बुद्धिजीवी वर्ग और हमारा समाज

Intellectual meaning in hindi

पूरे शरीर का जितना प्रतिशत हिस्‍सा मस्तिष्‍क का होता है, समाज में उतना ही प्रतिशत बुद्धिजीवीयों का होता है ! बुद्धि के हिसाब से हमारे शरीर के अंग काम न करे तो अंजाम आप जानते ही हैं ! मस्तिष्‍क पूरे शरीर की चिंता न करे तो भी अंजाम की कल्‍पना कर सकते हैं ! पुराने युग मे राजा-महाराजा बुद्धिजीवियों यानि गुरुओं के चरण पखारा करते थे, पर आज समाज धन को महत्व देता है ,  बुद्धिजीवियों को महत्व देना शुरू कीजिए !

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Intellectuals and race

हे बुद्धिजीवियों , आप भी अपनी बुद्धि का सार्थक प्रयोग करना सीखिए, चाहे आप जिस परिवार, जाति और धर्म के हों, अपने समाज के , आसपास के लोगों को विकसित बनाने के यत्न कीजिए ! अपने विचारों में जनकल्याण की भावना को जन्म दें।  मेरी इस बात से परिवार , समाज , देश और राष्‍ट्र के टूटने की वजह समझ जाइए, जिसके टूटने के बाद कोई सुखी नहीं होता !

Quotes about intellectuals

कोई भी विचार हर दृष्टिकोण से सही नहीं होता। इसलिए दस तरह के विचारों की कमी बेशी का विश्‍लेषण करने के बाद जो सर्वसम्‍मत विचार बनते हैं, वही मानने योग्‍य होते हैं। पर हम अपने विचार को ही सर्वश्रेष्‍ठ मानते हुए किसी और की बातों को सुनना भी नहीं चाहते, एकांगी विचारधारा सर्वमान्‍य नहीं हो सकती। इसलिए हमें एकांगी विचारधारा वालों के न तो लेख पढ़ने चाहिए और न ही पुस्तकें। किसी बात का बेवजह विरोध पर कूदने वाले भी अच्छे नहीं होते।

The responsibility of intellectuals

हमारे विद्वानों को अपनी मातृभाषा में लिखने के बाद ही क्रमशः हिंदी या अंग्रेजी में लिखना चाहिए। प्राइमरी तक के बच्चों के लिए क्षेत्रीय भाषा में ज्ञान देना अच्छा है, उसके बाद हिंदी और अंग्रेजी का नंबर आना चाहिए। हमारे बच्‍चों को अंग्रेजी इसलिए पढनी पडती है, क्‍योंकि आजतक हमारे देश के विद्वानों ने सिर्फ अंग्रेजी में ही अपने ज्ञान को अभिव्‍यक्ति दी है। जिस दिन हमारे देश के विद्वान हमारी भाषाओं में अपने ज्ञान को किताबों और भाषणों की शक्‍ल में अभिव्‍यक्ति देने लगेंगे, हमारे बच्‍चों को अंग्रेजी माध्‍यम में पढने की जरूरत नहीं पडेगी। हमारे जैसे छोटे लोगों को जितनी समझ है, काश महान कहें जाने वाले लोगों को भी होती तो हमारे देश की ऐसी दुर्दशा नहीं होती।

Intellectuals and society

प्राचीनकाल में ज्ञानी ब्राह्मण और साधुओं की यथोचित क़द्र होती थी। पेट पालने के लिए शारीरिक श्रम की आवश्यकता नहीं होती थी। किसी के घर में पहुँच जाये, आदर सम्मान के साथ उनके खाने-पीने-रहने का इंतजाम किया जाता था। आज भले ही युग बदल गया हो, फिर भी बुद्धिजीवी वर्ग का गुजारा रॉयल्‍टी से होना चाहिए, यदि उन्हें अपनी आवश्यकता की पूर्ति के लिए शारीरिक श्रम करना पड़ता है तो उस देश की तरक्‍की असंभव है। देश में ऐसी स्थिति बनाने के लिए व्‍यावसायिक वर्ग और आम जनता को पैसे से अधिक ज्ञान को महत्‍व देना होगा। 

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2 टिप्‍पणियां:

अनीता सैनी ने कहा…

जी नमस्ते ,
आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार(२६ -०६-२०२०) को 'उलझन किशोरावस्था की' (चर्चा अंक-३७४५) पर भी होगी।
आप भी सादर आमंत्रित है
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अनीता सैनी

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' ने कहा…

बहुत सुन्दर।
सार्थक सन्देश।

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