पर्यावरण प्रदूषण पर निबंध

 

paryavaran pradushan par nibandh

1970 से ही प्रतिवर्ष 22 अप्रैल को दुनिया भर में पृथ्वी दिवस मनाये जाने की परम्परा रही है। इसका मुख्य उद्देश्य पर्यावरण संरक्षण के प्रति लोगों को जागरूक बनाना है। पर हमारी पृथ्वी हमारे देखरेख से संतुष्ट नहीं है, कोरोना के बहाने से विश्व के अधिकांश हिस्से को लॉक डाउन करके खुद अपनी रक्षा करने की व्यवस्था कर रही है।प्रतिवर्ष सालों से हम इसका थीम अलग अलग करके अलग अलग तरह से पर्यावरण की रक्षा का संकल्प लेते आ रहे हैं, पिछले साल “Protect Our Species,” था, इस साल पृथ्वी दिवस का थीम “Climate Action,” है। पर धरती माता ने एक ही बार सभी मामलों को संभालने का निश्चय किया है, ताकि पर्यावरण की रक्षा हो सके। पूरे देश की गाड़ियाँ बंद, फैक्टरियाँ बंद, प्रकृति की चिंता न करने वाले हम जैसे नालायक बच्चों को घर में कैद कर दिया है और पञ्चतत्व - भूमि ,आकाश ,हवा ,पानी और अग्नि को स्वच्छ और शुद्ध बनाने का निश्चय कर लिया है। बचपन से ही हमने सुना है - हर अति समाप्त होती है, पर्यावरण को बिगाड़ने की हमने अति कर दी थी, प्रकृति ने अब हमारी आँखे खोल दी है।

What is paryavaran in hindi

2011 में पर्यावरण  पर लिखे गए लेख  की अंतिम पंक्ति  पढ़कर मुझे खुद अचरज हुआ, मैंने उसी समय लिख दिया था कि  प्रकृति संतुलन करना अच्‍छी तरह जानती है, आनेवाली पीढी के बचपन को बचाने के लिए, उनको स्‍वच्‍छ और संतुलित पर्यावरण देने के लिए आज के कपूतों को मिटाने के लिए उसे कडा कदम उठाना होगा। पूरे लेख को यहाँ भी पढ़ सकते हैं ! 

Paryavaran nibandh in hindi

विद्यार्थी जीवन में हमारे पास लेखों के लिए गिनेचुने विषय होते थे , उनमें से एक बडा ही महत्‍वपूर्ण विषय था ‘विज्ञान:वरदान या अभिशाप’। पने परिवारवालों के वैज्ञानिक दृष्टिकोण का मेरे बाल मस्तिष्‍क पर पूरा प्रभाव था , मैं विज्ञान के वरदान होने के पक्ष में ही ढेर सारे तर्क देती। विज्ञान अभिशाप भी हो सकता है, इसके बारे में जानकारी निबंध की उन पुस्‍तकों में मिलती , जिसके लेखक अवश्‍य दूरदृष्टि रखने वाले थे। हमारा ज्ञान तब कितना सीमित था , पर आज सबकुछ स्‍पष्‍ट नजर आ रहा है। देखते ही देखते परिदृश्‍य बदल गया है, औद्योगिक विकास के क्रम में फैक्ट्रियों से निकलने वाले धुंए , केमिकलयुक्त पानी और अपशिष्ट पदार्थों ने पर्यावरण को भारी क्षति पहुंचायी है। इससे सर्वाधिक नुकसान हमारे बच्‍चों को पहुंचा है , क्‍यूंकि स्‍वच्‍छ एवं स्‍वस्‍थ पर्यावरण विकसित होते बचपन की पहली आवश्‍यकता है।

Paryavaran bachao in hindi

रासायनिक खाद और कीटनाशकों के सरकार के बेमतलब बढावा देने से जहां मिट्टी के सूक्ष्मजीव और जीवाणु के खात्मे से देशभर के खेतों की मिट्टी बेजान हो गई है, वहीं खाद्य पदार्थों में पोषक तत्‍वों का अभाव से बचपन के शारीरिक और मानसिक विकास पर बुरा प्रभाव पड रहा है। भारत में हजारों साल से प्रचलित जैविक खेती से मिट्टी में पोषक तत्वों की कमी नहीं होती और कम पानी में भी इसमें नमी बनी रहती है। रासायनिक खाद के उपयोग पर जोर ने पशुपालन को भी चौपट किया है, जिससे स्थिति और बिगडी है। सरकार गाय या भैंस पालने वाले खेतिहर को सीधे आर्थिक सहायता देकर नकली दुग्‍ध पदार्थों का कारोबार रोक सकती है , जिसके कारण बच्‍चों का स्‍वास्‍थ्‍य पर बुरा प्रभाव पड रहा है।

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Paryavaran pradushan ke bare mein

प्रकृति में जीव जंतु से लेकर पेड पौधे तक सब आपस में जुड़े हुए हैं। पर स्‍वार्थपूर्ण विकास के एक अंधे रेस के कारण जाने कितने वनस्पतियों के साथ बहुत से जीव विलुप्त होने की कगार पर है । बगीचों से ताजे फल और सब्जियों को तोडकर खाने और भांति भांति के तितलियों, परिंदों के पीछे भागने का सुख आज के बच्‍चों को नहीं । वनस्‍पतियों और जीवों की सुरक्षा और उनके बढ़त के उपाय कर उनका बचपन लौटाया जा सकता है। इसके अलावे प्लास्टिक ने भी छोटी-बड़ी नदियों को कचरे से भर दिया है, जिसके कारण आज गंगा जैसी पवित्र नदी भी प्रदूषित है। पीने के पानी की कौन कहे , प्राणवायु के लिए कितने बच्‍चे इनहेलर के सहारे जीने को बाध्‍य हैं , बाकी इलाज के अभाव में मौत को गले लगा रहे हैं।

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राष्ट्रीय आय की गणना में आज वर्ष भर में वस्तुओं और सेवाओं के शुद्ध उत्पादन को शामिल किया जाता है, परंतु इस प्रक्रिया में जो वायुमण्डल प्रदूषित होता है , वन कटते हैं , भूमि बंजर होती है , नदियों, झीलों के पानी गंदले होते हैं , मछलियां नष्ट होती हैं , उनकी गणना नहीं की जाती। वास्‍तव में राष्‍ट्रीय आय नहीं , `हरित राष्ट्रीय आय' की गणना की जानी चाहिए। आज बचपन में ही मोटापा, कमजोरी, आंखों में चश्मा लग चुका होता है, चालीस की उम्र से पहले लोग शुगर , हाई ब्लडप्रेशर , हाइपर टेंशन के शिकार हो जाते हैं, प्रौढावस्‍था में ही ओपन हार्ट सर्जरी की मजबूरी से जूझते है । बीमारियों के इलाज का खर्च भी राष्‍ट्रीय आय में घटाने से हमें सही विकास दर प्राप्‍त होगा।

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वास्‍तव में पर्यावरण को लेकर कभी भी सरकार गंभीर नहीं रही! विकास के लिए जब भी पेड काटे जाएं, सरकार द्वारा कंपनियों को उतने ही पेड लगाने की जिम्‍मेदारी भी दी जाए। इसके अलावे अधिकाधिक उपयोग होने से कोयले , तेल और गैस के भंडार लगातार समाप्‍त हो रहे हैं , उनपर भी रोक लगनी चाहिए। जल संरक्षण, पौधरोपण, ध्वनि व वायु प्रदूषण कम कर ही सरकार देश को या आने वाली पीढी को सुरक्षित रख सकते हैं। एक फलदार पेड़ अपने पूरे जीवन में पंद्रह लाख से अधिक का लाभ दे जाता है। पर विदेशी नीतियों के अंधानुकरण और अपने प्राकृतिक संसाधनों के प्रति व्‍यक्ति और सरकार , दोनो की उपेक्षापूर्ण रवैये ने इस युग में बच्‍चों को कंप्‍यूटर और कार भले ही आसानी से दे दिया हों , शुद्ध जल, पौष्टिक खाना और मनोनुकूल वातावरण नहीं दे पा रहे।

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रामराज्य का वर्णन करते हुए गोस्वामी तुलसीदास जी ने पर्यावरण को बनाए रखने में राजा और प्रजा के संयुक्त उत्तरदायित्व पर जोर दिया था। इस्‍तेमाल न होने पर बिजली से चलनेवाली चीजें बंद रखकर , पानी गर्म करने के लिए सोलर हीटर का उपयोग जैसे व्‍यक्तिगत उपायों से पर्यावरण को बचाने में मदद मिलेगी। पटाखों से पर्यावरण को और क्षति न पहुंचाएं। गाडी की जगह साइकिल चलाकर खुद के स्‍वास्‍थ्‍य को ठीक रखने के साथ साथ एक आदर्श भी स्‍थापित किया जा सकता है।

 हम कहीं भी जाएं, यादगारी के लिए कुछ पेड या पौधे ही लगा दें। किसी अतिथि का सम्‍मान करते हुए पुष्‍पमालाओं की जगह गमले में लगा पौधा भेंट करें। उत्तराखंड की कन्‍याओं ने दूल्हों के जूते चुरा कर उनसे नेग लेने की जगह उनसे पौधे लगवाने की एक सार्थक पहल की है। आने वाले युग में स्‍वस्‍थ पर्यावरण के लिए बच्‍चों को इसके प्रति जिम्‍मेदार बनाएं। बूंद-बूंद से ही तो सागर बनता है, एक करे तो उससे प्रेरित होकर दूसरा भी करेगा।

Paryavaran bachao in hindi

इतने दिनों बाद विश्‍व को पर्यावरण-रक्षा की चिंता हुई थी , हमारे ऋषि मुनियों ने हजारो वर्ष पहले इस बारे में सोंच लिया था। हमारी महान संस्‍कृति ने लोगों को हमेशा से पेड़ों की रक्षा करना, नदियों को मां मानना , पीपल, बरगद, तुलसी जैसे पौधों और जलाशयों की पूजा करना, जीव जंतुओं की रक्षा करना सिखलाया। ग्रहों के बुरे प्रभाव को दूर करने के लिए भी विभिन्‍न पेड पौधों के तनों , छालों , फूल पत्‍तों के उपयोग की सलाह हमारे ज्‍योतिष के ग्रंथों में है।

 स्वामी विवेकानंदजी भी पर्यावरण की रक्षा के लिए भारतीय अध्यात्म और दर्शन को उपयोगी मानते थे, कोरोना के बाद आज की पीढी इसे जितनी जल्‍द अपना लें उतना ही अच्‍छा है। प्रकृति संतुलन करना अच्‍छी तरह जानती है, आनेवाली पीढी के बचपन को बचाने के लिए, उनको स्‍वच्‍छ और संतुलित पर्यावरण देने के लिए आज के कपूतों को मिटाने के लिए उसे कडा कदम उठाना होगा।

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संगीता पुरी

Specialist in Gatyatmak Jyotish, I write blogs on various topics particularly Astrology. My several books published on Gatyatmak Jyotish in a lucid style. I was selected among 100 women achievers in 2016 by the Union Minister of Women and Child Development, Mrs. Menaka Gandhi. In addition, I also had the privilege of being invited by the Hon. President Mr. Pranab Mukherjee for lunch on 22nd January, 2016. I got honoured by the Chief Minister of Uttarakhand Mr. Ramesh Pokhariyal with 'Parikalpana Award' The governor of Jharkhand Mrs. Draupadi Murmu also honoured me with ‘Aparajita Award’ organized by the newspaper ‘Prabhat Khabar’. गत्यात्मक ज्योतिष विशेषज्ञा, इंटरनेट में 15 वर्षों से ब्लॉग लेखन में सक्रिय, सटीक भविष्यवाणियों के लिए पहचान, 'गत्यात्मक ज्योतिष' को परिभाषित करती कई पुस्तकों की लेखिका, 2016 में महिला-बाल-विकास मंत्री श्रीमती मेनका गाँधी जी और महामहिम राष्ट्रपति प्रणव मुख़र्जी द्वारा #100womenachievers में शामिल हो चुकी हैं। उत्तराखंड के मुख्य मंत्री श्री रमेश पोखरियाल जी के द्वारा 'परिकल्पना-सम्मान' तथा झारखण्ड की गवर्नर श्रीमती द्रौपदी मुर्मू जी द्वारा 'अपराजिता सम्मान' से मुझे सम्मानित होने का गौरव प्राप्त हुआ। Ph. No. - 8292466723

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