आयुर्वेदिक दवाईयां और काढ़ा लीजिए - Gatyatmak Jyotish

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Wednesday, 24 June 2020

आयुर्वेदिक दवाईयां और काढ़ा लीजिए

Aayurvedik medicine


कुछ दिन पहले तक दूर दूर से आ रही खबरे दिन ब दिन नजदीक पहुँचने लगी है, चिकित्सा के क्षेत्र में हो रहे विकास के कारण समाज से महामारी शब्द के अर्थ, उसके प्रभाव और उसकी सावधानियों की चर्चा गायब हो गयीं थी. यदि ऐसा न होता तो विदेश से आनेवाले नागरिकों के ने जो गलतियां की थी, कम से कम सरकार के अनाउंसमेंट के बाद भी हमारे नेता, आम नागरिक और मजदूरों ने इतनी बड़ी गलती न की होती. 

दो महीने का लॉक डाउन बीमारी की चेन तोड़ने के लिए कम नहीं होता, पर लॉक डाउन में यत्र-तत्र भीड़ होते रहने के कारण चेन टूटनेवाली बात ख़त्म हो गयी।  सरकारी व्यवस्था की पोल खोलकर अब क्या होनेवाला? कम साधन में समस्या तो आएंगी, कमियाँ तो रहेंगी ही, भारत में केस बढ़ने नहीं चाहिए थे, हमें लॉक डाउन को सफल बनाना चाहिए था, इसमें बहुत सारे डिस्टर्बेंस आये, लोगों तक भी सही सन्देश नहीं पहुँचाया जा सका, टीवी चैनल्स भी उत्तरदायित्व का पालन नहीं कर सकें, एक पंक्ति में कहा जा सकता है, न तो सरकार और न ही विपक्ष की कार्यशैली सही रही, इतनी बड़ी विपत्ति में भी हम एकजुट नहीं रहे।

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अभी भी वक्त है, महामारी किसी को नहीं पहचानती, सावधानी ही एकमात्र उपाय है, ईश्वर सब शुभ करें ! नागरिकों से भी लॉक डाउन के दौरान और अभी भी जो भूलें हो रही हैं, उसमे उनके द्वारा दूरी का पालन नहीं किया जाना मुख्य है. पौष्टिक खाना, शरीर में पानी की प्रचुरता बनाये रखना, आयुर्वेदिक सावधानियां, योगा, चेहरे पर मास्क, हाथ पर नियंत्रण, कम से कम बाहर निकलना - इनका पालन सबसे आवश्यक हो गया है.

दिल्ली और मुम्बई में तो अब कुछ नहीं हो सकता, लाख कोशिश कर ले अब जो करेगा ऊपरवाला ही करेगा....छोटे शहरों वाले समझदारी दिखाएँ तो बच सकते हैं ! भारत में कोरोना की ये हालत नही होने देनी चाहिए थी ! अब भी तो नहीं चेत रहे हैं लोग ! कुछ की गलतियों का खामियाजा सब भुगत रहें हैं ! पुलिस को इतना गंभीर हमने कभी नहीं पाया था, जितना कोरोनाकाल में वे गंभीर रहे , पर नतीजा वही ढाक के तीन पात ! शांति से घर में बैठना था दो महीने लोगों को ! झारखण्ड में भी सामुदायिक संक्रमण शुरू हो गया है !

सरकार को दोष देने का अधिकार जनता को तबतक नहीं बनता, जबतक वो खुद को पार्टी और पॉलिटिक्स से अलग नहीं करे। जबतक हम खुद को जाति और धर्म, ऊँच और नीच से परे नहीं रखे, जबतक हम नेताओं के तलुए चाटेंगे, स्वार्थी बनकर भ्रष्टाचार का हिस्सा बनेंगे, पेड़ मीडिया की खबरों पर विश्वास करेंगे, हमें सबकुछ सहन करना होगा। फूट डालो और शासन करो, यह राजनीति का मूल मंत्र है, क्या हम एकजुट नहीं होकर इनको अपनी जिम्मेदारी अहसास नहीं करवा सकते ? 

यदि हम एकजुट होकर जागरूक नागरिक बन जाएँ, ब्लॉक से लेकर केंद्र तक के गतिविधियों का हिसाब किताब रखें। हमारे आयकर का पैसा वेतन के रूप में खानेवाले जो भी अफसर, कर्मचारी जनता के लायक या उनका हितैषी नदिखे, उनका बॉयकॉट करें! गाँव से लेकर महानगर तक की हर स्तर की जनता की हर समस्या को समझें, समाधान निकालें । चरित्रवान और ईमानदार उम्मीदवारों को खड़ा करें, फिर राजनीति में भी या तो ईमानदार नेता रहेंगे या उन्हें ईमानदार बनने की मजबूरी होगी । एकजुट तो हमें ही होना होगा !

पूरे देश को लगातार बंद रखने की बात अब नहीं सोची जा सकती।  कोरोना का हमारे जीवन में प्रवेश हो चुका, आनेवाले वर्षों में दूसरी बीमारियों से कोई मौत नहीं होगी, हर मौत के पीछे कोरोना होगा, और अफ़सोस करते हुए लोगों का वक्तव्य 'कई बीमारियों से ग्रस्त, कमजोर था/थी वो, कोरोना को नहीं झेल पाया/पायी', इसलिए घर से कम से कम निकलिए...शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढाईये, आयुर्वेदिक दवाईयां और काढ़ा लीजिए, यही बचा सकता है सीनियर सिटिज़न को, जिसकी ओर मैं भी बढ़ रही हूँ। 




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