भाग्य क्या है ???

 

Bhagya kya hai?

विचित्रता से भरी इस प्रकृति में नाना प्रकार की विशेषताओं के साथ मौजूद पशु पक्षी , पेड पौधे तो अपने विकास के क्रम में सुविधाएं और बाधाएं प्राप्त करते ही हैं , इन सबके साथ ही साथ हानिकारक किटाणुओं विषाणुओं के साथ जीवनयापन करता मनुष्ये भी अपनी राह में तरह तरह के मोड प्राप्त करता है , इसके बाद भी आमजन का भाग्य के प्रति अनजान दिखना आश्चर्यजनक प्रतीत होता है। भले ही उस भाग्य को पूर्ण तौर पर जान पाने में हम असमर्थ हों , पर उसके अनुकूल या प्रतिकूल होने में तो शक की कुछ भी गुंजाइश नहीं।

सबसे पहले तो प्रकृति के विभिन्न पशु पक्षियों के जीवन पर ही गौर किया जा सकता है , जहां बलवान शिकार करता है और उसके डर से बलहीन दुबके पडे होते हैं। भाग्य भरोसे ही इनका जीवन चलता है , अच्छा रहा तो शिकार नहीं होता है , बुरा रहा तो तुरंत मौत के मुंह में चले जाते हैं , कर्म कोई मायने ही नहीं रखता। बलवान पशुओं से बचने के लिए ये कोई कर्म भी करते हैं , तो वह भाग्य से मिलने वाली इनकी विशेषताएं होती हैं। जैसे कि उडकर , डंसकर या भागकर ये खुद को बचा लेते हैं।


bhagya kya hai ?

Kya bhagya badal sakta hai

आदिम मानव का जीवन भी पशुओं की तरह ही अनिश्चितता भरा था , कर्म कोई मायने नहीं रखता था , कब किसके चंगुल में आ जाएं और प्राणों से हाथ धो बैठे कहना मुश्किल था। इन्हें बुद्धि की विशेषता भाग्य से ही मिली है , जिसके उपयोग से वह बलवान पशुओं तक को नियंत्रित कर सका। प्रकृति में मौजूद हर जड चेतन की विशेषताओं का खुद के लिए उपयोग करना सीखा , पर इसके बावजूद इसके नियंत्रण में भी सबकुछ नहीं है , भाग्य से लडने की विवशता आज भी बनी ही है।

क्रमश: मनुष्य का जीवन विकसित हुआ , पर यहां भी भाग्य की भूमिका बनी रही। एक बच्चे का भिखारी के घर तो एक अरबपति के घर में जन्म होता है , कोई हर सुख सुविधा में तो कोई फटेहाल जीवन जीने को विवश है। यदि आर्थिक स्तर को छोड भी दिया जाए , क्यूंकि अपने अपने स्तर पे ही जीने की सबकी आदत होती है , हर स्तर पर सुख या दुख से युक्त होने की संभावना बन सकती है। पर जन्म के बाद ही दो बच्चे में बहुत अंतर हो सकता है। एक मजबूत शरीर लेकर उत्साहित तो दूसरा शरीर के किसी अंग की कमी से मजबूर होता है। किसी का पालन पोषण माता पिता परिजनों के लाड प्यार में तो किसी को इनकी कमी भी झेलना होता है। पालन पोषण में ही वातावरण में अन्य विभिन्न्ता देखने को मिल सकती है।

Karm bada ya bhagya

आज प्रकृति से लडता हुआ मनुष्य बहुत ही विकसित अवस्था तक पहुंच चुका है , पर लोगों के जीवन स्तर के मध्य का फासला जितना बढता जा रहा है , भाग्य् की भूमिका उतनी अहम् होती जा रही है। किसी व्यक्ति की जन्मजात विशेषता उसे भीड से अलग महत्वपूर्ण बनाने में समर्थ है , इसी प्रकार जहां संयोग के कारण एक बडी सफलता या असफलता जीवन स्तर में बडा परिवर्तन ला देती है , वहीं किसी प्रकार का दुर्योग लोगों को असफल जीवन जीने को बाध्य कर देता है। संक्षेप में यही कहा जा सकता है कि हम प्रकृति की ओर से अपने वातावरण और जमाने के अनुकूल जो विशेषताएं प्राप्त‍ करते हैं , वो हमारा भाग्यु है , इसके प्रतिकूल हमारे व्यक्तित्व और वातावरण की विशेषताएं हमारा दुर्भाग्य कही जा सकती हैं।

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    मुहूर्त्त का सच

     

    Aaj ka shubh muhurat kya hai

    अपने पिताजी की पुस्तक में से एक लेख आज आपके लिए प्रस्‍तुत है .....

    आज के अनिश्चित और अनियमित युग में हर व्यक्ति स्वयं को असुरक्षित महसूस करता है। अपने कर्मों और कार्यक्रमों पर भरोसेवाली कोई बात नहीं रह जाती है। जैसे जैसे आत्मविश्वास में कमी होती जा रही है मुहूर्त यात्रा आदि संदर्भों की ओर लोगों का झुकाव बढ़ता जा रहा है। पत्र-पत्रिकाओं में अक्सर फिल्म-निर्माण प्रारंभ करने और उसके प्रदर्शन की शुरुआत के लिए मुहूर्त की चर्चा देखने को मिलती है। फिल्म-निर्माण करने में अधिक से अधिक खर्च-शक्ति और पूंजी की लागत होती है कामयाबी मिलने पर लागत-पूंजी न केवल सार्थक होती है वरन् प्रतिदान के रुप में कई गुणा बढ़ भी जाती है। दूसरी ओर फिल्म फलॉप होने पर फिल्म निर्माता दर-दर भटकाव की स्थिति को प्राप्त करते हैं। सचमुच फिल्म निर्माण बहुत बड़ा रिस्क होता है इसलिए फिल्मनिर्माता एक अच्छे मुहूर्त की तलाश में होते हैं ताकि काम अबाध गति से चलता रहे और प्रदर्शन के बाद भी फिल्म काफी लाभदायक सिद्ध हो। किन्तु वस्तुतः होता क्या है आज का फिल्म उद्योग काफी लाभप्रद नहीं रह गया है कुछ सफल है तो अधिकांश की स्थिति बिगड़ी हुई है। क्या सचमुच मुहूर्त काम करता है ?

    Shubh yatra in hindi

    पूरे देश में प्रवेशिका परीक्षा देनेवालों की संख्या करोड़ों में होती है। इस वैज्ञानिक युग में जैसे-जैसे मनोरंजन के साधन बढ़ते चले गए पढ़ाई का वातावरण धीरे-धीरे कमजोर पड़ता चला गया। आज जैसे ही परीक्षा के लिए कार्यक्रम की घोषणा होती है अधिकांश विद्यार्थी परेशान नजर आते हैं क्योंकि उनकी तैयारी संतोषजनक नहीं होती है इसलिए उनका आत्मविश्वास काम नहीं करता रहता है। प्रायः सभी विद्यार्थी और उनके अभिभावक अपने आवास से परीक्षा-स्थल पर पहुंचने के लिए मुहूर्त्‍त की तलाश में पंडितों के पास पहुंच जाते हैं। पंडितजी के पास ग्रहों नक्षत्रों के आधार पर शोध किए गए कुछ विशिष्ट शुभ समय-अंतराल की तालिका होती है।

    aaj ka shubh muhurat kya hai

    कभी महेन्द्र योग कभी अमृत योग तो कभी सिद्धियोग से संबंधित इस प्रकार के शुभफलदायी लघुकालावधि की सूचना बारी-बारी से सभी विद्यार्थियों और अभिभावकों को दी जाती है या फिर एक ही विद्यार्थी पंडितजी से यह मुहूर्त्‍त प्राप्त कर कई विद्यार्थियों को जानकारी देते हैं। विद्यार्थी झुंड बनाकर एक ही साथ उसी शुभ मुहूर्त्‍त में अपने गांव कस्बे या क्षेत्र से परीक्षास्थल के लिए निकलते हैं। पर सोंचने की बात है कि क्या सबका परिणाम एक सा होता है नहीं विद्यार्थियों को उनकी प्रतिभा के अनुरुप ही फल प्राप्त होता है। उत्तीर्ण होने लायक विद्यार्थी सचमुच उत्तीर्ण होते हैं और जिन विद्यार्थियों के अनुत्तीर्ण होने की संभावना पहले से ही रहती है वैसे ही विद्यार्थी अनुत्तीर्ण देखे जाते हैं। विरले ही ऐसे विद्यार्थी होते हैं जिनका परीक्षा परिणाम प्रत्याशा के विरुद्ध होता है उन विद्यार्थियों ने शुभ मुहूर्त्‍त में यात्रा नहीं की इसलिए ही ऐसा हुआ यह तो कदापि नहीं कहा जा सकता। 

    यहां तो मैं केवल यात्रा की बात कर रहा हूं किन्तु कल्पना करें किसी समय अमृत योग सिद्धि योग या महेन्द्र योग चल रहा हो और उसी समय किसी विषय की परीक्षा चल रही हो तो क्या लाखों की संख्या में परीक्षा दे रहे विद्यार्थी उस विषय में उत्तीर्ण हो जाएंगे कदापि नहीं सभी विद्यार्थियों को उनकी योग्यता के अनुरुप ही  परीक्षाफल की प्राप्ति होगी। अमृतयोग या सिद्धियोग कुछ काम नहीं कर पाएगा।

    Types of muhurat

    हर विषय की परीक्षा का समय निर्धारित होता है और लाखों की संख्या में परीक्षार्थी परीक्षा में सम्मिलित होकर भिन्न-भिन्न परीणामों को प्राप्त करते हैं। समय के छोटे से टुकड़े को ही मुहूत्र्त कहा जाता है। इस दृष्टिकोण से परीक्षा की कुल अवधि जिसमें सभी विद्यार्थी परीक्षा दे रहे हैं एक प्रकार का मुहूत्र्त ही हुआ। वह मुहूर्त्‍त अच्छा है या बुरा सभी विद्यार्थियों के लिए एक जैसा ही होना चाहिए परंतु क्या वैसा हो पाता है स्पष्ट है ऐसा कभी नहीं हो सकता ।

    बहुत बार समय का एक छोटा सा अंतराल आम लोगों को प्रभावित करता है। हवाई जहाज या रेल के दुर्घटनाग्रस्त होने पर सैकड़ो लोग एक साथ मरते हैं। इसी तरह युद्ध भूकम्प या तूफान के समय मरनेवालों की संख्या हजारो में होती है। उक्त कालावधि को हम बहुत ही बुरे समय से अभिहित कर सकते हैं क्योकि इस प्रकार की घटनाएं जनमानस पर बहुत ही बुरा प्रभाव डालती है किन्तु इस प्रकार की घटनाओं को अच्छे योगों में भी घटते हुए मैंने पाया है। इसी प्रकार शुभ विवाह के लिए शुभ मुहूर्तों की एक लम्बी तालिका होती है जिन तिथियों में ही शादी-विवाह की व्यवस्था की जाती है। 

    परंतु बहुत बार हम ऐसा सुनते हैं कि आकस्मिक दुर्घटना के कारण बरातियों की मौत हो गयी ऐसी हालत में इन योगों की कौन सी प्रासंगिकता रह जाती है क्या यह बात दावे से कही जा सकती है कि जो हवाई जहाज दुर्घटनाग्रस्त हुई उसमें हवाई यात्रा करने से पूर्व सभी यात्रियों में से किसी ने मुहूर्त्‍त नहीं देखा होगा उसमें स्थित कोई आम आदमी जो भाग्यवादी दृष्टिकोण भी रखता होगा यात्रा के विषय में अवश्य ही पंडितों से सलाह ले चुका होगा फिर भी सभी यात्रियो का परिणाम एक सा ही देखा जाता है।

    जहां एक ओर  सामूहिक उत्सव एक ही मेले में लाखो लोगों का एक साथ उपस्थित होना सामूहिक विवाह सौंदर्य प्रतियोगिता आदि सुखद अहसास खास समय अंतराल के विषय वस्तु हो सकते हैं वहीं दूसरी ओर भूकम्प तूफान युद्ध और दुर्घटनाओं से लाखों लोगों का प्रभावित होना भी सच हो सकता है। इस प्रकार से अच्छे या बुरे समय को स्वीकार करना हमारी बाध्यता तो हो सकती है किन्तु इन दोनों प्रकार के समयों को अलग-अलग कर दिखाने के सूत्रों की पकड़ जब अच्छी तरह हो जाएगी तो फलित ज्योतिष के द्वारा समय और तिथियुक्त भविष्यवाणियां भी आसानी से की जा सकेगी।

    Muhurtham meaning

    अमुक दिन अमुक समय पर भूकम्प आनेवाला है तूफान आनेवाला है कहकर लोगों को सतर्क किया जा सकेगा। अगर ऐसा हो पाया तो बुरे समय का बोध स्वतः हो जाएगा। किन्तु अभी फलित ज्योतिष इतना ही विकसित है कि वह ग्रह की स्थिति अंश कला और विकला तक कर सकता है परंतु उसके फलाफल की प्राप्ति किस वर्ष होगी इसकी भी चर्चा नहीं कर पाता । दूसरी ओर फलित ज्योतिष के ज्ञाता किसी खास घंटा और मिनट को भी शुभ और अशुभ कहने में नहीं चूकते हैं। फलित कथन की यह दोहरी नीति फलित ज्योतिष में भ्रम उत्पन्न करती है।

    कभी-कभी एक ही समय में एक घटना घटित होती है और उस घटना का प्रभाव दो भिन्न-भिन्न व्यक्ति और समुदाय के लिए अलग-अलग यानि एक के लिए शुभ और दूसरे के लिए अशुभ फलदायक होता है। इस प्रकार की घटनाएं अक्सर होती हैं एक हारता है तो दूसरा जीतता है। एक को हानि होती है तो दूसरा लाभान्वित होता है। वर्षों तक मुकदमा लड़ने के बाद दोनों पक्ष के मुकदमेबाज ज्योतिषी से सलाह लेने पहुंच जाते हैं। फैसले के लिए कौन सी तिथि का चुनाव किया जाए। पंचांग में एक बहुत ही शुभ समय का उल्लेख है। दोनो पक्ष भिन्न-भिन्न ज्योतिषियों से सलाह लेकर उस शुभ दिन को फैसले की सुनवाई के लिए तैयार होकर जाते हैं। पर परिणाम क्या होगा एक को जीत तो दूसरे को हार मिलनी ही है। निर्धारित शुभ समय एक के लिए शुभफलदायक तो दूसरे के लिए अशुभ फलदायक होगा।

    दो देशों के मध्य क्रिकेट मैच हो रहा है।  दोनो देशों के निवासी बड़ी तल्लीनता के साथ मैच देख रहे होते हैं। कई घंटे बाद निर्णायक क्षण आता है। जीतनेवाला देश कुछ ही मिनटों में खुशी का इजहार करते हुए करोड़ो रुपए की आतिशबाजी कर लेता है किन्तु प्रतिद्वंदी देश गम में डूबा शोकाकुल मातम मनाता रहता है। ऐसे निर्णायक क्षण को बुरा कहा जाए या अच्छा निर्णय करना आसान नहीं है। इसी तरह बंगला देश के आविर्भाव के समय 1971 में दिसम्बर के पूर्वार्द्ध में एक पखवारे तक दोनो देशों के बीच युद्ध होता रहा जान-माल की हानि होती रही। बंगला देश अस्तित्व में आया। 

    सिद्धांततः भारत की जीत हुई पाकिस्तान की पराजय। किन्तु दोनो ही देशों को भरपूर आर्थिक नुकसान हुआ। इन पंद्रह दिनों की अवघि को किस देश के लिए किस रुप में चिन्हित किया जाए। 15 दिनों के अंदर उल्लिखित अमृत महेन्द्र और सिद्धियोग का भारत और पाकिस्तान के सैनिकों के लिए और बंगला देश के नागरिकों के लिए क्या उपयोगिता रही ?

    इस अवधि में बंगला देश निवासी स्त्री-पुरुषों के साथ पाकिस्तानी सैनिकों का अत्याचार अपनी पराकाष्ठा पर था। क्या फलित ज्योतिष के दैनिक मुहूर्तों का इनपर कोई प्रभाव पड़ सका मुहूर्त के रुप मे छोटे-छोटे अंतराल की चर्चा न कर स्थूल रुप से ही इस लम्बी अवधि तक की युद्ध की विभीषिका को क्या फलित ज्योतिष में एक अनिष्टकर योग के रुप में  चित्रित किया जा सकता है नहीं क्योकि इस घटना का प्रभाव सारे विश्व के लिए एक जैसा नहीं था । न्यूटन के तीसरे नियम के अनुसार प्रत्येक क्रिया के बराबर और विपरीत एक प्रतिक्रिया होती है। यदि यह प्रकृति का नियम है तो समय के छोटे से अंतराल में भी जिसे हम बुरा या अशुभ फल प्रदान करनेवाला कहते हैं किसी न किसी का कल्याण हो रहा होता है।

    अतः किसी भी समय को किसी व्यक्ति विशेष के लिए अच्छा या बुरा समय कहना ज्यादा सटीक होगा। अमृत योग में भी किसी को फांसी पर लटकाया जा सकता है विषयोग में भी कल्याणकारी कार्य हो सकते हैं । किसी वर्ष मक्का-मदीना में गए हजयात्रियों की संख्या 20 लाख थी। गैस-रिसाव से अग्नि प्रज्वलित हुई तथा तेज हवा के झोकों के कारण आग की लपटे हजारो पंडालों तक फैल गयी। इससे 400 तीर्थयात्री मारे गए। शेष हजयात्रा पूरी करके सकुशल वापस आ गए। जो मारे गए वे सीधे जन्नत सिधार गए। उनका संपूर्ण परिवार पीडि़त हुआ। जो घायल हुए वे स्वयं पीडि़त हुए। शेष हादसे से प्रभावित नहीं होने के कारण हजयात्रा की सफलता को उपलब्धि के रुप में लेंगे। सभी अपने अपने दशाकाल के अनुसार फल की प्राप्ति कर रहे थे मुहूर्त के अनुसार उनका फल प्रभावित नहीं हुआ।

    Aaj ka shubh muhurat

    किसी धनाढ्य व्यक्ति के यहां लक्ष्मीपूजन किस समय किया जाए इसके लिए पंडित शुभ मुहूर्त निकाल देते हैं पूजा भी हो जाती है धन की वर्षा भी होने लगती है किन्तु एक पंडित अपने लिए वह शुभ मुहूर्त कभी नहीं निकाल पाता है । यदि पक्के विश्वास की बात होती तो पंडित उस शुभ घड़ी में स्वयं अपने यहां लक्ष्मी-पूजन करता और धन की वर्षा उसी के यहां होती उसे केवल दक्षिणा से संतुष्ट रहने की बात नहीं होती।

    निष्कर्ष यह है कि हर समय का महत्व हर व्यक्ति के लिए अलग-अलग होता है। पंचांग में यदि एक समय को शुभ लिख दिया जाए तो कोई समय शुभ नहीं हो जाएगा। एक समय एक व्यक्ति हॅसता है तो दूसरा रोता है। यात्रा या मुहूर्त के बल पर बुरे समय को अच्छे समय में बदलना कठिन ही नहीं असंभव कार्य है। अपने कर्मफल को भोगने के लिए हम सभी विवश हैं। किसी की यात्रा या मुहूर्त उसी दिन शुरु हो जाता है जिस दिन उसका जन्म पृथ्वी पर होता है। जबतक यह जीवन है हर व्यक्ति अपने यात्रा-पथ में है।

    जन्म के अनुसार संस्कार विचारधारा कर्तब्य सुखदुख सब निर्धारित है। जन्मकालीन ग्रहों द्वारा निर्मित वातावरण इन सबके लिए काफी हद तक जिम्मेवार है। जन्म से मृत्यु तक के यात्रापथ में उसके समस्त कार्यक्रम उसकी सफलता और असफलता तक के क्षणों का निर्धारण लगभग हो चुका होता है। इस बीच यदि कोई बार-बार मुहूर्त की तलाश करता है तो क्या सचमुच अपनी प्रकृति विचारधारा कार्यप्रणाली और मंजिल को बदलने की क्षमता रखता है यदि ये सारे संदर्भ हर समय बदल दिए जाए तो व्यक्ति कहां पहुंचेगा ?

    Shadi-vivah ke muhurt

    पंचांगों में शुभ विवाह के लिए बहुत सारे मुहूर्तों का उल्लेख होता है। वैवाहिक बंधनों में बॅघनेवालों के लिए शुभ तिथियां कुल मिलाकर 40 से 50 के बीच होती हैं। उनमें भी कई प्रकार के दोषों का उल्लेख रहता है। लोग भ्रमजाल में उलझे उनमें से किसी अच्छी तिथि के लिए पंडितों के पास पहुंचते हैं। अभिभावकों के पास पंचांगों में लिखी बातों को मानने के अलावा और कोई उपाय नहीं होता। वैवाहिक संस्कार जीवन का एक बहुत ही महत्वपूर्ण संस्कार है इसका बंधन बहुत ही नाजुक होता है संपूर्ण जीवन पर गहरा प्रभाव डालनेवाला।

    इसलिए लोग शुभलग्न या शुभ तिथियों में ही विवाह निश्चित करते हैं। सीमित तिथियां होने से कभी-कभी एक ही तिथि में शादी की इतनी भीड़ हो जाती है कि हर प्रकार की व्यवस्था में अभिभावकों को काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। उत्सवी वातावरण बोझिल बन जाता है। जिस कार्यक्रम की शुरुआत में ही कष्ट या तनाव हो जाए उसका मनोवैज्ञानिक बुरा प्रभाव भविष्य में भी देखने को मिलता है। शुभ तिथि के चयन में इस बात का सर्वाधिक महत्व होना चाहिए कि वांछित कार्यक्रम का किस प्रकार से समापन हो पर इसका सहारा न लेकर ऊबाऊ मुहूर्त की चर्चा करना समाज में व्यर्थ का बोझ देना है। 

    पंचांग में शुक्र के अस्‍त होने पर शादी के लिए कोई शुभ लग्न पंचांगों में दर्ज नहीं किया जाता है। पर ज्योतिषियों को यह मालूम होना चाहिए कि शुक्र का अस्त होना हर स्थिति में कष्टकर नहीं होता। सूर्य के साथ अंतर्युति करते हुए जब शुक्र अस्त होता है तो वह आम लोगों के लिए कष्टकर हो सकता है किन्तु वही शुक्र सूर्य से बहिर्युति करते हुए जब अस्त हो तो बहुत ही अच्छा फल प्रदान करता है। जब शुक्रास्त सूर्य के साथ बहिर्युति करते होता है तो शुक्र की कमजोरी को दृष्टिकोण में रखकर वैवाहिक शुभ लग्न का उल्लेख नहीं करना अनजाने में बहुत बड़ी भूल होती है। पंचांग निर्माता या फलित ज्योतिष के विशेषज्ञ विभिन्न कारणों से शादी के लिए किसी वर्ष शुभ लग्न की कितनी भी कमी दर्ज क्यों न करें विवाह की कुछ संख्या घट सकती है परंतु होगी तो अवश्य ही और यदि वे लागातार कुछ वर्षों तक शुभ लग्न की कमी दिखलाते रहें तो विवाह बिना लग्न के ही होते देखे जाएंगे।

    Aaj ka shubh muhurat kitne baje hai

    कहने का अभिप्राय यह है कि विधि-निषेध ओर कर्मकाण्ड से संबंधित ज्योतिषीय चर्चा जब भी हो उसका ठोस वैज्ञानिक आधार होना आवश्यक होगा अन्यथा उन नियमों की अवहेलना स्वतः युग के साथ होनी स्वाभाविक है। जब आजतक ग्रह-शक्ति निर्धारण और उनके प्रतिफलन काल से संबंधित ठोस सूत्र ज्योतिषियों को मालूम नहीं है तो मुहूर्त को लेकर तनाव में पड़ने की कोई आवश्यकता नहीं होनी चाहिए। जबतक फलित ज्योतिष को विकसित स्वरुप न प्रदान कर दी जाए यानि ग्रह की इस स्थिति का यह परिणाम होगा यह बात दावे से न कही जा सके तबतक ज्योतिषियों के अधूरे ज्ञान या संशय का लाभ जनता को मिलना चाहिए। अनावश्यक विधि निषेध से संबंधित नियमावलि से आमलोगों को कदापि परेशान नहीं किया जाना चाहिए।

    शादी के लिए कन्या पक्ष और वरपक्ष तैयार है सांसारिक दृष्टि से उसे अंजाम देने में सप्ताह भर का समय काफी है परंतु फिर भी विवाह नहीं हो पा रहा है इसका कारण यह है कि पंचांग में शुभ लगन का अभाव है। इस तरह सिर्फ वैवाहिक लग्न के संदर्भ में ही नहीं अपितु हर प्रकार के कार्यों में पंचांगों में दर्ज मुहूर्तों का अभाव आम जीवन में कई प्रकार की असुविधाओं को जन्म देता है जबकि विश्वासपूर्वक मुहूर्तों की उपयोगिता और प्रभाव को अभी कदापि सिद्ध नहीं किया जा सका है।

    स्मरण रहे हर शुभ मुहूर्त का आधार तिथि नक्षत्र चंद्रमा की स्थिति योगिनी दिशा और ग्रहस्थिति के आधार पर किया गया है किन्तु ग्रह-शक्ति के सबसे बड़े आधार ग्रह की विभिन्न प्रकार की गतियों के आधार पर मुहूर्तों का चयन नहीं हुआ है। अतः अभी तक के मुहूर्त पूर्ण विश्वसनीय नहीं हैं। अभी यह भी अनुसंधान बाकी ही है कि एक व्यक्ति के लिए सभी शुभ मुहूर्त शुभफल ही प्रदान करते हैं अतः कर्मकाण्ड से डरने की कोई आवश्यकता नहीं। विकसित विज्ञान का काम सभी व्यक्तियों के मन से भय को दूर कर मनुष्य को निडर बनाना है। .. और हमें उसी प्रयास में बने रहना चाहिए।

    न तो एक व्यस्त डॉक्टर मुहूर्त देखकर रोगी का ऑपरेशन करता है और न ही एक व्यस्त वकील मुहूर्त देखकर अपने मुकदमें की पैरवी करता है न ही एक कुशल वैज्ञानिक मुहूर्त देखकर उपग्रह या मिसाइल का प्रक्षेपण करते हैं। जो अधिक फुर्सत में होते है वे ही मुहूर्त की तलाश में होते हैं या फिर जिनके आत्मविश्वास में थोड़ी कमी होती है वे ही मुहूर्त की चर्चा करते हैं। योजनाओं के अनुरुप हर प्रकार के संसाधन उपस्थित हो तो किसी भी व्यक्ति को यह समझ लेना चाहिए कि मुहूर्त स्वयं आकर हमारे सामने खड़ा है उसे ढूंढ़ने के लिए पंडित के पास जाने की आवश्यकता नहीं। ऐसी परिस्थिति उत्पन्न होने पर किसी भी व्यक्ति को अपने काम में विलम्ब नहीं करना चाहिए। यह अलग बात हे कि जब योजना को स्वरुप देने में संसाधन की कमी हो रही हो कई तरह की बाधाएं उपस्थित हो रही हो तो ऐसी परिस्थिति में ज्योतिषी से यह सलाह लेने की बात हो सकती है कि निकट भविष्य में कोई शुभ मुहूर्त उसके जीवन में है या नहीं ?   

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      कुंभ लग्‍नवालों के जीवन के विभिन्‍न संदर्भ

       

      Kumbha lagna ki kundli

      Kumbh lagn me chandra ka fal

      आसमान के 300 डिग्री से 330 डिग्री तक के भाग का नामकरण कुंभ राशि  के रूप में किया गया है। जिस बच्‍चे के जन्‍म के समय यह भाग आसमान के पूर्वी क्षितिज में उदित होता दिखाई देता है , उस बच्‍चे का लग्‍न कुंभ माना जाता है। कुंभ लग्‍न की कुंडली के अनुसार मन का स्‍वामी चंद्र षष्‍ठ भाव का स्‍वामी होता है और यह जातक के प्रभाव और रोग , ऋण , शत्रु जैसे हर प्रकार के झंझट का प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए कुंभ लग्‍न के जातकों के मन को पूर्ण तौर पर प्रभावित करने वाले संदर्भ किसी प्रकार के झंझट ही होते हैं। जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में चंद्र के मजबूत रहने पर ऐसे जातकों के समक्ष किसी प्रकार का झंझट उपस्थित नहीं होता , जो मन को खुश रखता है। जबकि जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में चंद्र के मजबूत रहने पर कई तरह के झंझट उपस्थित होकर इनके मन को दुखी करते हैं। 'गत्यात्मक ज्योतिष' चन्द्रमा की शक्ति का निर्णय इसके आकार के आधार पर करता है। अमावस के चन्द्रमा को शुन्य, दोनों अष्टमी के चन्द्रमा को 50 और पूर्णिमा के चन्द्रमा को 100 प्रतिशत गत्यात्मक शक्ति दी जाती है। 


      Kumbha lagna ki kundli


      Kumbh lagna me surya ka fal

      कुंभ लग्‍न की कुंडली के अनुसार समस्‍त जगत में चमक बिखेरने वाला सूर्य सप्‍तम भाव का स्‍वामी होता है और यह जातक के घर गृहस्‍थी का प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए अपने नाम यश को फैलाने के लिए कुंभ लग्‍न के जातक अपनी घर गृहस्‍थी को महत्‍व देते हैं। जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में सूर्य के मजबूत रहने से इनके घर गृहस्‍थी का वातावरण और दाम्‍पत्‍य जीवन बहुत ही उत्‍तम कोटि का और अनुकरणीय होता है , जबकि जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में सूर्य के कमजोर रहने इन्‍हें अपनी दाम्‍पत्‍य जीवन से कष्‍टकर समझौता करने को बाध्‍य होना पडता है।  'गत्यात्मक ज्योतिष' में सूर्य को हर वक्त 50 प्रतिशत गत्यात्मक शक्ति दी जाती है, पर यह जिस ग्रह की राशि में होता है, उससे इन्हे गत्यात्मक शक्ति प्रभावित होकर थोड़ी धनात्मक या ऋणात्मक हो जाती  है। 

      Kumbh lagna me mangal ka fal

      कुंभ लग्‍न की कुंडली के अनुसार मंगल तृतीय और दशम भाव का स्‍वामी होता है और यह जातक के भाई बहन , बंधु बांधव , पिता , समाज और पद प्रतिष्‍ठा का प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए इस लग्‍न के जातकों के परिवेश में भाई , बहन , बंधु बांधव ,  पिता , समाज सभी शामिल होते है। जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में मंगल के मजबूत रहने पर भाई बंहन बंधु बांधवों से लेकर पिता समाज के सारे बुजुर्गों से इनके संबंध अच्‍छे बने होते हैं और इसके कारण प्रतिष्‍ठा के पात्र बनते हैं। विपरीत स्थिति में यानि जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में मंगल के कमजोर रहने पर भाई , बंधु , पिता , समाज या अन्‍य लोगों का कष्‍ट झेलने को इन्‍हे बाध्‍य होना पडता है , इनकी प्रतिष्‍ठा पर भी आंच आती है।  'गत्यात्मक ज्योतिष' मंगल की शक्ति का निर्णय इसके सूर्य के निकट होने या दूर होने से करता है, जन्मकुंडली में मंगल सूर्य के निकट हो तो मंगल को अधिकतम गत्यात्मक शक्ति मिलती है, सूर्य से जितना दूर होता है, शक्ति घटती जाती है, सूर्य और मंगल आमने सामने हो तो मंगल काफी कमजोर होता है। 

      Kumbh lagna me shukra ka fal

      कुंभ लग्‍न की कुंडली के अनुसार शुक्र चतुर्थ और नवम भाव का स्‍वामी है और यह जातक के मातृ पक्ष और हर प्रकार की छोटी बडी संपत्ति , स्‍थायित्‍व के साथ साथ भाग्‍य आदि का प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए कुंभ लग्‍नवालों के हर प्रकार के संपत्ति का उनकी माता या भाग्‍य से संबंध बना होता है। जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में शुक्र के मजबूत रहने पर कुंभ लग्‍नवाले माता या भाग्‍य के सहयोग से हर प्रकार की संपत्ति का सुख प्राप्‍त कर लेते हैं और स्‍थायित्‍व की मजबूती पाते हैं। पर जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में शुक्र कमजोर हो तो मातृ पक्ष से कष्‍ट होता है , उनके साथ विचारों का तालमेल न होने से या भाग्‍य के साथ न देने से हर प्रकार के संपत्ति के सुख में बाधा आती है और स्‍थायित्‍व कमजोर दिखाई पडता है।  'गत्यात्मक ज्योतिष' शुक्र की शक्ति का निर्णय उसकी गति से करता है, शुक्र की गति प्रतिदिन 1 डिग्री से अधिक हो तो शुक्र को अधिक गत्यात्मक शक्ति मिलती है, प्रतिदिन 1 डिग्री हो तो 50 प्रतिशत , यदि गति 1 डिग्री से कम होने लगती है तो गत्यात्मक शक्ति भी कम होने लगती  है, जैसे ही शुक्र वक्री होता है तेजी से घटती हुई गत्यात्मक शक्ति शुन्य हो जाती है। 

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      Kumbh lagna me budh ka fal

      कुंभ लग्‍न की कुंडली के अनुसार बुध पंचम और नवम भाव का स्‍वामी है और यह जातक के बुद्धि , ज्ञान संतान और जीवनशैली का  प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए इस लग्‍न के जातक अपनी बुद्धि का उपयोग हमेशा जीवनशैली को सुधारने के लिए करते हैं। यही कारण है कि हमारे देश में अधिकांश चिंतकों और विचारकों ने कुंभ लग्‍न में ही जन्‍म लिया था। ये ऐसी जीवनशैली पर विश्‍वास रखते हैं , जो आनेवाली पीढी को अधिक सक्षम बना सके। जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में बुध के मजबूत रहने पर ऐसे जातकों की अपनी बुद्धि , ज्ञान की मजबूती के साथ साथ संतान के मामलों की मजबूती भी देखने को मिलती है , इनकी जीवनशैली मजबूत होती है। जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में बुध के कमजोर रहने पर जातक खुद तो दिमाग से कमजोर होता ही है , संतान पक्ष से भी बडी उम्‍मीद नहीं रख पाता और उसकी जीवनशैली में सुधार नहीं हो पाता।  'गत्यात्मक ज्योतिष' बुध की शक्ति का निर्णय उसकी गति से करता है, बुध की गति प्रतिदिन 1 डिग्री से अधिक हो तो बुध को अधिक गत्यात्मक शक्ति मिलती है, प्रतिदिन 1 डिग्री हो तो 50 प्रतिशत , यदि गति 1 डिग्री से कम होने लगती है तो गत्यात्मक शक्ति भी कम होने लगती  है, जैसे ही बुध वक्री होता है तेजी से घटती हुई इसकी गत्यात्मक शक्ति शून्य हो जाती है। 

      Kumbh lagna me guru ka fal

      कुंभ लग्‍न की कुंडली के अनुसार बृहस्‍पति द्वितीय और एकादश भाव का स्‍वामी होता है और यह जातक के धन , कोष , लाभ के मामलों का प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए कुंभ लग्‍न के जातकों के धन कोष का लाभ से और लाभ का धन कोष से संबंध बना होता है। जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में बृहस्‍पति के मजबूत होने पर कुंभ लग्‍न के जातक संसाधन वाले परिवार में जन्‍म लेते हैं , जिससे इन्‍हें लाभ को लेकर कोई चिंता नहीं होती। सतत लाभ से इनका कोष मजबूत बना होता है। इसके विपरीत , जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में बृहस्‍पति के कमजोर होने पर कुंभ लग्‍नवाले जातक के समक्ष संसाधन हीनता की स्थिति होती है , जिससे इनका लाभ प्रभावित होता है और इनके कोष पर बुरा प्रभाव पडता है।  'गत्यात्मक ज्योतिष' गुरु की शक्ति का निर्णय इसके सूर्य के निकट होने या दूर होने से करता है, जन्मकुंडली में गुरु सूर्य के निकट हो तो गुरु को अधिकतम गत्यात्मक शक्ति मिलती है, सूर्य से जितना दूर होता है, शक्ति घटती जाती है, सूर्य और गुरु आमने सामने हो तो गुरु काफी कमजोर होता है। 

      ज्योतिष में हुए नए रिसर्च, गत्यात्मक ज्योतिष के बारे में अधिक जानने के लिए ये लेख अवश्य पढ़ें  ------

      Kumbh lagna me shani ka fal

      कुंभ लग्‍न की कुंडली के अनुसार शनि प्रथम और द्वादश भाव का स्‍वामी होता है यानि यह जातक के शरीर , व्‍यक्तित्‍व , खर्च और बाहरी संदर्भों आदि मामलों का प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए इस लग्‍नवाले जातकों की अपने स्‍वास्‍थ्‍य या व्‍यक्तित्‍व को मजबूती देने में अधिक से अधिक खर्च करने की प्रवृत्ति होती है । जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में शनि के मजबूत रहने पर ऐसे जातकों का स्‍वास्‍थ्‍य अच्‍छा रहता है , खर्च शक्ति के बने होने से और खाने पीने के सुख से आत्‍मविश्‍वास में बढोत्‍तरी होती है। पर जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में शनि के कमजोर रहने पर मकर लग्‍नवालों के स्‍वास्‍थ्‍य में कमजोरी बनी रहती है , खर्चशक्ति की कमी से आत्‍मविश्‍वास कमजोर होता है।   'गत्यात्मक ज्योतिष' शनि की शक्ति का निर्णय इसके सूर्य के निकट होने या दूर होने से करता है, जन्मकुंडली में शनि सूर्य के निकट हो तो  शनि को अधिकतम गत्यात्मक शक्ति मिलती है, सूर्य से जितना दूर होता है, शक्ति घटती जाती है, सूर्य और  शनि आमने सामने हो तो शनि काफी कमजोर होता है। 

      ज्योतिष में सभी लग्न की कुंडलियों के बारे में पढ़ने के लिए  यहाँ क्लिक कर सकते हैं। लेकिन ग्रह कमजोर है या मजबूत, इसका पता आंशिक तौर पर हमारे योगकारक ग्रहों का प्रभाव  लेख से मालूम हो सकता है, पर ग्रहों की गत्यात्मक और स्थैतिक शक्ति की जानकारी के लिए हमारे केंद्र से जन्मकुंडली बनवाना आवश्यक है!

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        कुंभ लग्‍न की कुंडली भारतीयों के जीवनशैली

         

        India horoscope

        आजादी मिलने के वक्‍त की गंहस्थिति पर ध्‍यान दिया जाए तो भारतवर्ष की जन्‍मकुंडली भले ही वृषभ लग्न और कर्क राशि की बनें और उसके अनुसार सभी ज्‍योतिषी भारतवर्ष के बारे में भविष्‍यवाणी करने को बाध्‍य हों ,पर गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' की मान्‍यता है कि भारत के अलग होने के आधार पर यानि देश के विस्‍तार के कम या अधिक हो जाने से उसकी नई जन्‍मकुंडली नहीं बनायी जानी चाहिए। मैने पिछले दिनों सभी लग्‍नवालों की विशेषताओं की चर्चा करते हुए 12 लेख लिखे ,पहले ही लेख में तर्क दिए गए थे कि मनुष्‍य की जीवनशैली मेष लग्‍न की जन्‍मकुंडली की जीवनशैली से मेल खाती है। इन्‍हीं लेखों के आधार पर कहा जा सकता है कि भारतवासियों की जीवनशैली पूर्ण तौर पर कुंभ लग्‍न की जन्‍मकुंडली का प्रतिनिधित्‍व करती है और इस आधार पर भारतवर्ष का जन्‍म लग्‍न कुंभ होना चाहिए। इसलिए कुंभ लग्‍न के हिसाब से विभिन्‍न भावों में गोचर के ग्रहों की स्थिति के आधार पर भारतवर्ष के बारे में भविष्‍यवाणी की जानी चाहिए। इस मान्‍यता के पक्ष में ये तर्क दिए जा सकते हैं ....

        India horoscope

        Kumbh Lagna ki kundli me Chandra

        कुंभ लग्‍न की कुंडली के अनुसार एक जातक के स्‍वभाव के बारे में आपने पढा। कुंभ लग्‍नवालों के मन का स्‍वामी चंद्र षष्‍ठ भाव का स्‍वामी होता है और यह जातक के प्रभाव और रोग , ऋण , शत्रु जैसे हर प्रकार के झंझट का प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए कुंभ लग्‍न के जातकों के मन को पूर्ण तौर पर प्रभावित करने वाले संदर्भ किसी प्रकार के झंझट ही होते हैं। रोग , ऋण या शत्रु जैसे झंझट न होने पर मन को खुशी मिलती है , जबकि झंझट उपस्थित होकर इनके मन को दुखी करते हैं। भारतवासियों को भी किसी प्रकार के झंझट लेने की इच्‍छा नहीं होती , ये रोग के इलाज के लिए नहीं , रोग से बचने के लिए परहेज पर विश्‍वास रखते हैं , ऋण लेने को बडी मुसीबत मानते हैं , शत्रुता जैसे झंझट से दूर रहना पसंद करते हैं , हजारों साल का इतिहास गवाह है कि इन्‍होने आजतक कहीं भी आक्रमण नहीं किया।

        Kumbh Lagna me Surya ka fal

        कुंभ लग्‍न की कुंडली के अनुसार समस्‍त जगत में चमक बिखेरने वाला सूर्य सप्‍तम भाव का स्‍वामी होता है और यह जातक के घर गृहस्‍थी का प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए अपने नाम यश को फैलाने के लिए कुंभ लग्‍न के जातक अपने घर गृहस्‍थी को महत्‍व देते हैं। घर गृहस्‍थी का वातावरण और दाम्‍पत्‍य जीवन बहुत ही उत्‍तम कोटि का और अनुकरणीय होता है , भले ही सूर्य कमजोर रहने पर इन्‍हें अपनी दाम्‍पत्‍य जीवन से कष्‍टकर समझौता करने को बाध्‍य होना पडे। भारतवासी भी अपनी घर गृहस्‍थी को इतना महत्‍व देते हैं कि यहां कष्‍टकर समझौता भी इन्‍हें मंजूर होता है , जो अनुकरणीय है।

        Kumbh lagna me Mangal ka fal

        कुंभ लग्‍न की कुंडली के अनुसार मंगल तृतीय और दशम भाव का स्‍वामी होता है और यह जातक के भाई बहन , बंधु बांधव , पिता , समाज और पद प्रतिष्‍ठा का प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए इस लग्‍न के जातकों के परिवेश में भाई , बहन , बंधु बांधव , पिता , समाज सभी शामिल होते है , चाहे मंगल के मजबूत होने से भाई बंहन बंधु बांधवों से लेकर पिता समाज के सारे बुजुर्गों से इनके संबंध अच्‍छे बने हों और इसके कारण प्रतिष्‍ठा के पात्र हों , या फिर मंगल के कमजोर होने पर भाई , बंधु , पिता , समाज या अन्‍य लोगों का कष्‍ट झेलने को इन्‍हे बाध्‍य होना पडता है , इनकी प्रतिष्‍ठा पर भी आंच आए। पर भाई बहन बंधु बांधव और सामाजिकता के बिना एक भारतीय नहीं रह सकता।

        Kumbh lagna me Shukra ka fal

        कुंभ लग्‍न की कुंडली के अनुसार शुक्र चतुर्थ और नवम भाव का स्‍वामी है और यह जातक के मातृ पक्ष और हर प्रकार की छोटी बडी संपत्ति , स्‍थायित्‍व के साथ साथ भाग्‍य आदि का प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए कुंभ लग्‍नवालों के हर प्रकार के संपत्ति का उनकी माता या भाग्‍य से संबंध बना होता है। कुंभ लग्‍नवाले माता या भाग्‍य के सहयोग से हर प्रकार की संपत्ति का सुख प्राप्‍त कर लेते हैं और स्‍थायित्‍व की मजबूती पाते हैं। यदि भाग्‍य के साथ न देने से हर प्रकार के संपत्ति के सुख में बाधा हो और स्‍थायित्‍व कमजोर दिखाई पडे । एक भारतवासी के संदर्भ में भी देखें तो इन्‍हें भाग्‍य से ही इन्‍हें प्राकृतिक संपदा प्राप्‍त है , जो जिस क्षेत्र में हैं , उसी क्षेत्र में किसी न किसी प्रकार का प्रचुर भंडार उपलब्‍ध हैं। कभी प्राकृतिक विपत्ति का सामना करना भी पडे तो इतने बडे साधन संपन्‍न भारतवर्ष में उन्‍हें गुजारे की दिक्‍कत नहीं होती।

        'गत्यात्मक गोचर प्रणाली' पर आधारित प्रतिदिन, प्रतिमाह और प्रतिवर्ष जीवन के हर मामले के भविष्यफल को समझने के लिए इस एप्प को इनस्टॉल करें !

        Kumbh Lagna me Budh ka fal

        कुंभ लग्‍न की कुंडली के अनुसार बुध पंचम और नवम भाव का स्‍वामी है और यह जातक के बुद्धि , ज्ञान संतान और जीवनशैली का प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए इस लग्‍न के जातक अपनी बुद्धि का उपयोग हमेशा जीवनशैली को सुधारने के लिए करते हैं। यही कारण है कि हमारे देश में अधिकांश चिंतकों और विचारकों ने कुंभ लग्‍न में ही जन्‍म लिया था और उन्‍होने अपने ज्ञान का उपयोग भौतिक या अन्‍य सुख के लिए नहीं , सिर्फ और सिर्फ जीवनशैली को सुधारने के लिए किया। कुंभ लग्‍नवालों की तरह ही भारतीय ऐसी जीवनशैली पर विश्‍वास रखते हैं , जो आनेवाली पीढी को अधिक सक्षम बना सके। हजारो वर्षों से भारतवासियों ने भी अपने दिमाग का पूरा उपयोग जीवनशैली को मजबूत बनाने में किया है , ताकि आनेवाली पीढी शारीरिक मानसिक और आर्थिक तौर पर अधिक मजबूत हो सके।

        Kumbh Lagna me Guru ka fal

        कुंभ लग्‍न की कुंडली के अनुसार बृहस्‍पति द्वितीय और एकादश भाव का स्‍वामी होता है और यह जातक के धन , कोष , लाभ के मामलों का प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए कुंभ लग्‍न के जातकों के धन कोष का लाभ से और लाभ का धन कोष से संबंध बना होता है। कुंभ लग्‍न के जातक संसाधन वाले परिवार में जन्‍म लेते हैं , जिससे इन्‍हें लाभ को लेकर कोई चिंता नहीं होती , सतत लाभ से इनका कोष मजबूत बना होता है। संसाधन हीनता से इनका लाभ प्रभावित होता है तो इनके कोष पर बुरा प्रभाव पडता है। भारतवासियों को भी लाभ संसाधन के बल पर ही मिलता आ रहा है , कभी किसी प्रकार की आपत्ति में एक क्षेत्र के लोगों का लाभ भले ही प्रभावित हो जाए , पर उन्‍हे दूसरे क्षेत्र से संरक्षण मिल ही जाता है।

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        Kumbh Lagna me Shani ka fal

        कुंभ लग्‍न की कुंडली के अनुसार शनि प्रथम और द्वादश भाव का स्‍वामी होता है यानि यह जातक के शरीर , व्‍यक्तित्‍व , खर्च और बाहरी संदर्भों आदि मामलों का प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए इस लग्‍नवाले जातकों की अपने स्‍वास्‍थ्‍य या व्‍यक्तित्‍व को मजबूती देने में अधिक से अधिक खर्च करने की प्रवृत्ति होती है। जातकों का स्‍वास्‍थ्‍य अच्‍छा रहता है , खर्च शक्ति के बने होने से और खाने पीने के सुख से आत्‍मविश्‍वास में बढोत्‍तरी होती है। कभी कभार कुंभ लग्‍नवालों के स्‍वास्‍थ्‍य में कमजोरी बनी रहती है , खर्चशक्ति की कमी से आत्‍मविश्‍वास कमजोर होता है। भारतवासियों के संदर्भ में देखा जाए , तो आजतक इनका खर्च भोजन में ही होता आया है। इनमें स्‍वास्‍थ्‍य के मामलों को गंभीरता से देखने की प्रवृत्ति मौजूद है , स्‍वास्‍थ्‍य के अलावे दूसरी जगह पर इनका खर्च बहुत कम होता है।

        Kundli India

        देश की तरह ही अपने अपने परिवार या समाज के हिसाब से , धर्म के हिसाब से माता और पिता के विचारों के हिसाब से भी अलग अलग लग्‍नानुसार हर व्‍यक्ति जीता है। मानव जाति के हिसाब से हममें से हर किसी की शैली मेष लग्‍न के अनुरूप होती है , पुन: भारतवासी होने के हिसाब से कुंभ लग्‍न के अनुरूप और अपने अपने धर्म , समाज या परिवार के हिंसाब से माता , पिता को प्रतिनिधित्‍व करनेवाले लग्‍न का भी छाप हमपर पडता है। पर मूल तौर पर अपने जन्‍मकालीन लग्‍न के हिसाब से जीने की सभी मनुष्‍यों की अपनी प्रवृत्ति होती है , क्‍यूंकि इन सबके बावजूद हर कोई अलग अलग बीज होता है और उसका निर्धारण लग्‍नकुंडली से ही किया जा सकता है, ठीक वैसे ही जैसे विशेष तौर पर विकसित किए गए लंगडे आम के पेड में कुछ गुण पेड के हिसाब से , कुछ आम के हिसाब से और कुछ अपनी जाति के हिसाब से होते हैं , पर उनमें मुख्‍य खूबी वह होती है , जिस गुण के कारण उसका अस्तित्‍व होता है।

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          'लग्‍नचंदा योग'

           

          Same rashi same lagna

          किसी भी कुंडली में यह स्थिति तब बनती है, ज़ब बालक के जन्म के समय पूर्वी क्षितिज पर लग्न के साथ चन्द्रमा का भी उदय हो रहा हो! ऐसी स्थिति में बालक की लग्नकुंडली और चन्द्रकुंडली एक ही होती है! यदि लग्न  के आसपास ही सूर्य भी स्थित हो तो चन्द्रमा कमजोर तथा लग्न के विपरीत दिशा में सूर्य स्थित हो तो चन्द्रमा मजबूत माना जाता है! 

          क्षेत्रीय भाषाओं में बहुत नाज नखरों से पालन पोषण होनेवाले दुलारे बच्‍चे को 'लगनचंदा बच्‍चा' कहा जाता है , किसी बच्‍चे की जिद को देखकर उसे डांटते हुए यह भी कहा जाता है कि तुम 'लगनचंदा' नहीं हो , जो तुम्‍हारी हर जरूरत पूरी हो जाएगी। इस शब्‍द के इतने लोकप्रिय होने के बावजूद आपमें से शायद ही कोई जानते होंगे कि 'लगनचंदा योग' का क्‍या मतलब है ?

          मैं अपने एक आलेख में पहले ही बता चुकी हूं कि ज्‍योतिष में आसमान के बारहों राशियों में से जिसका उदय बालक के जन्‍म के समय पूर्वी क्षितिज पर होता रहता है , उसे बालक का लग्‍न कहते हैं। अब इसी लग्‍न में यानि उदित होती राशि में च्रद्रमा की स्थिति हो , तो बालक की 'जन्‍मकुंडली' में लग्‍नचंदायोग बन जाता है , जिसे ही क्षेत्रीय भाषा में 'लगनचंदा योग' कहते हैं।

          Same rashi same lagna


          Lagan chanda

          यदि संभावनावाद की दृष्टि से यहां भी विचार किया जाए , तो किसी भी कुंडली में बारह भाव होते हैं और किसी भी भाव में किसी ग्रह के बैठने की संभावना 1/12 होती है। इस हिसाब से लगनचंदा योग भी 12 में से एक बच्‍चे का होता है , यानि 8 प्रतिशत से अधिक बच्‍चे 'लगनचंदा योग ' में आ जाते हैं। पर हम इस वास्‍तविक दुनिया को देखेंगे , तो अहसास होगा कि 8 प्रतिशत बच्‍चों को मुंहमांगी मुराद पूरी नहीं होती है , तो इसका अर्थ क्‍या यह माना जाए कि इस योग में कोई सच्‍चाई नहीं !

          नहीं, ऐसी बात नहीं है , 'लग्‍नचंदा योग' किसी भी व्‍यक्ति के बाल्‍यावस्‍था में बच्चे के पालन पोषण के फलस्‍वरूप उसके मनोवैज्ञानिक विकास में बहुत ही सकारात्‍मक प्रभाव डालता है , लेकिन इसके लिए जन्‍मकुंडली में चंद्रमा की स्थिति को मजबूत होना चाहिए। यदि चंद्रमा मजबूत हो , तो बालक पर 'लग्‍नचंदा योग' का पूरा प्रभाव पडेगा , जबकि चंद्रमा कमजोर हो तो 'लग्‍नचंदा योग' के प्रभाव में बाधा दिखाई दे सकती है।

          Weak moon

          चंद्रमा की शक्ति का निर्णय हम उसके आकार के आधार पर कर सकते हैं। इस हिसाब से जब चंद्रमा अमावस्‍या के आसपास का हो , तो वह कमजोर होता है , जबकि पूर्णिमा के आसपास का हो , तो वह मजबूत होता है। कमजोर चंद्रमा लग्‍न में हो , तो बालक को  बुरा फल तथा मजबूत चंद्रमा लग्‍न में हो , तो बालक को अच्‍छा फल प्रदान करता है। सामान्‍य होने पर सामान्‍य ढंग का फल प्राप्‍त होता है।

          Strong moon

          मजबूत चंद्रमा के साथ का 'लग्‍नचंदा योग' मेष लग्‍नवालों के लिए माता से सुख और लगाव, वृष लग्‍नवालों के लिए भाई बहनों  से सुख और लगाव , मिथुन लग्‍नवालों के लिए धन  से सुख और लगाव , कर्क लग्‍नवालों के लिए स्‍वास्‍थ्‍य  से सुख और लगाव, सिंह लग्‍नवालों के लिए  से सुख और लगाव , कन्‍या लग्‍न वालों के लिए लाभ  से सुख और लगाव , तुला लग्‍नवालों के लिए पिता  से सुख और लगाव, वृश्चिक लग्‍नवालों के लिए भाग्‍य  से सुख और लगाव , धनु लग्‍नवालों के लिए जीवन शैली  से सुख और लगाव , मकर लग्‍नवालों के लिए घरेलू मामलों  से सुख और लगाव , कुंभ लग्‍नवालों के लिए रोग प्रतिरोधक क्षमता  से सुख और लगाव तथा मीन लग्‍नवालों के लिए बुद्धि  से सुख और लगाव भरपूर रहता है , जबकि कमजोर चंद्रमा के साथ का 'लग्‍नचंदा योग' लगाव के बावजूद बचपन में इन सुखों में कमी का अहसास देता है।

          Lagnachanda yog

           वैसे तो ज्योतिष में छठे भाव में ग्रहों की उपस्थिति को अच्छा नहीं माना जाया, पर अच्‍छे 'लग्‍नचंदा योग' के साथ यदि षष्‍ठ भाव में अधिकांश ग्रहों की स्थिति हो तो इस योग का प्रभाव और अधिक पडता है। ऐसे बच्‍चे शरीर से स्‍वस्‍थ , अपने मा पिताजी और परिवार वालों के लाडले , हर प्रकार की सुख सुविधा में जीवन यापन करने वाले होते हैं। उनके बचपन में पालन पोषण के वक्‍त लाड प्‍यार का क्‍या कहना ??  

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