डॉ बी एन पांडेय जी के द्वारा लिखा गया प्राक्‍कथन



सूर्यादि ग्रहों तथा अश्विन्‍यादि नक्षत्रों के गणित तथा फलित का वर्णन विवेचन करने वाले शास्‍त्र की अभिद्दा ज्‍योतिष है। वेद के छठे अंग ( अनुक्रमत शिक्षा , कल्‍प , व्‍याकरण , तिरूक्‍त , छंद और ज्‍योतिष ) के रूप में ज्‍योतिष विद्या की प्राचीनता एवं महत्‍व निर्विवाद है। वेदांगों के बिना वेदों का सम्‍यक अध्‍ययन तथा उनके द्वारा अनुदेशित आचरणों के अनुरूप जीवनचर्या ढालकर ऊर्घ्‍वगामिता सिद्ध नहीं हो सकती। वेदांगों में ज्‍योतिष को वेदों का साक्षात नेत्र (वेदस्‍य चक्षु o) कहा गया है। हमारा जीवन श्रोताश्रित यानि  वंदाधारित हो अथवा स्‍मार्त्‍ताश्रित यानि परंपरावादी धर्मशास्‍त्रानुरूप ज्‍योतिष विज्ञान दोनो का अधिष्‍ठान है। प्रारंभ में वैदिक कर्मकांड की तिथियों तथा उससे संबंधित मांगलिक मुहूर्त्‍तों को जानने के लिए ज्‍योतिष विद्या का चिंतन एवं आविर्भाव किया गया। पर कालक्रम से इसके आयाम उपवृंहित होकर भविष्‍य का पूर्वज्ञान करने तथा जीवन जातक के भावी शुभाशुभ घटनाओं के पूर्व कथन करने तक विस्‍तीर्ण हो गया। विष्‍णुधर्मोत्‍तरपुराण के एक श्‍लोक से सिद्ध होता है कि ज्‍योतिष विद्या या ज्‍योतिर्विज्ञान का दूसरा नाम काल विधान शास्‍त्र भी है ..
वेदास्‍तु यज्ञार्थमभिप्रवृत्‍ता: कालानुपूर्वा विहिताश्र्च यज्ञा:।
तस्‍मादिदं कालविधान शास्‍त्र, यो ज्‍योतिषं वेद स वेद सर्वम् ।।

अर्थात् वेद तो यज्ञों के अनुष्‍ठान के लिए प्रवृत्‍त हुए हैं और सभी यज्ञ कालानुपूर्व ( क्रमबद्ध रूप से निर्धारित यानि निर्णित काल से पहले ही बंधे हुए हैं ) हैं , इसलिए जो विद्वान कालविधानशास्‍त्र यानि ज्‍योतिष विद्या का ज्ञाता है वही सर्वज्ञाता है ।
इससे यह भी सिद्ध होता है कि ज्‍योतिर्विज्ञान के और चाहे जितने उद्देश्‍य हों , इसका मुख्‍य प्रयोजन काल विधान ही है। इसके बिना षोडष संस्‍कार , तिथि , वार , योग , नक्षत्रों की स्थिति इसके अनुरूप व्रत निर्देश , जातक एवं होरा विषयक मुहूर्त्‍तादि विचार संभव ही नहीं है। समासत: सकल ज्ञान का आधार ज्‍योतिष विद्या ही है तथा यही इसका मुख्‍य उद्देश्‍य भी है।

अर्थात यह ज्‍योतिष शास्‍त्र वेदो का नेत्र है , अतएव उसकी प्रधानता अन्‍य वेदांगों के बीच स्‍वत: प्रमाणित है , क्‍योंकि अन्‍य सभी अंगों से परिपूर्ण व्‍यक्ति नेत्रहीन होने से नहीं के बराबर है।
वेदस्‍य चक्षु किल शास्‍त्रमेतत्‍प्रधानतांगेषु ततोर्थजाता।
अंगैर्युतोन्‍ये: परिपूर्णमूर्तिश्र्चक्षुर्विहीन: पुसषों न किंचित्।। 

यह ज्‍योतिष शास्‍त्र स्‍कंध त्रियात्‍मक है , इसका प्रथम स्‍कंध ( शाखा अथवा विभाग ) सिद्धांत स्‍कंध , दूसरा संहिता स्‍कंध और तीसरा होरा स्‍कंध कहा जाता है। त्रुटि ( समय का अत्‍यंत सूक्ष्‍म भाग ) से लेकर प्रलय के अंत तक के काल और सूर्यादि ग्रहों से संबंधित कालमान की गणना की गणित विद्या को सिद्धांत स्‍कंध कहते हैं।

सूर्यदि ग्रहों , विविध केतुओं , तारामंडलों , नक्षत्रों , ताराओं , तारामंडलों के स्‍थान , योग , उनकी गति संबंधी शुभाशुभ फलों के विचार , शास्‍त्र को संहिता स्‍कंध कहते हैं। तथा ज्‍योतिष के जिस अंग के द्वारा जन्‍म , वर्ष , इष्‍ट काल पर ग्रहादि के प्रभाव , दृष्टि , बल , दशा एवं अंतर्दशादि की गणना और फलाफल का र्नि‍णय किया जाता है , उसे होरा स्‍कंध कहते हैं। होरा , जातक तथा हायन इसी के पर्यावाची नाम हैं। विद्वानों के मतानुसार अहोरात्र शब्‍द के आदि और अंत के वर्णों का लोप होकर ही होरा शब्‍द निर्मित हुआ है , जिसका अर्थ लग्‍न अथवा लग्‍नार्थ होता है , जिसके द्वारा जातक अर्थात जन्‍म और नवजात शिशु संबंधी सभी घटना फलों का विचार किया जाता है।

‘चतुर्लक्षं च ज्‍योतिषं’ सूत्र के अनुसार मूल ज्‍योतिर्विज्ञान 400000 श्‍लोकों से समृद्ध है। नारदसंहिता , कश्‍यपसंहिता और पराशरसंहिता के साक्ष्‍य से इस विज्ञान के 18 प्रवर्तक माने जाते हैं। यथा ब्रह्मा , सूर्य , वशिष्‍ठ , अवि , मनु , सोम या पौल्‍स्‍त्‍य , लोमश , मरीच , अंगिरा , व्‍यास , नारद , शौनक , भृगु , च्‍यवन , यवन , गर्ग , कश्‍यप तथा पराशर । ( कुछ पश्चिम भक्‍त लेखकों ने यवनाचार्य को म्‍लेच्‍छ के रूप में यूनानी लोमश को रोमश बताकर रोम का तथा पौल्‍स्‍त्‍य को एलेक्‍जेन्ड्रिया का पॉल नाम से विदेशी निर्धारित करने की चेष्‍टा की है। दृष्‍टब्‍य अद्भुत भारत ( वंडर दैट वाज इंडिया ) लेखक ए एल बाशम पृष्‍ठ 492 )

उत्‍तर वैदिक काल के ज्‍योतिषियों में आर्यभट्ट (पांचवी शताब्‍दी) , वराहमिहिर (छठी शताब्‍दी) , लल्‍लू ब्रह्मगुप्‍त (सातवीं शताब्‍दी) तथा भास्‍कराचार्य के नाम से प्रख्‍यात है। ज्ञातब्‍य है कि पश्चिम जगत को ज्ञात होने से काफी पहले आर्यभट्ट ने यह सिद्धांत स्‍थापित किया था कि सूर्य स्थिर है तथा पृथ्‍वी ही उसकी परिक्रमा करती है। यद्पि सिद्धांत , संहिता और होरा स्‍कंध के अंतर्गत शतश: उपविषय सिन्‍नविष्‍ट है , पर स्‍थूल रूप से इसके ही दो भाग प्रमुख हैं..
1. गणित तथा 2. फलित , जो गिरा ( वाणी ) और अर्थ अथवा जल और वीचि यानि लहर के समान परस्‍पर अभिन्‍न रूप से जुडे है , जिस प्रकार अर्थरहित शब्‍द बेकार होता है , उसी प्रकार फलित पक्ष विहीन गणित ज्‍योतिष भी व्‍यर्थ होता है। तदापि इन दोनो में ज्‍योतिष प्रधन्‍तर है , क्‍योंकि गणित के बिना फलित ज्‍योतिष किसी निष्‍कर्ष पर नहीं पहुंच सकता। वह सर्वथा परतंत्र और गणित ज्‍योतिष के अधीन है।

पूर्वोक्‍त प्राचीन 18 प्राचीन आचार्यों के सिद्धांतों में संप्रति जो सिद्धांत सर्वाधिक मान्‍य है , वह है सूर्य सिद्धांत। वैसे वराह मिहिर ने अपनी पुस्‍तक पंच सिद्धांतिका में पांच , नृसिंह दैवज्ञ ने हिल्‍लाजदीपिका में छह , दैवज्ञ पुंजराज ने अपने ग्रंथ शंभुहोरा प्रकाश में सात तथा शाकल्‍य संहिता के ब्रह्म सिद्धांत में आठ सिद्धांतों के होने की चर्चा मिलती है।  किंतु सभी ने सूर्य सिद्धांत को ही सबसे अधिक मान्‍य प्रामाणिक और शुद्ध माना है। ज्‍योतिर्विज्ञान की प्राचीनता के अतिरिक्‍त यह निर्विवाद है कि गणित और ज्‍योतिष शास्‍त्र सारे संसार में भारत से ही फैले हैं। खगोल और भूगोल विद्या भी ज्‍योतिष के अंग हैं। सामान्‍य भाषा में शून्‍य का अर्थ आकाश होता है। पर ज्‍योतिष के अनुसार आकाश शून्‍य ( खाली ) नहीं है। इसमें अनेक ग्रहों , नक्षत्रों और तारामंडल की अवस्थिति है। आकाश को प्राचीन ऋषियों ने तीन भागों में विभक्‍त किया है ...
क. पृथ्‍वी ख. अंतरिक्ष और ग. द्यूलोक । नक्षत्र मंडल को भी राशिचक्रों में विभाजित किया गया है और प्रत्‍येक राशि के साथ सूर्य के संक्रमण को देखकर 12 राशियों के नाम पर 12 सोर मास तथा पूर्णिमा की रात में नक्षत्र विशेष के साथ चंद्रमा की सन्निकटता के आधार पर चांद्रमासों का विधान किया गया। जिस मास की पूर्णिमा चित्रा नक्षत्र से युक्‍त थी , उसे चैत , विशाखा से युक्‍त को बैशाख , ज्‍येष्‍ठा से ज्‍येष्‍ठ , पूर्वाषाढ या उत्‍तराषाढ से आषाढ , श्रवण से श्रावण , पूर्व एवं उत्‍तर भाद्रपद से भाद्रपद ( भादो ) , अश्विनी से आश्विन , कृतिका से कात्रिक , मृगशिरा से मार्गशीर्ष ( अगहन  , पुष्‍य से पौष , मघा से माघ तथा पूर्वा और उत्‍तरा फाल्‍गुनी नक्षत्र से फाल्‍गुन महीने का नामकरण हुआ। इसी तरह वारों या दिनों के नाम भी ग्रहों के प्रात:कालीन स्थिति के आधार पर हैं और इनका क्रम पूर्णत: वैज्ञानिक है।

भारतीय ज्‍योतिष में चिंतन और प्रयोग का बराबर महत्‍वपूर्ण स्‍थान रहा है। जयपुर और दिल्‍ली की वेधशालाएं इनकी प्रयोग धर्मिता के प्रमाण हैं,  केवल बंधे बंधाए सूत्रों पर यह नहीं चलता रहा है , अन्‍यथा आर्यभट्ट वराहमिहिर , ब्रह्मगुप्‍त का कोई स्‍थान नहीं होता। वशिष्‍ठ , लोमश , अत्रि , आर्यभट्ट एवं ब्रह्मगुप्‍त से लेकर कृष्‍णमूर्ति तक भारतीय ज्‍योतिष को नया आयाम देने की परेपरा चलती आ रही है , चाहे वह गणित के क्षेत्र में हो या फलित के क्षेत्र में। ज्‍योतिष में व्‍यास , वशिष्‍ठ , मृग , पराशर के बाद , सत्‍याचार्य और उसके बाद प्रसिद्ध वैज्ञानिक ज्‍योतिषाचार्य वाराह मिहिर हुए , जिन्‍होने इस विद्या को व्‍यवस्थित किया। 20वीं सदी में उल्‍लेखनीय स्‍वर्गीय सूर्य नारायण राव , श्री लक्ष्‍मण दास मदान , डॉ वी भी रमण , डॉ कृष्‍णमूर्ति और भगवान दास मित्‍तल रहें। डॉ रमण की अंग्रेजी की पत्रिका ‘द एस्‍ट्रोलोजिकल मैगजीन’ ने देश विदेश में भारतीय ज्‍योतिष की महानता को उजागर किया है। उनके संपादकीय देश विदेश के राजनीतिक उतार चढाव के लिए काफी चर्चित रहे हैं। नवीनता के संदर्भ में श्री भगवान दास मित्‍तल का बहुत बडा योगदान रहा , जिन्‍होने राशि से अधिक महत्‍वपूर्ण लग्‍न को समझा और इनकी सारी विवेचनाएं इसी पर आधारित रही हैं। श्री कृष्‍णमूर्ति भी ज्‍योतिष को पूर्ण विज्ञान का दर्जा दिलाने में अग्रसर रहे हैं। उनका ज्‍योतिष पंचांग एवं अयनांश शत प्रतिशत शुद्ध है। इसी प्रकार पत्रिका बाबाजी राजनैतिक और व्‍यक्तिगत भविष्‍यवाणी , भूकम्‍प , भ्रष्‍टाचार , सनसनीखेज हत्‍याएं और दुर्घटनाओं की शत प्रतिशत भविष्‍यवाणियों के लिए नाम कमा चुकी है। इसके संपादक श्री मदान जी इस प्रकार की घटनाओं का अंदाजा ग्रहों की चाल से लगाते हैं। इसी प्रकार ‘ज्‍योतिष तंत्र विज्ञान’ , ‘तंत्र मंत्र यंत्र विज्ञान’ ‘ज्‍योतिष्‍मती’ , ज्‍योतिष धाम’ आदि पत्रिकाओं के संपादक अपनी अपनी पत्रिका के माध्‍यम से ज्‍योतिष विज्ञान का प्रचार प्रसार करते आ रहे हैं।

ज्‍योतिष के क्षेत्र में पिता से शिक्षा ग्रहण करने और पुत्री से सहयोग प्राप्‍त करने की परंपरा भी प्राचीन काल से ही चली आ रही है। लीलावती ने अपने पिता से ही ज्‍योतिष का ज्ञान प्राप्‍त किया था। अपने पिता के मरणोपरांत उनकी पुत्री श्रीमती सुप्रिया जगदीश ही ‘ज्‍योतिष्‍मती’ का संपादनभार संभाल रही है। श्रीमती गायत्री देवी वासुदेवन ‘द एस्‍ट्रोलोजिकल मैगजीन’ के संपादन में महत्‍वपूर्ण भूमिका निभा रही है। इसी ज्‍योतिष विज्ञान की विकास दशा एवं नव्‍य दिशा बुद्धि की परंपरा में प्रस्‍तुत पुस्‍तक ‘गत्‍यात्‍मक दशा पद्धति: एक परिचय’ का प्रणयण गणित विषय में कुशाग्र प्रज्ञा समृद्ध लेखिका श्रीमती संगीता पुरी ने किया है। यह विद्या उन्‍हें स्‍वनाम धन्‍य तेजस्‍वी ज्‍योतिषी पिता श्री विद्या सागर महथा , ज्‍योतिष वाचस्‍पति , ज्‍योतिष रत्‍न से प्राप्‍त हुई है , जिन्‍होने लगभग पूरी आयु ज्‍योतिष के अध्‍ययन मनन और चिंतन में लगायी है। दशा पद्धति की गत्‍यात्‍मक पद्धति उनके चिंतन और अन्‍वेषण का परिणाम हैं, जिसे विरासत के रूप में उनकी पुत्री ने उनसे पूरी अर्हता के साथ ग्रहण किया है। पुस्‍तक की विषय वस्‍तु , प्रमेयों , प्रतिपत्तियों , निष्‍कर्षों और तार्किक विश्‍लेषणों से यह सहज ही विश्‍वास होता है कि इस पुस्‍तक से फलित ज्‍योतिष को एक नई और मौलिक चिंतन दिशा मिलेगी। फलित ज्‍योतिष के क्षेत्र में गत्‍यात्‍मक दशा पद्धति की यह पहली कृति है , जिसका श्रेय लेखिका को मिलेगा। फलित ज्‍योतिष की पिटी पिटायी परंपराओं के यांत्रिक विवेचन से हटकर वैज्ञानिक ज्‍योति‍षीय तथ्‍यों का प्रादुष विवेचन इस पुस्‍तक की विशेषता है , जो अभी तक फलित ज्‍योतिष के एकमेव आश्रय विंशोत्‍तरी पद्धति की शरणागति की अनिवार्यता को अस्‍वीकार करती है।

विंशोत्‍तरी पद्धति के स्‍थान पर ज्‍योतिष में वर्णित ग्रहों की अवस्‍था को क्रमानुसार स्‍थान पुस्‍तक की विवेच्‍य प्रणाली में दिया गया है , लेखिका की मान्‍यता है कि बाल्‍यावस्‍था में प्रभावित करनेवाला उपग्रह चंद्रमा है , भले ही जातक का जन्‍म किसी भी नक्षत्र में हुआ हो। इसी तरह वृद्धावस्‍था को प्रभावित करने वाले ग्रह बृहस्‍पति और शनि हैं। इसका कारण यह है कि फलित ज्‍योतिष में वृद्धावस्‍था का ज्ञानी ग्रह बृहस्‍पति माना गया है , उत्‍तर वृद्धावस्‍था के प्रतीक ग्रह के रूप में शनि की मान्‍यता है। इस दशा पद्धति में ग्रहों का कालक्रम क्रमश: चंद्र , बुध , मंगल , शुक्र , सूर्य , बृहस्‍पति , शनि , यूरेनस , नेप्‍च्‍यून और प्‍लूटो को रखा गया है। जन्‍म नक्षत्र पर इस दशाकाल की कोई आश्रिति नहीं है। इस मौलिक दशा पद्धति के जन्‍म दाता श्री विद्या सागर महथा की मान्‍यता है कि सभी ग्रहों के दशाकाल को संचालित करने का अधिकार मात्र चंद्रमा को देना सर्वथा अवैज्ञानिक है। अपने दशाकाल में सभी ग्रह अपनी बल स्थिति अपनी गत्‍यात्‍मकता के अनुसार संभालेंगे , यह सहज वैज्ञानिक बुद्धि से समर्थित और पुष्‍ट होता है।

इस दशा पद्धति में राहू और केतु कोई आकाशीय पिंड नहीं है ,  भौतिक विज्ञान के अनुसार पदार्थ की अनुपस्थिति में शक्ति या ऊर्जा की परिकल्‍पना नहीं की जा सकती। प्रस्‍तुत दशा पद्धति में एक ओर ग्रहों के दशा काल में निश्चित कालक्रम को स्‍थान दिया गया है , तो उसी वैज्ञानिकता से ग्रहों में बलाबल की परंपरागत रीति से हटकर विचार किया गया है। इसमें चेष्‍टा बल , दिकबल , स्‍थानबल , अष्‍टकवर्ग बल आदि से भिन्‍न ग्रहों के गत्‍यात्‍मक और स्‍थैतिक बल को तथा ग्रहों की गमता को ग्रह बल का मुख्‍य आधार माना गया है। जो हो , यह तो सभी मानेंगे कि जिस विधि से संपूर्ण जीवन की तिथियुक्‍त भविष्‍यवाणी बहुत ही आत्‍मविशवास के साथ और सही सही की जा सके , वही विधि अंतत: लोकग्राह्य होगी।

यूरेनस, नेप्‍च्‍यून तथा प्‍लूटो आदि पाश्‍चात्‍य मान्‍यता के ग्रहों की स्‍वीकृति तथा भारतीय फलित ज्‍योतिष में उसका सन्निवेश भी इस बात का प्रमाण है कि लेखिका अबतक की रूढ परंपराओं में बंधी नहीं होकर प्राच्‍य और पाश्‍चात्‍य पुरातन और अर्वाचीन दोनो की उपयोगी ज्‍योतिषीय पद्धतियों का स्‍वीकार करने में कोई संकोच नहीं किया है। ‘ या नो भद्रा तत्‍वो यन्‍तु विश्‍वस्‍त:’ ( सारे विश्‍व से भद्र विचार हमारे पास आवें) के आर्ष वाक्‍य के अनुदेश के सर्वथा अनुकूल हैं। नए रास्‍ते पर चलनेवाले पहले व्‍यक्ति को बहुत सी कठिनाइयों का सामना करना पडता है। उसके लिए सारस्‍वत स्‍वीकृति सहज नहीं होती। ऐसी ही परिस्थिति में महाकवि कालिदास ने कहा था ....
पुराणमित्‍येव न साधु सर्वं , न चापि सर्व नवमित्‍यवद्यम ।
सन्‍त: परिक्ष्‍याण्‍यतरद् भजन्‍त , मूढ: पर प्रत्‍ययनेय बुद्धि ।।

‘जो पुराना है , वह न तो सबका सब ठीक है और न जो नया है वह सभी केवल नया होने के कारण अग्राह्य है। साधु बुद्धि के लोग दोनो की परीक्षा करके स्‍वीकार और अस्‍वीकार करते हैं , दूसरों के कहने पर तो मूढ ही राय बनाते हैं’
मेरा विश्‍वास है कि प्रस्‍तुत पुस्‍तक अपनी मौलिकता और विवेचन बल पर ज्‍योतिषीय जगत में अपने आदर का स्‍थान स्‍वयमेव बना लेगी और इसकी प्रतिभापूर्ण लेखिका एक नए हस्‍ताक्षर के रूप में सम्‍मान अर्जित करेंगी , ऐसा ही हो , यह मेरा आशीर्वचन तथा शुभांशसा दोनो है। राष्‍ट्रीय एवं अंतर्राष्‍ट्रीय स्‍तर के नक्षत्र शास्‍त्रीय पत्र पत्रिकाओं में लेखिका की जो रचनाएं स्‍वागत पा रही हैं , उससे मेरी इन आशाओं और विश्‍वासों को मूर्त्‍त होने की आश्‍वस्ति मिलती है।

इत्‍यलम् इतिशुभम
डॉ विश्‍वंभर नाथ पांडेय
एम ए , एल एल बी, पी एच डी
निदेशक , भारतीय संस्‍कृति एवं लोक सेवा संस्‍थान
भूतपूर्व प्राचार्य , रांची कॉलेज , रोची , झारखंड 

29 अप्रैल को होने वाले विवाह



30 अप्रैल को सुबह सुबह शैलेश भारतवासी जी के फेसबुक स्‍टेटस पर मेरी नजर गई ...

क्या कभी ऐसा भी हो सकता है कि मातम और उत्सव इतनी जल्दी-जल्दी हों कि इंसान उनका एहसास न कर सके। गौरव शर्मा (Gaurav Sharma) के परिवार के साथ कुछ ऐसा ही हुआ। 27 अप्रैल 2013 को गौरव का लग्न-महोत्सव था (झाँसी, आगरा, मथुरा आदि स्थानों का लग्न पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के तिलकोत्सव की तरह का ही एक वैवाहिक संस्कार है)। लड़की पक्ष वाले लग्न करके रात तीन बजे तक झाँसी से धौलपुर के लिए निकले। शायद वे धौलपुर पहुँच भी नहीं पाए होंगे कि लगभग सुबह के साढ़े सात बजे गौरव के पिताजी का दिल का दौरा पड़ने से देहांत हो गया। यह पहला ही दौरा था लेकिन जानलेवा साबित हुआ। 

इस घटना को लेकर मन कुछ दुखी ही था कि शाम को सुनील बडोला जी का फेसबुक स्‍टेटस भी वैसा ही देखने को मिल गया .... 

मातम में बदली शादी, दूल्हे की मौत

देहरादून: अंबाला से पूरे परिवार और नाते-रिश्तेदारों के साथ सेहरा बांधकर देहरादून बरात लेकर पहुंचे दूल्हे की जयमाला के दौरान तबियत बिगड़ गई। परिजन उसे अस्पताल ले गए, लेकिन उपचार के दौरान उसकी मौत हो गई। पुलिस ने शव को पोस्टमार्टम के बाद परिजनों को सौंप दिया। मृतक के परिजनों ने खाने में किसी तरह की विषाक्त चीज खिलाने की आशंका जताई है। पुलिस पीएम रिपोर्ट आने का इंतजार कर रही है। उसके आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी।


30 वर्षों से ग्रहों के प्रभाव का अध्‍ययन करने के बाद यह तो स्‍पष्‍ट हुआ है कि ग्रहों का कोई योग सुखद वातावरण तैयार करता है तो कुछ कष्‍टकर , यही कारण है कि शुभ मुहूर्त्‍तों में विवाह या अन्‍य कर्मकांड करने को महत्‍व दिया जाता है। 29 अप्रैल को अक्षय तृतीया का दिन था , जिस दिन के लग्‍न को हमारे पंचांगों में बहुत ही शुभ माना गया है , फिर भी ऐसी दुर्घटनाएं क्‍यों हुई , आखि 29 अप््रैल को दिन अशुभ तो नहीं था , यह जानने के लिए मैने गूगल में '29 अप्रैल 2013' कीवर्ड के द्वारा पिछले सप्‍ताह के सभी समाचारों पर नजर डाली तो पाया कि बहुत सारे स्‍थानों में इस दिन के विवाह में कुछ न कुछ बाधाएं उपस्थित हुईं , ऐसा अन्‍य दिनों में भी होता होगा , क्‍योंकि मैने इस तरह का सर्च कभी नहीं किया था। पर यदि इसी बार इतने बडे स्‍तर पर वैवाहिक कार्यक्रम में गडबडी आई है तो यह मेरे लिए शोध का विषय है कि आखिर इस दिन ग्रहों की स्थिति में क्‍या गडबडी थी , ताकि ऐसे दिनों में आगे विवाह न किए जाने की सलाह लोगों को दी जा सके। ये देखिए 29 अप्रैल को होने वाले विवाह के साथ अजब गजब कुछ समाचारों के लिंक ...... 
गलोड़ में मंगलवार रात को शादी समारोह में हिस्सा लेने आए एक युवक की छत से गिरकर मौत हो गई। मृतक की पहचान रामू (23) पुत्र अशोक बाबू निवासी नंगला कीरत गोला बाजार तहसील व जिला मैनपुरी (उत्तर प्रदेश) के रूप में हुई है। पुलिस ने पोस्टमार्टम करवाने के बाद शव परिजनों को सौंप दिया है।रामू गलोड़ में अपनी भांजी की 29 अप्रैल को शादी समारोह में हिस्सा लेने के लिए पहुंचा था। 
शादी 29 अप्रैल की रात देहरादून में वेदपाल के रिश्तेदार के घर होनी थी। यहां रायपुर क्षेत्र की आर्डिनेंस फैक्ट्री एस्टेट में वधू पक्ष ने शादी का इंतजाम किया। तय कार्यक्रम के मुताबिक, सोमवार को वर पक्ष के लोग बरात लेकर यहां पहुंचे। देर रात जयमाला हुई। जयमाला के बाद फोटो खिंचवाने का कार्यक्रम चल रहा था कि दूल्हे प्रदीप को पेट में दर्द हुआ। उसने टॉयलेट जाने की इच्छा जताई। बाथरूम में उसे उल्टियां होने लगीं और वह बेहोश होकर गिर पड़ा। वर व वधू पक्ष के लोग प्रदीप को तत्काल दून अस्पताल लाए, लेकिन हालत गंभीर देख डॉक्टरों ने प्रदीप को सीएमआइ अस्पताल रेफर कर दिया। सीएमआइ से उसे मसूरी हाईवे स्थित मैक्स अस्पताल रेफर कर दिया गया। मैक्स अस्पताल में उपचार के दौरान प्रदीप की मौत हो गई। 
गांव सकलूपुरा में भांजी की शादी होने से उनका परिवार 28 अप्रैल को भात देने गया था। जहां 29 अप्रैल की रात को शादी थी। बारात गांव सौर्या मकनपुर से आई हुई थी। परिजनों के मुताबिक पीडि़त बालिका पिता के साथ घर की छत पर सो रही थी, इस दौरान बरात में आया एक वहशी दरिंदा छह वर्षीय बालिका को उठाकर दूर ले गया और उसके साथ दुष्कर्म किया। 
गांव सांकरोड़ निवासी देसराज के बेटे कैलाश की शादी गुडग़ांव के खेड़की माजरा निवासी जोगेंद्र की बेटी के साथ 29 अप्रैल को थी। ओमपाल भी कैलाश की बारात में गया हुआ था। दोस्त की शादी में खुश ओमपाल देर रात तक डीजे पर नाच रहा था। रात 12 बजे के बाद गांव के ही सुमेर व विक्रम का डीजे पर नाचने को लेकर झगड़ा हो गया। ओमपाल ने झगड़े में सुमेर का पक्ष लिया था। ओमपाल जब टैंट में खाना खाने जा रहा था तो डीजे पर झगड़ा करने वाले युवकों ने मिलकर ओमपाल को बुरी तरह से पीटना शुरू कर दिया। इस घटना में वह अधमरा हो गया। लोगों ने बीच-बचाव कर मामले को शांत करा दिया। इस झगड़े में ओमपाल को कई जगह गुम चोट लगी थी। उसे सिविल अस्पताल में ले जाया गया, मगर चिकित्सकों ने उसे मृत घोषित कर दिया। 
यह घटना है बेगूं थाना क्षेत्र के नंदवाई पंचायत अंतर्गत मुरोली की। यहां रहने वाली 16 वर्षीय कविता पुत्री रामलाल धाकड़ रविवार को पुलिस थाने पहुंची। उसने सीआई विक्रमसिंह को लिखित आवेदन देकर बताया कि वह मंडावरी में अपने मौसी-मौसाजी के पास रहती है। उसके माता-पिता 29 अप्रैल को आयोजित सामूहिक विवाह सम्मेलन में उसकी शादी करवाना चाहते हैं। जबकि वह बालिग होने तक शादी नहीं करना चाहती है, इसलिए शादी करने पर आमादा उसके परिजनों को पाबंद कराया जाए। 
गांधी नगर निवासी अनूप नाग ने अपनी इकलौती पुत्री की शादी चास निवासी प्रदीप कुमार के पुत्र प्रकाश के साथ तय की थी। तिलक में एक लाख रुपये दी गई थी जबकि 29 अप्रैल को बारात आनी थी। तय तारीख को रात में करीब दस बजे बारात आई। गुरुद्वारा हॉल में बारात को ठहराया गया। लड़की वालों ने जोड़ाफाटक सुरेंद्र वाटिका में इंतजाम किया था। वहां मेहमानों को भोजन आदि चल रहा था। बारात भी हॉल से सुरेंद्र वाटिका ही आनी थी। लेकिन रात बारह बजे जब तक बारात नहीं निकली। लड़की के पिता जब दूल्हे के कमरे में गए तो तो उनके होश उड़ गए। प्रकाश अपनी शादी के कपड़े जुड़वा भाई सूरज को पहना रहा था। 
बहन की बेटी लीलावती की 29 अप्रैल को बरात आने वाली थी। शादी में हिस्सा लेने के लिए दीनानाथ बाइक से सिंगही जा रहा था। बाइक पर उसकी पत्‍‌नी रीता, बेटा ध्रुव भी बैठा था। वह खुखुंदू थाना क्षेत्र के ग्राम मुजुरी के समीप भरथुआ-भटनी मार्ग पर पहुंचे थे कि अचानक भटनी की तरफ से एक ट्रक आ गया। उसे पास देते समय बाइक अनियंत्रित होकर गड्ढे में चली गई, जिससे तीनों गंभीर रुप से घायल हो गए। आसपास के लोगों ने तीनों को इलाज के लिए जिला अस्पताल भिजवाया, जहां हालत गंभीर देख चिकित्सक ने दीनानाथ को मेडिकल कालेज गोरखपुर रेफर कर दिया। गोरखपुर जाते समय दीनानाथ ने रास्ते में ही दम तोड़ दिया। 
29 अप्रैल को शादी होनी थी। कार्यक्रम के मुताबिक शनिवार को मंडप के दिन मंडप के दिन पिता ग्राम प्रधान बृजभान सिंह व अन्य तमाम लोगों को साथ लेकर ननौरा तिलक चढ़ाने पहुंचा यहां लड़के के पिता ताराचंद ने तिलक के थाल में कम से कम एक लाख रुपए रखने को कहा। इतनी रकम की व्यवस्था न हो पाने पर उसने पिता को उल्टी सीधी बातें कह तिलक वापस कर दिया। मौजूद लोगों ने ताराचंद को समझाने की कोशिश की पर वह किसी की बात सुनने को तैयार नहीं हुआ। लाचार हो तिलक ले कर गए लोग बैरंग वापस लौट आए। लड़की के पिता ने रविवार को श्रीनगर थाने में तहरीर देकर दहेज उत्पीड़न का मुकदमा दर्ज करने की गुहार लगाई है। 
29 अप्रैल को उसकी शादी की तिथि तय हो गयी और निमन्त्रण कार्ड भी बाँटे गये। इसी बीच इस प्रेमी जोड़े ने लोक लाज व मर्यादाओं को ठेगा दिखाते हुये घर से भागकर अपनी अलग दुनिया बसाने का समाज विरोधी निर्णय ले लिया। इसके तहत विगत शनिवार को प्रेमी युगल ने घर से भागने की योजना बना ली। उधर, शनिवार को युवक ने अपने ही घर में गणेश पूजन व तेल की रस्म परिजनों के कहे अनुसार अदा की। परन्तु इसके बाद उसका प्रेमिका से मोबाइल पर सम्पर्क हो गया, और उसका दिल फिर से उसके लिये मचलने लगा। दोनों मोबाइल फोन पर सम्पर्क के आधार पर अपने पुराने मिलन स्थल पर पहुँच गये। बाद में लोक लाज व मर्यादाओं को ठेंगा दिखाकर उक्त प्रेमी जोड़ा घर से फरार हो गया। 
विवेक विहार निवासी भूपसिंह के बेटे सतेन्द्र की शादी 29 अप्रैल को है। शनिवार को सगाई समारोह चल रहा था। भूपसिंह के दामाद दरोगा सुनील कुमार टुंडला से आए हैं। बताया जाता है कि नाच गाने के दौरान दरोगा ने अपनी पिस्टल से चली गोली साली राजशिखा के पेट में लग गई 
घटना के बारे में घायल धर्मराज कोटार्य ने बताया कि उसके अनौसा निवासी साले रामभवन की 29 अप्रैल को शादी है। इससे महोबा बारात जाने के लिए आतिशबाजी बुक करने आया था। उसके पीछे-पीछे बेटा खेमराज भी चला आया था। इससे वह भी चपेट में आकर घायल हो गया। 
मनियर प्रतिनिधि के अनुसार मनियर पूरब टोला (छावनी मुहल्ला) निवासी पारस सिंह का इकलौता पुत्र सूरज सिंह (22) अपने मोहल्ले के राजा सिंह, बब्बन वर्मा, मक्खन वर्मा के साथ पतार घाट घाघरा में स्नान करने गया हुआ था। स्नान करते समय सूरज चकोह में फंस गया। उसका चचेरा भाई राजा ने उसका हाथ पकड़कर बाहर खींचना चाहा लेकिन वह स्वयं चकोह में फंसता देख उसका हाथ छोड़ दिया जिससे सूरज पल भर में ही लहरों में समा गया। सूरज के डूबने की खबर कस्बे में आते ही शोक की लहर दौड़ गई। गोताखोरों को बुलाकर शव की तलाश देर शाम तक होती रही लेकिन कोई सफलता नहीं मिल सकी। पारस सिंह गुजरात में प्राइवेट कंपनी में काम करते हैं। उनका इकलौता पुत्र सूरज भोपाल में बीसीए की तैयारी कर रहा था। पारस सिंह 29 अप्रैल को भाई की लड़की की शादी में शामिल होने के लिए आए हुए थे। 
पत्‍‌नी की हत्या के बाद आभूषण व नकदी के साथ बांके बिहारी के फरार होने को ले गांव में तरह-तरह की चर्चा है। ग्रामीणों ने बताया कि बांके की बहन रेणु की शादी 29 अप्रैल को होनी थी। रेणु की शादी के लिए उसके पिता विंध्याचल जायसवाल ने आभूषण के साथ-साथ घर में नकदी रखे हुए थे। हत्या के बाद बांके ने पत्‍‌नी के शरीर से भी गहने उतार लिए। इसके साथ-साथ घर में रखे आभूषण व नकदी लेकर फरार हो गया है। 
अपनी चचेरी बहन अर्चना, जिसकी शादी 29 अप्रैल को होनी है, उसमें शरीक होने के लिए आया था। आरोपी पट्टीदारों से उसका कोई विवाद नहीं था। अजय का कसूर बस इतना था कि उसने घर आते समय ध्रुव सिंह को शराब पीने से मना किया था। इसी को लेकर अजय और ध्रुव में कहासुनी हुई। लोगों ने बीच बचाव कर मामले को शांत कर दिया। यह बात ध्रुव को नागवार लगी और अपने पुत्रों संग अजय की हत्या कर दी। 
पुलिस ने मृतक के पिता राजेन्द्र के बयान पर इत्फाकिया कार्रवाई करते हुए शव का पोस्टमार्टम करवा परिजनों को सौंप दिया। राजेंद्र सिंह ने बताया कि वह किसान है। उसके दो लड़के हैं। उसका बड़ा लड़का सोनू कनीना के पीकेएसडी कॉलेज में बीए द्वितीय का छात्र था। अचानक गुरुवार दोपहर करीब एक बजे सोनू ने प्लाट में जाकर फांसी लगा ली। सरपंच कुलदीप सिंह ने बताया कि सोनू की चचेरी बहन की 29 अप्रैल को शादी होनी है। उसका पूरा परिवार शादी की तैयारियों में लगा हुआ था।

अंधविश्‍वासों के आवरण में प्रच्‍छन्‍न : क्‍या है सत्‍य ??



समाज में भांति भांति के अंधविश्‍वास व्‍याप्‍त हैं , जो बुद्धिजीवी वर्ग को स्‍वीकार्य नहीं हो सकते , पर इन अंधविश्‍वासों के मध्‍य भी कुछ वैज्ञानिक सत्‍य हैं , जिनका खुलासा हमारे पिताजी श्री विद्या सागर महथा इस पुस्‍तक में कर रहे हैं , जिन्‍होने विज्ञान से स्‍नातक और हिंदी भाषा में मास्‍टर डिग्री लेने के बाद अपना सारा जीवन प्रकृति के उन रहस्‍यों को समझने में लगा दिया , जिससे पूरी दुनिया अनजान है , सालभर से मैं इस पुस्‍तक को सारगर्भित बनाने में ही जुटी थी , अब यह प्रकाशन के लिए तैयार हो चुकी है , समाज से अंधविश्‍वास दूर करने के लिए सामान्‍य लोगों के लिए पठनीय इस पुस्‍तक का प्रकाशन और जन जन तक वितरण आवश्‍यक भी है।






समर्पण






मेरी माताजी सदैव भाग्य और भगवान पर भरोसा करती थी। मेरे पिताजी निडर और न्यायप्रिय थे। दोनों के व्यक्तित्व का संयुक्त प्रभाव मुझपर पड़ा। जहां एक ओर माताजी की अतिशय भाग्यवादिता ने मुझे परम शक्ति की यांत्रिकी को समझने को प्रेरित किया , वहीं दूसरी ओर पिताजी की न्यायप्रियता के फलस्वरुप मुझे सच और झूठ की पहचान एवं उसकी अभिव्यक्ति की शक्ति मिली। अतः मै अपनी पहली पुस्तक ‘ अंधविश्वासों के आवरण में प्रच्छकन्न् : क्या है सत्य़ ’ पूज्य माता-पिता के चरण-कमलो में सादर समर्पित करता हूं।


विद्यासागर महथा












पी डी एफ में पूरी पुस्‍तक पढने के लिए यहां क्लिक करें ....










विषय क्रम ...

5. हस्त रेखाएं

6. वास्तुशास्त्र

7. हस्ताक्षर विज्ञान

8. नजर का असर

9. न्यूमरोलोजी

10. प्रश्न कुंडली

11. ज्यो्तिष की सीमाएं

12. ज्यो्तिषी का विवादास्पद सामाजिक महत्व

13. राजयोग

14. कुंडली मेलापक

15. राहू और केतु

16. विंशोत्तरी पद्धति

17. ज्योतिष की त्रुटियां एवं दूर करने के उपाय

18. ज्योतिष का वैज्ञानिक आधार

19. ग्रह शक्ति का रहस्य

20. हम ग्रह की किस शक्ति से प्रभावित हैं ?

21. गत्यात्म्क दशा पद्धति

22. ग्रहों का मानव जीवन पर प्रभाव

23. सहजन्मा के मंजिल की एकरूपता

24. क्या् बुरे ग्रहों का इलाज है ?

25. खतरे की पूर्व जानकारी से लाभ

26. घडी की तरह समय की जानकारी आवश्यलक है

27. ज्योतिष और आध्यात्म

28. ज्योतिषियों से विनम्र निवेदन









1. वार से फलित कथन अवैज्ञानिक


2. यात्राएं और सप्ताह के दिन


3. शकुन


4. मुहूर्त्त










... पढने के बाद प्रतिक्रिया दें .. दस उत्‍तम प्रतिक्रियाओं को पुस्‍तक में जगह दी जाएगी .....


नारी को युग के अनुरूप अपने व्‍यक्तित्‍व को मजबूत बनाना होगा ....


कुछ दिनों पूर्व एक उलझा हुआ सवाल मिला था , कहते हैं कि नियति निर्धारित है और उसे परिवर्तित नहीं किया जा सकता. तो क्या स्त्री की नियति भी निश्चित है जो उसे सदियों से भोग्या बना कर रख दिया गया है? पुरुष वर्ग ने ही सारी किस्मत का ठेका ले रखा है और औरत किस्मत की मारी बेचारी बन के रह गई है. क्या ज्योतिष की नजर से स्त्री चिंता का कोई समाधान मिल सकता है? आशा है आप मेरे इस सवाल का उत्तर अवश्य देंगी……


चिंतन के क्रम में बहुत सारी बातें जुटती गयी , जो आज पोस्‍ट के रूप में प्रस्‍तुत है ….


विविधता प्रकृति की सबसे बडी खासियत है , इसलिए जहां एक ओर शैवाल जैसे एक कोशिकीय जीव और केंचुए से लेकर ह्वेल और हाथी जैसे जीव और कमल एवं गुलाब जैसे सुंदर फूलदार से लेकर नागफनी जैसे रेगिस्तानी पौधे यहां मौजूद हैं, तो दूसरी ओर नीम, पीपल और वट जैसे विशाल वृक्ष जीवन के अनेक रूपों को आश्रय प्रदान कर जैव विविधता को बनाए हुए हैं । एक एक कण अलग अलग रंग रूप और स्‍वभाव लेकर बिखरे हुए हैं , यदि गंभीरता से विचार किया जाए तो किसी का भी महत्‍व कम नहीं लगता । विष और अमृत दोनो जगह जगह पर उपयोगी हैं , पर युग के अनुरूप प्रकृति की प्रत्‍येक वस्‍तु में कभी किसी का महत्‍व कम और कभी अधिक हो जाता है।

जब ‘शक्ति’ के आधार पर कोई सभ्‍यता और संस्‍कृति चले , अधिकांश समय ऐसा ही चला है , तो जैसा कि जंगल राज में चलता है , मजबूत अपने शिकार के लिए कमजोर जीवों को मारते हैं और कमजोर अपने बचाव का रास्‍ता ढूंढते हैं। पशुओं की प्रकृति को स्‍वीकार करना हमारी मजबूरी हो सकती है , पर हमारा दुर्भाग्‍य है कि हमें ऐसी प्रवृत्ति वाले मनुष्‍य को भी स्‍वीकार करना पडता है। ऐसा राज होने पर मनुष्‍य भी पशु ही हो जाते हैं , ऐसी स्थिति में बलवान शोषण करता है और बलहीनों को शोषित होना पडता है , इस दृष्टि से हमेशा नारी कमजोर है। इसी प्रकार कभी ‘पद’ तो कभी ‘धन’ को मजबूत माना जाता रहा और समाज में इनका महत्‍व बना रहा। प्राचीन नारियों के पास भी कभी न तो धन रहे और न पद। नारियों ने कभी एकजुट होकर इसके लिए लडने की हिम्‍मत भी नहीं की।

इसी प्रकार जब ‘ज्ञान’ के आधार पर कोई सभ्‍यता और संस्‍कृति चले तो ज्ञानी शोषण करते हैं और अज्ञानियों को शोषित होना पडता है। अज्ञानियों के हर कमजोरी का फायदा उठाकर ज्ञानी उसकी खासियत का उपयोग करते हैं , प्रकृति के सभी जीव जंतुओं को ऐसे ही उपयोग में लाया गया , इसके कारण आज कुछ ही वर्षों में न जाने कितने जीव विनाश के कगार पर हैं। प्राचीन काल से समाज में नारियों के ‘ज्ञान’ प्राप्‍त करने की सुविधा न होने से यहां भी उनकी लाचारी हो जाती है , उनकी कोमल भावनाओं का फायदा उठाकर उनकी हर खासियत का उपयोग किया जाता है। पर मैं समझती हूं कि ज्ञान का नाजायज फायदा उठानेवाले ऐसे ज्ञानी अज्ञानियों से भी बदतर हैं।

आज विकासशील और विकसीत देशों में ‘ज्ञान’ के आधार पर ही सभ्‍यता और संस्‍कृति चल रही है , इसी कारण पर्यावरण का हद से भी बुरा हाल है , वनों और वन्‍य जीवों का तो हाल पूछिए ही मत। पर यहां नारियों की स्थिति अविकसित देशों की तुलना में कुछ अच्‍छी मानी जा सकती है। जिन देशों में इन्‍हें ‘ज्ञान’ प्राप्‍त की सुविधा भी मिल रही है, इनकी लाचारी कम ही दिखती है , यदि विकास का क्रम बना रहा तो आनेवाले दिनों में इनकी स्थिति में सुधार संभव है । पर आनेवाली संस्‍कृति में ‘अर्थोपार्जन करने वाले ज्ञान’ का ही महत्‍व है , स्‍त्री हैं या पुरूष कोई मायने नहीं रखता । जो खुद , किसी व्‍यक्ति को , किसी कंपनी को या किसी सरकार को अर्थोपार्जन में मदद करते हैं , समाज में उनकी उपयोगिता है , चाहे इसके लिए आपको कोई भी उल्‍टा सीधा काम करना पडे , आपके सौ खून भी माफ हो सकते हैं। इसके विपरीत आप अर्थोपार्जन के गुर नहीं जानते तो आपके गुण , ज्ञान और ईमानदारी की कोई कीमत नहीं।

इसलिए हमारे प्राचीन ऋषि मुनियों ने सभ्‍यता संस्‍कृति को ‘धर्म’ के आधार पर चलाने का फैसला लिया था , ऐसी स्थिति में ‘शक्ति’ , ‘ज्ञान’ , ‘पद’ या ‘धन’ का नाजायज फायदा उठानेवाले नहीं होते। प्रकृति के एक एक कण की खासियत देखी जाती है और तदनुरूप उसका उपयोग किया जाता है। धर्म ने हमेशा आज के लिए नहीं , आनेवाले कल के लिए सोंचा , आनेवाली पीढी के लिए सार्थक चिंतन किया। यही कारण है कि सभी ‘धर्म’ का मूल व्‍यक्ति के मानवीय गुणों का विकास करना है। सिर्फ ‘स्‍व’ के बारे में सोचना आज के युग में बहुत बडी गल्‍ती है , प्रकृति में एक एक व्‍यक्ति के कार्य याद रखे जाते हैं और उन्‍हें उनके अच्‍छे और बुरे दोनो तरह के परिणाम भी मिलते हैं। पर विडंबना ही है कि जब सभ्‍यता संस्‍कृति ‘शक्ति’ , ‘ज्ञान’ , ‘पद’ या ‘धन’ के हिसाब से चलती है तो धर्म नाममात्र के लिए रह जाता है , क्‍यूंकि इसको भी उसी हिसाब से चला दिया जाता है।

अब यदि ज्‍योतिष पक्ष की बात की जाए तो ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ का विकास मात्र पचास वर्ष पुराना है और इससे पहले के ज्‍योतिष की पुस्‍तकों में सिद्धांतों की इतनी भीड है कि अध्‍ययन में किसी के पूरे जीवन गुजर जाएंगे और किसी निष्‍कर्ष पर पहुंचना संभव नहीं। उनके सभी नियमों में विरोधाभास है , एक का दूसरे से तालमेल का सर्वथा अभाव है। इसलिए खगोल शास्‍त्र के मूल आधार को लेकर हमारे पिताजी विद्या सागर महथा जी ने नए रूप में अध्‍ययन , मनन , चिंतन आरंभ किया और पचास वर्षों तक लगातार एक एक निष्‍कर्ष स्‍थापित करते चले गए। फलस्‍वरूप ज्‍योतिष की एक नई शाखा ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ का विकास हुआ। इतने मजबूत आधार प्राप्‍त करने के बाद 25 वर्षों से मैने भी उन्‍हें सहयोग देना आरंभ किया है , फलस्‍वरूप इसके विकास में तेजी आयी है।






‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ ने मनुष्‍य के जीवन में पडनेवाले ग्रहों के प्रभाव का बहुत अच्‍छा अध्‍ययन किया है, मानव जीवन के बहुत सारे पक्षों की बातें अब स्‍पष्‍ट समझ में आती है। खासकर मनुष्‍य के जीवन के विभिन्‍न काल पर ग्रहों से वे किस प्रकार प्रभावित होंगे , इसको स्‍पष्‍टत: बताया जा सकता है । ग्रहों के गत्‍यात्‍मक और स्‍थैतिक शक्ति की नई जानकारी के बाद मौसम , शेयर बाजार , राजनीति और अन्‍य क्षेत्रों में ग्रह के प्रभाव के बारे में लगातार अध्‍ययन चल रहा है और कई निष्‍कर्ष स्‍थापित किए जा चुके हैं।






पर युग पर ग्रहों के प्रभाव के अध्‍ययन की अभी शुरूआत ही हुई है , हाल फिलहाल में मैने वृद्धों के जीवन पर पड रहे ग्रहों के बुरे प्रभाव का कारण ढूंढने में सफलता पायी है। उसके हिसाब से भारतवर्ष में 2020 के बाद क्रमश: ऐसा वातावरण बनना आरंभ होगा कि वृद्धों का महत्‍व बढता जाएगा। पिछली सदी के अंतिम दशक में युवाओं को गंभीर निराशाजनक परिस्थिति का सामना करना पडा था, क्‍यूंकि हर नौकरी में छंटनी का दौर चल रहा था, विरले ही किसी प्रतियोगिता में सफल होते थे। 2000 के बाद युवाओं के समक्ष कार्यक्रमों की कमी नहीं , चारो ओर उन्‍हें प्रशिक्षित करने के लिए कॉलेज खुल रहे हैं और उनकी मांग बनी हुई है।






पर ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ नारियों की दुर्दशा के बारे में कोई ग्रहीय कारण स्‍पष्‍टत: नही समझ सका है , अभी लंबे शोध की आवश्‍यकता है। वैसे भी नए सिरे से अध्‍ययन की जाए तो युग के अध्‍ययन में युग लग जाते हैं , विदेशियों के आक्रमण ने हमारा परंपरागत ज्ञान को नष्‍ट जो कर दिया है। पर इतना तो अवश्‍य है कि प्रकृति ने युग और काल के अनुरूप किसी के बनावट में कुछ कमजोरी दी है तो इनके भाग्‍य में कुछ कमी तो अवश्‍य होगी और उसका फल उन्‍हें झेलना ही होगा। नारी को युग के अनुरूप अपने व्‍यक्तित्‍व को मजबूत बनाना होगा।






अंतर्राष्‍ट्रीय महिला दिवस पर एक जरूरी मांग ... अपनी सरकार से

Mahila divas kab manaya jata hai


पिछले माह ट्रेन से आ रही थी , रिजर्वेशन नहीं होने और भीड के अधिक होने के कारण महिला बॉगी में चढ गयी , यहां हर वर्ग का प्रतिनिधित्‍व करने वाली महिलाएं मौजूद थी , बच्चियों , युवतियों से लेकर वृद्धा तक , मजदूर से लेकर सामान्‍य गृहस्‍थ तक और नौकरीपेशा से लेकर हम जैसी महिलाओं तक , जिसे किसी वर्ग में रखा ही नहीं जा सकता। पुलिस को ध्‍यान न रहे तो महिला बॉगी में महिलाओं के साथ वाले पुरूष भी अड्डा जमा ही लेते हैं , सफर में महिलाओं की संख्‍या कम नहीं रहती , इसलिए सबके बैठने की समुचित व्‍यवस्‍था नहीं हो पा रही थी। दस और बारह वर्ष की दो बच्चियां एक दो जगहों पर खुद को एडजस्‍ट करने की भी कोशिश की , पर कोई फायदा नहीं हुआ तो कुछ देर खडी इंतजार करती रही , जैसे ही उन्‍होने दो महिलाओं को उतरते देखा तो वे तेजी से सीट की ओर बढी , पर उन्‍होने पाया कि पहले जिस सीट पर सात महिलाएं बैठी थी , वहां इन पांच ने ही खुद को फैलाकर पूरी जगह घेर ली थी। 
बच्चियों ने पहले उनसे आग्रह किया , पर बात न बनी तो तर्कपूर्ण बातें कर हल्‍ला मचाकर सभी यात्रियों का ध्‍यान इस ओर आकृष्‍ट किया। सबको उनके पक्ष में देखकर महिलाओं ने खुद को समेटकर उन्‍हें बैठने की जगह दी। बच्चियों की माताजी को बच्चियों के उचित पालन पोषण के लिए शाबाशी मिली , शाबाशी देने वालों में दो कॉलेज की छात्राएं ही नहीं थी , जो छुट्टियों में महानगर से वापस आ रही थी, वरन् हर वर्ग की महिलाएं थी। बीस पच्‍चीस साल में बच्चियों के पालन पोषण में यह बडा अंतर आया है , हमारे जमाने में तो बडों के प्रति सम्‍मान और छोटों के प्रति स्‍नेह का प्रदर्शन करते हुए नाजायज को भी जायज कहने की शिक्षा दी जाती थी। यही कारण है कि सामने वालों के गलत वक्‍तब्‍य पर उस वक्‍त महिलाओं के मुंह से चूं भी नहीं निकलती थी। 

मैने जब कॉलेज की लडकियों से इस अंतर की चर्चा की तो उन्‍होने कहा कि उनकी मम्‍मी भी कुछ ऐसे ही बताती हैं। फिर बात आयी हमारे जमाने में परिवार के लिए किए जाने वाले महिलाओं के समझौते पर , एक लडकी ने बताया कि उसकी मम्‍मी बीएड कर चुकी थी , नौकरी करने को पापा ने मना कर दिया और मम्‍मी घर परिवार संभालने के चक्‍कर में मान भी गयी। मैने कहा कि उस जमाने में किसी एक महिला के साथ नहीं , बहुतों के साथ ऐसा हुआ कि उन्‍हें कैरियर को ताक पर रखना पडा। हमारे परिचय की एक गायनोको‍लोजिस्‍ट हैं , जिन्‍होने नौकरी के अधिकांश समय छुट्टियों में ही व्‍यतीत किए , फिर रिजाइन करना पडा , क्‍योंकि पतिदेव की पोस्टिंग जहां थी , वहां से वे ट्रासफर नहीं करा सकते थे और ये न तो वहां आ सकती थी और न अकेले बच्‍चों को लेकर रह सकती थी। 
सबसे बडी बात कि वे कैरियर को छोडकर भी राजी खुशी अपने पारिवारिक दायित्‍वों को निभाती रहीं। मैने खुद भी अपने परिवार और बच्‍चों को संभालने के लिए कैरियर के बारे में कभी नहीं सोंचा। पर आज की पीढी की लडकियां ऐसा समझौता नहीं कर सकती , दोनो लडकियां एक साथ बोल उठी , ‘हमारा सबकुछ बर्वाद हो जाए , हम कैरियर को नहीं बर्वाद होने देंगे’। वास्‍तव में ये आवाज इन दो लडकियों की नहीं , आज की पूरी पीढी की युवतियों की ये आवाज बन रही है और इसकी प्रेरणा उन्‍हें इनकी मांओं से ही मिल रही है , जो कल तक परिवार संभालने के कारण खुद के कैरियर पर ध्‍यान नहीं दे रही थी। समाज के लिए चिंतन का विषय है कि इन प्रौढ महिलाओं के चिंतन में बदलाव आने में कहीं उनका ही हाथ तो नहीं ?
सरकारी नौकरी कर रही महिलाओं को भले ही दुधमुंहे कभी कमजोर ,कभी बीमार बच्‍चे को छोडकर भले ही नौकरी को संभाल पाने में महिलाओं को दिक्‍कत होती हो , पर घर परिवार की जिम्‍मेदारी से मुक्‍त होते ही बच्‍चों के स्‍कूल में एडमिशन के पश्‍चात हल्‍के रूप में और बच्‍चों के बारहवीं पास करते ही अचानक महिलाओं को कुछ अधिक ही फुर्सत मिलने लगती है। कम पढी लिखी कम विचारशील महिलाएं अपनी अपनी मंडलियों में आ जाकर , फिल्‍में टीवी देखकर समय काट ही नहीं लेती , अपने दायित्‍व विहीन अवस्‍था का नाजायज फायदा उठाती हैं और समय का पूरा पूरा दुरूपयोग करती हैं। उनकी छोटी मोटी जरूरतें पतियों के द्वारा पूरी हो जाने से वे निश्चिंत रहती हैं। 
पर विचारशील महिलाएं कोई न कोई रचनात्‍मक कार्य करना चाहती है , पर बढती उम्र के साथ कुछ बाधाएं भी आती हैं , और उनको काम में परिवार , समाज का सहयोग भी नहीं मिल पाता , उन्‍हें ऐसा महसूस होने लगता है कि उनकी प्रतिभा का कोई महत्‍व नहीं। उनकी प्रतिभा को समाज में महत्‍व दिया जाता , तो उनका दृष्टिकोण ऐसा नहीं होता। जिस त्‍याग को अब वे भूल समझ रही हों , वह त्‍याग अपनी बच्चियों से नहीं करवा सकती। पर इससे भी आनेवाली पीढी को बहुत नुकसान है , यह बात समाज को समझनी चाहिए।

पूरी एक पीढी की युवतियों का यह सोंचना कि परिवार के लिए कैरियर को छोडना उचित नहीं , आने वाले समय में बहुत बडी अव्‍यवस्‍था पैदा कर सकता है। हमारी पीढी की गैर कामकाजी महिलाओं ने बच्‍चों के प्रत्‍येक क्रियाकलापो पर ध्‍यान रखा , उसे शारीरिक , नैतिक , बौद्धिक और चारित्रिक तौर पर सक्षम बनाया । सारी कामकाजी महिलाओं के बच्‍चों का लालन पालन ढंग से न हो सका , ऐसी बात भी नहीं है , यदि परिवार में बच्‍चों पर ध्‍यान देने वाले कुछ अभिभावक हों या पति और पत्‍नी मिलकर ही बच्‍चों का ध्‍यान रख सकते हों , तो महिलाओं के नौकरी करने पर कोई दिक्‍कत नहीं आयी। पर आज की युवतियॉ कैरियर को अधिक महत्‍व देंगी , वो भी प्राइवेट जॉब को वरियता देती हैं , तो बच्‍चे आयाओं के भरोसे पलेंगे , उनके हिसाब से ही तो उनका मस्तिष्‍क विकसित होगा। 
एक भैया की शादी मेरे साथ ही हुई थी , पत्‍नी अपने जॉब में तरक्‍की कर रही हैं , इसलिए संतुष्‍ट हैं , पर बच्‍चों के विकास से संतुष्‍ट नहीं , अफसोस से कहती हैं , ‘जब सबका बच्‍चा बढ रहा था , मेरा बढा नहीं , जब सबका बच्‍चा पढ रहा है , मेरा पढा नहीं।‘ हां चारित्रिक तौर पर दोनो अच्‍छे हैं पर इस प्रकार की असंतुष्टि उस समय एक दो परिवार की कहानी थी , अब यही हर परिवार की कहानी होगी। बच्‍चों का विकास ढंग से नहीं होगा , उनके व्‍यक्तित्‍व का पतन होगा तो उसे भी देश को ही झेलना होगा। महिला दिवस पर न जाने कितने सेमिनार और कार्यक्रम हा, पर शायद ही किसी का ध्‍यान इस गंभीर समस्‍या पर जाएगा।

कैरियर को महत्‍व देते हुए विवाह न करने या विवाह के बाद बच्‍चे न पैदा करने का व्‍यक्तिगत फैसला समाज के लिए दुखदायी नहीं है , पर विवाह कर बच्‍चे को जन्‍म देने के बाद उसका उचित लालन पालन न हो , यह समाज के लिए सुखद संकेत नहीं। आने वाले समय में बच्‍चों का पालन पोषण , देख रेख भी सही हो , और महिलाएं भी संतुष्‍ट रहे , इसके लिए सरकार को बहुत गंभीरता से एक उपाय करने की आवश्‍यकता है। नौकरी को लेकर महिलाओं के सख्‍त होने का सबसे बडा कारण यह है कि उम्र बीतने के बाद उनके लिए कोई संभावनाएं नहीं बचती , जबकि बच्‍चों को पढाने के क्रम में उनकी पढाई लिखाई चलती रहती है और भले ही अपने विशिष्‍ट विषय को भूल भी गयी हूं , उनका सामान्‍य विषयों का सामान्‍य ज्ञान कम नहीं होता। 
इसलिए सरकार को 35 से 40 वर्ष की उम्र के विवाहित बाल बच्‍चेदार महिलाओं पर उचित ध्‍यान देना चाहिए। उनके लिए हर प्रकार के सरकारी ही नहीं प्राइवेट नौकरियों में भी आरक्षण देने की व्‍यवस्‍था करनी चाहिए। इसके अतिरिक्‍त उन्‍हें व्‍यवसाय के लिए बैंको से बिना ब्‍याज के ऋण और अन्‍य तरह की सुविधाएं मुहैय्या करायी जानी चाहिए, ताकि घर परिवार संभालते वक्‍त भविष्‍य में कुछ आशाएं दिखती रहें। महिला विकास के लिए काम कर रही सरकारी गैरसरकारी तमाम संस्‍थाओं से मेरा अनुरोध है कि सिर्फ गांव की महिलाओं के लिए ही नहीं , मध्‍यम वर्ग की महिलाओं के लिए तथा आने वाली पीढी की बेहतर सुरक्षा के लिए इस मांग को सरकार के समक्ष रखे। आने वाली बेहतर पीढी के लिए महिलाओं का भविष्‍य के लिए आश्‍वस्‍त रहना आवश्‍यक है।