पर्यावरण प्रदूषण पर निबंध

 

paryavaran pradushan par nibandh

1970 से ही प्रतिवर्ष 22 अप्रैल को दुनिया भर में पृथ्वी दिवस मनाये जाने की परम्परा रही है। इसका मुख्य उद्देश्य पर्यावरण संरक्षण के प्रति लोगों को जागरूक बनाना है। पर हमारी पृथ्वी हमारे देखरेख से संतुष्ट नहीं है, कोरोना के बहाने से विश्व के अधिकांश हिस्से को लॉक डाउन करके खुद अपनी रक्षा करने की व्यवस्था कर रही है।प्रतिवर्ष सालों से हम इसका थीम अलग अलग करके अलग अलग तरह से पर्यावरण की रक्षा का संकल्प लेते आ रहे हैं, पिछले साल “Protect Our Species,” था, इस साल पृथ्वी दिवस का थीम “Climate Action,” है। पर धरती माता ने एक ही बार सभी मामलों को संभालने का निश्चय किया है, ताकि पर्यावरण की रक्षा हो सके। पूरे देश की गाड़ियाँ बंद, फैक्टरियाँ बंद, प्रकृति की चिंता न करने वाले हम जैसे नालायक बच्चों को घर में कैद कर दिया है और पञ्चतत्व - भूमि ,आकाश ,हवा ,पानी और अग्नि को स्वच्छ और शुद्ध बनाने का निश्चय कर लिया है। बचपन से ही हमने सुना है - हर अति समाप्त होती है, पर्यावरण को बिगाड़ने की हमने अति कर दी थी, प्रकृति ने अब हमारी आँखे खोल दी है।

What is paryavaran in hindi

2011 में पर्यावरण  पर लिखे गए लेख  की अंतिम पंक्ति  पढ़कर मुझे खुद अचरज हुआ, मैंने उसी समय लिख दिया था कि  प्रकृति संतुलन करना अच्‍छी तरह जानती है, आनेवाली पीढी के बचपन को बचाने के लिए, उनको स्‍वच्‍छ और संतुलित पर्यावरण देने के लिए आज के कपूतों को मिटाने के लिए उसे कडा कदम उठाना होगा। पूरे लेख को यहाँ भी पढ़ सकते हैं ! 

Paryavaran nibandh in hindi

विद्यार्थी जीवन में हमारे पास लेखों के लिए गिनेचुने विषय होते थे , उनमें से एक बडा ही महत्‍वपूर्ण विषय था ‘विज्ञान:वरदान या अभिशाप’। पने परिवारवालों के वैज्ञानिक दृष्टिकोण का मेरे बाल मस्तिष्‍क पर पूरा प्रभाव था , मैं विज्ञान के वरदान होने के पक्ष में ही ढेर सारे तर्क देती। विज्ञान अभिशाप भी हो सकता है, इसके बारे में जानकारी निबंध की उन पुस्‍तकों में मिलती , जिसके लेखक अवश्‍य दूरदृष्टि रखने वाले थे। हमारा ज्ञान तब कितना सीमित था , पर आज सबकुछ स्‍पष्‍ट नजर आ रहा है। देखते ही देखते परिदृश्‍य बदल गया है, औद्योगिक विकास के क्रम में फैक्ट्रियों से निकलने वाले धुंए , केमिकलयुक्त पानी और अपशिष्ट पदार्थों ने पर्यावरण को भारी क्षति पहुंचायी है। इससे सर्वाधिक नुकसान हमारे बच्‍चों को पहुंचा है , क्‍यूंकि स्‍वच्‍छ एवं स्‍वस्‍थ पर्यावरण विकसित होते बचपन की पहली आवश्‍यकता है।

Paryavaran bachao in hindi

रासायनिक खाद और कीटनाशकों के सरकार के बेमतलब बढावा देने से जहां मिट्टी के सूक्ष्मजीव और जीवाणु के खात्मे से देशभर के खेतों की मिट्टी बेजान हो गई है, वहीं खाद्य पदार्थों में पोषक तत्‍वों का अभाव से बचपन के शारीरिक और मानसिक विकास पर बुरा प्रभाव पड रहा है। भारत में हजारों साल से प्रचलित जैविक खेती से मिट्टी में पोषक तत्वों की कमी नहीं होती और कम पानी में भी इसमें नमी बनी रहती है। रासायनिक खाद के उपयोग पर जोर ने पशुपालन को भी चौपट किया है, जिससे स्थिति और बिगडी है। सरकार गाय या भैंस पालने वाले खेतिहर को सीधे आर्थिक सहायता देकर नकली दुग्‍ध पदार्थों का कारोबार रोक सकती है , जिसके कारण बच्‍चों का स्‍वास्‍थ्‍य पर बुरा प्रभाव पड रहा है।

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Paryavaran pradushan ke bare mein

प्रकृति में जीव जंतु से लेकर पेड पौधे तक सब आपस में जुड़े हुए हैं। पर स्‍वार्थपूर्ण विकास के एक अंधे रेस के कारण जाने कितने वनस्पतियों के साथ बहुत से जीव विलुप्त होने की कगार पर है । बगीचों से ताजे फल और सब्जियों को तोडकर खाने और भांति भांति के तितलियों, परिंदों के पीछे भागने का सुख आज के बच्‍चों को नहीं । वनस्‍पतियों और जीवों की सुरक्षा और उनके बढ़त के उपाय कर उनका बचपन लौटाया जा सकता है। इसके अलावे प्लास्टिक ने भी छोटी-बड़ी नदियों को कचरे से भर दिया है, जिसके कारण आज गंगा जैसी पवित्र नदी भी प्रदूषित है। पीने के पानी की कौन कहे , प्राणवायु के लिए कितने बच्‍चे इनहेलर के सहारे जीने को बाध्‍य हैं , बाकी इलाज के अभाव में मौत को गले लगा रहे हैं।

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राष्ट्रीय आय की गणना में आज वर्ष भर में वस्तुओं और सेवाओं के शुद्ध उत्पादन को शामिल किया जाता है, परंतु इस प्रक्रिया में जो वायुमण्डल प्रदूषित होता है , वन कटते हैं , भूमि बंजर होती है , नदियों, झीलों के पानी गंदले होते हैं , मछलियां नष्ट होती हैं , उनकी गणना नहीं की जाती। वास्‍तव में राष्‍ट्रीय आय नहीं , `हरित राष्ट्रीय आय' की गणना की जानी चाहिए। आज बचपन में ही मोटापा, कमजोरी, आंखों में चश्मा लग चुका होता है, चालीस की उम्र से पहले लोग शुगर , हाई ब्लडप्रेशर , हाइपर टेंशन के शिकार हो जाते हैं, प्रौढावस्‍था में ही ओपन हार्ट सर्जरी की मजबूरी से जूझते है । बीमारियों के इलाज का खर्च भी राष्‍ट्रीय आय में घटाने से हमें सही विकास दर प्राप्‍त होगा।

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वास्‍तव में पर्यावरण को लेकर कभी भी सरकार गंभीर नहीं रही! विकास के लिए जब भी पेड काटे जाएं, सरकार द्वारा कंपनियों को उतने ही पेड लगाने की जिम्‍मेदारी भी दी जाए। इसके अलावे अधिकाधिक उपयोग होने से कोयले , तेल और गैस के भंडार लगातार समाप्‍त हो रहे हैं , उनपर भी रोक लगनी चाहिए। जल संरक्षण, पौधरोपण, ध्वनि व वायु प्रदूषण कम कर ही सरकार देश को या आने वाली पीढी को सुरक्षित रख सकते हैं। एक फलदार पेड़ अपने पूरे जीवन में पंद्रह लाख से अधिक का लाभ दे जाता है। पर विदेशी नीतियों के अंधानुकरण और अपने प्राकृतिक संसाधनों के प्रति व्‍यक्ति और सरकार , दोनो की उपेक्षापूर्ण रवैये ने इस युग में बच्‍चों को कंप्‍यूटर और कार भले ही आसानी से दे दिया हों , शुद्ध जल, पौष्टिक खाना और मनोनुकूल वातावरण नहीं दे पा रहे।

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रामराज्य का वर्णन करते हुए गोस्वामी तुलसीदास जी ने पर्यावरण को बनाए रखने में राजा और प्रजा के संयुक्त उत्तरदायित्व पर जोर दिया था। इस्‍तेमाल न होने पर बिजली से चलनेवाली चीजें बंद रखकर , पानी गर्म करने के लिए सोलर हीटर का उपयोग जैसे व्‍यक्तिगत उपायों से पर्यावरण को बचाने में मदद मिलेगी। पटाखों से पर्यावरण को और क्षति न पहुंचाएं। गाडी की जगह साइकिल चलाकर खुद के स्‍वास्‍थ्‍य को ठीक रखने के साथ साथ एक आदर्श भी स्‍थापित किया जा सकता है।

 हम कहीं भी जाएं, यादगारी के लिए कुछ पेड या पौधे ही लगा दें। किसी अतिथि का सम्‍मान करते हुए पुष्‍पमालाओं की जगह गमले में लगा पौधा भेंट करें। उत्तराखंड की कन्‍याओं ने दूल्हों के जूते चुरा कर उनसे नेग लेने की जगह उनसे पौधे लगवाने की एक सार्थक पहल की है। आने वाले युग में स्‍वस्‍थ पर्यावरण के लिए बच्‍चों को इसके प्रति जिम्‍मेदार बनाएं। बूंद-बूंद से ही तो सागर बनता है, एक करे तो उससे प्रेरित होकर दूसरा भी करेगा।

Paryavaran bachao in hindi

इतने दिनों बाद विश्‍व को पर्यावरण-रक्षा की चिंता हुई थी , हमारे ऋषि मुनियों ने हजारो वर्ष पहले इस बारे में सोंच लिया था। हमारी महान संस्‍कृति ने लोगों को हमेशा से पेड़ों की रक्षा करना, नदियों को मां मानना , पीपल, बरगद, तुलसी जैसे पौधों और जलाशयों की पूजा करना, जीव जंतुओं की रक्षा करना सिखलाया। ग्रहों के बुरे प्रभाव को दूर करने के लिए भी विभिन्‍न पेड पौधों के तनों , छालों , फूल पत्‍तों के उपयोग की सलाह हमारे ज्‍योतिष के ग्रंथों में है।

 स्वामी विवेकानंदजी भी पर्यावरण की रक्षा के लिए भारतीय अध्यात्म और दर्शन को उपयोगी मानते थे, कोरोना के बाद आज की पीढी इसे जितनी जल्‍द अपना लें उतना ही अच्‍छा है। प्रकृति संतुलन करना अच्‍छी तरह जानती है, आनेवाली पीढी के बचपन को बचाने के लिए, उनको स्‍वच्‍छ और संतुलित पर्यावरण देने के लिए आज के कपूतों को मिटाने के लिए उसे कडा कदम उठाना होगा।

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    कोरोना वायरस से बचाव के तरीके

     Instructions for covid 19

    लॉक डाउन -२ शुरू हो गया आज, इसके अलावा कोई चारा न था।  कोरोना महामारी ने पूरे विश्व के सभी लोगों को अपने अपने घर में बैठने के हालात पैदा कर दिए हैं।  इससे कई प्रकार की परेशानियाँ खड़ी हुई हैं, पर कोरोना के देश में तीसरे, चौथे या पांचवे लेवल पहुँच जाने से तुलना की जाये तो ये सारी परेशानियाँ काफी छोटी हैं। लॉक डाउन ने लोगों को यह समझाने में मदद की है कि कोरोना जैसी बीमारी को हलके में नहीं लिया जाना चाहिए, पर अभी भी बहुत सारे लोग इसकी गंभीरता को नहीं समझ पा रहे हैं।  फलस्वरूप अभी भी ऐसी गलतिया जारी हैं, जो लॉक डाउन के दौरान नहीं होनी चाहिए थी। पूरा विश्व इस बात पर सहमत है कि इस बीमारी के चेन को ख़त्म करना ही इस बीमारी की सबसे बड़ी दवा है, इसके समक्ष अर्थव्यवस्था को भले ही कुछ नुकसान सहना पड़े। पर ऐसा कितने दिन हो सकता है ?
    instructions for covid 19

    कुछ सावधानी बरतने की सलाह देते हुए किसी दिन ऑफिस भी खुलेंगे, बाजार भी, रेल और गाड़ियाँ भी।  अभी तो कोरोना वायरस से बचने के लिए टीका बनाने में बहुत समय है, तबतक सावधानिया बरतना ही सबसे बड़ा उपाय है। कोरोना छूत की खतरनाक बीमारी तो है, पर छूत की अन्य बीमारियों में लक्षण दिखने के बाद ही संक्रमण का खतरा था, पर यह बीमारी लक्षण से पहले ही संक्रमण ले आती है। वैसे तो सरकार पूरा ध्यान दे रही है, पर हमलोग अभी से हम अपनी जीवनशैली में ये आदतें डाल लें तो बहुत अच्छा रहेगा :---------

    1. पूरे घर के पायदान और सभी वस्तुओं की कवर हटा दें, उनके अंदर कोरोना के छुपे रहने की संभावना बनेगी। प्रतिदिन इनकी साफ़-सफाई मुश्किल होती है। 
    2. प्लास्टिक का उपयोग बंद कर दें, सतह चिकना हो तो वैसे सामान रख सकते हैं, पर जालीदार या डिज़ाइन वाला होने से  यह अच्छी तरह साफ़ नहीं होता। 
    3. घर के परदे उतार दें या बिलकुल साइड कर दें, ताकि बाहर से आये व्यक्ति को बाथरूम जाते वक्त इसका स्पर्श न हो। 
    4. बाहर से आनेवाली वस्तुएँ - राशन, फल और साग सब्जियाँ बार बार न मंगवाएं।  इसे महीने में दो बार या तीन बार एक ही दिन मंगवाएं। 
    5. घर के अंदर आनेवाले सभी सदस्य चप्पल-जुत्ते बाहर उतार दें। ऐसे चप्पल-जूत्ते पहने, जिन्हे साबुन के पानी या डेटोल पानी से साफ़ किया जा सके। 
    6. गैस सिलिंडर, राशन आदि को घर के एक कोने में ३-४ दिन तक छोड़ दें, उसके बाद ही  सेनेटाइज़ करके घर में रखें। 
    7. सब्जियों-फल को एक-दो चम्मच नमक या मीठे सोडे वाले पानी में डुबोकर १५ मिनट छोड़ दें। फिर अच्छी तरह धोकर छानकर निकाल लें।  
    8. दूध के पैकेट को साबुन से साफ़ करके ही उपयोग करें। 
    9. जिस दिन बाहर से सामान आये, उस दिन पूरे घर, किचेन  की सफाई अच्छी तरह करें। 
    10. बाहर से आनेवाले आपकी घंटी या गेट नहीं छुएँ, ऐसी व्यवस्था रखें। प्रतिदिन इसे सनीटाइज़  करें। 
    11. घर के बाहर की सफाई करनेवाले झाड़ू से घर के अंदर की सफाई न करें। 
    12. ऑनलाइन ट्रांज़ैक्शन का उपयोग करें, यदि किसी को पैसे  हो तो पैसों को घर के कोने में एक बैग में टांगकर रखें।  लें-दें के बाद हाथ को अच्छी तरह धोएं। 
    13. हाथ धोते वक्त सभी जगह नल की टोटियों में भी साबुन लगा दिया करें, क्योंकि उसे घर के सभी व्यक्ति छूते हैं। 
    14. अपनी कलाई में डिज़ाइन वाली चूड़ियां न पहने, जिसमे वायरस के घुसने का ख़तरा हो। 
    15. प्रतिदिन कपडे धोने की आदत डालें। बाथरूम में एक बाल्टी में सर्फ का घोल रखें, ताकि नहाने जानेवाले सभी व्यक्ति उसमे अपने उतारे हुए कपडे सावधानी से डाल दे। अंत में उसे वाशिंग मशीन में धोकर धुप में सुखाये। संभव हो तो सभी कपड़ों को डेटोल से अंतिम बार धोएं। 
    16. सुबह मुंह-हाथ धोते वक्त फेसवाश भी अच्छी तरह करें। 
    17. बाहर से आये सामानों को व्यवस्थित करने के बाद घर की सफाई करके स्नान करके ही रसोई में जाएँ। खाना बनाने, खिलाने तक कोई भी दुसरा काम न करें। 
    18. बाहर से आये सामान को व्यवस्थित करने, रसोई बनाने या अन्य काम करने का समय अलग अलग करें, यह नहीं कि खाना बनाते हुए किसी का फ़ोन उठा लिया, किसी को पैसे दे दिए। 
    19. बाहर से लाये गए किसी भी सामान पर भरोसा न करें, उन्हें निकालने, सब्जियों को छीलने-काटने के बाद भी हाथ और वह जगह अच्छी तरह धोएं।  
    20. रसोई में नक्काशी  वाले बर्तन का उपयोग बंद करना होगा।  यदि उपयोग करें तो प्रतिदिन उसे गर्म पानी से धोये। 
    21. किचेन में उपयोग होनेवाले हर सामान को प्रतिदिन गरम पानी और साबुन से धोने की आदत डालनी होगी।  
    22. खाना गर्म बनाने और खाने-खिलाने की आदत डालें। 
    23. किचेन में चाय बनाने भी आएं तो सबसे पहले हाथ अच्छे से धोएं। 
    24. सुबह उठने,  बाहर से आने और कुछ भी खाने-पीने से पहले बच्चों से हाथ धुलवाने की आदत बनानी होगी। 
    25. सबसे बड़ी आदत जो हमें खुद में और बच्चों में विकसित करनी होगी, वह अपना मुंह-नाक-आँख  कभी भी नहीं छूना है । 
    26. खांसी और छींक का क्या है, जरूरी नहीं यह आये तो हमारे सामने टिश्यू पेपर हो, ऐसी स्थिति में कपडे का गला उठाकर अपना मुँह-नाक इसके अंदर करके हम छींक सकते हैं। बच्चों को भी ऐसा ही सिखाएं। 
    27. आप स्वयं भी न तो कहीं भी थूके और न ही किसी को थूकने दें। सरकार को थूकनेवालों पर कड़ी कार्रवाई करनी होगी। 
    हर वक्त मन को खुश रखें, मन के हारे हार है मन के जीते जीत।  चुनौतियाँ आयी हैं तो जाएंगी भी !


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      छुआछूत : किसी युग का विज्ञान

      What makes someone an untouchable in india

      युगों युगों से मानव-जाति को खतरनाक बैक्टीरिया और वायरस से जूझना पड़ता है - पूरी दुनिया के हर देश की हर क्षेत्र की टीमें एक छोटे से वायरस कोरोना की महामारी से लड़ने में व्यस्त है। कहते हैं, इससे पहले प्लेग की महामारी 1918 से 1920 के मध्य आयी थी। इन दोनों महामारियों के मध्य का दशक 1960 से 1970 के मध्य का है, जिस समय मैंने होश सम्भाला था। वह दशक मेडिकल के क्षेत्र में आज की तरह विकसित नहीं था, कई बीमारियाँ लोगों को मौत के मुँह में धकेल देती थी। हालाँकि देखा जाये तो आज का मेडिकल साइंस पुरानी बीमारियों से लड़ने में भले ही समर्थ हो गया हो, पर आज भी कई बड़ी बड़ी बीमारियां इसे चुनौती देती ही रहती है। हाल-फिलहाल बीमारी होने की चिंता से बेफिक्र लोग सावधानी कम बरत रहे थे, पर पुराने समाज ने इसलिए लोगों ने अपने जीवनशैली को इस ढंग से बनाया हुआ था कि बीमारियों से कम जूझना पड़े। जिस साफ सफाई और क्वैरेन्टाइन से आज कोरोना से जंग जीतने की कोशिश आज मेडिकल साइंस कर रहा है, वह मैंने होश सँभालते ही देखा था।


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      corona aur saf-safai ki aadat


      साफ़-सफाई का ध्यान रखना आवश्यक है - सबके घर में दैनिक कार्यों से निवृत होकर नहाने-धोने तक की व्यवस्था घर से बाहर होती थी। बिना नहाये-धोये खाना बनाना या खाना - दोनों की मनाही थी। शाम को बाहर से काम करके घर लौटे बड़े-बुजुर्ग और खेलकर आये बच्चे - सभी मुँह, हाथ-पैर धोकर ही अंदर आते थे। नहाने से पहले ही हर दिन सुबह-सुबह घर-द्वार-गौशाले, सारे बर्तन और कपडे की सफाई करना जरूरी था। रसोई और खाने की जगह प्रतिदिन गाय के गोबर से लीपा जाता। आँगन, द्वार पर गोबर के घोल का छींटा डालकर झाड़ू लगाई जाती। अमीर लोग सहायक-सहायिकाओं से करवाते, गरीब खुद करते, लेकिन सफाई का पूरा ख्याल करते थे। WHO ने हाथ धोने का जो तरीका बताया है, हमारी या उससे पहले की पीढ़ी को बचपन में माता-पिता द्वारा अवश्य ही सिखाया गया होगा। आज के ज़माने के साबुन, हैंडवाश तो नहीं थे, पर लकड़ी की राख से हम उँगलियों की पोरों, अंगूठो और हाथ के ऊपरी-निचले भागों को आराम से साफ़ किया करते थे। धोने के बाद भी चप्पल घर से बाहर रखते, खासकर रसोई में तो चप्पल ले जाने की अनुमति ही नहीं थी। हो सकता है, उस वक्त तक भी पहले वाले कुछ नियम गायब हो गए होंगे, लेकिन बाद में तो काफी तेजी से ये नियम समाप्त होते चले गए।

      Corona aur khane-pine kee adat

      लोगों को खाने-पीने की आदतें सुधारनी होगी - घर में काम पर किसी को रखने में यह ध्यान दिया जाता था कि उनके समाज के लोगों का खाना-पीना क्या है ? रसोई में आने की अनुमति अपने घर के लोगों के अलावा ब्राह्मणों को ही थी।  गरीब ब्राह्मणों की महिलाएं घर में खाना बना सकती थी, भोज वगैरह में गरीब ब्राह्मण पुरुष इस कार्य को संभालते थे। शाकाहारी परिवारों में शाकाहारी ब्राह्मण और मांसाहारी परिवारों में मांसाहारी ब्राह्मण इस कार्य को सँभालते। अधिकांश मांसाहारी परिवारों में मांसाहार के चूल्हे, बर्तन, हंसिया आदि अलग रखे जाते। प्रतिदिन का खाना उसमे नहीं बनता था। कारण चाहे जो भी हो, माँसाहार में भी मछली और बकरे का ही प्रचलन समाज में अधिक था, इसलिए इसका भक्षण करनेवाले समाज का आँगन तक प्रवेश था। वे हमारे घर-आँगन-द्वार-गौशाले की सफाई कर सकती थी, हमारे बर्तन और कपडे धो सकती थे। हमारे आँगन में खाना खा सकती थी। मुर्गे और अन्य चीजें खानेवालों को घर में प्रवेश नहीं था, यहाँ तक कि घर के मर्द होटल, पिकनिक में मुर्गा खा लें, महिलायें मुर्गे से छू  भी जाएँ तो स्नान करने के बाद ही घर में आ सकते थे। ऐसे चीजों को खानेवालों का आँगन में प्रवेश वर्जित था, ये खेत में काम कर सकते थे। बीमारी को जन्म देनेवाले बहुत रिस्क वाले पेशे वाले लोगों से तो  समाज में पूरा परहेज किया जाता रहा। हो सकता है, इन सबसे भी कभी-कभी बीमारी फैली हो, उन्हें जानकारी हो।

      coronavirus and intouchability

      क्या छुआछूत किसी युग का विज्ञान  रहा है ? - इतने परहेज और साफ़-सफाई के बावजूद बीमारी तो हर घर में दस्तक दे ही देती थी।  पर किसी एक में बीमारी का लक्षण दीखते ही उसे पूरे परिवार या समाज से अलग कर दिया जाता था, खासकर संक्रमण वाले बीमारी से बचने के लिए तो अवश्य ही ऐसा किया जाता था। कुत्ते, साँप आदि के काटने पर भी ऐसा ही किया जाता था। उन्हें अलग बर्तन में खाना दिया जाता था, उनके कपडे-बिस्तर अलग से धोये जाते थे। अलग से नहलाया जाता था, साथ खेलने तक की अनुमति नहीं होती थी। जिस तरह बीमारी होने के बाद लोगों को अलग रखा जाता था, उसी तरह रोग प्रतिरोधक क्षमता में कमी रखनेवालों को भी सबसे अलग रखा जाता। उनका सोना-जागना-स्नान-हर कार्य का समय होता, उनके लिए विशेष पौष्टिक और रोग-प्रतिरोधक क्षमता युक्त खाना बनता। माहवारी के दिनों में महिलाओं, प्रसूता और नवजात को काफी दिनों तक परिवार से अलग सुरक्षित रखा जाता था। आज के युग में कोरोना बीमारी ने हमारे देशवासियों को यह ज्ञान दिया है कि अस्पृश्यता समाज के लिए अभिशाप नहीं, वरदान था। क्या अस्पृश्यता उस युग का विज्ञान था ? मुझे तो ऐसा लगता है, आपको ?

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        'योग्यतम की उत्तरजीविता' का सिद्धांत

        Survival of the fittest meaning in hindi

        विश्व की जनसँख्या को समझने के जितने भी प्रयास हुए, उसमे माल्थस के सिद्धांत को सबसे अधिक मान्यता मिली। बिल्कुल प्राकृतिक ढंग से उन्होंने समझाया कि विकास के क्रम में संसाधनों की बढ़ोत्तरी जनसँख्या की तुलना में काफी कम होती है। संसाधन १-२-३-४-५-६ की गति से बढ़ते हैं, जबकि जनसँख्या १-२-४-८-१६-३२ की गति से बढ़ती है। समय के साथ इनमे तालमेल नहीं आ पाता, बढ़ती हुई जनसँख्या खुद को नियंत्रित न करके अप्राकृतिक ढंग से संसाधनों का दोहन करती है और अस्वास्थ्यकर भोजन लेने को मजबूर होती है। इसलिए संतुलन बनाने के लिए प्रकृति को जनसँख्या कम करने हेतु बाढ़, भूकंप, अकाल, महामारी आदि का सहारा लेना पड़ता है। 

        survival of the fittest meaning in hindi

        theory of Malthus


        जबतक प्राकृतिक ढंग से प्रकृति द्वारा दी गयी सुविधाओं का आप उपयोग करेंगे, प्रकृति आपके लिए वरदान बनी रहेगी। पर जब भी, जहाँ भी अप्राकृतिक ढंग से संसाधनों का दुरूपयोग होगा, प्रकृति को दंड देने में तनिक भी देर न लगेगी। यह कोरोना वायरस जहाँ से भी आया हो, चाहे यह किसी के दिमाग की उपज हो या प्राकृतिक ढंग से ही आया हो, पर मानव जाति को कुछ न कुछ सीखने के लिए ही आया है। पूरे विश्व में खासकर विकासशील देशों में पिछले 25 वर्षों विकास की अंधी दौड़ वाली जीवन-शैली ने मनुष्य होने का अहसास ही समाप्त कर दिया था। मेडिकल सुविधाओं ने लोगों को इतनी हिम्मत दे दी थी कि हमारे देश के बडी कहावत 'एहतियात इलाज से बेहतर है' की धज्जियाँ उड़ने लगी।

        manau jati aur jeevanshaili

        हमने 1970 के दशक में होश सँभाला था। माता-पिता, दादा-दादी, नाना-नानी के व्यवहार में साफ़ एहतियात देखा था। क्या-क्या किया जाये, ताकि जीवन में उलझने कम हों, उन्होंने हमें भी यही सिखाया था। अपनी जीवनशैली को उस ढंग से जीने की हमने भी कमोबेश कोशिश की। तन-मन-धन-संपर्क- सबको मजबूत बनाने की कोशिश, इसका पालन जो नहीं करेगा, उसे प्रकृति माफ़ नहीं करेगी। डार्विन ने 'survival of the fittest' यानि 'योग्यतम की उत्तरजीविता' के सिद्धांत को देकर इस बात पर मुहर लगायी कि प्रकृति का काम दुनिया को सुन्दर बनाना है। वायरस दुनिया से समाप्त होनेवाला नहीं , पर उत्तम लोग यहाँ कई  वायरस के प्रकोप के बाद भी बने रहेंगे। कोरोना के मामले में प्रकृति के द्वारा योग्यतम होना ऐसे माना जा सकता है :--------

        1. जो जीवन-शैली से मजबूत हैं - जिन्हे साफ़-सफाई की आदत है, बाहर से आने के बाद चप्पल-जूत्ते घर से बाहर बरामदे में, कपडे बदलकर, पैर-हाथ धोकर खाते-पीते आये हैं, घर का बना खाना खाते-पीते आये हैं, साफ़-सफाई का पूरा ध्यान रखने के कारण कोरोना से सन्क्रमण की संभावना कम बनेगी। 
        2. जो तन से मजबूत हैं - जिन्हे कोरोना का संक्रमण तो हो गया, लेकिन नियम से खाने-पीने की आदत के कारण अपनी रोग-प्रतिरोधक क्षमता से इसे जीतकर बाहर आने की संभावना बनेगी। 
        3. जो धन से मजबूत हैं  - जिन्हे कोरोना के संक्रमण से बचने के लिए हर तरह के साधन उपलब्ध हैं। वे घर में बैठकर हर सुविधाएँ लेकर खुद को बचाने की संभावना बनेगी। 
        4. जो समझ से मजबूत हैं - जिन्होंने माहौल को देखा, समझा, उसके हिसाब से घर में बैठ गए। बेवजह बाहर न निकलने की समझदारी दिखाने से कोरोना से बचने की संभावना बनेगी। 
        5. जो मन से मजबूत हैं - ऐसे समय में मन से मजबूत होना बहुत आवश्यक है, मन के मजबूत होने से कोरोना के साथ साथ दूसरी बीमारियों से भी बचने की संभावना बनेगी। 
        6. जिनपर पूर्वजों का पुण्य है - कुछ दिन पहले मैंने लिखा था कि आपका कर्म आपके समक्ष मौजूद दो पीढ़ियों के लिए व्यवस्था कर सकता है, पर आपका धर्म आनेवाली दो पीढ़ियों की व्यवस्था करता है। इस दृष्टि से जिनके पूर्वजों ने धर्म कमाया होगा, उनकी संतान के साथ प्रकृति न्याय कर सकती है। 
        7. नेतृत्व से मजबूत - आपके पास नेता कैसा है ?  यह भी आपके, आपके समाज और आपके देश को योग्यतम बना सकता है। 

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          चन्द्रमा और बचपन

          चन्द्रमा और बचपन

          Amavasya born boy astrology in hindi


          चंद्रमा पृथ्‍वी का निकटतम ग्रह है और इस कारण इसका प्रभाव पृथ्‍वी पर सर्वाधिक पडता है। समुद्र में ज्‍वार भाटे का आना इसका सबसे बडा उदाहरण है। मनुष्‍य के जीवन को भी यह बहुत अधिक प्रभावित करता है। इसलिए ज्योतिष में लग्नकुंडली के साथ साथ चंद्रकुंडली बनाने का भी नियम है। य‍ह मानव मन का प्रतीक ग्रह है , इसलिए यह लग्नकुंडली में जिस भाव का स्‍वामी होता है या जिस भाव में स्थित होता है , वहीं जातक का सर्वाधिक ध्‍यान होता है। 

          amavasya born boy astrology in hindi

          Moon child astrology


          'गत्यात्मक ज्योतिष' के अनुसार जन्म से 12 वर्ष तक की उम्र बाल्‍यावस्‍था की होती है। बच्‍चे मन से बहुत कोमल और भावुक होते हैं। उनके अंतर्मन में कोई बात गहराई तक छू जाती है। इसलिए बच्‍चों के मनोवैज्ञानिक विकास में चंद्रमा का अधिक प्रभाव देखा जाता है। जिन बच्‍चों का चंद्रमा मजबूत होता है वे 12 वर्ष की उम्र तक बहुत चंचल और तेज दिखाई पडते हैं। उनका बचपन स्‍वस्‍थ वातावरण में गुजरता है। वे मस्‍त स्‍वभाव के होते हैं। इसके विपरीत जिनका चंद्रमा कमजोर होता है , वे इस उम्र तक बहुत ही सुस्‍त और चिडचिडे नजर आते हें और बचपन में ही अपने वातावरण में घुटन महसूस करते हैं। उनको किसी शारीरिक कष्‍ट की संभावना भी बचपन में बनी होती है।

          Strength of moon 

          गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष के द्वारा चंद्रमा की शक्ति का निर्णय उसके आकार के आधार पर किया जाता है। पूर्णिमा के दिन चांद अपने पूरे आकार में होता है। इसलिए उस दिन वह पूर्ण शक्ति में होता है। ऐसी स्थिति में कुंडली में चन्द्रमा को सूर्य के सर्वाधिक दूरी पर देख सकते हैं। यही कारण है कि पूर्णिमा के दिन जन्‍म लेनेवाले बच्‍चे अपने माता पिता और परिवारजनों का विशेष प्‍यार प्राप्‍त करते हैं , यही नहीं वे अपने पूरे वातावरण से भी पूणत: संतुष्‍ट होते हैं। अष्‍टमी के दिन तक चांद सामान्‍य शक्ति का ही रहता है , ऐसी स्थिति में कुंडली में सूर्य और चंद्र केन्द्रगत होता है। पर उसके बाद धीरे धीरे उसका आकार छोटा होता जाता है और अमावस्‍या के दिन चंद्रमा लुप्‍त हो जाता है। इस समय चंद्रमा अपनी पूरी ताकत खो देता है। ऐसी स्थिति में सूर्य और चंद्र आसपास होते हैं।  इस कारण अमावस्‍या के आसपास जन्‍म लेनेवाले बच्‍चे शरीर से कमजोर होते हैं , माता पिता ओर परिवार जनों के प्‍यार में कमी प्राप्‍त करते हैं या अपने आसपास के किसी बच्‍चे को सुख सुविधायुक्‍त देखकर आहें भरते हैं।

          Strong & weak moon

          यदि मजबूत चंद्रमा लग्‍नेश , षष्‍ठेश , लग्‍नस्‍थ या षष्‍ठस्‍थ हो , तो वैसे बच्‍चे शरीर से बहुत मजबूत होते हैं , विलोमत: स्थिति में यानि कमजोर चंद्रमा लग्‍नेश , षष्‍ठेश , लग्‍नस्‍थ या षष्‍ठस्‍थ हो , तो वैसे बच्‍चे शरीर से बहुत कमजोर होते हैं। विभिन्‍न लग्‍नवाले बच्‍चों के लिए कमजोर और मजबूत चंद्रमा का फल भिन्‍न भिन्‍न होता है।

          मेष लग्‍न में कमजोर चांद में जन्‍म लेनेवाले बच्‍चे अंतर्मन में माता से अपने को असंतुष्‍ट हसूस करते हैं। यदि चंद्रमा आठवें हो तो बच्‍चा बचपन में ही मां से दूर हो जाता है। जबकि मजबूत चांद में जन्‍म लेनेवाले बच्‍चे मां का भरपूर सुख और प्‍यार पाते हैं। वे या तो बडे या इकलौते होते हैं , जिनपर मां का पूरा ध्‍यान होता है।

          वृष लग्‍न के कमजोर चांद में जन्‍म लेनेवाले बच्‍चे भाई बहन से संबंधित कष्‍ट या बुरा अनुभव बचपन में ही प्राप्‍त करते हैं। यदि चंद्रमा षष्‍ठस्‍थ हो , तो उनका भाई बहन से बहुत झगडा होता है। इस लग्‍न में मजबूत चांद में बच्‍चे का जन्‍म हो , तो बच्‍चों का भाई बहन के साथ अच्‍छा संबंध होता है।

          मिथुन लग्‍न में कमजोर चांद में जन्‍मलेनेवाले बच्‍चे बाल्‍यावस्‍था में अपने को साधनहीन समझते हैं , जबकि मजबूत चांद में जन्‍म लेनेवाले बच्‍चे अपने को साधन संपन्‍न और सुखी।

          कर्क लग्‍न में कमजोर चांद में जन्‍म लेनेवाले बच्‍चे बाल्‍यावस्‍था में शरीर से कमजोर होते हैं , जबकि मजबूत चांद में जन्‍म हो तो वे शरीर से काफी मजबूत होंगे।

          सिह लग्‍न के बच्‍चे , जिनका चंद्रमा कमजोर हो , बचपन में अभाव महसूस करते हें , किन्‍तु मजबूत चांद वाले बच्‍चों के उपर बहुत खर्च किया जाता है । पर यदि इनके लग्‍न में सूर्य हो , तो कभी कभी इन्‍हें भी गंभीर शरीरिक कष्‍ट का सामना करना पडता है।

          कन्‍या लग्‍न में कमजोर चांद में जन्‍म लेनेवाले बच्‍चे स्‍वयं को किसी प्रकार की लाभप्राप्ति के लिए कमजोर पाते हैं , जबकि मजबूत चांद में जन्‍म लेनेवाले बच्‍चे को किसी प्रकार का लाभ आसानी से मिल जाता है।

          तुला लग्‍न में कमजोर चांद में जन्‍म लेनेवाले बच्‍चों को उपेक्षित दृष्टि से देखा जाता है , जबकि इसी लग्‍न में मजबूत चांद में जन्‍म लेनेवालों को बहुत ही महत्‍वपूर्ण समझा जाता है और उनका पूरा ख्‍याल भी रखा जाता है।

          वृश्चिक लग्‍न में कमजोर चांद में जन्‍म लेनेवाले बच्‍चे अपने को अभागा और कमजोर महसूस करते हैं , जबकि मजबूत चांद में जन्‍म लेनेवाले बच्‍चे अपने को भाग्‍यशाली और हिम्‍मतवर समझते हैं।

          धनु लग्‍न में कमजोर चांद में जन्‍म लेनेवाले बच्‍चे अपने जीवन को बंधा बंधा सा पाते हैं , जबकि मजबूत चांद में जन्‍म लेनेवाले बच्‍चों का जीवन बहुत ही सुखमय होता है।

          मकर लग्‍न में कमजोर चांद में जन्‍म लेनेवाले बच्‍चे दोस्‍तों का अभाव महसूस करते हैं , पारिवारिक माहौल भी अच्‍छा नहीं पाते हें वे , पर मजबूत चांद में जन्‍म लेनेवालो की पारिवारिक स्थिति संतुष्टि देनेवाली होती है , दोस्‍ती करने में भी वे माहिर होते हैं।

          कुंभ लग्‍न में कमजोर चंद्रमा में जन्‍म लेनेवाले बच्‍चों को बाल्‍यावस्‍था में गंभीर शरीरिक कष्‍ट होता है। ये बहुत ही अधिक बीमार पडते हैं। मजबूत चांद में जन्‍म लेनेवाले बच्‍चों में रोगप्रतिरोधक क्षमता होती है और उनका बचपन अच्‍छी तरह व्‍यतीत होता है।

          मीन जल्ग्‍न में कमजोर चांद में जन्‍मलेनेवाले बच्‍चे प्रारंभ में मंदबुद्धि के होते हें1 किन्‍तु यही चांद मजबूत हो तो बच्‍चे अपनी तेज बुद्धि के कारण परिवार के सदस्‍यो के विशेष प्‍यार को प्राप्‍त करते हैं।

          kundali me chandrama ka prabhav

          इस प्रकार 12 वर्ष तक के बच्‍चे की सफलता , असफलता , मानसिक स्थिति और अन्‍य प्रकार के व्‍यवहार का मुख्‍य कारण चंद्रमा ही होता है। आज के युग में चूंकि अभिभावक बच्‍चों के क्रियाकलापों के प्रति अधिक जागरूक और बच्‍चों के चहुंमुखी विकास के लिए प्रयत्‍नशील हैं , अमावस्‍या के आसपास जन्‍म लेनेवाले बच्‍चों के व्‍यवहार से क्षुब्‍ध हो जाते हैं , पर ऐसा नहीं होना चाहिए। ‘होनहार वीरवान के होत चिकने पात’ को गलत साबित करते हुए छोटे चांद में जन्‍म लेनेवाले बहुत सारे बच्‍चों को बाद में असाधारण कार्य करते हुए देखा गया है , जिसके बारे में अगले लेख में चर्चा की जाएगी।

          चन्द्रमा को मजबूत बनाने के लिए उपायों की चर्चा इस लेख में की गयी है। 

          'गत्यात्मक ज्योतिष' आधारित सूत्रों पर कुंडली निर्माण, सटीक भविष्यवाणी, उचित परामर्श और समुचित उपचार के लिए संपर्क करें - 8292466723, gatyatmakjyotishapp@gmail.com

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