति ... ग्रह जब सामान्‍य होते हैं तो उन्‍हें सामान्‍य गत्‍यात्‍मक शक्ति संपन्‍न माना जाता है ।  'गत्यात्मक ज्योतिष' ऐसे ग्रहों को 40  से 60 प्रतिशत गत्यात्मक शक्ति देता है, क्योंकि ये महत्‍वपूर्ण ग्रह होते हैं , जिसके कारण लोग समन्‍वयवादी दृष्टिकोण के हो जाते हैं। जन्मकुंडली में चन्द्रमा, मंगल, बृहस्पति और शनि सूर्य से केन्द्रगत हों तो सामान्य शक्ति के होते हैं।  बुध और शुक्र सूर्य से अधिकतम दूरी पर सहित हों तो सामान्य शक्ति के माने जाएंगे। लोगों के जो ग्रह सामान्‍य हो उनसे संबंधित संदर्भ और उनका गत्‍यात्‍मक दशाकाल महत्‍वपूर्ण होता है।

    4. मंद गति ... ग्रह जब मंदगति के होते हैं तो उन्‍हें कुछ कम गत्‍यात्‍मक शक्ति संपन्‍न माना जाता है ।  'गत्यात्मक ज्योतिष' ऐसे ग्रहों को 30 से 40 प्रतिशत गत्यात्मक शक्ति देता है, क्योंकि ये बहुत मेहनती ग्रह होते हैं , जिसके कारण लोगों का किसी भी क्षेत्र में बहुत अधिक ध्‍यान संकेन्‍द्रण होता है। जन्मकुंडली में चन्द्रमा सूर्य से तीसरे या ग्यारहवें स्थित हो, मंगल, बृहस्पति और शनि सूर्य से त्रिकोण में स्थित हों तो कम गत्यात्मक शक्ति के होते हैं।  बुध और शुक्र सूर्य के निकट होते हैं और उनकी गति १ डिग्री प्रतिदिन की होती है। लोगों के जो ग्रह मंद गतिशील हो उनसे संबंधित संदर्भ और उनका गत्‍यात्‍मक दशाकाल बहुत ही दवाबपूर्ण होता है।

    5. वक्री गति .... ग्रह जब वक्री गति में होते हैं तो उन्‍हें कम गत्‍यात्‍मक शक्ति संपन्‍न माना जाता है ।  'गत्यात्मक ज्योतिष' ऐसे ग्रहों को 10 से 30 प्रतिशत गत्यात्मक शक्ति देता है, क्योंकि ये कुछ कठिनाई और असफलता देनेवाले ग्रह होते हैं , जिसके कारण लोग थोडे चिडचिडे और निराश हो जाते हैं। जन्मकुंडली में चन्द्रमा सूर्य के दूसरे या बारहवें स्थित हो, मंगल , बृहस्पति और शनि सूर्य से छठे या आठवें  स्थित हो, तो इन्हे बहुत कम गत्यात्मक शक्ति दी जाती है। बुध और शुक्र सूर्य के साथ हो तथा वक्र गति में हों तो इन्हे बहुत कम गत्यात्मक शक्ति दी जाएगी।  जो ग्रह वक्री हो उनसे संबंधित संदर्भ और उनका गत्‍यात्‍मक दशाकाल कठिनाई भरा होता है।

    6. अतिवक्री गति ... ग्रह जब अतिवक्री होते हैं तो उन्‍हें बहुत कम गत्‍यात्‍मक शक्ति संपन्‍न माना जाता है ।  'गत्यात्मक ज्योतिष' ऐसे ग्रहों को 0 से 10 प्रतिशत गत्यात्मक शक्ति देता है, क्योंकि ये बहुत अधिक कठिनाई और तनाव देनेवाले ग्रह होते हैं , जिसके कारण लोग किंकर्तब्‍यविमूढ और अवसाद ग्रस्‍त हो जाते हैं। जन्मकुंडली में चन्द्रमा सूर्य के साथ हो, मंगल , बृहस्पति और शनि सूर्य से सप्तम हो तो इनकी गत्यात्मक शक्ति शुन्य के आसपास होती है। बुध और शुक्र वक्री गति के साथ सूर्य की डिग्री के आसपास होते हैं। लोगों के जो ग्रह अतिवक्री हो उनसे संबंधित संदर्भ और उनका गत्‍यात्‍मक दशाकाल पराधीन और लाचार होता है।

    kundli dekhne ka tarika

    (Gatyatmak Falit Jyotish ke sutra)

    यदि गत्‍यात्‍मक शक्ति की दृष्टि से यानि सुख के नजर से देखा जाए तो अतिशीघ्री ग्रह को सर्वाधिक मजबूत और अतिवक्री ग्रह को सर्वाधिक कमजोर माना जा सकता है , पर स्‍थैतिक शक्ति की दृष्टि से यानि कार्यक्षमता और महत्‍व की नजर से देखा जाए तो सामान्‍य और मंद ग्रह को सर्वाधिक मजबूत माना जा सकता है , क्‍योकि अधिकांश ग्रहों के शीघ्री या अतिशीघ्री होने के समय का माहौल खुशनुमा होता है और उस समय जो भी जातक जन्‍म लें , जीवनभर खुशनुमा माहौल प्राप्‍त करते हैं। इसी तरह अधिकांश ग्रहों के वक्री या अतिवक्री होने के समय का माहौल कष्‍टदायक होता है और उस समय जो भी जातक जन्‍म लें , जीवनभर कष्‍टप्रद माहौल प्राप्‍त करते हैं।

    इन दोनो के ही विपरीत , अधिकांश ग्रहों के सामान्‍य या मंद होने के समय का माहौल महत्‍वपूर्ण और दवाबपूर्ण होता है और उस समय जो भी जातक जन्‍म लें , जीवनभर महत्‍वपूर्ण और दवाबपूर्ण माहौल प्राप्‍त करते हैं। यही कारण है कि गत्यात्मक ज्योतिष के द्वारा की गई गणना सटीक होती है।  हमारे क्लाइंट्स की संतुष्टि का मुख्य कारण है।

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    ज्योतिषियों के लिए ----

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      जन्म कुंडली में राजयोग

      All Raj yoga in kundli 

      राजयोगों की विवेचना या उल्लेख करते हुए सामान्यतया ज्योतिषी या ज्योतिषप्रेमी अपने मस्तिष्क मे भावी उपलब्धियों की बहुत बड़ी तस्वीर खींच लेने की भूल करते हैं। चूंकि आज का युग राजतंत्र का नहीं है , कई लोग इसकी व्याख्या करते हुए कहते हैं कि राजयोग का जातक मंत्री , राज्यपाल , राष्ट्रपति , कमांडर , जनप्रतिनिधि या टाटा ,बिड़ला जैसी कम्पनियों का मालिक होना है। लेकिन जब इस प्रकार के योगों की प्राप्ति बहुत अधिक दिखलाई पड़ने लगी , यानि राजयोगवाली बहुत सारी कुंडलियॉ देखने को मिलने लगीं , तो ज्योतिषी फलित कहते वक्त कुछ समझौता करने लगे और राजयोग का अर्थ गजेटेड अफसरो से जोड़ने लगें हैं। 

      जन्म कुंडली में राजयोग

       जन्म कुंडली में राजयोग

      पर जिस राजयोग में एक राजा को पैदा होना चाहिए , उसमें एक मामूली दुकानदार पैदा हो जाता है और जब श्रीमती इंदिरा गॉधी जैसे सर्वगुणसंपन्न प्रधानमंत्री की कुंडली की व्याख्या करने का अवसर मिलता है , तो बड़े से बड़े ज्योतिषी उनकी कुंडली में बुधादित्य राजयोग ही उनके प्रघानमंत्री बनने का कारण बताते हैं , जबकि संभावनावाद के अनुसार 50 प्रतिशत से अधिक लोगों की कुंडली में बुधादित्य योग के होने की संभावना होती है। एक महान ज्योतिषी ने अपनी पुस्तक में लिखा है , बुधादित्य योग यद्यपि प्राय: सभी कुंडलियों में पाया जाता है , फिर भी इसे कम महत्वपूर्ण नहीं समझना चाहिए। इस तरह राजयोगों का विश्लेषण क्या असमंजस में डालनेवाला पेचीदा , अस्पष्ट और भ्रामक नहीं है ? इस तरह के पेचीदे वाक्य राजयोग के विषय में ही नहीं , वरन् ज्योतिष के समस्त नियमों के प्रति बुिद्धजीवी वर्ग की जो धारणा बनती है , उससे फलित ज्योतिष का भविष्य उज्जवल नहीं दिखाई पड़ता है। 

      Raj yoga in kundali check

      आज कम्प्यूटर का जमाना है , अपने समस्त ज्योतिषीय नियमों , सिद्धांतो को कम्प्यूटर में डालकर देखा जाए , कुंडली निर्माण से संबंधित गणित भाग का काम संतोषजनक है , परंतु फलित भाग बिल्कुल ही स्थूल पड़ जाता है , इससे किसी को संतुष्टि नहीं मिल पाती है। एक मामूली प्रथमिक स्कूल के शिक्षक और बसचालक की कुंडली में अनेक राजयोग निकल आते हैं और अमेरिका के राष्ट्रपति बिल क्लिंटन की कुंडली में एक दरिद्र योग का उल्लेख इस तरह होता है , मानो वह अति विशिष्ट व्यक्ति न होकर भिखारी हो। ऐसी स्थिति में आवश्‍यक है कि विभिन्‍न ग्रहों की स्थिति को देखते हुए आज के युग के अनुरूप राजयोगों की अलग से व्‍याख्‍या की जाए। ग्रहों की गत्यात्मक और स्थितिक शक्ति के हिसाब से ही आकलन किया जाये तो राजयोग की सही विवेचना हो पाएगी।

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        ज्योतिष समस्या और समाधान

        jyotish samasya 

        गणित ज्‍योतिष जैसे वैदिक कालीन ज्ञान पर आधारित होने के बावजूद भी फलित ज्‍योतिष इसलिए विवादास्‍पद है , क्‍योंकि यह ग्रहों का मानव पर पडने वाले प्रभाव की कहानी कहता है , जबकि वैज्ञानिक इसे मानने को तैयार नहीं हैं। इतने वर्षों से यह लोगों का विश्‍वास जीतने में सफलता नहीं प्राप्‍त कर सका है , जाहिर है अपनी खूबियों के साथ ही साथ कई कमजोरियों को भी यह झेल रहा है। अपने आरंभिक अध्‍ययन काल में गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष ने परंपरागत फलित ज्‍योतिष में दो कमजोरियां पाई थी ..

        Jyotish vigyan ke bare me

        1. ग्रहों के शक्ति निर्धारण की , जिसके लिए ज्‍योतिष में कम से कम बारह या उससे अधिक सूत्र हैं , पर विज्ञान मानता है कि किसी भी शक्ति को मापने का एक सूत्र होना चाहिए , बारह सूत्रों में मालूम कैसे हो कि कुंडली में कोई ग्रह बलवान है या कमजोर, जो ज्‍योतिष को विवादास्‍पद बनाने के लिए काफी है ।


        2. ग्रहों के दशाकाल निर्धारण की , यानि किसी खास ग्रह का अच्‍छा या बुरा प्रभाव कब पडेगा , जिसके लिए कोई विंशोत्‍तरी पर आधारित हैं , कोई कृष्‍णमूर्ति पर , कोई गोचर पर तो कोई अभी तक उलझे ही हुए हैं कि सत्‍य किस माना जाए , अब मालूम कैसे हो कि जो ग्रह कमजोर हैं , उसका बुरा या जो ग्रह मजबूत हें , उसका अच्‍छा प्रभाव कब पडेगा ?

        Jyotish vigyan hai 

        ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिषीय अनुसंधान संस्‍थान’ इन दोनो कमजोरियों को दूर करने का एक प्रामाणिक सूत्र तैयार कर चुका है और मेरी एक पुस्‍तक ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष : ग्रहों का प्रभाव’ के द्वारा वह जनसामान्‍य के द्वारा उपयोग में भी लायी जा रही है। ‘गत्‍यात्‍मक शक्ति’ निकालने के सूत्र और ‘गत्‍यात्‍मक दशा पद्धति’ और ‘गत्‍यात्‍मक गोचर प्रणाली’ की खोज के बाद अब ज्‍योतिष टटोलने वाला विज्ञान नहीं रहा।

        samasya ka samadhan kaise kare

        ज्‍योतिष को उसकी कमजोरियों से छुटकारा दिलाने के लिए पूरे जीवन किए गए प्रयास के बाद समझ में आ ही गया कि ग्रहों की सारी शक्ति उसकी गति में है। उन्होंने गत्यात्मक ज्योतिष के अद्भुत सूत्र दिए। हमें बंदूक की एक छोटी सी गोली में शक्ति दिखाई पउती है , एक पत्‍थर का टुकडा लेकर हम अपने को बलवान समझते हैं , क्‍योंकि इन्‍हें गति देकर इनसे शक्ति उत्‍सर्जित करवाया जा सकता है। पर जब ग्रहों की शक्ति ढूंढने की बारी आती है तो ज्‍योतिषी उनकी गति पर ध्‍यान न देकर स्थिति पर होता है। इसके बाद इन्‍होने ग्रहों की शक्ति के लिए सूत्र का प्रतिपादन कर पूरे देश के ज्‍योतिषियों को ज्‍योतिष के वास्‍तविक स्‍वरूप को समझाया और कुंडली देखने का तरीका बताया । 

        शरीर ब्रह्मांड का प्रतिनिधित्‍व करता है और इसमें मौजूद ग्रंथियां ग्रहों के हिसाब से चलती हैं। इसलिए व्‍यक्ति के जीवन को निर्धारित करने में ग्रहों का हाथ है ,और इसे ज्‍योतिष के माध्‍यम से ही समझा जा सकता है। ज्‍योतिष को विकसित बनाने के लिए जहां एक ओर ज्‍योतिषियों को इसकी समस्‍त कमजोरियों को समझकर इसे सुलझाने की जरूरत है ,वहीं दूसरी ओर वैज्ञानिकों को भी इसमें निहित सत्‍य को समझने की आवश्‍यकता है। तभी ज्‍योतिष का विकास हो सकता है , अन्‍यथा कितने 'ज्‍योतिष दिवस' आते जाते रहेंगे , न ज्‍योतिष और न ही ज्‍योतिषी को सम्‍मान मिलेगा। समाज उन्‍हें अंधविश्‍वासी न समझे , इसलिए भीड में लोग ज्‍योतिषी से बात करने से भी कतराते रहेंगे।

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          प्रश्न कुंडली कैसे बनाये ?

          प्रश्न कुंडली कैसे बनाये ?(Prashna kundli kaise banaye)

          बहुत सारे ज्योतिषी मूल कुंडली के अभाव में प्रश्नकुंडली से ही यजमानों की समस्याओं को समझने की चेष्‍टा करते हैं और उनकी समस्याओं का समाधान भी करते हैं! यजमानो के प्रश्न पूछने के समय को वे प्रश्न का जन्मकाल मानते हैँ, उस समय की जन्मकुंडली बनाकर उस जन्मकुंडली में प्रश्न का उत्तर तलाशते हैँ! 

          मूल कुंडली के अभाव में प्रश्नकुंडली की विवेचना भलमनसाहत के साथ ही साथ एक सद्प्रयास की बात हो सकती है , किन्तु इसके माध्यम से वस्तुत: उद्देश्य-पूर्ति में कामयाबी भी मिलती होगी , इसपर हमें संदेह है। इस प्रकार की प्रक्रिया अपनाकर ज्योतिशी किसी न किसी प्रकार की उलझन में ही फंसते चले जाते हैं।

           जब हजारों वर्षों के प्रयास से आजतक फलित ज्योतिष का जितना विकास हुआ है , उससे मूल कुंडली की ही सही व्याख्या और घटनेवाले घटनाओं के सही समय की जानकारी नहीं दी जा सकती है , तो प्रश्नकुंडली से क्या सही कहा जा सकता है , यह सोंचनेवाली बात हो सकती है ? 

          प्रश्न कुंडली फलादेश (Prashna kundli faladesh)

          मूल कुंडली किसी भी व्यक्ति के समग्र चरित्र , विचारधाराओं , मूल प्रवृत्तियो , संस्कार , कार्यक्षमता , मंजिल , संसाधन और सुख-दुख का परिचायक होती है। जन्मकालीन ग्रहों की स्थिति और गति सर्वदा प्रकृति के भिन्न और अनोखे स्वरुप का ही प्रतिनिधित्व करती है। प्रकृति या शिव का स्वरुप प्रतिक्षण बदलता है। प्रकृति का स्वरुप शाश्वत होते हुए भी अनंतस्वरुपा है। एक बार जो दिखाई पड़ा , उसे पुन: देख पाना काफी कठिन है। अत: प्रश्नकुंडली के द्वारा व्यक्ति की मूल कुंडली की व्याख्या या मौलिक विशेषताओं का एक अंश भी सही चित्रण कर पाना काफी कठिन होगा।

          प्रश्नकुंडली बनाकर ज्योतिशी निश्चित रुप से अपने उद्देश्य पूर्ति में 12 लग्नों के बीच के एक लग्न का चयन कर लेते हैं और उसे ही उस जातक की नियति समझ बैठते हैं , फिर वही संभावना और लॉटरी की चर्चा हो गयी , जिससे आजतक फलित ज्योतिश गुमराह होते हुए कश्टकर परिस्थितियों से गुजर रहा है। लॉटरी से संबंधित भाग्यफल जैसा कि मैने पहले ही कहा है , आहत और व्याकुल मन की शांति के लिए अस्थायी राहत प्रदान करने वाला हो सकता है , किन्तु किसी भी हालत में पक्की और स्थायी भविष्‍यवाणी का सशक्त आधार नहीं हो सकता।

          प्रश्न कुंडली कैसे देखें ?(Prashn Kundali kaise dekhen )

          लेकिन इसके बावजूद गोचर से सम्बंधित प्रश्नो के जवाब देने में प्रश्नकुंडली महत्वपूर्ण रोल अदा कर  सकती है। जन्म कुंडली न होने की स्थिति में बहुत सारे ज्योतिषी जॉब के लिए परेशां युवकों को प्रश्नकुंडली से सलाह देते नजर आते हैं, जो हमारी दृष्टि में सही नहीं है।  जॉब कब होगी , कहाँ होगी , इसका अनुमान प्रश्नकुंडली से नहीं किया जा सकता।  लेकिन यदि जॉब में कोई समस्या चल रही हो , गलत स्थान पर ट्रांसफर हो गया हो , किसी प्रकार का इल्जाम लग गया हो , उसके उपस्थित होने के समय देखकर , उस समय की कुंडली बनाकर समस्या के समाधान को समझा जा सकता है। 

          प्रश्नकुंडली में विवाह (Prashna kundli for marriage)

          इसी तरह प्रश्नकुंडली से किसी की शादी-विवाह का समय निकालना संभव नहीं है। यदि बात कहीं गंभीर तौर पर बनने के बाद रुकावट आ गयी हो, सबकुछ अच्छा होने के बाद वैवाहिक जीवन में कोई परेशानी आ गयी हो तो उस समय की प्रश्नकुंडली बनाकर परेशानी के अंत के समय क अनुमान संभव है। इसका अर्थ यही है कि जन्मकुंडली न होने की स्थिति में किसी भी मामले में समस्या के उपस्थित होने की कुंडली बनाकर समस्या के समाधान का समय बताया जा सकता है, लेकिन जन्मकुंडली की तुलना में इसकी सत्यता का प्रतिशत कुछ कम होगा। 

          prashn kundali kaise banaye ?

          प्रश्न कुंडली बनाने की विधि (prasn kundli kaise dekhe)

          गत्यात्मक ज्योतिष मानता है कि प्रश्न पूछने के समय को नहीं, वरन वास्तव में घटना उपस्थित होने से आपके मस्तिष्क में जिस समय कोई प्रश्न आता है, किसी समय खास परिस्थितिया उपस्थित होती हैँ, उस समय को प्रश्नकुंडली बनाने के लिए लिया जाये, तो गोचर के प्रभाव से किस समय खास परिस्थितिया उपस्थित हुई, जिनके करण किसी के मन में कोई प्रश्न आया तो इसका समाधान कब हो सकता है, इसके बारे में संभावना व्यक्त की जा सकती है।

           पर आजतक प्रश्नकुंडली बनाने का आधार भी गलत लिया जाता रहा है। प्रश्नकुंडली में प्रश्न पूछने का समय नहीं लेकर कुंडली नहीं बनानी चाहिए। प्रश्न के लिए जिम्मेदार परिस्थितियों के उपस्थित होने का समय लिया जाना चाहिए!

          'गत्यात्मक ज्योतिष' आधारित सूत्रों पर कुंडली निर्माण, सटीक भविष्यवाणी, उचित परामर्श और समुचित उपचार के लिए संपर्क करें - 8292466723, gatyatmakjyotishapp@gmail.com

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