युग क्यों बदलते हैं ?

1 yuga is equal to how many years

हमारे पञ्चाङ्ग की गणना में सारे ग्रहों की स्थिति की चर्चा रहती है, जो अभी आसमान में चल रहे हैं। पर हमारे धार्मिक ग्रंथों के अनुसार धरती का एक वर्ष देवताओं के एक दिन-रात के बराबर है। जिसमें उत्तरायण दिन व दक्षिणायन रात मानी जाती है। दरअसल, एक सूर्य संक्रान्ति से दूसरी सूर्य संक्रान्ति की अवधि सौर मास कहलाती है। ऐसे ही 30 दिन-रात मिलकर देवताओं का एक माह और 12 महीनो का एक दिव्य वर्ष कहलाता है।

Yuga cycle

इसी आधार पर चार युगों की मानव सौर वर्षों में अवधि के बारे में इस तरह की चर्चा की गयी है -सतयुग 4800 (दिव्य वर्ष) 17,28,000 (सौर वर्ष)
त्रेतायुग 3600 (दिव्य वर्ष) 12,96,100 (सौर वर्ष)
द्वापरयुग 2400 (दिव्य वर्ष) 8,64,000 (सौर वर्ष)
कलियुग 1200 (दिव्य वर्ष) 4,32,000 (सौर वर्ष)
कलियुग के 4,32,000 साल लंबे कलियुग को शुरू हुए तकरीबन 6000 वर्ष ही गुजरे हैं, अभी लम्बा समय व्यतीत करना है। कलियुग में हमेशा लोगों का धर्म से भटकाव होता है और धर्म-प्रवृत्त करने के लिए प्रकृति को कोशिश करनी पड़ती है। 

When will kalyug end

कलियुग को समाप्त होने में बहुत समय है, अभी लोगों को धर्म की और प्रवृत्त करने के लिए इस दुनिया में समय समय पर किसी न किसी रूप में एक तूफ़ान आया करता है, तूफ़ान शांत होने पर ही पता चलेगा कि इसने क्या क्या ले डुबोया ? सौ वर्षों की एक सदी में कभी-कभी ही कोरोना जैसी त्रासदी आया करती हैं, जो कभी भूगोल, कभी इतिहास और कभी सभ्यता-संस्कृति तक बदल देती हैं। अभी सबसे बड़े तूफ़ान के रूप में कोरोना जारी है, चारो और अफरा तफरी का माहौल है। दूसरे देशों में तो लाशें बिछती देख ली है हमने, ईश्वर से ही प्रार्थना है, हिन्दुस्तान में ऐसा तांडव न मचाये। कोरोना के पहले की बातें २०-२५ वर्षों बाद बच्चों को सुनाये जायेंगे तो वे ऐसे ही आश्चर्य के साथ सुनेंगे, जैसा हम आजादी के पहले की कहानियों को सुनते आये हैं। बचपन से एक कहावत सुनते आ रहे हैं - 'हर अति का अंत इति से होता है' , प्रकृति के पास हर बात का इलाज है। देख रही हूँ कि कोरोना के बाद वही सारी बातें बदलने वाली हैं, जिन मामलों में हमने अति कर दी थी, जो क्षेत्र अपना लक्ष्य भूलकर पैसे कमाने की मशीन बन गए थे -----

1 yuga is equal to how many years

Kali yuga me bollywood hindi

१) कला के माध्यम से लोगों को सीख देने और उनका मनोरंजन करनेवाला 'सिनेमा जगत' अपने लक्ष्य से दूर पैसे कमाने की मशीन बन गया था। समाज को खासकर युवा वर्ग को सीख देने में में सिनेमा की क्या भूमिका हो सकती है, इसे न सोचकर लोग क्या देखना चाहते हैं, इसी पर फोकस किया। कोरोना के बाद इस उद्योग को बड़ी मार पड़ने वाली है, शायद इन्हे आनेवाले दिनों में टीवी चैनल और इंटरनेट के माध्यम से विकल्प ढूँढना होगा। मध्यम वर्ग का इस क्षेत्र में किया जानेवाला खर्च बचेगा, मध्यम वर्ग कड़ी निगाह रखे, ताकि वे वही परोस पाए, जो हमारे बच्चों को शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक रूप से मजबूत बना सके। 

Indian cricket 

२) खेल की शुरुआत बच्चों को नियमों से बाँधने और हर प्रतिस्पर्धा में खेल भावना विकसित कराने के लिए हुई थी, ताकि वे बड़े होकर हर हार- जीत को स्वाभाविक ढंग से ले। पर हमारे देश के खेल क्रिकेट ने पैसे कमाने के लिए हर भावना समाप्त कर दी, आनेवाले समय किसी भी खेल में स्टेडियम में भीड़ नहीं दिखने वाली। यदि कभी कहीं खेल होता भी है, टीवी चैनल और इंटरनेट के माध्यम से विकल्प ढूँढना होगा। मध्यम वर्ग का इस क्षेत्र में किया जानेवाला खर्च बचेगा, कोरोना का टीका आने के बाद ही यह क्षेत्र कुछ संभल सकता है। 

Paryatan in hindi


३ ) देशभर में जितने भी घूमने के स्थल हैं, प्राचीनकाल में सबको धर्मस्थल के रूप में विकसित किया गया था, ताकि धर्म के बहाने से सबको दुनिया की खूबसूरती दिखाई जा सके। अपने बाल-बच्चों की जिम्मेदारियां समाप्त करने के बाद घूमने-फिरने के लिए समय निश्चित किया गया था, ताकि किसी दुर्घटना में कोई गुजर भी जाये तो बच्चों को दिक्कत न हो। सभी गांव से उपयुक्त ऋतु में बसें जाती, स्वावलम्बी बसें, जिसमे दो-चार नवयुवक होतें, खाने-पीने का या बनाने का सामान होता। बस रोक रोक कर लोग खाते-पीते और अपने लक्ष्य की और बढ़ जाते, फिर वाप्पस गाँव आ जाते। पर पर्यटन को आज इतना महत्व दिया गया था कि छोटे-छोटे बच्चों के लिए भी माता-पिता हर रिस्क लेने को तैयार हो गए थे। बेवजह होने वाली इस खर्चे से भी मध्यम वर्ग मुक्त हुआ। 

Hotels in india 

४ ) चलते मुसाफिरों के लिए सेवा भावना के तहत तैयार किया जाने वाला सराय, लोगो के दान से मुफ्त पानी पिलाने और मामूली खर्च में रहने-खाने की व्यवस्था किया करता था। यह आज बड़े-बड़े होटल के रूप में 'कुछ भी' परोसकर पैसे कमाने की मशीन बन गया था। उच्च वर्ग की बात तो छोड़िए, माध्यम वर्ग भी इनके चक्कर में पड़ अपनी रसोई को कभी-कभार ही उपयोग करने लगा था। कोरोना के बाद इस इंडस्ट्री को भी भारी मार पड़नेवाली है, माध्यम वर्ग अपनी रसोई में हमारी दादी-नानी की तरह हर पकवान बनाने की व्यवस्था करें। पानी बेचनेवालों का स्कोप भी अब न्यूनतम हो गया। 

Marriage & other ceremony

५) कभी आपने विचार किया है, जन्मदिन, शादी- विवाह में और मौत के समय लोगों के इकट्ठे होने का प्रयोजन क्या रहा होगा ? सुख-दुःख में परिवार, समाज के साथ रहना या आनेवाले अच्छे-बुरे समय के लिए इन घटनाओं का गवाह बनना, बस इतना ही। लेकिन पिछले १०-२० वर्षों में इन आयोजनों की चकाचौंध ने सामान्य हैसियत रखनेवालों की नींद उड़ा दी थी, वे अपने बच्चों की शादी और माता-पिता का क्रियाकर्म कैसे करें ? कोरोना के बाद निश्चित ही इस इंडस्ट्री को भी बड़ी मार पड़ेगी। मध्यम वर्ग ५-१० लोगों के मध्य मंदिर में शादी-विवाह की शुरुआत कर समाज में आदर्श स्थापित करे, ताकि मध्यम वर्ग के पैसों की बचत हो सके। 

Dharma life

६) धर्म का क्षेत्र भी अपने लक्ष्य को भूलकर पैसे कमाने की मशीन बन गया था। मंदिर, मस्जिद, चर्च,गुरूद्वारे में दिया जानेवाला चढ़ावा जनता के लिए होता है, जनता- पीने और रहने की व्यवस्था उनकी होनी चाहिए थी। पर नहीं चढ़ावा उनका, रहने-खाने- व्यवस्था आप खुद करो, गुरूद्वारे को छोड़कर धर्म की सही परिभाषा कहीं नहीं दिखी। कई तरह के टिकट रखकर भक्तो से भेदभाव, ईश्वर को भी देखा नहीं गया, ईश्वर से भी सहा नहीं गया। आनेवाले दिनों में धर्म हमारे घर में मानी जानेवाली चीज हो जाएगी, हो भी जानी चाहिए। धर्म के क्षेत्र में किये जानेवाले किसी भी आडम्बर के प्रति समाज अभी से सचेत हो जाये, इस क्षेत्र की भी कमाई बंद हो जानी चाहिए। 

Hamare sanskar

७ ) परिवार क्या होता है, बच्चों पर कितना ध्यान दें, बड़े-बूढ़े क्या चाहते हैं, लोग ये सब भी भूलकर पैसे कमाने की मशीन बन गए थे। साफ़-सफाई के वे नियम, जो देश में पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलता आ रहा था, दादी-नानी से हम खुद सीखते आ रहे थे, उसे आज की पीढ़ी ने ढकोसला मान लिया था। बाहर से आनेवाले जूत्ते, कपडे हमारी रसोई तक पहुँच रहे थे, लोग हाथ धोना भूल चुके थे, किससे कितनी दूरी रखनी चाहिए, ये सब भूल चुके थे। वास्तव में आज की पीढ़ी, जो स्वावलम्बन भूल चुकी थी, उसे कोरोना ने स्वावलम्बी होना सिखाया है। आलस्य के वशीभूत सभी कार्य नौकरानियों से कराने वाले आज अपने हाथों से खाना बना रहे हैं, कपडे धो रहे हैं, बर्तन धो रहे हैं। 

Education system

८) १०-१५ वर्षों में पढ़ाई-लिखाई में जो परिवर्तन आया, वो भी प्राकृतिक नहीं था। बच्चे पैसेवाले लाइन को चुनने में और संस्थान नंबर वाले बच्चों को चुनने में व्यस्त थे। परीक्षाओं में नंबर लाने का टेंशन इतना हो गया था कि बच्चों को पढ़ाई के अलावा कुछ काम करने की फुर्सत मिले। कोरोना वायरस ने सिखला दिया है कि पढाई लिखाई के साथ स्वावलम्बन कितना आवश्यक है। १ या २ बच्चे को जन्म देकर उनके जीवन-शैली की ऐसी-तैसी कर देने वाले माँ-पापा को भी कोरोना ने बड़ा झटका दिया है, उन्हें सुपर चाइल्ड बनाने सपना टूट गया है। 

Majdooron ka shahar prem

८ ) इधर हाल-फिलहाल गाँव में खेती-बारी के लिए मजदूर नहीं मिल रहे थे। सारे देश के ब्लॉकों में स्थित कृषि अनुसंधान केंद्र अपने वेतन का भार तो हम जैसे आयकर दाताओं पर डाल रहे हैं, पर उनका गाँव की कृषि में कोई योगदान है, मुझे नहीं दिखा। बचपन में जिस गाँव के खेत-बारी को हरा-भरा देख चुकी हूँ, वर्षों से उसे उजाड़ देखकर बड़ा कष्ट पहुंचा। यदि कोई खेती में दिलचस्पी ले भी तो मजदूर नहीं मिलते, शहरों की चकाचौंध में समर्थ युवा निकल चुके हैं। असमर्थों को खाने के लिए मुफ्त अनाज मिल ही रहा था। लगभग सभी गाँवों में एक सी स्थिति थी, शहरों को अनाज की आपूर्ति करनेवाले गाँव में भी जरूरत की वस्तुएँ शहरों से आ रही थी। कोरोना के बाद जिस हिसाब से मजदूर गांव वापस आ रहे हैं, शायद गाँवों में खेती-बारी, पशु-पालन आदि में तेजी आये। अनाज के नाम पर शरीर में जा रहे कई तरह के रसायनों से लोगों को मुक्ति मिलेगी। 

Pollution

९ ) सभी जगहों पर बेवजह हो रही भीड़ प्रकृति को प्रदूषित भी कर रही थी। हम आनेवाली पीढ़ी को शुद्ध भूमि, जल और वायु दे पाएंगे, तो यह कोरोना का हमारे लिए वरदान ही होगा। कोई संस्था या कोई सरकार ऐसा नहीं कर सकती थी। यदि हमारे बजट का अधिकांश खर्च कम हो जाये तो हम कम पैसों में भी घर में खा-पीकर रह सकते हैं। भ्रष्टाचार भी इन उलूल-जुलूल खर्चों के लिए ही किया जाता है। समाज के सभी लोग जिम्मेदार बने, जरूरी चीजों पर सरकार का ध्यान आकृष्ट करें, उलूल-जुलूल मांगे सामने न रखें। संयम से जीएँ, प्रकृति जो भी करती है, हमारे भले के लिए करती है। देश की जनता नियमों से रहे तो कोरोना के बाद हमारी यात्रा अधिक शांतिपूर्ण और सुखद होगी। 

Schools & hospitals

१० ) कई इंडस्ट्री और भी होंगे, जो अपने मूल उद्देश्य को भूलकर पैसे कमाने की मशीन बन चुके हैं, इनमें स्कूल और एक अस्पताल भी है। इनको भी मार पड़नी चाहिए, मध्यम वर्ग के पास पैसे कम होंगे तो ऐसा हो सकता है। समाज से मेरा निवेदन होगा कि सभी अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में पढ़ने भेजे और सभी जिम्मेदार होकर समय समय पर वहां की व्यवस्था चेक करें। यदि कोई कमजोरी हो तो उसको दूर करने की करवाएं। ऐसा ही सरकारी अस्पतालों में भी किया जाये। इससे भी मध्यम वर्ग का पैसा बचेगा। एक बात तो मई बार-बार कहूंगी, व्यर्थ के चकाचौंध और प्रकृति ने हमारी जीवनशैली को बदलने का मौका दिया है तो इसे जरूर बदलें।



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