मेरे द्वारा रची गयी गत्‍यात्‍मक भृगुसंहिता नष्‍ट

 

Bhrigu Samhita online reading

गत्यात्मक ज्योतिष ने आज के आधुनिक युग के अनुरूप गत्यात्मक भृगु संहिता के लेखन की दिशा में बड़ा काम किया है। पिछले दो कडी में मैने भृगुसंहिता के बारे में कुछ जानकारियां दी थी , पर दूसरे सामयिक मुद्दों में व्‍यस्‍तता बन जाने से उसकी आगे की कडी में रूकावट आ गयी थी। जहां पहली कडी में मैने इस कालजयी रचना के आधार को बताया था , वहीं दूसरी कडी में मैने अपने पिताजी के द्वारा लिखी जा रही गत्‍यात्‍मक भृगुसंहिता के अधूरे ही रह जाने की जानकारी दी थी। 

अपनी जबाबदेही के समाप्‍त होने के बावजूद प्रकाशकों के किसी प्रकार की दिलचस्‍पी न लेने से मेरे पिताजी गत्‍यात्‍मक भृगुसंहिता का आधा भाग लिखने के बाद उसे और आगे न बढा सके तथा उनके द्वारा लिखा गया गत्‍यात्‍मक भृगुसंहिता का आधा भाग मेरे पास ज्‍यों का त्‍यों सुरक्षित रहा। उनके अधूरे सपने को पूरा करने की दृढ इच्‍छा होने के कारण इस गत्‍यात्‍मक भृगुसंहिता को भी पूरा करने की लालसा मेरे भीतर उमडती तो अवश्‍य थी , पर मुझमें इतनी योग्‍यता भी नहीं थी कि उनकी भाषा से सामंजस्‍य बनाकर इसका आधा भाग लिख सकूं और पिताजी आगे बढने को तैयार ही नहीं थे, इस कारण मैं मायूस थी।

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पर जीवन में नित्‍य नए नए प्रयोग करते रहने के शौक ने मुझे शांत बैठने नहीं दिया और मैने ’गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ के सूत्रों को कंप्‍यूटर में डालकर उसके द्वारा किसी व्‍यक्ति के जीवन के उतार चढाव और अन्‍य प्रकार के सुख दुख से संबंधित ग्राफों को प्राप्‍त करने के लिए 2002 में कंप्‍यूटर इंस्‍टीच्‍यूट में दाखिला ले लिया। 2003 में मैने एम एस आफिस सीखने के क्रम में ही ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ के सूत्रों पर आधारित मैने पहला प्रोग्राम एम एस एक्‍सेल की शीट पर बनाया , जिसमें जन्‍मविवरण डालने के बाद कुछ मेहनत भी करनी पडती थी , पर वह हमारे सिद्धांतों के अनुरूप ही हर प्रकार के ग्राफ देने में सफल था। पर मुख्‍य मुद्दा तो उसके लिए भविष्‍यवाणियां दे पाना था , जिसके लिए एक्‍सेल ही पर्याप्‍त नहीं था।

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जब मै एम एस वर्ड के 'मेल मर्ज' प्रोग्राम को समझने में समर्थ हुई , भृगुसंहिता तैयार करने के लिए एक शार्टकट रास्‍ता नजर आ ही गया। पिताजी के द्वारा छह लग्‍न तक के तैयार किए गए वाक्‍यों को चुन चुनकर 'मेल मर्ज' का उपयोग करके बारहों लग्‍न तक की भविष्‍यवाणियां तैयार की जा सकती थी। 

पर भले ही यह शार्टकट था , पर इसमें भी कम मेहनत नहीं लगनी थी , क्‍यूंकि जहां भृगुसंहिता के ओरिजिनल में 1296 प्रकार के फलादेश और पिताजी के लिखे गत्‍यात्‍मक भृगुसंहिता में 2016 अनुच्‍छेद होते , वहीं मेरे द्वारा कंप्‍यूटर में तैयार होनेवाले इस गत्‍यात्‍मक भृगुसंहिता में 40,320 अनुच्‍छेद या इसे पृष्‍ठ ही कहें , क्‍यूंकि तबतक ग्रहों की अन्‍य कई प्रकार की शक्तियों की खोज की जा चुकी थी।

 पिताजी के लिखे भाग से मुख्‍य वाक्‍यों को श्रेणी बनाकर अलग करना , उसे एम एस एक्‍सेल में ग्रहों की शक्ति के आधार पर 40 तरह के शीट बनाकर 12 ग्रहों * 12 राशियों = 144 सेल तक लिखना , फिर सभी ग्रहों की 7 ग्रहों के बारे में अगले पन्‍नों पर भिन्‍न भिन्‍न बातों को लिखकर उससे उन 144 शीटों का मेल मर्ज करना आसान तो नहीं था, मुझे इसमें एक वर्ष से उपर ही लगे। पर इससे 12 * 12 * 7 * 40 = 40,320 पन्‍नों की एक भृगुसंहिता तैयार हो गयी , अपने सपने को पूरा हुआ देखकर मुझे खुशी तो बहुत हुई ,मुझे लगा की इस प्रकार मैं गत्यात्मक भृगु संहिता को ऑनलाइन एक एक तक पहुंचा सकती हूँ।

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पर इसे पढने पर मुझे ऐसा महसूस हुआ कि इसे बनाने में मुझे थोडा समय और देना चाहिए था, लेकिन मैं आत्म विश्वास में थी कि ऐसा करना संभव है। खुद की लिखी भाषा और कंप्‍यूटर के द्वारा तैयार की जानेवाली भाषा में कुछ तो अंतर होता ही है , भविष्‍यवाणियां बहुत स्‍वाभाविक ढंग से लिखी गयी नहीं लग रही थी , पर प्रयोग के समय एक एक अनुच्‍छेद को एडिट करते हुए इसे सामान्‍य बनाना कठिन भी नहीं था। कुछ दिनों तक एडिट कर और प्रिंट निकालकर मैने इसकी भविष्‍यवाणियां लोगों को वितरित भी की , खासकर भविष्‍यवाणियों का उम्र के साथ तालमेल काफी अच्‍छा था , जो इसे लोकप्रिय बनाने के लिए काफी था। लोग ऑनलाइन इसे पढ़ सकते थे।

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‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ के अनुसार एक्‍सेल प्रोग्राम में किसी व्‍यक्ति का जीवन ग्राफ जो भी दर्शाता था , उसे यह प्रोग्राम शब्‍दों में बखूबी अभिव्‍यक्‍त कर देता था। यह प्रोग्राम अंदर किसी फोल्‍डर में पडा था , बार बार प्रयोग के क्रम में दिक्‍कत होने से मैने डेस्‍कटाप पर ही इसका शार्टकट बना लिया था। पहली बार कंप्‍यूटर को फारमैट करने की नौबत आयी , सारे फाइलों को सीडी में राइट करके रखा गया , पर अनुभवहीनता के कारण इस प्रोग्राम को कापी करने की जगह इसकेशार्टकट को ही कापी कर लिया गया और कंप्‍यूटर फारमैट हो गया और इसके साथ ही सारी मेहनत फिर से बेकार। 

पर 40 शीटों के एक्‍सेल के उस फाइल का सीडी में बच जाना बहुत राहत देनेवाला था, क्‍यूंकि उसके सहारे कभी भी नई गत्‍यात्‍मक भृगुसंहिता तैयार की जा सकती थी। लेकिन अधिक तैयारी करने में अधिक देर हो जाती है , पर अभी तक उसपर काम करना संभव न हो सका। अगली कडी में इस बात की चर्चा करूंगी कि गत्‍यात्‍मक भृगुसंहिता के निर्माण के लिए मेरा अगला कदम क्‍या होगा ??

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    आधी-अधूरी गत्‍यात्‍मक भृगु संहिता

     Bhrigu Samhita kundli in Hindi

    मेरे पिछले पोस्‍ट में आपलोगों ने महर्षि भृगु द्वारा उस युग के अनुरूप लिखी गयी ‘भृगुसंहिता’ ग्रंथ के बारे में जानकारी प्राप्‍त की , भविष्‍यवाणियों के लिए यह एक बहुत ही अच्‍छी पांडुलिपी रही होगी । पर इसे आधुनिक युग की जीवनशैली के सापेक्ष देखा जाए , तो उसमें बहुत सारी खूबियों के साथ ही साथ कुछ कमियां भी दिखाई पडने लगी। इसका मुख्‍य कारण यही था कि इस ग्रंथ में ग्रहों की स्थिति के आधार पर ही फलाफल की चर्चा की गयी थी , जिसकी चर्चा मैं पिछले पोस्‍ट में कर चुकी हूं । वैसे षष्‍ठ , अष्‍टम और द्वादश भाव की नयी व्‍याख्‍या करते हुए मैने एक और लेख लिखा है , जिसे अवश्‍य पढ लें , क्‍यूंकि इसे पढ लेने पर यह बात और स्‍पष्‍ट हो जाएगी कि ज्‍योतिष के प्राचीन सिद्धांतों को आज की कसौटी पर कसना क्‍यूं आवश्‍यक है। गत्यात्मक ज्योतिष यह काम बखूबी क्र रहा है। 

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    ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ के अनुसार भृगु संहिता कुंडली को पढ़ने के लिए ग्रहों की शक्ति के आकलन और खासकर ग्रह जिस राशि में स्थित हों , उसके राशिश के सापेक्षिक शक्ति के आकलन के सूत्र की खोज के बाद 1990 में ही यह स्‍पष्‍ट हो गया था कि एक ही स्थिति में होने के बावजूद सारे ग्रह कब धनात्‍मक प्रभाव दे सकते हैं और कब ऋणात्‍मक। इसलिए इस आधार पर भविष्‍यवाणी किया जाना अधिक उपयुक्‍त हो सकता है , इसे ध्‍यान में रखते हुए श्री विद्यासागर महथा जी के द्वारा एक नई गत्यात्मक भृगुसंहिता कुंडली रचने की दिशा में लेखन शुरू कर दिया गया। 1996 में जब मेरी पुस्‍तक प्रकाशित हुई, तो उसके प्रस्‍तावना में उन्‍होने बहुत जल्‍द निकट भविष्‍य में ही ‘गत्‍यात्‍मक भृगुसंहिता’ को बाजार में उपलब्‍ध कराने का पाठकों से वादा भी किया था।

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    चूंकि राहू और केतु के प्रभाव को ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ अभी तक स्‍पष्‍टत: नहीं समझ सका है , इसलिए इसकी चर्चा इस पुस्‍तक में नहीं की जा रही थी। पर अन्‍य सातों ग्रहों के बारह राशियों और बारह लग्‍नानुसार ग्रहों के धनात्‍मक और ऋणात्‍मक फलाफल को देखते हुए 7*12*12*2 = 2016 अनुच्‍छेद लिखकर ही इस ग्रंथ को पूरा किया जा सकता था। अपने पूरे जुनून और दृढ इच्‍छा शक्ति के बावजूद बहुत ही सटीक ढंग से वे इसे आधा (कन्‍या लग्‍न तक) यानि 1000 अनुच्‍देद ही पूरा कर सके थे कि कुछ पारिवारिक जबाबदेहियां पुन: उनका रास्‍ता रोककर खडी हो गयी । वैसे इस हालत में भी उस भृगुसंहिता का एक भाग तो प्रकाशित किया ही जा सकता था , पर उसे पूर्ण तौर पर समझने के लिए ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ के मूल नियमों को समझना आवश्‍यक था , जिसके लिए एक अन्‍य पुस्‍तक को प्रकाशित करना आवश्‍यक था , जो पहले से ही लिखी जा चुकी थी।

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    पर आश्‍चर्य की बात है कि बोकारो से भेजी गयी मुझ जैसी अनुभवहीन लेखिका की पहली पुस्‍तक ‘गत्‍यात्‍मक दशा पद्धति : ग्रहों का प्रभाव’ को पहली बार में ही एक प्रकाशक ने प्रकाशित कर दिया , पर 1975 में अपने पांच लेखों के आधार पर पूरे भारतवर्ष के ज्‍योतिषियों के मध्‍य प्रथम पुरस्‍कार जीतनेवाले और 80 के दशक में ही अपनी मौलिकता के लिए सभी वरिष्‍ठ ज्‍योतिषियों के मध्‍य चर्चित रहे श्री विद्यासागर महथा जी की पुस्‍तकों को बिना किसी शर्त के भी प्रकाशित करने में दिल्‍ली के इतने सारे प्रकाशकों में से किसी ने कोई दिलचस्‍पी नहीं ली , जबकि वे उन दिनों दिल्‍ली में ही निवास कर रहे थे। इस पुस्‍तक को प्रकाशित करने में प्रकाशकों के सामने जो समस्‍या आ रही थी , उसका उन्‍होने खुलकर जिक्र किया था , जिसकी चर्चा करना उचित नहीं ।

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    प्रकाशकों की उपेक्षा को देखते हुए उनके कई मित्रों ने इस पुस्‍तक को स्‍वयं प्रकाशित करने की सलाह दी , पर जहां एक ओर उस पुस्‍तक को समझने के लिए ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ के सिद्धांतों को समझना आवश्‍यक था , वहीं इस नई पद्धति के लिए प्रचुर प्रचार प्रसार की भी आवश्‍यकता थी। इतनी मेहनत कर पाने में जहां एक ओर दिन ब दिन उनकी उम्र का बढोत्‍तरी और व्‍यावहारिक मामलों की कमी जबाब देता जा रहा था , वहां मैं भी अपनी पारिवारिक जिम्‍मेदारियों यानि दोनो बेटों के पालन पोषण में फंसते चले जाने से समय की कमी महसूस कर रही थी। पुस्‍तकों के प्रकाशित नहीं हो पाने के कारण उनके उत्‍साह में थोडी कमी का आना स्‍वाभाविक था , इस कारण उनके प्रशंसकों के लगातार पत्र आने और मेरे लाख अनुरोध के बावजूद भी वे उस भृगुसंहिता को आगे नहीं बढा सके और उनके हाथो से लिखी आधी-अधूरी भृगुसंहिता ही अभी तक वैसी ही स्थिति में डायरी में सुरक्षित पडी है । इससे आगे क्‍या हुआ , इसकी चर्चा पुन: अगली कडी में हो पाएगी।

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      भृगु संहिता पर आये कमेंट्स के जवाब

       

      Bhrigu samhita prashnavali

      मैने कल भृगुसंहिता कुंडली के बारे में एक आलेख पोस्‍ट किया था , इसकी दूसरी कडी मैं आज पोस्‍ट करनेवाली थी , पर पहले पहली कडी के पाठकों की जिज्ञासा को शांत करना आवश्‍यक है। भृगु संहिता प्रश्नावली में सबसे पहले क्षितिज जी का प्रश्न है कि उस पोस्‍ट में जानकारी तो अच्‍छी थी , लेकिन मेरा आलेख उन्‍हें तकनीकी अधिक लगा। उनका मानना है कि अगर कुछ उदाहरणों के साथ मैं इसे सरल रुप में लिखती तो शायद आम लोग भी इसका लाभ उठा पाते , पर मुझे नहीं लगता कि ऐसी कोई कठिन बात मैने लिखा है , आप जब भी नए विषय को पढेंगे , आपको पुराने विषयों की अपेक्षा अधिक ध्‍यान संकेन्‍द्रण की जरूरत होती है। हमें ज्‍योतिष के हिसाब से कुछ शब्‍दों को प्रयोग करना होता है , आप हमारे पुराने आलेख में इन शब्‍दों ( राशि , लग्‍न आदि ) के बारे में जान सकते हैं। गत्यात्मक ज्योतिष को समझने के लिए कुछ अधिक ध्यान संकेन्द्रण की आवश्यकता होगी। 

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      श्यामल सुमन जी ने भृगु संहिता का नाम भी सुना है और किताब भी देखने का अवसर मिला, लेकिन उनका  प्रश्न है कि वे पढ नहीं सके , क्‍यूंकि वह पुस्‍तक संस्‍कृत में थी और उन्‍हें संस्कृत भाषा की उतनी जानकारी नहीं है। उन्‍हें जानकारी दे दूं कि विभिन्‍न प्रकाशकों ने कई लेखकों के हिन्‍दी की भृगुसंहिता का प्रकाशन भी किया है। पर उसे समझने के लिए ज्‍योतिष की थोडी जानकारी आवश्‍यक है। उडनतश्‍तरी जी और डा महेश सिन्‍हा जी कहते हैं पंजाब के किसी गांव में या पूरी या कई गांवों में टुकडो टुकडों में ओरिजनल भृगु संहिता रखी है। सुना बस है कि लोग वहाँ अपना भाग्य पढ़वाने जाते हैं। सुनने में तो हमें भी अवश्‍य आया है , पर जबतक दावों की पुष्टि नहीं हो जाती , वास्‍तव में ओरिजिनल भृगुसंहिता के बारे में कह पाना बहुत ही मुश्किल है। 

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      ज्ञानदत्त पाण्डेय जी की भृगु संहिता प्रश्न है कि श्री कन्हैयालाल माणिक लाल मुंशी को पढ़ा था कि भृगु संहिता से लोग भूतकाल तो सही सही बता पा रहे थे , पर भविष्य के बारे में उतने सही नहीं थे। पर मेरे विचार से भृगुसंहिता में व्‍यक्ति की चारित्रिक विशेषताएं और भाग्‍य की ओर से मिलनेवाले सुख दुख का ही वर्णन है , समय की इसमें कोई चर्चा नहीं होती । ज्‍योतिषियों के बारे में नहीं , सिर्फ तांत्रिको के बारे में सुना है कि वे भूत की जानकारी सही सही दे पाते हैं , भविष्‍य की नहीं। हो सकता है , वे तांत्रिक हों और भृगुसंहिता के आधार पर भविष्‍य पढने का झूठा दावा कर रहे हों। डा महेश सिन्‍हा जी कहते हैं कि उत्तर में जैसे भृगु संहिता का नाम है वैसे ही दक्षिण में नाडी ज्योतिष का । नाडी ज्‍योतिष के साथ ही साथ सुधीर कुमार जी रावण-संहिता, लाल किताब और नीलकंठी पुस्तकों/विद्याओं का भी भविष्यवाणियों के लिए उपयोग की चर्चा करते हैं , उनकी चर्चा बाद में कभी की जाएगी।

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      सबसे मुख्‍य प्रश्न है प्रवीण शाह जी की , जिन्‍होने कहा कि विश्वास तो नहीं होता इस तरह की संहिताओं में क्योंकि जब हर काल में जन्म लेने वालों का भविष्य पहले ही से लिखा है, जब सब कुछ पूर्व निर्धारित है तो कर्म का क्या योगदान रहा? बिल्‍कुल सही कहना है आपका , मुझे खुद भी विश्‍वास नहीं था , पर यह अविश्‍वास वहीं से शुरू होता है , जहां हमलोग अधिक विश्‍वास कर लेते हैं , यदि विश्‍वास एक सीमा तक किया जाए तो अविश्‍वास की कोई गुजाइश नहीं होती।

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      यदि आपके पास अलग अलग दस बीस प्रकार के बीज हों और आप उन्‍हे न पहचानते हों , तो आप अनिश्चितता की स्थिति में ही उन बीजों को जमीन में बो देंगे , उसे सींचकर और अन्‍य देखभाल कर उसे पौधे बनने देंगे , उसके बाद उन बीजों की गतिविधियों को गौर करेंगे , उनका कौन सा पार्ट किस काम में लाया जा सकता है , उसका प्रयोग कर देखेंगे , पर एक किसान किसी बीज को देखते ही आपको उसका पूरा भविष्‍य बतला देगा।

      आप उसे बो दें , कितने दिन में उसका अंकुरण निकलेगा , कितने दिन में वह पेड , पौधा या लता बनेगा , कितने दिनों में वह फल देने लायक होगा , उसके विभिन्‍न अंगों यानि जड , तना , फल , फूल और पत्‍तों में से किस किस को किस तरह उपयोग में लाया जा सकता है। इसी प्रकार हम सारे मनुष्‍य देखने में एक समान होते हुए भी अलग अलग प्रकार के बीज हैं , मनुष्‍य की कुंडली के ग्रहों को देखकर हम उसकी प्रकृति के बारे में , उसके विकास के बारे में वैसी ही भविष्‍यवाणी कर पाते हैं ।

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      पर जिस तरह एक बीज के विकास में देखरेख की भूमिका अहम् होती है , उसी प्रकार एक मनुष्‍य के विकास में भी माहौल बहुत बडा अंतर दे सकता है। एक किसान ने हर प्रकार के बीज का पूरा भविष्‍य आपको दिखा दिया , बीजों का जितना अधिक देखभाल किया जाए , किसान की भविष्‍यवाणी उतनी ही सटीक होगी। पर उसे बोया ही नहीं जाए या बोने के बाद देखभाल नहीं की जाए , तो क्‍या होगा ? उसका नष्‍ट होना तो निश्चित है , पर इससे एक किसान ने बीज के बारे में जो भविष्‍यवाणी की थी , वह गलत तो नहीं होगी न।

      इसी प्रकार कर्म करने से हमारी भविष्‍यवाणियों के सटीक होने की संभावना बलवती होती जाती है। मनुष्‍य के भाग्‍य को लंबाई मान लिया जाए और कर्म को चौडाई , तो किसी भूखंड के क्षेत्रफल की तरह ही इन दोनो का गुणनफल ही किसी व्‍यक्ति की उपलब्धि होगी। इसलिए मेहनत से इंकार तो किया ही नहीं जा सकता , पर भविष्‍य की जानकारी से हम सही दिशा में मेहनत करने को प्रवृत्‍त अवश्‍य होते हैं।

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        क्‍या आपने भृगुसंहिता का नाम सुना है ?

         

        Bhrigu samhita in hindi

        भृगु संहिता फलित ज्योतिष - ज्‍योतिष में थोडी भी रूचि रखनेवालों ने भृगुसंहिता का नाम अवश्‍य सुना होगा। जैसा कि नाम से ही स्‍पष्‍ट है , यह ज्‍योतिष के क्षेत्र में महर्षि भृगु द्वारा रचित एक ऐसी कालजयी पुस्‍तक मानी जाती है , जिसमें हर काल में जन्‍म लेनेवालों का भविष्‍य लिखा हुआ है। आम लोगों की तरह मैं भी सोंचा करती थी कि जिनलोगों ने जन्‍म भी नहीं लिया है , उसके बारे में भी भविष्‍यवाणी कर पाना भला कैसे संभव है ? इस पुस्‍तक की मूल पांडुलिपि के बारे में अभी तक सही सही बता पाना मुश्किल है , पर गुरू शिष्‍य परंपरा के तहत् आज तक ढोए जा सके तथ्‍यों के आधार पर जब विभिन्‍न प्रकाशनों की भृगुसंहिताओं को पढा , तो भृगुसंहिता के मूल आधार के बारे में बात समझ में आयी। गत्यात्मक ज्योतिष प्राचीनतम विधाओं का भी नवीनतम उपयोग की बात करता है। 

        Bhrigu samhita in hindi


        Bhrigu samhita Hindi explanation

        वास्‍तव में , प्राचीन ज्‍योतिष में हमें प्रभावित करने वाले 7 आकाशीय पिंडों और दो महत्‍वपूर्ण विंदुओं ( राहू और केतु ) को मिलाकर 9 ग्रह माने गए है। इन 9 ग्रहों की 12 राशियों में स्थिति 9*12 = 108 तरह के फलादेश दे सकती है। यदि लग्‍न के आधार पर विभिन्‍न भावों को देखते हुए गणना की जाए , तो 12 लग्‍नवालों के लिए पुन: 108*12 = 1296 प्रकार के फलादेश होंगे। यदि इन फलादेशों को 1296 अनुच्‍छेदों में लिखकर रखा जाए , तो किसी भी बच्‍चे के जन्‍म के बाद उस बच्‍चे की जन्‍मकुंडली में नवों ग्रहों की स्थिति को देखते हुए भृगुसंहिता में से 9 अनुच्‍छेदो को चुनकर भविष्‍यवाणी के लिए निकाला जा सकता है।

        Gatyatmak Bhrigu samhita Hindi guide

        प्राचीन ज्‍योतिष में आकाश का 30-30 डिग्रियों में विभाजन , उनका विभिन्‍न ग्रहों को आधिपत्‍य दिया जाना और लग्‍नसापेक्ष सभी भावों को जो विभाग सौंपे गए हैं , उस आधार को ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ ने जस का तस स्‍वीकार किया है। पर जब विभिन्‍न प्रकाशनों की भृगुसंहिताओं को पढा , तो पाया कि सारे फलादेश ग्रह स्थिति के आधार पर लिखे गए हैं। यानि लगभग कोई भी ग्रह हों , लग्‍न से केन्‍द्र या त्रिकोण में हों तो उन्‍हें बलवान तथा षष्‍ठ , अष्‍टम या द्वादश भाव में हो तो उन्‍हें कमजोर मानकर फलादेश लिखा गया है ।

        Gatyatmak Bhrigu samhita Hindi notes

        पर ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ की मान्‍यता है कि जिस तरह राजमहल में दिखाई देनेवाले सभी राजा नहीं होते , न पुलिस स्‍टेशन कैम्‍पस में दिखाई देनेवाले सभी लोग अपराधी और न ही श्‍मशान में दिखाई पडनेवाला सारा शरीर लाश उसी तरह ग्रहों की स्थिति मात्र के आधार पर भविष्‍य का आकलन गलत है। भले ही अधिकांश समय ग्रह अपनी स्थिति के अनुसार ही फल देते हों , पर कभी कभी इसका उल्‍टा भी हो जाया करता है।

        लग्नकुंडली

        ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ के द्वारा ग्रहों की गत्‍यात्‍मक और स्‍थैतिक शक्ति का खुलासा होने के बाद यह स्‍पष्‍ट हो गया कि धन स्‍थान में मौजूद ग्रहों के बावजूद जातक निर्धन , भाग्‍य स्‍थान में मौजूद ग्रहों के बावजूद जातक भाग्‍यहीन , बुद्धि स्‍थान में मौजूद ग्रहों के बावजूद जातक बुद्धिहीन और अष्‍टम भाव में मौजूद ग्रहों के बावजूद जातक अच्‍छे जीवन जीनेवाला क्‍यूं हो जाता है। इस आधार पर ‘भृगुसंहिता’ के नाम के साथ कोई छेडछाड न करते हुए कुछ वर्षों से एक ‘गत्‍यात्‍मक भृगुसंहिता’ तैयार करने की दिशा में काम किया गया , जिसमें क्‍या क्‍या खूबियां थी और उसे तैयार करने में क्‍या क्‍या परेशानियां आयी , उसे पढने के लिए अगले पोस्‍ट का इंतजार करें ।

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          घरेलू नुस्खे और देसी इलाज

           

          Gharelu nuskhe hindi mein

          शनिवार और रविवार को बच्‍चों की छुट्टियों की वजह से नींद देर से ही खुलती है । हां , कभी कभार फोन की घंटी नींद अवश्‍य तोड दिया करती है। ऐसे ही एक शनिवार भोर की अलसायी हुई नींद के आगोश में थी कि अचानक फोन की घंटी बजी। फोन उठाकर जैसे ही मैने ‘हलो’ कहा , वैसे छोटी बहन की दर्दनाक आवाज कानों में पडी , ‘दीदी , मुझे बचा लो , ये लोग मेरी जान ले लेंगे।’ मेरे तो होश ही उड गए , विवाह के दस वर्षों तक सबकुछ सामान्‍य रहने के बाद ससुराल में इसके जीवन में कौन सा खतरा आ गया। अपने को बहुत संभालते हुए पूछा , ‘क्‍या हुआ , पूरी बात बताओ ’ तब उसने जो बताया , वह लगभग शून्‍य हुए दिमाग को काफी राहत देनेवाली थी।

          Gharelu nuskhe in hindi

          दरअसल गर्मी की वजह या अन्‍य किसी वजह से कई दिनों से उसके शरीर के कई जगहों पर फोडे निकल गए थे , कुछ काफी बडे भी हो गए थे। शाम को डाक्‍टर ने बडे फोडों को जल्‍द आपरेशन करा लेने की सलाह दी थी। रात में इनलोगों में लंबी बहस चली थी , बहन के पति और श्‍वसुर डाक्‍टर की सलाह मान लेने को कह रहे थे और बहन एक दो दिन इंतजार करना चाह रही थी । सुबह सुबह अपनी हार को नजदीक पाकर उसने घबडाकर मुझे फोन लगा दिया था। अपनों का कष्‍ट देखना बहुत मुश्किल होता है , उसकी समस्‍या को हल करने के लिए मैने जैसे ही अपना दिमाग खपाया , एक देशी इलाज का उपाय नजर आ ही गया। 

          Aayurved in hindi

          किसी भी फोडे के लिए आयुर्वेद की एक दवा है ‘एंटीबैक्‍ट्रीन’ , मैने बहुत दिन पूर्व उसका प्रयोग किया था और उसके चार छह घंटे के अंदर उसके प्रभाव से प्रभावित होकर कई बार दूसरों को भी उसके उपयोग की सलाह दी थी , जिसमें से किसी को भी उस दवा पर संदेह नहीं रह गया था। अगर फोडा शुरूआती दौर में हो तो , यह दवा उसे दबा देती है और यदि फोडा पक चुका हो , तो यह दवा उसके मवाद को बहा देती है , यानि फोडा किसी भी हालत में हो , उसका मुंह हो या नहीं , इसका उपयोग किया जा सकता है। बाद में घाव भी इसी दवा से ठीक हो जाता है , इसलिए मैने उसके पति से एक दिन का समय मांगा और बहन को उसी दवा के प्रयोग की सलाह दी। और मेरी आशा के अनुरूप ही रात में उसकी खनकती हुई आवाज कानों में पडी। फोडा बह चुका था , पाठक कभी भी बहुत कम कीमत की इस दवा की परीक्षा ले सकते हैं। एलोपैथी की कडी दवाओं या आपरेशन से बचने के लिए इस प्रकार के बहुत उपाय देशी इलाज और आयुर्वेद में हैं , जिनके बारे में या तो लोगों को जानकारी नहीं है या फिर वे विश्‍वास नहीं कर पाते।

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          Gharelu nuskhe for constipation

          कई बार छोटे बच्‍चों के कब्‍ज को लेकर अभिभावक की पारेशानी को देखकर डाक्‍टर लगातार एलोपैथी की दवा चलाते हैं । मैने ऐसे कई बच्‍चों को छोटी हर्रे घिसकर पिलाने की सलाह दी है और उससे बच्‍चों को फिर एलोपैथी की दवा की जरूरत नहीं रह गयी है। सर्दी खांसी के लिए देशी इलाज के रूप में तुलसी , अदरक का रस और मधु को साथ मिलाकर बच्‍चों को पिलाया जाता है , बडे भी इसका काढा पीकर सर्दी ठीक कर सकते हैं। बडे पत्‍ते वाली तुलसी , जो कि घर में नहीं लगायी जाती , वह कुछ बीमारियों में बहुत कारगर होती है।

          Desi ilaj in hindi

          मेरी एक भांजी के पैर में घुटने के नीचे कुछ दाने हो गए , कभी कभी नोचने भी लगे , देखते ही देखते बढने भी लगे। हमने एलोपैथी के चर्मरोग विशेषज्ञ को दिखाया , उसकी कई दवाएं चली , पर कम अधिक होता रहा , जड से नहीं मिटा। हारकर हमने होम्‍योपैथी के डाक्‍टर से दिखाया। पहले सप्‍ताह की दवा से उसने बीमारी बढने की उम्‍मीद की , वह सही रहा , पर दूसरे सप्‍ताह से बीमारी में जो कमी होनी चाहिए थी , वह नहीं हुई और पहले से बडी समस्‍या देखकर हमलोग और घबडा गए। कुछ दिन बाद हमारे गांव से एक व्‍यक्ति आए , उन्‍होने देखा और अपनी देशी इलाज की दवाई सुझा दी , और उनकी दवाई से पूरा इन्‍फेक्‍शन समाप्‍त । दवाई का नाम सुनेंगे , तो आप चौंक ही जाएंगे , दवा थी , गाय के ताजे दूध का फेन। एक महीने में बीमारी समाप्‍त हो गयी।

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          बचपन से बिल्‍कुल स्‍वस्‍थ रहे मेरे बडे बेटे को 12 वर्ष की उम्र के बाद सालोभर सर्दी खांसी रहने लगी , पांच छह वर्षों तक एलोपैथी की दवा चलाने के बाद भी कोई फायदा नहीं हुआ , डाक्‍टर कहा करते थे कि ध्‍यान दें , इसे किस चीज से एलर्जी है , उससे दूर रखें , पर इतने दिनों तक हमें कुछ भी समझ में न आया , जितनी सावधानी बरतते , सर्दी खांसी उतनी ही अधिक परेशान करती थी। अंत में हारकर हमलोगों ने होम्‍योपैथी की दवा चलायी , और छह महीने में एलर्जी जड से दूर। हर वक्‍त टोपी , मफलर , मोजे में अपने को पैक रखने वाले और हर ठंडा खाना से वंचित रहनेवाले उसी बेटे को आज कहीं भी किसी परहेज की जरूरत नहीं होती है। ऐसी अन्‍य बहुत सारी घटनाएं हैं , जिसके कारण एलोपैथी से इतर पद्धतियों पर भी मेरा भरोसा बना हुआ है।

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          एलोपैथी के साइड इफेक्‍ट के कारण उत्‍पन्‍न होने वाली बहुत सी सारी शारीरिक समस्‍याओं के बावजूद भी इलाज की सर्वोत्‍तम पद्धति के रूप में अभी एलोपैथी का नाम ही लिया जा सकता है । एलोपैथी की सफलता को देखते हुए मै भी इसे स्‍वीकारती हूं , वैसे इसका सबसे बडा कारण इस मद में किया जानेवाला खर्च है , इससे इंकार नहीं किया जा सकता । पर छोटी छोटी बीमारियों के लिए ही सही , जहां पर हमारी ये देशी दवाएं कारगर है , वहां एलोपैथी का प्रयोग किया जाना क्‍या उचित है ?

          Desi ilaj in hindi

          लोग ये जानते हैं कि सरदर्द हो , तो दर्दनिवारक गोली लेनी है , पर ये क्‍यूं नहीं जानते कि फोडा होने पर ‘एंटीबैक्‍ट्रीन’ का प्रयोग करना है। ताज्‍जुब की बात है कि यहां की इतनी सटीक देशी दवाइयों की जानकारी यहीं के ही लोगों को मालूम नहीं है। शिक्षा का मतलब अपनी सभ्‍यता, संस्‍कृति और ज्ञान को भूल जाना नहीं होता , पर आजतक ऐसा ही होता आया है , जो हमारी शिक्षा व्‍यवस्‍था को दोषपूर्ण तो ठहरा ही देता है। युग बदलने के साथ ही साथ हर पद्धति का विकास किया जाना अधिक आवश्‍यक है , जब तक हर क्षेत्र का समानुपातिक विकास न हो , एक क्षेत्र की अंधी दौड में हमें शामिल नहीं होना चाहिए।

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