चन्द्र दोष के उपाय

 

चन्द्र दोष के उपाय

गत्यात्मक ज्योतिष के रिसर्च के बाद 'हमलोग जब भी ग्रहों के प्रभाव और ज्‍योतिष की चर्चा करते हैं , आम लोगों की जिज्ञासा किन्‍ही अन्‍य बातों में न होकर ग्रहों के दुष्‍प्रभाव को दूर करने के उपायों, खासकर चंद्र दोष के उपाय को जानने की ही होती है। इस विषय पर हमने 'क्‍या भवितब्‍यता टाली जा सकती है ?' शीर्षक से 11 आलेखों की एक पूरी शृंखला ही तैयार की है , जिसमें स्‍पष्‍ट किया गया है कि प्रकृति के नियमों को समझना ही बहुत बडा ज्ञान है , उपचारों का विकास तो इसपर विश्‍वास होने या इस क्षेत्र में बहुत अधिक अनुसंधान करने के बाद ही हो सकता है। अभी तो परंपरागत ज्ञानों की तरह ही ज्‍योतिष के द्वारा ग्रहों के प्रभाव के तरीके को जानकर अपना बचाव कर पाने में हमें बहुत सहायता मिल सकती है। लेकिन फिर भी ज्‍योतिषियों द्वारा लालच दिखाए जाने पर लोग उनके चक्‍कर में पडकर अपने धन का कुछ नुकसान कर ही लेते हैं।



chandra dosh ke upay

ग्रहों के अनुसार हो या फिर पूर्वजन्‍म के कर्मों के अनुसार, जिस स्‍तर में हमने जन्‍म लिया , जिस स्‍तर का हमें वातावरण मिला,  उस स्‍तर में रहने में अधिक परेशानी नहीं होती। पर कभी कभी अपनी जीवनयात्रा में अचानक ग्रहों के अच्‍छे या बुरे प्रभाव देखने को मिल जाते हैं , जहां ग्रहों का अच्‍छा प्रभाव हमारी सुख और सफलता को बढाता हुआ हमारे मनोबल को बढाता है , वहीं ग्रहों का बुरा प्रभाव हमें दुख और असफलता देते हुए हमारे मनोबल को घटाने में भी सक्षम होता है। 

वास्‍तव में , जिस तरह अच्‍छे ग्रहों के प्रभाव से जितना अच्‍छा नहीं हो पाता , उससे अधिक हमारे आत्‍मविश्‍वास में वृद्धि होती है , ठीक उसी तरह बुरे ग्रहों के प्रभाव से हमारी स्थिति जितनी बिगडती नहीं , उतना अधिक हम मानसिक तौर पर निराश हो जाया करते हैं। ज्‍योतिष के अनुसार हमारी मन:स्थिति को प्रभावित करने में चंद्रमा का बहुत बडा हाथ होता है। धातु में चंद्रमा का सर्वाधिक प्रभाव चांदी पर पडता है। यही कारण है कि बालारिष्‍ट रोगों से बचाने के लिए जातक को चांदी का चंद्रमा पहनाए जाने की परंपरा रही है। बडे होने के बाद भी हम चांदी के छल्‍ले को धारण कर अपने मनोबल को बढा सकते हैं।

चंद्रमा पूर्णिमा के दिन अपनी पूरी शक्ति में

आसमान में चंद्रमा की घटती बढती स्थिति से चंद्रमा की ज्‍योतिषीय प्रभाव डालने की शक्ति में घट बढ होती रहती है। अमावस्‍या के दिन बिल्‍कुल कमजोर रहने वाला चंद्रमा पूर्णिमा के दिन अपनी पूरी शक्ति में आ जाता है। आप दो चार महीने तक चंद्रमा के अनुसार अपनी मन:स्थिति को अच्‍छी तरह गौर करें , पूर्णिमा और अमावस्‍या के वक्‍त आपको अवश्‍य अंतर दिखाई देगा। पूर्णिमा के दिन चंद्रोदय के वक्‍त यानि सूर्यास्‍त के वक्‍त चंद्रमा का पृथ्‍वी पर सर्वाधिक अच्‍छा प्रभाव देखा जाता है। 

इस लग्‍न में दो घंटे के अंदर चांदी को पूर्ण तौर पर गलाकर एक छल्‍ला तैयार कर उसी वक्‍त उसे पहना जाए तो उस छल्‍ले में चंद्रमा की सकारात्‍मक शक्ति का पूरा प्रभाव पडेगा , जिससे व्‍यक्ति के मनोवैज्ञानिक क्षमता में वृद्धि होगी। इससे उसके चिंतन मनन पर भी सकारात्‍मक प्रभाव पडता है। यही कारण है कि लगभग सभी व्‍यक्ति को पूर्णिमा के दिन चंद्रमा के उदय के वक्‍त तैयार किए गए चंद्रमा के छल्‍ले को पहनना चाहिए।

पूर्णिमा की अंगूठी 

वैसे तो किसी भी पूर्णिमा को ऐसी अंगूठी तैयार की जा सकती है , पर विभिन्‍न राशि के लोगों को भिन्‍न भिन्‍न माह के पूर्णिमा के दिन ऐसी अंगूठी को तैयार करें। 15 मार्च से 15 अप्रैल के मध्‍य आनेवाली पूर्णिमा को मेष राशिवाले , 15 अप्रैल से 15 मई के मध्‍य आनेवाली पूर्णिमा को वृष राशिवाले , 15 मई से 15 जून के मध्‍य आनेवाली पूर्णिमा को मिथुन राशिवाले , 15 जून से 15 जुलाई के मध्‍य आनेवाली पूर्णिमा को कर्क राशिवाले , 15 जुलाई से 15 अगस्‍त के मध्‍य आनेवाली पूर्णिमा को सिंह राशिवाले , 15 अगस्‍त से 15 सितम्‍बर के मध्‍य आनेवाली पूर्णिमा को कन्‍या राशिवाले , 15 सितम्‍बर से 15 अक्‍तूबर के मध्‍य आनेवाली पूर्णिमा को तुला राशिवाले , 15 अक्‍तूबर से 15 नवम्‍बर के मध्‍य आनेवाली पूर्णिमा को वृश्चिक राशिवाले , 15 नवम्‍बर से 15 दिसंबर के मध्‍य आनेवाली पूर्णिमा को धनु राशिवाले , 15 दिसंबर से 15 जनवरी के मध्‍य आनेवाली पूर्णिमा को मकर राशिवाले , 15 जनवरी से 15 फरवरी के मध्‍य आनेवाली पूर्णिमा को कुंभ राशिवाले तथा 15 फरवरी से 15 मार्च के मध्‍य आनेवाले पूर्णिमा को मीन राशिवाले अपनी अपनी अंगूठी बनवाकर पहनें , तो अधिक फायदेमंद होगा। इससे चन्द्र दोष के उपाय भी होते हैं।

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    नाक, मुंह और हाथों पर नियंत्रण


    Ways to control yourself from corona virus


    महाराष्ट्र की राजधानी मुंबई में पिछले सप्ताह की तुलना में इस सप्ताह कोरोना वायरस के कम मरीज, कम मौतें देखने को मिली, प्रतिदिन के आंकड़े को भी देखें तो दिन-ब-दिन मामले कम हो रहे हैं, यहाँ तक कि धारावी में भी केस बहुत कम मिल रहे हैं। अब जो मामले आ भी रहे हैं, उसमे अधिक संख्या उत्तर मुंबई के रोगियों की है, जो प्रशासन के निर्देश के बावजूद कल तक बाजार में भीड़ लगा रहे थे। पुलिस ने मालाड, कांदिवली, बोरीवली और दहिसर के 27 इलाकों में सख्ती बढ़ा दी है. इन इलाकों को पूरी तरह से लॉकडाउन कर दिया गया है. मुंबई में कोरोना से ठीक हो रहे मरीजों की संख्या को देखते हुए भी कहा जा सकता है कि धीरे-धीरे हालात सामान्य हो रहे हैं. कोरोना से ठीक हो चुके मरीजों की संख्या मुंबई में कोरोना के एक्टिव मामलों की तुलना में ज्यादा है.

    Ways to control yourself from corona virus


    Coronavirus in Delhi and Mumbai


    इन दिनों वायरस संक्रमण के मामले दिल्ली में कोरोना मुंबई से भी ज़्यादा हो गए हैं. दिल्ली में सुबह के आँकड़ों के अनुसार अब कुल कोरोना संक्रमित लोगों की संख्या 70390 हो गई है जबकि मुंबई में संक्रमण के मामले 69528 हैं. दिल्ली में बीते 24 घंटों में संक्रमण के 3788 नए मामले सामने आए हैं. वहीं मुंबई में 24 घंटों में 1118 नए मामले मिले. हालांकि संक्रमण से होने वाली मौतों के मामले में दिल्ली मुंबई से पीछे है और स्थिति बेहतर है. दिल्ली में अब तक संक्रमण से कुल 2365 लोगों की मौत हुई है जबकि मुंबई में 3964 लोग अब तक संक्रमण की वजह से जान गंवा चुके हैं. फिर भी चिंतनीय तो है ही। दिल्ली में निश्चित तौर पर इस हालत के लिए प्रशासनिक लापरवाही के साथ लोगों के गैर-जिम्मेदाराना व्यवहार को दोष दिया जा सकता है। लॉक डाउन ख़त्म होते ही लोग इतनी तेजी से घूमते फिरते नजर आये, गलती किसी की होती है, भुगतना किसी और को पड़ता है।

    What is control yourself from corona virus

    वास्तव में, कोरोना वायरस का नियंत्रण न होना प्रशासनिक और व्यक्तिगत लापरवाही का ही परिणाम है। झारखण्ड में शुरूआती दौर में संक्रमण के मामले ३ स्थानों पर मिले थे। पहला रांची के हिंदपीढ़ी, जहाँ संक्रमण तेजी से हो रहा था, प्रशासनिक चुस्ती के कारण नियंत्रित किया जा सका। हिंदपीढ़ी का संपर्क पुरे रांची से काट दिया गया था, पर कुछ लोगों की व्यक्तिगत लापरवाही के कारण संक्रमण रांची के कई गाँवों में फैला। झारखण्ड में शुरुआती दिनों के और दो केस बोकारो जिले में ही थे, पर प्रशासनिक और लोगों की व्यक्तिगत चुस्ती से दोनों का परिणाम संतोषजनक रहा। पुरे गाँव को सख्ती से बंद कर दिया गया था, जो बीमारी को नहीं फैलने देने का एकमात्र उपाय है। बोकारो-रांची-जमशेदपुर के युवाओं का विदेशों से, बड़े शहरों से प्रतिदिन आना जाना लगा रहता है, बीमारी के दौरान भी वे बाहर से आये, पर क्वैरेन्टाइन के नियमों का अच्छी तरह पालन होने से बीमारी का फैलाव नहीं हो पाया था। इधर-उधर से आ रहे मजदूरों के कारण अभी भी कोरोना संक्रमितों के छिटपुट मामले निकल ही रहे हैं, इन दिनों इस वायरस से प्रशासनिक और व्यक्तिगत स्तर पर लोग कैसे निबट रहे हैं, इसका पता तो एक महीने बाद यहाँ का माहौल बताएगा।

    Will you control yourself from corona virus

    कोरोना वायरस की कोई दवा नहीं है, यह लोगों तक न पहुंचे, बस इसका उपाय करना आवश्यक है। इसके लिए मुंह और नाक के बचाव के लिए मास्क और अपने हाथों पर नियंत्रण आवश्यक है। अभी के हालत में यह पूरे विश्व में हर स्थान पर किया जाना चाहिए।  पर जबतक एरिया रेड जोन घोषित नहीं हो जाता, प्रशासन के निर्देश के बावजूद लोग जागरूक नहीं होते। और रेड जोन घोषित होने के बाद कोरोना वायरस के प्रसार पर हमारा नियंत्रण नहीं रह जाता। इसलिए आवश्यक है कि अपने एरिया को रेड जोन बनने नहीं दिया जाये। मुंबई, दिल्ली जैसे बड़े शहर लापरवाही की वजह से ही कोरोना वायरस का भीषण प्रकोप झेल रही है, अब कोरोना वायरस अपना रुख धीरे-धीरे छोटे शहरों की ओर कर रही है, उसके बाद गावों की ओर भी करेगी। लॉक डाउन खुलने के बाद पटना की एक शादी के दौरान गुडगाँव में रहने वाले दूल्हे की कोरोना से मौत और २२ लोगों का संक्रमित हो जाना, रायपुर में एक सैलून वाले के संक्रमण से १००-२०० लोगों का संक्रमण हो जाना, जैसी घटनाएं इसी ओर इशारा कर रही है। पर बड़े शहरों की तुलना में छोटे शहरों में भीड़ कम है, गांव में और भी कम। इसलिए इन जगहों पर इसके नियंत्रण की काफी संभावना होगी। पर प्रशासनिक और व्यक्तिगत चुस्ती हर जगह आवश्यक है, सभी लोगों के सुरक्षित रहने के लिए बेहतर यही है कि हम अपने नाक, मुंह और हाथों पर इतना नियंत्रण रखें कि हमारा जोन रेड जोन नहीं बन पाए

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    गत्यात्मक ज्योतिष  से जुड़े अन्य लिंक्स 



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        बुद्धिजीवी वर्ग और हमारा समाज

        Intellectual meaning in hindi

        पूरे शरीर का जितना प्रतिशत हिस्‍सा मस्तिष्‍क का होता है, समाज में उतना ही प्रतिशत बुद्धिजीवीयों का होता है ! बुद्धि के हिसाब से हमारे शरीर के अंग काम न करे तो अंजाम आप जानते ही हैं ! मस्तिष्‍क पूरे शरीर की चिंता न करे तो भी अंजाम की कल्‍पना कर सकते हैं ! पुराने युग मे राजा-महाराजा बुद्धिजीवियों यानि गुरुओं के चरण पखारा करते थे, पर आज समाज धन को महत्व देता है ,  बुद्धिजीवियों को महत्व देना शुरू कीजिए !

        intellectual meaning in hindi,

        Intellectuals and race

        हे बुद्धिजीवियों , आप भी अपनी बुद्धि का सार्थक प्रयोग करना सीखिए, चाहे आप जिस परिवार, जाति और धर्म के हों, अपने समाज के , आसपास के लोगों को विकसित बनाने के यत्न कीजिए ! अपने विचारों में जनकल्याण की भावना को जन्म दें।  मेरी इस बात से परिवार , समाज , देश और राष्‍ट्र के टूटने की वजह समझ जाइए, जिसके टूटने के बाद कोई सुखी नहीं होता !

        Quotes about intellectuals

        कोई भी विचार हर दृष्टिकोण से सही नहीं होता। इसलिए दस तरह के विचारों की कमी बेशी का विश्‍लेषण करने के बाद जो सर्वसम्‍मत विचार बनते हैं, वही मानने योग्‍य होते हैं। पर हम अपने विचार को ही सर्वश्रेष्‍ठ मानते हुए किसी और की बातों को सुनना भी नहीं चाहते, एकांगी विचारधारा सर्वमान्‍य नहीं हो सकती। इसलिए हमें एकांगी विचारधारा वालों के न तो लेख पढ़ने चाहिए और न ही पुस्तकें। किसी बात का बेवजह विरोध पर कूदने वाले भी अच्छे नहीं होते।

        The responsibility of intellectuals

        हमारे विद्वानों को अपनी मातृभाषा में लिखने के बाद ही क्रमशः हिंदी या अंग्रेजी में लिखना चाहिए। प्राइमरी तक के बच्चों के लिए क्षेत्रीय भाषा में ज्ञान देना अच्छा है, उसके बाद हिंदी और अंग्रेजी का नंबर आना चाहिए। हमारे बच्‍चों को अंग्रेजी इसलिए पढनी पडती है, क्‍योंकि आजतक हमारे देश के विद्वानों ने सिर्फ अंग्रेजी में ही अपने ज्ञान को अभिव्‍यक्ति दी है। जिस दिन हमारे देश के विद्वान हमारी भाषाओं में अपने ज्ञान को किताबों और भाषणों की शक्‍ल में अभिव्‍यक्ति देने लगेंगे, हमारे बच्‍चों को अंग्रेजी माध्‍यम में पढने की जरूरत नहीं पडेगी। हमारे जैसे छोटे लोगों को जितनी समझ है, काश महान कहें जाने वाले लोगों को भी होती तो हमारे देश की ऐसी दुर्दशा नहीं होती।

        Intellectuals and society

        प्राचीनकाल में ज्ञानी ब्राह्मण और साधुओं की यथोचित क़द्र होती थी। पेट पालने के लिए शारीरिक श्रम की आवश्यकता नहीं होती थी। किसी के घर में पहुँच जाये, आदर सम्मान के साथ उनके खाने-पीने-रहने का इंतजाम किया जाता था। आज भले ही युग बदल गया हो, फिर भी बुद्धिजीवी वर्ग का गुजारा रॉयल्‍टी से होना चाहिए, यदि उन्हें अपनी आवश्यकता की पूर्ति के लिए शारीरिक श्रम करना पड़ता है तो उस देश की तरक्‍की असंभव है। देश में ऐसी स्थिति बनाने के लिए व्‍यावसायिक वर्ग और आम जनता को पैसे से अधिक ज्ञान को महत्‍व देना होगा। 

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          धर्म और परंपरागत ज्ञान-विज्ञान

           

          धर्म क्या है ?


          धर्म क्या है - अलग अलग काल में अलग अलग देश में उनके विद्वानों, उनके नेताओं या उनके योद्धाओं द्वारा पूरे समाज को समुचित ढंग से चलाने के लिए अनिवार्य रूप से धारण करने के लिए कुछ नियमों की संहिता बनाई जाती है । इस संहिता की अधिकाँश बातें भविष्य में बड़ी समस्या उत्पन्न होने से बचाती है। इसलिए ये बातें जनसामान्य को बड़ी आसानी से समझ में आ जाती हैं।

          चूँकि उन विद्वानों, नेताओं, योद्धाओं के अनुयायी बड़ी संख्या में होते हैं, बिना किसी प्रकार का तर्क किये हुए उनकी बातों को मानती रहती है। ये नियम उनके लिए धर्म हो जाते हैं, जिसका पालन उनकी संतानों के लिए भी अनिवार्य कर दिया जाता है। उन विद्वानों, नेताओं और योद्धाओं को धर्मगुरु भी मान लिया जाता है। धर्मगुरु की कमी से समाज को आगे नियम-पालन में कठिनाई नहीं आये, इसलिए समाज के वंश की वृद्धि के साथ धर्मगुरुओं के भी दुगुने-चौगुने शिष्य बनते रहते हैं।

          यह सब आज के संविधान की तरह का ही माना जा सकता है, पर जहाँ संविधान को सजा के भय से माना जाता है, वहीं धर्म आस्था से जुड़े होने के कारन माना जाता रहा है। संविधान में परिवर्तन की जगह धर्म में भी देश काल परिस्थिति के हिसाब से परिवर्तन की बात की गयी है। छोटे-छोटे परिवार या क्षेत्र के छोटे नियम को छोड़ दिया जाये तो हर बड़े क्षेत्र के बड़े धर्म को आप वहां की तात्कालीन परिस्थिति के हिसाब से सही पा सकते हैं। जरूर ये नियम प्रकृति के नियमो से तालमेल के बाद ही बनाये गए होंगे।

          Indian religion facts

          विज्ञान क्या है ??


          विज्ञान क्या है - वर्तमान काल में प्रकृति के नियमों के कार्य-कारण संबंधों को अच्छी तरह टेस्ट करने के बाद वैज्ञानिक जो भी निष्कर्ष निकालते हैं , वह विज्ञान है। इसका विकास एक एक सीढी निरंतर होता रहता है, इसमें अभी तक उपस्थित होते आये हर समस्या का समाधान होता है। पढ़े लिखे लोगों तक तो यह जर्नल के माध्यम से पहुँच जाता है। विकसित देशों में विज्ञान के प्रचार-प्रसार में दिक्कत नहीं आती है, पर अविकसित देश, जहाँ अधिकांश लोग पढ़े लिखे न हो, वहां तक ये नियम नहीं पहुँच पाते।

          वैज्ञानिकों के दिए गए सलाह में खर्च भी अधिक हैं, इसलिए जनसामान्य को यह आकर्षित नहीं कर पाता। विज्ञान ने हर रोग का उपाय ढूंढा, पर दैनंदिन कठिनाईयों से निबटने के लिए सार्वभौमिक नियम नहीं बनाये। विज्ञान की खोज को कहीं कहीं पैसे कमाने का भी बड़ा स्रोत समझकर सबकी जिंदगी से खिलवाड़ किया गया। वैज्ञानिकों ने कुछ सलाह भी दी तो सरकार ने उन नियमों को मानने के लिए कभी लोगों को प्रेरित किया कभी नहीं। कुल मिलाकर हर क्षेत्र के वैज्ञानिकों और सरकार के मध्य तालमेल का ऐसा अभाव रहा कि विज्ञान वरदान से अधिक अभिशाप बन गया है।

          धर्म की उपेक्षा 

          धर्म की उपेक्षा - इस वैज्ञानिक युग में सबसे बड़ी गलती हर देश ने जो की, वह यह है कि पढ़े लिखे लोगों ने धर्म या परंपरागत रूप से चल रहे ज्ञान-विज्ञान को अपना क्षेत्र नहीं चुना। जिन्होंने चुना भी, उन्हें सरकार इतना साधन नहीं दे पायी कि वे देश काल और परिस्थिति के हिसाब से बदल रहे धर्म, परंपरागत ज्ञान-विज्ञान का प्रचार-प्रसार धर्म गुरु बनकर कर सके। बिना तर्क समझाए विज्ञान के सभी नियमों को जनता द्वारा मनवा लेना बहुत आसान था। जीवन-शैली को बदलने में विज्ञान को धर्मगुरुओं द्वारा प्रचारित-प्रसारित किया जा सकता था। किसी भी देश की रीढ़ रहे धर्म को वैज्ञानिक और सरकार उपेक्षा भरी निगाह से देखते रहे और आज के आर्थिक युग में इस रीढ़ को विनष्ट करने का मौका व्यावसायिक दिमाग रखने लोगों को मिल गया। वे अपने मनमाने व्यवहार से जनता को लूटते, खसोटते और गलत निर्देश देते रहे। हर बड़े से छोटे जगहों में सैकड़ों उदहारण आपको मिल जायेंगे, जहाँ धर्म का वास्तविक स्वरुप खोया हुआ है और धर्म अधर्म बन गया है।

          निष्कर्ष

          निष्कर्ष - यदि एक लेखक का काम समस्या को दिखाना तो इसको सुलझाना भी है। सभी विषयों की तरह धर्म और परंपरागत ज्ञान-विज्ञान को भी आज के जमाने के अनुरूप विकसित बनाने के लिए उस तरह की रूचिवाले १२वीं तक की पढ़ाई में कुशाग्र रहे विद्यार्थियों को मौका दिया जाये। वे ग्रेजुएशन लें, मास्टर डिग्री लें, पीएचडी और M PHIL करें, आज् के ज़माने के हिसाब से उचित लग रहे सिद्धांतों को चुनचुनकर इकठ्ठा करें और सरकार की मदद से धर्मगुरु तथा आचार्य बनकर मानव जीवन की जीवनशैली को सुन्दर बनाने में मदद करें। याद रखें, धर्म को समाज से दूर नहीं किया जा सकता। उसे ज़माने के अनुकूल बनाया जा सकता है। आज इस क्षेत्र में बड़े बड़े विद्वानों की आवश्यकता है। और इसके लिए वैज्ञानिकों और सरकार को आगे आना होगा। अन्यथा विज्ञान कितना भी आगे निकल जाये, धर्म के नाम पर अधर्म को मानने वाले जाहिल लोग इस दुनिया में भरे रहेंगे।

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            प्राइवेट नौकरी कर रहे युवाओं की चिंता

            विश्व में कोरोना वायरस प्राकृतिक आपदा बनकर आयी हो या ये मानवकृत आपदा हो, पूरा विश्व इसके विभीषिका से त्रस्त है। उच्च-मध्यम-निम्न वर्ग, धर्म और जाति-पाति नहीं देख रहा यह वायरस। कोई बीमार पड़ रहे हैं तो कोई मृत्यु का वरण भी, धन या पद की कोई मजबूती काम नहीं आ रही है। निम्नस्तरीय लोगों को अभी सरकारी मदद, समाजसेवी संस्थाओं की मदद मिल रही है, माहौल ठीक होने पर उन्हें बड़ा-छोटा काम भी मिल जायेगा। उच्चवर्गीय परिवार कोरोना के बाद के समाज की मांग के अनुरूप पूंजी के अनुरूप अपने रोजगार को बदल देंगे। गांव-शहर में बसे मध्यमवर्गीय परिवार के लोगों को दो-तीन महीने घर में बैठकर या जरूरी काम करते हुए काटने में भी कोई दिक्कत नहीं, पर उनकी भविष्य की सम्भावनाएँ अनिश्चित लगती हैं।


            corona side effects


            सरकारी नौकरी कर रहे लोगों पर करियर और रोजी-रोटी की अनिश्चितता नहीं, पर इतने बड़े देश में आयी चुनौतियों को संभालने के क्रम में सरकारी दवाब का सामना तो करना ही पड़ रहा है। पर प्राइवेट नौकरी कर रहे घर-परिवार से अलग रह रहे युवाओं की चिंता भी कम नहीं, जिन्हे अपने नियोक्ताओं के लाभ की भी चिंता करनी है, कंपनी में बने रहने के लिए ऊपर आनेवाले हर आदेश का पालन कर खुद मेहनत करनी है, घर में सहायिकाओं के अभाव में खाने-पीने, साफ़-सफाई का ध्यान भी रखना है। इसके बाद भी यह तनाव बना ही हुआ है कि किसकी नौकरी बचेगी और किसकी नौकरी जाएगी ?


            पूरे भारतवर्ष से दो तरह की खबरें रही है -- जहाँ किसी प्रदेश, किसी शहर और किसी गाँव से अच्छी व्यवस्था की, मतलब प्रशासन द्वारा खाने-पीने की व्यवस्था की गयी है. जरूरतभर अनाज बांटे गए हैं, पुलिस चुस्त बनी हुई है, लोगों को जमा होने नहीं दिया जा रहा है, सेनिटाइज़ेशन किया जा रहा है तो वहीं किसी प्रदेश, किसी शहर और किसी गाँव से बुरी व्यवस्था की खबर भी, लोग खाने-खाने को मुंहताज हैं, अनाज किसी को मिला किसी को नहीं, पुलिस आराम कर रही है, लोग जमा हो रहे हैं, सैनिटीजसन की तो कुछ चर्चा नहीं है। 

            इससे एक निष्कर्ष तो निकलता है, अच्छी व्यवस्था करने वाला पूरा प्रदेश, शहर या गाँव केंद्र द्वारा दी गयी जिम्मेदारियाँ ले रहा है, जनता को भेजी गयी सुविधाओं को देने में पैसे खर्च कर रहा है, बुरी व्यवस्था करनेवाला प्रदेश, शहर या गाँव केंद्र द्वारा दी गयी जिम्मेदारियाँ नहीं ले रहा है, जनता को भेजी गयी सुविधाओं को न बाँटकर पैसे बचा रहा है। बेईमानी के फल को भोगते हुए हमारे पूर्वजों ने देखा था, इसलिए हमेशा बच्चों को ईमानदारी की शिक्षा दिया करते थे। 

            यह बात अलग है कि बाद में हमारे पाठ्यक्रम से नैतिक शिक्षा का विषय ही गायब कर दिया गया। कोरोना के इस भयंकर दौर में यदि कोई पैसे बचाकर ऊपर से नीचे तक इसे बाँटने जैसा भ्रष्टाचार करके यह सोच रहे हैं कि जनता की आह उन्हें नहीं लगेगी तो गलत सोच रहे, जनता की आह सबसे भारी होती है। इससे निष्कर्ष यही निकलता है कि देश मे स्वार्थियों की कमी नहीं है। नैतिक शिक्षा की बात भूल गए हो। बड़े बुजुर्गों द्वारा दीं गयी शिक्षा भूल गए हो पर आज प्रकृति की ताकत को तो पहचानो। आपत्तिकाल मे दूसरे के हिस्से के पैसे मत रखो नादानो !

            जिस देश के गरीबों को आनेवाले समय मे खाने पीने, जरूरी व्यवस्था मे ही दिक्कत है, सफाई के लिए साबुन और सेनेटाइजर कहाँ से खरीद पाएंगे ? वैज्ञानिकों को कोरोना वायरस पर गाय के गोबर, मूत्र और लकड़ी की राख़ का भी प्रयोग टेस्ट करना चाहिए. पिछली कई महामारियों मे, जब सर्फ़ सैनिटाइज़र का बनना शुरू भी नहीं हुआ था, यह रामबाण साबित हुआ था. प्लेग के बारे मे प्रसिद्द है कि जिनके घर मे गायें थी, उस के घर मे प्लेग नहीं फैला था. गावों मे अभी भी गोबर से घर आँगन लीपे और राख़ का उपयोग हाथ धोने और बर्तन मांजने मे किया जाता है. उम्मीद है, सरकार इसपर ध्यान देगी। 


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              कोविड की बीमारी में उम्र


              कोरोना के बहुत मारक होने की चर्चा कभी नहीं हुई है, विदेशों से भी जो संकेत आ रहे थे, उसके अनुसार स्वस्थ व्यक्ति को कोरोना से डरने की आवश्यकता नहीं थी, आज हमारे देश के केस को देखते हुए भी यही कहा जा सकता है, पर थॉयरॉइड, BP, न्यूमोनिया, हार्ट, किडनी, शुगर के पेशेंट जिस घर में हों, वहाँ रहनेवाले स्वस्थ व्यक्ति भी सावधानी से रहे, कोरोना से खतरा स्वस्थ लोगों को नहीं, पर पहले से कोई बीमारी रखने वालों को तो है, लापरवाही किया तो आप नहीं भुगतेंगे, आपके घर में रहनेवाले कमजोर भुगतेंगे ! आपका परिवार मजबूत है तो नहीं भुगतेगा पर पड़ोसी के परिवार में लोग कमजोर हुए तो भुगतेंगे !

              age factor in covid


              इसलिए न घबराओ, एक और माता आयी हैं ! जबतक टीका नहीं आ जाता, चेचक की तरह इलाज रखो, बच्चों बुजुर्गों की सारी व्यवस्था अलग रखें ! जरूरी कार्यों से बाहर निकलनेवाले अपनी सारी व्यवस्था अलग रखें ! अच्छे मास्क लगाएं, बाहर से आते ही चप्पल बाहर रखें, बहुत सावधानी से बिना किसी चीज को छुए बाथरूम जाएँ ! सबसे पहले हाथ धोयें, कपडे गरम पानी मे डुबोएं और सर से पैर तक अच्छे से सफाई करके नहाये ! बाहर से आनेवाले सामानो को मानकर चलें कि इसमें कोरोना है ! एक सप्ताह बाहर छोड़ दे या साबुन से धो लें ! गरम पानी मे 5 मिनट के लिए डाल दें ! उसके बाद ही उसका उपयोग करें ! चेन टूटेगा, हड़बड़ाहट न रखें ! भारत मे कोरोना का खास असर नहीं देखा जा रहा है ! सावधान रहेंगे तो कोरोना भी आउट और हम भी आउट हो पाएंगे !

              कोरोना के रिकवरी रेट पर मत जाइये, रिकवरी के पहले पूरे महीने जो झेलना पड़ेगा, उसे समझिए ! नादानी मत कीजिए ! कुछ दिनों जरूरी बातों के लिए ही बाहर निकलें ! घर मे रहेंगे तो एक साल पीछे जायेंगे ! बाहर निकले और कोरोना हुआ तो पूरे परिवार डिस्टर्ब होंगे ! कई साल पीछे जायेंगे ! परिवार मे कोई दुर्घटना हो गयी तो जीवनभर खुद को माफ़ न कर सकेंगे ! दूसरे क्या कर रहे हैं, नक़ल न कीजिए ! आप सही कीजिए, दूसरे नक़ल करेंगे ! कोरोना जहाँ फ़ैल जाता है, संभालना मुश्किल होता है ! जहाँ नहीं फैला है, वहाँ फैलने न दें !  अधिक से अधिक लोग पोस्ट को शेयर कीजिए ! ताकि लोग पढ़कर कुछ समझें, भीड़ न बनायें ! बिलकुल जरूरी काम से ही बाहर निकले लोग ! हर जगह भीड़ हो रही है !

              कोविड की बीमारी में उम्र मायने नहीं रखती, शरीर की आतंरिक शक्ति मायने रखती है, 95% लोगों के इस बीमारी से जीतने की शक्ति के पीछे स्वास्थ्यवर्धक खान-पान, शारीरिक श्रम करते रहना, कोई बीमारी न होना है, सलमान ख़ान की दबंग सीरीज की तीनों फिल्मों, पार्टनर, तेरे नाम, जय हो जैसी अनेक फिल्मों में उनके संगीतबद्ध हिट गाने देनेवाले मशहूर संगीतकार जोड़ी साजिद-वाजिद के वाजिद ख़ान का आज सुबह 42 साल की उम्र में ही मुंबई के चेम्बूर में सुराना अस्पताल में निधन हो गया, उन्हें किडनी की बीमारी थी और उनका Covid-19 टेस्ट पॉजिटिव आया था, कोरोना से पहले भी कम उम्र के कई डॉक्टर्स, व्यवसायी की मौत हमलोग देख चुके हैं, किसी भ्रम में ना रहे, सुरक्षा में कोताही करके कोविड को फैलने का मौका न दें !

              मेरी पुस्तक 'मेरी कोरोना डायरी' का एक अंश ! पूरी पुस्तक पढ़ने के लिए नीचे लिंक हैं ! आमेज़न के किंडल पर यह मात्र 100/- रुपये में उपलब्ध हैं :-----



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                कोरोना के केसेज इतने न बढ़ते


                दो-तीन  महीने के पूरे घटनाक्रम को देखकर मालूम हो गया। ऊपरवाली सरकार जो चाहती है वो करवा लेती है। ऊपर से यमराज ने महामारी के रूप मे यमदूतों को भेज दिया तो बचना मुश्किल है। देश का इतना बड़ा लॉक डाउन का निर्णय कुछ काम न आया। गाँव -गाँव मे कोरोना को फैलने का मौका मिल गया। मजदूरों को समझा-बूझाकर बड़े बड़े अपने शहर मे रखकर तीन महीने के चावल-रोटी का खर्च न तो सरकार कर सकी और न उद्योगपति कर पाए। न क्रिकेट के खिलाडी और न फ़िल्म जगत ही, वोट के लिए घर घर पहुँच जाने वाले पक्ष या विपक्ष किसी भी राजनीतिक दल के कार्यकर्ता भी नहीं।

                coronavirus increases


                आज दादाजी की बात बहुत याद आ रही है, 'घर की रोटी आधी भली !' महानगर बड़े लोगों के लिए होता है ! मजदूरों, सामान्य नौकरी पेशा करनेवालों के लिए नहीं होता ! अब चेत जाएँ गाँव के लोग ! आनेवाले दिनों मे देश मे ऐसी व्यवस्था लाने की जरूरत है कि लोग अपने घर से ही पढ़ाई, अपने घर से ही नौकरी कर सकें ! किराये या EMI के खर्चे न हो ! माता-पिता-पत्नी-बच्चों के साथ रह सके ! बहुत उच्च स्तर की पढ़ाई या नौकरी के लिए ही महानगर की आवश्यकता हो ! बाकी की अपने अपने जिले - राज्य के अंदर ही ! दसवीं पास करते ही बच्चों को बाहर भेजो ! ऐसी मजबूरी न बालकों न अभिभावकों के लिए उचित है ! आनेवाले समय मे सरकार के सामने बहुत बड़ी जवाबदेही होगी ! और गांववालों के सामने भी ! जो मजदूर महानगर मे बच जायेंगे, उनके लिए अच्छा ही अच्छा होगा !

                अनिश्चितता के कारण दूर दूर तक बाजार मे मांग की कमी है। लोग सिर्फ आवश्यक आवश्यता पर ही फोकस कर रहे हैं। हर क्षेत्र के उद्योगपति निराशा मे हैं, मकान मालिकों को इतना आत्मविश्वास कहाँ से आ रहा है कि उन्हें नए किरायेदार मिल जायेंगे। बसे बसाये पुराने किरायेदारों को निकाल भगा रहे हैं। सरकार ने अपने नुकसान की परवाह न करके थोड़े देर से ही सही, पर लॉक डाउन की घोषणा तो की। सरकार ने स्पष्ट बोल था कि ये तीन महीने हमें अपने घर के अंदर रहकर काटने हैं, जो समर्थ हैं अपने खाने पीने की व्यवस्था करें, गरीबों के खाने की व्यवस्था सरकार करेगी। जिनतक सरकार नहीं पहुँच पाए, उनतक समाज के लोग मदद करें। भीषण संकट की घडी है, व्यवसायी अपने एम्प्लाइज के खाने पीने की व्यवस्था करें। मकान मालिक किराया न लें, बैंक EMI न लें। 

                कोरोना से जंग सभी देशवासियों को मिलकर जीतना था। सरकार तीन महीने के लिए निम्न आय वाले परिवारों को खाने की व्यवस्था कर रही थी। मध्यम आय वाले तीन महीने के खाने की व्यवस्था खुद कर रहे थे। उच्च वर्ग सरकार को दान देकर भारत को इस बीमारी से लड़ने के लिए तैयार कर रहे थे। सरकार के निर्देश के बावजूद बैंकों EMI लिया , मकान मालिकों ने किराया लिया। प्राइवेट स्कूल फीस लेने के लिए बेचैन हैं। कंपनी के मालिक एम्लॉईज के खाने-रहने की व्यवस्था नहीं पाए , उन्हें भी कोरोना के मामले मे देश का साथ नहीं देता हुआ माना जाना चाहिए। 

                यदि ये सब होता तो कोरोना के केसेज इतने न बढ़ते, गड़बड़ी कहाँ कहाँ आयी, आपलोग ध्यान दें। मैं तो इतना कहूंगी कि जनता ने इस लॉक डाउन को गंभीरता से नहीं लिया। प्रशासन को, पुलिस को, डॉक्टर्स को, नर्सों को काफी दवाब आया। जो बाहर न निकले, वे भी सोसाइटी में पिकनिक मनाते दिखें। घर में किसी एक को सर्दी-बुखार हुआ तो किसी ने खुद से क्वैरेन्टाइन नहीं किया। पूरे घर, सोसाइटी में घूमते मिले। लोगों ने कोरोना की गंभीरता को नहीं समझा। मजदूरों को स्थायित्व का खतरा दिखा। फुर्सत में होम सिकनेस बना, रोज रोज भीड़ इकट्ठी करते रहें। 

                लॉक डाउन के तीसरे दिन से ही यत्र-तत्र जो भीड़ दिखी, वह इसी ओर इशारा करती है। हर जगह सिर्फ लाचारों की भीड़ नहीं थी, हठी की भी भीड़ थी। तीन महीने तो किसी तरह गुजारने थे, सबलोगों को घर में रहकर जीवन जी लेना था, कुछ भी खाकर। सब्जी, दूध की इतनी मारामारी क्यों, हमारे जनरेशन तक पहुँचने के लिए हमारे पूर्वजों ने कितनी मेहनत की है हम भूल गए। संकट के समय जानवर भी एकजुटता को महत्व देते आये हैं, लेकिन हमें नहीं देनी थी । 

                कुल मिलाकर एक बात कही जा सकती है कि एकजुटता की कमी से भारत ने बहुत जगह हार मानी है, लोग माने न माने कोरोना काल का इतिहास भी एकजुटता की कमी का इतिहास बनेगा। उनके द्वारा की जानेवाली लापरवाही भविष्य में सबको कोरोना के चक्र में झोंकेगी, जबतक गलती का अहसास होगा, काफी देर हो चुकी होगी। एक बात यह भी है कि जिस देश मे जागरूकता इतनी कम हो कि हेलमेट और सीट बेल्ट भी फाइन के डर से पहनते हों, वहाँ जनता से कुछ उम्मीद करनी भी बेकार है. हमारे यहाँ अभी कोरोना नहीं आया है, यह बात देशभर मे हर जगह हर महीने फेल हो रही है, फिर भी अभीतक लोग यही बात कर रहे हैं.

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                  आयुर्वेदिक दवाईयां और काढ़ा लीजिए

                  Aayurvedik medicine


                  कुछ दिन पहले तक दूर दूर से आ रही खबरे दिन ब दिन नजदीक पहुँचने लगी है, चिकित्सा के क्षेत्र में हो रहे विकास के कारण समाज से महामारी शब्द के अर्थ, उसके प्रभाव और उसकी सावधानियों की चर्चा गायब हो गयीं थी. यदि ऐसा न होता तो विदेश से आनेवाले नागरिकों के ने जो गलतियां की थी, कम से कम सरकार के अनाउंसमेंट के बाद भी हमारे नेता, आम नागरिक और मजदूरों ने इतनी बड़ी गलती न की होती. 

                  दो महीने का लॉक डाउन बीमारी की चेन तोड़ने के लिए कम नहीं होता, पर लॉक डाउन में यत्र-तत्र भीड़ होते रहने के कारण चेन टूटनेवाली बात ख़त्म हो गयी।  सरकारी व्यवस्था की पोल खोलकर अब क्या होनेवाला? कम साधन में समस्या तो आएंगी, कमियाँ तो रहेंगी ही, भारत में केस बढ़ने नहीं चाहिए थे, हमें लॉक डाउन को सफल बनाना चाहिए था, इसमें बहुत सारे डिस्टर्बेंस आये, लोगों तक भी सही सन्देश नहीं पहुँचाया जा सका, टीवी चैनल्स भी उत्तरदायित्व का पालन नहीं कर सकें, एक पंक्ति में कहा जा सकता है, न तो सरकार और न ही विपक्ष की कार्यशैली सही रही, इतनी बड़ी विपत्ति में भी हम एकजुट नहीं रहे।

                  aayurvedik medicine,


                  अभी भी वक्त है, महामारी किसी को नहीं पहचानती, सावधानी ही एकमात्र उपाय है, ईश्वर सब शुभ करें ! नागरिकों से भी लॉक डाउन के दौरान और अभी भी जो भूलें हो रही हैं, उसमे उनके द्वारा दूरी का पालन नहीं किया जाना मुख्य है. पौष्टिक खाना, शरीर में पानी की प्रचुरता बनाये रखना, आयुर्वेदिक सावधानियां, योगा, चेहरे पर मास्क, हाथ पर नियंत्रण, कम से कम बाहर निकलना - इनका पालन सबसे आवश्यक हो गया है.

                  दिल्ली और मुम्बई में तो अब कुछ नहीं हो सकता, लाख कोशिश कर ले अब जो करेगा ऊपरवाला ही करेगा....छोटे शहरों वाले समझदारी दिखाएँ तो बच सकते हैं ! भारत में कोरोना की ये हालत नही होने देनी चाहिए थी ! अब भी तो नहीं चेत रहे हैं लोग ! कुछ की गलतियों का खामियाजा सब भुगत रहें हैं ! पुलिस को इतना गंभीर हमने कभी नहीं पाया था, जितना कोरोनाकाल में वे गंभीर रहे , पर नतीजा वही ढाक के तीन पात ! शांति से घर में बैठना था दो महीने लोगों को ! झारखण्ड में भी सामुदायिक संक्रमण शुरू हो गया है !

                  सरकार को दोष देने का अधिकार जनता को तबतक नहीं बनता, जबतक वो खुद को पार्टी और पॉलिटिक्स से अलग नहीं करे। जबतक हम खुद को जाति और धर्म, ऊँच और नीच से परे नहीं रखे, जबतक हम नेताओं के तलुए चाटेंगे, स्वार्थी बनकर भ्रष्टाचार का हिस्सा बनेंगे, पेड़ मीडिया की खबरों पर विश्वास करेंगे, हमें सबकुछ सहन करना होगा। फूट डालो और शासन करो, यह राजनीति का मूल मंत्र है, क्या हम एकजुट नहीं होकर इनको अपनी जिम्मेदारी अहसास नहीं करवा सकते ? 

                  यदि हम एकजुट होकर जागरूक नागरिक बन जाएँ, ब्लॉक से लेकर केंद्र तक के गतिविधियों का हिसाब किताब रखें। हमारे आयकर का पैसा वेतन के रूप में खानेवाले जो भी अफसर, कर्मचारी जनता के लायक या उनका हितैषी नदिखे, उनका बॉयकॉट करें! गाँव से लेकर महानगर तक की हर स्तर की जनता की हर समस्या को समझें, समाधान निकालें । चरित्रवान और ईमानदार उम्मीदवारों को खड़ा करें, फिर राजनीति में भी या तो ईमानदार नेता रहेंगे या उन्हें ईमानदार बनने की मजबूरी होगी । एकजुट तो हमें ही होना होगा !

                  पूरे देश को लगातार बंद रखने की बात अब नहीं सोची जा सकती।  कोरोना का हमारे जीवन में प्रवेश हो चुका, आनेवाले वर्षों में दूसरी बीमारियों से कोई मौत नहीं होगी, हर मौत के पीछे कोरोना होगा, और अफ़सोस करते हुए लोगों का वक्तव्य 'कई बीमारियों से ग्रस्त, कमजोर था/थी वो, कोरोना को नहीं झेल पाया/पायी', इसलिए घर से कम से कम निकलिए...शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढाईये, आयुर्वेदिक दवाईयां और काढ़ा लीजिए, यही बचा सकता है सीनियर सिटिज़न को, जिसकी ओर मैं भी बढ़ रही हूँ। 


                  मेरी पुस्तक 'मेरी कोरोना डायरी' का एक अंश ! पूरी पुस्तक पढ़ने के लिए नीचे लिंक हैं ! आमेज़न के किंडल पर यह मात्र 100/- रुपये में उपलब्ध हैं :-----




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                    आध्यात्मिक गुरु के रूप में गत्यात्मक ज्योतिष

                     

                    Spiritual guru in india

                    लगभग सभी ग्रंथों में जीवन को क्षणभंगुर माना गया है, पर यही जीवन मनुष्य को जीवन के कितने उतार-चढ़ाव दिखा देता है। नाना सुख, नाना व्याधियाँ, जब हम सुखी जीवन जी रहे होते हैं तो ऐसा महसूस होता है कि अब हमारे जीवन में दुःख आएंगे ही नहीं। जब हम हमारे जीवन में दुःख आता है तो ऐसा महसूस होता है कि हमें सारा जीवन अंधकार में ही काटना होगा। पर हमारा जीवन ही नहीं, सुख और दुःख दोनों क्षणभंगुर हैं। सुख में हम अहंकारी न हो जाएँ और दुःख में हम निराश न हो जाएँ, इसलिए तो हमें सच्चे गुरु की आवश्यकता पड़ती है। पर आज हम गुरु किसे बनाते हैं ?

                    Spiritual guru in india

                    Top guru in India

                    जिनके पास अट्टालिकाएं हों, १०-२० गाड़ियां हों, यानि सांसारिक तौर पर सफल लोगों को ही हम गुरु बनाते हैं, क्योंकि पैसों के बिना ज्ञान की कोई कीमत नहीं ! और मैंने कई बार उल्लेख किया है, शिक्षक हो, डॉक्टर हों या धर्मगुरु, उनके पैसे पर न जाएँ, शिक्षा, चिकित्सा और चमत्कार से कभी भी प्रभावित न हों, ज्ञान अर्जित करें। सुख में हमें किसी की जरूरत नहीं होती, आप पिकनिक मानते हुए, क्लब जाते हुए, मौज-मस्ती करते हुए समय को आसानी से काट सकते हैं। 

                    पर चाहे आप कितने पैसे वाले, कितने रसूख वाले हों, दुःख के समय की शुरुआत होते ही आपके मनोबल, आपके धैर्य की परीक्षा शुरू हो जाती है, वह बल हमारे धर्म-ग्रंथों में बिखरा पड़ा है, महापुरुषों की सूक्तियों में भरा पड़ा है, प्रतिदिन ईमानदार लोगों की एक-एक पोस्ट में लिखा गया है। इनको इग्नोर करनेवालो को मुसीबत का दिन काटना बहुत कठिन हो जाता है। हमारे पोस्ट पढ़नेवालों में से कोई ऋणात्मकता से जूझ रहे हों तो अपने आसपास ध्यान दें, क्या आपसे दुखी कोई नहीं ? आपको अपना स्तर दिखाई दे जायेगा।

                    Best guru in India

                    भारतवर्ष में जितने भी संसाधन हैं, लोगों को संतोषजनक जीवन देने में समर्थ हैं ! उपजाऊ भूमि, पालतू पशु, पोखर, नदिया सब मिलकर मेहनती व्यक्ति की जरूरतें तो पूरी कर देती हैं ! जब पूरी नहीं हो पाती तो प्रकृति के नियम के तहत दूसरे देशों की तरह ही महामारी आबादी को काम कर देती है ! पेड पौधों को मालूम है कि उनके बीज में क्षमता है। इसलिए वे अपना फल दुनिया को दे देते हैं। एक मनुष्‍य है जिसे विश्‍वास ही नहीं कि उनके बच्‍चों में भी अपरिमित क्षमता मौजूद है। इसलिए वे उनके भविष्‍य की व्‍यवस्‍था में धन के संचय का क्रम बनाए रखते हैं। पर हमारे पूर्वजों ने प्रकृति से लेना नहीं, जरूरतभर उपभोग करके सिर्फ देना सीखा था।  ईश्वर से प्रार्थना है, अनंत काल तक भारतवासियों का यही चरित्र बनाये रखे ! उन्हें लालच से दूर रखे !


                    Adhyatmik guru in India 

                    इतिहास गवाह है कि भारतवासी कभी भी दूसरे देशों के संसाधनों पर कब्जा करने नहीं गए, जहाँ भी गए उस देश के नियमों के हिसाब से रहे, उस देश से प्रेम किया ! प्रेम से बहुत कुछ जीता भी है ! अपने महत्वाकांक्षा के लिए आजतक किसी से लड़ने की आवश्यकता नहीं पडी ! जरूरत में कभी हम लड़े भी तो लंका जीतकर भी विभीषण को सौंपा, बँगला देश बंगाली मुसलमानो को ! यही ज्ञान हमारे साथ रहे तो हम अंदर से चैन से रहेंगे ! 

                    भारत में विक्सित किया गया 'गत्यात्मक ज्योतिष' का ज्ञान आपको आध्यात्मिक ज्ञान प्रदान करता है, यही बताता है कि जो हमारे भाग्य में है, वह हमारे ही प्रयास से हमें ही मिलेगा ! जो मुझे नहीं मिल रहा, उसके लिए कोई और जिम्मेदार नहीं है, प्रकृति हमारी परीक्षा ले रही है। समय आएगा, मुझे मेरा लक्ष्य मिलेगा, प्राकृतिक नियम के इस दृष्टिकोण के आते ही हमारा ध्यान इधर-उधर नहीं भटकता !

                    'गत्यात्मक ज्योतिष' आधारित सूत्रों पर सटीक भविष्यवाणी, उचित परामर्श और समुचित उपचार के लिए संपर्क करें - 8292466723 , gatyatmakjyotishapp@gmail.com

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                      अग्नि परीक्षा से भी बड़ी परीक्षा

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                      कल समाचार में पढ़ने को मिला कि कुछ वृद्धों की कोरोना से हुई मौत के बाद उनके बाल-बच्चों ने मोबाइल ऑफ कर दिया है, ताकि अस्पतालों को जवाब न देना पड़े ! खबर मुझे आहत कर गया, पर बुजुर्ग बाल-बच्चों की ये मानसिकता बनायीं किसने? चीन से कोरोना के शुरुआत से लेकर इसकी अमेरिका और यूरोप तक की यात्रा के बाद जब इसने भारत में कदम रखा, तबतक इसके विषय में ऋणात्मक खबरें ही आती रहीं. लगभग सभी देशों में बीमाऱ होने से लेकर दाहकर्म तक की जिम्मेदारी सरकारों की रही. मतलब आपके घर का कोई बीमाऱ है, आप तनाव ही ले सकते हैं, कर कुछ नहीं सकते, ऐसा सभी देशों, सभी डॉक्टरों का मानना था और है ! ऐसी हालत में दिल्ली में कुछ दिन पहले कोरोना से मौत के बाद शवयात्रा और श्मशान में भीड़ देखकर मैं चौंक गयी थी. मौते जब बहुत बढ़ने लगी तो लोगों में स्वाभाविक तौर पर डर का जन्म हुआ !

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                      दूसरे देशों की तुलना में भारतवर्ष इस मामले में कुछ अनोखा रहा, संसाधनों की कमी वाला देश कुछ दिनों के लॉक डाउन में और कमजोर हो गया ! खैर असहायों की रक्षा ईश्वर करते हैं, भारतवासियों द्वारा उपयोग किये जानेवाले कुछ रक्षात्मक दवाईयों ने असर किया या स्वयं की रोग प्रतिरोधक क्षमता ने, यह तो बताना मुश्किल है ! भारत संक्रमण के मामले में अपना आंकड़ा तो आगे बढ़ाता जा रहा है, पर मौत की खबरें अपेक्षाकृत कम हैं. फिर भी 45-50 से अधिक के उम्र वालों को, BP और शुगर के मरीजों को, हमेशा न्यूमोनिया या सांस की बीमारी वालों को कोरोना से बहुत ख़तरा है, कोरोना से डॉक्टरों की लाचारी और ऐसी मौतें आँखों के सामने से हटती नहीं है ! सरकार के आंकड़ों में मौतें 3% दिखाई दे पर जिनके परिवार का गया, वह उनके लिए 100% था !

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                      बस यही सोचकर मैं चार महीने से कोरोना से बचने के लिए अति सावधानी की सलाह देती आ रही हूँ ! स्वाभाविक है, कोरोना मरीजों से दूरी बनाये रहना और भी आवश्यक है ! कोरोना काल में सावधानी से रह रहे एक परिवार के बुजुर्ग अचानक बीमाऱ पड़ जाते है, अस्पताल में पहुँचने के बाद कोरोना से ग्रस्त हो जाते हैं, उनके सपूतों को उन्हें अस्पताल में छोड़कर आना पड़ता है ! सपूत भी क्या करें, आजकर अधिकांश लोग 35-40 की उम्र में bp-शुगर पेशेंट हैं, ख़तरा बड़ा है, घर में भी बच्चे हैं, सबकुछ छोड़कर एक के पीछे कैसे चलें ! ऊपर से सरकार, पुलिस और नियम के विरुद्ध करें तो महामारी एक्ट में फंसना है !

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                      पानी में डूबता हुआ आदमी बहुत बेचैनी में होता है ! उसके आसपास जो भी मिले, अपने बचने के लिए उसे कसकर पकड़ना चाहता है ! गलती से कोई उसकी पकड़ में आ गया तो दोनों का डूबना निश्चित है, इसलिए होश में रहनेवाले व्यक्ति उसका हाथ झटक देते हैं और दूसरे उपाय करते हैं ताकि उसे बचाया जा सके ! बहुत जगहों पर अति प्रेम और भावना में बहकर पूरे परिवार के एक साथ मौत होते देखा है ! कोरोना काल में लोगों से बहुत सारी गलतियाँ होंगी, लेकिन होगा वही जो राम ने रच रखा है ! शायद अभी कोरोना से हो रही मौत वाले वृद्धों का यथोचित संस्कार ईश्वर ने नहीं लिखा हो ! कोरोना कई परिवारों के लिए अग्नि परीक्षा से भी बड़ी परीक्षा लेकर आया है !

                      मेरी पुस्तक 'मेरी कोरोना डायरी' का एक अंश ! पूरी पुस्तक पढ़ने के लिए नीचे लिंक हैं ! आमेज़न के किंडल पर यह मात्र 100/- रुपये में उपलब्ध हैं :-----


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                        कोरोनिल नाम की दवाई लॉन्च

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                        कल से ही बाबा रामदेव जी के द्वारा कोरोनिल नाम की दवाई लॉन्च किये जाने और सरकार द्वारा इसके प्रचार पर रोक लगाने के साथ ही दवाई के पक्ष और विपक्ष में विमर्श चल रहा है ! सरकार अपना प्रोसेस करेगी ही, करनी भी चाहिए, पर मैंने आजतक किसी भी वस्तु या सेवा के बाजार में बिकने या उसके मूल्य निर्धारण में सरकार की दखलंदाजी नहीं देखी, किसी को विरोध करते भी नहीं पाया ! पूरा भारतवर्ष विश्वास पर चल रहा है ! जिस शिक्षक के पढ़ाने का ढंग पसंद है, जिस मिस्त्री का काम आपको पसंद है, जिस टेलर का काम आपको पसंद है, जिस ज्योतिषी का काम आपको पसंद है, जिस देशी विदेशी कंपनी का काम आपको पसंद है, जो घर -मकान आपको पसंद है, सामने प्रतिस्पर्धी नहीं हो, तो वह अपने वस्तु या सेवा के लिए मनमाना रेट रख सकता है, इसलिए काफ़ी अजूबा लग रहा है ! दवाई ने एक -दो महीने में दावे के हिसाब से परिणाम नहीं दिया तो खुद बिक्री ख़त्म हो जाएगी, इसमें रोक लगने का कोई उचित कारण नहीं दिख रहा ! पतंजलि ने बताया है कि अगले सोमवार को दवा के ऑनलाइन ऑर्डर के लिए एक मोबाइल ऐप 'ऑर्डर मी' लॉन्च की जाएगी, जिसके जरिए दवा खरीदी जा सकेगी। वहीं, जो लोग इसे ऑफलाइन स्टोर से खरीदना चाहते हैं, वे एक सप्ताह बाद पतंजलि के स्टोर से खरीद सकेंगे। ५४५ रुपये में ३० दिन की दवा होगी !


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                        कोरोना काल में सभी भयभीत हैं, न जाने कब कहाँ से कैसी खबर सुननी पड़ जाये, कब कोरोना किसी को काल का ग्रास बना ले ! एलोपैथी के पास कोई दवाई नहीं, जो कोरोना के गंभीर मरीजों को ठीक कर सके ! डॉक्टर स्वीकार कर रहे हैं कि कोरोना से आपका रोग प्रतिरोधक क्षमता ही बचा सकता है, बीमारी से बचने के लिए रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाये रखने की पूरी वकालत हमारे प्राचीन ज्ञान आयुर्वेद में की गयी है और उसके बहुत सारे उपाय भी बताये गए है, कोरोना काल में भारतीयों ने अपने सुविधानुसार नीम्बू पानी, हल्दी वाली दूध, आमला, गिलोय, एलोवेरा, त्रिफला, अन्य आयुर्वेदिक तत्वों को अपने खाने पीने में शामिल कर लिया है ! फिर भी जीवन अनिश्चितता में ही चल रहा है !

                        Can corona cure corona


                        इसी अनिश्चितता के दौर में पतंजलि के रामदेव बाबा जी ने कोरोना के उपचार के लिए एक दवाई लॉन्च कर दी है ! अपने शुरुआती दौर में ही बाबाजी लोगों का विश्वास जीत चुके हैं, इसलिए आज उनके अनुसरणकर्ताओं को ख़ुशी होनी स्वाभाविक है ! एलोपैथी के काम करने का ढंग बिलकुल अलग है, वह कुछ ठोस मिलने पर ही कोई निर्णय लेगा, अभी कोरोना की बदलती संरचना को ही नहीं समझ पा रहा ! घर में बंद रहकर धीरे धीरे लोगों का धैर्य समाप्त हो रहा है, इसलिए बाबा की दवाई में आशा की किरण दिखाई दे रही है ! वैसे भी सरकार ने सबकुछ खोल दिया है, घर से निकलने की मजबूरी आती जा रही है, ऐसे में मामूली खर्च में मिलने वाली कोरोना की दवा मानसिक और मनोवैज्ञानिक तौर पर लोगों को मजबूती देने में समर्थ है, जिससे भी किसी बीमारी को जीतने में मदद मिलती है !

                        Coronil is effective or not

                        पर चुंकि यह दवाई बाबा रामदेव के द्वारा बनायी गयी है, आयुर्वेदिक आधार पर बनायी गयी है, भारतीय सभ्यता और संस्कृति जिन्हे फूटे आँखों नहीं सुहाती, भारतीय परम्परा, आयुर्वेद, वैदिक गणित, ज्योतिष, योगा के उपहासमे जिन्हे आनंद आता है, वे दवाई के विरोध के कारण आज सरकार के पक्ष में हो गए है, जो सरकार भी उन्हें कभी नहीं सुहाई. तर्क भी ऐसे दे रहे है, बाबा व्यवसायी है, अपने कमाने की व्यवस्था कर रहे हैं ! यह सच है कि बाबा व्यवसायी हैं, पर बिना व्यावसायिक बुद्धि वालों के किस ज्ञान को आप सबों ने मिलकर अबतक आगे बढ़ाने का प्रयास किया ! एक दशक पहले की बात है, किसी अनिल कुमार नाम के व्यक्ति ने पूरे भारतवर्ष के भ्रमण के दौरान एकसे बढ़कर एक नवोन्मेष के सैकड़ों उदाहरण के साथ कादम्बिनी पत्रिका में लेख लिखा था. उनका वेबसाइट भी चल रहा है, आजतक किसी भारतीय रिसर्च को आगे बढ़ते मैंने नहीं देखा ! पर अब के हिन्दुस्तानियो को रोकना मुश्किल है, यह नया भारतवर्ष है !

                        मेरी पुस्तक 'मेरी कोरोना डायरी' का एक अंश ! पूरी पुस्तक पढ़ने के लिए नीचे लिंक हैं ! आमेज़न के किंडल पर यह मात्र 100/- रुपये में उपलब्ध हैं :-----



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                          More than four decades of continuous astrological research and dedication have helped Gatyatmak Jyotish develop a loyal following, we have been working to develop an astrological mobile application that could help us connect better in the smartphone era. It is not only a rashifal 2021 app. With the launch of this Jyotish app, which needs only your basic birth details to operate, we will be able to provide users with a range of astrological services ranging from a daily forecast, yearly forecast to a life charter in Hindi and in English also.

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                          Everyone has a keen interest in Jyotish vidya. But Gatyatmak Jyotish believes that your zodiac horoscope is able to tell about your entire personality and life-journey. Astrology sign is important in every person's horoscope, but the lord of astrological signs and the Dynamic and static strength of the planets in every house is responsible for all the situations that present before you. Aries horoscope, Taurus horoscope, Gemini horoscope, cancer horoscope, Leo horoscope, Virgo horoscope, libra horoscope, Scorpio horoscope, Sagittarius horoscope, Capricorn horoscope, Aquarius horoscope, Pisces horoscope --- all persons with the same ascendant live life in different circumstances.

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                          Similarly, in the same astrological sign of moon or sun, horoscope Aries, horoscope Taurus, horoscope Gemini, horoscope cancer, horoscope Leo, horoscope Virgo, horoscope libra, horoscope Scorpio, horoscope Sagittarius, horoscope Capricorn, horoscope Aquarius, horoscope Pisces ---- everyone with same moon's sign or sun's sign, gets different atmosphere. Therefore, it is believed that the rules of Jyotish shastra are not so simple. By combining all the principles of Gatyatmak Jyotish, our newly launched this astrology app has the ability to say accurate forecasts for you.

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                          Till now, If you want to match the horoscope of boy and girl, then find Jyotish vidya software, do online Kundli matching, which does not provide any benefit. For Kundli matching, we do not just see the position of Mars or the constellation of the moon, we see the natal chart of boy and girl, planets in all zodiac sign, analyze birth chart by understanding the position of planets. If one suffers marital issues in one's kundali, then the marital affairs of the other should be strong. Dynamic astrology is accurate for astrological consultation, it does not talk of miracles. Its astrological remedies are also quite affordable.

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                          In the coming times, even more, minute predictions than horoscopes will come in our app. Other paid astrological services are also available in the app, from which you can make gatyatmak Kundli, get Kundli checked, and get accurate future prediction through you, so you must install our app. Although our consultation fee for horoscope reading, Kundli matching, horoscope making is very low, we also offer free Kundli reading from time to time, so always stay with the app.

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                            ज्योतिष और आध्यात्म

                             

                            Aadhyatm gyan in Hindi by jyotish

                            किसी खास युग में हर क्षेत्र में किसी प्रकार की सफलता प्राप्‍त करने के लिए चाहे जिन गुणों और ज्ञान का महत्‍व हो , वे किसी एक व्‍यक्ति को शीर्ष तक क्‍यूं न पहुंचा देते हो , उनकी देखा देखी वैसे गुणों को आत्‍मसात कर स्‍वयं भी ऊंचाई पर पहुंचने के लिए चाहे हमारे जैसे कितने भी लोग प्रयत्‍नशील क्‍यूं न हों , सफल होकर हम सांसारिक सफलताओं से लैस ही क्‍यूं न हो जाएं , पर वह चिरंतन और स्‍थायी सुख नहीं दे पाते। स्‍थायी मा‍नसिक सुख प्राप्‍त करने के लिए कुछ ऐसे नियमों की जानकारी आवश्‍यक होती है , जिसे हमारे महापुरूषों द्वारा हर धर्म के सिद्धांतों के रूप में जोड दिया गया। 

                            ये सिद्धांत किसी भी व्‍यक्ति से 'अहं' को दूर करते हैं और इनके पालन से हमारे क्रियाकलाप सर्वजनहिताय होते हैं। सिर्फ अपने बारे में ही नहीं , सारे प्राणियों के साथ साथ दुनिया के एक एक कण से प्‍यार और उनकी सुरक्षा के लिए चिंतन ही आध्‍यात्‍म की ओर जाने की सीढी है । आज के दौर में गलत हाथों में जाकर धर्म का स्‍वरूप भले ही विकृत हो गया हो , पर दुनिया के प्रत्‍येक धर्म की खासियत यही थी , इससे इंकार नहीं किया जा सकता।

                            Aadhyatm gyan in Hindi by jyotish

                            Adhyatma Vigyan

                            आज का युग पूरे स्‍वार्थ का हो गया है , हर व्‍यक्ति को सिर्फ अपने से मतलब है।  अपना शरीर , अपने परिवार , अपने बच्‍चे , अपना व्‍यवसाय और अपना ही विकास , इसके लिए हम कोई भी तरीका अपनाने को तैयार हैं। गलत धरातल पर खडे होने के बाद भी हम अपनी उपलब्धियों पर गुमान करते हैं , बच्‍चों को भी सांसारिक रूप से ही सफल होने के हर गुर सिखाते हैं। एक व्‍यक्ति नहीं , आज सारे ही आगे बढने के लिए एक दूसरे को धक्‍का दे रहे हैं। आज ताकतवर की ही चल रही है , अपनी अपनी ताकत का हम सब दुरूपयोग कर रहे हैं , ऐसे में समस्‍त चर अचर मुसीबत में हैं। जबतक खुद के साथ विपत्ति नहीं आ जाती , दूसरे की समस्‍या पर हंसना आज हमारा खेल बना होता है। पर जब हमारे ऊपर मुसीबत आती है और हम लाचार होते हैं , तब समझ में आता है कि हमने जीवन में क्‍या क्‍या गल्तियां की हैं और हमारी जीवनशैली क्‍या होनी चाहिए। पर तब पछताने के सिवा कुछ भी नहीं होता।


                            Jyotish and Aadhyatm

                            ज्‍योतिष की सहायता से हम ग्रहों के पृथ्‍वी के जड चेतन पर पडनेवाले प्रभाव का अध्‍ययन करते हैं। जिस प्रकार प्रकृति में मौजूद हर जड चेतन की तरह में कुछ न कुछ विशेषताएं होती हैं , इसी प्रकार प्रत्‍येक मनुष्‍य भी भिन्‍न भिन्‍न बनावट के होते हैं , प्रत्‍येक में अलग अलग क्षमता होती है , इसलिए सबके पास सबकुछ नहीं हो सकता। भले ही सभी जड चेतन एक जैसे जीवन चक्र से गुजरते हों , पर चूंकि मनुष्‍य सबसे अधिक विकसित प्राणी है , और इसके जीवन के बहुत सारे आयाम हैं , इस कारण एक जैसे दिखने के बाद भी मनुष्‍य की जीवनशैली एक जैसी नहीं। दुनियाभर में समान उम्र के लोग भी भिन्‍न भिन्‍न परिस्थितियों से गुजरने को बाध्‍य होते हैं , प्रकृति के खास नियम के हिसाब से एक का समय अनुकूल होता है तो दूसरे का प्रतिकूल ।

                            Aadhyatma sadhana Kendra

                            ज्‍योतिष विषय की सहायता से हमें ग्रहों की मदद से अनुकूल और प्रतिकूल परिथितियों को जानने में मदद मिलती है। जब अनुकूल समय होता है , तो हमारा आत्‍मविश्‍वास बढाने के लिए हमारे मनोनुकूल वातावरण होता है , जबकि प्रतिकूल समय में हमारे साथ ऐसी ऐसी घटनाएं होती हैं , जिनसे हमारे आत्‍मविश्‍वास पर असर पडता है। जब हम अपने मनोनुकूल समय में अपने अधिकार के साथ साथ कर्तब्‍यों का पालन भी करें , तो प्रतिकूल समय में हमें काफी राहत मिल सकती है। 

                            पर यदि मनोनुकूल समय में अधिकारों का दुरूपयोग करेंगे , तो उसका बुरा फल प्रतिकूल समय में हमें या हमारे संतान को अवश्‍य झेलने को मजबूर होना होगा। प्रत्‍येक बुरा कार्य करने से पहले हमारी अंतरात्‍मा बारंबार झकझोरती है , पर हम उसे अनसुना करते हैं , पर उस गल्‍ती को करने के बाद एक दिन भी चैन से नहीं रह पाते। जिस सांसारिक सफलता को देखकर हम प्रभावित होते हैं , उसका मनुष्‍य के सुख और चैन से कोई संबंध नहीं होता। प्रकृति से जुडा व्‍यक्ति ही सर्वाधिक सुख और चैन से रह सकता है।

                            Jeevan me Aadhyatm ka mahatwa

                            इसके अलावे ज्‍योतिष से हमें इस बात के संकेत मिल जाते हैं कि जातक के आनेवाले समय में किसी खास पक्ष का वातावरण सुखद रहेगा या कष्‍टप्रद ..  इस बात का अहसास होते ही प्रकृति के नियमों के प्रति हमारा विश्‍वास गहराने लगता है। चूंकि सुख और कष्‍ट की सीमा को जान पाना मुश्किल है , इसलिए हमलोग किसी भी परिस्थिति में हार नहीं मानते , अंत अंत तक जीतने की कोशिश करते है , पर न जीत का घमंड होता है , न हार का गम । हम यह मान लेते हैं कि जो भी परिणाम हमारे सामने है , वो प्रकृति के किसी नियम के अनुसार हैं। 

                            हमने किसी समय कोई गल्‍ती की , जिसका फल हमें भुगतना पड रहा है। ऐसी स्थिति में हम दूसरों पर व्‍यर्थ का दोषारोपण नहीं करते , प्रकृति को जिम्‍मेदार मानकर अपने मन को कलुषित होने से बचा लेते हैं। हमें विश्‍वास हो जाता है कि यदि जानबूझकर दूसरा हमें कष्‍ट दे रहा है , तो प्रकृति उसका हिसाब किताब अवश्‍य रखती है और आनेवाले दिनों में उसका फल उसे स्‍वयं मिलेगा। इस प्रकार प्रकृति के नियमों के सहारे आध्‍यात्‍म का ज्ञान हमें ज्‍योतिष के माध्‍यम से मिल जाता है।

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