भृगु संहिता पर आये कमेंट्स के जवाब

 

Bhrigu samhita prashnavali

मैने कल भृगुसंहिता कुंडली के बारे में एक आलेख पोस्‍ट किया था , इसकी दूसरी कडी मैं आज पोस्‍ट करनेवाली थी , पर पहले पहली कडी के पाठकों की जिज्ञासा को शांत करना आवश्‍यक है। भृगु संहिता प्रश्नावली में सबसे पहले क्षितिज जी का प्रश्न है कि उस पोस्‍ट में जानकारी तो अच्‍छी थी , लेकिन मेरा आलेख उन्‍हें तकनीकी अधिक लगा। उनका मानना है कि अगर कुछ उदाहरणों के साथ मैं इसे सरल रुप में लिखती तो शायद आम लोग भी इसका लाभ उठा पाते , पर मुझे नहीं लगता कि ऐसी कोई कठिन बात मैने लिखा है , आप जब भी नए विषय को पढेंगे , आपको पुराने विषयों की अपेक्षा अधिक ध्‍यान संकेन्‍द्रण की जरूरत होती है। हमें ज्‍योतिष के हिसाब से कुछ शब्‍दों को प्रयोग करना होता है , आप हमारे पुराने आलेख में इन शब्‍दों ( राशि , लग्‍न आदि ) के बारे में जान सकते हैं। गत्यात्मक ज्योतिष को समझने के लिए कुछ अधिक ध्यान संकेन्द्रण की आवश्यकता होगी। 

Bhrigu prashnavali chart

श्यामल सुमन जी ने भृगु संहिता का नाम भी सुना है और किताब भी देखने का अवसर मिला, लेकिन उनका  प्रश्न है कि वे पढ नहीं सके , क्‍यूंकि वह पुस्‍तक संस्‍कृत में थी और उन्‍हें संस्कृत भाषा की उतनी जानकारी नहीं है। उन्‍हें जानकारी दे दूं कि विभिन्‍न प्रकाशकों ने कई लेखकों के हिन्‍दी की भृगुसंहिता का प्रकाशन भी किया है। पर उसे समझने के लिए ज्‍योतिष की थोडी जानकारी आवश्‍यक है। उडनतश्‍तरी जी और डा महेश सिन्‍हा जी कहते हैं पंजाब के किसी गांव में या पूरी या कई गांवों में टुकडो टुकडों में ओरिजनल भृगु संहिता रखी है। सुना बस है कि लोग वहाँ अपना भाग्य पढ़वाने जाते हैं। सुनने में तो हमें भी अवश्‍य आया है , पर जबतक दावों की पुष्टि नहीं हो जाती , वास्‍तव में ओरिजिनल भृगुसंहिता के बारे में कह पाना बहुत ही मुश्किल है। 

bhrigu samhita prashnavali

Bhrigu prashnavali guide

ज्ञानदत्त पाण्डेय जी की भृगु संहिता प्रश्न है कि श्री कन्हैयालाल माणिक लाल मुंशी को पढ़ा था कि भृगु संहिता से लोग भूतकाल तो सही सही बता पा रहे थे , पर भविष्य के बारे में उतने सही नहीं थे। पर मेरे विचार से भृगुसंहिता में व्‍यक्ति की चारित्रिक विशेषताएं और भाग्‍य की ओर से मिलनेवाले सुख दुख का ही वर्णन है , समय की इसमें कोई चर्चा नहीं होती । ज्‍योतिषियों के बारे में नहीं , सिर्फ तांत्रिको के बारे में सुना है कि वे भूत की जानकारी सही सही दे पाते हैं , भविष्‍य की नहीं। हो सकता है , वे तांत्रिक हों और भृगुसंहिता के आधार पर भविष्‍य पढने का झूठा दावा कर रहे हों। डा महेश सिन्‍हा जी कहते हैं कि उत्तर में जैसे भृगु संहिता का नाम है वैसे ही दक्षिण में नाडी ज्योतिष का । नाडी ज्‍योतिष के साथ ही साथ सुधीर कुमार जी रावण-संहिता, लाल किताब और नीलकंठी पुस्तकों/विद्याओं का भी भविष्यवाणियों के लिए उपयोग की चर्चा करते हैं , उनकी चर्चा बाद में कभी की जाएगी।

bhrigu prashnavali easy

सबसे मुख्‍य प्रश्न है प्रवीण शाह जी की , जिन्‍होने कहा कि विश्वास तो नहीं होता इस तरह की संहिताओं में क्योंकि जब हर काल में जन्म लेने वालों का भविष्य पहले ही से लिखा है, जब सब कुछ पूर्व निर्धारित है तो कर्म का क्या योगदान रहा? बिल्‍कुल सही कहना है आपका , मुझे खुद भी विश्‍वास नहीं था , पर यह अविश्‍वास वहीं से शुरू होता है , जहां हमलोग अधिक विश्‍वास कर लेते हैं , यदि विश्‍वास एक सीमा तक किया जाए तो अविश्‍वास की कोई गुजाइश नहीं होती।

bhrigu prashnavali guru

यदि आपके पास अलग अलग दस बीस प्रकार के बीज हों और आप उन्‍हे न पहचानते हों , तो आप अनिश्चितता की स्थिति में ही उन बीजों को जमीन में बो देंगे , उसे सींचकर और अन्‍य देखभाल कर उसे पौधे बनने देंगे , उसके बाद उन बीजों की गतिविधियों को गौर करेंगे , उनका कौन सा पार्ट किस काम में लाया जा सकता है , उसका प्रयोग कर देखेंगे , पर एक किसान किसी बीज को देखते ही आपको उसका पूरा भविष्‍य बतला देगा।

आप उसे बो दें , कितने दिन में उसका अंकुरण निकलेगा , कितने दिन में वह पेड , पौधा या लता बनेगा , कितने दिनों में वह फल देने लायक होगा , उसके विभिन्‍न अंगों यानि जड , तना , फल , फूल और पत्‍तों में से किस किस को किस तरह उपयोग में लाया जा सकता है। इसी प्रकार हम सारे मनुष्‍य देखने में एक समान होते हुए भी अलग अलग प्रकार के बीज हैं , मनुष्‍य की कुंडली के ग्रहों को देखकर हम उसकी प्रकृति के बारे में , उसके विकास के बारे में वैसी ही भविष्‍यवाणी कर पाते हैं ।

bhrigu prashnavali latest

पर जिस तरह एक बीज के विकास में देखरेख की भूमिका अहम् होती है , उसी प्रकार एक मनुष्‍य के विकास में भी माहौल बहुत बडा अंतर दे सकता है। एक किसान ने हर प्रकार के बीज का पूरा भविष्‍य आपको दिखा दिया , बीजों का जितना अधिक देखभाल किया जाए , किसान की भविष्‍यवाणी उतनी ही सटीक होगी। पर उसे बोया ही नहीं जाए या बोने के बाद देखभाल नहीं की जाए , तो क्‍या होगा ? उसका नष्‍ट होना तो निश्चित है , पर इससे एक किसान ने बीज के बारे में जो भविष्‍यवाणी की थी , वह गलत तो नहीं होगी न।

इसी प्रकार कर्म करने से हमारी भविष्‍यवाणियों के सटीक होने की संभावना बलवती होती जाती है। मनुष्‍य के भाग्‍य को लंबाई मान लिया जाए और कर्म को चौडाई , तो किसी भूखंड के क्षेत्रफल की तरह ही इन दोनो का गुणनफल ही किसी व्‍यक्ति की उपलब्धि होगी। इसलिए मेहनत से इंकार तो किया ही नहीं जा सकता , पर भविष्‍य की जानकारी से हम सही दिशा में मेहनत करने को प्रवृत्‍त अवश्‍य होते हैं।

'गत्यात्मक ज्योतिष' आधारित धारणा पर संगीता पुरी की ई-पुस्तकों को प्राप्त करने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें!

कृपया कमेंट बॉक्स में बताएँ कि यह लेख आपको कैसा लगा? यदि पसंद आया तो अपने मित्रों परिचितों को अवश्य शेयर करे, ताकि ज्योतिष से सम्बंधित वैज्ञानिक जानकारी जन-जन तक पहुंचे। नीचे के फेसबुक, ट्विटर और अन्य बटन आपको इस लेख को शेयर करने में मदद करेंगे।

    क्‍या आपने भृगुसंहिता का नाम सुना है ?

     

    Bhrigu samhita in hindi

    भृगु संहिता फलित ज्योतिष - ज्‍योतिष में थोडी भी रूचि रखनेवालों ने भृगुसंहिता का नाम अवश्‍य सुना होगा। जैसा कि नाम से ही स्‍पष्‍ट है , यह ज्‍योतिष के क्षेत्र में महर्षि भृगु द्वारा रचित एक ऐसी कालजयी पुस्‍तक मानी जाती है , जिसमें हर काल में जन्‍म लेनेवालों का भविष्‍य लिखा हुआ है। आम लोगों की तरह मैं भी सोंचा करती थी कि जिनलोगों ने जन्‍म भी नहीं लिया है , उसके बारे में भी भविष्‍यवाणी कर पाना भला कैसे संभव है ? इस पुस्‍तक की मूल पांडुलिपि के बारे में अभी तक सही सही बता पाना मुश्किल है , पर गुरू शिष्‍य परंपरा के तहत् आज तक ढोए जा सके तथ्‍यों के आधार पर जब विभिन्‍न प्रकाशनों की भृगुसंहिताओं को पढा , तो भृगुसंहिता के मूल आधार के बारे में बात समझ में आयी। गत्यात्मक ज्योतिष प्राचीनतम विधाओं का भी नवीनतम उपयोग की बात करता है। 

    Bhrigu samhita in hindi


    Bhrigu samhita Hindi explanation

    वास्‍तव में , प्राचीन ज्‍योतिष में हमें प्रभावित करने वाले 7 आकाशीय पिंडों और दो महत्‍वपूर्ण विंदुओं ( राहू और केतु ) को मिलाकर 9 ग्रह माने गए है। इन 9 ग्रहों की 12 राशियों में स्थिति 9*12 = 108 तरह के फलादेश दे सकती है। यदि लग्‍न के आधार पर विभिन्‍न भावों को देखते हुए गणना की जाए , तो 12 लग्‍नवालों के लिए पुन: 108*12 = 1296 प्रकार के फलादेश होंगे। यदि इन फलादेशों को 1296 अनुच्‍छेदों में लिखकर रखा जाए , तो किसी भी बच्‍चे के जन्‍म के बाद उस बच्‍चे की जन्‍मकुंडली में नवों ग्रहों की स्थिति को देखते हुए भृगुसंहिता में से 9 अनुच्‍छेदो को चुनकर भविष्‍यवाणी के लिए निकाला जा सकता है।

    Gatyatmak Bhrigu samhita Hindi guide

    प्राचीन ज्‍योतिष में आकाश का 30-30 डिग्रियों में विभाजन , उनका विभिन्‍न ग्रहों को आधिपत्‍य दिया जाना और लग्‍नसापेक्ष सभी भावों को जो विभाग सौंपे गए हैं , उस आधार को ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ ने जस का तस स्‍वीकार किया है। पर जब विभिन्‍न प्रकाशनों की भृगुसंहिताओं को पढा , तो पाया कि सारे फलादेश ग्रह स्थिति के आधार पर लिखे गए हैं। यानि लगभग कोई भी ग्रह हों , लग्‍न से केन्‍द्र या त्रिकोण में हों तो उन्‍हें बलवान तथा षष्‍ठ , अष्‍टम या द्वादश भाव में हो तो उन्‍हें कमजोर मानकर फलादेश लिखा गया है ।

    Gatyatmak Bhrigu samhita Hindi notes

    पर ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ की मान्‍यता है कि जिस तरह राजमहल में दिखाई देनेवाले सभी राजा नहीं होते , न पुलिस स्‍टेशन कैम्‍पस में दिखाई देनेवाले सभी लोग अपराधी और न ही श्‍मशान में दिखाई पडनेवाला सारा शरीर लाश उसी तरह ग्रहों की स्थिति मात्र के आधार पर भविष्‍य का आकलन गलत है। भले ही अधिकांश समय ग्रह अपनी स्थिति के अनुसार ही फल देते हों , पर कभी कभी इसका उल्‍टा भी हो जाया करता है।

    लग्नकुंडली

    ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ के द्वारा ग्रहों की गत्‍यात्‍मक और स्‍थैतिक शक्ति का खुलासा होने के बाद यह स्‍पष्‍ट हो गया कि धन स्‍थान में मौजूद ग्रहों के बावजूद जातक निर्धन , भाग्‍य स्‍थान में मौजूद ग्रहों के बावजूद जातक भाग्‍यहीन , बुद्धि स्‍थान में मौजूद ग्रहों के बावजूद जातक बुद्धिहीन और अष्‍टम भाव में मौजूद ग्रहों के बावजूद जातक अच्‍छे जीवन जीनेवाला क्‍यूं हो जाता है। इस आधार पर ‘भृगुसंहिता’ के नाम के साथ कोई छेडछाड न करते हुए कुछ वर्षों से एक ‘गत्‍यात्‍मक भृगुसंहिता’ तैयार करने की दिशा में काम किया गया , जिसमें क्‍या क्‍या खूबियां थी और उसे तैयार करने में क्‍या क्‍या परेशानियां आयी , उसे पढने के लिए अगले पोस्‍ट का इंतजार करें ।

    कृपया कमेंट बॉक्स में बताएँ कि यह लेख आपको कैसा लगा? यदि पसंद आया तो अपने मित्रों परिचितों को अवश्य शेयर करे, ताकि ज्योतिष से सम्बंधित वैज्ञानिक जानकारी जन-जन तक पहुंचे। नीचे के फेसबुक, ट्विटर और अन्य बटन आपको इस लेख को शेयर करने में मदद करेंगे।

      घरेलू नुस्खे और देसी इलाज

       

      Gharelu nuskhe hindi mein

      शनिवार और रविवार को बच्‍चों की छुट्टियों की वजह से नींद देर से ही खुलती है । हां , कभी कभार फोन की घंटी नींद अवश्‍य तोड दिया करती है। ऐसे ही एक शनिवार भोर की अलसायी हुई नींद के आगोश में थी कि अचानक फोन की घंटी बजी। फोन उठाकर जैसे ही मैने ‘हलो’ कहा , वैसे छोटी बहन की दर्दनाक आवाज कानों में पडी , ‘दीदी , मुझे बचा लो , ये लोग मेरी जान ले लेंगे।’ मेरे तो होश ही उड गए , विवाह के दस वर्षों तक सबकुछ सामान्‍य रहने के बाद ससुराल में इसके जीवन में कौन सा खतरा आ गया। अपने को बहुत संभालते हुए पूछा , ‘क्‍या हुआ , पूरी बात बताओ ’ तब उसने जो बताया , वह लगभग शून्‍य हुए दिमाग को काफी राहत देनेवाली थी।

      Gharelu nuskhe in hindi

      दरअसल गर्मी की वजह या अन्‍य किसी वजह से कई दिनों से उसके शरीर के कई जगहों पर फोडे निकल गए थे , कुछ काफी बडे भी हो गए थे। शाम को डाक्‍टर ने बडे फोडों को जल्‍द आपरेशन करा लेने की सलाह दी थी। रात में इनलोगों में लंबी बहस चली थी , बहन के पति और श्‍वसुर डाक्‍टर की सलाह मान लेने को कह रहे थे और बहन एक दो दिन इंतजार करना चाह रही थी । सुबह सुबह अपनी हार को नजदीक पाकर उसने घबडाकर मुझे फोन लगा दिया था। अपनों का कष्‍ट देखना बहुत मुश्किल होता है , उसकी समस्‍या को हल करने के लिए मैने जैसे ही अपना दिमाग खपाया , एक देशी इलाज का उपाय नजर आ ही गया। 

      Aayurved in hindi

      किसी भी फोडे के लिए आयुर्वेद की एक दवा है ‘एंटीबैक्‍ट्रीन’ , मैने बहुत दिन पूर्व उसका प्रयोग किया था और उसके चार छह घंटे के अंदर उसके प्रभाव से प्रभावित होकर कई बार दूसरों को भी उसके उपयोग की सलाह दी थी , जिसमें से किसी को भी उस दवा पर संदेह नहीं रह गया था। अगर फोडा शुरूआती दौर में हो तो , यह दवा उसे दबा देती है और यदि फोडा पक चुका हो , तो यह दवा उसके मवाद को बहा देती है , यानि फोडा किसी भी हालत में हो , उसका मुंह हो या नहीं , इसका उपयोग किया जा सकता है। बाद में घाव भी इसी दवा से ठीक हो जाता है , इसलिए मैने उसके पति से एक दिन का समय मांगा और बहन को उसी दवा के प्रयोग की सलाह दी। और मेरी आशा के अनुरूप ही रात में उसकी खनकती हुई आवाज कानों में पडी। फोडा बह चुका था , पाठक कभी भी बहुत कम कीमत की इस दवा की परीक्षा ले सकते हैं। एलोपैथी की कडी दवाओं या आपरेशन से बचने के लिए इस प्रकार के बहुत उपाय देशी इलाज और आयुर्वेद में हैं , जिनके बारे में या तो लोगों को जानकारी नहीं है या फिर वे विश्‍वास नहीं कर पाते।

      desi ilaj

      Gharelu nuskhe for constipation

      कई बार छोटे बच्‍चों के कब्‍ज को लेकर अभिभावक की पारेशानी को देखकर डाक्‍टर लगातार एलोपैथी की दवा चलाते हैं । मैने ऐसे कई बच्‍चों को छोटी हर्रे घिसकर पिलाने की सलाह दी है और उससे बच्‍चों को फिर एलोपैथी की दवा की जरूरत नहीं रह गयी है। सर्दी खांसी के लिए देशी इलाज के रूप में तुलसी , अदरक का रस और मधु को साथ मिलाकर बच्‍चों को पिलाया जाता है , बडे भी इसका काढा पीकर सर्दी ठीक कर सकते हैं। बडे पत्‍ते वाली तुलसी , जो कि घर में नहीं लगायी जाती , वह कुछ बीमारियों में बहुत कारगर होती है।

      Desi ilaj in hindi

      मेरी एक भांजी के पैर में घुटने के नीचे कुछ दाने हो गए , कभी कभी नोचने भी लगे , देखते ही देखते बढने भी लगे। हमने एलोपैथी के चर्मरोग विशेषज्ञ को दिखाया , उसकी कई दवाएं चली , पर कम अधिक होता रहा , जड से नहीं मिटा। हारकर हमने होम्‍योपैथी के डाक्‍टर से दिखाया। पहले सप्‍ताह की दवा से उसने बीमारी बढने की उम्‍मीद की , वह सही रहा , पर दूसरे सप्‍ताह से बीमारी में जो कमी होनी चाहिए थी , वह नहीं हुई और पहले से बडी समस्‍या देखकर हमलोग और घबडा गए। कुछ दिन बाद हमारे गांव से एक व्‍यक्ति आए , उन्‍होने देखा और अपनी देशी इलाज की दवाई सुझा दी , और उनकी दवाई से पूरा इन्‍फेक्‍शन समाप्‍त । दवाई का नाम सुनेंगे , तो आप चौंक ही जाएंगे , दवा थी , गाय के ताजे दूध का फेन। एक महीने में बीमारी समाप्‍त हो गयी।

      Desi ilaj for cold

      बचपन से बिल्‍कुल स्‍वस्‍थ रहे मेरे बडे बेटे को 12 वर्ष की उम्र के बाद सालोभर सर्दी खांसी रहने लगी , पांच छह वर्षों तक एलोपैथी की दवा चलाने के बाद भी कोई फायदा नहीं हुआ , डाक्‍टर कहा करते थे कि ध्‍यान दें , इसे किस चीज से एलर्जी है , उससे दूर रखें , पर इतने दिनों तक हमें कुछ भी समझ में न आया , जितनी सावधानी बरतते , सर्दी खांसी उतनी ही अधिक परेशान करती थी। अंत में हारकर हमलोगों ने होम्‍योपैथी की दवा चलायी , और छह महीने में एलर्जी जड से दूर। हर वक्‍त टोपी , मफलर , मोजे में अपने को पैक रखने वाले और हर ठंडा खाना से वंचित रहनेवाले उसी बेटे को आज कहीं भी किसी परहेज की जरूरत नहीं होती है। ऐसी अन्‍य बहुत सारी घटनाएं हैं , जिसके कारण एलोपैथी से इतर पद्धतियों पर भी मेरा भरोसा बना हुआ है।

      desi dawai ke nuskhe

      एलोपैथी के साइड इफेक्‍ट के कारण उत्‍पन्‍न होने वाली बहुत सी सारी शारीरिक समस्‍याओं के बावजूद भी इलाज की सर्वोत्‍तम पद्धति के रूप में अभी एलोपैथी का नाम ही लिया जा सकता है । एलोपैथी की सफलता को देखते हुए मै भी इसे स्‍वीकारती हूं , वैसे इसका सबसे बडा कारण इस मद में किया जानेवाला खर्च है , इससे इंकार नहीं किया जा सकता । पर छोटी छोटी बीमारियों के लिए ही सही , जहां पर हमारी ये देशी दवाएं कारगर है , वहां एलोपैथी का प्रयोग किया जाना क्‍या उचित है ?

      Desi ilaj in hindi

      लोग ये जानते हैं कि सरदर्द हो , तो दर्दनिवारक गोली लेनी है , पर ये क्‍यूं नहीं जानते कि फोडा होने पर ‘एंटीबैक्‍ट्रीन’ का प्रयोग करना है। ताज्‍जुब की बात है कि यहां की इतनी सटीक देशी दवाइयों की जानकारी यहीं के ही लोगों को मालूम नहीं है। शिक्षा का मतलब अपनी सभ्‍यता, संस्‍कृति और ज्ञान को भूल जाना नहीं होता , पर आजतक ऐसा ही होता आया है , जो हमारी शिक्षा व्‍यवस्‍था को दोषपूर्ण तो ठहरा ही देता है। युग बदलने के साथ ही साथ हर पद्धति का विकास किया जाना अधिक आवश्‍यक है , जब तक हर क्षेत्र का समानुपातिक विकास न हो , एक क्षेत्र की अंधी दौड में हमें शामिल नहीं होना चाहिए।

      'गत्यात्मक ज्योतिष' आधारित सूत्रों पर कुंडली निर्माण, सटीक भविष्यवाणी, उचित परामर्श और समुचित उपचार के लिए संपर्क करें - 8292466723, gatyatmakjyotishapp@gmail.com

      कृपया कमेंट बॉक्स में बताएँ कि यह लेख आपको कैसा लगा? यदि पसंद आया तो अपने मित्रों परिचितों को अवश्य शेयर करे, ताकि ज्योतिष से सम्बंधित वैज्ञानिक जानकारी जन-जन तक पहुंचे। नीचे के फेसबुक, ट्विटर और अन्य बटन आपको इस लेख को शेयर करने में मदद करेंगे।

        चंद्रग्रहण या सूर्यग्रहण का राशि पर प्रभाव

         

        Grahan ka rashi par prabhav

        आप दुनिया को जिस रूप में देख पाते हैं , उसी रूप में उसका चित्र उतार पाना मुश्किल होता है , चाहे आप किसी भी साधन से कितनी भी तन्‍मयता से क्‍यूं न कोशिश करें। इसका मुख्‍य कारण यह है कि आप हर वस्‍तु को देखते तो त्रिआयामी हैं , यानि हर वस्‍तु की लंबाई और चौडाई के साथ साथ उंचाई या मोटाई भी होती है , पर चित्र द्विआयामी ही ले पाते हैं , जिसमें वस्‍तु की सिर्फ लंबाई और चौडाई होती है। इसके कारण किसी भी वस्‍तु की वास्‍तविक स्थिति दिखाई नहीं देती है।

        Surya grahan ke bare mein bataiye

        इसी प्रकार जब हम आकाश दर्शन करते हैं , तो हमें पूरे ब्रह्मांड का त्रिआयामी दर्शन होता है । प्राचीन गणित ज्‍योतिष के सूत्रों में सभी ग्रहों की आसमान में स्थिति का त्रिआयामी आकलण ही किया जाता है , इसी कारण सभी ग्रहों के अपने पथ से विचलन के साथ ही साथ सूर्य के उत्‍तरायण और दक्षिणायण होने की चर्चा भी ज्‍योतिष में की गयी है। पर ऋषि , महर्षियों ने जन्‍मकुंडली निर्माण से लेकर भविष्‍य कथन तक के सिद्धांतों में कहीं भी आसमान के त्रिआयामी स्थिति को ध्‍यान में नहीं रखा है । 

        इसका अर्थ यह है कि फलित ज्‍योतिष में आसमान के द्विआयामी स्थिति भर का ही महत्‍व है। शायद यही कारण है कि पंचांग में प्रतिदिन के ग्रहों की द्विआयामी स्थिति ही दी होती है। ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ भी ग्रहों के पृथ्‍वी के जड चेतन पर पडने वाले प्रभाव में ग्रहों की द्विआयामी स्थिति को ही स्‍वीकार करता है। इस कारण सूर्यग्रहण या चंद्रग्रहण से प्रभावित होने का कोई प्रश्‍न ही नहीं उठता ?

        grahan ka rashi par prabhav

        surya-chandra-grahan

        हम सभी जानते हैं कि आसमान में प्रतिमाह पूर्णिमा को सूर्य और चंद्र के मध्‍य पृथ्‍वी होता है , जबकि अमावस्‍या को पृथ्‍वी और सूर्य के मध्‍य चंद्रमा की स्थिति बन जाती है , लेकिन इसके बावजूद प्रतिमाह सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण नहीं होता। इसका कारण भी यही है। आसमान में प्रतिमाह वास्‍तविक तौर पर पूर्णिमा को सूर्य और चंद्र के मध्‍य पृथ्‍वी और हर अमावस्‍या को पृथ्‍वी और सूर्य के मध्‍य चंद्रमा की स्थिति नहीं बनती है । यह तो हमें मात्र उस चित्र में दिखाई देता है , जो द्विआयामी ही लिए जाते हैं। इस कारण एक पिंड की छाया दूसरे पिंड पर नहीं पडती है। जिस माह वास्‍तविक तौर पर ऐसी स्थिति बनती है, एक पिंड की छाया दूसरे पिंड पर पडती है और इसके कारण सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण होते है।

         Chandra grahan ka rashi par prabhav

        सूर्यग्रहण के दिन चंद्रमा सूर्य को पूरा ढंक लेता है , जिससे उसकी रोशनी पृथ्‍वी तक नहीं पहुंच पाती , तो दूसरी ओर चंद्रग्रहण के दिन पृथ्‍वी सूर्य और चंद्रमा के मध्‍य आकर सूर्य की रोशनी चंद्रमा पर नहीं पडने देती है । सूर्य और चंद्र की तरह ही वास्‍तविक तौर पर समय समय पर अन्‍य ग्रहों की भी आसमान में ग्रहण सी स्थिति बनती है , जो विभिन्‍न ग्रहों की रोशनी को पृथ्‍वी तक पहुंचने में बाधा उपस्थित करती है। पर चूंकि अन्‍य ग्रहों की रोशनी से जनसामान्‍य प्रभावित नहीं होते हैं , इस कारण वे सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण की तरह उन्‍हें साफ दिखाई नहीं देते। परंतु यदि ग्रहणों का प्रभाव पडता , तो सिर्फ सूर्य और चंद्र ग्रहण ही प्रभावी क्‍यूं होता, अन्‍य ग्रहण भी प्रभावी होते और प्राचीन ऋषियों , महर्षियों के द्वारा उनकी भी कुछ तो चर्चा की गयी होती ।

        Surya grahan ka rashi par prabhav,

        अन्‍य ग्रहों के ग्रहणों का किसी भी ग्रंथ में उल्‍लेख नहीं किए जाने से यह स्‍पष्‍ट है कि किसी भी ग्रहण का कोई ज्‍योतिषीय प्रभाव जनसामान्‍य पर नहीं पडता है। पर चूंकि सूर्य के उदय और अस्‍त के अनुरूप ही पशुओं के सारे क्रियाकलाप होते हैं , इसलिए अचानक सूर्य की रोशनी को गायब होते देख उनलोगों का व्‍यवहार असामान्‍य हो जाता है , जिसे हम ग्रहण का प्रभाव मान लेते हैं । लेकिन चिंतन करनेवाली बात तो यह है कि यदि ग्रहण के कारण जानवरों का व्‍यवहार असामान्‍य होता , तो वह सिर्फ सूर्यग्रहण में ही क्‍यूं होता ? चंद्रग्रहण के दिन भी तो उनका व्‍यवहार असामान्‍य होना चाहिए था। पर चंद्रग्रहण में उन्‍हें कोई अंतर नहीं पडता है , क्‍यूंकि अमावस्‍या के चांद को झेलने की उन्‍हें आदत होती है।

        Chandra grahan ka prabhav in hindi

        वास्‍तव में ज्‍योतिषीय दृष्टि से अमावस्‍या और पूर्णिमा का दिन ही खास होता है। यदि इन दिनों में किसी एक ग्रह का भी अच्‍छा या बुरा साथ बन जाए तो अच्‍छी या बुरी घटना से जनमानस को संयुक्‍त होना पडता है। यदि कई ग्रहों की साथ में अच्‍छी या बुरी स्थिति बन जाए तो किसी भी हद तक लाभ या हानि की उम्‍मीद रखी जा सकती है। ऐसी स्थिति किसी भी पूर्णिमा या अमावस्‍या को हो सकती है , इसके लिए उन दिनों में ग्रहण का होना मायने नहीं रखता। 

        पर पीढी दर पीढी ग्रहों के प्रभाव के ज्ञान की यानि ज्‍योतिष शास्‍त्र की अधकचरी होती चली जानेवाली ज्‍योतिषीय जानकारियों ने कालांतर में ऐसे ही किसी ज्‍योतिषीय योग के प्रभाव से उत्‍पन्‍न हुई किसी अच्‍छी या बुरी घटना को इन्‍हीं ग्रहणों से जोड दिया हो। इसके कारण बाद की पीढी इससे भयभीत रहने लगी हो। इसलिए समय समय पर पैदा हुए अन्‍य मिथकों की तरह ही सूर्य या चंद्र ग्रहण से जुड़े सभी अंधविश्वासी मिथ गलत माने जा सकते है। यदि किसी ग्रहण के दिन कोई बुरी घटना घट जाए , तो उसे सभी ग्रहों की खास स्थिति का प्रभाव मानना ही उचित होगा , न कि किसी ग्रहण का प्रभाव।

        अमेज़ॉन के किंडल में गुरूवर विद्या सागर महथा जी की  फलित ज्योतिष : कितना सच कितना झूठ को पढ़ने के लिए  इस लिंक पर क्लिक करें !

        कृपया कमेंट बॉक्स में बताएँ कि यह लेख आपको कैसा लगा? यदि पसंद आया तो अपने मित्रों परिचितों को अवश्य शेयर करे, ताकि ज्योतिष से सम्बंधित वैज्ञानिक जानकारी जन-जन तक पहुंचे। नीचे के फेसबुक, ट्विटर और अन्य बटन आपको इस लेख को शेयर करने में मदद करेंगे।

          ज्योतिष के अचूक उपाय

           

          Jyotish ke achuk upay

          Gold silver copper ring astrology in hindi

          गत्यात्मक ज्योतिष’ मानता है कि मनुष्य के समक्ष उपस्थित होनेवाली शारीरिक, मानसिक या अन्य प्रकार की कमजोरी का एक कारण उसके जन्मकाल के कमजोर ग्रह हैं और उस ग्रह के प्रभाव को मानव पर पड़ने से रोककर ही उस समस्या को कम किया जा सकता है। ज्योतिष शास्त्र में नए ढंग से कुंडली देखने का तरीका ईजाद करने के बाद गत्यात्मक ज्योतिष ने बुरे ग्रहों के अचूक उपाय के लिए निम्न रास्ते सुझाये हैं -

          1. समय-नियोजन – अंधेरे में चलनेवाले लगभग सभी राहगीर अपने गंतब्य पर पहुंच ही जाते हैं। बिना घड़ी पहने परीक्षार्थी परीक्षा दे ही सकते हैं। बिना कैलेण्डर के लोग वर्ष पूरा कर ही लेते हैं। किन्तु टॉर्च, घड़ी और कैलेण्डर के साथ चलनेवाले लोगों को ही यह अहसास हो सकता है कि उनका रास्ता कितना आसान रहा। वे पूरी अवधि में चिंतामुक्त रहें। इसी प्रकार का सहयोग ‘गत्यात्मक ज्योतिष’ आपको प्रदान करता है। ग्रहों के बुरे प्रभाव को परिवर्तित कर पाना यानि बुरे को अच्छे में तथा अच्छे को बुरे में बदल पाना असंभव है, किन्तु ग्रहों के बुरे प्रभाव को कम करने के लिए या अच्छे प्रभाव को और बढ़ा पाने के लिए परामर्श अवश्य दी जा सकती है।

          2. प्रभावी अंगूठी या लॉकेट – अमावस्या के दिन बिल्कुल कमजोर रहने वाला चंद्रमा पूर्णिमा के दिन अपनी पूरी शक्ति में आ जाता है। आप अपनी मन:स्थिति को अच्छी तरह गौर करें, पूर्णिमा और अमावस्या के वक्त आपको अवश्य अंतर दिखाई देगा। पूर्णिमा के दिन चांदी को पूर्ण तौर पर गलाकर एक छल्ला या लॉकेट तैयार कर पहनने से उनमे चंद्रमा की सकारात्मक शक्ति आती है, जिसका पहननेवाले पर अच्छा प्रभाव पडता है, जिससे व्यक्ति के मनोवैज्ञानिक क्षमता में वृद्धि होती है । हमारे यहाँ ये अंगूठियॉ उस मुहूर्त्त में बनवायी जाती हैं, जब कई ग्रहों का शुभ प्रभाव पृथ्वी के उस स्थान पर पड़ रहा हो, जिस स्थान पर वह अंगूठी बनवायी जा रही हो। दो घंटे के उस विशेष लग्न का चुनाव कर अंगूठी को अधिक प्रभावशाली बनाया जाता है।

          jyotish ke achuk upay

          3. रंगो का चुनाव – ‘गत्यात्मक ज्योतिष’ ग्रहों के प्रभाव को कम या अधिक करने के लिए कलर थेरेपी के महत्व को स्वीकार करता है। यह तथ्य सर्वविदित है कि विभिन्न पदार्थों में रंगों की विभिन्नता का कारण किरणों को अवशोषित और उत्सर्जित करने की शक्ति है। इस आधार पर सफेद रंग की वस्तुओं का चंद्र, हरे रंग की वस्तुओं का बुध, लाल रंग की वस्तुओं का मंगल, चमकीले सफेद रंग की वस्तुओं का शुक्र, तप्त लाल रंग की वस्तुओं का सूर्य, पीले रंग की वस्तुओं का बृहस्पति और काले रंग की वस्तुओं का शनि के साथ संबंध होने से इंकार नहीं किया जा सकता। रंगो का उपयोग आप विभिन्न रंग के रत्न के साथ ही साथ वस्त्र धारण से लेकर अपने सामानों और घरों की पुताई तक और विभिन्न प्रकार की वनस्पतियों को लगाकर प्राप्त कर सकते हैं। 

          4. संगति का प्रभाव – हम संगति के महत्व के बारे में हमेशा ही कुछ न कुछ पढ़ते आ रहें हैं। यहॉ तक कहा गया है -----`संगत से गुण होत हैं, संगत से गुण जात´। गत्यात्मक ज्योतिष भी संगति के महत्व को स्वीकार करता है। एक कमजोर ग्रह या कमजोर भाववाले व्यक्ति को मित्रता, संगति, व्यापार या विवाह वैसे लोगों से करनी चाहिए, जिनका वह ग्रह या वह भाव मजबूत हो। यदि एक बालक का जन्म अमावस्या के दिन हुआ हो, तो उन कमजोरियों के कारण, जिनका चंद्रमा स्वामी है, बचपन में बालक का मनोवैज्ञानिक विकास सही ढंग से नहीं हो पाता है और बच्चे का स्वभाव कुछ दब्बू किस्म का हो जाता है, उसकी इस स्थिति को ठीक करने के लिए बालक की संगति पर ध्यान देना होगा। पूर्णिमा के आसपास जन्म लेने वाले बच्चों की उच्छृंखलता को देखकर उनके बाल मन का मनोवैज्ञानिक विकास भी कुछ अच्छा हो जाएगा। ऐसा ही अन्य ग्रहों और भावों के साथ भी होता है।

          5. दान का महत्व – इसके अलावे ग्रहों के बुरे प्रभाव को कम करने के लिए हमारे धर्मशास्त्रों में हर तिथि पर्व पर स्नानादि के पश्चात् दान करने के बारे में बताया गया है। अपनी कुंडली के अनुसार ही उसमें जो ग्रह कमजोर हो, उसको मजबूत बनाने के लिए दान करना चाहिए। जातक का चंद्रमा कमजोर हो, तो अनाथाश्रम को दान करना चाहिए, खासकर 12 वर्ष से कम उम्र के अभावग्रस्त और जरुरतमंद बच्चों को दिए जानेवाले दान से उनका काफी भला होगा। जातक का बुध कमजोर हो तो उन्हें विद्यार्थियों को या किसी प्रकार के रिसर्च कार्य में लगे व्यक्ति को सहयोग देना चाहिए। जातक का मंगल कमजोर हो, तो उन्हें युवाओं की मदद और कल्याण के लिए कार्यक्रम बनाने चाहिए। जातक का शुक्र कमजोर हो तो उनके लिए कन्याओं के विवाह में सहयोग करना अच्छा रहेगा। सूर्य कमजोर हो तो प्राकृतिक आपदाओं में पड़नेवालों की मदद की जा सकती है। बृहस्पति कमजोर हो तो अपने माता पिता और गुरुजनों की सेवा से लाभ प्राप्त किया जा सकता है। शनि कमजोर हो तो वृद्धाश्रम को दान करें या अपने आसपास के जरुरतमंद अतिवृद्ध की जरुरतों को पूरा करने की कोशिश करें।

          6. पेड़-पौधों की भूमिका – प्राचीनकाल से ही पेड़-पौधें का मानव विकास के साथ गहरा संबंध रहा है। यदि जातक का चंद्रमा कमजोर हो, तो उन्हें तुलसी या अन्य छोटे-छोटे औषधीय पौधे, बुध कमजोर हो तो उसे बिना फल फूलवाले या छोटे छोटे हरे फलवाले पौधे, मंगल कमजोर हो तो उन्हें लाल फल-फूलवाले बड़े-बड़े पेड़, शुक्र कमजोर हो तो उन्हें सफेद फल-फूलवाले बड़े-बड़े पेड़, सूर्य कमजोर हो तो उन्हें तप्त लाल रंग के फल-फूलवाले बड़े-बड़े पेड़, बृहस्पति कमजोर हो तो उन्हें पीले फल-फूलवाले बड़े-बड़े पेड़, शनि कमजोर हो तो उन्हें सार्वजनिक स्थलों पर पीपल और बरगद के पेड़ लगाने चाहिए।

          7. प्रार्थना – कभी कभी हमारे सामने ऐसी समस्याएं आ जाती है, जिसे हम न तो खुद और न ही दूसरों से हल करवा पाते हैं, उस समय एक सर्वशक्तिमान की याद अवश्य आ जाती है, जिसके सामने हम प्रार्थना करने लगते हैं। ऐसा माना जाता है कि प्रार्थना में अद्भुत शक्ति होती है और इसके जरिए हम प्रभु या प्रकृति से संबंध बना लेते हैं। जहां धार्मिक और आध्यात्मिक रूचि रखने वाले व्यक्ति प्रतिदिन प्रार्थना करते हैं, वहीं सांसारिक या व्यस्त रहने वाले व्यक्ति विपत्ति के उपस्थित होने पर अवश्य ईश्वर की प्रार्थना किया करते हैं। प्रार्थना के सफल होने के लिए ईश्वर के प्रति समर्पित होने के साथ साथ अपने अहंकार का त्याग और मन की निश्छलता की आवश्यकता होती है। अपने या अपनों के लिए की गयी प्रार्थना भी ग्रहों के प्रभाव को कम करने में सहायक होती है। 



          गत्यात्मक ज्योतिष में ग्रहों के प्रभाव को दूर करने से सम्बंधित उपायों के बारे में प्रकाशित पुस्तक को पढ़ने के लिए अमेज़ॉन के किंडल में  इस लिंक पर क्लिक करें !

          कृपया कमेंट बॉक्स में बताएँ कि यह लेख आपको कैसा लगा? यदि पसंद आया तो अपने मित्रों परिचितों को अवश्य शेयर करे, ताकि ज्योतिष से सम्बंधित वैज्ञानिक जानकारी जन-जन तक पहुंचे। नीचे के फेसबुक, ट्विटर और अन्य बटन आपको इस लेख को शेयर करने में मदद करेंगे।