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29 अप्रैल को होने वाले विवाह



30 अप्रैल को सुबह सुबह शैलेश भारतवासी जी के फेसबुक स्‍टेटस पर मेरी नजर गई ...

क्या कभी ऐसा भी हो सकता है कि मातम और उत्सव इतनी जल्दी-जल्दी हों कि इंसान उनका एहसास न कर सके। गौरव शर्मा (Gaurav Sharma) के परिवार के साथ कुछ ऐसा ही हुआ। 27 अप्रैल 2013 को गौरव का लग्न-महोत्सव था (झाँसी, आगरा, मथुरा आदि स्थानों का लग्न पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के तिलकोत्सव की तरह का ही एक वैवाहिक संस्कार है)। लड़की पक्ष वाले लग्न करके रात तीन बजे तक झाँसी से धौलपुर के लिए निकले। शायद वे धौलपुर पहुँच भी नहीं पाए होंगे कि लगभग सुबह के साढ़े सात बजे गौरव के पिताजी का दिल का दौरा पड़ने से देहांत हो गया। यह पहला ही दौरा था लेकिन जानलेवा साबित हुआ। 

इस घटना को लेकर मन कुछ दुखी ही था कि शाम को सुनील बडोला जी का फेसबुक स्‍टेटस भी वैसा ही देखने को मिल गया .... 

मातम में बदली शादी, दूल्हे की मौत

देहरादून: अंबाला से पूरे परिवार और नाते-रिश्तेदारों के साथ सेहरा बांधकर देहरादून बरात लेकर पहुंचे दूल्हे की जयमाला के दौरान तबियत बिगड़ गई। परिजन उसे अस्पताल ले गए, लेकिन उपचार के दौरान उसकी मौत हो गई। पुलिस ने शव को पोस्टमार्टम के बाद परिजनों को सौंप दिया। मृतक के परिजनों ने खाने में किसी तरह की विषाक्त चीज खिलाने की आशंका जताई है। पुलिस पीएम रिपोर्ट आने का इंतजार कर रही है। उसके आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी।


30 वर्षों से ग्रहों के प्रभाव का अध्‍ययन करने के बाद यह तो स्‍पष्‍ट हुआ है कि ग्रहों का कोई योग सुखद वातावरण तैयार करता है तो कुछ कष्‍टकर , यही कारण है कि शुभ मुहूर्त्‍तों में विवाह या अन्‍य कर्मकांड करने को महत्‍व दिया जाता है। 29 अप्रैल को अक्षय तृतीया का दिन था , जिस दिन के लग्‍न को हमारे पंचांगों में बहुत ही शुभ माना गया है , फिर भी ऐसी दुर्घटनाएं क्‍यों हुई , आखि 29 अप््रैल को दिन अशुभ तो नहीं था , यह जानने के लिए मैने गूगल में '29 अप्रैल 2013' कीवर्ड के द्वारा पिछले सप्‍ताह के सभी समाचारों पर नजर डाली तो पाया कि बहुत सारे स्‍थानों में इस दिन के विवाह में कुछ न कुछ बाधाएं उपस्थित हुईं , ऐसा अन्‍य दिनों में भी होता होगा , क्‍योंकि मैने इस तरह का सर्च कभी नहीं किया था। पर यदि इसी बार इतने बडे स्‍तर पर वैवाहिक कार्यक्रम में गडबडी आई है तो यह मेरे लिए शोध का विषय है कि आखिर इस दिन ग्रहों की स्थिति में क्‍या गडबडी थी , ताकि ऐसे दिनों में आगे विवाह न किए जाने की सलाह लोगों को दी जा सके। ये देखिए 29 अप्रैल को होने वाले विवाह के साथ अजब गजब कुछ समाचारों के लिंक ...... 
गलोड़ में मंगलवार रात को शादी समारोह में हिस्सा लेने आए एक युवक की छत से गिरकर मौत हो गई। मृतक की पहचान रामू (23) पुत्र अशोक बाबू निवासी नंगला कीरत गोला बाजार तहसील व जिला मैनपुरी (उत्तर प्रदेश) के रूप में हुई है। पुलिस ने पोस्टमार्टम करवाने के बाद शव परिजनों को सौंप दिया है।रामू गलोड़ में अपनी भांजी की 29 अप्रैल को शादी समारोह में हिस्सा लेने के लिए पहुंचा था। 
शादी 29 अप्रैल की रात देहरादून में वेदपाल के रिश्तेदार के घर होनी थी। यहां रायपुर क्षेत्र की आर्डिनेंस फैक्ट्री एस्टेट में वधू पक्ष ने शादी का इंतजाम किया। तय कार्यक्रम के मुताबिक, सोमवार को वर पक्ष के लोग बरात लेकर यहां पहुंचे। देर रात जयमाला हुई। जयमाला के बाद फोटो खिंचवाने का कार्यक्रम चल रहा था कि दूल्हे प्रदीप को पेट में दर्द हुआ। उसने टॉयलेट जाने की इच्छा जताई। बाथरूम में उसे उल्टियां होने लगीं और वह बेहोश होकर गिर पड़ा। वर व वधू पक्ष के लोग प्रदीप को तत्काल दून अस्पताल लाए, लेकिन हालत गंभीर देख डॉक्टरों ने प्रदीप को सीएमआइ अस्पताल रेफर कर दिया। सीएमआइ से उसे मसूरी हाईवे स्थित मैक्स अस्पताल रेफर कर दिया गया। मैक्स अस्पताल में उपचार के दौरान प्रदीप की मौत हो गई। 
गांव सकलूपुरा में भांजी की शादी होने से उनका परिवार 28 अप्रैल को भात देने गया था। जहां 29 अप्रैल की रात को शादी थी। बारात गांव सौर्या मकनपुर से आई हुई थी। परिजनों के मुताबिक पीडि़त बालिका पिता के साथ घर की छत पर सो रही थी, इस दौरान बरात में आया एक वहशी दरिंदा छह वर्षीय बालिका को उठाकर दूर ले गया और उसके साथ दुष्कर्म किया। 
गांव सांकरोड़ निवासी देसराज के बेटे कैलाश की शादी गुडग़ांव के खेड़की माजरा निवासी जोगेंद्र की बेटी के साथ 29 अप्रैल को थी। ओमपाल भी कैलाश की बारात में गया हुआ था। दोस्त की शादी में खुश ओमपाल देर रात तक डीजे पर नाच रहा था। रात 12 बजे के बाद गांव के ही सुमेर व विक्रम का डीजे पर नाचने को लेकर झगड़ा हो गया। ओमपाल ने झगड़े में सुमेर का पक्ष लिया था। ओमपाल जब टैंट में खाना खाने जा रहा था तो डीजे पर झगड़ा करने वाले युवकों ने मिलकर ओमपाल को बुरी तरह से पीटना शुरू कर दिया। इस घटना में वह अधमरा हो गया। लोगों ने बीच-बचाव कर मामले को शांत करा दिया। इस झगड़े में ओमपाल को कई जगह गुम चोट लगी थी। उसे सिविल अस्पताल में ले जाया गया, मगर चिकित्सकों ने उसे मृत घोषित कर दिया। 
यह घटना है बेगूं थाना क्षेत्र के नंदवाई पंचायत अंतर्गत मुरोली की। यहां रहने वाली 16 वर्षीय कविता पुत्री रामलाल धाकड़ रविवार को पुलिस थाने पहुंची। उसने सीआई विक्रमसिंह को लिखित आवेदन देकर बताया कि वह मंडावरी में अपने मौसी-मौसाजी के पास रहती है। उसके माता-पिता 29 अप्रैल को आयोजित सामूहिक विवाह सम्मेलन में उसकी शादी करवाना चाहते हैं। जबकि वह बालिग होने तक शादी नहीं करना चाहती है, इसलिए शादी करने पर आमादा उसके परिजनों को पाबंद कराया जाए। 
गांधी नगर निवासी अनूप नाग ने अपनी इकलौती पुत्री की शादी चास निवासी प्रदीप कुमार के पुत्र प्रकाश के साथ तय की थी। तिलक में एक लाख रुपये दी गई थी जबकि 29 अप्रैल को बारात आनी थी। तय तारीख को रात में करीब दस बजे बारात आई। गुरुद्वारा हॉल में बारात को ठहराया गया। लड़की वालों ने जोड़ाफाटक सुरेंद्र वाटिका में इंतजाम किया था। वहां मेहमानों को भोजन आदि चल रहा था। बारात भी हॉल से सुरेंद्र वाटिका ही आनी थी। लेकिन रात बारह बजे जब तक बारात नहीं निकली। लड़की के पिता जब दूल्हे के कमरे में गए तो तो उनके होश उड़ गए। प्रकाश अपनी शादी के कपड़े जुड़वा भाई सूरज को पहना रहा था। 
बहन की बेटी लीलावती की 29 अप्रैल को बरात आने वाली थी। शादी में हिस्सा लेने के लिए दीनानाथ बाइक से सिंगही जा रहा था। बाइक पर उसकी पत्‍‌नी रीता, बेटा ध्रुव भी बैठा था। वह खुखुंदू थाना क्षेत्र के ग्राम मुजुरी के समीप भरथुआ-भटनी मार्ग पर पहुंचे थे कि अचानक भटनी की तरफ से एक ट्रक आ गया। उसे पास देते समय बाइक अनियंत्रित होकर गड्ढे में चली गई, जिससे तीनों गंभीर रुप से घायल हो गए। आसपास के लोगों ने तीनों को इलाज के लिए जिला अस्पताल भिजवाया, जहां हालत गंभीर देख चिकित्सक ने दीनानाथ को मेडिकल कालेज गोरखपुर रेफर कर दिया। गोरखपुर जाते समय दीनानाथ ने रास्ते में ही दम तोड़ दिया। 
29 अप्रैल को शादी होनी थी। कार्यक्रम के मुताबिक शनिवार को मंडप के दिन मंडप के दिन पिता ग्राम प्रधान बृजभान सिंह व अन्य तमाम लोगों को साथ लेकर ननौरा तिलक चढ़ाने पहुंचा यहां लड़के के पिता ताराचंद ने तिलक के थाल में कम से कम एक लाख रुपए रखने को कहा। इतनी रकम की व्यवस्था न हो पाने पर उसने पिता को उल्टी सीधी बातें कह तिलक वापस कर दिया। मौजूद लोगों ने ताराचंद को समझाने की कोशिश की पर वह किसी की बात सुनने को तैयार नहीं हुआ। लाचार हो तिलक ले कर गए लोग बैरंग वापस लौट आए। लड़की के पिता ने रविवार को श्रीनगर थाने में तहरीर देकर दहेज उत्पीड़न का मुकदमा दर्ज करने की गुहार लगाई है। 
29 अप्रैल को उसकी शादी की तिथि तय हो गयी और निमन्त्रण कार्ड भी बाँटे गये। इसी बीच इस प्रेमी जोड़े ने लोक लाज व मर्यादाओं को ठेगा दिखाते हुये घर से भागकर अपनी अलग दुनिया बसाने का समाज विरोधी निर्णय ले लिया। इसके तहत विगत शनिवार को प्रेमी युगल ने घर से भागने की योजना बना ली। उधर, शनिवार को युवक ने अपने ही घर में गणेश पूजन व तेल की रस्म परिजनों के कहे अनुसार अदा की। परन्तु इसके बाद उसका प्रेमिका से मोबाइल पर सम्पर्क हो गया, और उसका दिल फिर से उसके लिये मचलने लगा। दोनों मोबाइल फोन पर सम्पर्क के आधार पर अपने पुराने मिलन स्थल पर पहुँच गये। बाद में लोक लाज व मर्यादाओं को ठेंगा दिखाकर उक्त प्रेमी जोड़ा घर से फरार हो गया। 
विवेक विहार निवासी भूपसिंह के बेटे सतेन्द्र की शादी 29 अप्रैल को है। शनिवार को सगाई समारोह चल रहा था। भूपसिंह के दामाद दरोगा सुनील कुमार टुंडला से आए हैं। बताया जाता है कि नाच गाने के दौरान दरोगा ने अपनी पिस्टल से चली गोली साली राजशिखा के पेट में लग गई 
घटना के बारे में घायल धर्मराज कोटार्य ने बताया कि उसके अनौसा निवासी साले रामभवन की 29 अप्रैल को शादी है। इससे महोबा बारात जाने के लिए आतिशबाजी बुक करने आया था। उसके पीछे-पीछे बेटा खेमराज भी चला आया था। इससे वह भी चपेट में आकर घायल हो गया। 
मनियर प्रतिनिधि के अनुसार मनियर पूरब टोला (छावनी मुहल्ला) निवासी पारस सिंह का इकलौता पुत्र सूरज सिंह (22) अपने मोहल्ले के राजा सिंह, बब्बन वर्मा, मक्खन वर्मा के साथ पतार घाट घाघरा में स्नान करने गया हुआ था। स्नान करते समय सूरज चकोह में फंस गया। उसका चचेरा भाई राजा ने उसका हाथ पकड़कर बाहर खींचना चाहा लेकिन वह स्वयं चकोह में फंसता देख उसका हाथ छोड़ दिया जिससे सूरज पल भर में ही लहरों में समा गया। सूरज के डूबने की खबर कस्बे में आते ही शोक की लहर दौड़ गई। गोताखोरों को बुलाकर शव की तलाश देर शाम तक होती रही लेकिन कोई सफलता नहीं मिल सकी। पारस सिंह गुजरात में प्राइवेट कंपनी में काम करते हैं। उनका इकलौता पुत्र सूरज भोपाल में बीसीए की तैयारी कर रहा था। पारस सिंह 29 अप्रैल को भाई की लड़की की शादी में शामिल होने के लिए आए हुए थे। 
पत्‍‌नी की हत्या के बाद आभूषण व नकदी के साथ बांके बिहारी के फरार होने को ले गांव में तरह-तरह की चर्चा है। ग्रामीणों ने बताया कि बांके की बहन रेणु की शादी 29 अप्रैल को होनी थी। रेणु की शादी के लिए उसके पिता विंध्याचल जायसवाल ने आभूषण के साथ-साथ घर में नकदी रखे हुए थे। हत्या के बाद बांके ने पत्‍‌नी के शरीर से भी गहने उतार लिए। इसके साथ-साथ घर में रखे आभूषण व नकदी लेकर फरार हो गया है। 
अपनी चचेरी बहन अर्चना, जिसकी शादी 29 अप्रैल को होनी है, उसमें शरीक होने के लिए आया था। आरोपी पट्टीदारों से उसका कोई विवाद नहीं था। अजय का कसूर बस इतना था कि उसने घर आते समय ध्रुव सिंह को शराब पीने से मना किया था। इसी को लेकर अजय और ध्रुव में कहासुनी हुई। लोगों ने बीच बचाव कर मामले को शांत कर दिया। यह बात ध्रुव को नागवार लगी और अपने पुत्रों संग अजय की हत्या कर दी। 
पुलिस ने मृतक के पिता राजेन्द्र के बयान पर इत्फाकिया कार्रवाई करते हुए शव का पोस्टमार्टम करवा परिजनों को सौंप दिया। राजेंद्र सिंह ने बताया कि वह किसान है। उसके दो लड़के हैं। उसका बड़ा लड़का सोनू कनीना के पीकेएसडी कॉलेज में बीए द्वितीय का छात्र था। अचानक गुरुवार दोपहर करीब एक बजे सोनू ने प्लाट में जाकर फांसी लगा ली। सरपंच कुलदीप सिंह ने बताया कि सोनू की चचेरी बहन की 29 अप्रैल को शादी होनी है। उसका पूरा परिवार शादी की तैयारियों में लगा हुआ था।

मुहूर्त्‍त को लकर लोगों के भ्रम

कई प्रकार की व्‍यस्‍तता के कारण कुछ दिनों से अपने ब्‍लोग पर नियमित रूप से ध्‍यान नहीं दे पा रही हूं। फिलहाल जहां एक ओर दोनो बच्‍चों की छुट्टियां मनमाने ढंग से मनाने में उनकी मदद कर रही हूं , वहीं दूसरी ओर बिखरे पडे सभी आलेखों को संपादित कर उसे पुस्‍तकाकार देने में भी व्‍यस्‍त हूं। इस पुस्‍तक का काम जल्‍द ही पूरा हो जाएगा , जिसमें ज्‍योतिष की सारी कमियों को सटीक ढंग से स्‍वीकार करते हुए उसे दूर करने के उपायों की चर्चा की गयी है। जल्‍द ही इसकी पी डी एफ फाइल इंटरनेट पर डाल दूंगी , ताकि इसे पढकर ज्‍योतिष प्रेमी ज्‍योतिष के वास्‍तविक स्‍वरूप को समझ पाएं। इसी दौरान पिताजी की भी एक डायरी पढने का मौका मिला , उसमें से भी कुछ उपयोगी आलेखों को इस पुस्‍तक में सम्मिलित करने की भी इच्‍छा है। उन्‍हीं चुने हुए आलेखों में से एक आज आपके लिए प्रस्‍तुत है .....

आज के अनिश्चित और अनियमित युग में हर व्यक्ति स्वयं को असुरक्षित महसूस करता है। अपने कर्मों और कार्यक्रमों पर भरोसेवाली कोई बात नहीं रह जाती है। जैसे जैसे आत्मविश्वास में कमी होती जा रही है , मुहूर्त , यात्रा आदि संदर्भों की ओर लोगों का झुकाव बढ़ता जा रहा है। पत्र-पत्रिकाओं में अक्सर फिल्म-निर्माण प्रारंभ करने और उसके प्रदर्शन की शुरुआत के लिए मुहूर्त की चर्चा देखने को मिलती है। फिल्म-निर्माण करने में अधिक से अधिक खर्च-शक्ति और पूंजी की लागत होती है , कामयाबी मिलने पर लागत-पूंजी न केवल सार्थक होती है , वरन् प्रतिदान के रुप में कई गुणा बढ़ भी जाती है। दूसरी ओर फिल्म फलॉप होने पर फिल्म निर्माता दर-दर भटकाव की स्थिति को प्राप्त करते हैं। सचमुच फिल्म निर्माण बहुत बड़ा रिस्क होता है , इसलिए फिल्मनिर्माता एक अच्छे मुहूर्त की तलाश में होते हैं , ताकि काम अबाध गति से चलता रहे और प्रदर्शन के बाद भी फिल्म काफी लाभदायक सिद्ध हो। किन्तु वस्तुतः होता क्या है ? आज का फिल्म उद्योग काफी लाभप्रद नहीं रह गया है , कुछ सफल है , तो अधिकांश की स्थिति बिगड़ी हुई है। क्या सचमुच मुहूर्त काम करता है ?

पूरे देश में प्रवेशिका परीक्षा देनेवालों की संख्या करोड़ों में होती है। इस वैज्ञानिक युग में जैसे-जैसे मनोरंजन के साधन बढ़ते चले गए , पढ़ाई का वातावरण धीरे-धीरे कमजोर पड़ता चला गया। आज जैसे ही परीक्षा के लिए कार्यक्रम की घोषणा होती है , अधिकांश विद्यार्थी परेशान नजर आते हैं , क्योंकि उनकी तैयारी संतोषजनक नहीं होती है , इसलिए उनका आत्मविश्वास काम नहीं करता रहता है। प्रायः सभी विद्यार्थी और उनके अभिभावक अपने आवास से परीक्षा-स्थल पर पहुंचने के लिए मुहूर्त्‍त की तलाश में पंडितों के पास पहुंच जाते हैं। पंडितजी के पास ग्रहों , नक्षत्रों के आधार पर शोध किए गए कुछ विशिष्ट शुभ समय-अंतराल की तालिका होती है।

कभी महेन्द्र योग , कभी अमृत योग तो कभी सिद्धियोग से संबंधित इस प्रकार के शुभफलदायी लघुकालावधि की सूचना बारी-बारी से सभी विद्यार्थियों और अभिभावकों को दी जाती है या फिर एक ही विद्यार्थी पंडितजी से यह मुहूर्त्‍त प्राप्त कर कई विद्यार्थियों को जानकारी देते हैं। विद्यार्थी झुंड बनाकर एक ही साथ उसी शुभ मुहूर्त्‍त में अपने गांव , कस्बे या क्षेत्र से परीक्षास्थल के लिए निकलते हैं। पर सोंचने की बात है कि क्या सबका परिणाम एक सा होता है ? नहीं , विद्यार्थियों को उनकी प्रतिभा के अनुरुप ही फल प्राप्त होता है। उत्तीर्ण होने लायक विद्यार्थी सचमुच उत्तीर्ण होते हैं और जिन विद्यार्थियों के अनुत्तीर्ण होने की संभावना पहले से ही रहती है , वैसे ही विद्यार्थी अनुत्तीर्ण देखे जाते हैं। विरले ही ऐसे विद्यार्थी होते हैं , जिनका परीक्षा परिणाम प्रत्याशा के विरुद्ध होता है , उन विद्यार्थियों ने शुभ मुहूर्त्‍त में यात्रा नहीं की , इसलिए ही ऐसा हुआ , यह तो कदापि नहीं कहा जा सकता।

यहां तो मैं केवल यात्रा की बात कर रहा हूं , किन्तु कल्पना करें किसी समय अमृत योग , सिद्धि योग या महेन्द्र योग चल रहा हो और उसी समय किसी विषय की परीक्षा चल रही हो , तो क्या लाखों की संख्या में परीक्षा दे रहे विद्यार्थी उस विषय में उत्तीर्ण हो जाएंगे ? कदापि नहीं , सभी विद्यार्थियों को उनकी योग्यता के अनुरुप ही  परीक्षाफल की प्राप्ति होगी। अमृतयोग या सिद्धियोग कुछ काम नहीं कर पाएगा।

हर विषय की परीक्षा का समय निर्धारित होता है और लाखों की संख्या में परीक्षार्थी परीक्षा में सम्मिलित होकर भिन्न-भिन्न परीणामों को प्राप्त करते हैं। समय के छोटे से टुकड़े को ही मुहूत्र्त कहा जाता है। इस दृष्टिकोण से परीक्षा की कुल अवधि , जिसमें सभी विद्यार्थी परीक्षा दे रहे हैं , एक प्रकार का मुहूत्र्त ही हुआ। वह मुहूर्त्‍त अच्छा है या बुरा , सभी विद्यार्थियों के लिए एक जैसा ही होना चाहिए , परंतु क्या वैसा हो पाता है ? स्पष्ट है , ऐसा कभी नहीं हो सकता ।

बहुत बार समय का एक छोटा सा अंतराल आम लोगों को प्रभावित करता है। हवाई जहाज या रेल के दुर्घटनाग्रस्त होने पर सैकड़ो लोग एक साथ मरते हैं। इसी तरह युद्ध , भूकम्प या तूफान के समय मरनेवालों की संख्या हजारो में होती है। उक्त कालावधि को हम बहुत ही बुरे समय से अभिहित कर सकते हैं , क्योकि इस प्रकार की घटनाएं जनमानस पर बहुत ही बुरा प्रभाव डालती है , किन्तु इस प्रकार की घटनाओं को अच्छे योगों में भी घटते हुए मैंने पाया है। इसी प्रकार शुभ विवाह के लिए शुभ मुहूर्तों की एक लम्बी तालिका होती है , जिन तिथियों में ही शादी-विवाह की व्यवस्था की जाती है। परंतु बहुत बार हम ऐसा सुनते हैं कि आकस्मिक दुर्घटना के कारण बरातियों की मौत हो गयी , ऐसी हालत में इन योगों की कौन सी प्रासंगिकता रह जाती है ? क्या यह बात दावे से कही जा सकती है कि जो हवाई जहाज दुर्घटनाग्रस्त हुई , उसमें हवाई यात्रा करने से पूर्व सभी यात्रियों में से किसी ने मुहूर्त्‍त नहीं देखा होगा ? उसमें स्थित कोई आम आदमी , जो भाग्यवादी दृष्टिकोण भी रखता होगा , यात्रा के विषय में अवश्य ही पंडितों से सलाह ले चुका होगा , फिर भी सभी यात्रियो का परिणाम एक सा ही देखा जाता है।

जहां एक ओर  सामूहिक उत्सव , एक ही मेले में लाखो लोगों का एक साथ उपस्थित होना , सामूहिक विवाह , सौंदर्य प्रतियोगिता आदि सुखद अहसास खास समय अंतराल के विषय वस्तु हो सकते हैं , वहीं दूसरी ओर भूकम्प , तूफान , युद्ध और दुर्घटनाओं से लाखों लोगों का प्रभावित होना भी सच हो सकता है। इस प्रकार से अच्छे या बुरे समय को स्वीकार करना हमारी बाध्यता तो हो सकती है , किन्तु इन दोनों प्रकार के समयों को अलग-अलग कर दिखाने के सूत्रों की पकड़ जब अच्छी तरह हो जाएगी , तो फलित ज्योतिष के द्वारा समय और तिथियुक्त भविष्यवाणियां भी आसानी से की जा सकेगी।

अमुक दिन अमुक समय पर भूकम्प आनेवाला है , तूफान आनेवाला है , कहकर लोगों को सतर्क किया जा सकेगा। अगर ऐसा हो पाया तो बुरे समय का बोध स्वतः हो जाएगा। किन्तु अभी फलित ज्योतिष इतना ही विकसित है कि वह ग्रह की स्थिति अंश , कला और विकला तक कर सकता है , परंतु उसके फलाफल की प्राप्ति किस वर्ष होगी , इसकी भी चर्चा नहीं कर पाता । दूसरी ओर फलित ज्योतिष के ज्ञाता किसी खास घंटा और मिनट को भी शुभ और अशुभ कहने में नहीं चूकते हैं। फलित कथन की यह दोहरी नीति फलित ज्योतिष में भ्रम उत्पन्न करती है।

कभी-कभी एक ही समय में एक घटना घटित होती है और उस घटना का प्रभाव दो भिन्न-भिन्न व्यक्ति और समुदाय के लिए अलग-अलग यानि एक के लिए शुभ और दूसरे के लिए अशुभ फलदायक होता है। इस प्रकार की घटनाएं अक्सर होती हैं , एक हारता है , तो दूसरा जीतता है। एक को हानि होती है , तो दूसरा लाभान्वित होता है। वर्षों तक मुकदमा लड़ने के बाद दोनों पक्ष के मुकदमेबाज ज्योतिषी से सलाह लेने पहुंच जाते हैं। फैसले के लिए कौन सी तिथि का चुनाव किया जाए। पंचांग में एक बहुत ही शुभ समय का उल्लेख है। दोनो पक्ष भिन्न-भिन्न ज्योतिषियों से सलाह लेकर उस शुभ दिन को फैसले की सुनवाई के लिए तैयार होकर जाते हैं। पर परिणाम क्या होगा ? एक को जीत तो दूसरे को हार मिलनी ही है। निर्धारित शुभ समय एक के लिए शुभफलदायक तो दूसरे के लिए अशुभ फलदायक होगा।

दो देशों के मध्य क्रिकेट मैच हो रहा है।  दोनो देशों के निवासी बड़ी तल्लीनता के साथ मैच देख रहे होते हैं। कई घंटे बाद निर्णायक क्षण आता है। जीतनेवाला देश कुछ ही मिनटों में खुशी का इजहार करते हुए करोड़ो रुपए की आतिशबाजी कर लेता है , किन्तु प्रतिद्वंदी देश गम में डूबा , शोकाकुल मातम मनाता रहता है। ऐसे निर्णायक क्षण को बुरा कहा जाए या अच्छा , निर्णय करना आसान नहीं है। इसी तरह बंगला देश के आविर्भाव के समय 1971 में दिसम्बर के पूर्वार्द्ध में एक पखवारे तक दोनो देशों के बीच युद्ध होता रहा , जान-माल की हानि होती रही। बंगला देश अस्तित्व में आया। सिद्धांततः भारत की जीत हुई , पाकिस्तान की पराजय। किन्तु दोनो ही देशों को भरपूर आर्थिक नुकसान हुआ। इन पंद्रह दिनों की अवघि को किस देश के लिए किस रुप में चिन्हित किया जाए। 15 दिनों के अंदर उल्लिखित अमृत , महेन्द्र और सिद्धियोग का भारत और पाकिस्तान के सैनिकों के लिए और बंगला देश के नागरिकों के लिए क्या उपयोगिता रही ?

इस अवधि में बंगला देश निवासी स्त्री-पुरुषों के साथ पाकिस्तानी सैनिकों का अत्याचार अपनी पराकाष्ठा पर था। क्या फलित ज्योतिष के दैनिक मुहूर्तों का इनपर कोई प्रभाव पड़ सका ? मुहूर्त के रुप मे छोटे-छोटे अंतराल की चर्चा न कर स्थूल रुप से ही इस लम्बी अवधि तक की युद्ध की विभीषिका को क्या फलित ज्योतिष में एक अनिष्टकर योग के रुप में  चित्रित किया जा सकता है ? नहीं , क्योकि इस घटना का प्रभाव सारे विश्व के लिए एक जैसा नहीं था । न्यूटन के तीसरे नियम के अनुसार प्रत्येक क्रिया के बराबर और विपरीत एक प्रतिक्रिया होती है। यदि यह प्रकृति का नियम है , तो समय के छोटे से अंतराल में भी , जिसे हम बुरा या अशुभ फल प्रदान करनेवाला कहते हैं , किसी न किसी का कल्याण हो रहा होता है।

अतः किसी भी समय को किसी व्यक्ति विशेष के लिए अच्छा या बुरा समय कहना ज्यादा सटीक होगा। अमृत योग में भी किसी को फांसी पर लटकाया जा सकता है , विषयोग में भी कल्याणकारी कार्य हो सकते हैं । किसी वर्ष मक्का-मदीना में गए हजयात्रियों की संख्या 20 लाख थी। गैस-रिसाव से अग्नि प्रज्वलित हुई तथा तेज हवा के झोकों के कारण आग की लपटे हजारो पंडालों तक फैल गयी। इससे 400 तीर्थयात्री मारे गए। शेष हजयात्रा पूरी करके सकुशल वापस आ गए। जो मारे गए , वे सीधे जन्नत सिधार गए। उनका संपूर्ण परिवार पीडि़त हुआ। जो घायल हुए , वे स्वयं पीडि़त हुए। शेष हादसे से प्रभावित नहीं होने के कारण हजयात्रा की सफलता को उपलब्धि के रुप में लेंगे। सभी अपने अपने दशाकाल के अनुसार फल की प्राप्ति कर रहे थे , मुहूर्त के अनुसार उनका फल प्रभावित नहीं हुआ।

किसी धनाढ्य व्यक्ति के यहां लक्ष्मीपूजन किस समय किया जाए , इसके लिए पंडित शुभ मुहूर्त निकाल देते हैं , पूजा भी हो जाती है , धन की वर्षा भी होने लगती है , किन्तु एक पंडित अपने लिए वह शुभ मुहूर्त कभी नहीं निकाल पाता है । यदि पक्के विश्वास की बात होती , तो पंडित उस शुभ घड़ी में स्वयं अपने यहां लक्ष्मी-पूजन करता और धन की वर्षा उसी के यहां होती , उसे केवल दक्षिणा से संतुष्ट रहने की बात नहीं होती।

निष्कर्ष यह है कि हर समय का महत्व हर व्यक्ति के लिए अलग-अलग होता है। पंचांग में यदि एक समय को शुभ लिख दिया जाए , तो कोई समय शुभ नहीं हो जाएगा। एक समय एक व्यक्ति हॅसता है , तो दूसरा रोता है। यात्रा या मुहूर्त के बल पर बुरे समय को अच्छे समय में बदलना कठिन ही नहीं , असंभव कार्य है। अपने कर्मफल को भोगने के लिए हम सभी विवश हैं। किसी की यात्रा या मुहूर्त उसी दिन शुरु हो जाता है , जिस दिन उसका जन्म पृथ्वी पर होता है। जबतक यह जीवन है , हर व्यक्ति अपने यात्रा-पथ में है।

जन्म के अनुसार संस्कार , विचारधारा , कर्तब्य , सुखदुख सब निर्धारित है। जन्मकालीन ग्रहों द्वारा निर्मित वातावरण इन सबके लिए काफी हद तक जिम्मेवार है। जन्म से मृत्यु तक के यात्रापथ में उसके समस्त कार्यक्रम , उसकी सफलता और असफलता तक के क्षणों का निर्धारण लगभग हो चुका होता है। इस बीच यदि कोई बार-बार मुहूर्त की तलाश करता है , तो क्या सचमुच अपनी प्रकृति , विचारधारा , कार्यप्रणाली और मंजिल को बदलने की क्षमता रखता है ? यदि ये सारे संदर्भ हर समय बदल दिए जाए , तो व्यक्ति कहां पहुंचेगा ?

पंचांगों में शुभ विवाह के लिए बहुत सारे मुहूर्तों का उल्लेख होता है। वैवाहिक बंधनों में बॅघनेवालों के लिए शुभ तिथियां कुल मिलाकर 40 से 50 के बीच होती हैं। उनमें भी कई प्रकार के दोषों का उल्लेख रहता है। लोग भ्रमजाल में उलझे उनमें से किसी अच्छी तिथि के लिए पंडितों के पास पहुंचते हैं। अभिभावकों के पास पंचांगों में लिखी बातों को मानने के अलावा और कोई उपाय नहीं होता। वैवाहिक संस्कार जीवन का एक बहुत ही महत्वपूर्ण संस्कार है , इसका बंधन बहुत ही नाजुक होता है , संपूर्ण जीवन पर गहरा प्रभाव डालनेवाला।

इसलिए लोग शुभलग्न या शुभ तिथियों में ही विवाह निश्चित करते हैं। सीमित तिथियां होने से कभी-कभी एक ही तिथि में शादी की इतनी भीड़ हो जाती है कि हर प्रकार की व्यवस्था में अभिभावकों को काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। उत्सवी वातावरण बोझिल बन जाता है। जिस कार्यक्रम की शुरुआत में ही कष्ट या तनाव हो जाए , उसका मनोवैज्ञानिक बुरा प्रभाव भविष्य में भी देखने को मिलता है। शुभ तिथि के चयन में इस बात का सर्वाधिक महत्व होना चाहिए कि वांछित कार्यक्रम का किस प्रकार से समापन हो , पर इसका सहारा न लेकर ऊबाऊ मुहूर्त की चर्चा करना समाज में व्यर्थ का बोझ देना है। 

पंचांग में शुक्र के अस्‍त होने पर शादी के लिए कोई शुभ लग्न पंचांगों में दर्ज नहीं किया जाता है। पर ज्योतिषियों को यह मालूम होना चाहिए कि शुक्र का अस्त होना हर स्थिति में कष्टकर नहीं होता। सूर्य के साथ अंतर्युति करते हुए जब शुक्र अस्त होता है , तो वह आम लोगों के लिए कष्टकर हो सकता है , किन्तु वही शुक्र सूर्य से बहिर्युति करते हुए जब अस्त हो , तो बहुत ही अच्छा फल प्रदान करता है। जब शुक्रास्त सूर्य के साथ बहिर्युति करते होता है तो शुक्र की कमजोरी को दृष्टिकोण में रखकर वैवाहिक शुभ लग्न का उल्लेख नहीं करना अनजाने में बहुत बड़ी भूल होती है। पंचांग निर्माता या फलित ज्योतिष के विशेषज्ञ विभिन्न कारणों से शादी के लिए किसी वर्ष शुभ लग्न की कितनी भी कमी दर्ज क्यों न करें , विवाह की कुछ संख्या घट सकती है , परंतु होगी तो अवश्य ही और यदि वे लागातार कुछ वर्षों तक शुभ लग्न की कमी दिखलाते रहें तो विवाह बिना लग्न के ही होते देखे जाएंगे।

कहने का अभिप्राय यह है कि विधि-निषेध ओर कर्मकाण्ड से संबंधित ज्योतिषीय चर्चा जब भी हो , उसका ठोस वैज्ञानिक आधार होना आवश्यक होगा , अन्यथा उन नियमों की अवहेलना स्वतः युग के साथ होनी स्वाभाविक है। जब आजतक ग्रह-शक्ति निर्धारण और उनके प्रतिफलन काल से संबंधित ठोस सूत्र ज्योतिषियों को मालूम नहीं है , तो मुहूर्त को लेकर तनाव में पड़ने की कोई आवश्यकता नहीं होनी चाहिए। जबतक फलित ज्योतिष को विकसित स्वरुप न प्रदान कर दी जाए , यानि ग्रह की इस स्थिति का यह परिणाम होगा , यह बात दावे से न कही जा सके , तबतक ज्योतिषियों के अधूरे ज्ञान या संशय का लाभ जनता को मिलना चाहिए। अनावश्यक विधि निषेध से संबंधित नियमावलि से आमलोगों को कदापि परेशान नहीं किया जाना चाहिए।

शादी के लिए कन्या पक्ष और वरपक्ष तैयार है , सांसारिक दृष्टि से उसे अंजाम देने में सप्ताह भर का समय काफी है , परंतु फिर भी विवाह नहीं हो पा रहा है , इसका कारण यह है कि पंचांग में शुभ लगन का अभाव है। इस तरह सिर्फ वैवाहिक लग्न के संदर्भ में ही नहीं , अपितु हर प्रकार के कार्यों में पंचांगों में दर्ज मुहूर्तों का अभाव आम जीवन में कई प्रकार की असुविधाओं को जन्म देता है , जबकि विश्वासपूर्वक मुहूर्तों की उपयोगिता और प्रभाव को अभी कदापि सिद्ध नहीं किया जा सका है।

स्मरण रहे , हर शुभ मुहूर्त का आधार तिथि , नक्षत्र , चंद्रमा की स्थिति , योगिनी , दिशा और ग्रहस्थिति के आधार पर किया गया है , किन्तु ग्रह-शक्ति के सबसे बड़े आधार ग्रह की विभिन्न प्रकार की गतियों के आधार पर मुहूर्तों का चयन नहीं हुआ है। अतः अभी तक के मुहूर्त पूर्ण विश्वसनीय नहीं हैं। अभी यह भी अनुसंधान बाकी ही है कि एक व्यक्ति के लिए सभी शुभ मुहूर्त शुभफल ही प्रदान करते हैं , अतः कर्मकाण्ड से डरने की कोई आवश्यकता नहीं। विकसित विज्ञान का काम सभी व्यक्तियों के मन से भय को दूर कर मनुष्य को निडर बनाना है। .. और हमें उसी प्रयास में बने रहना चाहिए।

न तो एक व्यस्त डॉक्टर मुहूर्त देखकर रोगी का ऑपरेशन करता है , और न ही एक व्यस्त वकील मुहूर्त देखकर अपने मुकदमें की पैरवी करता है , न ही एक कुशल वैज्ञानिक मुहूर्त देखकर उपग्रह या मिसाइल का प्रक्षेपण करते हैं। जो अधिक फुर्सत में होते है , वे ही मुहूर्त की तलाश में होते हैं या फिर जिनके आत्मविश्वास में थोड़ी कमी होती है , वे ही मुहूर्त की चर्चा करते हैं। योजनाओं के अनुरुप हर प्रकार के संसाधन उपस्थित हो तो किसी भी व्यक्ति को यह समझ लेना चाहिए कि मुहूर्त स्वयं आकर हमारे सामने खड़ा है , उसे ढूंढ़ने के लिए पंडित के पास जाने की आवश्यकता नहीं। ऐसी परिस्थिति उत्पन्न होने पर किसी भी व्यक्ति को अपने काम में विलम्ब नहीं करना चाहिए। यह अलग बात हे कि जब योजना को स्वरुप देने में संसाधन की कमी हो रही हो , कई तरह की बाधाएं उपस्थित हो रही हो , तो ऐसी परिस्थिति में ज्योतिषी से यह सलाह लेने की बात हो सकती है कि निकट भविष्य में कोई शुभ मुहूर्त उसके जीवन में है या नहीं ?   

ग्रहीय स्थिति के हिसाब से 11-11-11 जादुई आंकडें का दिन नहीं !!



इंतजार की घडी बहुत निकट आ गयी है , 11-11-11 के जादुई आंकडें के दिन में मात्र चार दिन बच गए हैं। जैसे जैसे यह निकट आ रहा है , वैसे वैसे शुभ काम शुरू करने की प्रतीक्षा में युवाओं के दिल की धडकने तेज हो गयी है। कुछ विवाह के लिए तो कई परिवार नन्हे मेहमान के इंतजार में बैठे है। वे चाहते हैं कि बच्चा सदी की खास तारीख 11-11-11 को ही इस दुनिया में आए। यहां तक कि ऐश्वर्या राय ने भी इसी दिन मां बनने का निश्‍चय किया है। अंक ज्‍योतिषियों की मानें , छह 1 यनि ट्रिपल इलेवन के आने से ही यह दिन महत्‍वपूर्ण बन गया है। इस दिन लडका हुआ तो राजयोग में जन्‍म लेगा , धनवान , ईमानदार, ऊर्जावान , कुशल नेतृत्वकर्ता , पुरुषार्थी होगा , जबकि बेटी हुई तो शक्ति का अवतार और धर्मपरायण होगी , उसे संगीत से लगाव होगा तथा वह लेखनी में निपुण होगी। इस खास तारीख का महत्‍व अंक विशेषज्ञों ने ऐसा बना डाला है कि लोग इस दिन सिजेरियन के लिए भी तैयार हैं , दस दिन पूर्व और पश्‍चात् जन्‍म लेने वाले बच्‍चे भी इसी दिन जन्‍म लेने को विवश हैं। कइयों के मां बाप ने तो अस्‍पतालों में एडवांस बुकिंग भी करा ली है और इस दिन की प्रसूति के लिए विशेषज्ञ डॉक्‍टरों की देख रेख में गर्भवती महिलाओं को रखा गया है।









पर ज्‍योतिष की दृष्टि से देखा जाए तो इस दिन ग्रहों की स्थिति की ऐसी कोई खासियत नहीं दिखाई देती , जिसका प्रभाव जन्‍म लेने वाले बच्‍चे पर असाधारण ढंग से पडे। यह दिन पूर्णिमा का है , इसलिए ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ के हिसाब से चंद्रमा पूरी ताकत में होगा , इस कारण बच्‍चे के बचपन के स्‍वच्‍छंद मनोवैज्ञानिक विकास में कोई बाधा नहीं होनी चाहिए। मंगल की राशि में पूर्ण चंद्र मंगल से संबंधित पक्षों को भी मजबूत बन सकता है। पर इसके साथ का वक्री बृहस्‍पति बच्‍चे को किसी न किसी मुद्दे को लेकर संवेदनशील बनाएगा , जिसका प्रभाव भी उसके विकास पर पडेगा। इस जातक की चंद्र कुंडली में दो दो ग्रहों बुध और शुक्र की आठवें भाव में स्थिति बनेगी , जिसके कारण जीवन के तीन चार पक्ष मनोनुकूल नहीं बने रहने से जीवन में बाधाएं आती रहेंगी। यही नहीं , इन ग्रहों के प्रभाव से बचपन में ही छह वर्ष की उम्र के बाद ही पारिवारिक मामलों में कई तरह की बाधाएं देखने को मिलेगी। चंद्रमा के बाद एक शनि की ग्रह स्थिति ही कुछ मनोनुकूल बनकर जातक को कभी कभी अपने संदर्भों में राहत दे सकती है , पर जिस प्रकार के असाधारण बच्‍चों की बात अंक विशेषज्ञ कर रहे हैं , वैसा तो ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ के हिसाब से हमें नहीं दिखाई देता।