सरस्‍वती पूजा पर आज तो बस पुरानी यादें ही साथ हैं !!

February 08, 2011
सरस्‍वती पूजा को लेकर सबसे पहली याद मेरी तब की है , जब मैं मुश्किल से पांच या छह वर्ष की रही होऊंगी और सरस्‍वती पूजा के उपलक्ष्‍य में शाम को स्‍टेज में हो रहे कार्यक्रम में बोलने के लिए मुझे यह कविता रटायी गयी थी ...

शाला से जब शीला आयी ,
पूछा मां से कहां मिठाई ।
मां धोती थी कपडे मैले ,
बोली आले में है ले ले।
मन की आशा मीठी थी ,
पर आले में केवल चींटी थी।
खूब मचाया उसने हल्‍ला ,
चींटी ने खाया रसगुल्‍ला।

गांव में रहने के कारण अपनी पढाई न पूरी कर पाने का मलाल दादाजी को इतना रहा कि उन्‍होने पांचों बेटों को अधिक से अधिक पढाने की पूरी कोशिश की। एक मामूली खेतिहर और छोटा मोटा व्‍यवसाय करनेवाले मेरे दादाजी अपने पांचो बेटे को कक्षा में टॉपर पाकर और उनके ग्रेज्‍युएट हो जाने मात्र से ही काफी खुश रहते और मानते कि हमारे परिवार पर मां सरस्‍वती की विशेष कृपा है , इसलिए अच्‍छा खासा खर्च कर अपने घर  पर ही वसंत पंचमी के दिन सरस्‍वती जी की विशेष पूजा करवाया करते थे। सुबह पूजा होने के बाद शाम को लोगों की भीड जुटाने के लिए एक माइक और लाउस्‍पीकर आ जाता , वहां के सांस्‍कृतिक कार्यक्रम में हमारे परिवार के लोगों का तो शरीक रहना आवश्‍यक होता। घर के छोटे बच्‍चे भी स्‍टेज पर जाकर अपना नाम ही जोर से चिल्‍लाकर बोल आते।

थोडी बडी होने पर स्‍कूल में भी हमारा उपस्थित र‍हना आवश्‍यक होता , चूंकि स्‍कूलों के कार्यक्रम में थोडी देरी हो जाया करती थी , इसलिए हमारे घर की पूजा सुबह सवेरे ही हो जाती और माता सरस्‍वती को पुष्‍पांजलि देने के बाद ही हमलोग तब स्‍कूल पहुंचते , जब वहां का कार्यक्रम शुरू हो जाता था। सभी शिक्षकों को मालूम था कि हमारे घर में भी पूजा होती है , इसलिए हमें कभी भी देर से पहुंचने को लेकर डांट नहीं पडी। बचपन से ही हम भूखे प्‍यासे स्‍कूल जाते और स्‍कूल की पूजा के बाद ही प्रसाद खाते हुए सारा गांव घूमते , प्रत्‍येक गली में एक सरस्‍वती जी की स्‍थापना होती थी , हमलोग किसी भी मूर्ति के दर्शन किए बिना नहीं रह सकते थे।

ऊंची कक्षाओं के बच्‍चों को स्‍कूल के सरस्‍वती पूजा की सारी व्‍यवस्‍था खुद करनी होती थी , इस तरह वे एक कार्यक्रम का संचालन भी सीख लेते थे। चंदा एकत्रित करने से लेकर सारा बाजार और अन्‍य कार्यक्रम उन्‍हीं के जिम्‍मे होता। सहशिक्षा वाले स्‍कूल में पढ रही हम छात्राओं को सरस्‍वती पूजा के कार्यक्रम में चंदा इकट्ठा करने और पंडाल की सजावट के लिए घर से साडियां लाने से अधिक काम नहीं मिलता था , इसलिए सबका खाली दिमाग अपने पहनावे की तैयारी करता मिलता।

तब लहंगे का फैशन तो था नहीं , बहुत कम उम्र से ही सरस्‍वती पूजा में हम सभी छात्राएं साडी पहनने के लिए परेशान रहते। आज की  तरह तब महिलाओं के पास भी साडियों के ढेर नहीं हुआ करते थे , इसलिए अच्‍छी साडियां देने को किसी की मम्‍मी या चाची तैयार नहीं होती और पूजा के मौके पर साधारण साडियां पहनना हम पसंद नहीं करते थे। साडियों के लिए तो हमें जो मशक्‍कत करनी पडती , उससे कम ब्‍लाउज के लिए नहीं करनी पडती। किसी भी छात्रा को अपनी मम्‍मी और चाचियों का ब्‍लाउज नहीं आ सकता था, ब्‍लाउज के लिए हम पूरे गांव में दुबली पतली नई ब्‍याहता भाभियों को ढूंढते। तब रंगो के इतने शेड तो होते नहीं थे , हमारी साडी के रंग का ब्‍लाउज कहीं न कहीं मिल ही जाता , तो हमें चैन आता।

हमारे गांव में वसंतपंचमी के दूसरे दिन से ही मेला भी लगता है , हमारे घर में तो सबका संबंध शुरू से शहरों से रा है , इसलिए मेले को लेकर बडों को कभी उत्‍साह नहीं रहा , पर दूर दराज से पूरे गांव में सबके घर मेहमान मेला देखने के लिए पहुंच जाते हैं। अनजान लोगों से भरे भीड वाले वातावरण में हमलोगों को लेकर अभिभावक कुछ सशंकित भी रहते , पर एक सप्‍ताह तक हमलोगों का उत्‍साह बना रहता। ग्रुप बनाकर ही सही , पर मेले में आए सर्कस से लेकर झूलों तक और मिठाइयों से लेकर चाट पकौडों तक का आनंद हमलोग अवश्‍य लेते।

वर्ष 1982 में के बी वूमेन्‍स कॉलेज , हजारीबाग में ग्रेज्‍युएशन करते हुए चतुर्थ वर्ष में पहली बार सरस्‍वती पूजा के आयोजन का भार हमारे कंधे पर पडा था। इस जिम्‍मेदारी को पाकर हम दस बीस लडकियां अचानक बडे हो गए थे और पंद्रह दिनों तक काफी तैयारी के बाद हमलोगों ने सरस्‍वती पूजा के कार्यक्रम को बहुत अच्‍छे ढंग से संपन्‍न किया था। वो उत्‍साह भी आजतक नहीं भूला जाता। आज तो बस पुरानी यादें ही साथ हैं , सबों को सरस्‍वती पूजा की शुभकामनाएं !!

Share this :

Previous
Next Post »
14 Komentar
avatar

घर..स्कूल..कॉलेज की कितनी ही यादें जुड़ी हुई हैं, सरस्वती पूजा से.हमेशा...उसके आयोजन में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया..शुरू-शुरू में तो बहुत ही खालीपन सा महसूस होता इस दिन. पर धीरे-धीरे आदत पड़ गयी

ना जाने कितनी चीज़ों की आदत पड़ती जायेगी.

Balas
avatar

माँ सरस्वती को नमन........बसंत पंचमी की हार्दिक शुभकामनायें आपको भी......

Balas
avatar

जीवन भर की पूँजी लगती हैं ऐसी यादें ... और कभी साथ भी नहीं छोड़तीं ......बसंतोत्सव की शुभकामनाये

Balas
avatar

कितने सुहाने थे वो दिन।
यादें याद रहती है...।

Balas
avatar

पुरानी यादों की बात ही निराली है।

Balas
avatar

वसंत पंचमी की हार्दिक शुभकामनाएं।

---------
ब्‍लॉगवाणी: एक नई शुरूआत।

Balas
avatar

अपनी यादे बांटने का धन्यवाद |

Balas
avatar

अपनी अमूल्य यादों को साझा कराने के लिए आभार।

Balas
avatar

first of all thanks for your valuable comment on my blog...and thanks for sharing ur memories also..

Balas
avatar

आपकी सरस्वती पूजा की रोचक चर्चा और पुरानी यादों से जुडकर बहुत अच्छा लगा.आपका मेरे ब्लॉग 'मनसा वाचा कर्मणा' पर आने से भी मुझे खुशी मिली है.कृपया समय समय पर आकर अपने अमूल्य विचारों से मेरा मार्गदर्शन कीजिये.

Balas
avatar

अरे आपने इस ब्लॉग पर काफी दिन से कुछ नहीं लिखा है ! जिन्हें ज्योतिष की समझ नहीं है उनका भी ध्यान रखें :-)
शुभकामनायें !

Balas
avatar

होली पर आपको,समस्त परिवार को और सभी ब्लोगर जन को हार्दिक शुब कामनाएँ .

Balas
avatar

ज्योतिष के अलावा अन्य सामाजिक पहलुओं पर आपकी चिंताओं की ज़रूरत है....इस पोस्ट के लिए शुक्रिया !

Balas
avatar

बिहार और झारखंड के लोगों के कारण यह पूजा अब महानगरों में भी खूब धूमधाम से होती है।

Balas