हिन्‍दी ब्‍लॉग जगत से जुडी पुस्‍तक

 

Blogging in Hindi मीनिंग

Blogging in Hindi meaning

जब भी ऑनलाइन काम में कुछ स्कोप तलाश करने की बारी आती है, ब्लॉग का नाम अवश्य सुनाने को मिलता है। ब्लॉग एक डायरी की तरह होता है, जिसमे आप अपने विचारों, भावनाओं, चित्रों, वीडियो आदि को दुनिया से शेयर कर सकते हैं। ब्लॉग लिखने के लिए कंप्यूटर का बेसिक ज्ञान और किसी भी भाषा में अभिव्यक्ति की कला भी चाहिए। ब्लॉग लिखने के अभी बहुत सारे मंच हैं  , जहाँ हज़ारो ब्लॉगर विभिन्न विषयों पर ब्लॉग्गिंग कर  रहे हैं। आजकल ब्लॉग्गिंग से पैसों की भी कमाई के रास्ते खुले हैं। 

हमने 2006 से ही ज्योतिष को लेकर खूब ब्लॉग्गिंग की, मैंने ज्योतिष जैसे विषय पर खूब लिखा और ब्लॉग्गिंग के कारण ही गत्यात्मक ज्योतिष को अच्छी पहचान मिली है। यदि ब्लॉग्गिंग न होता तो समाज में ज्योतिष की इस विधा को प्रचारित प्रसारित करना बहुत मुश्किल था। उस समय पूरे विश्व में हिंदी के 200-400 ब्लोग्गेर्स रहे होंगे, जिनमे जान-पहचान और आपसी सहयोग हुआ करता था। उसी समय का यह संस्मरण है। 

मेरा मायका बोकारो जिले में ही है , इसलिए आसपास ही लगभग सारे रिश्‍तेदार हैं , हमेशा कहीं न कहीं से न सिर्फ निमंत्रण मिलता है , हमारी उपस्थिति की उम्‍मीद भी की जाती है, सो हर जगह रस्‍म अदायगी के लिए भी मुझे ही जाना होता है। अकेले टैक्‍सी में भी जाना मुझे बोरिंग लगता है , बोकारो का स्‍टेशन भी शहर से 8 कि मी की दूरी पर है , इसलिए स्‍टेशन जाना , क्‍यू में खडे होकर टिकट लेना और ट्रेन पकडना भी कठिनाई भरा ही है , जबकि सुबह फोन करके किसी बस वाले से एक सीट रखवा लिया जाए , तो आराम से घर से निकलकर टहलते हुए अधिकतम 300 मीटर  के अंदर स्थित बस स्‍टैण्‍ड में जाकर आज के आरामदेह बसों में बैठ जाने पर तीन चार घंटे में गंतब्‍य पर पहुंचना काफी आसान है। इसलिए मुझे झारखंड के अंदर 150 से 200 कि मी के अंदर तक के इस सफर के लिए टैक्‍सी या ट्रेन से अधिक सुविधाजनक बस ही लगता है।

एक कार्यक्रम में सम्मिलित होने के लिए पिछले महीने जाकर बस पर बैठी ही थी कि ढेर सारी पुस्‍तके हाथ में लिए एक किशोर पुस्‍तक विक्रेता मेरी ओर बढा। मेरे नजदीक आकर उसने अपने दाहिने हाथ में रखी एक पुस्‍तक आगे बढायी और मुझसे कहा 'इसे ले लीजिए .. इसमें मेहंदी की डिजाइने हैं' जबतक मैने 'ना' में सर हिलाया , तबतक मेरी त्‍वचा से वह मेरी उम्र का सही अंदाजा लगा चुका था। वह क्षणभर भी देरी किए बिना विभिन्‍न देवताओं की आरती की पुस्‍तक निकालकर मुझे दिखाने लगा। ट्रेन में पत्र पत्रिकाएं पढी भी जा सकती हैं , पर बस के हिलने डुलने में आंख्‍ा कहां स्थिर रह पाता है , मुझे विवाह में भी जाना था , पुस्‍तके लेकर क्‍या करती , मैने मना कर दिया। पर उस किशोर पुस्‍तक विक्रेता के मनोविज्ञान समझने की कला ने मुझे खासा आकर्षित किया। इतनी कम उम्र में भी उसे पता है कि किस उम्र में किस तरह के लोगों को किस तरह की पुस्‍तकें चाहिए।

Blogging Hindi me

बस चल चुकी थी और हमेशा की तरह मैं चिंतन में मग्‍न थी। उम्र बढने या परिस्थितियां बदलने के साथ साथ सोंच कितनी बदल जाती है। पत्र पत्रिकाएं या हल्‍की फुल्‍की पुस्‍तकें पढने में मेरी सदा से रूचि रही है , पिताजी के एक मित्र ने पत्र पत्रिकाओं की दुकान खोली थी। पिताजी जब भी बाजार जाते और तीन चार पत्रिकाएं ले आते थे , दूसरे या तीसरे दिन जाकर पुरानी पत्रिकाओं को वापस करते और नई पत्रिकाएं ले आते थे। हम सभी भाई बहन अपनी अपनी रूचि के अनुसार एक एक पत्रिका लेकर बैठ जाते। कोई खेल से संबंधित तो कोई बाल पत्रिका तो कोई साहित्यिक। कुछ दिनों तक तो साहित्‍य की पुस्‍तकों में से कहानी , कविताएं पढना मुझे अच्‍छा लगा , पर उसके बाद धीरे धीरे मेरी रूचि सिलाई-बुनाई-कढाई की ओर चली गयी । फिर तो सीधा महिलाओं की पत्रिकाओं में से नए फैशन के कपडे या बुनाई के नए नए पैटर्न देखती और सलाई या क्रोशिए में मेरे हाथ तबतक चलते , जबतक वो पैटर्न उतर नहीं जाते।

पर ग्रेज्‍युएशन की पढाई करते वक्‍त कैरियर के प्रति गंभीर होने लगी , तब प्रतियोगिता के लिए आनेवाले पत्र पत्रिकाओं में मेरी रूचि बढने लगी, फिर तो कुछ वर्ष खूब हिसाब किताब किए , जीके , आई क्‍यू और अंकगणितीय योग्‍यता को मजबूत बनाने की कोशिश की , पर फिर नौकरी करनेवाली कई महिलाओं की घर गृहस्‍थी को अव्‍यवस्थित देखकर मेरी नौकरी करने की इच्‍छा ही समाप्‍त हो गयी। कैरियर के लिए  कॉलेज की प्रोफेसर के अलावे अपने लिए कोई और विकल्‍प नहीं दिखा और दूसरी नौकरी के लिए मैने कोशिश ही नहीं की। व्‍याख्‍याता बनने के लिए उस समय सिर्फ मास्‍टर डिग्री लेनी आवश्‍यक थी , सो ले ली । प्राइवेट कॉलेजों के ऑफर भी आए तो बच्‍चों की जबाबदेही के कारण टालमटोल कर दिया और सरकारी कॉलेजों में तो आजतक इसकी न तो वेकेंसी निकली और न मैं व्‍याख्‍याता बन सकी। जो भी हो, उसके बाद प्रतियोगिता के लिए भी पढाई लिखाई तो बंद हो ही गया।

विवाह के बाद ससुराल पहुंची , तो वहां के संयुक्‍त परिवार में अच्‍छे खाने पीने की प्रशंसा करने वालों की बडी संख्‍या को देखते हुए परिवार के लिए नई नई रेसिपी बनाने में ही कुछ दिनों तक व्‍यस्‍त रही , इस समय पत्र पत्रिकाओं में मुख्‍य रूप से विभिन्‍न प्रकार की रेसिपी को पढना ही मुख्‍य लक्ष्‍य बना रहा। पर दो चार वर्षो में ही मेरी महत्‍वाकांक्षी मन और दिमाग में मेरे जीवन को व्‍यर्थ होते देख 'कुछ' करने की ओर मेरा ध्‍यान आकर्षित किया। जब भी मैके आती , बच्‍चों को घरवालों के भरोसे छोडकर पिताजी के साथ ज्‍योतिष सीखते और उसमें लम्‍बी लम्‍बी सार्थक बहस करते हुए मैने इसे ही अपने जीवन का लक्ष्‍य बनाया । इसके बाद मेरे घर में ज्‍योतिष की पत्रिकाएं आने लगी और मेरा ध्‍यान उसके लिए नए नए आलेख लिखने में लगा रहा । दो तीन वर्षों में ही उन आलेखों को संकलित करते हुए 'अजय बुक सर्विस' ने एक पुस्‍तक ही प्रकाशित कर डाली।

Hindi blogging topics

पुस्‍तक के प्रकाशन के बाद दो तीन वर्ष बच्‍चों को सही दिशा देने की कोशिश में फिर इधर उधर से ध्‍यान हट गया, क्‍यूंकि मेरे विचार से उनके बेहतर मनोवैज्ञानिक और शैक्षणिक विकास पर ध्‍यान देना आवश्‍यक था। लेकिन जब दो तीन वर्षों में बच्‍चों ने अपनी व्‍यक्तिगत जिम्‍मेदारियां स्‍वयं पर ले ली , तो फुर्सत मिलते ही ज्‍योतिष के इस नए सिद्धांत को कंप्‍यूटराइज करने का विचार मन में आया। कंप्‍यूटर प्रोफेशनलों से बात करने पर उन्‍हें यह प्रोग्राम बनाना कुछ कठिन लगा, तो मैने खुद ही कंप्‍यूटर के प्रोग्रामिंग सीखने का फैसला किया। संस्‍थान में दाखिला लेने के बाद मैं कंप्‍यूटर की पत्रिकाओं में भी रूचि लेने लगी थी और तबतक इसके सिद्धांतो को समझती रही , जबतक अपना सॉफ्टवेयर कंप्‍लीट न हो पाया। ये सब तैयारियां मैं एक लक्ष्‍य को लेकर कर रही थी , पर उस लक्ष्‍य के लिए घर से दूर निकल पाने में अभी भी समय बाकी था। एक तो ग्रहों के अनुसार भी मैं अपने अनुकूल समय का इंतजार कर रही थी , ताकि इस लक्ष्‍य को प्राप्‍त करने में बडी बाधा न आए, दूसरे बच्‍चों के भी बारहवीं पास कर घर से निकलने देने तक उनपर एक निगाह बनाए रखने की इच्‍छा से मैने अपने कार्यक्रमों को कुछ दिनों तक टाल दिया।

उसके बाद के दो तीन वर्ष शेयर बाजार पर ग्रहों के प्रभाव के अध्‍ययन करने में गुजरे। इस दौरान नियमित तौर पर इससे जुडे समाचारों को देखना और पढना जारी रहा। 'दलाल स्‍ट्रीट' भी मेरे पास आती रही। फिर भी समय कुछ अधिक था मेरे पास , कंप्‍यूटर की जानकारी मुझे थी ही , बचे दो तीन वर्षों के समय को बेवजह बर्वाद न होने देने के लिए मैं हिन्‍दी ब्‍लागिंग से जुड गयी और तत्‍काल इसके माध्‍यम से ही अपनी 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' के बारे में पाठकों को जानकारी देने का काम शुरू किया। एक वर्ष वर्डप्रेस पर लिखा , फिर मैं ब्‍लॉगस्‍पॉट पर लिखने लगी। यह एक अलग तरह की दुनिया है , जहां लेखक और पाठक के रिश्‍ते बढते हुए धीरे धीरे बहुत आत्‍मीय हो जाते हैं। औरों की तरह मैं भी इससे गंभीरता से जुडती चली गयी और आज इसके अलावे हर कार्य गौण है। अब आगे की जीवनयात्रा में रूचि किस दिशा जाएगी , यह तो समय ही बताएगा , पर आज तो यही स्थिति है कि यदि उस पुस्‍तक विक्रेता किशोर के हाथ में हिन्‍दी ब्‍लागिंग से जुडी दस पुस्‍तकें भी होती , तो मैं सबको खरीद लेती ।

जयोतिष में हुए नए रिसर्च, गत्यात्मक ज्योतिष के बारे में अधिक जानने के लिए ये लेख अवश्य पढ़ें  ------

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    धार्मिक ग्रंथों के पात्र और घटनाएं वास्‍तविक ?

     

    About Mahabharat in Hindi

    हमारे धार्मिक ग्रंथों के प्रति हिन्‍दुओं में अटूट श्रद्धा है, पर इसके बावजूद कुछ बातें अक्‍सर विवादास्‍पद बनी रहती हैं। वेदों और पुराणों में लिखी ऋचाएं तो सामान्‍य लोगों को पूरी तरह समझ में आने से ही रही , इसलिए वे बहस का मुद्दा नहीं बन पाती , पर 'रामायण' और 'महाभारत' जैसे ग्रंथ या अन्‍य धार्मिक पुस्‍तकें अपनी सहज भाषा और सुलभता के कारण हमेशा ही किसी न किसी प्रकार के विवाद में बने होते हैं। कभी इन ग्रंथों के पात्रों और घटनाओं के काल्‍पनिक और वास्‍तविक होने को लेकर विवाद बनता है , तो कभी इनमें सीमा से अधिक अतिशयोक्ति भी लोगों का विश्‍वास डिगाने में महत्‍वपूर्ण भूमिका अदा करती है। घटनाओं का क्रम देखकर ही 'रामायण' और 'महाभारत' की कहानी मुझे कभी भी काल्‍पनिक नहीं लगी , साथ ही घटनाओं के साथ साथ ग्रहों नक्षत्रों की स्थिति का सटीक विवरण और रामचंद्र जी और कृष्‍ण जी की जन्‍मकुंडली इस घटना के पात्रों के वास्‍तविक होने की पुष्टि कर देती है। पर इन ग्रंथों में कहीं कहीं पर वर्णन सहज विश्‍वास के लायक नहीं है , यह मैं भी मानती हूं।

    पर इसे एक अलग कोण से भी देखा और समझा जा सकता है , जिसकी प्रेरणा मुझे हमारे पडोसी श्री श्रद्धानंद पांडेय जी के द्वारा लिखा गया एक आलेख 'क्‍या हनुमान जी एक बंदर थे ?' से मिली। वैसे तो वे साइंस के ही विद्यार्थी रहे हैं , पर जाति से ब्राह्मण होने या फिर अपने शौक के कारण, विज्ञान के अलावे हर तरह के ग्रंथों को पढना भी उनसे नहीं छूटता। प्राचीन ग्रंथों को सीधा न नकारते हुए वे तर्क से उन खामियों का कारण ढूंढते हैं , जो अक्‍सर एक वैज्ञानिक मस्तिष्‍क में कौंधते हैं । एक घटना का उदाहरण देते हुए उन्‍होने इस आलेख की शुरूआत की है , जिसमें उनका चार वर्ष का पुत्र कई दिनों से 'सिंह अंकल' के आने की सूचना सुनकर अपने पापा के जंगल वाले सिंह दोस्‍त का इंतजार कर रहा था और 'सिंह अंकल' के आने पर उन्‍हें अपनी कल्‍पना के अनुरूप न पाकर उनके मिलकर भी असंतुष्‍ट था। उनका कहना था कि इस प्रकार की गलतफहमी कई पीढीयों तक कहानी सुनते सुनते आराम से हो सकती है।

    पौराणिक कथा का अर्थ


    उनके आलेख को पढने के बाद उनकी बातों से असहमत हुआ ही नहीं जा सकता। हो सकता है , प्राचीन काल में शब्‍द कम रहे हों , क्‍यूंकि ग्रहों को जो नाम दिया गया , वही सप्‍ताह के दिनों का भी दिया गया है। नक्षत्रों का जो नाम है , वहीं हिन्‍दी के महीनों का नाम है। जानवरों को जो नाम दिए गए , वही मनुष्‍य की विभिन्‍न जातियों को दिए गए थे। खासकर अभी भी आदिवासियों की जाति तो पशुओं के नाम पर देखी जाती है। उनका कहना है हनुमान मनुष्‍य ही रहे होंगे , पर जाति के कारण हनुमान के रूप में ऐसे प्रसिद्ध हो गए हों कि बाद में उनकी कल्‍पना हनुमान के रूप में ही कर ली गयी हो। इसी तरह 'देव' 'मनुष्‍य' और 'दैत्‍य' के रूप में वर्णित सारे चरित्र मनुष्‍य हो सकते हैं। रामायण में वर्णित अन्‍य लोगों को भी पशु ही समझ लिया गया हो , तो वर्णन में गलतफहमी होना स्‍वाभाविक है।

     मैने पहले भी सुना है कि यदि दस बीस लोगों का एक घेरा बना लिया जाए और किसी के कान में फुसफुसाकर एक कोई बात सुनाए , वह दूसरे को और दूसरा तीसरे को सुनाता चला जाए , तो दसवें या बीसवें व्‍यक्ति के पास पहुंचने पर उस बात के अर्थ का अनर्थ होना तय है। महाभारत की कहानी में धृतराष्‍ट्र को अंधा बताया गया है , पर इस दृष्टि से सोंचती हूं तो मुझे नहीं लगता है कि वे अंधे रहे होंगे। मेरे विचार से किसी चीज का अधिक मोह लोगों को अंधा बना देता है। महाभारत की पूरी कहानी में धृतराष्‍ट्र का चरित्र पुत्रमोह में अंधा दिखता है , जनता को उससे नाराजगी रही होगी , इसी कारण कहानी में अंधा अंधा कहते सुनते लोगों ने उसे अंधा मान लिया होगा।  

    धृतराष्‍ट्र तो मोह में अंधे थे ही , लेकिन राजमहल में इतनी घटनाएं घटती रहीं और उनकी रानी गांधारी को भी कुछ नजर नहीं आया। अब कहानी में एक वाक्‍य जोड दें कि धृतराष्‍ट्र तो अंधा था ही , गांधारी ने भी आंख में पट्टी बांध रखी थी। इस प्रकार से कई पीढी चलने पर कहानी को एक अलग मोड लेना ही था , क्‍यूंकि प्रश्‍न उठना ही है , दोनो अंधे कैसे ? औरतों के पतिप्रेम और त्‍याग की भावना को देखते हुए कारण बताया जाएगा , 'गांधारी ने जब देखा कि उसके पति 'कुछ नहीं' देख सकते हैं , तो उसने भी 'कुछ नहीं' देखने के लिए आंखो पर पट्टी बांध ली। 

    बस इसी तरह पीढी दर पीढी एक के बाद एक कुछ गलत तथ्‍य जुटते चले गए होंगे, जिनपर हम आज विश्‍वास नहीं कर पाते। पर इसमें कुछ न कुछ वास्‍तविकता होने से तो इंकार नहीं किया जा सकता है।

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      कुंडली से किसी व्‍यक्ति के विभिन्‍न पहलुओं, भविष्‍य का अनुमान

       

      Jyotish 12 bhav

      (jyotish aur bhav)

      गणित ज्‍योतिष में आसमान के पूरब से पश्चिम की ओर जाती गोलाकार 360 डिग्री की पट्टी को बारह भागों में बांट दिया जाता है। इन बारह भागों को हम राशि कहते हैं , इन राशियों में व्‍यक्ति के जन्‍म के समय जो राशि उदित होती है , उसे लग्‍न राशि कहते हैं।  

      Jyotish 12 bhav

      प्रथम भाव ज्योतिष (Jyotish me pahla bhav)

      • लग्‍नराशि जन्‍मकुंडली का प्रथम भाव होता है। इसी भाव के स्‍वामी ग्रह या इस भाव में स्थित ग्रहों के हिसाब से बालक की शारीरिक स्थिति या उसके आत्‍मविश्‍वास के बारे मे अनुमान किया जाता है। बचपन में स्वास्थ्य तथा बड़े होने पर व्यक्तिगत गुणों से व्यक्तित्व बनता है और आत्मविश्वास में वृद्धि या कमी होती है.
      •  इसके बाद उदित होनेवाली राशि जन्‍मकुंडली का द्वितीय भाव होता है। इसी भाव के स्‍वामी ग्रह या इस भाव में स्थित ग्रहों के हिसाब से बालक की आर्थिक या पारिवारिक स्थिति के बारे में अनुमान किया जाता है। बचपन में पारिवारिक स्थिति, बड़े होने पर अपनी हैसियत इससे देखी जाती है.
      •  इसके बाद उदित होनेवाली राशि जन्‍मकुंडली का तृतीय भाव होता है। इसी भाव के स्‍वामी ग्रह या इस भाव में स्थित ग्रहों के हिसाब से बालक की भाई बहन की स्थिति या शक्ति के बारे में अनुमान किया जाता है।बचपन में इससे अपने भाई बहन तथा बड़े होने पर साथ देनेवाले या अनुसरनकर्ता भी इसी भाव से देखे जाते हैँ.

      चतुर्थ भाव ज्योतिष (Jyotish me chautha bhav)

        •  इसके बाद उदित होनेवाली राशि जन्‍मकुंडली का चतुर्थ भाव होता है। इसी भाव के स्‍वामी ग्रह या इस भाव में स्थित ग्रहों के हिसाब से बालक की माता की स्थिति या हर प्रकार की संपत्ति के बारे मे अनुमान किया जाता है। सुख शान्ति प्रदान करने के लिए बचपन में माँ की गोद, बड़े होने पर अपनी संपत्ति और स्थायित्व इस भाव से देखे जाते हैँ.

        पंचम भाव ज्योतिष (Pancham bhav jyotish)

        • इसके बाद उदित होनेवाली राशि जन्‍मकुंडली का पंचम भाव होता है। इसी भाव के स्‍वामी ग्रह या इस भाव में स्थित ग्रहों के हिसाब से बालक की बुद्धि की स्थिति या संतान के बारे मे अनुमान किया जाता है। बचपन में आईक्यू और बड़े होने पर पढ़ाई, लिखाई, संतान की स्थिति इसी से देखी जाती है.

        षष्ठ भाव ज्योतिष (Shashth bhav Jyotish)

        • इसके बाद उदित होनेवाली राशि जन्‍मकुंडली का षष्‍ठ भाव होता है। इसी भाव के स्‍वामी ग्रह या इस भाव में स्थित ग्रहों के हिसाब से बालक की रोग प्रतिरोधक या बड़े होने पर किसी प्रकार के झंझट से जूझने की शक्ति या प्रभाव के बारे मे अनुमान किया जाता है। 

        सप्तम भाव ज्योतिष (Saptam bhav jyotish)

        • इसके बाद उदित होनेवाली राशि जन्‍मकुंडली का सप्‍तम भाव होता है। इसी भाव के स्‍वामी ग्रह या इस भाव में स्थित ग्रहों के हिसाब से बालक के पारिवारिक सुख और बड़े होने पर दाम्‍पत्‍य जीवन की स्थिति के बारे मे अनुमान किया जाता है।

        अष्टम भाव ज्योतिष (Ashtam bhav in jyotish)

        • इसके बाद उदित होनेवाली राशि जन्‍मकुंडली का अष्‍टम भाव होता है। इसी भाव के स्‍वामी ग्रह या इस भाव में स्थित ग्रहों के हिसाब से बालक की जीवतता या बड़े होने के बाद जीवनशैली या उम्र के बारे मे अनुमान किया जाता है।

        नवम भाव ज्योतिष (Bhagya bhav jyotish)

        • इसके बाद उदित होनेवाली राशि जन्‍मकुंडली का नवम् भाव होता है। इसी भाव के स्‍वामी ग्रह या इस भाव में स्थित ग्रहों के हिसाब से बालक की भाग्‍य की स्थिति या बड़े होने के बाद धर्म के प्रति उसके दृष्टिकोण के बारे मे अनुमान किया जाता है।

        दशम भाव ज्योतिष (Jyotish dasham bhav)

        • इसके बाद उदित होनेवाली राशि जन्‍मकुंडली का दशम् भाव होता है। इसी भाव के स्‍वामी ग्रह या इस भाव में स्थित ग्रहों के हिसाब से बालक के पिता और बड़े होने के बाद पद प्रतिष्‍ठा की स्थिति या उसके सामाजिक और राजनीतिक स्थिति के बारे मे अनुमान किया जाता है।

        एकादश भाव ज्योतिष (Ekadash bhav Jyotish)

        • इसके बाद उदित होनेवाली राशि जन्‍मकुंडली का एकादश भाव होता है। इसी भाव के स्‍वामी ग्रह या इस भाव में स्थित ग्रहों के हिसाब से बालक के लाभ बड़े होने के बाद उसके प्रति संतोष या लक्ष्‍य के बारे मे अनुमान किया जाता है।

        द्वादश भाव ज्योतिष (Dwadash bhav Jyotish)

        • इसके बाद उदित होनेवाली राशि जन्‍मकुंडली का द्वादश भाव होता है। इसी भाव के स्‍वामी ग्रह या इस भाव में स्थित ग्रहों के हिसाब से बालक के खर्च या बाहरी संदर्भों की स्थिति या विदेश यात्रा के बारे मे भी अनुमान किया जाता है।

            यूं तो परंपरागत ज्‍योतिष में बालक के विभिन्‍न संदर्भों के बारे में अनुमान करने के लिए ग्रहों की शक्तियों को निकालने के कई सूत्र दिए गए हैं , पर गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष उनकी सहायता नहीं लेता और विभिन्‍न भावों के स्‍वामी ग्रह या उन भावों में स्थित ग्रहों की 'गत्‍यात्‍मक शक्ति' और 'स्‍थैतिक शक्ति' के द्वारा इसका आकलन करता है । ज्योतिष के क्षेत्र में नया प्रयोग है, जो काफी सटीक है।  

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              श्री कृष्ण बाल लीला का राज

               श्री कृष्ण बाल लीला

              (About Krishna in Hindi)

              भले ही महाभारत की कहानी के कुछ अंश को लेखक की एक कपोल कल्‍पना मान लें , पर यह मेरी व्‍यक्तिगत राय है कि पूरे महाभारत की कहानी पर प्रश्‍न चिन्‍ह नहीं लगाया जा सकता है। लोग भगवान कृष्ण को एक कथा या एक कहानी मान सकते हैं , पर ग्रंथो में उल्लिखित उनकी जन्‍मकुंडली एक ऐसा सत्‍य है , जो उनके साक्षात पृथ्‍वी पर जन्‍म लेने की कहानी कहता है। सिर्फ जन्‍म ही नहीं , उन्‍‍होने पूर्ण तौर पर मानव जीवन जीया है। इनके अनेक रूप हैं और हर रूप की लीला अद्भुत है। भले ही लोग उन्‍हें ईश्वर का अवतार कहते हों , पर बाल्‍यावस्‍था में उन्‍होने सामान्‍य बालक सा जीवन जीया है । कभी मां से बचने के लिए मैया मैंने माखन नहीं खाया , तो कभी मां से पूछते हैं , राधा इतनी गोरी क्यों है, मैं क्यों काला हूं? , कभी शिकायत करते हैं कि दाऊ क्यों कहते हैं कि तू मेरी मां नहीं है।

              About Krishna in Hindi

              कृष्ण भक्ति में डूबे उनकी बाल लीलाओं का वर्णन करने वाले कवियों में सूरदास का नाम सर्वोपरि है। पर भले ही सूरदास ने कृष्ण के बाल्य-रूप का सजीव और मनोवैज्ञानिक वर्णन करने में अपनी कल्पना और प्रतिभा का कुछ सहारा लिया हो , पर कृष्‍ण जी की जन्‍मकुंडली से स्‍पष्‍ट है कि वास्‍तव में उनका बालपन बहुत ही संतुलित रहा होगा । इसमें शक नहीं की जा सकती कि बालपन में ही एक एक घटनाओं पर उनकी दृष्टि बहुत ही गंभीर रही होगी। और बाल-कृष्ण की एक-एक चेष्टाएं पीढी दर पीढी चलती हुई सूरदास की पीढी तक पहुंच गयी होगी। भले ही उसके चित्रण में सूरदास ने अपनी कला का परिचय दे दिया हो।


              ये रही कृष्‍ण जी की जन्‍मकुंडली ........


              'लग्‍नचंदायोग' की चर्चा करते हुए लेख में मैने लिखा था कि ज्‍योतिष में आसमान के बारहों राशियों में से जिसका उदय बालक के जन्‍म के समय पूर्वी क्षितिज पर होता रहता है , उसे बालक का लग्‍न कहते हैं। अब इसी लग्‍न में यानि उदित होती राशि में चंद्रमा की स्थिति हो , तो बालक की 'जन्‍मकुंडली' में लग्‍नचंदायोग बन जाता है , जिसे ही क्षेत्रीय भाषा में 'लगनचंदा योग' कहते हैं। कृष्‍ण जी की कुंडली में 'लग्‍नचंदा योग स्‍पष्‍ट दिख रहा है , जो कृष्‍ण जी के बचपन को महत्‍वपूर्ण बनाने के लिए काफी है।

               'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' की जानकारी देते हुए लिखे गए अपने एक लेख में चंद्रमा की कमजोरी और मजबूती की चर्चा करने के क्रम में मैने लिखा है यदि चंद्रमा की स्थिति सूर्य से 0 डिग्री की दूरी पर हो, तो चंद्रमा की गत्यात्मक शक्ति 0 प्रतिशत, यदि 90 डिग्री, या 270 डिग्री दूरी पर हो, तो चंद्रमा की गत्यात्मक शक्ति 50 प्रतिशत और यदि 180 डिग्री की दूरी पर हो, तो चंद्रमा की गत्यात्मक शक्ति 100 प्रतिशत होती है। चूंकि कृष्‍ण जी ने अष्‍टमी के दिन जन्‍म लिया , जब सूर्य और चंद्रमा के मध्‍य कोणिक दूरी 90 डिग्री की होती है , इसलिए उनके जन्‍मकालीन चंद्रमा को 50 प्रतिशत अंक प्राप्‍त होते हैं। 

              इसी लेख में मैने आगे लिखा है कि चंद्रमा की गत्यात्मक शक्ति के अनुसार ही जातक अपनी परिस्थितियां प्राप्त करते हैं। यदि चंद्रमा की गत्यात्मक शक्ति 50 प्रतिशत हो, तो उन भावों की अत्यिधक स्तरीय एवं मजबूत स्थिति, जिनका चंद्रमा स्वामी है तथा जहां उसकी स्थिति है, के कारण बचपन में जातक का मनोवैज्ञानिक विकास संतुलित ढंग से होता है। इस नियम से कृष्‍ण जी का मनोवैज्ञानिक विकास बहुत ही संतुलित ढंग से होना चाहिए। 

              अब यदि भाव यानि संदर्भ की की बात की जाए , तो वृष लग्‍न लग्‍न में मजबूत चांद में बच्‍चे का जन्‍म हो , तो बच्‍चों का भाई बहन , बंधु बांधव के साथ अच्‍छा संबंध होता है। बाल सखाओं के साथ्‍ा मीठी मीठी हरकतों के कारण कृष्‍ण जी का बचपन यादगार बना रहा। यहां तक कि बाल सखा सुदामा को जीवनपर्यंत नहीं भूल सके। 

              इसके अतिरिक्‍त 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' की दृष्टि से एक और ग्रहीय स्थिति बनती है , जिसका उल्‍लेख भी मैने 'लग्‍नचंदा योग' वाले लेख में कर चुकी हूं। 'लग्‍नचंदा योग' के साथ यदि षष्‍ठ भाव में अधिकांश ग्रहों की स्थिति हो तो इस योग का प्रभाव और अधिक पडता है। कृष्‍ण जी के षष्‍ठ भाव में शुक्र और शनि दोनो ही ग्रहों की मजबूत स्थिति से कृष्‍ण जी के बचपन को महत्‍वपूर्ण बनाती है। इसके अलावे जिस ग्रह की पहली राशि में चंद्रमा स्थित है , उसी ग्रह की दूसरी राशि में शुक्र और शनि की स्थिति होने के कारण जीवन में झंझट भी आए और उन्‍होने उनका समाधान भी किया। शुक्र और शनि क्रमश: शरीर , व्‍यक्तित्‍व , प्रभाव , भाग्‍य और प्रतिष्‍ठा के मामले थे और ये सब बचपन में मजबूत बने रहें।  यही था कृष्‍ण की संतुलित बाल लीलाओं का राज !

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                मिथ्‍या भ्रम

                 

                Kahani in Hindi me

                kahani in hindi me

                मुझे परंपरागत मान्‍यताएं बहुत पसंद है , क्‍यूंकि उससे सामान्‍य तौर पर कुछ नुकसान नहीं दिखाई पडता तथा ध्‍यान देने पर उसमें अनेक अच्‍छी बातें छुपी महसूस होती हैं। पर कभी कभी समाज में प्रचलित कुछ ऐसे अंधविश्‍वासों को भी शामिल देखती हूं , जिससे किसी का नुकसान हो रहा हो , तो वह मुझे बुरा लगता है। इसी सोंच में मैने एक कहानी ‘मिथ्‍याभ्रम’ लिखी थी , यह एक सत्‍य घटना पर आधारित है , जो आपको पढवा रही हूं। इसके अलावे मेरी दो कहानियां ‘एक झूठ’ और ‘पहला विरोध साहित्‍य शिल्‍पी में पहले प्रकाशित हो चुकी हैं , जिसे कभी समय निकालकर अवश्‍य पढें। तो लीजिए ‘मिथ्‍याभ्रम’ को पढना शुरू कीजिए ...... 

                ‘क्‍या हुआ, ट्रेन क्‍यूं रूक गयी ?’ रानी ने उनींदी आंखों को खोलते हुए पूछा। ’अरे, तुम सो गयी क्‍या ? देखती नहीं , बोकारो आ गया।‘ बोकारो का नाम सुनते ही वह चौंककर उठी। तीन दिनों तक बैठे बैठे कमर में दर्द सा हो रहा था। कब से इंतजार कर रही थी वह , अपने गांव पहुंचने का , इंतजार करते करते तुरंत ही आंख लग गयी थी। अब मंजिल काफी नजदीक आ गयी थी। उसने अपने कपडे समेटे , मोनू को संभाला और सीट पर एक नजर डालती हुई ट्रेन से उतरने के लिए क्‍यू में खडी हो गयी। 

                दस वर्षों बाद वह मद्रास से वापस आ रही थी। गांव आने का कोई बहाना इतने दिनों तक नहीं मिल रहा था। गांव का मकान भी इतने दिनों से सूना पडा था। अपने अपने रोजगार के सिलसिले में सब बाहर ही जम गए थे। पर इस बार चाचाजी की जिद ने उन सबके लिए गांव का रास्‍ता खोल ही दिया था। वे अपने लडके की शादी गांव से ही करेंगे। सबके पीछे वह सामानों को लेकर ट्रेन से उतर पडी। एक टैक्‍सी ली और गांव के रास्‍ते पर बढ चली। 

                टैक्‍सी जितनी ही तेजी से अपने मंजिल की ओर जा रही थी , उतनी ही तेजी से वह अतीत की ओर। मद्रास के महानगरीय जीवन को जीती हुई वह अबतक जिस गांव को लगभग भूल ही चली थी , वह अचानक उसकी आंखों के सामने सजीव हो उठा था। घटनाएं चलचित्र के समान चलती जा रही थी। उछलते कूदते , उधम मचाते उनके कदम .. कभी बाग बगीचे में तो कभी खेल के मैदानों में। अपना लम्‍बा चौडा आंगन भी उन्‍हें धमाचौकडी में मदद ही कर देता था। 

                खेलने का कोई साधन नहीं , फिर भी खेल में इतनी विविधता। जो मन में आया , वही खेल लिया। खेल के लिए कार्यक्रम बनाने में उसकी बडी भूमिका रहती। वास्‍तविक जीवन में जो भी होते देखती , खेल के स्‍थान पर उतार लेती थी। घर के कुर्सी , बेंच , खाट और चौकी को गाडी बनाकर यात्रा का आनंद लेने का खेल बच्‍चों को खूब भाता था। कोई टिकट बेचता , कोई ड्राइवर बनता , तो कोई यात्री। रूट की तो कोई चिंता ही नहीं थी , उनकी मनमौजी गाडी कहीं से कहीं पहुंच सकती थी।

                तब सरकार की ओर से परिवार नियोजन का कार्यक्रम जोरों पर था। भला उनके खेल में यह कैसे शामिल न होता। कुर्सी पर डाक्‍टर , बेंच पर उसके सहायक और खाट चौकी पर लेटे हुए मरीज । चाकू की जगह चम्‍मच , पेट काटा , आपरेशन किया , फटाफट घाव ठीक , एक के बाद एक मरीज का आपरेशन। भले ही अस्‍पताल के डाक्‍टर साहब का लक्ष्‍य पूरा न हुआ हो , पर उन्‍होने तो लक्ष्‍य से अधिक काम कर डाला था।

                इसी तरह गांव में एक महायज्ञ का आयोजन हुआ। यज्ञ के कार्यक्रम को एक दिन ही देख लेना उनके लिए काफी था। अपने आंगन में यज्ञ का मंडप तैयार बीच में हवन कुंड और चारो ओर परिक्रमा के लिए जगह । मुहल्‍ले के सारे बच्‍चे हाथ जोडे हवनकुंड की परिक्रमा कर रहे थे और ‘श्रीराम , जयराम , जय जय राम , जय जय विघ्‍न हरण हनुमान’ के जयघोष से आंगन गूंज रहा था। कितना स्‍वस्‍थ माहौल था , बच्‍चे भी खुश रहते थे और अभिभावक भी। 

                लेकिन इसी क्रम में उसे एक बच्‍चे दीपू की याद अचानक आ गयी। जब सारे बच्‍चे खेल रहे होते , वह एक किनारे खडा उनका मुंह तक रहा होता। ‘दीपू , तुम भी आ जाओ’ उसे बुलाती , तो धीरे धीरे चलकर उनके खेल में शामिल होता। पर दीपू को शामिल करके खेलना शुरू करते ही तुरंत रानी को कुछ याद आ जाता और वह दौडकर घर के एक खास कमरे में जाती। उसका अनुमान बिल्‍कुल सही होता। दीपू की मम्‍मी उस कमरे में फरही बना रही होती। अपनी कला में पारंगत वह छोटे छोटे चावल को मिट्टी के बरतन में रखे गरम रेत में तल तलकर निकाल रही होती। 

                उसकी दिलचस्‍पी चावल के फरही में कम होती , इसलिए वह अंदर जाकर चने निकाल लाती। ’काकी, इन चनों को तल दो ना’ वह उनसे आग्रह करती। ’इतनी जल्‍दी तलने से ये कठोर हो जाएंगे और इन्‍हे खाने में तुम्‍हारे दांत टूट जाएंगे, थोडी देर सब्र करो।‘ वह चने में थोडे नमक , हल्‍दी और पानी डालकर उसे भीगने को रख देती। अब भला उसका खेल में मन लग सकता था। हर एक दो मिनट में अंदर आती और फिर निराश होकर बाहर आती , लेकिन कुछ ही देर में उसे सब्र का सोंधा नमकीन फल मिल जाता और चने के भुंजे को सारे बच्‍चे मिलकर खाते। इस तरह शायद ही कभी दीपू को उनके साथ खेलने का मौका मिल पाया हो। 

                टैक्‍सी अब उसके गांव के काफी करीब आ चुकी थी। रबी के फसल खेतों में लहलहा रहे थे। बहुत कुछ पहले जैसा ही दिखाई पड रहा था। शीघ्र ही गांव का ब्‍लाक , मिड्ल स्‍कूल , बस स्‍टैंड , गांव का बाजार , सब क्रम से आते और देखते ही देखते आंखो से ओझल भी होते जा रहे थे। थोडी ही देर में उसका मुहल्‍ला भी शुरू हो गया था। बडे पापा का मकान , रमेश की दुकान , हरिमंदिर , शिवमंदिर , सबको देखकर खुशी का ठिकाना न था। 

                पर एक स्‍थान पर अचानक तीनमंजिला इमारत को देखकर उसके तो होश उड गए। यह मकान पहले तो नहीं था। फिर उसे दीपू की याद आ गयी। इसी जगह तो दीपू का छोटा सा दो कमरों का खपरैल घर था , जिसके बाहरवाले छोटे से कमरे को ड्राइंग , डाइनिंग या किचन कुछ भी कहा जा सकता था तथा उसी प्रकार अंदरवाले को बेडरूम , ड्रेसिंग रूम या स्‍टोर। यहां पर इस मकान के बनने का अर्थ यही था कि दीपू के पापा ने अपनी जमीन किसी और को बेच दी , क्‍यूंकि इतनी जल्‍दी उनकी सामर्थ्‍य तीनमंजिला मकान बनाने की नहीं हो सकती थी। 

                घर पहुंचने से ठीक पहले उसका मन बहुत चिंतित हो गया था। पता नहीं वे लोग अब किस हालत में होंगे । दीपू के पापा तो बेरोजगार थे , उसकी मम्‍मी ही दिनभर भूखी , प्‍यासी , अपने भूख को तीन चार कप चाय पीकर शांत करती हुई लोगों के घरों में फरही बनाती अपने परिवार की गाडी को खींच रही थी। बृहस्‍पतिवार को वे भी बैठ जाती थी , क्‍यूंकि गांव में इस दिन चूल्‍हे पर मिट्टी के बरतन चढाना अशुभ माना जाता है। कहते हैं , ऐसा करने से लक्ष्‍मी घर से दूर हो जाती है , धन संपत्ति की हानि होती है।

                एक दिन बैठ जाना दीपू की मम्‍मी के लिए बडी हानि थी। कुछ दिनों तक उन्‍होने इसे झेला , पर बाद में एक रास्‍ता निकाल लिया। अब वे बृहस्‍पतिवार को अपने घर में फरही बनाती मिलती , जो उनके घर से सप्‍ताहभर की बिक्री के लिए काफी होता। ’काकी , तुम अपने घर में बृहस्‍पतिवार को मिट्टी के बर्तन क्‍यू चढाती हो ? ‘ वह अक्‍सर उनसे पूछती। उनके पास जबाब होता ‘ बेटे , मुझे घरवालों के पेट भरने की चिंता है , मेरे पास कौन सी धन संपत्ति है , जिसे बचाने के लिए मुझे नियम का पालन करना पडे’ तब उसका बाल मस्तिष्‍क उनकी इन बातों को समझने में असमर्थ था। 

                पर अभी उसका वयस्‍क वैज्ञानिक मस्तिष्‍क दुविधा में पड गया था। ’क्‍या जरूरत थी , दीपू के मम्‍मी को बृहस्‍पतिवार को अपने घर में फरही बनाने की , लक्ष्‍मी सदा के लिए रूठ गयी , जमीन भी बेचना पड गया , अपनी जमीन बेचने के बाद न जाने वे किस हाल में होंगी , दीपू भी न जाने कहां भटक रहा होगा’ सोंचसोंचकर उसका मन परेशान हो गया था। टैक्‍सी के रूकते ही वे लोग घर के अंदर गए , परसों ही शादी थी , लगभग सारे रिश्‍तेदार आ चुके थे , इसलिए काफी चहल पहल थी। मिलने जुलने और बातचीत के सिलसिले में तीन चार घंटे कैसे व्‍यतीत हो गए , पता भी न चला। 

                अब थोडी ही देर में रस्‍मों की शुरूआत होने वाली थी। चूंकि घर में रानी ही सबसे बडी लडकी थी , उसे ही गांव के सभी घरों में औरतों को रस्‍म में सम्मिलित होने के लिए न्‍योता दे आने की जबाबदेही मिली। वह दाई के साथ इस काम को करने के लिए निकली। सबों के घर तो जाने पहचाने थे , पर सारे लोगों में से कुछ आसानी से पहचान में आ रहे थे , तो कुछ को पहचानने के लिए उसके दिमाग को खासी मशक्‍कत करनी पड रही थी।

                एक मकान से दूसरे मकान में घूमती हुई वह आखिर उस मकान में पहुच ही गयी , जिसने चार छह घंटे से उसे भ्रम में डाल रखा था। इस मकान के बारे में उसने दाई से पूछा तो वह भाव विभोर होकर कहने लगी ‘अरे , दीपू जैसा होनहार बेटा भगवान सबको दे। उसने व्‍यापार में काफी तरक्‍की की और शोहरत भी कमाया । उसने ही यह मकान बनवाया है। इस बीच पिताजी तो चल बसे , पर अपनी मां का यह काफी ख्‍याल रखता है। अभी तीन चार महीने पूर्व इसका ब्‍याह हुआ है। पत्‍नी भी बहुत अच्‍छे घर से है‘ दाई उसकी प्रशंसा में अपनी धुन में कुछ कुछ बोले जा रही थी और वह आश्‍चर्यचकित उसकी बातों को सुन रही थी। 

                हां , उसके वैज्ञानिक मस्तिष्‍क को चुनौती देनेवाला एक मिथ्‍याभ्रम टूटकर जरूर चकनाचूर हो चुका था.

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