कुंभ लग्‍नवालों के जीवन के विभिन्‍न संदर्भ

 

Kumbha lagna ki kundli

Kumbh lagn me chandra ka fal

आसमान के 300 डिग्री से 330 डिग्री तक के भाग का नामकरण कुंभ राशि  के रूप में किया गया है। जिस बच्‍चे के जन्‍म के समय यह भाग आसमान के पूर्वी क्षितिज में उदित होता दिखाई देता है , उस बच्‍चे का लग्‍न कुंभ माना जाता है। कुंभ लग्‍न की कुंडली के अनुसार मन का स्‍वामी चंद्र षष्‍ठ भाव का स्‍वामी होता है और यह जातक के प्रभाव और रोग , ऋण , शत्रु जैसे हर प्रकार के झंझट का प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए कुंभ लग्‍न के जातकों के मन को पूर्ण तौर पर प्रभावित करने वाले संदर्भ किसी प्रकार के झंझट ही होते हैं। जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में चंद्र के मजबूत रहने पर ऐसे जातकों के समक्ष किसी प्रकार का झंझट उपस्थित नहीं होता , जो मन को खुश रखता है। जबकि जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में चंद्र के मजबूत रहने पर कई तरह के झंझट उपस्थित होकर इनके मन को दुखी करते हैं। 'गत्यात्मक ज्योतिष' चन्द्रमा की शक्ति का निर्णय इसके आकार के आधार पर करता है। अमावस के चन्द्रमा को शुन्य, दोनों अष्टमी के चन्द्रमा को 50 और पूर्णिमा के चन्द्रमा को 100 प्रतिशत गत्यात्मक शक्ति दी जाती है। 


Kumbha lagna ki kundli


Kumbh lagna me surya ka fal

कुंभ लग्‍न की कुंडली के अनुसार समस्‍त जगत में चमक बिखेरने वाला सूर्य सप्‍तम भाव का स्‍वामी होता है और यह जातक के घर गृहस्‍थी का प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए अपने नाम यश को फैलाने के लिए कुंभ लग्‍न के जातक अपनी घर गृहस्‍थी को महत्‍व देते हैं। जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में सूर्य के मजबूत रहने से इनके घर गृहस्‍थी का वातावरण और दाम्‍पत्‍य जीवन बहुत ही उत्‍तम कोटि का और अनुकरणीय होता है , जबकि जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में सूर्य के कमजोर रहने इन्‍हें अपनी दाम्‍पत्‍य जीवन से कष्‍टकर समझौता करने को बाध्‍य होना पडता है।  'गत्यात्मक ज्योतिष' में सूर्य को हर वक्त 50 प्रतिशत गत्यात्मक शक्ति दी जाती है, पर यह जिस ग्रह की राशि में होता है, उससे इन्हे गत्यात्मक शक्ति प्रभावित होकर थोड़ी धनात्मक या ऋणात्मक हो जाती  है। 

Kumbh lagna me mangal ka fal

कुंभ लग्‍न की कुंडली के अनुसार मंगल तृतीय और दशम भाव का स्‍वामी होता है और यह जातक के भाई बहन , बंधु बांधव , पिता , समाज और पद प्रतिष्‍ठा का प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए इस लग्‍न के जातकों के परिवेश में भाई , बहन , बंधु बांधव ,  पिता , समाज सभी शामिल होते है। जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में मंगल के मजबूत रहने पर भाई बंहन बंधु बांधवों से लेकर पिता समाज के सारे बुजुर्गों से इनके संबंध अच्‍छे बने होते हैं और इसके कारण प्रतिष्‍ठा के पात्र बनते हैं। विपरीत स्थिति में यानि जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में मंगल के कमजोर रहने पर भाई , बंधु , पिता , समाज या अन्‍य लोगों का कष्‍ट झेलने को इन्‍हे बाध्‍य होना पडता है , इनकी प्रतिष्‍ठा पर भी आंच आती है।  'गत्यात्मक ज्योतिष' मंगल की शक्ति का निर्णय इसके सूर्य के निकट होने या दूर होने से करता है, जन्मकुंडली में मंगल सूर्य के निकट हो तो मंगल को अधिकतम गत्यात्मक शक्ति मिलती है, सूर्य से जितना दूर होता है, शक्ति घटती जाती है, सूर्य और मंगल आमने सामने हो तो मंगल काफी कमजोर होता है। 

Kumbh lagna me shukra ka fal

कुंभ लग्‍न की कुंडली के अनुसार शुक्र चतुर्थ और नवम भाव का स्‍वामी है और यह जातक के मातृ पक्ष और हर प्रकार की छोटी बडी संपत्ति , स्‍थायित्‍व के साथ साथ भाग्‍य आदि का प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए कुंभ लग्‍नवालों के हर प्रकार के संपत्ति का उनकी माता या भाग्‍य से संबंध बना होता है। जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में शुक्र के मजबूत रहने पर कुंभ लग्‍नवाले माता या भाग्‍य के सहयोग से हर प्रकार की संपत्ति का सुख प्राप्‍त कर लेते हैं और स्‍थायित्‍व की मजबूती पाते हैं। पर जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में शुक्र कमजोर हो तो मातृ पक्ष से कष्‍ट होता है , उनके साथ विचारों का तालमेल न होने से या भाग्‍य के साथ न देने से हर प्रकार के संपत्ति के सुख में बाधा आती है और स्‍थायित्‍व कमजोर दिखाई पडता है।  'गत्यात्मक ज्योतिष' शुक्र की शक्ति का निर्णय उसकी गति से करता है, शुक्र की गति प्रतिदिन 1 डिग्री से अधिक हो तो शुक्र को अधिक गत्यात्मक शक्ति मिलती है, प्रतिदिन 1 डिग्री हो तो 50 प्रतिशत , यदि गति 1 डिग्री से कम होने लगती है तो गत्यात्मक शक्ति भी कम होने लगती  है, जैसे ही शुक्र वक्री होता है तेजी से घटती हुई गत्यात्मक शक्ति शुन्य हो जाती है। 

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Kumbh lagna me budh ka fal

कुंभ लग्‍न की कुंडली के अनुसार बुध पंचम और नवम भाव का स्‍वामी है और यह जातक के बुद्धि , ज्ञान संतान और जीवनशैली का  प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए इस लग्‍न के जातक अपनी बुद्धि का उपयोग हमेशा जीवनशैली को सुधारने के लिए करते हैं। यही कारण है कि हमारे देश में अधिकांश चिंतकों और विचारकों ने कुंभ लग्‍न में ही जन्‍म लिया था। ये ऐसी जीवनशैली पर विश्‍वास रखते हैं , जो आनेवाली पीढी को अधिक सक्षम बना सके। जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में बुध के मजबूत रहने पर ऐसे जातकों की अपनी बुद्धि , ज्ञान की मजबूती के साथ साथ संतान के मामलों की मजबूती भी देखने को मिलती है , इनकी जीवनशैली मजबूत होती है। जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में बुध के कमजोर रहने पर जातक खुद तो दिमाग से कमजोर होता ही है , संतान पक्ष से भी बडी उम्‍मीद नहीं रख पाता और उसकी जीवनशैली में सुधार नहीं हो पाता।  'गत्यात्मक ज्योतिष' बुध की शक्ति का निर्णय उसकी गति से करता है, बुध की गति प्रतिदिन 1 डिग्री से अधिक हो तो बुध को अधिक गत्यात्मक शक्ति मिलती है, प्रतिदिन 1 डिग्री हो तो 50 प्रतिशत , यदि गति 1 डिग्री से कम होने लगती है तो गत्यात्मक शक्ति भी कम होने लगती  है, जैसे ही बुध वक्री होता है तेजी से घटती हुई इसकी गत्यात्मक शक्ति शून्य हो जाती है। 

Kumbh lagna me guru ka fal

कुंभ लग्‍न की कुंडली के अनुसार बृहस्‍पति द्वितीय और एकादश भाव का स्‍वामी होता है और यह जातक के धन , कोष , लाभ के मामलों का प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए कुंभ लग्‍न के जातकों के धन कोष का लाभ से और लाभ का धन कोष से संबंध बना होता है। जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में बृहस्‍पति के मजबूत होने पर कुंभ लग्‍न के जातक संसाधन वाले परिवार में जन्‍म लेते हैं , जिससे इन्‍हें लाभ को लेकर कोई चिंता नहीं होती। सतत लाभ से इनका कोष मजबूत बना होता है। इसके विपरीत , जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में बृहस्‍पति के कमजोर होने पर कुंभ लग्‍नवाले जातक के समक्ष संसाधन हीनता की स्थिति होती है , जिससे इनका लाभ प्रभावित होता है और इनके कोष पर बुरा प्रभाव पडता है।  'गत्यात्मक ज्योतिष' गुरु की शक्ति का निर्णय इसके सूर्य के निकट होने या दूर होने से करता है, जन्मकुंडली में गुरु सूर्य के निकट हो तो गुरु को अधिकतम गत्यात्मक शक्ति मिलती है, सूर्य से जितना दूर होता है, शक्ति घटती जाती है, सूर्य और गुरु आमने सामने हो तो गुरु काफी कमजोर होता है। 

ज्योतिष में हुए नए रिसर्च, गत्यात्मक ज्योतिष के बारे में अधिक जानने के लिए ये लेख अवश्य पढ़ें  ------

Kumbh lagna me shani ka fal

कुंभ लग्‍न की कुंडली के अनुसार शनि प्रथम और द्वादश भाव का स्‍वामी होता है यानि यह जातक के शरीर , व्‍यक्तित्‍व , खर्च और बाहरी संदर्भों आदि मामलों का प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए इस लग्‍नवाले जातकों की अपने स्‍वास्‍थ्‍य या व्‍यक्तित्‍व को मजबूती देने में अधिक से अधिक खर्च करने की प्रवृत्ति होती है । जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में शनि के मजबूत रहने पर ऐसे जातकों का स्‍वास्‍थ्‍य अच्‍छा रहता है , खर्च शक्ति के बने होने से और खाने पीने के सुख से आत्‍मविश्‍वास में बढोत्‍तरी होती है। पर जन्‍मकुंडली , दशाकाल या गोचर में शनि के कमजोर रहने पर मकर लग्‍नवालों के स्‍वास्‍थ्‍य में कमजोरी बनी रहती है , खर्चशक्ति की कमी से आत्‍मविश्‍वास कमजोर होता है।   'गत्यात्मक ज्योतिष' शनि की शक्ति का निर्णय इसके सूर्य के निकट होने या दूर होने से करता है, जन्मकुंडली में शनि सूर्य के निकट हो तो  शनि को अधिकतम गत्यात्मक शक्ति मिलती है, सूर्य से जितना दूर होता है, शक्ति घटती जाती है, सूर्य और  शनि आमने सामने हो तो शनि काफी कमजोर होता है। 

ज्योतिष में सभी लग्न की कुंडलियों के बारे में पढ़ने के लिए  यहाँ क्लिक कर सकते हैं। लेकिन ग्रह कमजोर है या मजबूत, इसका पता आंशिक तौर पर हमारे योगकारक ग्रहों का प्रभाव  लेख से मालूम हो सकता है, पर ग्रहों की गत्यात्मक और स्थैतिक शक्ति की जानकारी के लिए हमारे केंद्र से जन्मकुंडली बनवाना आवश्यक है!

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    कुंभ लग्‍न की कुंडली भारतीयों के जीवनशैली

     

    India horoscope

    आजादी मिलने के वक्‍त की गंहस्थिति पर ध्‍यान दिया जाए तो भारतवर्ष की जन्‍मकुंडली भले ही वृषभ लग्न और कर्क राशि की बनें और उसके अनुसार सभी ज्‍योतिषी भारतवर्ष के बारे में भविष्‍यवाणी करने को बाध्‍य हों ,पर गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' की मान्‍यता है कि भारत के अलग होने के आधार पर यानि देश के विस्‍तार के कम या अधिक हो जाने से उसकी नई जन्‍मकुंडली नहीं बनायी जानी चाहिए। मैने पिछले दिनों सभी लग्‍नवालों की विशेषताओं की चर्चा करते हुए 12 लेख लिखे ,पहले ही लेख में तर्क दिए गए थे कि मनुष्‍य की जीवनशैली मेष लग्‍न की जन्‍मकुंडली की जीवनशैली से मेल खाती है। इन्‍हीं लेखों के आधार पर कहा जा सकता है कि भारतवासियों की जीवनशैली पूर्ण तौर पर कुंभ लग्‍न की जन्‍मकुंडली का प्रतिनिधित्‍व करती है और इस आधार पर भारतवर्ष का जन्‍म लग्‍न कुंभ होना चाहिए। इसलिए कुंभ लग्‍न के हिसाब से विभिन्‍न भावों में गोचर के ग्रहों की स्थिति के आधार पर भारतवर्ष के बारे में भविष्‍यवाणी की जानी चाहिए। इस मान्‍यता के पक्ष में ये तर्क दिए जा सकते हैं ....

    India horoscope

    Kumbh Lagna ki kundli me Chandra

    कुंभ लग्‍न की कुंडली के अनुसार एक जातक के स्‍वभाव के बारे में आपने पढा। कुंभ लग्‍नवालों के मन का स्‍वामी चंद्र षष्‍ठ भाव का स्‍वामी होता है और यह जातक के प्रभाव और रोग , ऋण , शत्रु जैसे हर प्रकार के झंझट का प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए कुंभ लग्‍न के जातकों के मन को पूर्ण तौर पर प्रभावित करने वाले संदर्भ किसी प्रकार के झंझट ही होते हैं। रोग , ऋण या शत्रु जैसे झंझट न होने पर मन को खुशी मिलती है , जबकि झंझट उपस्थित होकर इनके मन को दुखी करते हैं। भारतवासियों को भी किसी प्रकार के झंझट लेने की इच्‍छा नहीं होती , ये रोग के इलाज के लिए नहीं , रोग से बचने के लिए परहेज पर विश्‍वास रखते हैं , ऋण लेने को बडी मुसीबत मानते हैं , शत्रुता जैसे झंझट से दूर रहना पसंद करते हैं , हजारों साल का इतिहास गवाह है कि इन्‍होने आजतक कहीं भी आक्रमण नहीं किया।

    Kumbh Lagna me Surya ka fal

    कुंभ लग्‍न की कुंडली के अनुसार समस्‍त जगत में चमक बिखेरने वाला सूर्य सप्‍तम भाव का स्‍वामी होता है और यह जातक के घर गृहस्‍थी का प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए अपने नाम यश को फैलाने के लिए कुंभ लग्‍न के जातक अपने घर गृहस्‍थी को महत्‍व देते हैं। घर गृहस्‍थी का वातावरण और दाम्‍पत्‍य जीवन बहुत ही उत्‍तम कोटि का और अनुकरणीय होता है , भले ही सूर्य कमजोर रहने पर इन्‍हें अपनी दाम्‍पत्‍य जीवन से कष्‍टकर समझौता करने को बाध्‍य होना पडे। भारतवासी भी अपनी घर गृहस्‍थी को इतना महत्‍व देते हैं कि यहां कष्‍टकर समझौता भी इन्‍हें मंजूर होता है , जो अनुकरणीय है।

    Kumbh lagna me Mangal ka fal

    कुंभ लग्‍न की कुंडली के अनुसार मंगल तृतीय और दशम भाव का स्‍वामी होता है और यह जातक के भाई बहन , बंधु बांधव , पिता , समाज और पद प्रतिष्‍ठा का प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए इस लग्‍न के जातकों के परिवेश में भाई , बहन , बंधु बांधव , पिता , समाज सभी शामिल होते है , चाहे मंगल के मजबूत होने से भाई बंहन बंधु बांधवों से लेकर पिता समाज के सारे बुजुर्गों से इनके संबंध अच्‍छे बने हों और इसके कारण प्रतिष्‍ठा के पात्र हों , या फिर मंगल के कमजोर होने पर भाई , बंधु , पिता , समाज या अन्‍य लोगों का कष्‍ट झेलने को इन्‍हे बाध्‍य होना पडता है , इनकी प्रतिष्‍ठा पर भी आंच आए। पर भाई बहन बंधु बांधव और सामाजिकता के बिना एक भारतीय नहीं रह सकता।

    Kumbh lagna me Shukra ka fal

    कुंभ लग्‍न की कुंडली के अनुसार शुक्र चतुर्थ और नवम भाव का स्‍वामी है और यह जातक के मातृ पक्ष और हर प्रकार की छोटी बडी संपत्ति , स्‍थायित्‍व के साथ साथ भाग्‍य आदि का प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए कुंभ लग्‍नवालों के हर प्रकार के संपत्ति का उनकी माता या भाग्‍य से संबंध बना होता है। कुंभ लग्‍नवाले माता या भाग्‍य के सहयोग से हर प्रकार की संपत्ति का सुख प्राप्‍त कर लेते हैं और स्‍थायित्‍व की मजबूती पाते हैं। यदि भाग्‍य के साथ न देने से हर प्रकार के संपत्ति के सुख में बाधा हो और स्‍थायित्‍व कमजोर दिखाई पडे । एक भारतवासी के संदर्भ में भी देखें तो इन्‍हें भाग्‍य से ही इन्‍हें प्राकृतिक संपदा प्राप्‍त है , जो जिस क्षेत्र में हैं , उसी क्षेत्र में किसी न किसी प्रकार का प्रचुर भंडार उपलब्‍ध हैं। कभी प्राकृतिक विपत्ति का सामना करना भी पडे तो इतने बडे साधन संपन्‍न भारतवर्ष में उन्‍हें गुजारे की दिक्‍कत नहीं होती।

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    Kumbh Lagna me Budh ka fal

    कुंभ लग्‍न की कुंडली के अनुसार बुध पंचम और नवम भाव का स्‍वामी है और यह जातक के बुद्धि , ज्ञान संतान और जीवनशैली का प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए इस लग्‍न के जातक अपनी बुद्धि का उपयोग हमेशा जीवनशैली को सुधारने के लिए करते हैं। यही कारण है कि हमारे देश में अधिकांश चिंतकों और विचारकों ने कुंभ लग्‍न में ही जन्‍म लिया था और उन्‍होने अपने ज्ञान का उपयोग भौतिक या अन्‍य सुख के लिए नहीं , सिर्फ और सिर्फ जीवनशैली को सुधारने के लिए किया। कुंभ लग्‍नवालों की तरह ही भारतीय ऐसी जीवनशैली पर विश्‍वास रखते हैं , जो आनेवाली पीढी को अधिक सक्षम बना सके। हजारो वर्षों से भारतवासियों ने भी अपने दिमाग का पूरा उपयोग जीवनशैली को मजबूत बनाने में किया है , ताकि आनेवाली पीढी शारीरिक मानसिक और आर्थिक तौर पर अधिक मजबूत हो सके।

    Kumbh Lagna me Guru ka fal

    कुंभ लग्‍न की कुंडली के अनुसार बृहस्‍पति द्वितीय और एकादश भाव का स्‍वामी होता है और यह जातक के धन , कोष , लाभ के मामलों का प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए कुंभ लग्‍न के जातकों के धन कोष का लाभ से और लाभ का धन कोष से संबंध बना होता है। कुंभ लग्‍न के जातक संसाधन वाले परिवार में जन्‍म लेते हैं , जिससे इन्‍हें लाभ को लेकर कोई चिंता नहीं होती , सतत लाभ से इनका कोष मजबूत बना होता है। संसाधन हीनता से इनका लाभ प्रभावित होता है तो इनके कोष पर बुरा प्रभाव पडता है। भारतवासियों को भी लाभ संसाधन के बल पर ही मिलता आ रहा है , कभी किसी प्रकार की आपत्ति में एक क्षेत्र के लोगों का लाभ भले ही प्रभावित हो जाए , पर उन्‍हे दूसरे क्षेत्र से संरक्षण मिल ही जाता है।

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    Kumbh Lagna me Shani ka fal

    कुंभ लग्‍न की कुंडली के अनुसार शनि प्रथम और द्वादश भाव का स्‍वामी होता है यानि यह जातक के शरीर , व्‍यक्तित्‍व , खर्च और बाहरी संदर्भों आदि मामलों का प्रतिनिधित्‍व करता है। इसलिए इस लग्‍नवाले जातकों की अपने स्‍वास्‍थ्‍य या व्‍यक्तित्‍व को मजबूती देने में अधिक से अधिक खर्च करने की प्रवृत्ति होती है। जातकों का स्‍वास्‍थ्‍य अच्‍छा रहता है , खर्च शक्ति के बने होने से और खाने पीने के सुख से आत्‍मविश्‍वास में बढोत्‍तरी होती है। कभी कभार कुंभ लग्‍नवालों के स्‍वास्‍थ्‍य में कमजोरी बनी रहती है , खर्चशक्ति की कमी से आत्‍मविश्‍वास कमजोर होता है। भारतवासियों के संदर्भ में देखा जाए , तो आजतक इनका खर्च भोजन में ही होता आया है। इनमें स्‍वास्‍थ्‍य के मामलों को गंभीरता से देखने की प्रवृत्ति मौजूद है , स्‍वास्‍थ्‍य के अलावे दूसरी जगह पर इनका खर्च बहुत कम होता है।

    Kundli India

    देश की तरह ही अपने अपने परिवार या समाज के हिसाब से , धर्म के हिसाब से माता और पिता के विचारों के हिसाब से भी अलग अलग लग्‍नानुसार हर व्‍यक्ति जीता है। मानव जाति के हिसाब से हममें से हर किसी की शैली मेष लग्‍न के अनुरूप होती है , पुन: भारतवासी होने के हिसाब से कुंभ लग्‍न के अनुरूप और अपने अपने धर्म , समाज या परिवार के हिंसाब से माता , पिता को प्रतिनिधित्‍व करनेवाले लग्‍न का भी छाप हमपर पडता है। पर मूल तौर पर अपने जन्‍मकालीन लग्‍न के हिसाब से जीने की सभी मनुष्‍यों की अपनी प्रवृत्ति होती है , क्‍यूंकि इन सबके बावजूद हर कोई अलग अलग बीज होता है और उसका निर्धारण लग्‍नकुंडली से ही किया जा सकता है, ठीक वैसे ही जैसे विशेष तौर पर विकसित किए गए लंगडे आम के पेड में कुछ गुण पेड के हिसाब से , कुछ आम के हिसाब से और कुछ अपनी जाति के हिसाब से होते हैं , पर उनमें मुख्‍य खूबी वह होती है , जिस गुण के कारण उसका अस्तित्‍व होता है।

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      'लग्‍नचंदा योग'

       

      Same rashi same lagna

      किसी भी कुंडली में यह स्थिति तब बनती है, ज़ब बालक के जन्म के समय पूर्वी क्षितिज पर लग्न के साथ चन्द्रमा का भी उदय हो रहा हो! ऐसी स्थिति में बालक की लग्नकुंडली और चन्द्रकुंडली एक ही होती है! यदि लग्न  के आसपास ही सूर्य भी स्थित हो तो चन्द्रमा कमजोर तथा लग्न के विपरीत दिशा में सूर्य स्थित हो तो चन्द्रमा मजबूत माना जाता है! 

      क्षेत्रीय भाषाओं में बहुत नाज नखरों से पालन पोषण होनेवाले दुलारे बच्‍चे को 'लगनचंदा बच्‍चा' कहा जाता है , किसी बच्‍चे की जिद को देखकर उसे डांटते हुए यह भी कहा जाता है कि तुम 'लगनचंदा' नहीं हो , जो तुम्‍हारी हर जरूरत पूरी हो जाएगी। इस शब्‍द के इतने लोकप्रिय होने के बावजूद आपमें से शायद ही कोई जानते होंगे कि 'लगनचंदा योग' का क्‍या मतलब है ?

      मैं अपने एक आलेख में पहले ही बता चुकी हूं कि ज्‍योतिष में आसमान के बारहों राशियों में से जिसका उदय बालक के जन्‍म के समय पूर्वी क्षितिज पर होता रहता है , उसे बालक का लग्‍न कहते हैं। अब इसी लग्‍न में यानि उदित होती राशि में च्रद्रमा की स्थिति हो , तो बालक की 'जन्‍मकुंडली' में लग्‍नचंदायोग बन जाता है , जिसे ही क्षेत्रीय भाषा में 'लगनचंदा योग' कहते हैं।

      Same rashi same lagna


      Lagan chanda

      यदि संभावनावाद की दृष्टि से यहां भी विचार किया जाए , तो किसी भी कुंडली में बारह भाव होते हैं और किसी भी भाव में किसी ग्रह के बैठने की संभावना 1/12 होती है। इस हिसाब से लगनचंदा योग भी 12 में से एक बच्‍चे का होता है , यानि 8 प्रतिशत से अधिक बच्‍चे 'लगनचंदा योग ' में आ जाते हैं। पर हम इस वास्‍तविक दुनिया को देखेंगे , तो अहसास होगा कि 8 प्रतिशत बच्‍चों को मुंहमांगी मुराद पूरी नहीं होती है , तो इसका अर्थ क्‍या यह माना जाए कि इस योग में कोई सच्‍चाई नहीं !

      नहीं, ऐसी बात नहीं है , 'लग्‍नचंदा योग' किसी भी व्‍यक्ति के बाल्‍यावस्‍था में बच्चे के पालन पोषण के फलस्‍वरूप उसके मनोवैज्ञानिक विकास में बहुत ही सकारात्‍मक प्रभाव डालता है , लेकिन इसके लिए जन्‍मकुंडली में चंद्रमा की स्थिति को मजबूत होना चाहिए। यदि चंद्रमा मजबूत हो , तो बालक पर 'लग्‍नचंदा योग' का पूरा प्रभाव पडेगा , जबकि चंद्रमा कमजोर हो तो 'लग्‍नचंदा योग' के प्रभाव में बाधा दिखाई दे सकती है।

      Weak moon

      चंद्रमा की शक्ति का निर्णय हम उसके आकार के आधार पर कर सकते हैं। इस हिसाब से जब चंद्रमा अमावस्‍या के आसपास का हो , तो वह कमजोर होता है , जबकि पूर्णिमा के आसपास का हो , तो वह मजबूत होता है। कमजोर चंद्रमा लग्‍न में हो , तो बालक को  बुरा फल तथा मजबूत चंद्रमा लग्‍न में हो , तो बालक को अच्‍छा फल प्रदान करता है। सामान्‍य होने पर सामान्‍य ढंग का फल प्राप्‍त होता है।

      Strong moon

      मजबूत चंद्रमा के साथ का 'लग्‍नचंदा योग' मेष लग्‍नवालों के लिए माता से सुख और लगाव, वृष लग्‍नवालों के लिए भाई बहनों  से सुख और लगाव , मिथुन लग्‍नवालों के लिए धन  से सुख और लगाव , कर्क लग्‍नवालों के लिए स्‍वास्‍थ्‍य  से सुख और लगाव, सिंह लग्‍नवालों के लिए  से सुख और लगाव , कन्‍या लग्‍न वालों के लिए लाभ  से सुख और लगाव , तुला लग्‍नवालों के लिए पिता  से सुख और लगाव, वृश्चिक लग्‍नवालों के लिए भाग्‍य  से सुख और लगाव , धनु लग्‍नवालों के लिए जीवन शैली  से सुख और लगाव , मकर लग्‍नवालों के लिए घरेलू मामलों  से सुख और लगाव , कुंभ लग्‍नवालों के लिए रोग प्रतिरोधक क्षमता  से सुख और लगाव तथा मीन लग्‍नवालों के लिए बुद्धि  से सुख और लगाव भरपूर रहता है , जबकि कमजोर चंद्रमा के साथ का 'लग्‍नचंदा योग' लगाव के बावजूद बचपन में इन सुखों में कमी का अहसास देता है।

      Lagnachanda yog

       वैसे तो ज्योतिष में छठे भाव में ग्रहों की उपस्थिति को अच्छा नहीं माना जाया, पर अच्‍छे 'लग्‍नचंदा योग' के साथ यदि षष्‍ठ भाव में अधिकांश ग्रहों की स्थिति हो तो इस योग का प्रभाव और अधिक पडता है। ऐसे बच्‍चे शरीर से स्‍वस्‍थ , अपने मा पिताजी और परिवार वालों के लाडले , हर प्रकार की सुख सुविधा में जीवन यापन करने वाले होते हैं। उनके बचपन में पालन पोषण के वक्‍त लाड प्‍यार का क्‍या कहना ??  

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        भारत में ज्योतिष का अध्ययन

        Astrology Hindi

        लोगों को भविष्य को लेकर दिलचस्पी बनी रहती है, इसलिए भविष्य के विश्लेषण की अनेक विधियां प्रचलित हैं , पर एस्ट्रोलॉजी, यानि ज्योतिष, भविष्य को समझने की सबसे सटीक और वैज्ञानिक विधि है। एस्ट्रोलॉजी आसमान के ग्रहों-नक्षत्रों का अध्ययनकरते हुए उनका पृथ्वी के जड़-चेतन पर पड़ने वाले प्रभाव की चर्चा करता है। यह काल-गणना का शास्त्र है, विभिन्न समयांतराल में ग्रहों के अच्छे या बुरे प्रभाव की चर्चा करता है।

        Astrology of India

        भारतवर्ष में वैदिककालीन ग्रंथो में ही एस्ट्रोलॉजी की चर्चा है, इसका महत्व इस बात से सिद्ध होता है कि ज्योतिष को वेदों का नेत्र कहा जाता था। राजा-महाराजाओं के दरबार में ज्योतिषियों को शामिल रखने की जो परम्परा थी, वह अभी तक चल ही रही है। यहाँ अधिकांश शुभ कार्य मुहूर्त देखकर ही किये जाते हैं। भारत में ज्योतिष का अध्ययन लगभग 8 हज़ार सालों से चल रहा है, इसलिए विद्वान मानते हैं कि ज्योतिष शास्त्र का उदय भारत में ही हुआ था।

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        बहुत लोगों के मन में यह भ्रम रहता है कि ज्योतिष के ग्रन्थ हिन्दुओं के होते हैं, इसलिए यह हिन्दुओं से सम्बन्ध रखता है।  पर ऐसी कोई बात नहीं, यह एक विज्ञान है और विज्ञान के सभी नियमों का धर्म  से कोई सम्बन्ध नहीं होता। हमारे पास सभी धर्मों के लोग आते हैं और अपनी जन्मकुंडली विश्लेषित करवाते हैं।

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        जिस समय बच्चे का जन्म होता है, उस वक्त का दिन और समय नोट कर लिया जाता है और बाद में पंडितों से जन्मकुंडली बनवायी जाती है। बच्चे के जन्म के पूरे दिन की चंद्रकुंडली एक समान होती है, जन्म-समय न होने की स्थिति में चंद्र कुंडली से भी भविष्यफल निकाला जा सकता है। पर जन्म-समय हो तो बच्चे की लग्नकुंडली बन जाती है।

         लग्नकुंडली

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        पंडित एस्ट्रोलॉजी के द्वारा जो जन्मकुण्डली बनाते है, वह मुख्यतया जन्मकालीन तिथि और समय में ग्रहों की गति और स्थिति पर आधारित होती है। जन्मांग चक्र में १२ खाने आसमान के ३६० डिग्री को १२ भाग में बांटकर निकाले जाते।  इन १२ भागों में उस समय जहाँ जो ग्रह मौजूद होते हैं, वही उस ग्रह को रखा जाता है।

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        कुंडली में ग्रहों की स्थिति को देखकर भविष्यफल कहा जाता है।  कुंडली के १२ खाने जीवन के १२ सन्दर्भों के बारे में जानकारी देते हैं।  जिस भाव का स्वामी या उसमे मौजूद ग्रह मजबूत हों, तो जीवन के वे मामले मजबूत होते हैं, यदि किसी भाव का स्वामी और उसमे ग्रह कमजोर हो तो जीवन के वे  कमजोर हो जाते हैं। इन ग्रहों का प्रतिफलन जीवन के किस काल में होगा, इसकी जानकारी भी जन्मकुंडली से हो जाती है।

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        अनिश्चितता के इस युग में सबको अपना भविष्य जानने की इच्छा होती है। ज्योतिष आज किसी परिचय का मोहताज नहीं है। आप किसी भी शहर में रहते हों, आपके आसपास कोई न कोई ज्योतिषी मिल ही जायेंगे। लेकिन जन्मकुंडली बनाने का काम कोई भी ज्योतिषी कर सकता है, पर फलित कथन के लिए ज्योतिषी को अनुभवी होने की आवश्यकता होती है। भविष्य का निर्णय करते ज्योतिषी के पास पहुंचना चाहिए। कुछ  उपाय के नाम पर लूट भी मचा रखी है, इसलिए लोग ज्योतिषियों के पास जाने से डरते हैं।

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        आज के ऑनलाइन युग में किसी अच्छे ज्योतिषी से परामर्श लेना मुश्किल नहीं रह गया है। आज अपने क्लाइंट्स को ईमेल से रिपोर्ट भेजने और फ़ोन से बात करने की सुविधा बहुत सारे ज्योतिषियों ने दे रखी है। आप दूसरे देश और शहर के ज्योतिषियों से भी कुंडली-विमर्श  करवाकर कंसल्टेशन ले सकते हैं। हमारे यहाँ पूरे जीवन के उतार चढ़ाव का स्पष्ट ग्राफ, जीवन के सभी मामलों के पाई चार्ट के साथ साथ विस्तार में भविष्यफल लिखकर दिया जाता है। ऐसा जीवन ग्राफ पूरे विश्व में कहीं भी उपलब्ध नहीं है।  'गत्यात्मक ज्योतिष' की सेवा लेने के लिए भी आप 8292466723b ,  gatyatmakjyotishapp@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं।

        योगकारक ग्रह

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        अमेज़ॉन के किंडल में गुरूवर विद्या सागर महथा जी की  फलित ज्योतिष : किना सच कितना झूठ को पढ़ने के लिए  इस लिंक पर क्लिक करें !

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          युग क्यों बदलते हैं ?

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          हमारे पञ्चाङ्ग की गणना में सारे ग्रहों की स्थिति की चर्चा रहती है, जो अभी आसमान में चल रहे हैं। पर हमारे धार्मिक ग्रंथों के अनुसार धरती का एक वर्ष देवताओं के एक दिन-रात के बराबर है। जिसमें उत्तरायण दिन व दक्षिणायन रात मानी जाती है। दरअसल, एक सूर्य संक्रान्ति से दूसरी सूर्य संक्रान्ति की अवधि सौर मास कहलाती है। ऐसे ही 30 दिन-रात मिलकर देवताओं का एक माह और 12 महीनो का एक दिव्य वर्ष कहलाता है।

          Yuga cycle

          इसी आधार पर चार युगों की मानव सौर वर्षों में अवधि के बारे में इस तरह की चर्चा की गयी है -सतयुग 4800 (दिव्य वर्ष) 17,28,000 (सौर वर्ष)
          त्रेतायुग 3600 (दिव्य वर्ष) 12,96,100 (सौर वर्ष)
          द्वापरयुग 2400 (दिव्य वर्ष) 8,64,000 (सौर वर्ष)
          कलियुग 1200 (दिव्य वर्ष) 4,32,000 (सौर वर्ष)
          कलियुग के 4,32,000 साल लंबे कलियुग को शुरू हुए तकरीबन 6000 वर्ष ही गुजरे हैं, अभी लम्बा समय व्यतीत करना है। कलियुग में हमेशा लोगों का धर्म से भटकाव होता है और धर्म-प्रवृत्त करने के लिए प्रकृति को कोशिश करनी पड़ती है। 

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          कलियुग को समाप्त होने में बहुत समय है, अभी लोगों को धर्म की और प्रवृत्त करने के लिए इस दुनिया में समय समय पर किसी न किसी रूप में एक तूफ़ान आया करता है, तूफ़ान शांत होने पर ही पता चलेगा कि इसने क्या क्या ले डुबोया ? सौ वर्षों की एक सदी में कभी-कभी ही कोरोना जैसी त्रासदी आया करती हैं, जो कभी भूगोल, कभी इतिहास और कभी सभ्यता-संस्कृति तक बदल देती हैं। अभी सबसे बड़े तूफ़ान के रूप में कोरोना जारी है, चारो और अफरा तफरी का माहौल है। दूसरे देशों में तो लाशें बिछती देख ली है हमने, ईश्वर से ही प्रार्थना है, हिन्दुस्तान में ऐसा तांडव न मचाये। कोरोना के पहले की बातें २०-२५ वर्षों बाद बच्चों को सुनाये जायेंगे तो वे ऐसे ही आश्चर्य के साथ सुनेंगे, जैसा हम आजादी के पहले की कहानियों को सुनते आये हैं। बचपन से एक कहावत सुनते आ रहे हैं - 'हर अति का अंत इति से होता है' , प्रकृति के पास हर बात का इलाज है। देख रही हूँ कि कोरोना के बाद वही सारी बातें बदलने वाली हैं, जिन मामलों में हमने अति कर दी थी, जो क्षेत्र अपना लक्ष्य भूलकर पैसे कमाने की मशीन बन गए थे -----

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          १) कला के माध्यम से लोगों को सीख देने और उनका मनोरंजन करनेवाला 'सिनेमा जगत' अपने लक्ष्य से दूर पैसे कमाने की मशीन बन गया था। समाज को खासकर युवा वर्ग को सीख देने में में सिनेमा की क्या भूमिका हो सकती है, इसे न सोचकर लोग क्या देखना चाहते हैं, इसी पर फोकस किया। कोरोना के बाद इस उद्योग को बड़ी मार पड़ने वाली है, शायद इन्हे आनेवाले दिनों में टीवी चैनल और इंटरनेट के माध्यम से विकल्प ढूँढना होगा। मध्यम वर्ग का इस क्षेत्र में किया जानेवाला खर्च बचेगा, मध्यम वर्ग कड़ी निगाह रखे, ताकि वे वही परोस पाए, जो हमारे बच्चों को शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक रूप से मजबूत बना सके। 

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          २) खेल की शुरुआत बच्चों को नियमों से बाँधने और हर प्रतिस्पर्धा में खेल भावना विकसित कराने के लिए हुई थी, ताकि वे बड़े होकर हर हार- जीत को स्वाभाविक ढंग से ले। पर हमारे देश के खेल क्रिकेट ने पैसे कमाने के लिए हर भावना समाप्त कर दी, आनेवाले समय किसी भी खेल में स्टेडियम में भीड़ नहीं दिखने वाली। यदि कभी कहीं खेल होता भी है, टीवी चैनल और इंटरनेट के माध्यम से विकल्प ढूँढना होगा। मध्यम वर्ग का इस क्षेत्र में किया जानेवाला खर्च बचेगा, कोरोना का टीका आने के बाद ही यह क्षेत्र कुछ संभल सकता है। 

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          ३ ) देशभर में जितने भी घूमने के स्थल हैं, प्राचीनकाल में सबको धर्मस्थल के रूप में विकसित किया गया था, ताकि धर्म के बहाने से सबको दुनिया की खूबसूरती दिखाई जा सके। अपने बाल-बच्चों की जिम्मेदारियां समाप्त करने के बाद घूमने-फिरने के लिए समय निश्चित किया गया था, ताकि किसी दुर्घटना में कोई गुजर भी जाये तो बच्चों को दिक्कत न हो। सभी गांव से उपयुक्त ऋतु में बसें जाती, स्वावलम्बी बसें, जिसमे दो-चार नवयुवक होतें, खाने-पीने का या बनाने का सामान होता। बस रोक रोक कर लोग खाते-पीते और अपने लक्ष्य की और बढ़ जाते, फिर वाप्पस गाँव आ जाते। पर पर्यटन को आज इतना महत्व दिया गया था कि छोटे-छोटे बच्चों के लिए भी माता-पिता हर रिस्क लेने को तैयार हो गए थे। बेवजह होने वाली इस खर्चे से भी मध्यम वर्ग मुक्त हुआ। 

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          ४ ) चलते मुसाफिरों के लिए सेवा भावना के तहत तैयार किया जाने वाला सराय, लोगो के दान से मुफ्त पानी पिलाने और मामूली खर्च में रहने-खाने की व्यवस्था किया करता था। यह आज बड़े-बड़े होटल के रूप में 'कुछ भी' परोसकर पैसे कमाने की मशीन बन गया था। उच्च वर्ग की बात तो छोड़िए, माध्यम वर्ग भी इनके चक्कर में पड़ अपनी रसोई को कभी-कभार ही उपयोग करने लगा था। कोरोना के बाद इस इंडस्ट्री को भी भारी मार पड़नेवाली है, माध्यम वर्ग अपनी रसोई में हमारी दादी-नानी की तरह हर पकवान बनाने की व्यवस्था करें। पानी बेचनेवालों का स्कोप भी अब न्यूनतम हो गया। 

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          ५) कभी आपने विचार किया है, जन्मदिन, शादी- विवाह में और मौत के समय लोगों के इकट्ठे होने का प्रयोजन क्या रहा होगा ? सुख-दुःख में परिवार, समाज के साथ रहना या आनेवाले अच्छे-बुरे समय के लिए इन घटनाओं का गवाह बनना, बस इतना ही। लेकिन पिछले १०-२० वर्षों में इन आयोजनों की चकाचौंध ने सामान्य हैसियत रखनेवालों की नींद उड़ा दी थी, वे अपने बच्चों की शादी और माता-पिता का क्रियाकर्म कैसे करें ? कोरोना के बाद निश्चित ही इस इंडस्ट्री को भी बड़ी मार पड़ेगी। मध्यम वर्ग ५-१० लोगों के मध्य मंदिर में शादी-विवाह की शुरुआत कर समाज में आदर्श स्थापित करे, ताकि मध्यम वर्ग के पैसों की बचत हो सके। 

          Dharma life

          ६) धर्म का क्षेत्र भी अपने लक्ष्य को भूलकर पैसे कमाने की मशीन बन गया था। मंदिर, मस्जिद, चर्च,गुरूद्वारे में दिया जानेवाला चढ़ावा जनता के लिए होता है, जनता- पीने और रहने की व्यवस्था उनकी होनी चाहिए थी। पर नहीं चढ़ावा उनका, रहने-खाने- व्यवस्था आप खुद करो, गुरूद्वारे को छोड़कर धर्म की सही परिभाषा कहीं नहीं दिखी। कई तरह के टिकट रखकर भक्तो से भेदभाव, ईश्वर को भी देखा नहीं गया, ईश्वर से भी सहा नहीं गया। आनेवाले दिनों में धर्म हमारे घर में मानी जानेवाली चीज हो जाएगी, हो भी जानी चाहिए। धर्म के क्षेत्र में किये जानेवाले किसी भी आडम्बर के प्रति समाज अभी से सचेत हो जाये, इस क्षेत्र की भी कमाई बंद हो जानी चाहिए। 

          Hamare sanskar

          ७ ) परिवार क्या होता है, बच्चों पर कितना ध्यान दें, बड़े-बूढ़े क्या चाहते हैं, लोग ये सब भी भूलकर पैसे कमाने की मशीन बन गए थे। साफ़-सफाई के वे नियम, जो देश में पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलता आ रहा था, दादी-नानी से हम खुद सीखते आ रहे थे, उसे आज की पीढ़ी ने ढकोसला मान लिया था। बाहर से आनेवाले जूत्ते, कपडे हमारी रसोई तक पहुँच रहे थे, लोग हाथ धोना भूल चुके थे, किससे कितनी दूरी रखनी चाहिए, ये सब भूल चुके थे। वास्तव में आज की पीढ़ी, जो स्वावलम्बन भूल चुकी थी, उसे कोरोना ने स्वावलम्बी होना सिखाया है। आलस्य के वशीभूत सभी कार्य नौकरानियों से कराने वाले आज अपने हाथों से खाना बना रहे हैं, कपडे धो रहे हैं, बर्तन धो रहे हैं। 

          Education system

          ८) १०-१५ वर्षों में पढ़ाई-लिखाई में जो परिवर्तन आया, वो भी प्राकृतिक नहीं था। बच्चे पैसेवाले लाइन को चुनने में और संस्थान नंबर वाले बच्चों को चुनने में व्यस्त थे। परीक्षाओं में नंबर लाने का टेंशन इतना हो गया था कि बच्चों को पढ़ाई के अलावा कुछ काम करने की फुर्सत मिले। कोरोना वायरस ने सिखला दिया है कि पढाई लिखाई के साथ स्वावलम्बन कितना आवश्यक है। १ या २ बच्चे को जन्म देकर उनके जीवन-शैली की ऐसी-तैसी कर देने वाले माँ-पापा को भी कोरोना ने बड़ा झटका दिया है, उन्हें सुपर चाइल्ड बनाने सपना टूट गया है। 

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          ८ ) इधर हाल-फिलहाल गाँव में खेती-बारी के लिए मजदूर नहीं मिल रहे थे। सारे देश के ब्लॉकों में स्थित कृषि अनुसंधान केंद्र अपने वेतन का भार तो हम जैसे आयकर दाताओं पर डाल रहे हैं, पर उनका गाँव की कृषि में कोई योगदान है, मुझे नहीं दिखा। बचपन में जिस गाँव के खेत-बारी को हरा-भरा देख चुकी हूँ, वर्षों से उसे उजाड़ देखकर बड़ा कष्ट पहुंचा। यदि कोई खेती में दिलचस्पी ले भी तो मजदूर नहीं मिलते, शहरों की चकाचौंध में समर्थ युवा निकल चुके हैं। असमर्थों को खाने के लिए मुफ्त अनाज मिल ही रहा था। लगभग सभी गाँवों में एक सी स्थिति थी, शहरों को अनाज की आपूर्ति करनेवाले गाँव में भी जरूरत की वस्तुएँ शहरों से आ रही थी। कोरोना के बाद जिस हिसाब से मजदूर गांव वापस आ रहे हैं, शायद गाँवों में खेती-बारी, पशु-पालन आदि में तेजी आये। अनाज के नाम पर शरीर में जा रहे कई तरह के रसायनों से लोगों को मुक्ति मिलेगी। 

          Pollution

          ९ ) सभी जगहों पर बेवजह हो रही भीड़ प्रकृति को प्रदूषित भी कर रही थी। हम आनेवाली पीढ़ी को शुद्ध भूमि, जल और वायु दे पाएंगे, तो यह कोरोना का हमारे लिए वरदान ही होगा। कोई संस्था या कोई सरकार ऐसा नहीं कर सकती थी। यदि हमारे बजट का अधिकांश खर्च कम हो जाये तो हम कम पैसों में भी घर में खा-पीकर रह सकते हैं। भ्रष्टाचार भी इन उलूल-जुलूल खर्चों के लिए ही किया जाता है। समाज के सभी लोग जिम्मेदार बने, जरूरी चीजों पर सरकार का ध्यान आकृष्ट करें, उलूल-जुलूल मांगे सामने न रखें। संयम से जीएँ, प्रकृति जो भी करती है, हमारे भले के लिए करती है। देश की जनता नियमों से रहे तो कोरोना के बाद हमारी यात्रा अधिक शांतिपूर्ण और सुखद होगी। 

          Schools & hospitals

          १० ) कई इंडस्ट्री और भी होंगे, जो अपने मूल उद्देश्य को भूलकर पैसे कमाने की मशीन बन चुके हैं, इनमें स्कूल और एक अस्पताल भी है। इनको भी मार पड़नी चाहिए, मध्यम वर्ग के पास पैसे कम होंगे तो ऐसा हो सकता है। समाज से मेरा निवेदन होगा कि सभी अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में पढ़ने भेजे और सभी जिम्मेदार होकर समय समय पर वहां की व्यवस्था चेक करें। यदि कोई कमजोरी हो तो उसको दूर करने की करवाएं। ऐसा ही सरकारी अस्पतालों में भी किया जाये। इससे भी मध्यम वर्ग का पैसा बचेगा। एक बात तो मई बार-बार कहूंगी, व्यर्थ के चकाचौंध और प्रकृति ने हमारी जीवनशैली को बदलने का मौका दिया है तो इसे जरूर बदलें।

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